सोमवार, 21 जून 2021

Not So Horrible

 

अति भयानक नहीं

 

1.

अति भयानक नहीं

 

कुछ किस्से ऐसे होते हैं, जिनके बारे में कुछ न कहना ही बेहतर होता है. ऊपर से, अगर तुम्हें उसका अंत मालूम हो तो. पहली बात, ख़तरे से ख़ाली नहीं, दूसरी, ठीक से समझ नहीं पायेंगे. हो सकता है बिल्कुल ही न समझ पायें. और हो सकता है, समझ जायें, मगर वे नहीं जिन्हें समझना चाहिये. सही है, नये साल की पूर्व संध्या पर कुछ ऐसे किस्से निकल आते हैं जिन्हें पर्याप्त मात्रा में समझा जा सकता है, काफ़ी दिनों तक उनकी फ़रमाइश भी की जाती है, जैसे, उस किस्से की, जो कोई एक फमीच लेखक तुर्गेनेव के बारे में सुनाना चाहता था, अगर मैं उसे ठीक से समझा हूँ तो... सिर्फ इस समय मैं न तो तुर्गेनेव के बारे में और न ही रहस्यमय फमीच के बारे में ( जिसके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता), बल्कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के पूरी तरह वास्तविक आदमी के बारे में बताने जा रहा हूँ, उसका नाम है सुदाकोव यिव्गेनी वलेरेविच.

सुदाकोव कार्मिक प्रबंधक था, जिस फ़र्म में वह काम करता था वह तरक्की कर रही थी. उसका सब कुछ अच्छा था, वह हर काम में सफ़ल हो रहा था. सेहत बेहद बढ़िया थी, सिगरेट नहीं पीता था, शराब भी नपी-तुली पीता था, बेहतरीन दंत चिकित्सकों द्वारा अनुसंशित टूथपेस्ट का इस्तेमाल करता था. भविष्य की ओर सकारात्मक दृष्टि से देखता था. एक बार (बात दिसम्बर के अंत की है) सुदाकोव दीवान पर लेटा था और यूँ ही पुराने रेडियो की बटन घुमा रहा था. उसकी पत्नी और बेटी शाम को किसी ख़ास शॉपिंग पर गई थीं, जिसका परिणाम होने वाला था, जैसा उसका अनुमान था, नये साल का उपहार, शायद, 64,000 प्रविष्ठियों वाला कहावतों का बृहद कोष. उसे अक्लमन्दी पसंद थी, साथ ही – संक्षिप्तता और सटीकता भी अच्छी लगती थी. वह कल्पना कर रहा था कि कैसे पत्नी और बेटी जल्दी ही बर्फ़ से आयेंगी और कैसे पत्नी बातों में उसे उलझायेगी, ताकि बेटी भारी-भरकम पैकेट के साथ चुपचाप कमरे में खिसक जाये या, कम से पैकेट को डबल-डोर के बीच कहीं छुपा दे. उसकी बेटी म्यूज़िक-स्कूल में वॉयलिन की क्लास में पढ़ती थी, और पत्नी शाकाहारी थी और पशु कल्याण समिति की सदस्य थी.

राऊँण्ड टेबल कॉन्फ्रेंस चल रही थी, शायद अर्थशास्त्र पर...सुदाकोव को पता नहीं था कि कौन सी वेव लेंथहै. वह आगे बढ़ जाना चाहता था, बिना ध्यान दिये, मगर बातचीत का संचालन करने के किसी अजीब, लगभग विक्षिप्त तरीके ने उसका ध्यान खींच लिया. प्रसारण में भाग लेने वाले जैसे किसी बात से डरे हुए थे. और, जैसे उन्हें कोई और ही चीज़ परेशान कर रही है, न कि वह जिसके बारे में वे अभी बहस कर रहे थे. वे तीन थे, एक को दूसरे दो फमीच कहकर संबोधित कर रहे थे, बिना नाम लिये, सिर्फ पिता के नाम से, और ये अजीब बेतकल्लुफ़ी पूरे कार्यक्रम को मिली जुली बातचीत का रंग दे रही थी. फमीच धीमी आवाज़ में ऑइल फ्यूचर्स के कॉन्ट्रेक्ट्स में गिरावट के बारे में जानकारी दे रहा था, अक्सर शब्दों में गड़बड़ करते हुए, पारिभाषिक शब्दों को भूलते हुए. अचानक वह वाक्य पूरा किये बिना रुक गया. हाथापाई की आवाज़ सुनाई दी. छक्-छक्. और अचानक:

“फमीच, तुम कहाँ हो?,,,क्या तुम यहाँ हो, फ़मीच?...वह यहाँ है या नहीं है?”

“यहीं है वह, यहीं पर,” दूसरे ने पहले वाले को जवाब दिया.

“मैं यहीं हूँ, दोस्तों. मैं आपके साथ ही हूँ.”

ये कैसा नॉन-प्रोफ़ेशनलिज़्म है?’ सुदाकोव अपने आप से भुनभुनाया.

तभी फमीच से विनती की गई कि वह कोई किस्सा सुनाये.

फमीच: कौनसा किस्सा?

पहला: कोई भी किस्सा.

दूसरा: वर्ना तो, कुछ डरावना-सा लग रहा है, फमीच.

फमीच: कौन-सा किस्सा सुनाऊँ आपको?

पहला : कोई भी, फमीच, सिर्फ भयानक न हो.

दूसरा : भयानक किस्से नहीं चाहिये, ठीक है. फमीच?

फमीच : सभी किस्से भयानक हैं. मैं सिर्फ भयानक किस्से ही जानता हूँ.

पहला: झूठ बोल रहे हो, सिर्फ भयानक नहीं.

दूसरा : फमीच, हमें डराओ नहीं, तुम देख ही रहे हो कि हमें वैसे भी डर लग रहा है...

पहला : चल, चल, सुना रे...

 सुदाकोव को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था. ये क्या बकवास है? अभी-अभी तो पेट्रोल की कीमतों के बारे में बात कर रहे थे...

फमीच: ठीक है. सुनिये. पिता का नाम था सिर्गेइ निकलायेविच, वह घुड़सवार दस्ते का सेवानिवृत्त अफ़सर था. माँ वर्वारा पित्रोव्ना एक अमीर ज़मींदार घराने से थी. तुर्गेनेव का बचपन अर्लोव प्रांत में माता-पिता की जागीर में हुआ. पहले सिक्षक थे फ़्योदर लबानव, जो दास-सेक्रेटरी थे. एक बार छह साल के तुर्गेनेव को एक मशरूम मिली, साधारण मशरूम – ज़हरीली. ये अजीब लग सकता है, मगर उन्नीसवीं सदी में ऐसी मशरूम खाने लायक समझी जाती थीं, कम से कम उन्हें ख़तरनाक नहीं समझा जाता था...

पहला: फमीच, तू क्या कह रहा है? तुझे क्या हुआ है?

फमीच : क्या? आख़िर, बात क्या है?

दूसरा: तू कहाँ है, फमीच?                          

फमीच : “कहाँ” से क्या मतलब है? यहीं हूँ.

पहला: फमीच, तू नहीं है. सिर्फ तेरी आवाज़ है.

दूसरा: फमीच, आवाज़ दे.

फमीच: अच्छा?

पहला : ये : “अच्छा” है, मगर तू ख़ुद नहीं है...

फमीच : अच्छा? अच्छा?

पहला : अच्छा-अच्छा मत कर, फमीच. तू कहाँ है? तू क्यों नहीं है? कुछ कहो! मुझे डर लग रहा है, फमीच...

दूसरा: हमें डराओ मत, फमीच. तू ऐसा क्यों कर रहा है, फमीच?....

फमीच : अच्छा?

पहला : फिर “अच्छा”!

फमीच : ख़ुद ही तो, ख़ुद ही तो...अपनी ओर तो देखो!...आप ख़ुद कहाँ हो?

दूसरा : हम यहीं हैं! ये कैसा सवाल है?!

पहला: हम यहीं हैं...हम हिल रहे हैं...

फमीच : हिल रहे हैं वे! अगर तुम लोग यहाँ हिल रहे हो, तो-फिर, तालियाँ बजाओ...

दूसरा : ये क्या बात है, फमीच?

फमीच : आहा! नहीं बजा सकते! क्योंकि तुम्हारे हाथ ही नहीं हैं, इसीलिये!...

पहला: फमीच...क्या बकवास कर रहे हो, फमीच?...

दूसरा: ये सही नहीं है, फमीच...

फमीच : अगर सही नहीं है तो पैर पटक कर दिखाओ. तो?

पहला: ये सब क्या है, फमीच...

फमीच : तुम्हारे पैर ही नहीं हैं! तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है! सिर्फ आवाज़ें हैं.

दूसरा : मगर हम ख़ुद कहाँ हैं?

फमीच : ये किसे मालूम है...

पहला: फमीच, तूने कहा “किसे”...ये मालूम है “किसे”? ये कौन है – “किसे”?

फमीच : मैंने सिर्फ यूँ ही कह दिया. कोई नहीं.

पहला : नहीं, फमीच. ये यूँ ही नहीं है. जवाब दे. “और ये किसे मालूम है”. ये तेरे लब्ज़ हैं – किसे मालूम है?

फमीच : अरे, उसे, जो सुन रहा है...हमें.

दूसरा : और हमें कोई सुन रहा है?

फमीच : मेरा ख़याल है, हाँ.

पहला : हमें कौन सुन रहा है?

फमीच: मुझे कहाँ से पता. ऐसा हो ही नहीं सकता कि हमें किसी ने सुना ही नहीं.

दूसरा: और अचानक हम वहाँ – उसके पास हों? वह सुन रहा है – और हम उसके यहाँ हैं...

पहला: मैं प्रवेश-कक्ष में, हैंगर के पीछे खड़ा हूँ...क्या ऐसा हो सकता है?

दूसरा : “और मैं कमरे में, परदे के पीछे...वहाँ हवा चल रही है. फ़मीच, मुझे ठण्ड लग रही है.

पहला : और, तू कहाँ है, फ़मीच?

फमीच: और मैं बाथरूम में हूँ...मैं टब में लेटा हूँ – मुँह नीचे करके.

दूसरा : मगर मुँह नीचे करके क्यों, फमीच?

फमीच : ये मेरा मामला है, किसलिये.

पहला : फमीच, मगर तेरे पास है...मुँह?

फमीच : उत्सुकता – पाप है...मेरे प्यारों...ईईई...ई.ई.

पहला : फमीच, तेरी आवाज़ को क्या हुआ?

फमीच : कुछ नहीं, सब ठीक है. ई. ई.

पहला : फमीच, और अगर वह कार में बैठा है – कौन हमारी बातें सुन रहा है, आँ? तब हम कहाँ हैं?...

फमीच : ई...ईईई...ई...वह कार में नहीं है...ई. 

दूसरा: फमीच, और अगर अचानक वह हमें – खट् से?...

पहला : ऑफ़ कर देगा, क्या?

दूसरा : हाँ, हाँ. हम उसके यहाँ रह जायेंगे?...या नहीं?

पहला : बिना आवाज़ों के?...

फमीच : कोशिश तो करे. ई.

दूसरा : ई. ई.

पहला : तू ऐसा क्यों कर रहा है, फमीच?

फमीच : ई. ई.

दूसरा : फमीच को क्या हुआ ?

पहला : उसकी आवाज़...ई...ग़ायब हो रही है...

दूसरा : और वह ख़ुद?

पहला : ई...मालूम नहीं...

दूसरा : फमीच!

फमीच : ई.ई.ई.

पहला : ई.ई.

दूसरा: दोस्तों, आप क्या कर रहे हैं?...ई...किसलिये?...

फमीच : ई.

दूसरा : दोस्तों...ई...आप कहाँ....पहला : ई...ई...ई....

और – ख़ामोशी.

ये क्या था?’- सुदाकोव ने बटन घुमाया और दूसरी फ्रिक्वेन्सी पर चला गया : वहाँ कैलोरी-फ्री मायोनेज़ का इश्तेहार दे रहे थे. उसने बटन पीछे घुमाया, और, पहले वाली फ्रिक्वेन्सी को फांदकर, “शिल्कून्चिक” पर चला गया. उस फ्रिक्वेन्सी पर वह पहुँच ही नहीं पाया – वहाँ पूरी तरह से ख़ामोशी थी.

मैं बताना भूल गया कि सुदाकोव का रेडियो बैटरी पर चलता था, और ख़ुद सुदाकोव आधे अंधेरे में बैठा था, क्योंकि चालीस मिनट पहले सब-स्टेशन पर दुर्घटना हो गई थी, और घर में बिजली नहीं थी. मगर, रास्ते के बिजली के खंभों के कारण कमरे में काफ़ी रोशनी थी. परदों की ओर देखते हुए, सुदाकोव फिसलती हुई फुर्तीली परछाईयाँ देख सकता था, बर्फ गिर रही थी.

प्रवेश कक्ष में परदे के पीछे कुछ गिरा.

वह उठा और शोर सुनकर प्रवेश कक्ष की ओर गया. मगर हैंगर्स तक दो मीटर भी न जाकर, रुक गया.

बाथरूम से निश्चित रूप से चटखारे लेने की आवाज़ आ रही थी.

“कौन है यहाँ?” सुदाकोव ने मानो किसी और की आवाज़ में पूछा. 

कल्पना कीजिये, आप प्रवेश कक्ष में अकेले हैं और कोई पीछे से आपके कंधे पर हाथ रख देता है.

पीछे मुड़कर देखने की सुदाकोव की हिम्मत नहीं हुई. उसके हाथ-पैर सुन्न हो गये. मगर सुदाकोव को बचाया इसने नहीं, उसे इस बात ने बचाया कि मेरी क्रिसमस की कहानी के लिये मेरे पास सात हज़ार शब्द हैं. कितना ख़ुशनसीब था वह. सुदाकोव अब कभी नहीं जान पायेगा. अच्छा, मेरे दोस्त, जी ले, अभी शाम नहीं हुई है. स्वाभाविक बने रहो, टैक्स भरते रहो. नया साल मुबारक हो तुझे! सबको – सुख की कामनाएँ.

 

2.

“सबके सुख की इच्छा कर रहा है. और यह कि टैक्स भरते रहें!” ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने पूरी कहानी पढ़कर चहकते हुए कहा.

ड्यूटी-इन्स्पेक्टर मझोले कद का, गठीले बदन का था और कैप्टन की रैंक का था. सचित्र पत्रिका, जिसे वह पढ़ रहा था, मेज़ की सतह पर किनारे से कोण बनाते हुए रखी थी, इसलिये ख़ुद पाठक भी तिरछा बैठा था : कैप्टन जैसे एक और बार उसे छूने से बचने की कोशिश कर रहा था.

“आप ज़रा देखिये, लीदिया पित्रोव्ना, यहाँ तस्वीर भी ऐसी है – कुछ भी समझ में नहीं आयेगा. क्या आप मुझे बता सकती हैं कि यहाँ क्या बना हुआ है?”

लीदिया पित्रोव्ना उबले हुए पानी का बर्तन लेकर कैप्टन की मेज़ के पास से जा रही थी; उसने पत्रिका पर सिर्फ एक सरसरी नज़र डाली.

“हम किसी बात पर आश्चर्य करें...शुक्रगुज़ारी – ज़ीरो. बल्कि किसी बात का इलज़ाम भी लगा देंगे.”

सवाल जिस बारे में किया गया था, उसका लीदिया पित्रोव्ना की बात से ज़रा भी संबंध नहीं था, मगर उन दोनों को – कैप्टन को भी, और लेफ़्टिनेन्ट को भी (स्वागत कक्ष में वह तीसरा आदमी था) – यह कथन सही प्रतीत हुआ. हरेक ज़िम्मेदारी निभाता है. और हर कोई – अपनी, अपनी.

इस बात पर कौन बहस कर सकता था कि नशा-विमुक्ति केन्द्र में नर्स का काम सबसे ज़्यादा कठिन होता है? मगर आसान काम किसका है, जैसा कि कहते-पूछते हैं?

अभी पिछले सोमवार की ही तो बात है कि यहाँ लाये गये एक मरीज़ के पेट में छेद दिखाई दिया था – मुश्किल से अस्पताल में ला सके. नवम्बर में मरीज़ को कोमाकी हालत में लाया गया, खून की उल्टियाँ कर रहा था, पीला पड़ गया था, रोगनिरोधी कैबिन के वॉल पेपर की तरह, बस लिवर के कॉमा में मरने ही जा रहा था. एक बार एक धुत् शराबी को लाये, मगर जाँच करो तो वह नशे में चूर निकला. किसी अनजान नशे के कारण मूर्च्छित लोगों को यहाँ निरंतर एक नेटवर्क के द्वारा लाया जाता था. लीदिया पित्रोव्ना को ख़ास तौर से “लेखकों” से नफ़रत थी (अपने आप को लेखक कहने वाले लोगों को यहाँ करीब डेढ़ महीने में एक बार लाया जाता था). उसे लगता था कि लेखक, या तो किसी फ़ैशन के कारण, या अपनी मर्ज़ी से, या परिष्कृत चालाकी से, सबको मिर्गी के दौरों से बीमार कर देते हैं, और मिर्गी के दौरे के बाद की हालत को, जिससे हर स्वास्थ्य-सहायक वाकिफ़ होता है, आसानी से उन लक्षणों के संयोजन से गलत समझा जा सकता है, जो मध्यम दर्जे के नशे को सूचित करते हैं.

अगर कोई उससे कहता, कि वह अपनी उम्र के मुताबिक अच्छी ही लगती है, तो वह ख़ुश हो जाती.

अपने सफ़ेद एप्रन को ठीक-ठाक करके लीदिया पित्रोव्ना लिखने की जर्जर मेज़ पर बैठ गई, जो, सच कहा जाये तो, उसे बिल्कुल पसंद नहीं थी – इसलिये नहीं कि वह लंगडी और भद्दी थी, जितना इसलिये कि सूची के अनुसार उसे नहीं दी गई थी.

“या तो बीबी, या भूत,” पत्रिका में पढ़ी हुई कहानी के साथ दिये गये चित्र को अच्छी तरह देखते हुए ड्यूटी-इन्स्पेक्टर बड़बड़ा रहा था.

“तो, मैं उसके पीछे चला,” लेफ्टिनेन्ट ने कहा. “आख़िरी वाला बच गया है. या उसे सुबह तक रोक लेंगे?”

नर्स तैश में आ गई.

“भाड़ में जाये आख़िरी वाला! आराम करने को दिल चाह रहा है!”

“जाओ,” ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने हुक्म दिया. “कपड़े वापस कर देना – कोई बहस नहीं!”

“बेकार ही रुक गया,” लेफ्टिनेंट को अफ़सोस हुआ, “अब सो नहीं सकूँगा.”

“मैं यही तो कह रहा हूँ, रुके रहो,” - जाने वाले को डांटा.

कैप्टन के साथ अकेले रह जाने पर नर्स ने कहा:

“उसे पर्फ्यूम इस्तेमाल करने का हुक्म दो.”

“ये उसके पास से नहीं, ये वहाँ से आ रही है,” लेफ्टिनेंट के बचाव में ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने कहा.

वहाँ सेके बारे में मैं ख़ुद भी जानती हूँ,” आवाज़ में तैश का पुट लाते हुए नर्स ने कहा; सफ़ाई के अन्य कामों के अलावा, ताज़ी हवा का संचारण भी उसकी ज़िम्मेदारियों में शामिल था, जिसके बारे में ही ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने इशारा किया था, ऐसा उसे लगा.

(वैसे वहाँ, जहाँ “वहाँ से”, लेफ्टिनेन्ट अब खोल रहा था, खड़खड़ाता हुआ, आधा दरवाज़ा - आधी जाली).

“या, आपके ख़याल से मैं गंध नहीं पहचानती?” उसने उबले हुए पानी में चाय के एकदम दो पैकेट डाल दिये (लीदिया पित्रोव्ना को बेहद कड़कचाय पसंद थी). “ये सही है कि काम शारीरिक है, पसीना बहाना पड़ता है, मगर मेरे बारे में सोचना भी अच्छा होता. क्या मैं औरत नहीं हूँ?”

कैप्टन सिर्फ दायें हाथ से पत्रिका के पन्ने पलट रहा था, बायाँ हाथ उसने कुहनी से सीधा रखा था और, हाँलाकि इसकी ज़रूरत नहीं थी, मज़बूती से उसे मेज़ के किनारे पर टिका रखा था. पत्रिका चिकनी-चमकदार, महंगी, मोटी-सी, रंगबिरंगी, हर तरह की बकवास से भरपूर थी, जैसे राशि-भविष्य, कहानियाँ, चुटकुले, हर संभव वस्तु की रेटिंग और गुज़रते हुए साल के परिणाम; हर संभव मशहूर व्यक्ति के छोटे-छोटे इंटरव्यू जिनके बारे में ड्यूटी-इन्स्पेक्टर न तो कुछ जानता था और न ही उसने कुछ सुना था, इस पत्रिका की ख़ास पहचान थे. मगर सबसे ज़्यादा पत्रिका में थे – इश्तेहार.

“ये रही मायोनेज़,” ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ख़ुश हो गया.

“और कौन सी मायोनेज़ है?”

“कैलोरी-मुक्त”

नर्स को बचपन याद आया:

“मेरे लिये, जब छोटी थी, पापा ने बच्चों वाली किताब ख़रीदी थी, छोटी बच्चियों के लिये कहानी संग्रह, और वहाँ थी छपाई की ख़ामी – चार पन्ने बिल्कुल कोरे थे. और मैंने सोचा कि उनके पास छापने के लिये कुछ नहीं है. कहानियाँ कम पड़ गई होंगी, तो कोरे पन्नों के साथ ही किताब निकाल दी. मैंने तय कर लिया, कि लेखक कम होंगे, कि उन्हें लिखना नहीं आता होगा. प्रकाशक की मदद भी करना चाहती थी, बस, चार पन्नों की कहानी लिखने बैठ गई, छोटी लड़कियों के बारे में. करीब-करीब पूरी ही कर ली थी. नहीं तो लेखक बन सकती थी. वह बात आगे बढ़ी नहीं.

“फ़मीच क्यों? फमीच ही क्यों, दूसरा कोई क्यों नहीं?” ड्यूटी-इन्स्पेक्टर असमंजस में था. “पित्रोविच क्यों नहीं? सिम्योनिच क्यों नहीं?”

उसने कहानी को दुबारा पढ़ने के बारे में सोचा, मगर आरंभ शुरू से नहीं, बल्कि उस जगह से किया, जहाँ फ़मीच पहली बार पूछता है : “अच्छा?”

“बस करो,” लीदिया पित्रोव्ना के उकता कर कहा. “पढ़ना हानिकारक है. आँख़ें ख़राब कर लोगे.”

इसी समय स्वागत-कक्ष में लेफ्टिनेन्ट के साथ एक क्लायन्ट आया.

लेखक महाशय की दाढ़ी उलझी हुई थी, वह ख़ुद जूते-कपड़ों में था, और न सिर्फ जूते, पतलून और स्वेटर पहने था, बल्कि ओवरकोट भी पहने था. पट्टे से लटकता हुआ पर्स भी था – पूरा और साबुत. घर में उसे उसमें एक प्लास्टिक का मुड़ा-तुड़ा गिलास मिलेगा.

मेज़ पर प्रमुख को देखकर, लेखक ने ज़ोर से कहा:

“आपने मेरी कमीज़ की कॉलर फ़ाड़ दी!”

नर्स सहृदयता से मुस्कुराई.

“अफ़साना न बनाइये,” कठोर, मगर शांत स्वर में ड्यूटी-इन्स्पेक्टर के जवाब दिया और फट् से पत्रिका बंद कर दी. “मैंने आपका कुछ नहीं फ़ाड़ा है.”

“इसने!” लेखक ने लेफ्टिनेन्ट की ओर उँगली से इशारा किया.

नर्स ने क्लायन्ट के पीछे से इशारा किया, और लेफ्टिनेन्ट, सलाह मानकर फ़ौरन प्रक्रिया-कक्ष में लौट गया.

“बैठिये, प्लीज़,” ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने कहा, “दंगा-मस्ती नहीं करेंगे, ये आपको शोभा नहीं देता. ये रही रजिस्ट्रेशन-बुक”, उसने लोगों की रजिस्ट्रेशन-बुक निकाली.

मुखपृष्ठ पर ख़ूबसूरत लड़की की तस्वीर वाली शानदार पत्रिका के सामने रजिस्ट्रेशन-बुक बेहद भद्दी लग रही थी. कैप्टन ने क्लायन्ट को हाल ही के नोट्स दिखाए.

“देखिये. आपके ऊपर किसी भी तरह के बल प्रयोग के बारे में कुछ भी नहीं लिखा गया है. यकीन हो गया? चलिये, इस बारे में और बात नहीं करेंगे. ज़्यादा दिलचस्प किस्से के बारे में बातें करें. आपने मेरी दिलचस्पी जगा दी है. मैंने पूरी पढ़ ली. हाँ, पूरी तरह ध्यान से. बस, कुछ भी समझ में नहीं आया, कि आप अपनी रचना से प्रकट क्या करना चाहते थे.”

लेखक ने पीठ सीधी की, जैसे कुछ कहने जा रहा हो, मगर कहा कुछ नहीं.

“काफ़ी कुछ धुंधला-सा, अस्पष्ट-सा है,” कैप्टन कहता रहा. “हालाँकि बड़े रोचक ढंग से लिखा है, मगर किसलिये? इरादा क्या है? मुझे सिर्फ उत्सुकता है.”

“सहानुभूति है,” लेखक ने कहा.  

“सहानुभूति की ज़रूरत नहीं है. सिर्फ समझना चाहता हूँ. कौन चटखारे ले रहा था? वहाँ बाथरूम में कोई चटखारे ले रहा था, मुझे समझ में नहीं आया कि कौन और किसलिये? और ये भी समझ में नहीं आया कि कंधे पर हाथ किसने रखा था.”

लेखक ने जवाब देने में जल्दी नहीं की.

“और आवाज़ों के साथ क्या हुआ. और सब लोग ग़ायब क्यों हो गये? हाँ, यह सबसे प्रमुख है – आवाज़ें क्यों ग़ायब हो गईं?और तुर्गेनेव किसलिये? वो वाला तुर्गेनेव ही है ना?”

लेखक ख़ामोश रहा.

“और “अति भयानक नहीं” क्यों? तो फिर “अति भयानक” क्या है? मैं सिर्फ सब कुछ समझ नहीं पाया, और कुछ ज़्यादा समझना चाहता था.”

“ये पवित्र कहानी है.”

“मैं समझ रहा हूँ.”

“आभासी पवित्र,” लेखक ने बेचैनी से अपनी दाढ़ी सहलाते हुए स्पष्ट किया.

“मैं समझ रहा हूँ. तो फिर क्या?”

लेखक ने पूछा:

“क्या यह पूछताछ हो रही है?”

लीदिया पित्रोव्ना की भारी आह सुनाई दी.

ड्यूटी-इन्स्पेक्टर उदास हो गया.

“मेरा कॉम्रेड था, फमीचेव, कैप्टन, जैसा मैं हूँ...उनके यहाँ दूसरे में तीस बेड्स थे, वह बॉस था...हम उसे, जब काम पर होते थे...फमीच कहकर बुलाते थे...मर गया.”

लीदिया पित्रोव्ना ने गिलास मेज़ पर रख दिया. सिर्फ दीवार के पीछे प्रक्रिया-कक्ष में लेफ्टिनेन्ट की ख़ामोश उपस्थिति का एहसास हो रहा था. ख़ामोशी के पल मिनट भर भी चल सकते थे. ऐसा न हो, इसलिये “अति भयानक नहीं” का लेखक आवाज़ करते हुए अपनी कुर्सी पर कसमसाया और खाँसा. चूँकि कैप्टन ख़ामोशी को भंग करने की जल्दी में नहीं था, लेखक ने, मेज़ के नीचे कहीं देखते हुए पूछा;

“कर्तव्य करते हुए?”

जवाब फ़ौरन नहीं आया:

“साइरोसिस से.”

पहले ही की तरह मेज़ के नीचे कहीं नज़र गड़ाए, लेखक ने अनायास ही भँवें हिलाईं, जिसका मतलब कैप्टन ने अपने कॉम्रेड की मृत्यु के कारण के मूल्यांकन की पुष्टि से लगाया:

“आप फिर से ग़लत हैं. मैं जानता हूँ, कि आप क्या सोच रहे थे. ये बिल्कुल कर्तव्य करते हुए नहीं हुआ था.”

“औसत दर्जे के शराबियों को,” नर्स की आवाज़ आई, “ साइरोसिस कुछ कम होता है, बनिस्बत उन लोगों के जो बिल्कुल नहीं पीते.”

ख़ामोश रहे.

“क्या मैं आज़ाद हूँ?” लेखक ने पूछा.

“करीब-करीब. औपचारिकताएँ पूरी करनी हैं.”

कैप्टन ने जैसे अपनी बात को साबित करते हुए मेज़ से रिपोर्ट उठाई जिसे वह पहले ही तैयार कर चुका था, और उसे अपनी आँखों के सामने लाया, मगर उसमें कोई नई प्रविष्टी न देखकर (क्योंकि उसमें नया हो ही नहीं सकता था), उसे वापस मेज़ पर रख दिया.

उसकी आवाज़ थरथरा गई:

“आप, शायद कोई ऐसी बात जानते हैं, जो औरों को मालूम नहीं है.”

“मैं?”

“मगर आप क्या जानते हैं? आप तो कुछ भी नहीं जानते. मगर सब आपको सुनने के लिये बाध्य हैं. आप रूस के निर्माण के बारे में कैसे बोलेंगे. नैतिक मूल्यों के बारे में. जासूसी उपन्यास पढ़त हो – हँसने को जी चाहता है. आप लोग हैं कौन? कहाँ से आये हैं? इन्सान का दिमाग़ – ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं में सबसे जटिल है. और ख़ुद इन्सान भी. जब उसे देखते हो, कैसे वह यहाँ कच्छे में उल्टी में लिपटा पड़ा है – ख़ौफ़ दबोच लेता है. ब्रह्माण्ड के लिये डर लगता है. यही है विकास की चरम सीमा. समझ रहे हो? तेरह अरब वर्ष पहले. विस्फ़ोट. विकिरण. धूल. हाइड्रोजन. पदार्थ. व्यवस्था. इन्सान – एक व्यवस्था है, सुव्यवस्था, किसी चीज़ ने हमें सुव्यवस्थित कर दिया – सर्वोच्च क्रम में. परमाणु को परमाणु से, अणु को अणु से. और अचानक – धड़ाम् से  ज़मीन पर. और ख़ास बात – क्या फ़र्क है मुझमें और उसमें, जब वह कच्छे में है और ज़ुबान नहीं हिला पा रहा है? हाँ, कोई फ़र्क नहीं है. अगर तेरह अरब वर्षों की स्थिति से देखें – कोई फ़र्क नहीं है. क्या वो, क्या मैं, क्या तू, क्या ये लड़की. और ब्रह्माण्ड में हमसे ज़्यादा क्लिष्ट कुछ और है ही नहीं. जब कच्छे में फ़र्श पर पड़े हो तब भी. और अचानक – कुछ नहीं. और कुछ और. मगर क्या? आप नहीं जानते कि क्या. और वहीं. फ़मीचेव मुझसे फ़्राइंग पैन के बारे में कहता था. जैसे, मैं और फ़मीचेव बहस कर रहे हैं, क्या ज़्यादा बेहतर रहेगा – जब फ्राइंग पैन में कोई चीज़ तली जाती है या जब वहाँ कुछ भी न हो. वह कहता है कि फ्राइंग पैन में तलना बेहतर होगा, अगर हो तो. बुरी बात है, मगर ठीक है कि तुम किसी तरह हो तो सही. और मेरे ख़याल में, बेहतर होता कि कुछ भी न हो. जैसे जिया-जिया, और बस. खालीपन. खालीपन भी नहीं.

.”

उनकी आँखें मिलीं.

.... – कड़वाहट से क्लायन्ट ने उच्चारण किया, बदले की भावना से मुस्कुराते हुए.

कैप्टन को गुस्सा आ गया:

“आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? बुरी बात है.”

वह उठा, सामने वाली दीवार की ओर गया और प्रेसिडेन्ट की तस्वीर को सीधा किया (वह वाकई में तिरछी लटक रही थी); इसके बाद अपनी जगह पर लौट आया.

“अलेग अन्द्रेयेविच”, नर्स ने कहा, “एक बजने में दस मिनट हैं.”   

“मगर उसे मेट्रो से नहीं जाना है, “ मायूस ख़ुशी से कैप्टन ने जवाब दिया, “वह बगल वाली सड़क पर ही रहता है.”

“अगर एक बजे तक नहीं गया, तो सिर्फ पाँच बजे के बाद ही.”

“छोड़िये भी आप ये निर्देश, लीदिया पित्रोव्ना! अभी भेज देते हैं, परेशान न हो. कितना है?” कैप्टन ने रिपोर्ट में देखा. “सात सौ तीस रूबल्स? सब कुछ वापस लौटा रहे हैं. एक एक कोपेक. वर्ना कुछ लोग हम पर इल्ज़ाम लगाते हैं.”

लेखक पहले की तरह मुस्कुरा रहा था, सिर्फ, कुछ ज़्यादा ही कड़वाहट से. 

“ब्रह्माण्ड की बात कर रहे हैं? कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, ब्रह्माण्ड भी मिलेगा आपको, जल्दी ही यह निठल्लेपन की नौकरी ख़त्म हो जायेगी. पूरे शहर के लिये सिर्फ दो नशा विमुक्ति केन्द्र बचे हैं. जबकि पाँच थे!”

“आप पच्चीस तो नहीं चाहते?” नर्स चहकी. “मैं साल भर बाद रिटायर हो रही हूँ. जब मैंने शुरुआत की थी, तब पच्चीस नशा विमुक्ति केंद्र थे!”

“जितना ज़्यादा पियेंगे, उतना ही कम होश में रहेंगे,” कैप्टन ने कहा. “और, पहियों में डंडे डालते हैं...निर्देशों से, आदेशों से...यहाँ ब्रह्माण्ड का कोई काम नहीं है.”

“ऐसा कैसे?” कहानी का लेखक चहका, खास तौर से किसी एक से नहीं और फ़ौरन पूरी दुनिया से मुख़ातिब होते हुए, “ क्या मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं था? किसी को तंग कर रहा था? क्या ज़मीन पर संतुलित ढंग से नहीं चल रहा था?...विशेषज्ञों की सलाह क्यों नहीं ली गई?”

क्लायंट ने ध्यान ही नहीं दिया,” कड़वाहट भरी मुस्कान से नर्स ने कहा.

“ये और लो,” कैप्टन ने कहा. “उन सबको सिर्फ एक ही बात की परेशानी है कि विशेषज्ञों की सलाह  क्यों नहीं ली गई. दूसरी बात के बारे में वे सोचते ही नहीं हैं. मगर लीदिया पित्रोव्ना तो सरसरी बिगाह से देखकर ही भाँप लेती है कि उनके खून में अल्कोहोल की कितनी मात्रा है, हाँलाकि सिर्फ डिग्री ही काफ़ी है.”

“अभी भी तीन सौ से कम नहीं है,” लीदिया पित्रोव्ना ने आँख से ही पहचान लिया. “और हालत – सामान्य है. इस समय.”

“क्या इसका मतलब यह है, कि आप छुट्टी देने की संभावना के बारे में राय दे रही हैं?” कैप्टन ने जानबूझकर औपचारिक लहजे में लीदिया पित्रोव्ना से पूछा.

“एकदम सही,” नर्स ने कहा. 

कैप्टन ख़ुश हो गया.

“गर्मियों में आपका साथी यहाँ था. कुलनाम याद नहीं है. उसने तो स्ट्रासबुर्ग की अदालत में जाने की धमकी भी दी थी. सिर्फ विशेषज्ञों की राय के बारे में परेशान था, कि विशेषज्ञों ने उसकी जाँच क्यों नहीं की. और इसीलिये कि आप पर, कुछ गिने-चुने इन्सानों पर,  दया आती है. अगर विज्ञान के सभी नियमों के अनुसार विशेषज्ञ आते, तो आपसे, ज़ाहिर है, छह सौ पचास नहीं लिये जाते!

क्या मुझे छह सौ पचास देना है?” लेखक ने पूछा.

“आपको हक है कि सरकारी बैंक में भी भर सकते हैं, सिर्फ वह ज़्यादा परेशानी का काम है...यहाँ की अपेक्षा.”

“दिलचस्प बात है, किस बात के लिये?”

“आपने मुझमें उत्सुकता उत्पन्न की, सिर्फ इसीलिये मैं इतना उत्सुक हूँ.” कैप्टन ने जवाब दिया. “रुकिये, रसीद लिखता हूँ.”

 

रसीद भरते हुए, ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने बीच-बीच में दस्तावेज़ से नज़र हटाते हुए अपनी बात जारी रखी:

“बेशक...आपकी बात सुनें तो, हम लोग गुण्डे हैं, हम इतने बदमाश हैं. किडनियाँ निकाल लेते हैं, लूट लेते हैं. क्या आप सोच रहे हैं कि हमें मालूम नहीं है कि हमसे बचने के लिये आप पैसे जुराबों में छिपाकर रखते हैं?...मैं ख़ास आपके बारे में नहीं कह रहा हूँ, बल्कि आम तौर से. मगर आप नहीं जानते कि अभी परसों मैंने एक आदमी की ज़िन्दगी बचाई थी. हाँ, लीदिया पित्रोव्ना, क्या मैंने अभी तक आपको बताया नहीं है? और याद दिला दी. शाम को खिड़की की तरफ़ जा रहा था, करीब ग्यारह बजे, देखता क्या हूँ : बर्फ के ढेर पर रेंग रहा था. बीबी पैनकेक बना रही है, मैं खिड़की से देख रहा हूँ: थोड़ा-सा उठता है, और फ़िर से – धम्. देख रहा हूँ – जम जायेगा. कोई दूसरा, समझदार होता, तो किसी सवारी-गाड़ी को बुलाता, या, जैसा आप कहते हैं, “छड़ी”...और वह सही होता, वर्ना – बेवकूफ़ होता, मगर मैंने किसी को नहीं बुलाया, ख़ुद ही नीचे उतरा, बर्फ के ढेर में से ऊपर खींचा, वह थैंक्यू” बुदबुदाया, देखा, चश्मा एक कान पर लटक रहा है, मगर वह बेघर-आवारा नहीं है! उसकी तबियत ख़राब थी. बोला, कुछ दूर और नहीं खींच पाया. प्रवेश द्वार तक दो सौ मीटर्स चलना था, मगर पैरों ने जवाब दे दिया, गिर रहा हूँ, खड़ा नहीं हो पा रहा हूँ. तो क्या किया जाये? मैंने उसे अपने ऊपर लाद लिया, ज़्यादा सही कहूँ, तो हाथों में उठा लिया, वैसे ही लाया – उसके प्रवेश द्वार तक, और ठेठ दूसरी मंज़िल पर उसके दरवाज़े तक. और अगर मैं न होता, तो हमारे यहाँ ऐंठ चुका मुर्दा पड़ा होता. मैंने ऐसा नहीं होने दिया.”

“ये है तैयार कहानी! पवित्र! असली!” लीदिया पित्रोव्ना जोश से चहकी.

लेखक ने कहा:

“इसका श्रेय आपको दिया जायेगा.”

कैप्टन ने जवाब दिया:

“उम्मीद करता हूँ.”

आप बहुत धीरे लिखते हैं,” लेखक ने कहा.

“और आप क्या जल्दी लिखते हैं?” कैप्टन ने तीखेपन से पूछा. “मैं और फ़मीच, मतलब कैप्टन फमीचेव के साथ, पिछले से पिछले साल शेलोन जा गये थे. सुबह चट्टानों पर पंहुचे, कोहरा इतना घना हो गया था, ऐसा नहीं, जैसे तैरने वाला हो, अपने जूते भी नहीं दिखाई दे रहे थे. और बिल्कुल ऐसे ही – जैसे आपकी कहानी में. मैं उससे पूछता हूँ, “फ़मीच, तू कहाँ है?” और वह बोला, “यहीं हूँ मैं,” और सिर्फ आवाज़ ही थी, और वह ख़ुद नहीं था. बस, याद आ गई, जब आपकी वाली यह पढ़ रहा था. जैसे आवाज़ सुन रहा था.”

लेखक ने कहा:

“दो कप्तान.:

“बढ़िया कहा”. कैप्टन ने कहा.

लेखक ने कैप्टन द्वारा तैयार किये गये बिल पर हस्ताक्षर किये.

कैप्टन ने अलमारी खोली, बॉक्स नंबर 7 बाहर निकाला.

“अब पैसों के अलावा जो है. ये रहे – कागज़ात. पासपोर्ट...मेम्बरशिप कार्ड...क्रेडिट कार्ड...आगे...टेलिफोन...बदन पर पहनने वाला क्रॉस चांदी का, बॉल पेन...आप माफ़ कीजिये, लिस्ट में सब कुछ नहीं शामिल किया है, मगर, जो शामिल नहीं किया है, सब कुछ लौटायेंगे...वार्डरोब का कूपन, कहाँ का है यह पता नहीं चला है...फोटो, शायद बीबी का...”

कैप्टन ने सूची से नज़र हटाई, ताकि वार्तालाप कर रहे व्यक्ति की प्रतिक्रिया देख सके. किसी भी हालत में, चाहे वहाँ जो भी रहा हो, वह कम से कम “शायद” पर प्रतिक्रिया दे सकता था, और तब बातचीत, ज़्यादा दिल से हो सकती थी, मगर लेखक इस उकसाहट पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता था, चाहे वह मासूमियत भरी ही क्यों न हो, - वह ख़ामोश रहा.

“और ये भी...पत्रिका, आपकी कहानी वाली.”

“आप रख सकते हैं.”

“ठीक है,” कैप्टन राज़ी हो गया.

“ट्रॉफ़ी के तौर पर,” लेखक ने आगे जोड़ा.

“नहीं. ऐसे नहीं चलेगा. सिर्फ साफ़ दिल से.”

“जैसा आप चाहें.”

“ये, जैसा आप चाहें. मगर ट्रॉफी हम नहीं लेते. सिर्फ साफ़ दिल से.”

“साफ़ दिल से, तो साफ़ दिल से,” लेखक ने कहा.

कैप्टन को संदेह हुआ.

“क्या कुछ लिखूँ?

“आप नाराज़गी से लिखेंगे.”

“कुलनाम क्या है?” लेखक ने पूछा. 

कुछ देर सोच कर कैप्टन ने जवाब दिया:

“येर्शोव”

और कुछ और सोचकर आगे बोला”:

“अलेग. अगर पिता का नाम भी लिखें तो अन्द्रेयेविच.”

उसे अभी भी इत्मीनान नहीं था – इस बात का नहीं कि पासपोर्ट के मुताबिक उसका नाम क्या था, बल्कि इस भेंट पर लिखी जाने वाली इबारत के बारे में : परिस्थिति क्लायन्ट के हाथ में थी और वह इससे अवगत था. कैप्टन को डर था कि वह मज़ाक उड़ायेगा.  

“वहाँ सुदाकोव, और मैं येर्शोव. ये भी अजीब बात है.”

लेखक ने फॉर्म पर हस्ताक्षर किये, पत्रिका के पन्ने पलटे और उसने अपना नाम देखा. उसने अपने कुलनाम के ऊपर चित्र के बाईं ओर लिखा: “कैप्टन येर्शोव को – साफ़ दिल से.” और करीब चार सेकंड सोच कर उसमें जोड़ा: “फमीचेव के याद में”.

“था इन्सान,” इबारत पढ़कर ड्यूटी-इन्स्पेक्टर ने कहा, “धन्यवाद.”

“क्या अब मैं आज़ाद हूँ?”

“पूरी तरह से,” कैप्टन येर्शोव ने खड़े होकर लेखक से हाथ मिलाया. “अपना ख़याल रखें.”

भूतपूर्व क्लायंट सधे हुए कदमों से बाहर जाने वाले दरवाज़े की तरफ़ गया.

मगर, वह देहलीज़ पर वह थोड़ा ठहर गया, उसके ओवरकोट की जेब दरवाज़े के हैण्डल में अटक गई थी – खुले हुए दरवाज़े से ताज़ी, ठण्डी हवा आ रही थी, एक-दो बर्फ के फ़ाहे भी उड़कर स्वागत कक्ष में आये. लेखक मे अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर लिया, और सिर्फ तभी कैप्टन येर्शोव को याद आया कि यहाँ कितनी घनी और भारी हवा है. उसने दोनों पत्रिकाएँ मेज़ की दराज़ में रख दीं, पहले लोगों के रजिस्ट्रेशन वाली पत्रिका, फिर चमकदार पत्रिका, कहानी वाली और खिड़की की ओर चला वेंटिलेटर खोलने. नर्स लीदिया पित्रोव्ना ने अपने गाऊन की जेब से गोल वाला आईना निकाला और हल्की-सी नफ़रत के भाव से अपने आप को देखने लगी.

“मैं तो फ्राइंग पैन में नहीं चाहती,” उसने आईने के अपने प्रतिबिम्ब में आँखों के नीचे वाली सूजन को देखते हुए कहा. “मगर, जब कुछ भी न हो, जब ख़ालीपन हो, तब मेरा दिल नहीं चाहता.”

कैप्टन खिड़की से देख रहा था : न जाने कब से ऐसे फ़ाहे नहीं गिरे थे. उनके बेहद फूलेपन में कुछ बचपना-सा और स्वर्गीय-सा था.

“छड़ी के ऊपर वाला शीशा, जिसे अगली ड्यूटी तक के लिये आँगन में ही छोड़ दिया गया था, काफ़ी गंदा हो गया था. कोई ज़रूर उस पर ऊँगली से गन्दी बात लिख देगा. कैप्टन को मालूम था कौन-सी.

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