शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

Curly Brackets Hindi for Kindle

 

सिर्गेइ नोसव 

धनु-कोष्ठक



 



हिन्दी अनुवाद

आ. चारुमति रामदास












Figurniye Skobki {Curly Brackets}(Russian)@ Sergei Anatolevich Nosov 

Hindi Translation@A. Charumati Ramdas

Cover and illustration@Vandana Akella 

2022 










   

“मुझे कुछ कहना है!” 

 

भारत मैं सिर्फ एक बार गया हूँ, और यक़ीन कीजिए, मुझे उससे बेहद प्यार हो गया.

इस उपन्यास का घटनाक्रम सर्दियों में बर्फ़ीले, बर्फ से ढँके उत्तरी शहर पीटरबुर्ग में घटित होता है, मगर गर्माहट भरे भारत का ज़िक्र एक बार उपन्यास में होता है : लगता है, कि उपन्यास के कुछ पात्र (जादूगर, ऐन्द्रजालिक) भारत जा चुके हैं फ़कीरों के किसी रहस्यमय उत्सव में. 

मुझे बचपन से मालूम है, कि अंक, जिनका उपयोग हम करते हैं, हमारे यहाँ भारत से आए हैं. कहते हैं कि “शून्य” की संख्या का आविष्कार भी भारतीय विद्वानों ने किया था, जो गंगा के किनारों पर ध्यान में मगन रहते थे.

मतलब, बगैर भारत के तो मेरा उपन्यास लिखा ही नहीं जा सकता था, क्योंकि उसका नायक – मैथेमेटिशियन है.

मगर मैथेमेटिक्स इस उपन्यास में नहीं है. लेखक के लिए ये समझाना मुश्किल है, कि उसने किस बारे में लिखा है.

सबसे आसान होगा ये कहना कि उपन्यास भागने की असंभवता के बारे में है – अपने आप से और अपने वर्तमान से, वास्तविकता से, चाहे वह कितनी ही दिलफ़रेब क्यों न हो, अपने स्वयम् के (व्यक्तिगत) और उसी तरह हमारे सामान्य भूतकाल से. भाग कर छुपने के लिए कोई जगह ही नहीं है, ऐसे “धनु कोष्ठक” नहीं हैं, जो किसी व्यक्ति को अपने अहंभाव के बन्द कोष में सुखी रहने की इजाज़त दे सकें.         

मगर, मुझे लगता है, कि मैंने कोई चीज़ सरल कर दी है. हो सकता है, कि यह उपन्यास सरलताओं और क्लिष्टताओं के बारे में हो? ऐसी सीधी सादी सच्चाइयों के बारे में, जिनकी ओर, अपने जीवन को बेहद क्लिष्ट बनाने की धुन में, हम देखना ही नहीं चाहते?

याद है, कि कैसे स्कूल में हमें सवाल दिए जाते थे : एल्जेब्रा (बीज गणित) के भारी भरकम एक्स्प्रेशन्स (पदों) को सुलझाने के. ये रहा फ्रैक्शनल नंबर (अपूर्णांक), न्यूमरेटर है और डिनॉमिनेटर है, आप उसके हिस्सों को एक एक करके आसान बनाना आरंभ करते हैं, परिणाम को कोष्ठकों से बाहर ले आते हैं, परिणाम प्राप्त करते जाते हैं, और एक ख़ूबसूरत पल में ये अपूर्णांक छोटा होते होते, अंत में एक आसान जवाब दे ही देता है. बिल्कुल आसान. फिर फ़रक क्या पड़ता है, कि उन कोष्ठकों में क्या था. बीत गया – सपने की तरह.  जब मैं “धनु कोष्ठक” लिख रहा था, तो बीजगणित का यही दुरूह पद - जो ऊपर से देखने में क्लिष्ट, चालाक, ख़ौफ़नाक हद तक बोझिल है, मगर अंत में एक सरल, मानवीय अभिव्यक्ति के रूप में बदल जाता है - मेरे लिए रूपक बन गया. 

 “तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.”

आगे क्या लिखूँ?

मैं सोचता हूँ, कि मेरा उपन्यास प्यार के बारे में है, हालाँकि पूरे उपन्यास में हर चीज़ के बारे में बात होती है, मगर इस बारे में नहीं (क्या ये विषय कोष्ठकों में बन्द है?).             

और, शायद, काल के बारे में भी, वर्तमान काल के बारे में, जिसमें हम सब रहते ही हैं. अपरिभाषित क्षेत्रों के बारे में, जिनमें हम सब जाने ही वाले हैं : कौन कह सकता है कि कल क्या होगा और परसों? और साथ ही – ज़िन्दगी के बारे में भी, जिसे सिर्फ एक आश्चर्य समझ कर ही जीना चाहिए.

अगर मुझसे कोई कहेगा कि उपन्यास इस बारे में नहीं है (कभी कभी मुझसे कहा जाता है, कि “धनु कोष्ठक” किस बारे में है) तो, मैं न केवल फ़ौरन, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी सहमत हो जाता हूँ. मैं समझता हूँ कि पाठक ज़्यादा अच्छी तरह देख सकता है – वह सही  होगा.

मेरे उपन्यास को चुनने, ध्यान से पढ़ने और “धनु कोष्ठकों” का हिन्दी में अनुवाद करने के लिए मैं डा. चारुमति रामदास का अत्यंत आभारी हूँ.

उन सबको परोक्ष रूप से धन्यवाद, जिन्होंने इसे अब तक नहीं पढा है, मगर पढ़ने वाले हैं. 

तो, प्रिय पाठक, उपन्यास की राह पर चलें... बाद में चर्चा करेंगे.

सिर्गेइ नोसव  






अनुवादिका का प्रतिवेदन 


सिर्गेइ नोसव  आधुनिक रूसी लेखक, नाटककार एवम् निबन्धकार हैं. उन्हें पीटरबुर्ग का प्रमुख आधुनिकोत्तर (पोस्टमॉडर्न) लेखक कहा जाता है, उन्हें एक्ज़िस्टेन्शियलिस्ट (अस्तित्ववादी) भी माना जाता है.

सिर्गेइ नोसव  का जन्म 19 फरवरी 1957 को पीटरबुर्ग में हुआ था. उन्होंने विमानन साधन इंस्टीट्यूट और गोर्की साहित्यिक इंस्टीट्यूट में शिक्षा ग्रहण की. पहले कुछ साल विमानन साधन के क्षेत्र में काम किया फिर पत्रकारिता की ओर मुड़ गए. रेडिओ पर भी काम करते रहे. साहित्यिक इंस्टीट्यूट में पढ़ते हुए ही कुछ कविताएँ लिखीं थीं, जिन्हें उन्होंने जला दिया. सन् 1980 में ‘अव्रोरा’ नामक पत्रिका में उनकी कविताएँ छपीं. पहली पुस्तक “सितारों के नीचे” सन् 1990 में प्रकाशित हुई. सिर्गेइ   नोसव  ऐसे लेखक हैं जिनका नाम अनेक बार “नेशनल बेस्टसेलर’ और ‘रूसी बुकर’ की अंतिम सूची में शामिल हुआ था. एक अन्य पुरस्कार “बिग बुक” की अंतिम सूची में भी उन्हें शामिल किया गया था. सन् 1998 में उन्हें पत्रकारिता का ‘ज़लातोए पेरो’ (गोल्डन पेन) पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

 प्रस्तुत उपन्यास को सन् 2015 का ‘नेशनल बेस्टसेलर’ घोषित किया गया है.

सिर्गेइ   नोसव  ने लगभग बीस से ज़्यादा नाटक लिखे हैं, और उन सभी का सफ़लतापूर्वक मंचन होता रहता है. ‘धनु-कोष्ठक’ पढ़ते हुए भी आपको अनुभव होता है कि कोई नाटक या कोई सजीव कॉमेन्ट्री चल रही है.

उन्होंने अब तक छह उपन्यास लिखे हैं: ‘फ्रांत्सुआज़ा या ग्लेशियर्स की यात्रा’, ‘मुझे एक बन्दर दो’, ‘पंछी उड़ गए’, ‘समाज का सदस्य या भूखा समय’, ‘डेढ़ ख़रगोश’ और  ‘धनु कोष्ठक’. 

उनकी पुस्तक “पीटरबुर्ग के स्मारकों का रहस्यमय जीवन” भी काफ़ी प्रसिद्ध है.

सिर्गेइ नोसव  को युद्ध से संबंधित कथाओं में, विस्थापितों के दर्द को दर्शाने में, ऐतिहासिक गाथाओं के पुनर्मूल्यांकन में कोई दिलचस्पी नहीं है. नोसव  – ख़ामोश तबियत लेखक हैं. उन्हें दिलचस्पी है ज़िन्दगी के छोटे-छोटे प्रसंगों में – एक प्राइवेट आदमी, अपनी सभी अटपटी आदतों - बेकार के अपमान, दिलचस्प फ़ोबिया, और अटपटे निष्कर्षों की पोटली लादे – ये है उनका नायक.    

“धनु कोष्ठक” का नायक एवम् अन्य पात्र भी इसी अटपटेपन में लिपटे हैं. पूरा कथानक ही न जाने क्या है...पढ़ते समय आपको लगेगा कि ये क्या पढ़ रहा हूँ; मगर किताब हाथ से छूटॆगी नहीं, आप पूरी पढ़ जाएँगे; फिर उसे समझने के लिए और एक बार, और एक बार...हर बार नया आविष्कार करेंगे. सब कुछ मानों हथेली पे रखा हो, मगर उसमें ‘कुछ’ ढूँढ़ने की कोशिश करेंगे. 

“धनु कोष्ठक” पढ़कर हर पाठक अपने अपने निष्कर्ष निकालेगा.... 

उपन्यास का नायक कपितोनव  एक मैथेमेटिशियन है, जो दो अंकों की संख्याएँ बूझ सकता है. कपितोनव  को ‘रिमोटिस्ट-मेंटलिस्ट’ का ख़िताब देकर जादूगरों की वार्षिक कॉन्फ्रेन्स में बुलाया जाता है. इसी कॉन्फ़्रेन्स में भाग लेने के लिए वह मॉस्को से पीटरबुर्ग जा रहा है. वह पहले पीटरबुर्ग में ही रहता था, मगर अब मॉस्को के किसी इन्स्टीट्यूट में गणित पढ़ाता है. ‘धनु कोष्ठक’ मानो दो दिनों की इस कॉन्फ़्रेन्स के ‘मिनट्स‘ हैं. कपितोनव  के शनिवार को पीटरबुर्ग पहुँचने से लेकर सोमवार को वापस मॉस्को के लिए प्लेन का इंतज़ार करने तक के समय के एक एक मिनट का लेखा जोखा है. उपन्यास सिर्फ घड़ी के समय के अनुसार ही आगे बढ़ता है...

पीटरबुर्ग में उसके दिवंगत मित्र मूखिन, की पत्नी उसे एक नोटबुक देती है. मरीना के अनुसार मूखिन ने इसे अपने अंतिम कुछ दिनों में हाथ से लिखा था – नोटबुक से स्पष्ट होता है कि वह वास्तविक मूखिन था ही नहीं, बल्कि उसने उसे प्रतिस्थापित किया था. तो, जो मर गया, जिसकी अंतिम यात्रा में शामिल होने कपितोनव  आया था, वह कौन था? और असली मूखिन का क्या हुआ? 

इस तरह के ‘ग़ायब’ होने की, ‘प्रतिस्थापित’ होने की कई घटनाएँ हैं: डिनर के समय सबकी प्लेटों से गोभी के कटलेट्स ग़ायब हो जाते हैं, कपितोनव  की ब्रीफ़केस ग़ायब हो जाती है, और जो ब्रीफ़केस उसे मिलती है, उसमें ये गोभी के कटलेट्स पाए जाते हैं; मूखिन की नोटबुक ग़ायब हो जाती है और महाशय ओझा उसे मरीना को पहुँचा आते हैं... अंतिम दृश्य में जब कपितोनव  की हमसफ़र उससे कहती है, कि वे तो एक सप्ताह पीटरबुर्ग में रुके थे, तो पाठक के मन में ख़याल आता है, कि कपितोनव  के पाँच दिन फिर कहाँ गए, क्योंकि उसकी नज़र में तो दो ही दिन गुज़रे हैं, फिर क्या इन पाँच दिनों में कपितोनव  भी कहीं ग़ायब हो गया था या उसके समय को काल-भक्षक खा गया? 

‘तालाब’ क्यों मर जाता है? मूखिन को प्रतिस्थापित करने वाला, मूखिन जैसा – मगर मूखिन नहीं – कौन था, वह क्यों मूखिन बन कर रह रहा था, उसे क्या करना था, इससे पहले वह कहाँ था, इसके बाद कहाँ जाएगा? यक़ीन मानिए, आप ज़रूर अपने आप से ये प्रश्न पूछेंगे. लेखक जवाब नहीं देता है, कुछ भी नहीं कहता है... मगर इस साम्य के बारे में उपन्यास के दौरान कई बार इशारा किया जाता है. फिर, उपन्यास में कुछ लोग मरते हैं – दो उपन्यास के पहले और एक उपन्यास के दौरान... कपितोनव  इन दो (या पाँच) दिनों में अनिद्रा से ग्रस्त है. उसे बस आभास ही होते रहते हैं... जादूगरों की कॉन्फ़्रेन्स हमारी-आपकी अन्य कॉन्फ़्रेन्सों ही की तरह होती है... 

मतलब, लेखक कुछ ‘दिखाना’ तो चाहता है, मगर दिखाता भी नहीं है.

फिर ‘धनु कोष्ठक’ किसलिए?  मूखिन जैसे (अ)मूखिन ने इनका प्रयोग किया है, यह कहते हुए कि धनु कोष्ठक तीसरे स्तर की सुरक्षा प्रदान करते हैं. उनका उपयोग करने से ‘इस’ मूखिन के विचारों तक कोई पहुँच नहीं पाएगा. 

   नोसव  के इस उपन्यास में कभी कभी निकलाय गोगल की (पात्रों के नाम, सूक्ष्म व्यंग्य), दोस्तयेव्स्की की (उपन्यास ‘डबल’ की) और बुल्गाकव की (जादू के कारनामों की) झलक दिखाई दे जाती है. 

नोसव  का व्यंग्य मासूम, मगर पैना है. भाषा बेहद सरल, रोज़मर्रा की बोलचाल की, अतः ऐसे काफ़ी वाक्य मिल जाएँगे जो समूची दुनिया में बोले जाते हैं. भाषा के साथ जिस तरह के प्रयोग नोसव  करते हैं, वह कथानक को कुछ उलझाता, कुछ सुलझाता है... 

आधुनिक रूसी साहित्य में इस प्रकार का साहित्य भी रचा जा रहा है, और उसे ‘बेस्टसेलर’ का दर्जा प्राप्त हो रहा है, ये सुखद अनुभव हि. 

नोसव  के इस उपन्यास का अनुवाद करना आसान नहीं था... तमाम ऊटपटांग बातों को ऊटपटांग ही प्रतीत होने देना था, उपन्यास के समय को यथावत् ही रखना था, नामों के लिए विकल्प ढूँढ़ना... 

आप इस अनुवाद को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे ऐसी आशा करती हूँ, 

मेरे पति डा. रामदास आकेळ्ळा, पुत्र अभिजित, पुत्रवधू वन्दना और पोते श्रेयस को धन्यवाद देने के लिए मेरे पास पर्याप्त शब्द नहीं हैं. इनका प्रोत्साहन और सहायता ही मेरे लिए प्रेरणा का स्त्रोत है. थैंक्यू सो मच!


  हैदराबाद                                           चारुमति रामदास  

















          पहले हमारा शहर इस लिहाज़ से ज़्यादा सुखी था,” - अपनी छोटी-छोटी आँखों को सिकोड़कर धधकते कोयलों पर नज़र गड़ाए शरामीकिन कहता है. – “एक भी सर्दियों का मौसम ऐसा नहीं जाता था जब कोई महान हस्ती यहाँ न आई हो. कभी कोई विख्यात कलाकार, कभी कोई गायक... मगर अब...शैतान ही जाने क्या हो गया है, जादूगरों और हार्मोनियम बजाने वालों के सिवाय कोई और आता ही नहीं है. 

                                                              - अंतोन चेखव “ज़िन्दा कैलेण्डर”




गुज़रे दिन और रात. गुज़रे दिन और रात.

सरसराए पत्ते. 

- अलेक्सान्द्र व्वेदेन्स्की 





सन् दो हज़ार फलाँ-फलाँ की फ़रवरी (20** के बाद वाली संख्या कौन याद रख सकता है?) : ये उस साल की बात है जब भयानक बर्फबारी ने जनवरी में ही पिछले बीस-तीस सालों का रेकॉर्ड तोड़ दिया था.

कल शुक्रवार था, सप्ताह के दिन गुज़र गए, मगर ट्रेन चली जा रही है, और कपितोनव  के दिमाग़ में प्रस्तुत घड़ी के हालात की तस्वीरें बन रही हैं. ये है स्वयम् कपितोनव . एक मिनट पहले वह अपने ‘कुपे’ से बाहर निकला. “बोलेरो” का रिंगटोन बज उठा, और वह जेबों में मोबाइल ढूँढ़ता है. 

ये रहा मॉस्को-टाइम.

16.07

ये है ऑर्गेनाइज़िंग कमिटी वाली ओल्या.   “नमस्ते, एव्गेनी गिन्नादेविच. हमारा आदमी आपको ढूँढ़ नहीं पा रहा है. आप, असल में, कहाँ हैं?”  “मैं, असल में, ट्रेन में हूँ.”  “तो फिर बाहर क्यों नहीं आ रहे हैं?”  “क्योंकि सफ़र कर रहा हूँ.” कुछ पल के लिए उस ओर वाली ओल्या की बोलती बन्द हो जाती है. कपितोनव  शांत है – वह ग़लतफ़हमियों के लिए तैयार है. कॉरीडॉर के अंत में लगे हुए इलेक्ट्रोनिक-बोर्ड पर अब समय नहीं, बल्कि तापमान दिखाया जा रहा है -110 . ठीक है. मॉस्को से ज़्यादा ठण्ड नहीं है. 

कुपे को बेहद गर्म किया गया है.  “माफ़ कीजिए, आप कहाँ जा रहे हैं?” अजीब बात है. वह जा कहाँ रहा है? खिड़की के बाहर एक दुमंज़िला इमारत झांक रही थी, जो ज़मीन तक लटकती बर्फ की दीवार से ढंकी थी. और फिर से – पेड़, बर्फ, पेड़.  “पीटरबुर्ग, ओल्या. सेंट-पीटरबुर्ग.”  “मगर ट्रेन तो कब की आ चुकी है. आपसे मिलने रेल्वे-स्टेशन पे गए हैं.”  “ऐसे कैसे? मुझे तो लादोझ्स्की स्टेशन तक पहुँचने में अभी और आधा घण्टा लगेगा. अगर ट्रेन समय से चल रही है तो.”  “ठहरिए, मगर लादोझ्स्की स्टेशन पे क्यों?”  “तो फिर कौन से?”  “मॉस्को स्टेशन पे.”  “ओल्या, ग़ौर से सुनो! कल आपने ही फोन करके मुझसे कहा था कि “सप्सान”1 की टिकट्स उपलब्ध नहीं हैं, मगर यदि मैं दूसरे दिन पहुँचना चाहूँ, तो अद्लेर से आने वाली ट्रेन में टिकट बुक कर दूँ. आप भूल गईं? मैं कज़ान रेल्वे स्टेशन से ट्रेन में बैठा, न कि लेनिनग्राद स्टेशन से, और सारी बातों पर ग़ौर करते हुए, मैं लादोझ्स्की स्टेशन पर ही उतरूंगा, न कि मॉस्को स्टेशन पे! दमघोंटू कम्पार्टमेंट में मैं पूरे दिन परेशान होता रहा. ये सबसे बढ़िया ट्रेन नहीं है, और मॉस्को से पीटरबुर्ग आने के लिए ये सबसे बेहतरीन तरीक़ा भी नहीं है.”                     “माफ़ कीजिए, एव्गेनी गिन्नादेविच, वो मैं नहीं बल्कि दूसरी ओल्या थी. वो आपको फ़ोन करेगी.” कुपे का दरवाज़ा खुला है. हमसफ़र – एक महिला, जिसका नाम ज़िनाइदा है, और उसका ‘डाऊन’ (मन्दबुद्धि) बेटा झेन्या, जो बड़ा है, कपितोनव  की ओर देख रहे हैं. ज़िनाइदा सहानुभूति से देख रही है, और ‘डाऊन’ झेन्या - ख़ुशी से.  हाथ में झाडू लिए कण्डक्टर उधर से गुज़रती है, उसने भी ये बातचीत सुनी: “परेशान मत होइये, जल्दी ही ये ट्रेन कैन्सल होने वाली है, देखिए, कम्पार्टमेंट आधा खाली है.”  “मैं परेशान हो भी नहीं रहा हूँ.” भीतर आया, बैठ गया. सब बैठे हैं. जा रहे हैं. अब जल्दी ही पहुँच जाएँगे. “पहले मुझे ऐसा लगा कि आपकी बेटी ने फ़ोन किया है,” ज़िनाइदा ने कहा. उसे अफ़सोस होने लगा कि बेटी के बारे में उसे क्यों बताया. कपितोनव  की आँखों के सामने सफ़ेद दीवार पर काले अक्षर भाग रहे थे – सशस्त्र क्रांति का आह्वान. इसके बाद – गैरेजेस, शायद. वह इस तरफ़ से कभी पीटरबर्ग की ओर नहीं आया था. लादोझ्स्की स्टेशन को उसके पीटरबर्ग से मॉस्को जाने के कुछ ही साल पहले शुरू किया गया था. वह सिर्फ एक बार लादोझ्स्की पर आया था – जब बीबी के साथ वह समर-कैम्प से वापस लौट रही बेटी को लेने आया था. तब उसकी उम्र थी ग्यारह साल. 

ज़िनाइदा को अपने हमसफ़र पे दया आ रही थी:  “मुझे अफ़सोस है कि आप झपकी न ले सके.”  “कोई बात नहीं,” कपितोनव  ने कहा. सफ़र के दौरान काफ़ी देर तक कोई बातचीत नहीं हुई – मॉस्को से लेकर, जहाँ वह बैठा था, मतलब, पहले से सफ़र कर रहे उनके साथ – और लगभग अकूलव्का तक. कुपे में चौथा मुसाफ़िर नहीं था. उसका बेटा पूरे रास्ते छोटी सी मेज़ पर दमीनो के पांसों से खेलता रहा, और कपितोनव  ऊपर वाली बर्थ पर लेटे-लेटे छत की ओर देखता रहा, जो उसके एकदम क़रीब थी, और ऐसा दिखाता रहा कि दुनिया परिमेय ‘कर्व्स’ के अनुसार ही बनी है. तीन घण्टे पहले, अकूलव्का से भी पहले, आवश्यकता के कारण नहीं, बल्कि उकताहट के मारे, वह अकेला ही ट्रेन के रेस्टॉरेंट में चला गया, जहाँ अपने आपको अकेला मेहमान पाकर बीफ़स्टेक खा गया और सौ ग्राम कोन्याक पी गया, जो वास्तव में कोन्याक थी ही नहीं, मगर, चलो, ठीक है. और जब वापस लौटा, तो इस मुस्कुराती, थके हुए चेहरे वाली कुपे की पड़ोसन ने घर का बना हुआ केक उसे पेश किया, वह ज़िद करने लगी कि उसके और उसके बेटे के साथ कुपे-डिनर खाए. और तब कपितोनव  ने उसके सामने पहली स्वीकृति दी : उसने अभी-अभी खाना खाया है. तब उसने उससे कई बार पूछा: “और इस सब का हम क्या करें?” और उसने जवाब दिया: “अपने साथ ले जाइए”. मतलब, उन्होंने बातचीत की. – “ज़ीना”. – “एव्गेनी.” एव्गेनी गिन्नादेविच भी कह सकता था, जैसे कि वह अक्सर सेमेस्टर के आरंभ में विद्यार्थियों को अपना परिचय देता था (जो सही है), मगर उसने कहा “एव्गेनी” (झूठ तो नहीं बोला), और ज़िनाइदा ख़ुश हो गई: : “देखा, कैसे होता है,” उसने अपने मन्दबुद्धि बेटे से कहा. “हम और तुम जा रहे हैं, और ये भी नहीं जानते कि किसके साथ जा रहे हैं. अंकल झेन्या, तेरे हमनाम हैं”. उसके बेटे ने चहकते हुए अचानक अपना हाथ बढ़ाकर कपितोनव  को चौंका दिया, मगर वह अपनी ऊँगलियाँ फैला कर ही रुक गया – बड़े मरियल तरीक़े से हस्तांदोलन हुआ, एक ही तरफ़ से, याने कपितोनव  की तरफ़ से, मगर पर्याप्त गर्मजोशी भरा, जिससे ज़िनाइदा को ख़ुशी हो. जैसे उनके बीच कुछ घटित हो गया था. कपितोनव  को पता चला कि वे लिपेत्स्क से आ रहे हैं ज़िनाइदा की बहन से मिलने, कि ज़िनाइदा अपने बेटे को सेंट पीटरबुर्ग दिखाना चाहती है और ये कि बेटे का सपना है – “छोटा सा जहाज़” देखना. उसने वाक़ई में कई बार ये शब्द दुहराया “जआज़”. “अंकल झेन्या ने जआज़ देखा?” कपितोनव  ने कई बार इस जहाज़ को देखा था – एडमिरैल्टी2 के शिखर पे.

ख़ुदा ने चाहा, तो और भी देखेगा.

ज़िनाइदा बता रही थी अपने बारे में, पति के बारे में, जिससे झेन्या के जन्म होने के बाद तलाक़ हो गया था, और जो मेटलर्जिकल प्लान्ट में काम करता था, और भी ऐसी कई बातें जिनसे कपितोनव को कोई मतलब नहीं था, और वह सुन भी नहीं रहा था, मगर किसी एक पल में उसे महसूस हुआ कि वह भी कुछ कहे, और तब उसने दूसरी स्वीकारोक्ति दी – इस बारे में कि वह अनिद्रा से ग्रस्त है और पिछली दो रातों से सोया नहीं है.  “ओह, तो क्या हम डिस्टर्ब कर रहे हैं?” - “आपकी वजह से नहीं है”, - कपितोनव  ने कहा, क्योंकि उसकी स्वीकारोक्ति में कोई उलाहना नहीं था (वैसे ही जैसे उसमें कोई अर्थ भी नहीं था). “तो फिर सोते क्यों नहीं हो?” उसने जवाब दिया: “नींद नहीं आती.” और, उसने इस पर कहा: “जभी, मैं देख रही हूँ कि आप कुछ परेशान-परेशान लग रहे हैं”.        और अब वह कह रही है:  “आपका रिंग टोन कितनी ज़ोर से बजता है!”

उँगली की हरकत से उसने “बोलेरो” को रोक दिया, जो छोटे से जहाज़ का ख़्वाब देख रहे झेन्या को बहुत पसन्द आ गया था.    ओल्या – “दूसरी”:  “येव्गेनी गिन्नादेविच, कल आपसे मैंने बात की थी, मैंने ही अद्लेर की ट्रेन में आपका रिज़र्वेशन करवाया था, और हमारे लोग कन्फ्यूज़ हो गए, कार को सही जगह पर नहीं भेजा, बल्कि मॉस्को स्टेशन पर भेज दिया, माफ़ कीजिए, मगर हम आपको रिसीव नहीं कर पायेंगे...क्या हमारे बग़ैर आ सकते हैं?”

सब ठीक ही हो रहा है. उसने कल ख़ुद ही कहा था कि उसे लेने न आएँ. ये उन्हीं का आइडिया था – हर हालत में प्लेटफॉर्म पर उसे रिसीव करेंगे. उसके पास कोई सामान नहीं है, सिर्फ पर्स है, और उसे पता है कि मेट्रो क्या होती है. 

ओल्या-दूसरी जोश में कहे जा रही थी:  “सुनिए, आप इतने समझदार हैं, आपने सही किया कि उद्घाटन पे नहीं आए, यहाँ तो ऐसी-ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, आप ख़ुद ही देखेंगे, और अब मैं आपको बताती हूँ कि होटल तक कैसे पहुँचना है, आपको...” ज़रूरत नहीं है, वह जानता है. ओल्या, मतलब, कल वाली ओल्या, “दूसरी” न जाने क्यों आज बेहद घबरा रही है, बड़ी जल्दी-जल्दी बोल रही है, बिल्कुल बिना रुके, और यहाँ ये पुल भी है – फिनलैण्ड-रेल्वे वाला – और उसके शब्द खड़खड़ाहट में डूब रहे हैं. मन्दबुद्धि झेन्या थोड़ा सा ऊपर उठता है जिससे सफ़ेद नदी को अच्छी तरह देख सके. चौड़ी है नीवा, और पूरी तरह बर्फ़ के नीचे है.

कपितोनव  कुछ अलग-थलग शब्द सुन पाता है और उनके बीच “आर्किटेक्ट”. और इसके बाद ओल्या फिर से कहती है “आर्किटेक्ट”. वह समझ जाता है कि ये “आर्किटेक्ट” - उसीके लिए है.

ट्रेन धीरे धीरे पुल के ऊपर से गुज़रती है, खड़खड़ाते हुए. कपितोनव  लगभग चिल्लाकर कहता है:

 “मैं आर्किटेक्ट नहीं हूँ, मैं मैथेमेटिशियन हूँ!” 

 “कौन मैथेमेटिशियन है?”            (ये तो ग़ज़ब हो गया!)

 “मैं – मैथेमेटिशियन हूँ!”

  “जआज़! जआज़!” झेन्या परेशान हो रहा है, हालाँकि कोई जहाज़-वहाज़ नहीं है और वहाँ हो भी नहीं सकता. फ़िनलैण्ड-ब्रिज की फर्मों के समूह दिखाई देते हैं.  “ओल्या, आपने किसे और कहाँ आमंत्रित किया है? सही आदमी को, सही कॉन्फ्रेन्स में?”

 “ठहरिए, मैं दुबारा फ़ोन करती हूँ.” ”बहुत अच्छे,” कपितोनव  ने कहा. दाहिना किनारा. वेग कम हो जाता है – जल्दी ही पहुँच जाएँगे. इंतज़ार नहीं करना पड़ा.

“ येव्गेनी गिन्नादेविच, आप तो मुझे बेकार ही में डरा रहे हैं, सब कुछ ठीक है, आप मैथेमेटिशियन हैं, आर्किटेक्ट – आप नहीं हैं, वो दूसरे हैं, आज सिर्फ आप दोनों ही आ रहे हैं, और मैं थोड़ा कन्फ़्यूज़ हो गई, सिर्फ यही सोचती रही कि मैथेमेटिशियन वो है, और ये कि आप आर्किटेक्ट हैं, तो सब ठीक है, कुछ मत सोचिए, आ जाइए, हम मामला सुलझा लेंगे....”

मोबाइल को वापस रखकर वह तैयारी करने लगता है – स्वेटर पहन लेता है. खिड़की के बाहर इण्डस्ट्रियल ज़ोन नये निर्माणों से मिल रहा था. कपितोनव  स्वयँ से अप्रसन्न था. दुनिया के सामने वह अपने आपको मैथेमेटिशियन कहने से बचता था. अपने आपके बारे में ये कहना कि “मैं मैथेमेटिशियन हूँ” वैसा ही है जैसा “मैं कवि हूँ” या “मैं दार्शनिक हूँ”. अपने बारे में ऐसा कहने के लिए मुख्यतः ख़ुद को कवि या दार्शनिक समझना ज़रूरी है. कपितोनव  अपने आप को मुख्यत: मैथेमेटिशियन नहीं समझता. अगर कोई पूछे तो अपने बारे में कहता है, “मैथेमेटिक्स पढ़ाता हूँ” और इसके आगे अक्सर जोड़ देता है: “मानविकी” विभाग में. इस देश में कई लोग मैथेमेटिक्स को अनावश्यक विज्ञान समझते हैं. वह भी यही समझाने की कोशिश करता है कि कोई निरर्थक चीज़ करता है. है भी वैसा ही. मानविकी के विद्यार्थियों को इसकी ज़रा भी ज़रूरत नहीं है. उसे इसका यक़ीन है. ज़िनाइदा झेन्या का सामान समेट रही है, दमीनो के पांसों को बक्से में रख रही है. कपितोनव  की ओर न देखते हुए – मानो पूछना चाहती हो कि प्यारे, आपने, पहले ही ये बात क्यों न बताई?- पूछ ही लेती है.  “तो, आप मैथेमेटिशियन हैं?”

जैसे आप किसी इन्सान के साथ जा रहे हो, अपना दिल उसके सामने खोल कर रख देते हो, जो कुछ भी वह अपने बारे में बताता है उस पर यक़ीन कर लेते हो, और बाद में पता चलता है कि वह तो इन्सान ही नहीं है, बल्कि किसी दूसरे ग्रह का निवासी है.  “मतलब, मैथेमेटिक्स की कॉन्फ्रेंस में जा रहे हैं?”

(यह ऐसे गूंजता है जैसे “दूसरे ग्रह की”.)

कपितोनव  को मैथेमेटिक्स की कॉन्फ्रेन्स में नहीं बुलाया गया है (और दूसरे ग्रह की कॉन्फ्रेन्स में भी नहीं). मगर, चलो, चलने दो.  “हाँ, मैथेमेटिक्स की” – उसने झूठ बोल देता है. “तो क्या?” नहीं, कुछ नहीं. न तो डॉक्टर, न माइनर, न ही केमिकल इंजीनियर. ज़िनाइदा ने रास्ते में अपने बारे में सब कुछ बता दिया था, वह भी उसके साथ मानो खुल ही गया था, मगर अब ऐसा लगता है कि वह इतनी विशेष बात छुपा गया था – वह मैथेमेटिशियन है.

मगर, पहली बात, वह काफ़ी समय से मैथेमेटिशियन नहीं है – इस शब्द के वास्तविक अर्थ के संदर्भ में, और दूसरी बात, वह सब को क्यों बताता फिरे कि वह मैथेमेटिशियन है?

अपने बारे में वह वैसे भी काफ़ी कुछ बक गया था. अपने बारे में – जब क़रीब घंटा भर पहले मालाया विशेरा से गुज़र रहे थे (और ये कपितोनव  की तीसरी स्वीकारोक्ति थी) : कैसे उसका बेटी से हमेशा के लिए  झगड़ा हो गया था, कैसे पत्नी की मौत के बाद बेटी से हमेशा खटपट ही होती रहती है. उसने न जाने क्यों, ये भी बता दिया कि कल बेटी ने उसे, अपने सगे पिता को, कहाँ भेजा था (ज़िनाइदा ने हाथ नचाए). उसे ख़ुद से इस स्वीकारोक्ति की उम्मीद नहीं थी. अनजान लोगों के सामने दिल की बात कहना कपितोनव के नियमों में नहीं था. अपनों के भी सामने वह खुल कर दिल की बात नहीं कहता था. अपने आप से नहीं कहता था. ये सारी मानसिक स्थिति, ये सब अनिद्रा के कारण है. आख़िरी पल में वह इस अनावश्यक कॉन्फ्रेन्स के लिए तैयार ही इसलिए हुआ था कि घर से भाग सके, हालात कुछ बदल सकें. और, उसने ये सब इसे क्यों बताया? क्या रेस्तराँ में ली गई सौ ग्राम कोन्याक ने ज़बान को इस क़दर बहका दिया था? ऐसा नहीं हो सकता था. ये भी हो सकता है कि इस मन्दबुद्धि हमनाम ने अपनी उपस्थिति से उस पर ऐसा प्रभाव डाला कि मालाया विशेरा से गुज़रते हुए कपितानोव इतना परिपक्व हो गया कि खुल्लमखुला एक पिता की समस्याओं का इज़हार करते हुए ज़िनाइदा का समर्थन कर बैठा. मानो ग़ैरों की मुसीबतों के बारे में जानकर उसका मन कुछ हल्का हो जाएगा.  या फिर वह अपनी स्वयम् की कठिनाइयों के लिए एक आवश्यक पैमाना ढूँढ़ रहा था – जिससे कि वे औरों की कठिनाइयों के मुक़ाबले में छोटी लगें? फ़ू, कैसा ओछा काम कर बैठा था कपितोनव. उसने स्वयम् के लिए सांत्वना प्राप्त की थी, और किससे? – और अब, ये देखकर कि कैसे ज़िनाइदा, जिसने उसकी समस्याओं को दिल में बिठा लिया है, अपने बड़े बेटे की हाफ़-जैकेट के बटन बन्द करने में मदद कर रही है, वह अपनी साफ़गोई पर पछता रहा था, जिसकी किसी को भी ज़रूरत नहीं थी.

अपने बारे में कपितोनव  इतना जानता था कि वह एक अच्छा ही मैथेमेटिशियन है, - और इसके लिए वह अपनी मानसिकता को धन्यवाद देता है. कपितोनव में हर चीज़ बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति है, ज़िन्दगी के हालात को दिमाग़ में ठूँस लेने की आदत है, या, इसके विपरीत, उनसे ऐसी ही किन्हीं अन्य परिस्थितियों के पीछे छुप जाने की भावना है ¬– और जैसे जैसे ज़िन्दगी आगे बढ़ती जाती है, कपितोनव  भावात्मकता के कारण बेचैन होने लगता है – उसका दिमाग़ पर्याप्त रूप से उदासीन नहीं है.


16.39

“ट्रेन सही समय पर है,” कपितोनव  के कंधे के पीछे से उदासीनता से घोषणा हो रही है, जबकि कण्डक्टर तेज़ी से (दरवाज़ा खुल चुका है) हैण्डल को कपड़े से साफ़ कर रही है.

प्लेटफॉर्म पर खड़े लोगों में से कपितोनव ज़िनाइदा की बहन को अचूक पहचान लेता है. बाहर निकलते हैं – और वह अपने आप को एक अनजान किस्म के गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र में पाता है: इसमें आलिंगन हैं, आवाज़ें हैं, चुम्बन हैं – मगर ये सब कपितोनव  की पीठ के पीछे हो रहा है: आगे बढ़ते हैं.

कम्पार्टमेंट की उमस के पश्चात् बर्फ़ीली हवा जमी हुई सी प्रतीत हो रही है, और बर्फ के अभाव में ये अप्रत्याशित लगता है, - एक छत इस जगह को फ़रवरी के आसमान से बचा रही है, सर्दियों वाली पोषाकें जँच नहीं रही हैं, मतलब, यदि कोई असंबद्ध व्यक्ति सिनेमा-दर्शक की तरह प्लेटफॉर्म की ओर देखे, तो सिर्फ एक ही बात उसे सर्दियों के मौसम का यक़ीन दिला सकती है: सांस छोड़ते समय निकल रही वाष्प – ऐसा किसी भी फ़िल्म में नहीं किया जा सकता.  

वाष्प के पहले ही बादल से फ़राओन ख़ुफ़ू का ख़याल आ गया, स्कूल के दिनों में ही कपितोनव ने कहीं पढ़ा था, कि, सांस भीतर खींचते समय हम फ़राओन ख़ुफ़ू की मृत्युपूर्व छोड़ी हुई सांस का कम से कम एक अणु अपने भीतर खींचते हैं, और वह इतना घबरा गया था कि उसे ये बात ज़िन्दगी भर के लिए याद रह गई, इससे भी बुरी बात ये हुई कि – महान फ़राओन हमेशा के लिए दिमाग़ पर हावी हो गया: हर बार जब कपितोनव  गर्माहट से ठण्ड में निकलता है, वह याद आ जाता है, - हालाँकि वह उसे फ़ौरन भूल भी जाता है.        

पिछली बार वह पीटरबुर्ग आया था चार साल पहले, कोस्त्या मूखिन की अंत्ययात्रा पर. मगर तब गर्मियाँ थीं. 

पीटर में मेट्रो का किराया कितना है? हाँ, यहाँ टोकन्स हैं. वह भूल गया था कि पीटरबुर्ग की मेट्रो के टोकन्स कैसे दिखते हैं. काऊंटर पर क्यू चला जा रहा है, और, एकदम चार ख़रीद कर वह खिड़की में से चिल्लर के साथ लपक लेता है, जिसमें ज़्यादातर टोकन्स के ही जैसे दस–दस रूबल्स के सिक्के हैं. आसानी से गड़बड़ हो सकती है.    

जो कि हो ही जाती है – वह गड़बड़ा गया.

घुमौने दरवाज़े पे हमेशा की रुकावट. मॉस्को की आदत के अनुसार प्लास्टिक-टिकट पकड़े हाथ चेकिंग मशीन की ओर झुकने को तैयार (कपितोनव  को मालूम है कि इस चीज़ को क्या कहते हैं), मगर, बस, उसके हाथ में टिकट नहीं है, - वह मशीन के भीतर टोकन डालता है, मगर असल में – भुलक्कडपन के कारण – दस रूबल्स का सिक्का डाल देता है और समझ नहीं पाता कि मशीन उसका सिक्का वापस क्यों लौटा रही है. दुबारा कोशिश करता है – वही परिणाम. कपितोनव  झनझना जाता है और बगल वाले घुमौने दरवाज़े की ओर जाता है, और एक वैध टोकन का इंतज़ार कर रही मशीन में दूसरा दस रूबल्स का सिक्का घुसाता है, - फिर अगल-बगल देखता है (नमस्ते, बॉर्डर्स के, प्रवेश द्वारों के, और सफ़ेद ब्रेड के संदर्भ में ‘बन्स’ के शहर!)3, और उसकी आँखें पुलिसवाले की आँखों से मिलती हैं. वह ग़लत नहीं था: एक ओर हटने का इशारा उसी के लिए है.  वे, सही कहें तो, दो हैं. पासपोर्ट दिखाने के लिए कहते हैं.  “मैं मॉस्को से आया हूँ,” कपितोनव  ने अनिच्छा से बाकी के साऊथ से आये यात्रियों से दूर होते हुए कहा, जो बड़ी मात्रा में घुमौने दरवाज़े में घुसे जा रहे हैं और किसी तरह का संदेह भी नहीं जगा रहे हैं.

 “तो फिर मॉस्को स्टेशन पर क्यों नहीं गए?”  “क्योंकि लादोझ्स्की पे आया हूँ.”  “मगर मॉस्को स्टेशन ज़्यादा सुविधाजनक है.”  “हो सकता है.”  “मॉस्को – हमारे देश की राजधानी है,” विचारों में खोए-खोए पुलिस वाला पासपोर्ट का आवास-स्थान वाला पन्ना खोलकर अपने साथी से कहता है (वे दोनों, निःसंदेह, उकता रहे हैं). “यात्रा का उद्देश्य, अगर सीक्रेट न हो तो?”  “कॉन्फ्रेन्स,” कपितोनव  ने जवाब दिया. “आख़िर, बात क्या है? क्या हमारी सरकार पुलिस की हो गई है? या फिर मैं कुछ अलग-सा लग रहा हूँ?”  “आप अजीब तरह से हरकतें कर रहे हैं. और ये कैसी कॉन्फ्रेन्स है? आप जवाब देने से इन्कार भी कर सकते हैं.”  “एक संस्था की है,” कपितोनव  सिर्फ इसलिए जवाब देता है, क्योंकि “जवाब देने से इनकार कर सकते हैं” गूंज उठा था, और ऊपर से उसने कागज़ पर छपा निमंत्रण भी दिखा दिया, ये सोचकर कि इससे वह अन्य स्पष्टीकरण देने से बच जाएगा.  “मारा पापड़ वाले को!” पुलिस वाला कहता है, “जानी-पहचानी कॉन्फ्रेन्स है.”  “क्या वाक़ई में?” कपितोनव  को उस पर विश्वास नहीं हो रहा था. “क्या आपके पास इसकी कोई जानकारी है?”  “ये वही तो है जिसे उड़ा देने वाले थे,” पुलिस वाला दूसरे पुलिस वाले को कपितोनव  का निमंत्रण पत्र दिखाता है.

 “मतलब?” कपितोनव  समझ नहीं पाया. ”मतलब भी, जानकारी भी,” पहले वाले ने सभी बातों का एकदम जवाब दे दिया, जबकि दूसरा पुलिस वाल निमंत्रण-पत्र पर इस तरह नज़र गड़ाए था, जैसे किसी भूत को देख रहा है. “मतलब, आपने न्यूज़ नहीं सुनी?”

 “कौन उड़ाना चाहता था?” कपितोनव  एकदम चित हो गया.  “वैसे ही जोकर्स, जैसे आप.”  “ऐसे ही मैजिशियन्स,” दूसरे ने पुश्ती जोड़ी, और न जाने क्यों दोनों हँसने लगे. कागज़ लौटाते हुए, उसे छोड़ते हैं, साथ में पहले वाले के मुँह से निकलता है:  “अपना ध्यान रखिए.” कपितोनव  घुमौने दरवाज़े की तरफ़ लौटता है. 

16.58


पुलिस की सूचना से कपितोनव  के दिमाग़ में ऐसे ऊट-पटांग ख़याल आने लगते हैं, कि सच कहें तो, कपितोनव  सोच ही नहीं रहा है. और जब कपितोनव  सोचता नहीं है, तो सोच की प्रक्रिया ख़ुद-ब-ख़ुद होने लगती है – बेकार की, अनावश्यक, उसके लिए भी चुपचाप तरीक़े से. गहराई, जहाँ तक उसका एस्केलेटर जाता है, वो एस्केलेटर की लम्बाई का Sin300 , मतलब लम्बाई का आधा है, जिसके बारे में सोचने की ज़रूरत भी नहीं है : ये तो वैसे भी स्पष्ट है. नज़र, आदत के अनुसार, सामने से ऊपर आते हुए चेहरों पर उलझ जाती है जो अगर सुन्दरियों के नहीं, तो कम से कम ‘मिस एस्केलेटर’ मुक़ाबले की प्रतियोगियों के तो हों. लैम्प्स - क़तार में लगे – अपने आप गिन लिए जाते हैं. उतरते हुए: 21. तो, उनके बीच की दूरी और 300 का झुकाव, - ये हुई गहराई, 50 मीटर्स से कुछ ज़्यादा.

मगर ये सब – बस, यूँ ही – अन्य बातों के अलावा. उसने ‘मिस एस्केलेटर’ चुना पहली ही लड़की को, घुंघराले लाल बालों वाली, जिसकी लटें उसकी फ़र की हैट के नीचे से बाहर निकल रही थीं. सामने से आने वाले एस्केलेटर से और किसी ने तो आँखों को ख़ुशी नहीं दी.

मॉस्को में एक गुम्बद वाले स्टेशन्स लगभग हैं ही नहीं, मगर ये, पीटरबुर्ग में बहुत बड़ा है. अंतिम छोर पर बेघर लोग बैठे गर्मा रहे हैं: उनके पास न तो कानून-व्यवस्था रखने वाले जाते हैं, न ही स्थानीय अण्डरग्राउण्ड ट्रेन के कर्मचारी. कपितोनव  को भी प्लेटफॉर्म के उस छोर पर जाने की ज़रूरत नहीं है. 

मॉस्को जाने से पहले उसे राजधानी के मुक़ाबले में पीटरबुर्ग की मेट्रो चरम सादगी और सुन्दरता का प्रतीक लगती थी, - अब तो उसे लाइनों और पारपथों से जूझना है. वह कम्पार्टमेंट में हैण्डल पकड़े खड़ा है और मेट्रो का नक्शा देख रहा है जो किसी बैंक के इश्तेहार से दब गया है. ट्रेन बदलने की आवश्यकता की जाँच कर लेता है. वहाँ एस्केलेटर पर : जब वह नीचे जा रहा था, तो एक महिला की आवाज़ चेतावनी दे रही थी “चलते-फिरते विक्रेताओं द्वारा ग़ैरकानूनी चीज़ों का व्यापार करने की बढ़ती हुई घटनाओं की”, - अब कम्पार्टमेंट में विक्रेता प्रकट होता है और पूरी योग्यता से अपना परिचय देता है: कामकाजी ढंग, स्मार्ट, बढ़िया सधी हुई आवाज़. उसके हाथों में पोलिथिन का पैकेट है, जो सामान से भरा है. अपनी जोशभरी और खनखनाती आवाज़ में अब जो वह कह रहा है, उससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि ये जुराबें साधारण नहीं हैं. 

 “थर्मो-सॉक्स, रूस और बेलारूस में बनाए हुए!... ख़ुद ही पैरों के तापमान को नियंत्रित करते हैं, और चलते समय होने वाले घर्षण को कम करते हैं!... फ़ैक्ट्री के भाव पर दे रहा हूँ – 50 रूबल्स की जोड़ी, नो प्रॉफ़िट!...”

कम्पार्टमेंट में कपितोनव  अकेला ही है, जो विक्रेता की उपस्थिति पर ग़ौर करता है.  विक्रेता ने भी देख लिया कि एक व्यक्ति ने जेब से पचास रूबल्स निकाल लिए हैं. वह सही दिशा में तेज़-तेज़ क़दम बढ़ाता है.  “मैं ये नहीं पूछ रहा हूँ कि घर्षण कैसे कम होता है, मुझे इस बात में दिलचस्पी है”, कपितोनव  विक्रेता की तरफ़ पैसे बढ़ाते हुए बोला, “कि चलते समय घर्षण कम क्यों करना चाहिए?”

 “क़दम की सुरक्षितता और पैरों को उच्च कोटि के आराम का एहसास दिलाने के लिए,” कपितोनव  को जुराबें थमाते हुए, पलक झपकाए बिना विक्रेता जवाब देता है.

कहीं ये कोई फ़रिश्ता तो नहीं है, जो सिर्फ कपितोनव  के ही सामने प्रकट हुआ है? क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता कि किसी ने भी थर्मो-सॉक्स के विक्रेता की ओर न देखा हो: क्या कपितोनव  के अलावा किसीने उसकी आवाज़ सुनी, उसे देखा? दरवाज़े खुलते हैं और थर्मो-सॉक्स का विक्रेता कम्पार्टमेंट से बाहर निकल जाता है. 

17.47 

यूनिफॉर्म पहने, रेशमी टाई लगाए, सुनहरे बालों वाली रिसेप्शनिस्ट टेलिफोन पर बात कर रही है – भीतर आते हुए कपितोनव  की तरफ़ मुँह घुमाती है, और उसकी आँखों में कपितोनव  स्वागत के स्थान पर पढ़ता है : “हमारे पास प्रॉब्लेम्स हैं”. मौसम से संबंधित समस्या का अंदाज़ लगाने की ज़रूरत नहीं है. समस्या एक इकलौते ग्राहक के रूप में सामने खड़ी थी. उसके लम्बे, पीछे की तरफ़ कंघी किए हुए सफ़ेद बाल, देखने में पचास साल का, और कपड़े, जो उस पर थे उन्हें बस घिनौना ही कहा जा सकता था: ये न तो फ़र-कोट था, न भेड़ की खाल का कोट, न ही ओवर-कोट, न जैकेट. न गाऊन, न बख़्तर. उसकी पीठ पर झोला तो नहीं, बल्कि बुना हुआ थैला था.

“हाँ, हाँ,” रिसेप्शन-डेस्क के पीछे से लड़की कह रही है, “अपना नाम नहीं बताना चाहता...नहीं, पासपोर्ट नहीं दिखा रहा. बोला, कि पासपोर्ट नहीं है. और फॉर्म भरने से भी इनकार कर रहा है...यही, मैं यही कह रही हूँ. मगर वह सुन ही नहीं रहा.”  

सड़ान की हल्की सी बदबू, जो इस जगह के लिए अनपेक्षित थी, कपितोनव  को उस ग्राहक से एक क़दम पीछे हटने पर मजबूर कर देती है. वह पासपोर्ट निकालकर डेस्क पर रख देता है, - इस फ़ालतू काम को, जिसका मतलब सिवाय इसके कुछ नहीं है कि वह रजिस्ट्रेशन के लिए तैयार है, प्रॉब्लम-ग्राहक ने देखा – उसके, वैसे भी अप्रिय चेहरे पर घृणा का भाव प्रकट होता है, जबकि रिसेप्शन-डेस्क के पीछे से लड़की प्रशंसा के भाव से कपितोनव  की ओर देखकर सिर हिलाती है, जैसे कह रही हो कि आप बढ़िया हैं, सब कुछ ठीक है, और टेलिफोन के चोंगे में, शायद, अपने अफ़सर से कहती है: 

“अभी उनकी संयोजन समिति का प्रबन्धक आने वाला है, मैंने बुलाया है, उन्हींको सुलझाने दो...माफ़ कीजिए, ये आपसे कुछ कहना चाहता है...” और अब उससे, जिसका हाथ चोंगे की ओर बढ़ गया था, कहती है, “लीजिए.” कपितोनव  डिब्बे से फॉर्म निकालता है और बिना समय गँवाए उसे भरने लगता है. वह सुन रहा है:  “नमस्ते, मैं ‘ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट’4 हूँ!... एकदम ठीक, ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट, कोई और नहीं...नहीं, मुझे इसी नाम से निमंत्रित किया गया है, हिस्सा लेने वालों की सूची में मुझे इसी नाम से दर्शाया गया है, और मुझे आपके होटल के नियमों से कोई मतलब नहीं है!...मैं न तो सीदरव हूँ, न रबीनविच, न मिक्लुखा-मक्लाय, न ही जॉर्ज वाशिंगटन, मैं – ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट हूँ...मेरे सब्र का इम्तिहान न लीजिए!...नहीं, नहीं, फिर से नहीं!...इंतज़ार नहीं कर सकेंगे!...और मैं भी किसी का इंतज़ार नहीं करूँगा, ये मत सोचिए, कि करूँगा!...मुझे आप पर दया आती है!...हाँ, व्यक्तिगत रूप से आप पर!” इतना कहकर वह रिसेप्शनिस्ट लड़की को चोंगा लौटा देता है और कहता है बोला: “मुझे मेरा ब्रीफकेस दीजिए!”  “हम ब्रीफकेस नहीं देते.”  “मुझे मालूम है कि ब्रीफकेस आपके काऊंटर के पीछे है. मुझे सूचित किया गया है.”  “अभी आपकी संयोजन समिति का आदमी आएगा और आपको ब्रीफकेस देगा.”  “मेरे पास टाइम नहीं है. मैं ब्रीफकेस की मांग करता हूँ.”  “फिर से कहती हूँ. ब्रीफकेस आपकी कॉन्फ्रेन्स की संयोजन समिति देगी, और हमारा आपकी ब्रीफकेसों से कोई संबंध भी नहीं है!...हमने सिर्फ उन्हें काऊंटर के पीछे रखने की इजाज़त दी थी”.

 “ये तो आपके लिए और भी बुरा है!”  वह तेज़ी से मुड़ता है और बाहर की ओर जाने लगता है.

 “रुक जाइये, अभी आपकी कॉन्फ्रेन्स का प्रबन्धक आ रहा है!” मगर ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट दरवाज़े के बाहर जा चुका था.  “ओह-हो-हो,” लड़की बुदबुदाई.  “मुझे आपसे सहानुभूति है,” कपितोनव  फॉर्म भरते हुए कहता है. “कोई सम्प्रदायी है.”

 “कॉन्फ्रेन्स का सदस्य है,” रिसेप्शनिस्ट ने जवाब दिया.   “मैं भी सदस्य हूँ.”  “कभी कभी ढंग के लोग भी आ जाते हैं.”  “मेरे पास अपना कुलनाम है, छुपाने को कुछ भी नहीं है.”  “अभी देखते हैं कि क्या है,” रिसेप्शनिस्ट कपितोनव  का पासपोर्ट खोलती है कहती है, “कपितोनव .”  “कपितोनव ,” कपितोनव  ने सहमति दर्शाता है.  “एव्गेनी गिन्नादेविच,” लड़की कहती है.  “अगर पिता के नाम के साथ, तो हाँ,” कपितोनव  इस पर कहता है.

 “है!” उसे लिस्ट में उसका कुलनाम मिल गया था. “और मैंने क्या ग़लत किया था?... आपने ख़ुद ही सब कुछ देखा था?...क्योंकि हम किन्हीं उपनामों से रजिस्ट्रेशन कर लेते हैं, और फिर...”  “क्या लिस्ट में उसका यही नाम है....ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट?”

“हाँ. वैसे तीन हैं – उपनामों वाले. वे दो तो कम से कम पासपोर्ट्स के साथ थे...” संयोजन-समिति की प्रतिनिधि सीढ़ियों की तरफ़ से जल्दी-जल्दी हॉल में प्रवेश करती है. बैज के अनुसार – ओल्गा मत्वेयेवा.

 “नमस्ते. ये आप हैं?” वह ए.गे.कपितोनव  से एक ऐसे प्रतिनिधि की तरह मुख़ातिब हुई, जो कोई भी समस्या सुलझाने में समर्थ हो.  “कैसा रहा सफ़र? कोई समस्या है? परेशान न हों, सब ठीक कर लेंगे...”  “नमस्ते, ओल्गा, मगर...”  “वो अभी-अभी चला गया,” काऊन्टर के पीछे से सुनहरे बालों वाली बीच में टपक पड़ी.  “किधर?”

 “उस तरफ़. कहा कि हम सब को पछताना पड़ेगा.”  “ओह, हेल!” और संयोजन समिति की ओल्गा जो भी पहने है, मतलब बिना गरम कपडों के, बाहर, बर्फ़ में जाने लगती है, मगर फ़ौरन लौट आती है. “कम से कम, वो दिखता कैसे है?”  “आप फ़ौरन समझ जाएँगी,” रिसेप्शनिस्ट जवाब देती है.

 “पीला कफ़्तान,” कपितोनव  चिल्लाकर कहता है, मगर ओल्गा मत्वेयेवा ने, जो दरवाज़े के बाहर निकल गई थी, शायद ही उसकी बात सुनी हो.

 “सिर्फ, वो कफ़्तान नहीं था,” सोच में डूबी हुई रिसेप्शनिस्ट प्रतिवाद करती है, “चाहे जो कहिए, मगर कफ़्तान नहीं... हस्ताक्षर कीजिए, प्लीज़. (कपितोनव  ने फॉर्म तो भर दिया, मगर हस्ताक्षर करना भूल गया था.) रूम नं. 32, तीसरी मंज़िल. नाश्ता साढ़े छह से दस बजे तक. कमरे में धूम्रपान करना मना है.”  “किसी और बात की तो मनाही नहीं है?”  “नियम पढ़ लीजिए, आपने हस्ताक्षर किए तो हैं, कि नियमों से परिचित हो चुके हैं.”  “कहते हैं कि आज आपके यहाँ कुछ उड़ा देने वाले थे?” चाभी लेकर कपितिनोव उत्सुकता दिखाता है.  “आप अपने लोगों से ही पूछ लेते, वे ज़्यादा अच्छी तरह बता सकेंगे. हमारे यहाँ गर्मियों में फुटबॉल- फ़ैन्स रुके थे, उनके साथ ज़्यादा शांति थी”.

ओल्गा बाहर से लौटती है, ब्लाऊज़ पर बर्फ़ के फ़ाहे, उसने स्वयम् ही अपने कंधों को पकड़ा है. 

 “मैं तो उसके पीछे नहीं भागूंगी! जब वापस आयेगा, तो फ़ौरन मुझे फ़ोन कर देना. हद से हद उसे किसी के फ्लैट में ठहरा देंगे.”  “हाँ, कुछ ऐसा ही करना पड़ेगा,” काऊन्टर के पीछे वाली कहती है.   “और आप – कपितोनव ?” ओल्गा अंदाज़ लगाती है. “एव्गेनी... गिन्नादेविच? चलिए, आख़िरकार... ट्रेन के साथ बड़ी बेहूदा बात हुई, वो मैंने आपको फ़ोन किया था. याद है?” कपितोनव  कब का समझ गया था कि वह दोनों ओल्याओं में एक है, और वह जान गया है कि कौनसी वाली. जिसने उसे आर्किटेक्ट कहा था, जब ट्रेन पुल से गुज़र रही थी.

 “आपने मुझे ‘वो’ समझ लिया?”

 “मुश्किल दिन है,” ओल्या ने कहा. “बात बस ये थी कि आप दोनों अंतिम सदस्य थे और एक ही समय पर आए...” 

 “क्या आप सबको रिसीव करती हैं?”  “ओह, नहीं. ‘तालाब’5 ने कहा था कि आपको अवश्य रिसीव किया जाए.”  “मुझे?”  “और ये है पित्राज़वोद्स्क वाला. वही है. उसके साथ हमेशा कोई न कोई समस्या रहती ही है...हाँ! आपको ब्रीफ़केस देना होगा...” वह काऊन्टर के पीछे ढूँढ़ती है और काली ब्रीफ़केस निकालती है, साधारण ब्रीफ़केस से छोटी. “आपको, सदस्य के नाते. कॉन्फ्रेन्स के कागज़ात वगैरह, देख लीजिए...”  “आर्किटेक्ट ने भी मांगी थी, मैंने नहीं दी”. सुनहरे बालों वाली काऊण्टर के पीछे से चहकती है.

ओल्गा मत्वेयेवा काँच के बर्तन से चॉकलेट उठाती है: “सुकून देती है. मैं तो पूरी पगला गई हूँ. आपको कौन से? तीसरे? चलिए, हमारा रास्ता एक ही है,” कपितोनव  को लिफ्ट की ओर ले जाती है. कपितोनव  के बाएँ कंधे पर झोला था, दाएँ हाथ में – ब्रीफ़केस, वो भारी नहीं है. कपितोनव  मुड़कर देखता है, मगर सुनहरे बालों वाली रिसेप्शनिस्ट उसकी ओर नहीं, बल्कि किसी कागज़ में कुछ देख रही है. तिरछी नज़र से कपितोनव  अपनी गाइड के होठों पर हँसी देखता है. लिफ्ट उनके बुलाने पर फ़ौरन नहीं आती. इंतज़ार करते हैं. 

ओल्गा मत्वेयेवा ऊँचाई में उससे आधा सिर कम है, वह थोड़ा झुककर चलती है, उसके चेहरे के भावों में पंछियों जैसा कुछ है, - सिर्फ उसकी ओर देखने के बजाय कपितोनव  ने उससे पूछा:  “और ये बॉम्ब वाला किस्सा क्या है?”  “किसी सुअर के बच्चे ने पुलिस में फ़ोन कर दिया और कहा कि हॉल में बम छुपाया गया है. बस, यही किस्सा है. सेशन बरबाद हो गया. पूरा दिन बरबाद हो गया. मतलब, आपका कोई हर्ज नहीं हुआ. सब कुछ – कल ही होगा.”  “इसमें किसे दिलचस्पी है?”  “मतलब, किसी को तो है,” ओल्गा ने कहा. “अगर ये ईवेन्ट्स-आर्किटॆक्ट सुबह आ जाता, तो सब यही सोचते कि ये वही है. ख़ुशकिस्मत है.”

 “मैं भी,” कपितोनव  ने कहा.  “नहीं, आप पर तो किसी का शक नहीं जाता.”  “और, वह कौनसे ईवेन्ट्स का आर्किटेक्ट है?”  “देखिए, मैंने तो उसे इनवाईट नहीं किया. मेरा काम सिर्फ मेहमानों को रिसीव करना है.” लिफ्ट नीचे आ गई: आराम से दरवाज़े खोलती है. फिर सोचती है, कि क्या उन्हें बन्द करना चाहिए. वैसे भी लिफ्ट एक पवित्र स्थान है – यहाँ बातें नहीं करते, और स्विच, देखने की परंपरागत वस्तु होने के कारण, अपनी रोज़मर्रा की शकल से रोज़मर्रा के ख़यालों को भी बाहर ही रखते हैं. जब तक तीसरी मंज़िल पर बाहर नहीं आते, दोनों चुप रहते हैं और सोचते भी नहीं हैं.   

 “आपको इधर, और मुझे कोरीडॉर के उस कोने तक जाना है. अगर ऑपेरा सुनना चाहें – तो सात बजे दूसरी मंज़िल पर, ख़ास तौर से डेलिगेट्स के लिए. कॉन्सर्ट. मगर मुझे लगता है कि आप ऊँघने लगेंगे. अच्छी नींद नहीं हुई, हाँ?” 

 “हाँ. यहाँ मेडिकल शॉप कहाँ है?”  “अनिद्रा? आपको मेडिकल शॉप की ज़रूरत क्यों पड़ गई?”

“मॉस्को में मेरी तबियत बिगड़ गई थी.”  “और मैंने सोचा कि ट्रेन की वजह से...बेहतर है, थोड़ी सी रम पी लीजिए, ‘मिनिबार’ में मिल जाएगी... और एक बात: ब्रीफ़केस के बारे में...उसमें और चीज़ों के अलावा एक सुवेनीर भी है – जादुई छड़ी, सिर्फ छड़ी, लकड़ी की, ताबीज़ जैसी, देखियेगा...घबराइये नहीं, ये सिर्फ मज़ाक है. यहाँ, ऐसा लगता है कि सब लोग मज़ाक नहीं समझ पाते, इसलिए मैं आपको आगाह किए देती हूँ. वर्ना आप न जाने क्या सोचने लगेंगे...”


18.15

और, कोई झपकी नहीं, बल्कि सिर्फ विचार की अनुपस्थिति, हालाँकि, हो सकता है कि शॉवर के नीचे खड़े-खड़े एक-दो सेकण्ड के लिए वह होश खो बैठा हो. विचार की अनुपस्थिति का विचार कपितोनव  को वास्तविकता में वापस ले आता है, उसे याद आता है कि वह सोना चाहता था, और वह पानी बन्द कर देता है. कपितोनव  के मन में एक छोटा सा भय है: होटलों में वह कभी भी टूथ ब्रश को सिंक के पास वाले गिलास में नहीं छोड़ता है. यह शुरू हुआ हाल ही में एक संवाददाता द्वारा पर्दाफ़ाश करने वाली रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद. जो स्कैण्डल की ख़ातिर एक पांच सितारा होटल में सफ़ाई कर्मचारी के रूप में रही थी. उसने दावा किया था कि सफ़ाई करने वाली औरतें काम की अत्यधिकता के कारण सिंक को वैज्ञानिक तरीक़े से साफ़ नहीं कर पाती हैं, और काम जल्दी-जल्दी पूरा करने के लिए मेहमानों के टूथब्रशों का इस्तेमाल कर लेती हैं. कपितोनव इस पर विश्वास की अपेक्षा अविश्वास ही करता है, मगर प्लास्टिक के खोल में कपड़े का टुकड़ा डालकर रखा हुआ टूथ ब्रश अपने ट्रेवल-पर्स में डाल लेता है. 

नीना ने एक बार उससे कहा था कि वह अनेकों तरह के भय का पुतला है. शुक्र है कि ये खाने पीने की चीज़ों तक नहीं पहुँचता. पूरी ज़िन्दगी वह आगे के कम्पार्टमेन्ट्स से बचता रहा. कुछ समय से (जो कि वह भली भाँति छुपा लेता है, नीना को इस बारे में पता भी नहीं चला), जब वह बड़ा हो गया था, नन्ही आन्का के साथ हुई घटना के बाद से, वह खून देखने से डरने लगा था – नहीं, खून देखने से नहीं, बल्कि इस डर के कारण कि ऐसा करने से उसे नुक्सान पहुँचेगा: मिसाल के तौर पर, कपितोनव  ऐसी फ़िल्में देखने से बचता है जिनमें केचप या क्रेनबेरी जूस के उपयोग की संभावना हो. बावजूद इसके कि स्कूल में और विश्वविद्यालय में भी वह धौंस जमाने के लिए मशहूर था. मगर स्कूल के दिनों में ही, जब पाँचवीं कक्षा में इतिहास के पाठ के दौरान, अनुशासनप्रिय किरील सिर्गेयेविच ने रोमन सेना में ‘डेसिमेशन’ (विद्रोही सैनिकों में से दस के पीछे एक को मार देना – अनु.) के बारे में बताया और बातों-बातों में प्राचीन रोमन्स के अनुकरण के बारे में भी बताया (उनकी कक्षा में तीन को गोली मार दी जाती – वो भी बाकी बचे कॉम्रेड्स के प्रयत्नों से), कुछ महीनों तक वह अपनी ज़िन्दगी में 10 के अंक को प्रधानता देने लगा – जो, अगर उसके समर्थन में कुछ कहना हो तो, समूची स्थितीय प्रणाली का आधार है. मगर – दसवीं बस, दाँतों के डॉक्टर की लाईन में दसवाँ नम्बर....कहीं इसीलिए तो कपितोनव  ने मैथेमेटिक्स को नहीं चुना (कभी कभी वह इस बारे में सोचता है), ताकि अनजाने में ही अपने लड़कपन के डेसिफ़ोबिया से मुक्ति पा सके?

अपनी तमाम सादगी के बावजूद इस कमरे में विचित्र रूप से आईनों की भरमार है. उपकक्ष और बाथरूम में तो ठीक है, मगर कमरे में – और वहाँ तीन-तीन आईने किसलिए? कपितोनव  स्वयँ को प्यार करने का शौकीन नहीं है और इस संभावना से ज़रा भी ख़ुश नहीं है – पलंग पर पड़े-पड़े भी, सिर को मोड़कर, जो पलंग पर लेटे हुए उसका अपना ही हिस्सा है, चेहरा देखने की. 

तो, आइडिया ये था कि अगर सो न सके, तो झपकी ही ले ले. ये स्पष्ट हो गया कि सो नहीं पाएगा, और इसकी वजह टेलिविजन नहीं है (चैनल्स बदलता है), बल्कि व्यक्तिगत अनुभव था इस बोझिल जोश को सहने का, जो बिस्तर पर लेटते ही शिद्दत से महसूस होने लगता है. 

ऊपर से साऊण्ड-प्रूफ़िंग. ताज्जुब है.

पहले तो कपितोनव  को ऐसा महसूस हुआ कि दीवार की दूसरी ओर कोई खर्राटे ले रहा है. अभी से? कपितोनव कान लगाकर सुनता है. ये खर्राटा नहीं है. ये किसी का गला घोंट रहे हैं. वह कोई उपाय करता, मगर अपने कानों पर भरोसा करने से इनकार करता है. और, ये सही भी है. उल्टियाँ निकालने की कोशिशें – दीवार के पीछे यही हो रहा है.

कपितोनव  को आश्चर्य होता है. वह टेलिविजन का वॉल्यूम बढ़ा देता है. एक मशहूर यूरोपियन अफ़सर की प्रेमिका के बारे में ख़बर दिखाई जा रही है, जिसने एक प्रमुख समाचार पत्रिका पे मुकदमा दायर कर दिया है.  

तभी दीवार पर टकटक होती है.  “प्लीज़....वॉल्यूम!...” दीवार के पीछे से बड़ी मुश्किल से मतली को रोकते हुए पड़ोसी भर्राता है.

कपितोनव  बीमार आदमी से जुड़ना नहीं चाहता और टेलिविजन बन्द कर देता है.  “थैंक्यू...” कपितोनव  अविश्वास से ख़ामोशी को सुनता है: क्या दीवार के उस ओर वाला ज़िन्दा है? जीवन के कोई और लक्षण सुनाई नहीं देते. (मगर क्या ये भी कोई ज़िन्दगी है, जब तुम्हारी आंते बाहर निकल रही हों?)

कपितोनव  ब्रीफ़केस खोलता है. ब्रोश्यूर्स, प्रोग्राम से संबंधित डॉक्युमेंट्स की फ़ाइल्स. चार्टर का मसौदा. नोटपैड, बॉल पेन्स. इस शहर के स्मारकों के रहस्यमय जीवन के बारे में एक पुस्तिका – सुवेनीर. एक और सुवेनीर – जादुई छड़ी. कपितोनव  ख़ुद भी ये समझ सकता था, क्योंकि प्लास्टिक के उस खोल पर, जिसमें यह वस्तु रखी थी, एक स्लिप चिपकी थी जिस पर लिखा था “जादुई छड़ी”.

असल में तो ये चाइनीज़ रेस्टॉरेंट की एक साधारण डंड़ी थी – मज़ाक की बात ये थी कि आम तौर से पैकेट में ऐसी दो डंड़ियाँ रखी होती हैं और वे खाने के लिए होती हैं, और यहाँ है एक, और, इसलिए, किसी और काम के लिए है. कपितोनव  को सुझाव दिया जाता है कि वह स्वयँ को हैरी पॉटर समझे. उसे ऐसा लगा कि उस पर नज़र रखी जा रही है और उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किया जा रहा है – कि वो मुस्कुराता है या नहीं. कपितोनव नहीं मुस्कुराता, उसे ये दिलचस्प नहीं लगता. मगर किसी चीज़ ने उसे चीनी रेस्टॉरेंट की डंडी घुमाने पर मजबूर किया, - इंटरेस्टिंग! क्या कॉन्फ्रेन्स के सभी मेम्बर्स डंडी के साथ ऐसा ही करते हैं, जैसा अभी कपितोनव  कर रहा है, और क्या ऐसा करते समय कुछ लोग ‘अब्रा-का-दब्रा’ जैसा कुछ कहते हैं? कपितोनव  जादुई छड़ी को ब्रीफ़केस में रख देता है और मेम्बर्स के नामों की लिस्ट वाला ब्रोश्यूर निकालता है. हर मेम्बर के लिए एक-एक पृष्ठ है. उसकी तस्वीर और परिचायत्मक शब्द हैं.

सबसे पहले परिचय दिया गया है चेखव के मशहूर नायक के कुलनाम वाले अस्त्रोव का (शायद उपनाम है, कपितोनव ने सोचा.) “अस्त्रोव, अलेक्सान्द्र एस्कोल्दविच. विस्तृत क्षेत्र वाला सूक्ष्म मैजिशियन – माइक्रोमैग (यहाँ तात्पर्य है माइक्रो मैजिशियन से ). ‘गोल्डन-फ़नल’ से सम्मानित. माइक्रो मैजिशियन्स और मैजिशियन्स की अंतर्राष्ट्रीय अकादमी के सदस्य”. कपितोनव  को अस्त्रोव की मुस्कान अच्छी नहीं लगती, धृष्ठ नज़र उससे मेल नहीं खाती. वह पन्ना पलटता है और कॉन्फ्रेन्स के अगले मेम्बर की तस्वीर के स्थान पर उसका सांकेतिक रूप देखता है – एक फ्रेम में सिर और धड़ की सिर्फ रूपरेखा. रिसेप्शन काऊंटर पर हुई घटना के बाद इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है: “ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट”. और, आगे सिर्फ एक ही शब्द: “रिमोटिस्ट”. इस शब्द का क्या मतलब है, इसे अगर कपितोनव  समझने में असमर्थ है, तो कम से कम कुछ धुंधली सी कल्पना ज़रूर कर सकता है: रिमोट कन्ट्रोल वाली कोई चीज़, नहीं? – चलो, छोड़ो, इस पर मगज़मारी करने की ज़रूरत नहीं है, - साथ ही उसने इस बात पर भी ग़ौर किया कि वर्णक्रम टूट गया है: नियमानुसार ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट को अस्त्रोव से पहले होना चाहिए था (यहाँ रूसी वर्णक्रम की बात हो रही है – अनु.). ऐसा लगता है कि इस संदर्भ-पत्रिका के संकलनकर्ता एक बेचेहरा चेहरे से शुरूआत नहीं करना चाहते थे, मगर उस चेहरे वाले चेहरे में क्या ख़ास बात है...शायद, वही, जो उसके कुलनाम में है. 

आगे कपितोनव  सीधे ‘क’ अक्षर पे आ जाता है और कपितोनव को ढूँढ़ लेता है. 

उसके भीतर की हर चीज़ जैसे सिकुड़ने लगी. ये तस्वीर दो साल पहले बीबी ने खींची थी, जब वे तुर्की गए थे. ये इस ब्रोश्यूर में कैसे आ गई? मगर तभी उसे याद आ गया कि उसने स्वयम् ही दिसम्बर में इसे भेजा था, जब संयोजन समिति के लोगों ने उससे संपर्क किया था. ”कपितोनव , एव्गेनी गिन्नादेविच. मैथेमेटिशियन-मेन्टलिस्ट. दो अंकों वाली संख्याएँ.” 

वह मुस्कुराया. “मैथेमेटिशियन-मेन्टलिस्ट” – लगता है कि ऐसा ही कहते हैं. और “दो अंकों वाली संख्याएँ” पढ़कर सहयोगियों को क्या सोचना चाहिए?

पहली बार वह ‘सहयोगियों’ के रूप में उन पर विचार कर रहा है, अब तक वे एक अमूर्त समूह के तत्व थे. वह दिलचस्पी से ब्रोश्यूर के पन्ने पलटता है और “सहयोगियों” के बारे में जानकारी प्राप्त करता है. उनमें से अधिकांश माइक्रो-मैजिशियन्स हैं. किसी किसी का स्पेशलाइज़ेशन भी दर्शाया गया है: “माइक्रोमैजिशियन- मैचस्टिक्स”, “माइक्रोमैजिशियन-स्लीव्ज़”... बहुत सारे ‘मास्टर्स’ हैं – सिर्फ “मास्टर्स”, और साथ ही “मास्टर्स ऑफ़ ड्राईंगरूम-मैजिक” और उन्हीं जैसे. कई लोगों को “एक्सपर्ट-चीटर्स” कहा गया है, वैसे उनमें से दो “मास्टर्स” भी हैं. दो “अत्यंतसूक्ष्मधारी” हैं. ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट के अलावा कपितोनव  को दो और “रिमोटिस्ट्स” मिलते हैं. ये हैं कोई महाशय नेक्रोमेंसर 6 (ओझा-अनु.) और काल-भक्षक7. उनके साथ इन्सानों जैसे नाम नहीं दिए गए हैं, मगर ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट से अलग, इन दोनों की तस्वीरें दी गई हैं. काल-भक्षक – बीमारों जैसा दुबला है, उसके गाल लटके हुए हैं. महाशय नेक्रोमेंसर, वह नेक्रोमेंसर  (ओझा) जैसा ही है.

लैण्डलाइन फ़ोन की घण्टी कपितोनव  को पलंग से उठने पर मजबूर कर देती है.

 “यात्रा कैसी रही, एव्गेनी गिन्नादेविच? मैं ‘तालाब’, आपको तकलीफ़ दे रहा हूँ. मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया?”  “नमस्ते,” ‘तालाब’ को नाम, पिता के नाम से संबोधित करने की ज़ोखिम न उठाते हुए कपितोनव  कहता है, (विश्वास नहीं था कि याद है...) – थैंक्यू, सब ठीक है.”

 “फ़ाइटिंग मूड में तो हो?” ‘तालाब’ पूछता है.  “एकदम,” कपितोनव  जवाब देता है. “क्या, युद्ध की नौबत आने वाली है?”

 “एव्गेनी गिन्नादेविच, मैं नीचे, रेस्टॉरेंट में बैठा हूँ. क्या आप एक कप कॉफ़ी पीना पसन्द करेंगे?  एक दूसरे को थोड़ा बहुत समझेंगे, आमने-सामने बैठकर परिचय करेंगे. वर्ना तो हम क्या – बस, लिस्ट के अनुसार हैं?”  “ओह, बेशक, थैंक्यू, आता हूँ.” कमरे से निकलने से पहले उसने लिस्ट पर नज़र डाली – ब्रोश्यूर में ‘तालाब’ को ढूँढ़ा: वही है – वलेंतीन ल्वोविच.” 

18.57

 “नहीं, बस, कॉफ़ी के बदले ग्रीन टी – प्लीज़.”  “नींद डिस्टर्ब हो गई है?” ‘तालाब’  ने फ़ौरन पहचान लिया. होटल के रेस्टॉरेंट में छोटी सी मेज़ पर बैठते हैं. कपितोनव  का अपनी अनिद्रा के बारे में विस्तार से बताने का कोई इरादा नहीं है. 

“उम्मीद करता हूँ कि आरामदेह कमरे से बाहर खींच कर लाने के लिए आप मुझसे नाराज़ नहीं हैं? शायद, आप ऑपेरा सुनना चाहते थे? दूसरे अंक में पहुँच जाएँगे, समझ लीजिए कि पहला तो गया.” “नहीं, नहीं, मैं ऑपेरा का शौक़ीन नहीं हूँ.” वेट्रेस चीनी की केतली ले आई.

कपितोनव  ग़ौर करता है कि अगर केतली को ढक्कन के बल उलटा कर दिया जाए, जिससे उसका पेंदा ऊपर आ जाए और टोंटी को अपनी ओर रखा जाए, तो वह किसी हद तक ‘तालाब’  के चेहरे जैसी लगेगी. सुस्ताई हुई नाक, गोल-गोल गाल, एकदम समाप्त होता हुआ माथा, जैसे ‘तालाब’ चौबीसों घण्टे सिर के बल खड़ा रहा हो. खोपड़ी पर बाल सिर्फ समकोण बनाती हुई छोटी-छोटी मूँछों के रूप में थे, जैसे ‘तालाब’  की नाक के नीचे कोई टेप चिपका दिया हो. मगर उसकी आँख़ें बड़ी ज़िन्दादिल थीं और नज़र – पैनी.

हो सकता है कि बाथ-हाऊस में नंगा ‘तालाब’ विदूषक के रूप में चल जाता, मगर यहाँ काले कड़क सूट में, गहरे लाल वास्कट में, जिसके नीचे से बैंगनी टाई गुज़र रही है, वह बिल्कुल लॉर्ड जैसा लग रहा था.

 “तो, एव्गेनी गिन्नादेविच, क्या हाल हैं?” ‘तालाब’ ने दिलचस्पी लेते हुए पूछा. “प्रगति कैसी है, येव्गेनी?”

 “प्रगति से कोई शिकायत नहीं है, वलेंतीन ल्वोविच. सब ठीक है.”  “समझ गया. यहाँ निमंत्रित किये जाने से आपको आश्चर्य तो नहीं हुआ, येव्गेनी गिन्नादेविच?”  “आश्चर्य तो हुआ.”  “ ‘काला-वन’ 8   व्यक्तिगत रूप से आपको बुलाने के पक्ष में था. उसने ज़ोर दिया, मगर प्रस्ताव मैंने रखा. क्योंकि आपके ‘आइटम’ के बारे में मुझे क्रूप्नोव ने बताया था. क्रूप्नोव की याद है?”  “हाँ, उसने टूरिस्ट-सेन्टर में प्रोग्राम किया था, हम अक्टूबर में वहाँ मिले थे.”

 “वह तो – ठीक ठाक है, वह रिंग्स के करतब दिखाता है. हाथ का लचीलापन, जैसा कहते हैं. मगर आप, मतलब, सीधे दिमाग़ से, बुद्धि से, है ना? वह बहुत प्रभावशाली था, मगर हमारे दर्शक को आश्चर्यचकित करना मुश्किल है. 

 “वो, वहाँ एक कॉमन मेज़ थी,” कपितोनव  पिछले साल के प्रसंग को याद करते हुए कहता है, “आपका क्रूप्नोव आराम फ़रमा रहे लोगों के पास बैठ गया, मैंने भी करामात दिखाई. ऐसे ही, उत्सुकतावश.”  “मतलब, व्यावसायिक प्रदर्शन नहीं करते हैं.”  “बेशक, नहीं. ऐसे ही कभी-कभी मेज़ पर बैठे-बैठे, ग्रुप में.”

 “मगर मेज़ पर बैठे-बैठे भी व्यावसायिक रूप से किया जा सकता है. आजकल तो इसीका ज़्यादा चलन है. कॉर्पोरेट्स माइक्रोमैजिशियन्स को ऐसे ही बुलाते हैं. मेज़ पर ही, ग्रुप में बैठे-बैठे”.  “ओह, तो यही हैं ‘माइक्रोमैजिशियन्स’? पहले कुछ और नाम था...”

 “प्रेस्टिडिजिटेटर्स... मगर, लगता है कि ये नाम पसन्द नहीं था. मगर ‘माइक्रोमैजिशियन्स’ – ख़ुद ब ख़ुद ज़बान से उछलता है. नौजवानों को, पता है, प्रेस्टिडिजिटेटर्स कहलाना पसन्द नहीं है, उसमें कोई प्रेस्टिज नहीं है, वे तो ये शब्द कहना भी नहीं जानते, देखिए, आप भी तो भूल गए...मगर, माइक्रोमैजिशियन्स, सबको अच्छा लगता है. ये कब का प्रचलित हो गया है. काफ़ी समय से. मगर हम, वैसे नहीं हैं, मतलब - माइक्रोमैजिशियन्स- प्रेस्टिडिजिटेटर्स, हम - काफ़ी विस्तृत, विस्तृत हैं...तो आप, मतलब, सोची हुई संख्या बूझ लेते हैं?”  “दो अंकों वाली.”  “आप तो मैथेमेटिशियन हैं?”  “हाँ, मानविकी के विद्यार्थियों को लेक्चर्स देता हूँ...और, जहाँ तक इस करामात का सवाल है, इसमें किसी ख़ास मैथेमैटिक्स की ज़रूरत नहीं है.”  “ऐसे कैसे नहीं है, अगर संख्या मैथेमैटिकल है? या, कैसे? आप मुझे दिखाइए, डेमो बताइए. क्या अभी कर सकते हैं?”  “आसान है. मन में एक संख्या सोच लीजिए, दो अंकों वाली.”

 “ तीन अंकों वाली नहीं चलेगी?”  “दो अंकों वाली. तीन अंकों वाली से नहीं होता. दस तक की संख्या भी ले सकते हैं, मगर तब उस संख्या को टेलिफ़ोन नंबर की तरह सोचना पड़ेगा, जैसे – 07, 09.... दो अंकों वाली सरल हैं, ज़्यादा समझ में आती हैं.”  “ठीक है. सोच ली.”  “उसमें नौ जोड़िये.”  “एक सेकण्ड. जोड़ लिये.”

 “सात घटा दीजिये.” ”घटा दिये.”  “आपकी संख्या थी 36”.

 “नॉट बैड. नॉट एट ऑल बैड. मगर ये जोड़ना और घटाना क्यों? मगर, मैं ये किसलिए पूछ रहा हूँ. ये तो आपका सीक्रेट है.”    ”ओह नहीं, कोई सीक्रेट-वीक्रेट नहीं है, सिर्फ इसके बिना ये होता नहीं है.”  “शायद, क्यों कि मैं ताश के पत्तों पर काम करता हूँ. आप तो जानते हैं कि मेरी मुख्य ख़ासियत  - प्लेयिंग कार्ड्स हैं? इसीलिये, हाँ?”  “क्या – इसीलिये?”  “36. क्योंकि एक साधारण पैक में 36 पत्ते होते हैं. मैंने नहीं सोचा, ये अपने आप सोच लिया गया.”  “मुझसे किसी ने नहीं कहा कि आप पत्तों पर काम करते हैं. मुझे कैसे मालूम कि आप ताश के पत्तों पर या हैट से निकले ख़रगोश पर काम करते हैं”

 “मूलतः ताश के पत्तों पर. ख़रगोश – एकदम अलग विधा है. हालाँकि, पता है, मैं चूहों पर भी काम करता हूँ. मेरी ज़ूज़्या सारे पत्ते पहचानती है. एक-एक पत्ता! कभी देखिये ज़ूज़्या को. चलिए, एक बार और. मैंने सोच लिया.”  “आठ जोडिए.”  “आहा, अब आठ हो गए.”  “दो घटाइये.”  “घटा दिये.”  “54”.

 “क्योंकि ये है ताश का पूरा पैक, दोनों जोकरों के साथ. मैं तो फिर से उलझ गया.”   “आप हर संख्या को ताशों से ही जोड़ देते हैं.”  “ भाड़ में जाए! ये है करामात! आइडियोमोटोरिक्स, सब साफ़ है.”  “नहीं, यहाँ कुछ और है.”  “हाँ, मेरे चेहरे पे सब लिखा है. आप, बस उसे पढ़ना जानते हैं. मैं पार्टीशन के पीछे रहूँगा, तब कुछ नहीं हो सकेगा”.

 “हो जाएगा.”  “ठीक है, हम जाँच करेंगे... पक्का? मगर...काम की बात, सहयोगी. मैं चाहता हूँ कि आप हमारे साथ रहें, न कि उन मुफ़्तख़ोर बदमाशों के साथ, जो गिल्ड (व्यवसायी-परिषद) में सत्ता के पीछे भागते हैं. याद रखिये: ‘काला-वन', कोई और नहीं. उसे पकड़े रहिये. वो – हमारी पार्टी का है. और हमें किसी भी क़ीमत पर अपने आदमी को प्रेसिडेंट चुनना है. अगर ज्युपितेर्स्की का आदमी सत्ता में आ जाता है, तो हम सब ख़तम हो जाएँगे. गिल्ड के लिए ये विनाशकारी होगा. देखिए, किस किसको उन्होंने बुलाया है. आपने देखा है? – उसने ब्रीफ़केस से कॉन्फ्रेन्स के सदस्यों की सूची वाला ब्रोश्यूर निकाला – ये सब कमीने हैं! कम्पार्टमेंट-चीटर्स! पढ़िये: ‘ताश के पत्तों को किसी भी तरह से रखिए, मास्टर जीतेगा’! ये आपको कैसा लगा? ‘मास्टर’. मैं ख़ुद भी ताश के पत्तों पर काम करता हूँ, और मैं धोखेबाज़ों और जादूगरों को पहचान सकता हूँ. और चीज़ों में भी ऐसा ही है! जेबक़तरे अपने आप को माइक्रोमैजिशियन्स-मेनिप्युलेटर्स कहते हैं. और वो ऐसा भी दिखाते हैं कि हमारे संगठन में उनका एक ख़ास वर्ग है! जानते हैं, जहाज़ को पानी में जैसे छोड़ेंगे, वह वैसे ही तैरेगा. जैसी नींव रखेंगे, वैसी ही ज़िन्दगी मिलेगी. यहाँ हर वोट महत्वपूर्ण है. इसीलिए मैं आपके साथ यहाँ हूँ. क्या मैं आप पर निर्भर रह सकता हूँ?”  “आपके यहाँ तो मामला बेहद उलझा हुआ है...मैंने सोचा भी नहीं था.”  “सोचिए भी नहीं. आपका पसन्दीदा सब्जेक्ट है – मेन्टल मैजिक. बेकार की बातों के बारे में आपको सोचना भी नहीं चाहिए. आपके बारे में सब कुछ सोच लिया गया है. आप सिर्फ मुझे पकड़े रहिए और किसी पे भी यक़ीन मत कीजिए. सिर्फ मुझ पर, मतलब, मेरे ज़रिए – ‘काला-वन’ पर”.

 “आप मेन्टल मैजिक कह रहे हैं? क्या इसे इस नाम से जाना जाता है?”  “तो, फिर और कैसे? मेन्टल मैजिक. और, अगर आपके पास लोग आएँ और आपको पटाने की कोशिश करें, कि किसके साथ दोस्ती करनी चाहिए, किसके ख़िलाफ़ वोट देना है, तो मेरी बात याद रखिए: यहाँ किसी पर भी यक़ीन नहीं करना है, सिर्फ मुझ पर और मेरे ज़रिए काला-वन पर.”  “मैंने डेलिगेट्स की लिस्ट देखी है. असाधारण हैं...अगर नरमाई से कहूँ तो.”

 “साधारण ही ज़्यादा हैं. और, असाधारण कौन हैं?”

 “कोई नेक्रोमेंसर ...”   “महाशय नेक्रोमेंसर,” ‘तालाब’ दुरुस्त करता है. “ये हमारा आदमी है, वो सही वोट देगा...”  “काल-भक्षक...”                 

 “अरे, आप तो रिमोटिस्ट्स के बारे में कह रहे हैं,” ‘तालाब’ मुँह टेढ़ा करते हुए कहता है. “एक तीसरा भी है, वो भी आज ही आया है.”  “हाँ, मैंने उसे देखा है. उसने रिसेप्शन पे रजिस्ट्रेशन करवाने से इन्कार कर दिया”.

 “क्या आपने देखा कि वो कहाँ गया?”  “बाहर सड़क पे.”  “सड़क पे किस तरफ़? हमने उसे खो दिया.”

 “पता नहीं, बस, चला गया.”  “मैंने उसे बनाया है. कई लोगों को पसन्द नहीं आया है कि मैंने उन्हें बुलाया है. आपको वह कैसा लगा?”  “मेरे ख़याल से, पागल है.”  “सभी रिमोटिस्ट तिलचट्टों जैसे हैं...”  “माइक्रोमैजिशियन्स भी?”  “इसके विपरीत हैं, माक्रो. मगर हम सब...वो भी, और आप भी, और मैं, और हमारे अन्य भाई-बन्धु...हम सभी नॉनस्टेजर्स हैं....आप, बेशक, जानते हैं कि नॉनस्टेजर्स कौन होते हैं?...”  “कौन?”

 “नहीं जानते?...नॉनस्टेजर्स की कॉन्फ्रेन्स में आए हैं और नहीं जानते? ख़ुद नॉनस्टेजर हैं और नहीं जानते?”

 “ओह, तो मैं नॉन्स...नॉन्सेन्स...टे?...”  “नॉनस्टेजर. मतलब, जिसे कम से कम सामान की ज़रूरत होती है या किसी सामान की ज़रूरत नहीं होती – वो नॉनस्टेजर्स होते हैं. फिर वो माइक्रो हैं या माक्रोमैजिशियन्स हैं ये महत्वपूर्ण नहीं है. मेन्टलिस्ट्स भी वैसे ही होते हैं. आपको तो किसी विशेष सामान की ज़रूरत नहीं है ना? हाँ, अगर, खोपड़ी वाले डिब्बे की बात न करें तो?...”  “मुझे विश्वास नहीं है कि खोपड़ी वाले डिब्बे की भी ज़रूरत है.”  “चलो, इस बारे में हम और बात करेंगे. बिल, प्लीज़,” उसने वेट्रेस को बुलाया.  “और, आपके यहाँ ये बॉम्ब का क्या किस्सा था?” कपितोनव  पूछता है. ”बॉम्ब तो नहीं था, मगर ग़ैरकानूनी तरीक़े से कॉन्फ्रेन्स में रुकावट डालने की कोशिश की गई थी. मगर हम इसे आसानी से नहीं जाने देंगे. वैसे, ऑपेरा के बाद डिनर है – ना जाने की अपेक्षा देर से जाना अच्छा है. तो, आप दूसरे अंक तक पहुँच जाएंगे. प्रोग्राम होटल में ही हो रहा है. शायद, गाना शुरू भी हो गया.”  “कुछ सुनाई तो नहीं दे रहा.”  “आपके कान बेहद संवेदनशील हैं...जाइए. वहाँ संगीत की आवाज़ में नींद आ जाएगी.”  “क्या आप जा रहे हैं?”  “नहीं, मैं थियेटर नहीं जाता. सर्कस भी नहीं जाता. 

 “ऑपेरा का नाम क्या है?”  “केग्लिओस्त्रो”.               “ ऐसे किसी ऑपेरा के बारे में नहीं जानता. क्या ये उसीके बारे में है?”  “ शायद. और, क्या आप दूसरे ऑपेराज़ को जानते हैं? सांस्कृतिक कार्यक्रम की ज़िम्मेदारी मेरी नहीं है. किसी विषय को ध्यान में रखकर बनाया गया है. फिर भी – हमारा आदमी है.” आती हुई वेट्रेस अभी फ़ोल्डर मेज़ पर रखने भी नहीं पाई थी – ‘तालाब’ पलक झपकते ही उसके हाथ से फ़ोल्डर छीन लेता है और, बिल बाहर निकाले बिना, हौले से जिल्द के नीचे कुछ घुसा देता है और फ़ौरन फ़ोल्डर लौटा देता है.  

ऐसी फ़ुर्ती से चौंक गई वेट्रेस कुछ पल उससे मुँह मोड़ने वाले ‘तालाब’ के सामने बुत बनकर खड़ी रहती है – फिर संभलकर मुड़ती है और काऊन्टर की ओर चली जाती है. 

 “सुनिए,” आईने में दूर जाती हुई वेट्रेस की ओर देखते हुए कपितोनव  कहता है, “ये यहाँ इतने सारे आईने क्यों हैं? मेरे कमरे में तो ज़रूरत से ज़्यादा हैं.”  “हॉटेल के पार्टनर्स में से एक – ‘नेव्स्की मिरर्स’ कम्पनी है.” 

 “आह, तो ये बात है...मगर, फिर भी, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मेरे एक वोट में क्या रखा है? या फिर आप सबको ऐसे ही....पटाते हैं?”

 “पटा रहा हूँ सिर्फ आपको, क्योंकि आप आख़िरी हैं. बाकियों को, जिनकी ज़रूरत है, सब पटाए जा चुके हैं.” वेट्रेस फिर से फ़ोल्डर लेकर आ गई, चेहरे पर परेशानी के लक्षण थे.  “माफ़ कीजिए,” वह ‘तालाब’ से मुख़ातिब होती है, जो उसकी तरफ़ देख ही नहीं रहा है, “मगर इसमें पैसे नहीं हैं...”  “तो फिर क्या है?” सिर घुमाए बिना ‘तालाब’ पूछता है.    “ कार्ड 9 (यहाँ नक्शे से तात्पर्य है – अनु.)  ...”  “अफ्रीका का?”  “ नहीं...”  “यूरोप का?” 

 “नहीं...खेलने वाला कार्ड...”

 “हुकुम का?... चिड़ी का?...ईंट का?...”

  “पान की छक्की...” वेट्रेस बुदबुदाती है और कपितोनव  को खुला हुआ फ़ोल्डर दिखाती है, क्योंकि ‘तालाब’ पहले ही की तरह दूसरी ओर देख रहा है. कपितोनव  वाक़ई में पान की छक्की देखता है.  “बन्द कीजिए,” अनिच्छा से ‘तालाब’ कहता है. “इधर दीजिए. ये क्या है?” फ़ोल्डर को हथेलियों पर संभालते हुए, वह बिना खोले ही, उसे मेज़ पर रख देता है. 

 “आप मेरी खिंचाई क्यों कर रही हैं,” ‘तालाब’ कहता है, “सब वैसा ही है जैसा होना चाहिए.” 

वेट्रेस फ़ोल्डर खोलती है और उसमें पान की छक्की के बदले हज़ार रूबल्स का नोट देखती है. कपितोनव भी, जिसे गवाह बनाया गया था, यही देखता है.  “नो चेंज,” ‘तालाब’ उठता है. “चलिए, साथी.”

 “ऐसा कैसे?” वेट्रेस उत्तेजना से पूछती है.


19.55


हॉल में आकर ‘तालाब’ कपितोनव से बिदा लेने की जल्दी नहीं दिखाता. वह उसे रिसेप्शन डेस्क पर ले जाता है. पता चलता है, कि ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट वापस नहीं आया है.

 “एक सेकण्ड,” ‘तालाब’ कहता है और टेलिफ़ोन उठाता है. “ओलेन्का, मैं यहाँ नीचे हूँ, येव्गेनी गिन्नादेविच कपितोनव  के साथ, उन्हें नींद की प्रॉब्लेम हो गई है, और उनकी दीवार के उस पार वाला पड़ोसी – तुम जानती हो, कि कौन है. दूसरी बात ये कि हमारे आर्किटेक्ट ने अब तक रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया है. क्या येव्गेनी गिन्नादेविच को आर्किटेक्ट के कमरे में, जो एक मंज़िल नीचे है, शिफ्ट किया जा सकता है?...ओह, क्यों...अगर आर्किटेक्ट आ जाता है, तो उससे किसी तरह सुलझ लेना...हाँ? क्या ये इतना मुश्किल है?...” वह अप्रसन्नता से कुछ आपत्तियों के बारे में सुनता है, फिर कहता है:  “मगर हम एव्गेनी गिन्नादेविच को इन सारी तकलीफ़ों के ऐवज में कम से कम ट्रेन से नहीं, बल्कि  हवाई जहाज़ से तो मॉस्को वापस भेज ही सकते हैं?...और रिज़र्व फ़ण्ड, ओल्या?... नहीं मेरा मतलब काले बॉक्स से है...तुम देखो तो सही...नहीं प्यारी, पहले तुम देखो, और फिर बोलो, कि ख़ाली है...हाँ, अभी, इसी पल.” उसने टेलिफ़ोन हटा दिया.  “अफ़सोस की बात है कि काल-भक्षक और ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट एक ही मंज़िल पर नहीं रह सकते, मगर उम्मीद करता हूँ कि आपको हवाई जहाज़ से डर नहीं लगता?” उन्होंने एक दूसरे से हाथ मिलाया. ‘तालाब’ बाहर निकल गया. 

20.01


‘तालाब’ को परेशान पड़ोसी के बारे में कैसे पता चला? कमरे में लौटकर दीवार के पीछे से आ रही उबकाईयों की आवाज़ कपितोनव  वाक़ई में सुनना नहीं चाहता. वैसे भी टाईम – बस, इंटरवल होने ही वाला है. और अगर इंटरवल हो गया हो तो?”

दूसरी मंज़िल पर जाते हुए उसे फ़ौरन यक़ीन हो गया कि वाक़ई में इंटरवल चल रहा है. हॉल के दरवाज़े खुले हैं, थोड़े से निठल्ले लोग एक्वेरियम की मछलियों और दीवार पर टंगी हुई तस्वीरों को देखते हुए हॉल में घूम रहे हैं.     ज़्यादा सोचे बिना कपितोनव  हॉल में घुस जाता है. कपितोनव अपेक्षा कर रहा था कि यह तथाकथित ‘बिग’ हॉल वाक़ई में बड़ा होगा – वह बड़ा इसलिए भी लग रहा था कि कॉन्फ्रेन्स के अधिकांश डेलिगेट्स इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में नहीं आए थे. कपितोनव अंतिम पंक्ति के किनारे पर बैठ जाता है, यहाँ से उसे सिर्फ इधर-उधर बैठे दर्शकों के सिर ही दिखाई दे रहे हैं. चेहरे तो वह सिर्फ उन्हींके देख सकता है जो कोने वाले दरवाज़े से भीतर आ रहे हैं, - फिर, उसने ब्रोश्यूर में दी गई तस्वीरों को इतने ध्यान से नहीं देखा था कि भीतर आते हुए लोगों में से किसी को तो पहचान सके. मगर, क्यों : ये रहा माइक्रोमैजिशियन अस्त्रोव, वही, फ़ोटो में जिसकी मुस्कान को उसी की धृष्ठ नज़र ने बर्बाद कर दिया था. अब अस्त्रोव के चेहरे पर शांति और निडरता थी. और आम तौर से, वे हॉल में निर्विकार चेहरों से ही प्रवेश करते हैं. या तो उच्च कोटि की कला से मुलाक़ात जारी रखने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे होते हैं, या फिर पहले अंक से भावविभोर हो चुके हैं.

सब बैठ गए, और लाईट बुझ जाती है. स्टेज पर हैं दो जवान व्यक्ति, जो निश्चित रूप से अठारहवीं सदी के कपड़ों में नहीं हैं. लड़का कुर्सी पर बैठकर हॉल की तरफ़ देख रहा है, और लड़की उसकी पीठ के पीछे खड़ी कैंची की आवाज़ करती है, यह दर्शाते हुए कि बाल काटे जा चुके हैं.

लड़की ने पहनी है सफ़ेद गोलों वाली नीली स्कर्ट, फ़ुटबॉल-जर्सी, और वह नंगे पैर है. लड़के ने क्या पहना है, इस पर कपितोनव  ध्यान नहीं देता – कोई भूरी स्पोर्ट्स-शर्ट थी. 

वह बोली:  “कोई बात नहीं. बेहद अच्छा है. घबराओ नहीं, मैंने थोड़ा-थोड़ा. अब तुम वैसे ही हो, जैसे महीना भर पहले थे...तो, तुम्हें याद है, जब...”

वह बोला:  “अगर पारिभाषिक शब्दावली से चिपके रहें, तो कह सकते हैं कि आज हमारा ‘मधु-मास’ पूरा हो गया.” वह बोली:  “बेवकूफ़ नाम है. और, कुछ भी पूरा नहीं होता...” गले पे लपेटे हुए तौलिए से उसे मुक्त करके वह कहती है:  “जाओ, आईने में देख लो.”

वह जवाब देता है:

 “ज़रूरत नहीं है. मुझे तुम पर यक़ीन है.”  “बाथरूम में जाओ,” वह कहती है, “आलस न करो, आईने में देख लो.”  “जाकर क्या टपकती हुई छत देखूँ? आज ये देखने का दिन नहीं है कि छत से कैसे पानी टपकता है...” फिर भी वह उठकर एक ओर को जाता है, ये दिखाते हुए कि ख़ुद को आईने में देखने के लिए बाथरूम में गया है. इस बीच लड़की पुराने टेलिफ़ोन पर नंबर घुमाती है और प्लम्बर को बुलाती है. कोई भी गाता नहीं है. ये तो ऑपेरा जैसा नहीं है.  “प्ल-अ--म्ब-अ-र” वह जैसे बाथरूम से आवाज़ देता है. – “ये शब्द हमें कितना बोरिंग लगता है, मगर तुम सुनो, वह महान लगता है, एकदम शानदार. प्ल-अ--म्ब-अ-र!” लड़की उससे कहती है:  “कभी कभी मुझे ऐसा महसूस होता है...कि हम पूरी तरह से किसी न किसी पर निर्भर हैं... मानो हम किसी अजीब ही दुनिया के हैं, जिसे किसी ने सोचा था...” कपितोनव  फ़ैसला करता है, कि ये आधुनिक ऑपेरा है. ड्रामा के तत्वों सहित. अब वे गाना शुरू करेंगे.

 “मैं नहीं जानता कि ये आत्मनिर्भरता वाली बात क्या है,” ख़यालों में डूबकर नायक कहता है, “मगर हम वाक़ई में सही अनुपात में सोचे गए हैं. तुम मुझे सोचती हो, मैं – तुम्हें, हम दोनों को – मान लो, ग्रीशा, जिसे सोचा था आस्या ने. हम सब एक दूसरे को सोचते हैं, एक दूसरे की कल्पना करते हैं. ये नैसर्गिक है. हम, ज़ाहिर है, हैं, मगर महत्वपूर्ण बात ये नहीं है, कि हम कैसे हैं, बल्कि ये है, कि हम एक दूसरे को कैसे देखते हैं, एक दूसरे की कैसी कल्पना करते हैं...”  “और, नतीजा ये निकलता है कि तुम किसी प्लम्बर की कल्पना का फल हो.” आस पास के लोगों की प्रतिक्रिया देखने के लिए कपितोनव  इधर उधर नज़र घुमाता है, ये भूलकर कि वह अंतिम पंक्ति में है.

इस बीच कलाकार स्टेज पर प्यार के बारे में बातें करते हैं. लड़की पूछती है:  “ऐसा क्यों है, कि जब प्यार करते हो, तो ‘एडवेन्चरस’ महसूस करते हो?”

वह समझाता है कि वह कारनामा, जो उसने किया था, (ज़ाहिर है, पहले अंक में), बिल्कुल एडवेन्चर नहीं था. इस पर वह कहती है:  “कभी कभी मैं कल्पना करती हूँ कि बैंक-रॉबर बन गई हूँ. सान्ताक्लाज़ का मास्क पहन कर घुस जाती हूँ: सब खड़े हो जाओ! ...ये डाका पड़ रहा है!...जिससे कहा है, वो लेटा रहे!... कोई अपनी जगह से न हिले!” तब लड़का भी चिल्लाता है, जैसे वह भी खेल में शामिल हो गया हो: “हाथ सिर के पीछे!...कोई हिले नहीं!... बटन से हाथ हटा, तेरी माँ..., क्या पागल है!...”  स्टेज पर कोई बटन-वटन नहीं है. हालाँक़ि कपितोनव  दर्शकों के चेहरे नहीं देख सकता, मगर वह समझ रहा है कि वे बेचैन नहीं हो रहे हैं. उन्होंने पहला अंक देखा था, मगर कपितोनव  को इसका ओर-छोर तक पता नहीं है. संभव है कि वे अभी गाने भी गायेंगे और शायद केग्लिओस्त्रो भी प्रकट हो जाए.

अब स्टेज पर एक तीसरा, बड़ी उम्र का, व्यक्ति प्रकट होता है – स्पष्ट है कि वह केग्लिओस्त्रो नहीं है. उसके हाथों में चेस-बोर्ड है, वह प्रकट में सोचता है:  “स्ट्राँग मूव. इसका जवाब सोचना पड़ेगा...” लड़की:  “संगीतकार, महाशय!” वह उसे सुधारता है:  “संगीत-निर्देशक.”  “संगीत-निर्देशक महाशय, क्या मैं आपके बाल काट दूँ?”

आगे हो रही बातचीत से कपितोनव  समझ जाता है कि संगीत-निर्देशक इन नौजवान लोगों के घर में रहता है, क्योंकि उसकी चाभी खो गई है. और अब वह, न जाने क्यों गार्डन की ओर चला जाता है.  कपितोनव  अपनी ही पंक्ति में दो सीटें खिसक गया और उसने सामने की ओर झुककर सबसे पास वाले दर्शक से पूछा:

 “ये ऑपेरा तो नहीं है?” उसने जवाब दिया:  “और बैले भी नहीं है.”  कपितोनव  कुर्सी की पीठ से टिक जाता है. अच्छा-अच्छा. 

 “मेरे दिल में उन सबके प्रति गहरे सम्मान की भावना होती है, जिनकी चाभियाँ खो जाती हैं,” – नायिका ने कहा. “मैं अपने पिता को भूलने लगी हूँ, मैं सात साल की थी, जब वह डूब गए थे. और, मम्मा के साथ मेरे...ऊं... पता नहीं, हमारे संबंधों को क्या नाम दूँ...आदर्श. बस, आदर्श तरह के संबंध हैं. कभी कभी तो मुझे डर भी लगने लगता है कि मेरे और उसके बीच सब कुछ कितना अच्छा है...”  “ऐसा कम होता है...और चाभियों का क्या?” कपितोनव  आँख़ें बन्द कर लेता है, क्योंकि नायिका कोई किस्सा सुनाने जा रही थी, और उसकी आवाज़ सुखद, ढाढस बंधाती सी थी.

 “मुझे तो, असल में, इस दुनिया में होना ही नहीं था. मैं तो संयोगवश ही पैदा हो गई. अगर मेरे पापा सही समय पर भले लोगों के साथ वोद्का न पी रहे होते और अगर उनकी चाभियाँ न खो गई होतीं, च्-च्, तो अंजेलिनोच्का इस दुनिया में न होती...कुछ लोग नशे के कारण गर्भ में आते हैं, मगर मुझे नशे के कारण माँ के गर्भ में सुरक्षित रखा गया. अपने जन्म के लिए मैं पापा के नशे की आभारी हूँ. और चाभियों के खो जाने की.”  “क्या पहेलियों में बात कर रही हो...” उसका साथी कहता है, जैसे वह कपितोनव  के अनचाहे विचार को दुहरा रहा हो.

आगे की बात कपितोनव  ने आँखें बन्द करके सुनता है:  “वे मुझे नहीं चाहते थे, यही सारी पहेली है. व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं, बल्कि बच्चे ही नहीं...मेरे साथ सब कुछ नॉर्मल ही था...जब मैं पैदा हुई थी. मगर तब, मम्मा क्लिनिक में पड़ी थी, मुझसे छुटकारा पाने के लिए. और, पापा के पास घर पे दोस्त आ गए और वोद्का पीना शुरू कर दिया. फिर किसीने पूछा: तेरी अल्योना कहाँ है, क्या काम पे गई है? पापा ने बता दिया कि कौनसे काम के लिए गई है. अस्पताल में है – एबॉर्शन करवा रही है. दोस्त बोले, तूने बेवकूफ़ी की जो उसे अस्पताल भेज दिया, बच्चा पैदा करने दे, बोले. तुझे क्यों चाहिए एबॉर्शन?...क्या सठिया गया है? बच्चे – जीवन का प्रकाश होते हैं, बच्चे – बढ़िया बात है!... उसे फ़ौरन वापस ले आ, बेवकूफ़!...वो बोले, छोकरों, देर हो गई है, बोले, ट्रेन तो छूट गई. कोई देर-वेर नहीं हुई, पट्ठे. टैक्सी ले और चला जा!...नहीं, बोले, देर हो गई, पहले जाना चाहिए था. बेहतर है कि अल्योना की सेहत के लिए पिएँ, और आप सबके लिए, और धरती के सभी प्राणियों के सुख के लिए, और उनके लिए, जो समन्दर पे हैं...और जो समन्दर पे नहीं हैं...मतलब, उन्होंने जितनी भी वोद्का थी, पी ली, दोस्त घर जाने लगे, वह दरवाज़े पर उनसे बिदा लेने लगा, साथ जाना चाहता था, मगर तभी पता चला कि उसके पास चाभियाँ ही नहीं हैं. खो दीं. बोला, अल्योना के पास उसकी चाभियों के लिए जाना पड़ेगा, वर्ना बिना चाभियों के कैसे...अंकल झोरा घर पे रुक गए, ड्यूटी पे. और अंकल पेत्या और मेरे पप्पा ने टैक्सी ली और चल पड़े क्लिनिक. क्लिनिक पहुँचे, मम्मा को नीचे बुलाया, वो सीधे क्लिनिक के गाऊन में ही नीचे आ गई. क्या हुआ, क्या बात है? वे नशे में थे, बहक रहे थे. कुछ भी नहीं हुआ, चाभियाँ खो गई हैं, तुम्हारी वाली दो. मगर फिर उन्होंने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को इशारा किया: ये होती है किस्मत. ठीक है, प्रोग्राम बदल गया, हम तुम्हें लेने आए हैं. ये तुम्हारा मामला है. वह जैसी थी, वैसे ही उठाकर उसे टैक्सी में डाल दिया. अगर, ज़रा भी रुकते, तो देर हो जाती. बस, यही क़िस्सा है. उसे घर लाए. और दूसरे दिन मेरे पप्पा क्लिनिक गए उसका सामान लेने, पूरे होश में. और हाँ, चाभियाँ दूसरे कोट में मिल गईं”.

 “मम्मा ने बताया?” नायिका का साथी मानो कपितोनव  के दिल की बात पूछ लेता है.   “मुझे – मम्मा ने, और उसे – अंकल झोरा और अंकल पेत्या ने, और मेरे पप्पा ने भी...झूठ नहीं बोलने दिया. जब मैं सत्रह साल की हुई तो उसने मेरे जन्म का रहस्य बता दिया. भावविह्वल होकर. वह मुझसे बहुत प्यार करती है. तेरे बिना ज़िन्दगी की कल्पना भी नहीं कर सकती, बच्ची. असल में मुझे जन्म दिन नहीं मनाना चाहिए, बल्कि एबॉर्शन से बचने का दिन मनाना चाहिए. जान बचने का दिन. ये कब हुआ था: अप्रैल के अंत में, बसंत में. ये, बस, चमत्कार ही है, कि मैं हूँ”.

 “ग्रेट.”  “मैं भी सोचती हूँ, ग्रेट.”  ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, बुरी कहानी नहीं है’, कपितोनव  सोचता है, उसने महसूस किया कि वह अभी तक सोया नहीं, और मुश्किल से ही सो पाएगा, मगर, ख़ैर, वह आँखें बन्द किए ही सुनता रहता है.  “सुनो...चमत्कार के बारे में,” नायक ने कहता है और अचानक बढ़ते हुए जोश से सुनाने लगता है. “ मैं कभी कभी अपने जन्म के बारे में सोचता हूँ – बदन पे जैसे चीटियाँ चलने लगती हैं!... बाप को जवानी में चाकू घोंप दिया था. दादा लड़ाई पे थे, सिर ज़ख़्मी हो गया था...और, हर पुरखे के साथ, शायद, ऐसा ही कुछ-कुछ हुआ था...मगर मैं दूसरे ही बारे में, ऐसे हालात के बारे में, जो जीवनी से संबंधित नहीं थे....बस! और वे सौ करोड़ हैं. सब किसी न किसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं. मगर लक्ष्य प्राप्त करता है सिर्फ एक. इकलौता एक!...”

 “तुम किसके बारे में कह रहे हो?”  “स्पर्म्स के बारे में.” 

कपितोनव  ने आँखें खोल दीं. कोई नई बात नहीं है. स्टेज पर दो व्यक्ति हैं. वे बातें कर रहे हैं. वह अपनी बात जारी रखता है:  “और सिर्फ इसी निश्चित स्पर्म की बदौलत उत्पन्न होता हूँ, ख़ास मैं. कोई और नहीं, बल्कि सिर्फ मैं! अगर कोई आगे निकल जाता, सौ करोड़ में से कोई भी, तब मेरा ‘डबल’ होता, मतलब, मेरा भाई, उसी वंश परम्परा के साथ...जैसे जुड़वाँ – वैसा ही, जैसा मैं हूँ, मगर मैं नहीं!...”  “अगर कोई और तुमसे आगे निकल जाता और तुम तुम न होते? क्या तुम्हें यक़ीन है, कि तुम नहीं?”

 “दूसरा, एंजेलिना, दूसरा! मेरी बात सुनो. एक विशिष्ठ इन्सान अपने स्वरूप के लिए किसी विशिष्ठ स्पर्म की सफ़लता का आभारी होता है. मान लो, गर्भधारणा तो किसी भी हालत में हो ही जाती है, मगर इस बात की कितनी संभावना है कि वह गर्भ मेरा ही है – वैसा नहीं, जैसा मैं हूँ, बल्कि सिर्फ मैं?... अत्यंत ही अल्प संभावना होती है!...अण्डाणु के बारे में चुप ही रहूँगा...इस उद्देश्य से कि मेरा निर्माण हो, सिर्फ मेरा, जो इस समय तुम्हारे सामने खड़ा होकर हाथ नचा रहा है, दो विशिष्ठ सेल्स को, सूक्ष्म...अति सूक्ष्म...अत्यंत सूक्ष्म सेल्स को मिलना पड़ता है...सिर्फ उन्हीं दो को, किन्हीं और को नहीं – उनके जैसे अनगिनत सेल्स में से!...और यदि उस बात पर ग़ौर किया जाए, जो तुमने कही थी...ये सारे जीवन संबंधित केसेज़...तो क्या परिणाम निकलता है?... कोई एकदम बेमतलब की बात!...ये सारे युद्ध, महामारियाँ, एबॉर्शन्स, दुर्घटनाएँ...असफ़ल माता-पिता की असमय हुई मौतें – ये सब हमारे विरुद्ध है, सब हमारे ख़िलाफ़ है, व्यक्तियों के ख़िलाफ़ – वास्तव में अवतरित हुए लोगों के ख़िलाफ़!...हम ख़ुद कोई अवतार धारण करने में असमर्थ हैं!...समझ रही हो, एन्जेलीनूश्का? तुम असमर्थ हो. और मैं भी असमर्थ हूँ.”  “मगर हमने तो जन्म लिया है. और, सभी जन्म लेते हैं.”

 “लोग जन्म लेते हैं, ये एक सामान्य बात है, इसमें कोई अजीब बात नहीं है. अजीब बात कुछ और है : वो ये कि इन जन्म लेने वालों में तुम हो, मैं हूँ, मिसाल के तौर पर, आस्या है, जो इस समय अपनी स्कीज़ पर पहाड़ से नीचे उतर रही है, ग्रीशा है, जिसकी कुर्सी की पीठ उसने तोड़ दी और जिसे संगीतकार बाग में घुमा रहा है...किसी फ्रिज के लिए खिड़की से बाहर छलांग लगाना आसान है, बनिस्बत मेरे और तुम्हारे धरती पर जन्म लेने के! हमारे जन्म लेने की संभावना – बिल्कुल शून्य है! ये आश्चर्य है, प्राकृतिक आश्चर्य!”

“और हमने एक दूसरे से मिलने की अक्लमन्दी भी दिखाई!” वह चहकी. कपितोव का फ़ोन साइलेन्ट मोड़ पर कसमसा रहा है. अब, स्टेज पर अचानक म्यूज़िक और कुछ चकाचौंध होने लगती है. बाहर जाने का दरवाज़ा बगल में ही है: कपितोनव  उछलता है – और बाहर लॉबी में निकल जाता है.

मरीना का फ़ोन है. 


20.42           



“झेनेच्का 10, नमस्ते, प्यारे, सिर्फ ये मत कहो कि तुम पीटर11 में नहीं हो.”

 “तुम्हें कैसे पता मरीना?”  “अरे, तुम्हारी कॉफ्रेन्स के बारे में दिन भर ‘समाचारों’ में दिखा रहे हैं. तुम्हारे उस बेवकूफ़ बॉम्ब के कारण... कहीं ये तुम्हारी हरकत तो नहीं है?”  “मेरी? मैं तो अभी शाम को आया हूँ, मुझे ख़ुद भी कुछ पता नहीं है. मगर, तुम्हें किसने बताया कि मैं डेलिगेट हूँ?”  “ख़ुद ही अंदाज़ लगाया.”  “नहीं, ये नहीं हो सकता.”  “ओह, तुम्हारा ज़िक्र किया गया था,...स्पेशलाइज़ेशन के साथ...बोले कि संख्या बूझने वाला भी है. मैं समझ गई कि ये तुम ही हो.”  “बूझने वाले मेरे अलावा और भी हैं. मुझे तो कल सुबह तक पता नहीं था कि कॉन्फ्रेन्स में जाऊँगा.”  “मतलब, तुम्हारे बारे में मैं तुमसे ज़्यादा जानती हूँ.”  “चमत्कार की बात है. वैसे, यहाँ अभी-अभी चमत्कार ही की बात हो रही थी...सुनो, ज़िन्दगी कैसी कट रही है?”  “आ जाओ, ख़ुद ही देख लेना. पति से भी मिला दूंगी. अभी तुम कहाँ हो?”  “कौन बेवकूफ़ जानता है, कि कहाँ हूँ. ऑपेरा देख रहा हूँ.”  “मारीन्स्की में?”

 “ओह, नहीं, यहीं हॉटेल में...कोई गेस्ट-रूम जैसी, क्लब जैसी चीज़ है. बिल्कुल ऑपेरा जैसा नहीं है. वे गद्य में बात कर रहे हैं और स्पर्म्स के बारे में...”  “हो सकता है, लेक्चर हो?”  “नहीं, मरीना, ‘शो’ है.”  “वैसे तुम हो कहाँ? हॉटेल का नाम क्या है?” उसने नाम बताया. स्ट्रीट का नाम भी बताया.  “ओह, तब तो तुम्हें आने में कोई कठिनाई नहीं होगी.”

वह समझाती है कि कहाँ और कैसे आना है.

 “तुम तो शायद फोन भी नहीं करते. मुझे याद भी नहीं करते.”  “मरीना, मैं कह तो रहा हूँ कि अभी-अभी पहुँचा हूँ...”  “ठीक है. बस, सिर्फ कुछ ख़रीदना मत. घर में सब कुछ है.” कपितोनव  ने फ़ोन रख दिया. 

ओल्या-दूसरी (वो ही वाली) सीढ़ियाँ उतर रही है.  “येव्गेनी गिन्नादेविच, कितना अच्छा हुआ कि आप यहाँ मिल गए. आप हवाई जहाज़ से मॉस्को जाएँगे. टिकट 14.51 का है, सोमवार को. ठीक है? या रुकना चाहेंगे?”  “नहीं, थैंक्यू, मंगलवार को मुझे काम पर जाना है. ओल्या! क्या आपको मालूम है कि वहाँ क्या दिखा रहे हैं? ये तो ऑपेरा “केग्लिओस्त्रो” नहीं है?”

 “बदल दिया है. ये नाटक है, “चमत्कार है, कि मैं हूँ.” ये भी जादू और चमत्कारों के बारे में है...क्या आपको पसन्द नहीं आया?”  “थोड़ा ही देखा, मुझे जाना है.” 

21.20 


बाहर जाने वाला दरवाज़ा बन्द है, क्योंकि छत से जमी हुई बर्फ गिरा रहे हैं. आँगन में निकलकर कपितोनव  बॉइलर-रूम के पास से जाता है. बर्फ के फ़ाहे स्ट्रीट-लैम्प के नीचे पतंगों जैसे घूम रहे हैं. भूरी बिल्ली उसका रास्ता काटती है.  ये जगह ख़ासकर बिल्लियों वाली है, यहाँ उन्हें, कम्पाऊण्ड की बिल्लियों को, खिलाते हैं. भुने हुए सॉसेज की, और न जाने क्यों गोभी की ख़ुशबू आ रही है.            


21.32


ये है कपितोनव , और वह रूट-टैक्सी (यहाँ रूट-बस से तात्पर्य है – अनु.) में जा रहा है. आजकल इस शहर में परिवहन के इस साधन को, जैसे कि कपितोनव  को पता चला, कहते हैं “टेश्की” – अक्षर Т के सम्मान में, जिसके पीछे रूट नं. लिखा होता है. ये बात गले से नीचे नहीं उतर रही है. पहले ऐसा नहीं कहते थे, मगर ये तब की बात है, जब कपितोव ख़ुद ही पीटरबुर्गवासी था. खिड़कियाँ जम गई थीं. खिड़कियों से ये पता लगाना मुश्किल है कि ये पीटरबुर्ग है, मगर सिर्फ उसीके लिए, जो ये नहीं जानता कि किस शहर में जा रहा है.  

क़रीब-क़रीब हर आदमी अपने इलेक्ट्रोनिक खिलौने में व्यस्त है. कुछ लोग इन खिलौनों के माध्यम से किसी से बात कर रहे हैं. स्टीयरिंग पर बैठा ड्राइवर भी (वो अपनी भाषा में), वे भी जो पैसेज में खड़े हैं, बोल रहे हैं  – लगभग आधी बस बोल रही है, और काफ़ी ज़ोर से बोल रही है. मॉस्को में भी ऐसी ही तस्वीर है.

कपितोनव  मोबाइल निकालता है, ये देखने के लिए कि कहीं कोई ‘मिस्ड-कॉल’ तो नहीं है? चार ‘स्पैम’ हैं. फ़र्नीचर की पेशकश है, फ्लैट्स बेचे जा रहे हैं, एंटेलिया जाने का इनाम है, कुछ और भी है. न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि आन्का का कोई मैसेज ज़रूर होगा. बेटी ख़ामोश है. ठीक है, हम भी ख़ामोश रहेंगे.             

उसकी बगल में, ज़िन्दा पड़ोसी की ओर ध्यान न देते हुए, ज़ोर ज़ोर से लगातार बकवास किए जा रही है, ज़रा सोचिए, एक स्टूडेण्ट. वह किसी को यक़ीन दिला रही है कि उन दोनों की परिचित महिला पर भरोसा न करे. तुम चाहो या न चाहो, सुनना ही पड़ेगा :  “क्या तुम पागल हो गई हो! उस पर भरोसा करने की बात सोचना भी नहीं, वह सबको धोखा देती है! उसकी किसी भी बात का यक़ीन मत करो. तुम्हें भी धोखा देगी! वो ऐसी ही है! तुम नहीं जानतीं, हम शिशिर के कैम्प में “सच” वाला खेल खेल रहे थे, संक्षेप में.... किसी ने उससे कोई संख्या बोलने के लिए कहा. संक्षेप में, ये कि कितने खिलाड़ी थे. मालूम है, उसने क्या कहा? तेरह! ये तो बड़ी ग़ज़ब की बात हुई. खुल्लम खुल्ला ऐसा झूठ क्यों बोलना? सब समझ गए कि वह काफ़ी कम बता रही है. नहीं, किसी किसी के लिए ये भयानक-भयानक है, मैं समझती हूँ, मगर हम, हम तो उसे जानते हैं, हम अच्छी तरह उसे पहचानते हैं. संक्षेप में, वह समझ गई कि किसी ने उसकी बात पर यक़ीन नहीं किया, उसे शर्म आई कि ऐसा झूठ क्यों बोला, कि उसका झूठ पकड़ लिया गया है.... तो, क्या सोचती हो, उसने क्या किया? क्या बेईमानी को स्वीकार कर लिया?...ये कैसे हो सकता था!...अगर वह स्वीकार कर लेती, तो हम, शायद, उसके झूठ को माफ़ कर देते, मगर वो तो अपनी बात सही साबित करने लगी...मानो वह काफ़ी समय से चर्च जाती रही हो...मतलब, शर्मनाक, बिल्कुल शर्मनाक...सोच सकती हो? उस पर भरोसा करना ही नहीं चाहिए. धोखा देगी.” कपितोनव उठ जाता है और तिरछे होकर पैसेज की ओर, और पैसेज से होते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ता है. 

22.09


 “येव्गेनी”, मरीना कपितोनव  का अपने पति से परिचय करवाती है, और कपितोनव  से अपने पति का: “तोडोर.” और झूठी शान के साथ आगे कहती है: “असली बेल्जियन.”

 “मगर पॉइरट नहीं,” तोडोर ऊँगली से अपनी नाक के नीचे गुदगुदाते हुए मूँछों की अनुपस्थिति दर्शाता है. कपितोनव  को उसकी बोली में किसी विशेष लहज़े का आभास नहीं होता. असली बेल्जियन – हट्टा कट्टा, साँवला.

स्वर्गीय मूखिन से एकदम विपरीत.    “मेरी माँ – बुल्गारियन थी और पापा ब्रूसेल्स के.” ’नाटो’ का हेडक्वार्टर. गोभी. लेसें, बीयर.

संदर्भ झट् से याद आ जाता है. क्या कपितोनव  को अपने माता-पिता के बारे में बताना चाहिए?  “संक्षेप में, रूसी,” मरीना बात पूरी करती है.  “संक्षिप्त रूसी,” तोडोर ने पुश्ती जोड़ता है.  “तुम क्यों संक्षिप्त होने लगे?”  “तो फिर कैसे? तुम्हारे लोगों में से किसीने कहा था: चौड़ा है रूसी इन्सान, छोटा करना होगा.”  “मेरा ख़याल है कि वहाँ था, “सिकोड़ना”.

 “ये महत्वपूर्ण नहीं है.” कमरे में बातचीत चलती रही.  “झेन्या भी ब्यूस्टे में काम कर चुका है,” मरीना ने पति को बताया.  “ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स में,” पति कहता है, कपितोनव पर ये ज़ाहिर करते हुए कि वह पत्नी की बात समझ रहा है. (ब्यूस्टे में, मूखिन के साथ – ये मतलब भी छुपा हुआ है.)

तोडोर ने बल्गारियन रेड-वाईन की बोतल खोलते हुए (मेहमान ने वोद्का से इनकार कर दिया था) बताना शुरू किया कि वह क्या काम करता है: वह काम करता है...मगर कपितोनव  समझ नहीं पाया कि ये कौनसा क्षेत्र है: फूड-इण्डस्ट्री, मेडिसिन, PR?  कहानी के बीच में एक सवाल पूछकर कपितोनव  समझ गया कि न पूछना ही बेहतर है: असली बेल्जियन काफ़ी पहुँची हुई चीज़ है. उसका काम दही के किसी पेय से संबंधित था, जिसका बल्गारिया के एक पहाड़ी प्रदेश में परंपरागत ढंग से उत्पादन किया जाता था. इस प्रदेश में पिछली से पिछली शताब्दी में भी लम्बी उम्र तक जीने वालों की काफ़ी बड़ी संख्या थी. अपने समय में मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रोफ़ेसर मेच्निकोव ने इसमें काफ़ी दिलचस्पी दिखाई थी – अपनी खोज के अधिकांश प्रयोग उन्होंने पैरिस के पाश्चर इन्स्टिट्यूट में किए, जहाँ उनका अस्थि कलश सुरक्षित है.


 “मुलाक़ात के लिए,” मरीना ने जाम उठाया. 

जब तोडोर वर्णन कर रहा है, तो वह एक किनारे देख रही है, मेज़ के उस हिस्से की ओर जहाँ स्टैण्ड में नैपकिन्स रखे हैं, और उसके चेहरे पर सिवाय तनावपूर्ण उत्सुकता के कोई और भाव नहीं है. 

तोडोर की रूसी इतनी स्पष्ट है, कि उसके ग़ैर रूसी होने का भेद खोल रही है. मगर, हो सकता है कि कपितोनव  ख़ुद ही अपने पैनेपन की चापलूसी कर रहा हो.

 “योघर्ट12 (दही – अनु.) (दूसरे स्वर पर स्वराघात सहित, जो रूसी भाषा के नए नियमानुसार है और ऐतिहासिक दृष्टि से सही है – जिसका सही उच्चारण तोडोर ने सीख लिया था), जिसका उत्पादन पश्चिम में होता है, बिल्कुल योघर्ट नहीं है. बिल्कुल उसी तरह जैसे रूस में पश्चिमी तकनीक से उसे बनाया जाता है. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि मेच्निकोव ने दूध के जीवाणुओं और उनके लाभ के बारे क्या लिखा है. मेच्निकोव की दिलचस्पी नैसर्गिक मृत्यु की समस्या में थी. ये तब होता है जब जीवन से सराबोर शरीर में मृत्यु का भय कुंद हो जाता है, और इसे संभव बनाता है सही आहार.” तोडोर ख़ुद ही कहता है:  “सेहत के लिए.” कपितोनव को अचरज हो रहा था कि वह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि तोडोर वाक़ई में संजीदा है, या वह इतनी बारीक़ी से व्यंग्य को छुपा रहा है.

असली बेल्जियन को ये जानने में दिलचस्पी है कि क्या कपितोनव को पीटरबुर्ग पसन्द है.  “मैं अभी हाल ही में तो यहाँ से गया हूँ.”  “हाँ. मुझे ये मालूम है. मगर मैं ये जानना चाहता था कि क्या आपको कोई परिवर्तन नज़र आए.”  “आइसिकल्स13.” कपितोनव  की ओर से मरीना जवाब देती है. 

 “क्या किया जाए, ऐसी सर्दी है!” तोडोर चहकता है. “आप ‘बोर’ तो नहीं हो रहे हैं? मॉस्को – सेंट पीटरबुर्ग नहीं है.”

 “टाइम नहीं है, वर्ना शहर में घूमता.”  “फ़िसलन, फ़िसलन! सब पैर तोड़ लेते हैं. अभी तात्याना इग्नात्येव्ना अपनी कूल्हे की हड्डी तोड़ बैठी!”

कपितोनव  नहीं पूछता कि ये तात्याना इग्नात्येव्ना कौन है. और मरीना भी नहीं बताती. मरीना उससे कॉन्फ्रेन्स के बारे में बताने के लिए कहती है. कपितोनव  संक्षेप में बताता है कि जिसमें उसे भाग लेना है उस कॉन्फ्रेन्स का उद्देश्य, उसकी नज़र में, क्या है, मगर वह कॉपरफ़ील्ड के बारे में पूछे गए तोडोर के सवाल का जवाब नहीं दे सका – उसे नहीं पता कि बहुत दिनों से कॉपरफ़ील्ड की कोई ख़बर क्यों नहीं है.  “तब मैं ख़ुद ही आपको बताऊँगा.”

वह बताता है.

अगर तोडोर की बात का यक़ीन किया जाए, तो संयुक्त राज्य में जादू के कारनामों का ‘पेटेंट’ किया जाता है, इस अनिवार्य शर्त के साथ कि सात साल बाद उसके रहस्य को प्रकाशित किया जाएगा.  हर्षोल्लास के दिन गुज़र गए, और अब ‘पेटेन्ट्स’ इंटरनेट पर लगा दिए गए हैं. तोडोर ने अंग्रेज़ी में उन्हें पढ़ा और उनका अध्ययन किया, वह अब सब कुछ जानता है.

 “मगर, वह उड़ कैसे सका?” मरीना पूछती है. “वह तो सचमुच में उड़ा था न?” तोडोर खूब मज़बूत पतले प्लास्टिक के तारों और ख़ास तरीक़े से घूमती हुई रिंग्स की सहायता से समझाता है. कपितोनव  को कॉपरफ़ील्ड के रहस्यों में कोई दिलचस्पी नहीं है.  “और आप, मतलब, दो अंकों वाली संख्याएँ बूझ सकते हैं? क्या मैं कोई संख्या सोच सकता हूँ?”   “प्लीज़,” कपितोनव  ने कहा.  “हाँ, सोच ली.”

 “मगर, सिर्फ दो अंकों वाली!” मरीना बीच में टपकती है.  “ज़ाइन्का, मैं समझता हूँ.”  “उसमें बारह जोड़िए,” कपितोनव  ने कहता है.  “हाँ.” तोडोर जवाब देता है.   “ग्यारह घटाइए.”

 “हाँ.” कपितोनव  सोच में पड़ गया.  “या तो मैं ग़लती कर रहा हूँ, या – दस.”  “हाँ.”  “दस?”  “हाँ. हाँ.”

 “मुझे याद नहीं है कि कभी किसी ने ‘दस’ संख्या सोची थी. दो अंकों वाली संख्याओं में सबसे छोटी.  “तोडोर ‘मिनिमलिस्ट’ (कम से कम स्वीकार करने वाला – अनु.) है,” मरीना ने कहा.  “नहीं, मैं ‘मिनिमलिस्ट’ नहीं हूँ. क्या और सोचूँ?”  “नहीं,” मरीना कहती है.  “क्यों नहीं? बिल्कुल सोच सकते हैं,” कपितोनव  इजाज़त देता है.   “नहीं. बस हो गया.”  “आख़िर क्यों?”  “हो सकता है, दूसरी बार न हो पाए..”

 “बकवास, बिल्कुल होगा. और, अगर न भी हो तो क्या होगा?”  “झेन्या,” मरीना ने जवाब देती है, “जानते हो, मुझे बचपन से ही जादूगर क्यों नहीं अच्छे लगते? वे कितनी चीज़ें उछालते हैं, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है. मगर मुझे इस बात का इंतज़ार करना बड़ा असहज लगता है कि कोई एक बार ही चूक जाए.” 

 “ठीक है,” तोडोर ने कहा, “आप जादूगर हैं और मैं डिबेटर. चलिए, बहस करते हैं कि अगर आप मुझे एक हज़ार रूबल्स देंगे, तो मैं आपको पाँच हज़ार रूबल्स दूँगा.”  “मैं आसानी से आप पर विश्वास करता हूँ. बहस किसलिए?”  “क्या आपको विश्वास है कि अगर आप मुझे एक देंगे, तो मैं आपको पाँच हज़ार दूँगा?”  “मगर आपने ख़ुद ही तो ऐसा कहा है?”  “और आपने मुझ पर विश्वास कर लिया?”  “मगर, मुझे विश्वास क्यों नहीं करना चाहिए?”

 “रुकिए. क्या आप ये कहना चाहते हैं कि मैं ईडियट हूँ?”  “मेरे सूरज, झेन्या ने ऐसा तो नहीं कहा.”  “कौन किससे बहस करना चाहता है?” कपितोनव  पूछता है. “आप मुझसे या मैं आपसे?”  “तो, हम बहस कर रहे हैं? मुझे एक दीजिए, और पाँच ले लीजिए.”

 “कितने पर बहस करेंगे?”  “जितने पे चाहें. एक रूबल पे.”

 “झेन्या और तोडोर, बन्द करो.”  “ये रहे आपके लिए एक हज़ार.”  “थैन्क्यू. मैं आपको पाँच हज़ार नहीं दे सकता. मतलब, अफ़सोस है, कि मैं हार गया. आपकी जीत का माल लीजिए.” वह रूबल वापस देता है.

 “ये बच्चों वाली बहस गार्डनेर की किताब “मैथेमैटिकल गेम्स” में लिखी है, मैंने सातवीं क्लास में पढ़ी थी.”  “मतलब, आप फिर भी कहना चाहते हैं कि मैं ईडियट हूँ.”  “मेरे सूरज, झेन्या ने ऐसा नहीं कहा. उसे पैसे वापस दे दो.” तोडोर हज़ार रूबल्स वापस करने की कोशिश करता है, मगर कपितोनव  वापस नहीं लेना चाहता.  “”कोई वापस-बापस नहीं. मैं जीत गया, और मैंने ईमानदारी से रूबल कमाया है.”  “बेवकूफ़ी मत दिखाओ. ये रहे आपके एक हज़ार. उठाइये. ये केवल मज़ाक था.”  “हर चीज़ ईमानदारी से,” कपितोनव  तन जाता है. “एक हज़ार अब आपके हुए, यहाँ मज़ाक कहाँ से आ गया?”  “ये बहस सिर्फ नमूने के लिए थी.”  “ऐसा तो हमने तय नहीं किया था.”  “जब आप जानते थे कि हारने वाले हैं, तो आपने बहस क्यों की?”

 “और मैं तो जीत गया!”  “झेन्या,” मरीना कठोरता से कहती है, “अगर तुम पैसे वापस नहीं लोगे तो मैं गुस्सा करूँगी.”

 “बहुत अच्छे,” एक हज़ार जेब में रखते हुए कपितोनव बुदबुदाता है. “मुझसे मेरी जीत छीनी जा रही है.” वह रूबल मेज़ पर रखता है.  “हाँ,” रूबल उठाते हुए तोडोर कहता है. एक ऐसा अंतराल छा गया जिसे असहज कहते हैं.

 “अगर ईमानदारी से कहूँ तो मैं ये ट्रिक भूल चुका हूँ,” कपितोनव  ने कहा. “इत्तेफ़ाकन याद आ गई.”

 “ठीक है,” तोडोर जवाब देता है. “क्या चुटकुला सुनना चाहेंगे?” सुनाने के बाद, बिना रुके बोला:  “अब मुझे माफ़ कीजिए. आपसे मिलकर ख़ुशी हुई. मुझे जल्दी उठना है. हमारे यहाँ रुक जाइए, होटल की क्या ज़रूरत है?” तोडोर कमरे से निकल जाता है, कपितोनव घड़ी पर नज़र डालता है.


22.55


“बैठो!” कुर्सी से उठने की उसकी कोशिश का विरोध करते हुए मरीना कहती है. “तुम्हें जल्दी नहीं है. रात में हमारे यहाँ रहना. हमारे यहाँ एक कमरा ख़ाली है.”  “क्या मैंने उसका अपमान किया?”  “नहीं. उसे वाक़ई में जल्दी उठना पड़ता है. वह लवा पक्षी है. ये तो हम हैं उल्लू.”

तोडोर के बगैर वातावरण ज़्यादा हल्का, शांत हो गया. कपितोनव रात को वहाँ रुकने से इनकार कर देता है.  “सारी रात फ्लैट में घूमता रहूंगा, भूत की तरह. किसलिए?”

मरीना पूछती है:  “तुम्हें वो पसन्द नहीं आया?”  “क्यों नहीं पसन्द आया? बिल्कुल पसन्द आया.”

 “मैं बिल्कुल अच्छी हूँ, तुम कुछ सोचना मत,” मरीना ने कहा.  “मैं देख रहा हूँ, सोच नहीं रहा.”  “नहीं, सच में, हमारे बीच सब कुछ सामान्य है,” और आगे बोली, “मूखिन भी ‘बोरिंग’ था”. 

 “मरीन, मैंने पूछा नहीं...मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ कि मूख़िन के बारे में आख़िर क्या हुआ...जाँच और बाकी सब...”  “कुछ भी नहीं. मामला बन्द कर दिया. जवाबों के मुक़ाबले सवाल ही ज़्यादा थे. कुछ दिन पहले तक मैं किसी प्राइवेट डिटेक्टिव को रखना चाहती थी. अब ऐसा नहीं चाहती. मगर जिस बात में मेरा विश्वास नहीं है, वो ये है, कि वो ‘वही’ था.”  “तब, अंत्य संस्कार के समय मैं काफ़ी बकवास कर रहा था, तुम माफ़ करना.”  “किसे याद रहता है.”  “नीना को याद था.”  “नीनच्का...देख रहे हो, हमारे साथ कैसे सब कुछ एक जैसा होता है. मैं उस समय आ ही नहीं पाई, इस बात के लिए तुम मुझे माफ़ करना.” आन्का के बारे में पूछा.  “क्या तुम्हारे पास फोटो है?” उसके पास है – मोबाइल में. “ओय, सुन्दर! ओय, प्रिन्सेस! ...मुझे उसकी तब की याद है. हवा भरे हुए मगर के साथ. वह मुझे ‘मलीना आन्ती’ कहती थी.”  “वो मगर तुम्हीं ने तो उसे गिफ़्ट किया था...”  “ओह, हाँ.”

 “वो ‘साऊथ’ में उसे छोड़ती नहीं थी”.

 “बच्चों के लिए!” मरीना जाम उठाती है. 

जाम टकराए. पीने के बाद कपितोनव  कहता है:  “हमारे साथ कहीं कुछ अच्छा नहीं हो रहा है.”  “हमारे यहाँ...क्या बिल्कुल अच्छा नहीं है?”  “ओह, नहीं, मेरे और उसके बीच– उसके और मेरे बीच , उसके साथ मेरे...” ”प्रॉब्लेम्स?”  “हमेशा लड़ते रहते हैं. वह मुझे, शायद, तानाशाह समझती है. मैं चाहे कुछ भी पूछूँ, ये जैसे उसकी आज़ादी का, स्वाधीनता का, प्रभुसत्ता का हनन होता है. मैंने तो किसी भी चीज़ के बारे में पूछना ही छोड़ दिया है. दूसरी तरफ़ से, मैं क्यों नहीं पूछ सकता? मैं, क्या – बाहरी आदमी हूँ? वह ख़ुद ही तानाशाह है!...उसे मेरी हर बात से चिढ़ होती है, बिल्कुल हर बात से. नहीं: गुस्से से पागल हो जाती है. ‘मुझे ये बात गुस्सा दिलाती है!’ – ऐसा कहती है.”  “सुनो, तुम्हारी कौन सी बात उसे गुस्सा दिला सकती है?”

 “अरे, हर बात! मैं जूते चढ़ाने का चप्पा हुक पे क्यों नहीं लटकाता. मैं जल्दी-जल्दी क्यों खाता हूँ. उपस्थितों के बारे में मैं ‘वो लड़का” या “वो लड़की” क्यों कहता हूँ. चाय पैकेट्स में क्यों ख़रीदता हूँ. मैं इतना उदासीन क्यों हूँ....हर इन्सान के प्रति, हर चीज़ के प्रति...उसे, मिसाल के तौर पर ये अच्छा नहीं लगता कि जिस औरत से मैंने उसकी पहचान करवाने का फ़ैसला किया, वह काला चष्मा क्यों नहीं उतारती. वह मुझसे ये नहीं कहती कि अच्छा नहीं लगता, मगर मैं तो महसूस करता हूँ, देखता हूँ... जैसे किसी इन्सान के पास काला चष्मा न उतारने का कोई कारण ही नहीं हो सकता. कारण तो हो सकते हैं. और, उसे इससे क्या करना है?”  “सही है, उसे इससे कुछ नहीं करना है. मगर, वजह क्या है?”  “अब तुम भी. क्योंकि उसकी दोनों आँखें अलग-अलग तरह की हैं, एक – गहरी भूरी, दूसरी – नीली.”  “क्या उसे ये मालूम है?”  “कैसे नहीं मालूम होगा, अगर ये उसकी आँखें हैं?”                         “नहीं, मैं बेटी के बारे में पूछ रही हूँ.”  “और क्या उसे मालूम होना ही चाहिए? क्या ऐसी चीज़ें मैं समझाऊँ? क्या तुम ये ‘सीरियसली’ कह रही हो, मरीना?”

”शायद, नहीं समझाना चाहिए...मगर तुम इस तरह बता रहे हो...”  “चाय पैकेट्स में ख़रीदता हूँ...बता चुका...जल्दी-जल्दी खाता हूँ...हाँ...मैं किसी और तरह का क्यों न हुआ, बल्कि ऐसा...अपनी ख़ामियों से क्यों नहीं लड़ता...” 

“सुनो, मुझे यक़ीन नहीं होता! क्या वह इतनी भेजा-खाऊ है?”  “भेजा-खाऊ तो मैं हूँ! परिभाषा के अनुसार! वो मुझको ही भेजा-खाऊ समझती है! मालूम है, उसे मुझ पर शरम आती है. वह सोचती है कि वह एक असफ़ल आदमी की बेटी है.”  “क्या उसने ऐसा कहा?”  “नहीं, मैं ख़ुद ही जानता हूँ. मैं जानता हूँ कि वह ऐसा सोचती है.”  “हो सकता तुम ख़ुद ही ऐसा सोचते हो – अपने बारे में?”  “मैं ऐसा क्यों सोचने लगा? मैं इस बारे में कभी सोचता ही नहीं हूँ. मैं सिर्फ यही चाहता हूँ, कि वह असफ़ल न बने. मगर हर चीज़ उसी तरफ़ जा रही है.”  “किस तरफ़ जा रही है? वह अठारह साल की है.”  “हफ़्ते भर बाद उन्नीस की हो जाएगी. नहीं मरीना, तुम उसे नहीं जानतीं, उसने स्वयँ को असफ़ल बनाने का प्रोग्राम सेट कर लिया है – जीवन में असफ़ल होने का. युनिवर्सिटी - वह उसमें प्रवेश पा नहीं सकी – छोड़ रही है, और यहाँ भी मैं बेबस हूँ. लगभग छोड़ ही दी.”  “ऐसा क्यों?”

 “मुझे सताने के लिए. वह हर काम मुझे सताने के लिए ही करती है.”  “मतलब, उसकी ज़िन्दगी में तुम्हारी महत्वपूर्ण जगह है.”  “हाँ – क्योंकि मैं उसको जीने में डिस्टर्ब करता हूँ.”  “तुम डिस्टर्ब मत करो!”  “मगर मैं कहाँ डिस्टर्ब करता हूँ? किस बात में?”  “मुझे कैसे मालूम कि किस बात में? हो सकता है कि तुमने उसे अपनी ‘बोरियत’ की गिरफ़्त में ले लिया हो? बेशक, ले ही लिया है!...तुम सब लोग ऐसे ही हो!...क्या उसका ‘कोई’ है?”  “अच्छा सवाल है. लगता है, कोई है. और, जहाँ तक मैं समझता हूँ, वह शादी-शुदा है.”  “ ‘लगता है’, ‘जहाँ तक मैं समझता हूँ’...”

 “आख़िर, वह मुझे कुछ भी तो नहीं बताती. बस, मुस्कुराती है. क्या मैं – ख़िलाफ़ हूँ? जीना तो उसे है. एक बात मैं स्वीकार नहीं कर सकता – अनिश्चितता. वह जानती है कि अनिश्चितता मुझसे बरदाश्त नहीं होती, कि अनिश्चितता मुझे पस्त कर देती है, मगर जानबूझकर... मुझे लगता है, कि जानबूझकर...” “मैं समझी नहीं, आप लोग एक साथ रहते हैं ना? या वह तुमसे अलग रहती है?”  “अलग रहने के मुक़ाबले, एक साथ ही ज़्यादा हैं.”

 “तो, अलग हो जाते, बंटवारा कर लेते. कोई मुश्किल है?”  “कोई मुश्किल नहीं है...बस, ये होगा कैसे? किसी को तो ये करना पड़ेगा...”  “स्वाभाविक है. और वह लड़का? वो क्या है?”  “वो क्या है? वो ठीक है. ज़्यादा बुरी बात – कुछ और ही है. जहाँ तक मैं समझता हूँ, वह, नरमी से कहूँ तो, नासमझ, ग़ैरज़िम्मेदार है. एक न एक दिन ऐसे निकम्मे को बीबी भगा ही देगी, और तब मेरी बेटी बिना किसी परेशानी के उसके साथ रह सकेगी...”  “हो सकता है, कि तुम ईर्ष्या करते हो?”

 “प्लीज़, माफ़ करो.”  “मतलब, पिता की तरह?”         

 “मरीना, तुम क्या कह रही हो? वह वयस्क इन्सान है. वह प्यार करती है. उसके पास अपना कमरा है. मैं बर्दाश्त करने वाला हूँ. मैं तानाशाह नहीं हूँ. मगर, हो सकता कि मेरी अपनी कोई राय हो. जो, ख़ैर, ज़ाहिर करने की जल्दी मैं नहीं करूँगा. उसे ख़ुद भी मालूम है कि मैं क्या सोचता हूँ. और फिर...मरीना, मुझे लगता है नीना की मौत के लिए वह मुझे दोषी मानती है.”  “मगर तुम्हारा तो कोई दोष नहीं है.”  

 “मगर मुझे लगता है कि वह मुझे अपनी माँ की, मेरी बीबी की, मृत्यु का दोषी मानती है...”  “तुम्हें तो बहुत कुछ लगता रहता है! वो क्या सोचती है, ये तुम कैसे जान सकते हो?! सुनो, तुम सिर्फ आत्मकेन्द्रित हो. तुम जवान बाप हो, और बूढ़े ठूँठ की तरह सोचते हो...”  “ ‘जवान बाप’,” कपितोनव हँसने लगता है.   “तो क्या, जवान नहीं हो?”  “हुँ, थैन्क्यू.”

 “कोई बात नहीं. एक बात मैं समझ नहीं पाती, तुम तो मनोवैज्ञानिक हो.”  “मैं, और मनोवैज्ञानिक?”  “संख्याएँ बूझते हो, और मनोवैज्ञानिक नहीं हो?”  “सिर्फ दो अंकों वाली.”  “और मनोवैज्ञानिक नहीं हो?”  “ये मनोविज्ञान नहीं है.”  “तो क्या है? अंकगणित?”  “कोई अंक-वंक गणित नहीं है.” 

 “फिर क्या है? टेलिपैथी?”  “मालूम नहीं क्या है. बस, मुझसे वो हो जाता है. मगर कैसे – पता नहीं.” मगर, तब तुम्हें जानना चाहिए कि दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं. और तुम कुछ भी नहीं जानते, तुम्हें सिर्फ ‘लगता है’. अजीब बात है. मुझे तो ऐसा लगता है कि, हर चीज़, जो तुम्हें ‘लगती है’, वो तुम्हारी ही कल्पना होती है.”  “मैं पीटर नहीं आना चाहता था, कॉन्फ्रेन्स का निमंत्रण था मेरे पास, मगर मैंने निश्चय कर लिया था कि नहीं जाऊँगा, मगर बाद में, लेव टॉल्स्टॉय की तरह – कल के हंगामे के बाद... निकल गया. दरवाज़ा धड़ाम् से बन्द कर दिया.”  “उसने दरवाज़ा धड़ाम् से बन्द नहीं किया था. कल हुआ क्या था?”  “कल हम लड़ पड़े, मैंने थूका और चल पडा. मतलब, हमने झगड़ा नहीं किया. उसने मुझे बस भेज दिया.”  “कॉन्फ्रेन्स में?”  “ऐसा ही कह सकते हैं.”  “मुबारक हो. मुझे डर है, कि आप दोनों एक दूसरे के लायक ही हैं.”

 “मैंने उससे कहा कि, नीना के जाने के बाद, वह उसकी नकल उतारने लगी है. और, ऐसा नहीं करना चाहिए – स्वर्गवासी माँ की नकल उतारना. मैंने ऐसा कहा, और उसने मुझे भेज दिया. मेरे ख़याल से, ये सही नहीं है.”

 “ऐसा नहीं कहना चाहिए था.”  “भेजना भी नहीं चाहिए था.” 

मरीना कंधे उचका देती है.  “मेरे वाले को मुहावरे फेंकना अच्छा लगता है. वह कहता: हर कॉटेज के अपने झुनझुने होते हैं.”

 “अच्छा, चलो, कॉटेज के नाम पे. तुम्हारी कितनी अच्छी है. और झुनझुनों के लिए नहीं पियेंगे.” 

जामों के टकराने से खनखनाहट की आवाज़ हुई.  “पता नहीं, ये सब तुम्हें क्यों बता रहा हूँ. अपने बारे में मैं किसी को नहीं बताता. मगर, नहीं, आज ट्रेन में पैसेन्जर पड़ोसन को बताया.”

 “कोई बात नहीं – किसी को नहीं बताते, सिर्फ पुरानी दोस्त और ट्रेन की पैसेन्जर को बताते हो.”  “उसका बेटा मन्दबुद्धि है. बड़ा ही है. साथ में जा रहे थे. वह उसे एडमिरैल्टी वाला छोटा जहाज़ दिखाना चाहती थी.”  “मतलब, उस लड़के को भी बताया.”  “वैसे, हाँ. मगर वह सुन नहीं रहा था.”  “और तुम्हारी बेटी तुम्हारी योग्यताओं के बारे में क्या सोचती है?”  “क्या तुम ये सोचती हो कि मैं सिर्फ अपनी योग्यताओं का प्रदर्शन करता रहता हूँ? उसे इससे कोई मतलब नहीं है. शांति से देखती है. मैं उनमें से नहीं हूँ, जो उसे आश्चर्यचकित कर सके. अगर मैं पानी पर भी चलने लगता, जैसे ज़मीन पर चलता हूँ, तो इसे भी वह शांति से लेती....”  “मगर, ख़ैर, पानी पर तो तुम चलोगे नहीं, तो, तुम्हारे पानी पर चलने को किस तरह से लेती – ये, फिर से, कल्पना की ही बात है, बस.”  “हाँ, अभी-अभी आश्चर्य के बारे में नाटक दिखा रहे थे.”  “तुमने कहा था, कि स्पर्म्स के बारे में.”  “मैं समझ नहीं पा रहा था, कि वह किस बारे में था. सुनो, मरीन, क्या तुम वाक़ई में टेलिपैथी में विश्वास करती हो?”  “टेलिपैथी में क्यों?”  “तुमने मुझसे टेलिपैथी के बारे में जो पूछा था.”  “जानते हो ना, मैं, वैसे, आसानी से यक़ीन कर लेती हूँ. मैं हर चीज़ पे यक़ीन कर सकती हूँ,” मरीना ने जवाब दिया और, चूँकि कपितोनव ख़ामोश रहता है, आगे कहती है – हौले से: “मैं कोष्ठकों में भी यक़ीन कर सकती हूँ, धनु-कोष्ठकों में.”  “किसमें यक़ीन करती हो?” ”हाँ, बस, अपने-अपने झुनझुने...” दोनों ख़ामोश हैं.  “तुमने कुछ कहा, मगर मैं समझ नहीं पाया.”  “ देखो, मैं न तो ट्रेन में पैसेंजर्स से मिली थी, न ही किसी मन्दबुद्धि से, जिन्हें अत्यंत व्यक्तिगत बात बताई जा सकती थी. मगर सिर्फ तुम्हें. किसी और को नहीं बता सकती. मैंने अब तक इस बारे में किसी से बात नहीं की. बिल्कुल किसी से भी नहीं.”  “किस बारे में?” वह जाम में बची हुई वाईन ख़त्म करती है, नमकदानी को मेज़ पर इधर-उधर सरकाती है और सीधे कपितोनव  की आँखों में देखती है.  “अगर मैं कुछ ग़लत बोलूँ तो ठीक करना,” मरीना कहती है. “मैथ्स में धनु-कोष्ठकों का उपयोग किया जाता है, हाँ? मतलब, ऐसे वाले,” – ऊँगलियों से हवा में बनाकर दिखाती है. “वर्ग कोष्ठक नहीं. उनका प्रयोग लैब्नित्ज़13 ने किया था. मैं सही कह रही हूँ?”  “लैब्नित्ज़ के बारे में ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं है. हो सकता है, उसने भी किया हो. क्यों नहीं.”  “उसीने, ठीक उसीने. मुझे दिलचस्पी थी. मुझे समझाओ, उनका क्या उपयोग है.”  “तुम ये तो जानती हो कि मैथ्स में धनु-कोष्ठकों का प्रयोग किसने किया था, और ये नहीं जानतीं कि किसलिए?”

 “मैं तो उनका प्रयोग नहीं करती हूँ. मुझसे बस इतना मत कहो, कि वे स्कूल के पाठ्यक्रम में हैं.”

 “मगर तुम्हें उनकी ज़रूरत क्यों पड़ गई?”  “बस, यूँ ही.”  “यूँ ही? अगर ऐसा है, तो मतलब... कोष्ठक, कहती हो...मैथ्स में कोष्ठकों के ज़रूरत क्यों पड़ती है? जिससे कि अपने भीतर कुछ रख सकें, बन्द कर सकें. पहले रखते हैं लघु कोष्ठक में, और, वो, जो लघु कोष्ठक में बन्द है, उसे वर्ग कोष्ठक में रखते हैं, और वह, जो वर्ग कोष्ठक में रखा है, उसे रखा जाता है धनु-कोष्ठक में. सही अर्थ में, कोष्ठक का प्रकार भीतर रखने की, सुरक्षितता की श्रेणी को दर्शाता है.”  “क्या ‘सुरक्षितता’ - ऐसा कोई शब्द है?”   

 “ ‘सुरक्षितता’,” कपितोनव  अपनी बात जारी रखता है. “धनु कोष्ठक तीसरी श्रेणी की सुरक्षितता को दर्शाते हैं.”  “और चौथी श्रेणी को कौन दर्शाता है? और पाँचवीं? और छठी?”

 “इसके आगे भी धनु-कोष्ठक बना सकते हैं, मगर अक्सर नौबत वहाँ तक नहीं पहुँचती है.”  “क्यों नहीं पहुँचती?”  “इसलिए नहीं पहुँचती. इसलिए कि हमें सुसंबद्धता पसन्द है. स्पष्ट संक्षिप्तता.”  “यक़ीन नहीं है,” मरीना ने कहा.

 “किसमें?” कपितोनव  समझ नहीं पाता.  “आम तौर से, वे सुरक्षा करते हैं. मैं भी ऐसा ही सोचती थी, जैसा तुमने कहा.”  “मैंने क्या कहा? किसकी सुरक्षा करते हैं?”

 “और फिर तुमने बड़ी अच्छी तरह से बताया : सुरक्षितता.”

 “मरीनोच्का, हम किस बारे में बात कर रहे हैं?”  “क्या दो मिनट इंतज़ार कर सकते हो? मैं अभी तुम्हारे लिए एक चीज़ लाती हूँ.” मरीना दरवाज़े के पीछे चली जाती है. कपितोनव  ने टुकड़ों से एक वर्ग बनाया. ऐसा लग रहा था, जैसे उसने सीढ़ी रखी और अटारी पर चढ़ गई. 

23.29


“ये कोस्त्या के नोट्स हैं, झेन्या. ये वो है, जो वह मृत्यु के कुछ दिन पहले से लिख रहा था. इन्हें किसी ने नहीं देखा है, सिवाय मेरे, किसी ने नहीं पढ़ा है. सिर्फ मैंने. इनके अस्तित्व के बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. मेरा पति भी. मालूम नहीं कि मुझे इन्हें खोजकर्ता को दिखाना चाहिए था या नहीं, शायद मैंने ठीक ही किया जो नहीं दिखाया, खोज में इनसे कोई सहायता नहीं मिलती, फिर सवाल ये भी है कि वे कहाँ से ढूँढ़ना शुरू करते.” हरी नोट-बुक, पारदर्शी प्लास्टिक के कवर में, अभी तक उसके हाथों में ही है.

 “इसको वह मुझसे छुपाता था,” मरीना कहती रही, “हालाँकि मैंने देखा था कि वह कुछ लिख रहा है, मगर मेरे दिमाग़ में भी नहीं आ सकता था कि वो क्या है. मैं सोचती थी कि ऑफ़िस के बारे में है. मैं सिर्फ ये नहीं समझ पाई कि वह हाथ से क्यों लिख रहा है, हम सब तो काफ़ी समय से हाथ से कुछ घसीटते नहीं हैं, तुम भी तो हाथ से नहीं लिखते? और वह अक्सर कम्प्यूटर पे बैठा रहता था. और अचानक हो गया – ऐसा.” मरीना इंतज़ार करती है, कि वह कुछ कहेगा, मगर चूँक़ि कपितोनव ख़ामोश रहता है, वह आगे कहती है:  “ये एकदम विशिष्ठ लेख है.”  “क्या मैथेमेटिक्स से संबंधित कोई चीज़?” कपितोनव  पूछता है.  “हाँ, इसमें है, आपके ब्यूस्टे के बारे में है, मगर इतना ज़्यादा नहीं, उस बारे में है, जो आप लोग वहाँ करते थे...खाने पीने की चीज़ों के बारे में, मिसाल के तौर पर, आपके इन...मीट के समोसों के बारे में...”  “कैसे समोसों के बारे में?”  “मछलियों वाले, तुम्हें अब याद भी नहीं है. आप लोग वहाँ कुछ करते थे, कुछ कैल्कुलेशन्स, डिस्ट्रिब्यूशन्स, तुम बेहतर जानते हो. मैं तो तुम्हारे इस मैथेमेटिकल स्टैटिस्टिक्स के बारे में कुछ नहीं जानती...वहाँ है इस ...फ़ैक्टोरियल कॉन्ट्रास्ट्स और ऐसी ही किसी चीज़ के बारे में...मालूम है, ये बहुत कठिन नोट्स हैं, मगर मुझे मुँहज़बानी याद है.”  “मतलब, उसमें कैल्कुलेशन्स हैं?”  “तुमने क्या कहा?”  “क्या वहाँ फॉर्मूले हैं?”  “फॉर्मूले किसलिए? कोई फॉर्मूले-वॉर्मूले नहीं हैं. सिर्फ शब्द हैं. ज़िन्दगी के बारे में. मगर बिल्कुल, जैसे इन्सानी नहीं हैं. या, हो सकता है, इन्सानी हों, मगर मूखिन जैसे नहीं हैं. वो दूसरी तरह का था, एकदम दूसरी तरह का. प्यारा, गर्म जोश, बेहद ज़हीन. वह भौंडा नहीं था, है ना? मैं बाहरी रूप-रंग के बारे में नहीं कह रही हूँ.” 

कपितोनव  चुप रहना ही ठीक समझता है.  “वह तो किसी से ईर्ष्या नहीं करता था, तुमसे तो ईर्ष्या नहीं करता था?”  “मुझसे?”  “मैं इसीके बारे में कह रही हूँ. या फिर सबके दिमाग़ में ऐसा ही होता है? मैं पति के साथ रहती हूँ, वह अच्छा है, मगर, उसके दिमाग़ में, शैतान ही जाने, क्या चल रहा है? या, तुम्हारे, मुझे तो पता नहीं है, कि तुम्हारे दिमाग़ में क्या चल रहा है. जैसे, तुम्हें सब कुछ ‘लगता है’. हो सकता कि तुम ख़ामोश ‘सनकी’ हो, और मैं ये बात जानती ही नहीं हूँ. मैं सिर्फ अपने बारे में कोई ख़ास राय रख सकती हूँ. मेरे दिमाग़ में हर चीज़ पूरी तरह से व्यवस्थित है. बस, इसी बात का सबसे ज़्यादा डर लगता है. हो सकता है कि मैं नॉर्मल नहीं हूँ?”  “तुम बिल्कुल नॉर्मल हो. और तुम्हें शांत करने के लिए, मैं तुम्हारे सामने स्वीकार करता हूँ, कि मेरे दिमाग़ में भी हर चीज़ व्यवस्थित है. अगर मेरे दिमाग़ में कोई समस्या है, तो..सिर्फ ये, कि मैं सो नहीं सकता....”

 “मैं तुम्हें वोलोकोर्डिन दूँगी, एक छोटी सी शीशी, सिर्फ याद दिला देना.”

 “ठीक है, थैन्क्यू, याद दिला दूँगा. और, तुम्हारे यहाँ टैक्सी कैसे बुलाते हैं?”  “बहुत आसान है. थोड़ा रुको, मगर यदि ऐसा है, तो ये और भी बुरी बात है. अगर ऐसा है, अगर हम सब नॉर्मल हैं, तो फिर what the hell is this? ये उसके साथ क्यों हुआ? ये क्या है?”  “मरीनच्का, मैं समझ नहीं पा रहा, कि तुम किस बारे में कह रही हो.”

 “इससे पहले कि तुम इसे पढ़ना शुरू करो, मैं तुम्हें आगाह करना चाहती हूँ. इसमें काफ़ी कुछ अंतरंग बातें हैं. ख़ासकर मेरे बारे में, मगर, पन्ने तो नहीं फ़ाड़े जा सकते? मैं शर्मिन्दा हूँ. इसे पढ़ने वाले तुम पहले और आख़िरी होगे. मुझे छोड़कर.

 “मरीना, क्या तुम चाहती हो कि मैं इसे पढूँ?”

 “हाँ, बेशक, मैं सचमुच चाहती हूँ. अगर तुम्हें दिलचस्पी है तो, मैंने कभी भी प्रबल आवेग का नाटक नहीं किया, इस बारे में वह ग़लत था. तुम्हें इसलिए बता रही हूँ, कि तुम कुछ और न समझो. आवेग की स्थिति हमेशा हो, ऐसा नहीं था, ऐसा बिल्कुल नहीं था, मगर इसमें, शैतान ले जाए, नाटक किसलिए? और जब मैं हाथों में कीलें निकालने वाला हथौड़ा लिए खड़ी थी, उसने मुझे बुरी तरह डरा दिया, और उसके होंठ, सही में, बेहद ठण्डे थे.”

 “मतलब, ऐसा...मैं इसे नहीं पढूँगा.”  “तुम पढ़ोगे. होटल का पता क्या है?” वह टैक्सी बुलाती है – “सबसे सस्ती और तेज़”.

 “पढ़ोगे, पढ़ोगे...मैं अक्सर सोचती हूँ कि हमारे बीच बात कभी बिस्तर तक क्यों नहीं पहुँची. नहीं जानते?”

 “शायद इसलिए...इसलिए, शायद, कि हम दोस्त हैं.”  “पास! जवाब मंज़ूर है. तुम इसे अंत तक पढ़ोगे और, अगर चाहो, तो मुझसे कुछ कहोगे. मगर, सिर्फ, अगर चाहो तो. हो सकता है, मेरे दिमाग़ तक जो नहीं पहुँच पाया, उसे तुम समझ पाओगे. हो सकता है, तुम कोई ऐसी बात जानते हो, जो मैं नहीं जानती, आख़िर, तुम दोनों ने साथ में काम किया था, तुम्हारे कॉमन फ्रेण्ड्स हैं. जो...संक्षेप में, मैं तुमसे विनती करती हूँ कि इसे पढ़ो. आगाह करती हूँ, कि शुरू में बड़ी मुश्किल से पढ़ा जाएगा, मगर फिर...फिर आसान लगेगा. मैं ये जानबूझकर तुमसे कह रही हूँ, जिससे तुम डर न जाओ. वर्ना दो-चार पन्ने पढ़कर फेंक दोगे. और, इस बात से भी न घबराना कि हाथ से लिखा है...उसकी लिखाई बेहद अच्छी है. ये, देखो.” वह नोटबुक के बीच का कोई पन्ना खोलती है, और उसे हाथों से हटाए बिना, अपने भूतपूर्व पति के हाथ द्वारा लिखे गए दो पन्ने दिखाती है.                     “मैं किस बात का इंतज़ार कर रहा हूँ? मूख़िन की बीबी से – इस एक ख़याल से ही...” कपितोनव  दाएँ पन्ने की ऊपरी पंक्ति पढ़ लेता है. ये वो किसके बारे में लिख रहा है? अपने ख़ुद के? मगर अचरज किसी और ही बात का हो रहा है:  “मुझे नहीं मालूम था कि वह सुलेखक था.”

 “ज़्यादा बढ़ाचढ़ाकर भी नहीं कहना चाहिए.”  “मगर, हम सब तो ऐसे लिखते हैं, जैसे मुर्गी के पंजे के निशान हों.”

 “क्या तुम ये मान सकते हो कि ये लिखावट उसकी नहीं है?” मरीना ने संजीदगी से पूछा. 

कपितोनव समझ नहीं पाता कि क्या कहे.  “टैक्सी गेट पे है,” ऑपरेटर सूचित करता है.  “तो, ये बात है,” मरीना कहती है. “और, अब मुझसे वादा करो. पहली बात: तुम इसे पूरा पढ़ोगे. दूसरी बात: कल लौटा दोगे.”  “ज़ाहिर है, कल. परसों तो मैं जा रहा हूँ.” मरीना नोटबुक में अपना विज़िटिंग कार्ड रखती है. वे बिदा लेते हैं. उन्होंने दरवाज़े पे एक दूसरे का चुम्बन लिया.


सप्ताह का ये दिन था – शनिवार, जो इसी पल समाप्त हो रहा था: कपितोनव  बाहर निकलता है, उसके हाथ में मूख़िन की नोटबुक वाला पैकेट है, और इस तरह, आ पहुँचता है,  

रविवार. 

00.06 



यहाँ का पीटरबुर्ग बिल्कुल पीटरबुर्गी नहीं है, कोई एक टिपिकल सी चीज़ आँखों में चुभ रही है, - कपितोनव  को वह फ़िल्म पसन्द नहीं आ रही है, जिसे कार की खिड़कियों से दिखाया जा रहा है. 

टैक्सी ड्राइवर ने मौसम के बारे में फ़िज़ूल की बातचीत शुरू कर दी, इस बारे में कि सड़कों पर रीगेंट15 छिड़क देते हैं और लोगों की कोई इज़्ज़त ही नहीं है, और आम तौर से, या तो लोगों को ख़त्म कर मार देना चाहते हैं या फिर उन्हें महँगी दवाईयाँ ख़रीदने पर मजबूर करते हैं, - वह जल्दी ही पता कर लेता है कि पैसेंजर मॉस्को से है, और फ़ौरन सूचित करता है कि वह तो मॉस्को में किसी भी क़ीमत पर नहीं रहना चाहता, हालाँकि वहाँ, शायद, रास्तों से बर्फ ज़्यादा अच्छी तरह साफ़ करते हैं. 

आह, तो ये बात है : पैसेंजर – भूतपूर्व पीटरबुर्गवासी है.       


 “तो, फिर, ‘बोर’ तो नहीं हो जाते?” दो घण्टे पहले यही बात पूछ चुके हैं.

कपितोनव  ने कहा कि उसने बचपन से पीटर में ऐसी बर्फ नहीं देखी.  “पिछली सर्दियों में भी कम नहीं थी,” अपने शहर के प्रति गर्व की भावना से ड्राईवर जवाब देता है.

 “पिछली सर्दियों में मैं यहाँ नहीं आया था.”  “अरे, बेकार ही में. आ भी सकते थे. बढ़िया होता है मौसम. आना चाहिए था, न आना भी कोई बात है? आप आते रहिए.” अजीब बात है: कपितोनव  को ऐसा लगता है कि उसे विगत में बुलाया जा रहा है. मगर, क्यों नहीं? निमंत्रण तो हमेशा भविष्य के लिए होता है, ये सही है, मगर इन निमंत्रणों में से अनेकों सिर्फ अलंकारिक ही होते हैं, उतनी ही सफ़लता से विगत में क्यों न निमंत्रित किया जाए?

इस बीच ड्राईवर कपितोनव को शहर के टैक्सी-उद्योग की उपलब्धियों के बारे में बताता है. कुछ समय तक पीटरबुर्ग की सड़कों पर परिवहन के लिए साझा-टैक्सी ‘बोम्बिल’ का बोलबाला था (जिस पर ख़ुद-ब-ख़ुद बॉम्ब गिर गया), जो लोगों के समूहों द्वारा चलाई जाती थीं, और अब लोग, पहले की तरह, टेलिफ़ोन करके घर पे टैक्सी बुला लेते हैं. सस्ती, तेज़ और आरामदेह.”

 “वाह, फ़रवरी शुरू हो गई है, और आपके यहाँ अभी तक चौराहे पर क्रिसमस ट्री मौजूद है.”  “ये नये साल वाली नहीं है.”  “कैसे नहीं है नए साल वाली? पूरी मालाओं से लिपटी है!”

ड्राइवर नहीं जानता कि इसका क्या जवाब दे, इसलिए उसके दिमाग़ में जो पहली बात आती है, वही कह देता है:  “दिन में तो जाम लगा रहता है. सिर्फ रात को ही चला सकते हैं.” कपितोनव  को पार्क की हुई गाड़ियों के बदले बर्फ के बड़े-बड़े टीले देखने में मज़ा आ रहा है, मगर वह कुछ और भी देखना चाहता है. ड्राइवर सही है: कपितोनव  को पीटरबुर्ग की याद आती है. और, अगर कार को घण्टे- दो घण्टे के लिए – तीन घण्टे के लिए किराए पर ले लिया जाए, रात को, नेवा के किनारों पर, नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पे, पुराने कोलोम्ना पे...तो कितना ख़र्चा आएगा?...क़रीब दो हज़ार?

 “दो हज़ार में तो मैं एकदम अभ्भी तैयार हूँ,” ड्राइवर कहता है.  “मैं तैयार नहीं हूँ,” कपितोनव  कहता है.  “अच्छा, ऐसा करते हैं,” ड्राइवर कहता है. “मैं ऑपरेटर को फ़ोन कर दूँगा, कह दूँगा कि गाड़ी बिगड़ गई है, ये आसान है.”  “नहीं, थैन्क्स, काम है.”  “रात को – काम? काम तो मुझे है. आपको क्या काम है? बाद में हो नहीं पाएगा. आज मैं नेवा से होकर गुज़र रहा था, वहाँ बर्फ़ काटने की मशीन गुज़र रही थी, पानी के ऊपर भाप की दीवार बन गई थी...महलों से भी ऊँची! क़्या ख़ूबसूरती थी! और, वह एक जगह पर खड़ी नहीं रहती, बल्कि नेवा पर तैर रही है और गोल गोल घूम रही है, मगर बेहद तेज़ी से तैर रही है, थोड़ी सी टक्कर लगी कि पूरी की पूरी खाड़ी में!...तो? वर्ना ये क्या घूमना हुआ? तीन सौ रूबल्स...खिड़की से देखने लायक भी कुछ नहीं है...”  “फिर कभी,” कपितोनव  कहता है.  बहस करने लायक कुछ है ही नहीं – ये शहर का सबसे बेहतरीन भाग नहीं है.  “फिर कभी – तो आप मेरे बगैर जाएँगे.” 

0.33


तीसरी मंज़िल पर सभी सो नहीं रहे हैं, इस बारे में कपितोनव  को लिफ्ट से बाहर निकलते ही एहसास होता है. शोर का स्त्रोत कॉरीडोर के दूसरे दरवाज़े के पीछे है: सहयोगी पी रहे हैं. दाईं ओर लॉबी-कॉर्नर है – कपितोनव  निकल जाता, अगर आँख के किनारे से बन्द टी.वी. के सामने कुर्सी में धंसे एक आदमी को न देखता. क्या ये सो रहा है? या इससे भी बुरा कुछ है? बेहाल, चेहरे पर पीड़ा के लक्षण, बिना आँखें खोले, उसने कहा:

 “क्या आप सोच रहे हैं कि स्वादिष्ट है, पौष्टिक है?”  ‘मेरा पड़ोसी है’, कपितोनव अंदाज़ लगाता है.  “आप किस बारे में कह रहे हैं?”  “मैं काल के बारे में कह रहा हूँ. वर्तमान काल के बारे में. बकवास, बकवास, बकवास.” तो ये है कपितोनव  का पड़ोसी – काल-भक्षक, उसने अन्दाज़ लगाया.

 “शायद, आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?”  “और हो सकता है, कि आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?”  “ओह, माफ़ कीजिए.” कपितोनव कॉरीडोर से होते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ता है, मगर तभी दरवाज़ा खुलता है:  “मास्टर, ये आप हैं? आइये, रोशनी में आपका स्वागत है!” और कोई अज्ञात ख़तरनाक शक्ति कपितोनव  को उस ओर मोड़ देती है. मेज़, खाने-पीने की चीज़ें, ब्रेड, फ़र्श पर बिखरे ताश के पत्ते.  हाइपर-पत्तेबाज़ों का, हाइपर-जुआखोरों का क्लब है – सब समझ में आ गया, कि कहाँ फँस गया था.

पलंग पर पैर ऊपर करके एक बेहद ख़ुश लड़की बैठी है. कपितोनव  को बड़ा अचरज हुआ – ये वही लड़की है जिसे उसने शाम को स्टेज पर देखा था. 

नो, थैन्क्स, वह वोद्का नहीं पीता. नहीं, थैन्क्स, उसे अभी काम करना है. हाँ, ऐसा ही है, रात को काम करेगा. नहीं, अंकों पर नहीं, बल्कि किसी लेख पर. ठीक है, - अगर यहाँ सभी ऐसे प्रतीकवादी हैं, तो प्रतीकात्मक रूप से ‘हाँ’. प्रोटोकोल. आपकी सामूहिक सफ़लता और आपकी सेहत के लिए! वे मांग करते हैं कि अपना कमाल दिखाए.  “तान्का पर आज़माएँ.”  “तान्, उसके लिए कोई अंक सोचो, वह दिखाएगा.”  “सही में, हाँ? उसमें क्या है, मैं सोच सकती हूँ. और क्या, बूझेगा?” कपितोनव  जोड़ने-घटाने को कहता है. ये बहुत आसान है: उसका अंक है 23. तान्या चिल्लाती है, ‘ब्रेवो’, उस पर कोई यक़ीन नहीं करता, सब चिल्लाते हैं कि वह कपितोनव की ख़ातिर झूठ बोल रही है, उसने कोई दूसरी ही संख्या चुनी थी. कपितोनव वहाँ से जाना चाहता है, उसे छोड़ते नहीं हैं. पता चला कि अब तक सार्डीन16 का डिब्बा खुला ही नहीं है. तात्याना को ड्यूटी-ऑफ़िसर के पास कॅन-ओपनर लाने भेजते हैं. वह पलंग की साइड से कूदी और ख़ामोशी से चली जाती है.

कपितोनव जाना चाहता है, उसे दुबारा रोक लेते हैं. बोर्‍या सैप, हाइपर-चीट, ‘सेका’17 खेलने की पेशकश करता है. कपितोनव जाना चाहता है.  “वह हमें नीचा समझता है!”  “ठीक है, ‘फ़ूल”18  – वन-टू-वन” बोर्‍या सैप ताश की गड्डी फेंटता है, कपितोनव  को काटने के लिए देता है, बाँटता है. 

 “आप ट्रम्प क्या चुनेंगे?”  “डायमण्ड” कपितोनव  कहता है.  गड्डी के नीचे डायमण्ड की छक्की पड़ी थी.

कपितोनव के हाथों में सिर्फ ट्रम्प के ही पत्ते हैं – डायमण्ड के नहले से इक्के तक. 

हारना तो बिल्कुल नामुमकिन था, मगर वह जानता है कि हारेगा, वर्ना तो कोई मतलब ही नहीं है. और, अब कोई और चिल्लाता है: “बेईमान! बेईमान!” – और वह कपितोनव  की आस्तीन में से दूसरा इक्का निकालता है, ये भी डायमण्ड का इक्का था, मगर इस गड्डी से नहीं. “वाक़ई में बेईमान है!” – और कई सारे हाथ उसकी ओर बढ़ते हैं और कपितोनव  की आस्तीनों से, कॉलर के नीचे से, जेबों से डायमण्ड के इक्के ही इक्के निकालते हैं... वह विरोध करने की कोशिश करता है.

“शमादानों से मारना भी उसके लिए कम ही सज़ा है!”19 वह जाना चाहता है – जाने नहीं देते. खेल पूरा करे! कपितोनव ने पूरा खेल खेला. कपितोनव हार गया.

एक आवाज़ सुनता है: ”किसपे बाज़ी लगाई थी?”  और दूसरे ने फ़ब्ती कसी:  “मोबाइल फ़ोन पे!”

और तीसरा टपक पड़ा:  “अमर आत्मा पे!”

 “ठीक है,”कपितोनव  उठता है. – “मैं आपके हुनर की क़दर करता हूँ.”

मगर तभी एक ने कोई संख्या भी सोच ली – उसे बूझना होगा.  “दस जोड़िए,” भौंहे चढ़ाकर कपितोनव  कहता है. 

 “ख़ुद ही जोड़ लो,” सोचने वाला उससे कहता है.  “ठीक है, तब मेरे बिना खेलिए.”  “अरे, जोड़ दे ना! क्या तुझे क्या अफ़सोस हो रहा है?” चीट्स-उस्ताद सोचने वाले से चिल्लाकर कहते हैं. 

 “अच्छा, अच्छा, जोड़ दिए.”

 “सात निकाल दीजिए.”  “मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. निकाल दिए.”  “50.”  “60.”

 “ग़लत.”

 “ग़लत का क्या मतलब है? क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ?”

 “50,” कपितोनव  ने संजीदगी से दुहराता है.    “मैंने कहा 60! सिद्ध करो कि 50 है.”  “50, और धोखा देने की कोई ज़रूरत नहीं है.”

 कपितोनव जाना चाहता है, और वह कपितोनव का गिरेबान पकड़ना चाहता है. कपितोनव  उसके हाथों पर मारने लगता है. कपितोनव  तैश में आ गया. कन्स्ट्रक्शन-ब्रिगेड में उसका नाम था साइको-मैथेमैटिशियन.

वह मेज़ से दूर उछला, कुर्सी उठा ली, कुर्सी घुमाने लगा – अपने इरादे को गंभीरता से प्रदर्शित करने लगा.  “तो?” कोशिश तो करें! वह आक्रमण का जवाब देने को तैयार है. सिर्फ जब खून देखता है, तभी उससे बर्दाश्त नहीं होता – धुंध छा जाती है. इस बीच हाइपर-चीट्स “शांति! शांति!” चिल्लाते हैं, - उसे भी शांत करने की कोशिश करते हैं और कपितोनव  को भी.

 “सावधान, शीशा तोड़ दोगे!”  “यहाँ से चले जाओ, आप हमारी परंपरा के नहीं हो!” वह मूख़िन की नोट बुक वाला पैकेट उठाता है, जो ज़मीन पर गिर गया था, और बाहर निकल जाता है. उसके भीतर सब कुछ उबल रहा है, और हाथ जैसे कुर्सी की टांग को दबोच रहा है.

कॉरीडोर में तात्याना से टकराता है, जो कैन-ओपनर लेकर आ रही है.  “आप तो एक्ट्रेस हैं! आप चमत्कार के बारे में कह रही थीं! आप यहाँ कैसे? भागिये, भाग जाईये!...”

 “मैं? एक्ट्रेस? क्या, पापा जी, मस्ती में आ गए क्या? ढक्कन सरक गया?” वाक़ई में गलती हो गई थी. कोई और समझ बैठा था – शुरू में ही. स्टेज पर कोई और थी. मगर संख्या उसने बिल्कुल ठीक पहचानी थी. इसमें कोई सन्देह नहीं है. 


01.08 


शॉवर. टॉयलेट. नींद नहीं आएगी. वह पढ़ता रहेगा. 

01.20 


लेट गया.  नोटबुक खोली.

पहला पैरेग्राफ़.


01.21


और फिर से – शुरू से. क्योंकि समझना कठिन है.


01.22


और फिर से – क्योंकि वाक़ई में कठिन है:


{{{ ये तीसरा हफ़्ता है जबसे मैं - - : कन्स्तान्तीन अन्द्रेयेविच मूखिन हूँ, उम्र उनचालीस साल, किन्हीं चीज़ों का स्पेशलिस्ट, शादी-शुदा, मिलनसार, प्रिय खाद्य पदार्थ - - : फ़्राईड वेजिटेबल कबाब; एक्स्ट्रा वज़न 8 किलोग्राम. अपरिहार्य प्रश्न - - : तब मूख़िन का क्या? क्या उसे मालूम है कि मूखिन वह नहीं, बल्कि मैं हूँ? उत्तर नकारार्थी है - - : नहीं. मूख़िन नहीं जानता और जानने योग्य भी नहीं है, जैसे कि ये न जानने योग्य भी नहीं है, अपनी स्वयम् की अनुपस्थिति के कारण, मैं हो जाने के कारण. जब मूखिन के स्थान पर मैं हूँ, तब वह नहीं है. मूख़िन तब मूखिन बनेगा, जब मैं मूखिन होना बन्द कर दूँगा. उम्मीद करता हूँ कि कभी मूखिन होना समाप्त कर दूँग़ा, क्योंकि मूखिन होना क़िस्मत का खेल है. - - प्रश्न - - : मैं मूखिन होना कब बन्द करूँगा? - - : उत्तर - -  : उत्तर नहीं दूँगा; वह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित है. }}}         

कपितोनव  इलेक्ट्रिक केटल चालू करता है. बाथरूम जाकर एक बार फिर मुँह धोता है – पहले के शॉवर के अतिरिक्त.

कपितोनव  शांत है. वह स्वस्थ्य है और पूरे होश में है. वह ‘नोट्स’ को ग्रहण करने और उसकी मीमांसा करने के लिए तैयार है.


01.28


{{{ पहले वाला ‘नोट’ परीक्षण के तौर पर लिखा था. मैं धनु-कोष्ठकों की विश्वसनीयता परखना चाहता था. जाँच सफ़ल रही. कोई भी सन्देहास्पद चीज़ नहीं देखी गई. दो घंटों के ‘मैन्टेनेन्स-ब्रेक’ के बाद फिर से लिखना जारी करता हूँ. फ़िलहाल मुझे, मोटे तौर पर, जो हो चुका है, और जो हो रहा है उसका सार प्रस्तुत करना है. काम आसान नहीं है. मगर किसने कहा था, कि आसान होगा? कोशिश करूँगा. अगर सफ़ल हुआ, तो आगे बड़ा आसान होगा; मुझे इस पर यक़ीन है. 

तो बात ये है. 

बुधवार को मैं स्वयम् को मूख़िन महसूस कर रहा था, मगर गुरुवार को महसूस किया कि ये मेरा भ्रम था. ये प्रतिस्थापन तो काफ़ी पहले हो चुका था. मगर कब? जैसा कि आज, लक्षणों को याद करते हुए, मैं समझ गया कि प्रतिस्थापन पिछले से पिछले सप्ताह हुआ था, और अगर आज से उलटी गिनती करूँ तो - - : अठारह दिन पहले, उस दिन को गिनें तो. अजीब बात ये है कि इस गुरुवार तक मैं वाक़ई में स्वयम् को, मूखिन की तरह, असली मूखिन मान रहा था, जैसे कि प्रतिस्थापन हुआ ही न हो. ये बीच वाला समय ज़्यादा लम्बा खिंच गया, मगर अब सब गुज़र चुका है.


एक बार फिर से ‘पॉइन्टस’ के अनुसार.

1. ढ़ाई हफ़्ते पहले प्रतिस्थापन हुआ. बाह्य नियंत्रक शक्ति के माध्यम से ‘ऑब्जेक्ट’ मूखिन का मूखिन होना बन्द हो गया, और वह ‘सब्जेक्ट’ ‘मैं’ बन गया, जो तब तक नहीं समझ रहा था, कि मैं मूखिन नहीं हूँ, और उसी मूखिन द्वारा स्वयम् को प्रतिस्थापित कर चुका हूँ. रूपांतरण की प्रक्रिया पन्द्रह दिन चली, इस गुरुवार तक, और इन पन्द्रह दिनों में, सबसे महत्वपूर्ण रहकर,  हालाँकि अनेक स्तरों वाली स्कैनिंग सिस्टम का निष्क्रिय तत्व होते हुए, मैं अनजाने ही रिवर्स ट्रेंचिंग का उद्देश्य पूरा करता रहा.

2. गुरुवार को मुझे इस बात का अर्थ समझ में आया कि पिछले से पिछले हफ़्ते क्या हुआ था - - : मैं समझ गया कि वास्तविकता में मैं कौन हूँ. ज़्यादा सही होगा ये कहना, मैं इस बात को ज़्यादा अच्छी तरह समझ गया कि सबसे पहले मैं कौन नहीं हूँ - - : सैद्धांतिक रूप में मूखिन नहीं हूँ. जवाब देना मुश्किल लग रहा है, या तो वह सबकी भलाई के लिए हो या स्वयम् मेरे लिए हानिकारक हो, मैंने यही समझा है. मैं मानता हूँ कि प्रोजेक्ट के उद्देश्यों की दृष्टि से, जिन्हें मैं भी काफ़ी हद तक समझ नहीं पाया हूँ, मूखिन से भिन्न ‘सब्जेक्ट’ के तौर पर मेरे अपने बारे में अनुमान, न केवल किन्हीं संभावनाओं की खोज करेंगे, बल्कि वे किसी की समस्याओं से भी ग्रस्त हैं, और सच कहा जाए तो मेरी स्वयम् की समस्याओं से ग्रस्त हैं. चाहे जो भी हो, मुझे विश्वास है - - : मेरे द्वारा स्वयम् को मूखिन से भिन्न समझना, जिसने मूखिन को प्रतिस्थापित कर दिया है, प्राकृतिक विकास का कृत्य नहीं है, बल्कि ये नियंत्रक शक्ति द्वारा मुझे भेजा गया है. 

3. उसी पल मुझे सामान्य उद्देश्य की लगभग सभी सीमाओं का प्रतिनिधित्व दिया गया और सभी संभव क्षेत्रों के सहभागी की ज़िम्मेदारियों से अवगत कराया गया. बात हो रही है सीमाओं की, न कि ख़ुद उद्देश्य की, जिसका सार जानने की, ज़ाहिर है, मुझे इजाज़त नहीं है. साथ ही मुझे कुछ प्रमुख अवधारणाओं को समझने का काम दिया गया, जिनके बगैर मैं इस अर्थ को समझ ही नहीं पाता; ये अवधारणाएँ हैं - - : प्रोजेक्ट, नियंत्रक शक्ति, रिवर्स ट्रेन्चिंग, स्कैनिंग सिस्टम, संशोधक. साथ ही मुझे प्रतिबन्धों की, सीमाओं की, अनुमतियों की कल्पना दी गई. सबसे पहले मुझे मेरे द्वारा अवगत इस अर्थ को छुपाना होगा और किसी भी तरह से ये ज़ाहिर नहीं होने देना होगा, कि मैं मूखिन नहीं हूँ - - : न तो मौखिक रूप से, न ही लिखित में. मुझे ज्ञात है कि मैं इन प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा हूँ - - : अभी, स्वयम् को उस सार को प्रदर्शित करने की अनुमति देकर, जिसे मैं ख़ुद ही पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ.

4. इस समय, ऊपर निर्दिष्ट को समझने के तीसरे दिन, मैं, स्वयम् को उस सार को प्रकट करने की अनुमति देकर, जिसे मैं ख़ुद ही पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ, प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ. मैं प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ, ये अपना ही विनीत पाठक होने के कारण मुझे स्पष्ट रूप से विदित हो गया है. मगर मैं बिना डरे प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ, बिना किसी सम्मान के, बहादुरी से, क्योंकि मुझे उस क्षेत्र का पता चल गया है, जो नियंत्रक शक्ति के अधिकार में नहीं है और जो संशोधक की नज़र से भी आज़ाद है. ये है मेरा आविष्कार - - : तिहरे धनु-कोष्ठकों का ऑपरेटर - - : {{{- - - - - }}}. अविश्वसनीय लगता है, मगर ये ऐसा ही है - - : अगर इबारत को तिहरे धनु-कोष्ठकों के बीच रख दिया जाए, तो नियंत्रक शक्ति को पता भी नहीं चलेगा! सरल और बुद्धिमत्तापूर्ण! मैं क़रीब-क़रीब ख़ुशनसीब हूँ. ये नहीं समझाऊँगा कि मुझे नियन्त्रक शक्ति के इस अंधेरे कोने का पता कैसे चला; कई महान आविष्कारों के समान, मेरा आविष्कार भी संयोगवश ही (Incidental Case) प्रतीत हुआ. मैंने पुनरुक्ति का प्रयोग तो नहीं किया - - :  “Incidental Case”? वैसे, “केस” ही तो घटना (Incident) होती है ना? मगर मैं पुनरुक्ति से नहीं डरता. चाहे जो भी घटित हुआ हो, एक घटना ज़रूर उत्पन्न हो जाती है. घटना की नियती ही है घटित होना, इसीलिए वह घटना है! “केस” प्रतीत होती है - - : ‘केस’ प्रतीत होती है - - : विश्वसनीयता सहित, न कि आवश्यकता सहित. ‘केस’ और घटना के बीच अंतर ये है - - : घटना प्रतीत नहीं होती, मगर ‘केस’ घटित हो सकती है. ‘केस’ ज़्यादा गतिमान और लचीलापन लिए होती है. इसलिए मैं इस बात से सहमत हूँ, कि इसे ‘केस’ कहेंगे, बहस नहीं करूँगा, ऊपर से बहस भी अपने आप से. ‘केस’ घटित हुई. धनु-कोष्ठक - - : संयोगवश! - - : विस्मयकारक गुणों वाले. मैंने अदृश्य होने का तरीक़ा ढूँढ़ लिया - - : लिखाई में. क्या इस आविष्कार से मुझे कुछ प्राप्त होगा? हाँ, मगर थोड़ा सा. आज़ादी का स्तर; सबसे निचला स्तर, मगर फिर भी - - : मुझे!  किसी और को नहीं, बल्कि मुझे. मूखिन को नहीं - - : मुझे! मैं समझने की कोशिश कर सकता हूँ, कि मैं कौन हूँ, क्यों मैं मूखिन नहीं हूँ, और क्यों सिर्फ मूखिन को मैंने पिछले से पिछले हफ़्ते प्रतिस्थापित किया, और क्या प्रतिस्थापन के भविष्य के बारे में मेरे अनुमान विश्वसनीय हैं, जिनके बारे में अभी बताने की मेरी कोई इच्छा नहीं है - - : शब्दों से खेलने की मेरी उल्लासदायी एवम् लुभावनी योग्यता के बावजूद, जो उम्मीद करता हूँ कि समझने में आसान है ( ओह, वह मुझे बेहद, बेहद समझ में आती है, आख़िर ख़ुद को कैसे नहीं समझूँगा?). इस समय, तीन धनु-कोष्ठकों के भीतर रखकर, मैं चाहे जो भी लिखूँ, उसमें कोई संशोधन न कर पाएगा. मैं अदृश्य हूँ. मेरा उल्लासोन्माद बाह्य शक्तियों के लिए अप्राप्य है, चाहे उन्होंने अपने ज़माने में मेरे दिमाग़ में कितनी भी शाख़ाएँ क्यों न खोल रखी हों! मगर अपने आविष्कार का दुरुपयोग मैं नहीं करूँगा. असल में वह कुछ नहीं बदलेगा. मैं बेवफ़ा नहीं हूँ; मैं विश्वासघाती नहीं हूँ; मैं किसी उद्देश्य को समर्पित हूँ, चाहे मैं ये भी नहीं जानता होऊँ कि किस उद्देश्य को. बस - - : ...धनु-कोष्ठक, तिहरे - - ...कितना अच्छा है ये! - - : ...ख़ास बात - - : उन्हें बन्द करना नहीं भूलना चाहिए - - : ...कल्पना करने में भी डर लगता है कि अगर भूल गया तो - - : ...सब ख़तम! शुरूआत के लिए काफ़ी है. मैं बन्द करता हूँ.}}}                          


01.33


कपितोनव  चाय बनाता है (कप, उबला हुआ पानी और पैकेट). वह सुनिश्चित कर लेता है कि दरवाज़े का ताला बन्द कर लिया है. कप को स्टूल पर रखकर बिस्तर पर लेट जाता है और बेड-लैम्प को ठीक करता है.


01.36



{{{ धनु-कोष्ठक बन्द करने के बाद चौबीस घण्टे बीत चुके हैं - - : कोई प्रतिबन्ध नहीं! - - : बहुत अच्छे! - - : फिर से खोलता हूँ! - - : खोल दिए!

अब विस्तार से. धनुषावृत लेख के क्रमांक 2 से शुरू करता हूँ (बहुत सांकेतिक शब्द है, उम्मीद है कि आगे भी इसका उपयोग करता रहूँगा). 

इस गुरुवार को मुझे जिसकी इजाज़त दी गई थी, उसके विश्लेषण से आरंभ करता हूँ. तात्पर्य है, मेरी परिस्थिति के मेरे द्वारा किए गए विश्लेषण से. 

हालात ऐसे हैं. बारिश हो रही थी. बिना किसी संदेह के, कि मैं मूखिन हूँ, मैं काला अंग्रेज़ी छाता लिए मूखिन की धीमी चाल से घर जा रहा था. मूखिन की आदत के अनुसार मैं आसमान पर था, हर चीज़ के बारे में सोच रहा था - - : पराई चीज़ों के बारे में, मगर सिर्फ बाहरी प्रतिक्रियाओं के स्त्रोतों के बारे में नहीं सोच रहा था, जिनके अस्तित्व से अपने विचारों को उत्तेजित करने का मेरे पास तब ज़रा सा भी कारण नहीं था. ये भी जोड़ देता हूँ - - : साफ़, मूखिन जैसे स्पष्ट, शुद्ध विचारों को.


ख़ैर, उस समय जो बात मुझे परेशान कर रही थी, उसका वर्णन मैं प्रोटोकोल जैसी सटीकता के साथ कर सकता हूँ. सबसे पहले, एक खेदयुक्त जड़त्व की बदौलत मैं अपने परिश्रमी दिमाग़ को काम से संबंधित विचारों से परेशान कर बैठा, और वो भी तब जब मैं काम से घर लौट रहा था. बेहतर यही था कि उसे दिमाग़ से पूरी तरह निकाल दिया जाता. उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं के बारे में सैद्धांतिक प्रश्न अपने आप में दिलचस्प है, मगर हर बात का अपना समय होता है, ऊपर से दुनियादारी के लिहाज़ से वह मेरे लिए ज़रूरी नहीं था, क्योंकि उन दुख भरे दिनों में मुझे जीने के लिए आवश्यक साधनों से वंचित कर दिया गया था (स्वयम् ही अपने आप को वंचित कर दिया था). स्वाभाविक रूप से मेरे विचार देशवासियों के हित के विकास की ओर मुड़ गए, जैसी कि शासन को कल्पना करनी चाहिए. मतलब, मैं कल्पना कर रहा था कि कल्पना कैसी होनी चाहिए. शासन प्रमुख द्वारा भष्टाचार के विरुद्ध घोषित युद्ध पर मेरा ध्यान नहीं जा रहा था, मुझे कोई दूसरी ही चीज़ परेशान कर रही थी - - : प्रेसिडेन्ट द्वारा जुआ-घरों के बिज़नेस को सुनियोजित करने का वादा, जो मेरे घर से सौ क़दम दूर स्थित मनोरंजन केन्द्र ‘तुम्हारा सुख’ को बन्द करने के ख़तरे का सिग्नल है - - : क्या इस हानि को बर्दाश्त करने की ताक़त है मेरे पास?

इसके अलावा मैं उस हरे पाउडर के बारे में भी सोच रहा था, जो मुझे आज अपने ब्रीफ़केस में मिला था. मेरे पास एक बड़ी, पुरानी ब्रीफ़केस है, जिसका मैं आवश्यकता की नहीं, बल्कि स्टाईल की ख़ातिर इस्तेमाल करता हूँ, इसलिए उसका सावधानी पूर्वक इस्तेमाल करने में कोई परेशानी नहीं है. तो, आज अपने ब्रीफकेस से मैच-टेबल्स निकालते समय मैंने देखा कि उनके किनारों पर कुछ हरा रंग लगा हुआ है. ब्रीफकेस की तली में एक अनजान किस्म का पाउडर था. मैंने उसे आँगन में, गन्दे पानी के टैन्क में झटक दिया, जो हमारे ऑफ़िस के प्रवेशद्वार से कुछ दूर पर है. एक आवारा उम्मीद भरी नज़रों से मेरी ओर देख रहा था, शायद सोच रहा था कि अगर अचानक मैं पुरानी ब्रीफ़केस फेंक दूँ तो - - : यही सब सोच रहा था मैं, काम से घर लौटते हुए, सब कुछ साफ़ समझ में आने से लगभग एक घण्टा पहले. 

सीढ़ी चढ़ कर ऊपर गया, घण्टी बजाई; बीबी ने दरवाज़ा खोला और एक भी शब्द कहे बिना कमरे में टी.वी. देखने भागी. मेरे स्लिप्पर्स पर, अगर कोई तीसरी आँख सामने से देखे, तो, बड़ा सा अक्षर W है, पता नहीं निर्माता को इससे क्या प्रकट करना था - - : सान्ता क्लॉज़ को बड़ा मज़ेदार और ज्ञानवर्धक लगता, कि इन स्लिप्पर्स में मैं वो नहीं देखूँगा जो दूसरे देखते हैं - - : मेरा अक्षर M, बल्कि, दो अक्षर. गीली छतरी खोलकर, मैंने प्रवेश-कक्ष में सूखने के लिए रख दी. अगर टी.वी. के कारण मैं बीबी से ईर्ष्या करता, तो बड़ा हास्यास्पद लगता, मगर फिर भी, काम से लौटा हुआ पति, मेरी नज़र में, थोड़े से ध्यान के क़ाबिल तो है ही. हमारा किचन काफ़ी बड़ा और रोशनी भरा है, गमले में एलो वेरा लगा है, हाँ, ये मानना पड़ेगा कि पानी टपकने के निशानों से छत बहुत भद्दी हो गई है. गैस पर एक बर्तन में मुझे सॉसेज दिखाई दिया, देखना पड़ेगा, ठण्डा है. डिनर तो वह कहीं से भी नहीं लग रहा था, मगर फिर भी गैस के पास से हटे बिना मैं उसके तीन टुकड़े खा गया - - : भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी क़ाबिल बीबी को उलाहना देते हुए, जो पति से बातें करने के बदले टी.वी. के बॉक्स को ज़्यादा महत्व दे रही थी. मेरे हाव-भाव, हालाँकि, अनदेखे रह गए; नहीं उन्हें देख लिया गया, मगर उनका विश्लेषण मेरे अनुसार नहीं किया गया. बर्तन पर ढक्कन पटकने की आवाज़ सुनकर बीबी चीख़ी - - :  “शायद, घर लौटते हुए तुम कुछ लाए हो? शायद, तुम कम से कम समोसे तो लाए ही होगे?”

ये बीबी के व्यंग्य-बाण थे. वह बड़ी अच्छी तरह से जानती थी - - : मैं कुछ नहीं लाया हूँ, क्योंकि ला ही नहीं सकता था.

जब मैं बीबी के बारे में कह रहा हूँ, तो मेरा मतलब, स्वाभाविक रूप से, मूखिन की बीबी से है; उम्मीद करता हूँ कि आगे इसे स्पष्ट करना ज़रूरी नहीं होगा. 

मैं ख़ामोश रहा; कमरे में गया; टीवी-बॉक्स पे सीरियल आ रहा था. मुझे टीवी-बॉक्स में कुछ सन्देहास्पद नज़र आया. थोड़ी देर सोचकर, मैं, आश्चर्यचकित होकर, चहका - - :  “उसे तो मार डाला था!”  “किसी ने उसे नहीं मारा” (मेरी बीबी ने जवाब दिया).

 “मैं क्या, अंधा हूँ? कुछ एपिसोड्स पहले मार डाला था!”  “तुम सीरियल देखते नहीं हो, बेवकूफ़ी की बात मत करो” (बीबी ने कहा).  मुझे बेचैनी महसूस हुई - - : कुछ गड़बड़ है.  “क्या फिर से ज़िन्दा हो गया?”  “ये दूसरा है”.

 “कोई दूसरा-वूसरा नहीं है, मुझे याद है, वही है!”  “ये दूसरा है, एक ही एक्टर इसका ‘रोल’ कर रहा है!”  सही तो है - - : ये वाक़ई में ‘वो’ नहीं था, जिसे मैंने पिछले हफ़्ते परदे पर देखा था, उसे तो मार डाला गया था, वो भी मेरी आँखों के सामने, और ये - - : दूसरा है, हालाँकि एक ही एक्टर द्वारा प्रस्तुत किया गया. एक ही एक्टर, जैसे कुछ हुआ ही न हो, दूसरे को प्रदर्शित कर रहा है, जैसे कि ऐसा ही होना चाहिए; मैं चौंक गया.  “क्या उनके पास एक्टर्स नहीं हैं?” मैं इस बात को दुहराता, मगर बीबी का लिहाज़ करते हुए चुपचाप उसकी ख़ामोशी से सहमत हो गया - - : चलिए, मेरे प्रश्न को अत्युक्तिपूर्ण समझ लेंगे, जिसे किसी उत्तर की अपेक्षा नहीं होती. 

तब, जब बीबी ख़ामोशी का खेल कुछ देर और जारी रखना चाह रही थी, अप्रत्याशित रूप से मेरे मुँह से निकला - - :

 “बॉक्स वाक़ई में ईडियट्स के लिए है!”  “ बॉक्स ईडियट्स के लिए है? (पल भर में बीबी गुस्से से उबलने लगी). ब्रेवो, कोस्त्या, सुपर! एक हाथ के डाकू20 – ये बॉक्स ईडियट्स के लिए नहीं है! ये बॉक्स विद्वानों के लिए है!” उसे उलाहना देने का बहाना मिल ही गया - - : एक हाथ का डाकू; कल ही तो मैं हार गया था.

हार माननी ही पड़ी - - :

 “माफ़ करना. मेरा मतलब था - - : ईडियट्स बॉक़्स के भीतर हैं, न कि बाहर. मैं तुम्हें अपमानित करना नहीं चाहता था. एक बुद्धिमान, ख़ूबसूरत औरत ईडियट्स को घूर रही है”. 

और मैं कमरे से निकल गया, जो भी मिले वो खाने के लिए - - : अब पेट भर के खाऊँगा.  “अपना मुँह देख लो!” (पीछे से सुनाई दिया). मैंने फ्रिज खोला. और मुझे मक्खी21 की याद आई. ये रही. मक्खी - - : दरवाज़े के भीतरी ओर, अण्डों वाली शेल्फ के ऊपर. हमारे फ्रिज में मक्खी रहती है. कुछ ही समय से; हो सकता है कल से. कल शाम को मैंने पहली बार उसे देखा था. कल शाम को मैंने फ्रिज खोला और देखा कि कैसे एक उनींदी मक्खी उसके भीतर उड़ रही है. वह उड़कर बाहर नहीं आई, हालाँकि मैंने काफ़ी देर तक फ्रिज को खुला रखा था, और मैंने उसे भगाया नहीं. आज वह बेहोशी की हालत में थी. क्या उसे सपना आ रहा है? क्या मक्खियों को सपने आते हैं? क्या अगर मक्खियों को दो दिनों तक फ्रिज में बन्द करें तो उन्हें सपने आते हैं? मुझे इसमें सन्देह नहीं था कि मक्खी ज़िन्दा है. अगर मक्खी मरी हुई होती, तो वह दरवाज़े की दीवार पर न बैठी होती, बल्कि नीचे गिर जाती. वह यहाँ करती क्या है? हमारा फ्रिज तो ख़ाली है. वह यहाँ आई कैसे? वह इसमें घुस कैसे गई?             

   मक्खी के बारे में और कुछ खाने की इच्छा को भूलकर मैंने फ्रिज का दरवाज़ा बन्द कर दिया, क्योंकि बिजली की कौंध के समान मेरे विचार स्पष्ट हो गए थे – - : दिमाग़ में अचानक ख़याल आया - - : और मैं? - - : और मैं कौन हूँ? - - : क्या मैं मूखिन हूँ?

मैं अचानक पूरी स्पष्टता से समझ गया कि मैं कोई मूखिन-वूखिन नहीं हूँ; मूखिन का अपना अस्तित्व है, और मेरा अपना; और ये कि न तो मैं मूखिन का भाई हूँ, न ही यार; और मूखिन हूँ मैं-- : सिर्फ कुछ समय के लिए मूखिन हूँ, न कि पूरी तरह मूखिन - - : सिर्फ रंग-रूप से मूखिन, रूप से. 

इस खोज से चौंक कर मैंने अपना मुँह खोल दिया - - : ठीक ऐसा ही इस समय मैं हूँ.

मूखिन की हर चीज़ मेरे पास थी - - : सबसे पहले, उसकी स्मरणशक्ति, मैंने महसूस किया कि मूखिन की कोई भी बात न भूला हूँ, न भूलूँगा, ठीक वैसे ही जैसे मूखिन के अलावा किसी और चीज़ को आत्मसात् नहीं करूँगा. मेरे पास पर्याप्त मात्रा में मूखिन था, ज़रूरत से ज़्यादा ही था, मगर ये सब मेरा नहीं था.

तो मैं आख़िर कौन हूँ? (मैंने अपने आप से पूछा). कौन हूँ मैं? मगर मैं नहीं जानता था, कि मैं कौन हूँ. मैं चाहे जो भी रहा हूँ, मैं मूखिन बन गया हूँ, बिल्कुल मूखिन न होते हुए. मैं मूखिन था, मगर मूखिन नहीं था, और मूखिन नहीं था. मगर सबसे महत्वपूर्ण बात अब मैं स्पष्टतः समझ गया हूँ, कि मूखिन अभी, इस समय ग़ायब नहीं हुआ था और मैं भी मूखिन में अभी, इस समय परिवर्तित नहीं हुआ था.

ये पहले ही हो गया था, काफ़ी पहले, मेरे फ्रिज खोलने से काफ़ी पहले.

कब? कल? पिछले हफ़्ते? सालों पहले?

मुझे क्या हो गया है? क्यों मैं सुन रहा हूँ और एक एक अक्षर देख रहा हूँ: प्रॉजेक्ट, नियंत्रक शक्ति, स्कैनिंग सिस्टम? मैं क्यों इस बात को समझ रहा हूँ कि मुझे रूह को सर्द कर देने वाले रहस्यमय नियमों का पालन करना होगा, जो शब्दों के माध्यम से परावर्तित नहीं होते, मगर पूरी तरह समझ में आ जाते हैं? मैं समझ गया कि मुझसे क्या अपेक्षाएँ हैं - - : गुप्त रहो और छुपाते रहो कि तुम वाक़ई में मूखिन नहीं हो. मुझे डर का एहसास होने लगा; और ठण्ड का भी - - : मैं ख़ुद को मक्खी महसूस करने लगा, जो वहाँ बन्द थी. 

उसे बाहर निकालना चाहिए; मैंने फ्रिज खोला. मक्खी दरवाज़े पर नहीं थी. कहीं गिर तो नहीं गई? क्या वह मर गई और गिर गई? क्या मेरे आत्म-ज्ञान के एक मिनट में मक्खी मर सकती है?

मैंने दरवाज़े के सारे शेल्फ़्स देख डाले - - : मक्खी कहीं भी नहीं थी, मैंने पूरा फ्रिज देखा, सब्ज़ियों की ट्रे भी बाहर निकाली - - : खाली फ्रिज के सामने घुटनों के बल खड़े होकर मैंने प्लास्टिक के डिब्बों के नीचे देख लिया, जहाँ सब्ज़ियों को अच्छे दिनों में सुरक्षित रखना होता है - - : मक्खी कहीं नहीं थी.  “क्या पूरे पागल हो गए हो? (मेरे ऊपर से सुनाई दिया). क्या ‘चीज़’ का चूरा ढूँढ़ रहे हो?”

घुटनों से उठे बगैर मैंने कंधों के बीच अपना सिर समेट लिया. उसे क्या चाहिए? मूखिन की बीबी यहाँ क्यों आई है?  “पड़ोसन के पास जाकर दो अण्डे मांग लाती हूँ, कम से कम स्क्रैम्बल्ड अण्डे बना लूँगी, या फिर उन्हें उबाल दूँगी - - : क्या दिन आ गए हैं, शर्मनाक!” वह चली गई, और मैं, घुटनों से उठे बिना, फ्रिज में हाथ रखे रहा. जो हो गया है, उस सबके बाद मुझे मूखिन की बीबी से कैसा बर्ताव करना चाहिए? उसके साथ कैसे रहूँ?

बौद्धिक तौर पर आत्मसात् किए गए नियम, ख़ामोशी से कहे जा रहे थे - - : हिम्मत रखो, डटे रहो, कोई ऐसी बात न करो जो तुम्हारा भेद खोल दे (कि तुम मूखिन नहीं हो), किसी भी हालत में, किसी को भी हमारे रहस्य का राज़दार मत बनाना. हमारे रहस्य का - - : उनका और मेरा! और अब - - : थरथराते हुए (मेरे हाथ काँपने लगे, ओय-ओय!) - - : मैं, नियमों का उल्लंघनकर्ता, फ़िलहाल वह परेशानी दूर करने में समर्थ हूँ, जिसने अचानक मुझे दबोच लिया था, मदद के लिए तिहरे धनु कोष्ठकों को, जैसे राक्षसों को, बुलाता हूँ - - : टाइम हो गया, टाइम हो गया, और वैसे भी मैंने अपने आपको काफ़ी आज़ादी दे दी थी!}}}


{{{ फिर से खोले गए धनु कोष्ठकों और पहले बन्द किए गए कोष्ठकों के मध्य क़रीब ढ़ाई घण्टे का अंतर है. बाहरी तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गई. मैं इत्मीनान से हूँ; स्थिति पर मेरा नियंत्रण है; उम्मीद महसूस हो रही है. लिख रहा हूँ. दयालु पड़ोसन ने अण्डों के अलावा बीबी के साथ दो कैबेज-रोल्स और ब्रेड का चूरा भी भेज दिया. मेरा ख़याल है, कि डिनर बढ़िया बन गया - - : इससे बुरा भी होता रहा है. कैबेज-रोल के बाद मैं बाल्कनी में चला गया - - : अस्पष्ट चीज़ों के बारे में सोचने के लिए. हवा में गर्माहट थी; जुलाई का महीना था. वह अभी भी चल रहा है - - : जुलाई का महीना - - : इस जुलाई का आनन्द लूटने के लिए अभी काफ़ी समय है. मच्छर उड़ रहे थे; अंधेरा हो रहा था. पॉइंट नं. 2 से पॉइंट नं. 1 पर आता हूँ (मेरे आरंभिक “धनुष” में दिए गए पॉइंट्स को देखिए). फ़िलहाल मेरी दिलचस्पी प्रतिस्थापन की प्रक्रिया में है.

तो, बालकनी में मैं इसके बारे में सोच रहा था - - : ये हुआ कब था?... मुझे मूखिन की ज़िन्दगी का स्मरण हो आया - - : बचपन, किशोरावस्था, उसके विश्वविद्यालय, आरंभिक प्रौढ़ता. मैं उसकी ज़िन्दगी का वह ख़तरनाक मोड़ ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा था, जब मेरे द्वारा मूखिन प्रतिस्थापित कर दिया गया था.  

मुझे याद आया – बिल्कुल छोटा कोस्त्या, गर्मियों की, जुलाई की ही शाम को कामेन्का नदी के किनारे, उम्र छह साल, उसने अभी अभी बंसी के कांटे में कीड़ा फंसाना सीखा है; पिता, जो ख़ुद भी बंसी से लैस थे, कोस्त्या की डोंगी पर सतर्क नज़र रखे हुए थे. मुँह मारने का एहसास हुआ. बाँस की लम्बी बन्सी मूखिन के सामने झुकती है. उसने ज़िन्दगी में अपनी पहली मछली बाहर निकाली. मैंने मूखिन को अपने नौजवान दोस्तों के साथ वनस्पति एवम् जीव-जंतुओं के मित्रों की सोसाइटी में शामिल होते हुए देखा था. वह रात, जब वह बालिग हुआ था, जब उसने बेवकूफ़ी से ट्रेन को रोक दिया था. एक धुंधली सुबह को उसे अपनी मासूमियत खोते देखा था. देखा था कि कैसे मूखिन चट्टान पर रेंगा था. कैसे वह पीप भरे एपेंडिक्स से तड़पता अस्पताल में पड़ा था. पीप भरा एपेंडिक्स सबसे अप्रिय याद नहीं है. मेरी दिमाग़ी नज़र को दिखाई देता है मूखिन एक दुमंज़िला बैरेक में जाते हुए; चरमराती सीढ़ियाँ, रेल-कर्मचारियों का दिन, ख़ाली कॉरीडोर, सब लोग बाहर हैं, उसने दरवाज़ा खोला, जिस पर चाकू से बेमतलब शब्द “शलजम” खुरचा हुआ था. तेज़ तेज़ क़दमों से वापस चला जाता है. एक घण्टे बाद वह रेस्टारेंट-कार में वोदका पीता नज़र आयेगा, भूल जाने के लिए. अपने आपको भूल जाने के लिए. कुछ हद तक वह इसमें सफ़ल भी होता है. मूखिन मूखिन ही था. मैं मूखिन के बारे में वह सब याद नहीं करना चाहता, जिसे वह कभी भी याद करना नहीं चाहता था. नीचे लॉन में राख झटकते हुए मैंने दूसरे छोर से सोचना शुरू किया, या सरल शब्दों में कहूँ तो - - : अंत से, न कि आरंभ से. कोई चीज़ मुझसे कह रही थी कि ये हाल ही में हुआ है.

मुझे एक ‘शॉकिंग’ वाक़या याद आया, क्योंकि वह मुझे ‘शॉक’सहित याद आया था – - : साफ़-साफ़, स्पष्टता से, विरोधाभास सहित, जैसे वह अभी यहीं घटित हो रहा हो - - : मेरे दिमाग में नहीं, बल्कि मूखिन के किचन में (तब, जब मैं अभी बाल्कनी में था). हमारी - - : मेरी? उसकी - - : बीबी से बात हो रही थी - - : फिर से - - : क्या उसकी? क्या मेरी बीबी से? - - : ये निर्भर करता है. 

मूखिन शून्य में देख रहा था. बात पिछले से पिछले सप्ताह की है, मगर पिछले से पिछले बुधवार की नहीं, बल्कि तीसरे बुधवार पहले की. मैंने बाद में गिना था - - : पन्द्रह दिन पहले, मतलब इस गुरुवार से, या उन्नीस दिन पहले, अगर आज से गिना जाए, और आज, जब मैं ये लिख रहा हूँ, इतवार है.    मूखिन शून्य में देख रहा था. ग़लती करने से डरता हूँ, मगर, मेरे ख़याल में, वह बीबी को बताना चाहता था कि उस दिन काम पे कैसे वह इस प्रश्न को सुनकर स्तब्ध रह गया था - - : क्या वह किसी की हत्या कर सकता है. जैसे, सौतेले बाप की. उसका तो कभी सौतेला बाप था ही नहीं. मज़ाक का सार ये है, कि असिस्टेंट अलीना को एन्थ्रोपोमेट्रिक-रिसर्च की फ़ाइल के फ़ोटो देखते हुए पता चला कि किसी अपराधी के नाक-नक्श बिल्कुल मूखिन से मिलते जुलते हैं. आयु में अंतर के बावजूद (मूखिन काफ़ी बड़ा था), आँखों के बीच का अंतर और ठोड़ी की ऊँचाई का अनुपात एक समान था (हालाँकि यहाँ आयु का मुश्किल से ही कोई महत्व है). सब को ये सुनकर बड़ा मज़ा आया, मगर मूखिन ताव खा गया; अपने रूप-रंग के बारे में वह काफ़ी संजीदा था और यदि उस पर कोई फ़ब्ती कसी जाती, तो उसे अच्छा नहीं लगता था. 

मगर, मैं इस बात की पुष्टि नहीं करना चाहता, कि वह वाक़ई में बीबी को यह सब बताना चाहता था, मगर ये बात, कि शून्य में देखते हुए (और किचन में मौजूद रहकर), वह इसी के बारे में सोच रहा था - - : ये ऐसा तथ्य है जिसकी सच्चाई की ग्यारण्टी ले सकता हूँ. 

टी.वी. पे गैस की क़ीमतों के बारे में बता रहे थे.  “चाय या कॉफ़ी?” (बीबी ने पूछा). जवाब दिया - - :  “चाय”.  “या कॉफ़ी?”

जवाब दिया - - :  “कॉफ़ी”. 

 “मैंने तुमसे पूछा कि तुम क्या पिओगे, और तुम क्या जवाब दे रहे हो?”  “मैं जवाब ही दे रहा हूँ, कि क्या पिऊँगा”.  “पूछती हूँ - - : चाय? तुम - - : चाय. पूछती हूँ - - : कॉफ़ी? तुम - - : कॉफ़ी”.

 “तो फिर तुम कॉफ़ी के बारे में क्यों पूछ रही हो, जब मैं जवाब दे चुका हूँ कि चाय पिऊँगा”.  “टॉमेटो-जूस पियो. फ़ायदेमन्द है”.

 “मुझे टॉमेटो-जूस नहीं चाहिए. मुझे अकेला छोड़ दो. न तो मुझे चाय चाहिए, न ही कॉफ़ी”.

 “तुम ख़ुद ही नहीं जानते, कि तुम्हें क्या नहीं चाहिए. और, क्या चाहिए, ये भी नहीं जानते. तुम्हें कुछ भी नहीं चाहिए! - - : तुम्हें कुछ भी नहीं चाहिए! - - : ...कुछ भी नहीं! - - : ...कुछ नहीं- इत्ता सा भी नहीं! - - :”

ये शब्द मेरे लिए कहे गए थे. पहला मूखिन उन्हें नहीं सुन रहा था. पहला मूखिन तेज़ी से ग़ायब हो रहा था, मैं उसे प्रतिस्थापित कर रहा था, फिर से उसका रूप ले रहा था. उसने दाँत भींचे और बाहर निकल गया. हाँ, मैं बाल्कनी में आया, खड़ा रहा, जैसे अभी खड़ा हूँ, और सिगरेट पीता रहा, जैसे अभी पी रहा हूँ, घरों की छतों को देखते हुए, जैसे अभी देख रहा हूँ. ये था मैं! और ये हुआ था पिछले से पिछले सप्ताह के बुधवार को! तभी मैं समझा था, कि ये सब कैसे हुआ! (और, ये मैं समझा गुरुवार को!)


मनुष्य के अंतिम शब्द हमेशा महत्वपूर्ण होते हैं. जैसे मूखिन के - - : “मुझे अकेला छोड़ दो. न तो मुझे चाय चाहिए, न ही कॉफ़ी!” - - : ये उसके अंतिम शब्द थे. तभी वह ग़ायब हो गया, सही कहूँ तो, मुक्त हो गया, और मैं इन शब्दों को भूल नहीं सकता था.


बाह्य जगत में इस बीच कुछ भी नहीं हुआ - - : न तो घड़ी रुकी, न बल्ब फ्यूज़ हुआ, न कॉर्निस गिरी, जिस पर परदा टांगते हैं. टी.वी. ने भी स्विच-ऑफ़ होना, या फिर स्क्रीन पर कोई असाधारण बात दिखाना ज़रूरी नहीं समझा. कॉफ़ी भी भाग नहीं गई. और, क्या कॉफ़ी थी? और, क्या मूखिन था? (मेरा पूछने को दिल चाहता है). अगर मूखिन वास्तव में था, तो मैं जानना चाहता हूँ, कि क्या ग़ायब होते समय ख़ुद उसने कुछ महसूस किया था.

जैसे, मैंने, उसे प्रतिस्थापित करते हुए, कुछ भी महसूस नहीं किया. उदासीनता मुझ पर हावी थी. बाल्कनी में खड़ा था और कुछ भी महसूस नहीं कर रहा था; ऊँचाई को और उससे डरने की ज़रूरत को भी महसूस नहीं कर रहा था. बस यही वो सीमा थी - - : मैं मूखिन को प्रतिस्थापित कर रहा था, तब तक ये न समझ पाते हुए कि क्या कर रहा हूँ. उसे प्रतिस्थापित करने के पूरे पन्द्रह वास्तविक दिनों तक मैं समझ नहीं पाया कि मैं मूखिन नहीं हूँ!                 

हो सकता है, मैंने सोचा, कि पहले की तरह, मूखिन हूँ और कोई विशेष बात नहीं हुई है.


हो सकता है, इन दो हफ़्तों में मैं पुराने मूखिन की अपेक्षा ज़्यादा ही मनोरंजन केन्द्र ‘तुम्हारा सुख’ में जाकर ‘एक हाथ के डाकू’ से अकेले युद्ध करता रहा.


सोमवार की शाम को शॉपिंग के लिए दी गई रकम हार गया - - : एक-एक कोपेक, और मंगलवार को अपनी बचत भी, जिसे घर से ले गया था. 

मगर इस बात को मैं कब समझा, इस बारे में मैं पहली ही लिख चुका हूँ.}}}


{{{ हाँ, स्वीकार करना पड़ेगा - - : मूखिन को लूडोमैनिया22 था, उसके बाद मैं भी कुछ-कुछ लूडोमैनियाक हो गया हूँ. अभी तक मुझे पक्का यक़ीन नहीं हुआ है कि वाक़ई में मैं कितना लूडोमैनियाक हूँ, हालाँकि सारे लक्षण साफ़ हैं, मगर उम्मीद करता हूँ कि, फिर भी, मैं मूखिन जितना लूडोमैनियाक नहीं हूँ. ये आशा मुझे देती है, वास्तविकता को समझने की मेरी योग्यता - - : अक्सर लूडोमैनियाक इस बात को स्वीकार नहीं करते कि वे लूडोमैनियाक हैं, मगर मैं तो स्वीकार करता हूँ - - : हाँ, मैं लूडोमैनियाक हूँ, हो सकता है, टिपिकल न होऊँ, मगर हूँ तो लूडोमैनियाक, और निःसंदेह मूखिन के लूडोमैनिया को स्वीकार करता हूँ.


एक और बात, ये कहना अतिशयोक्ति होगी कि मुझे लूडोमैनिया से परेशानी होती है; इतना ही काफ़ी है कि वह मुझमें है; अगर किसी को परेशानी होती है, तो वो है मेरी बीबी, हालाँकि, जब मेरी बीबी मूखिन की बीबी थी, वह, मुझे लगता है, कि काफ़ी ज़्यादा परेशान हो जाती थी. इसमें बहस की कोई बात ही नहीं है - - : उसने जुए के खेलों के मेरे शौक के कारण (मेरी वर्तमान क्षमता में) उतना दुख नहीं उठाया, जितना मूखिन के शौक के कारण, और मुश्किल से ही 


02.00


मुझे इस बात के लिए उलाहना दिया जा सकता है कि मेरी हाल ही की हार ने उसके सब्र के प्याले को छलका दिया - - : अगर मूखिन मूखिन ही रहता, तो सब्र का प्याला और जल्दी छलक जाता - - : कहीं बीच में शामिल करने की इच्छा होती है “उसके” को - - : “उसके प्याले को सब्र के” या “प्याले को उसके सब्र के”, सिर्फ मैं किसी भी हालत में कल्पना नहीं कर सकता - - : उसकी - - : इस बोधगम्य प्याले के साथ. ये, वैसे, अप्रत्यक्ष रूप से मेरी अंतरात्मा की निर्मलता को दर्शाता है. मूखिन के पास स्वयम् को पीड़ा पहुँचाने के कई तरीके थे, और वह कभी कभी बदहवास आत्म-आलोचना और आत्म-पीड़न का भी शिकार हो जाता था. याद नहीं करना चाहता. उसकी अंतरात्मा का मामला है, मेरी नहीं. ये वो था, जो अपनी पूरी तनख़्वाह जुए में हार जाता था, ये वो था जिस पर कर्ज़ हो गया था, ये वो था जिसने अपनी बीबी की एक पुरातन चीज़ गिरवी रख दी थी, मगर पिंड छुड़ाना पड़ेगा मुझको और, मैं महसूस कर रहा हूँ कि जल्दी ही ऐसा करना होगा. पिछले दिनों हुईं मेरी छोटी-मोटी हारों का उन बड़ी-बड़ी हारों से कोई मुक़ाबला ही नहीं है, जो उसकी बीमारी के साथ-साथ पिछले डेढ़ साल में बढ़ती गईं, बिल्कुल उस दिन तक जब मूखिन, इस नाम के सीधे-सीधे अर्थ में, मूखिन होना बन्द हो गया. इसमें कोई शक ही नहीं है कि बीमारी तेज़ी से बढ़ती गई, मगर, इस बात से सहमत होते हुए कि ये हमारा साझा दुर्भाग्य है, मैं हर उस इन्सान का ज़ोरदार विरोध करूँगा, जो मूखिन के मैनिया की बढ़ती हुई उग्रता को उस मूखिन से जोड़ने की हिम्मत करेगा, जो मैं हूँ. गंभीर नज़र, जो मैंने ख़ुद ही अभी-अभी अपने आप को दिखाई है - - : इस बात का पक्का सुबूत है कि सब कुछ नियंत्रण में है. नहीं, कोई लक्षण तो है, मगर सिर्फ मेरा लूडोमैनिया उग्र स्वरूप धारण नहीं कर रहा है; बल्कि इसके विपरीत ही हो रहा है.


गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए, मैं इसे सौभाग्य ही कहूँगा कि मूखिन को ताशों के खेल में कोई दिलचस्पी नहीं थी, और न ही रुलेट23 में. वो तो सबसे पुरातन चीज़ पर बैठता था - - : लगभग हर शाम को काम से घर लौटते समय मनोरंजन-केन्द्र में घुस जाता, जो हमारी स्ट्रीट पर ही है, और वहाँ किसी  ऑटोमॅटिक गेम पर बैठ जाता. वह अपनी हार और जीत का रेकॉर्ड रखता था - - : जैसी कि अपेक्षा थी, ज़्यादातर हारता ही था. हम समझा नहीं सकते - - : न तो मूखिन को, न ही उसके बाद मुझे - - : इन नासपीटी मशीनों से हमारी दोस्ती-दुश्मनी की दास्तान को. एक ही शब्द  - - : छूत - - : मैं भी कहता हूँ, और वह भी यही कहता था. मगर हम खिंचते चले गए, खिंचते जा रहे हैं; शाम होगी, और, मैं जानता हूँ, कि कोई चीज़ हमें वहाँ खींचेगी, वापस न पलटाने के लिए!        

ख़ुद हमारे ही लिए सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि, हम - - : या नहीं, दुहरेपन के एहसास से बचने के लिए सिर्फ एक के बारे में ही बात करूँगा, मूखिन के बारे में - - : सबसे आश्चर्यजनक बात ये है, कि मूखिन को ‘थ्योरी ऑफ प्रॉबेबिलिटी’ के बारे में जानकारी थी, अंशतः, बड़ी संख्याओं के नियम के बारे में. मैं ये क्या कह रहा हूँ! जानकारी थी - - : ये सही शब्द नहीं है. वह इस क्षेत्र में एक तरह का विशेषज्ञ था; वह ‘ब्यूस्टे’ में काम करता था. ‘ब्यूस्टे’ क्या है? ओह, ये वह जगह है, जहाँ मैं सभी सहकर्मियों के साथ काम करता हूँ, जो मुझे मूखिन समझते हैं. ‘ब्यूस्टे’ – ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स, दूसरे शब्दों में कहें तो ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिकल इनवेस्टिगेशन्स. अगर मैं “प्राइवेट” शब्द जोड़ दूँ, तो वह, वाक़ई में कुछ भी नहीं बदलेगा. मतलब, मेरा संबंध रॅन्डम-प्रोसेसेज़ और रॅन्डम-वेरियेबल्स से है. मूखिन भी, ज़ाहिर है, यही करता था - - : स्टेटिस्टिकल डेटा का ‘कोरिलेशन’ आदि विधियों की सहायता से प्रसंस्करण करता था, कुछ परिणाम प्राप्त करता था, जिससे कि बाद में इन परिणामों के आधार पर दूसरे विशेषज्ञ खोजों के ग्राहकों को सुझाव दे सकें. थ्योरी ऑफ प्रोबेबिलिटी क्या बला है, मैं ठीक-ठाक जानता हूँ; मूखिन भी मेरे जितना ही जानता था. ”तुम्हारा सुख” में आने वालों में कोई और नहीं था, जो मूखिन की तरह (स्वयम् का उदाहरण नहीं दूँगा), इस बेहूदा खेल के हानिकारक प्रभाव के बारे में जानता हो. मूखिन जानता था कि वह किस तरफ़ जा रहा है; जानता था और जा रहा था. मगर क्यों, ये वह नहीं जानता था और मैं इसका जवाब नहीं दूँगा. 

मूखिन की बीबी पति के जुनून को दूसरी तरह से समझाती थी - - : स्वैराचार; परिवार के प्रति ग़ैरज़िम्मेदारी; आसानी से पैसा कमाने की इच्छा, (“अगर मेहनत से काम करता, एक-एक कोपेक बचाता!”); और अंत में आत्मपीड़न.


इस अंतिम बात से सहमत हुआ जा सकता है, अगर आत्मपीड़न से तात्पर्य है – जानबूझकर अपने हितों को नुक्सान पहुँचाना, और अंशत: - - : वित्तीय.  मगर आत्मपीड़न को मूखिन के अन्य कार्यकारी क्षेत्रों में भी प्रकट होना चहिए था, मगर ऐसा देखा नहीं गया. मेरी ही तरह, किसी अन्य बात में वह आत्मपीड़क जैसा नहीं था, बल्कि इसके विपरीत, मतलब “विपरीत” उस अर्थ में नहीं, कि वह या मैं, पर्याप्त मात्रा में अपनी-अपनी तरह के उत्पीड़नप्रिय थे या हैं, बल्कि उल्टे, इसके विपरीत, हम, अपनी क्रमिकता-पूर्वापरता के बावजूद, दुगुने नहीं, बल्कि एक इन्सान की तरह - - : दोनों ही समझदार हैं.


मुझे यक़ीन नहीं है कि इस ‘नोट’ को धनुषावृत्त करना चाहिए या नहीं, हालाँकि, इसे धनु-कोष्ठकों से ही शुरू किया था. हालाँकि - - : किसलिए? बल्कि, बेहद यक़ीन है! वह ज़रा भी हानिरहित नहीं है! मेरे और मूखिन के बीच की पृथक्करण रेखा को बिल्कुल ठीक खींचा गया है, समस्या को विस्तार से समझ लिया गया है; इसलिए उलझनों से बचने के लिए तिहरे धनु-कोष्ठकों से समाप्त करता हूँ.}}}


{{{ शुक्रवार को मैं काम पर गया. चलिए, दफ़्तर में मेरी कल्पना करें. मेरे सामने कम्प्यूटर है, जिस पर कुछ दिनों पहले तक मूखिन काम करता था. फ़िश-समोसों के ग्राहकों की पसन्द के डाइग्राम्स मेज़ पर पड़े हैं. शुक्रवार को तान्या ने उन्हें बनाया था, मुझे उनका अध्ययन करना है. 

ये अफ़वाह कि तान्या मूखिन से प्यार करती है, कुछ ज़्यादा ही अतिरंजित है. मेरे साथ तो उसका कोई लफ़ड़ा नहीं था. ये सच है कि वह इस बात को नहीं जानती, क्योंकि वह मुझे मूखिन समझ रही है.


मूखिन एक टीम में था; अब इस टीम में हूँ मैं. टीम में पाँच व्यक्तियों का कोर-ग्रुप है. मूखिन कोर-ग्रुप में था; अब मैं कोर-ग्रुप में हूँ. कोर-ग्रुप के सब लोग दिमाग़ से काम करते हैं - - : सिर्फ दिमाग़ से - - : विश्लेषण करते हैं, परस्पर-संबंध स्थापित करते हैं, निष्कर्ष लिखते हैं. मैं यही करता हूँ.           


दिमाग़ से काम करना आसान नहीं है - - : बिल्कुल मनोवैज्ञानिक. मैं तो बिना काम के भी पूरे समय सोचता रहता हूँ. काम पर ज़रा ज़्यादा सोचता हूँ, मगर इसी पर तो काम है. मगर वो - - : काम है. और, जब काम नहीं होता, तब काम नहीं है. मुझे, स्वीकार करना पड़ेगा, इस बात से चिढ़ होती है कि काम करते समय मैं अपने लिए नहीं, बल्कि मूखिन के लिए सोचता हूँ. मैं तो जब काम पर नहीं होता, तब भी मूखिन के लिए सोचता हूँ, मगर काम पर मूखिन के लिए सोचना अच्छा नहीं लगता, क्योंकि ये काम तो अभी भी उसीका है.

काम पर सब लोग मुझे, जैसा कि मैं कह चुका हूँ, मूखिन समझते हैं.

मूखिन के काम पे, दो बार अंडरलाइन करता हूँ, सब मुझे मूखिन समझते हैं. विचित्र बात होती, अगर कुछ और होता; मुझे इस बात को मानना पड़ेगा. 

हमारा ऑफ़िस - - : मुझे “दफ़्तर” शब्द ज़्यादा अच्छा लगता - - : हमारा ऑफ़िस-दफ़्तर भूतपूर्व कम्युनिटी रेसिडेन्सी वाली बिल्डिंग में दूसरी मंज़िल पर है, इस बिल्डिंग को पूरी तरह हमारे ‘ब्यूस्टे’ जैसे दफ़्तरों को दे दिया गया है. मेरे पास मेज़ है. ज़ाहिर है कि यह मेज़ मूखिन की थी. वह अभी भी मूखिन की ही है - - : क्योंकि पहली बात, अगर निष्पक्ष रूप से कहें, तो मूखिन, वास्तव में, मैं हूँ; और दूसरी बात, मैं मूखिन को प्रतिस्थापित कर रहा हूँ, आशा है, अस्थाई तौर पर, न कि स्थाई रूप से. 


तो, हम दिमाग़ से काम करते हैं - - : या, ठीक-ठीक कहूँ तो, दिमागों से - - : क्योंकि आम विषयों पर काम करते-करते हमारे दिमाग़ संयुक्त हो गए हैं.

आम विषय - - : ये आम जगह नहीं है. आम जगह - - : ये, जैसा कि ज्ञात है, सर्वविदित तथ्य है, घिसा-पिटा मुहावरा, दकियानूसी ख़याल है.

आम विषय, जो हमारे दिमागों को संगठित करते हैं, नियमानुसार, मौलिक हैं. 


सोचता हूँ, कि अगर कोई बाहरी इन्सान हमारे यहाँ आ जाए, और सुन ले कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, तो कुछ भी समझ नहीं पाएगा. एक बार मूखिन की बीबी पति के पास एक डॉक्यूमेन्ट लाई, जिसे वह घर पे भूल आया था (ये काफ़ी पहले की बात है) - - : कॉफ़ी पीते-पीते उसने सुना कि किस बारे में बातें हो रही हैं, और कुछ भी समझ नहीं पाई. 


उसने कुछ ऐसी बात सुनी - - : “जॉर्ज, क्या ख़याल है, उच्चतम समानता की विधि अपनाएँ, या लड़कियों को फ़िटिंग के लिए भेजें?” 

या फिर, मिसाल के तौर पर - - : कपितोनव , हमारे डेटा संतुलित नहीं हैं; सारी फ़सलों की फ़ैक्टोरियल विषमता का मूल्यांकन करो और फिर विसंगतियों का विश्लेषण करो!”


 “मृत्यु-दर की तालिका किसने मेज़ से उठाई?” - - : “मैंने, बरीस कार्लोविच, मुझे रिग्रेशन मॉडेल पर कुछ आपत्तियाँ हैं - - :” 

इस तरह हमारे यहाँ बातें करते थे; इस तरह हमारे यहाँ बातें करते हैं. 

याद है - - : “आप लोग वहाँ क्या करते हो?” - - : रात को, बिस्तर में, मूखिन की आश्चर्यचकित बीबी ने पति से पूछा, और मूखिन ने, मुझे याद है, उसे सब समझाया, कुछ भी नहीं छुपाया, मगर उसकी बात समझ में नहीं आई. 

ग़ायब होने से पहले वह ख़ुद फ़िश-समोसों की पसन्द का पैकिंग के वज़न और डेट ऑफ़ एक्स्पायरी के अनुसार इंटरब्लॉक विश्लेषण कर रहा था. इनरब्लॉक विश्लेषण - - : उनके फ़ेक्टोरियल एक्सपेरिमेंट के आधार पर - - : मैं पहले ही कर चुका था. आजकल सारे डेटा कपितोनव को भेज दिए जाते हैं, मगर मुझे विश्वास नहीं है, कि वह समय पर रिपोर्ट तैयार कर लेगा. कपितोनव बेहद लापरवाह हो गया है, काम उसे बोझ लगने लगा है; वह ‘सूटकेस-मूड़’ में है - - : नीना, कपितोनव  की बीबी, को मॉस्को में काम का ‘ऑफ़र’ आया है - - : कपितोनव अटैचमेन्ट की तरह जाएगा. 

जहाँ तक एंथ्रोपोमेट्रिक खोजों का प्रश्न है, वह मेरा विषय नहीं है, उस पर एक बहुत बड़े प्रतिष्ठान की आपराधिक प्रयोगशाला के आदेश पर उदाल्त्सोव काम कर रहा है. वहाँ कोई लोम्ब्रोज़ो के विचारों पर एक शोध-प्रबन्ध लिख रहा था, हालाँकि, मैं वाक़ई में इस बारे में कुछ नहीं समझता, और ना ही समझना चाहता हूँ - - : मेरे लिए इतना ही बहुत है कि उस मोटी फ़ाइल में, जिसे अलीना देख रही है, कई अन्य फ़ोटोग्राफ़्स के बीच एक नौजवान हत्यारे की भी फ़ोटो पड़ी है, जो जवानी के बेहतरीन दिनों के मूखिन से मिलती-जुलती है. आम तौर से हमारे यहाँ लोग दूसरों के काम में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं. फ़िश-समोसों की माँग में व्यस्त रहने के कारण मैं, शायद, कभी भी चेहरे के अनुपातों के सूचकांकों, और कुछ विशिष्ठ बातों जैसे नाक के ऊपरी और नाक के नीचे वाले बिन्दुओं के बारे में, और जिस बात से आजकल उदाल्त्सोव परेशान है, उसका अता-पता भी नहीं जान पाता, अगर अलीना मूखिन को चिढ़ाने के मूड में न होती - - : वह प्रसंग याद है मुझे - - : वह मेज़ के पीछे बैठी थी, जो मेरी, मगर पहले मूखिन की मेज़ के सामने है, और उसने पूछा - - : तब तक के मूखिन से (मुझसे नहीं): “कन्स्तान्तीन अन्द्रेयेविच, क्या आपको कभी सौतेले बाप को मारने की इच्छा नहीं हुई?” - - : “मेरा कोई सौतेला बाप नहीं था (मूखिन ने चौंककर सारिणी से नज़र हटाते हुए जवाब दिया). ऐसा अजीब सवाल क्यों पूछ रही हो?” - - : “वो इसलिए, कि ये नौजवान आपसे काफ़ी मिलता-जुलता है. उसने सौतेले बाप को मार डाला”. उसने नौजवान की फ़ोटो दिखाई - - : उस शोधकर्ता की फ़ाईल से. वह ये तो नहीं जान सकती थी कि जवानी में मूखिन कैसा था; उसे ये समानता ज़बर्दस्ती थोपी हुई प्रतीत हुई; ये मज़ाक उसे अच्छा नहीं लगा. उसने पूछा - - : “क्या आँखों के बीच की दूरी नापी है?” - - : “वह भी शामिल है” (अलीना ने कहा).


लगता है, कि मैं इस बारे में पहले ही लिख चुका हूँ. हाँ, ये उसी दिन हुआ था, जब मूखिन देरी से हुए मेरे आत्मज्ञान के पश्चात्, मूखिन नहीं रह गया, और मैं बन गया. उस दिन की घटनाएँ मुझे निरंतर परेशान करती हैं, जिन्हें, मानना पड़ेगा, कि खींच-तान कर ही घटनाएँ कहा जा सकता है. 


आसान शब्दों में कहूँ तो, उदाल्त्सोव कई अन्य विषयों पर भी काम कर रहा था, इसलिए वह असिस्टेंट अलीना को जल्दी करने के लिए नहीं कह रहा था, जो पूरे पूरे दिन सभी संभावित अपराधियों की तस्वीरों के पीछे स्केल और कम्पास लेकर डोलती रहती थी. 

दूसरे शब्दों में ये सही नहीं है कि हम बेवकूफ़ी भरा काम करते हैं, और किसी को भी हमारी रिसर्च की ज़रूरत नहीं है. साल भर पहले मूखिन भी ऐसा ही सोचता था - - : कि उनकी ज़रूरत नहीं है, मगर बाद में अलग तरह से सोचने लगा. आजकल हमारा काम ख़ूब फल-फूल रहा है. हम फ़ैशन में आ गए हैं. हमारे ग्राहकों में मेडिकल और बिज़नेस इन्स्टीट्यूशन्स हैं, राजनीतिक संगठन हैं, जो प्रशासकीय अधिकारियों के चुनावों में काम करते हैं, शिपिंग-उद्योग, कन्फ़ेक्शनरी फ़ैक्टरी, पोल्ट्री-कॉम्प्लेक्स, शहरी प्रशासन की अनेक कमिटियाँ, जिनमें प्रमुख हैं शिक्षा-कमिटी. हमारे पार्टनर्स हैं - - : पब्लिक-ओपिनियन का अध्ययन करने वाली प्रमुख एजेन्सियाँ; हमारी सफ़लता को प्रमाणित करने वाले सर्टिफ़िकेट्स प्रमुख के कमरे में टंगे हैं. }}}

       

{{{ मूखिन की बीबी को यक़ीन है कि हाथ बाथरूम में धोना चाहिए, और बर्तन किचन में. जहाँ तक बर्तनों को किचन में धोने का सवाल है, इसमें मूखिन को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, मगर हाथों को धोने पर लगी पाबन्दियों का वह पूरी ताक़त से विरोध करता था. उसने किचन में हाथ न धोने से न सिर्फ इनकार किया, बल्कि बर्तनों को धोने के साधनों से हाथ धोने पर लगे प्रतिबन्ध को भी समझना नहीं चाहा, ख़ास तौर से जब साधारण साबुन सिद्धांतवश किचन की सिंक पर नज़र न आता. मैं अक्सर सोचता हूँ कि लगातार नियम तोड़कर वह साबित क्या करना चाहता था, – उसे नतीजा मिल ही गया.


मूखिन की बीबी ने पति को सुधारने की उम्मीद नहीं छोड़ी.

ग्यारह साल तक ये “रीमेकिंग” की, ‘रीफिनिशिंग’ की, “रीशेविंग” की, “रीफ़ोर्जिंग” की प्रक्रिया चलती रही - - : और परिणाम स्वरूप, हमारा परिणाम रहा - - : बिल्कुल ज़ीरो.

मूखिन होते हुए मैं अपनी आदतें नहीं बदलता. अपने ऊपर आग झेल लेता हूँ.


कोई बात नहीं, बर्दाश्त कर लूंगा!


अंत में, अपने आप को याद दिलाता हूँ कि बीबी वह मेरी नहीं है, बल्कि बीबी, मोटे तौर पर, कन्स्तान्तिन मूखिन की है, और मुझे बर्दाश्त करने की कोई ज़रूरत नहीं है, या, सही कहूँ तो, ज़रूरी है, बेशक, मूखिन की तरह - - : बर्दाश्त करना, मगर वैसे नहीं जैसे मूखिन करता, अगर वो मैं नहीं होता, मगर मूखिन ने ये बर्दाश्त कैसे कर लिया - - : ग्यारह साल? - - : दिमाग़ चकरा गया है.


मैंने हाथ धो लिए, और वो भी बाथरूम में नहीं - - : किचन में. इसके अलावा मैंने उस सब का इस्तेमाल कर लिया, जो सिंक पर था - - : बर्तन धोने के केमिकल से - - : न कि उस साबुन से जो बाथरूम में था! उससे भी बुरा काम ये किया कि हाथ भी मैंने बर्तनों वाले तौलिए से पोंछ लिए - - : और वो भी मूखिन की बीबी की आँखों के सामने!

 

“कोस्त्या” (कड़ी आवाज़ में बीबी ने कहा, जैसे कि ऐसे ही होना चाहिए, मतलब, नहीं होना चाहिए था, क्योंकि मैंने तीन-तीन गुनाह किए थे).   

उसकी आवाज़ में मुझे उलाहने का बोझिलपन महसूस हुआ; और तब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ - - : 

 “कोस्त्या? क्या तुम्हें इतना यक़ीन है, कि मैं तुम्हारा कोस्त्या हूँ?” 

अंतराल ज़्यादा देर नहीं चला.  “तो फिर कौन हो?”  “हो सकता है, आज मैं कोस्त्या हूँ, बहस नहीं करूँगा, और कल मैं - - : प्रेसिडेन्ट! या - - : पड़ोसी, जो हमारे नीचे रहता है! या बूगोर्का स्टेशन वाली बार-गर्ल ओल्या! क्या तुम कल्पना नहीं कर सकतीं?” 

बेकार. कहना नहीं चाहिए था. प्रतिबन्ध लगा है. 


बीबी हाथों में प्लेट लिए जम गई.


“ये कैसा मज़ाक है?” (और मैंने देखा, कि वह डर गई है).


मैं ख़ामोश रहा - - : ज़्यादा ही बोल गया था. नहीं बोलना चाहिए था.  “कौन सी ओल्या - बार-गर्ल,  कौन सा प्रेसिडेन्ट” ( बीबी बड़बड़ाई).  “ज़्याब्लिक 24 (मूखिन हमेशा उसे ज़्याब्लिक कहता था) - - : ज़्याब्लिक, मेरी प्यारी, मुझे कभी भी न उकसाना 


02.30


अलग तरह का सच कहने के लिए” (और मैंने ऊँगली से ऊपर की ओर इशारा किया, सच के स्तर की ओर इशारा करते हुए, उच्चतम स्तर की ओर). 

    मेज़ से उठकर, हाथ के इशारे से आज्ञा दी, कि कोई सवाल न पूछे; अपने कमरे में चला गया.


अपने कमरे में दीवान पर लेट गया; अख़बार लिया. कैलिफ़ोर्निया में एक भूतपूर्व जज को गवाही के दौरान सार्वजनिक हस्तमैथुन करने के लिए एक साल के कारावास और दस हज़ार का जुर्माना देने की सज़ा सुनाई गई. उसने मेज़ के नीचे फ़िट किए गए एक विशेष उपकरण का प्रयोग किया था. उसकी विशेष आवाज़ ने आरोपी का पर्दाफ़ाश किया. 

सोचने की कोशिश करता हूँ; कल्पनाशक्ति कम पड़ रही है. 

वह मेरे पास आई. 

 “मुझे डराओ मत, कोस्तेन्का, मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे साथ कुछ ठीक नहीं है. जैसे कि तुम अपने नहीं हो”. 

झूठ बोल रही है. मैं अपना नहीं हूँ, ये वह देख नहीं सकती - - : क्योंकि मैं, बेशक, अपना हूँ - - : और मूखिन के समान हूँ.  “क्या ये तुम ही हो?”  ओह! उसकी नज़र बड़ी पैनी है. मगर, मैंने ख़ुद ही तो उसके सामने स्वीकार किया था. क्या समझ गई है?       

और इससे मुझे क्या हासिल हुआ? कुछ भी हासिल नहीं हुआ.

मैंने बात पलट दी - - : ”सब ठीक है”(चेहरे पर मुस्कान लाते हुए हौले से कहा). 

बालों में हाथ फेरते हुए, उसने मेरा सिर सहलाया. मैंने आँखें बन्द कर लीं; मैं घुरघुराने लगा - - : घुर्र घुर्र घुर्र. मूखिन पर दया आ रही है. बिल्कुल बेवकूफ़ है.}}}


{{{ तो, अख़बार रखकर, मैं दीवान पर लेट गया, बगल में बीबी बैठी थी; मेरा माथा, जिसे वह अपनी गर्माहटभरी हथेलियों से सहला रही थी, सीधा होने लगा, हो सकता है, बल पड़े हों. मैंने उसके चेहरे की ओर देखा - - : उसकी आँखों से भय छलक रहा था. उसे डराकर मैं भी खूब डर गया था; ये बहुत ख़तरनाक है - - : फ़ालतू बातें बक जाना, विशेषकर मेरी परिस्थिति में. डर है कि मुझे इसकी क़ैफ़ियत देनी पड़ेगी - - : उसके सामने नहीं - - : और उसे भी नहीं - - : और इसी पल भी नहीं. 

ग़ौर करना पड़ेगा, कि मूखिन की बीबी - - : एक आकर्षक औरत है. 

इस वाक्य को समझने की कोशिश करते हैं. उसका विश्लेषण किया जाना चाहिए. 

दूसरे भाग से शुरू करते हैं. मूखिन की बीबी -- : आकर्षक औरत है. ठीक, ऐसा ही है. उसे ख़ूबसूरत कहने से मैं बचता. मैं कलाकार नहीं हूँ, मगर मुझे मालूम है कि ख़ूबसूरती का पैमाना क्या है - - : कानों के सिरे आँखों के कोनों की सीध में होने चाहिए, और उनकी लौ नाक के निचले हिस्से के अनुरूप होना चाहिए. मूखिन की बीबी के या तो कान आवश्यकता से ज़्यादा ऊँचे हैं, या फिर नाक कुछ ज़्यादा नीचे है. शायद, इसीलिए वह लम्बी बालियाँ पहनती है. वे उस पर वाक़ई में जँचती हैं. मुझे ऐसा भी लगता है, कि उसका माथा नाक के बांसे तक निहायता नर्मी से उतरता है, जिससे, अगर उसके चेहरे को एक ओर से देखें, तो वह आगे की ओर उभरा हुआ प्रतीत होता है. अगर मूखिन अपनी बीबी की अत्यंत रियलिस्टिक पद्धति से बनाई गई तस्वीर देखता, और अगर वह नहीं जानता कि ये उसकी बीबी है, तो वह फ़ैसला करता - - : किसी अन्य दर्शक ही की तरह - - : कि - - : कलाकार जो कोई भी है - - : वह, पहली बात, मॉडेल के प्रति उदासीन नहीं है, क्योंकि बेजान - ठण्ड़ी नाक के साथ उसकी अप्रत्याशित सेक्स-अपील को प्रदर्शित करना असंभव होता, और दूसरी बात, रियलिस्ट से इस बात की न्यूनतम अपेक्षा है, क्योंकि वह स्वयँ को हल्के से बेतुकेपन की इजाज़त देकर एक सनकी झलक प्रकट करता है. सामान्य अनुपातों से ये साधारण से विचलन मूखिन की बीबी को एक विशिष्ठ लुभावनापन प्रदान करते हैं; उसे, जैसा कि मैंने कहा, आकर्षक बनाते हैं. एकदम सही शब्द है. वह आकर्षित करती है, और कोई चीज़ उसकी ओर खींचती है, उसके साथ आकर्षण को महसूस करना बिल्कुल आसान है. मतलब, मैं कहना चाहता हूँ - - : उसके प्रति आकर्षण. 


अब वो, जो उस वाक्य के पहले भाग से संबंधित है. मैंने कहा  - - : ग़ौर करना पड़ेगा. पहले शब्द पर ज़ोर देता हूँ. ग़ौर करना. आकर्षण, जिसके बारे में अभी-अभी बात हो रही थी, उसके आकर्षण को मेरे द्वारा ग़ौर किया जाना बन्द हो गया है, और अधिक स्पष्ट कहूँ तो, वाक़ई में, मूखिन द्वारा पहले ही ग़ौर किया जाना बन्द हो गया था, मैंने तो, वैसे, ये बात नहीं है कि ग़ौर करना बन्द कर दिया है, बल्कि मुझे तो वो ख़ुशनसीब मौका मिला ही नहीं कि उस बात पर ग़ौर कर सकूँ, जिस पर, मूखिन होने के कारण, कब से मूखिन ने गौर करना बन्द कर दिया था - - : उसकी बीबी का आकर्षण. दूसरे शब्दों में, मूखिन की बीबी का आकर्षण मूखिन के लिए अनजाने ही उसके द्वारा ग़ौर किया जाना बन्द हो गया, जिस पर मेरे द्वारा अभी-अभी ग़ौर किया गया है, यह अंश लिखते समय. मूखिन को समझा जा सकता है, ग्यारह साल साथ रहते-रहते काफ़ी कुछ पर, शायद, प्रत्यक्ष पर भी ग़ौर किया जाना बन्द हो जाता है; और मेरे लिए भी, जो मूखिन बन गया है, अगर मेरी मूखिनियत की (ये शब्द मैंने कुछ समय बाद मेरे संशोधक से सुना और जिसकी आश्चर्यजनक सटीकता के कारण मैं उसे इस्तेमाल करने से नहीं रह सकता) अल्पावधि पर ध्यान दिया जाए, ये समझना मुश्किल नहीं है. उनके असहज विवाहित जीवन के ग्यारह सालों के अनुभव को मेरे द्वारा चुपचाप स्वीकार कर लिया गया था. एक साथ रहना उनके लिए अच्छा था या बुरा था, विगत को तो मैं बदल नहीं सकता, वह भी दूसरों के विगत को.                               

तो ये मतलब है “ग़ौर करना पड़ेगा” से. और मैंने ग़ौर किया, मैंने वह ग़ौर किया, जिस पर मूखिन ने किसी समय ग़ौर करना बन्द कर दिया था - - : उसका ख़ामोश लुभावनापन, उसके आड़े-टेढ़े दांतों का आकर्षण, दिल को छू लेने वाला नाक का तीखापन, प्यारी कोमलता, उसकी स्नेहिल हथेलियाँ. बेशक, उसने तय कर लिया था, कि मैं पागल हो गया हूँ, और, अब दीवान पर लेटे मुझ पर दया करते हुए, अचानक उमड़ आई कोमलता से मेरा माथा सहला रही है, और मैं, जिसका माथा वह सहला रही है, मैं भी प्रत्युत्तर स्वरूप उस पर अधिकाधिक दया कर रहा हूँ, क्रमशः बढ़ती हुई तीव्रता से, क्योंकि ये सोचना ही कैसा लगता है कि तुम्हारा पति पूरी तरह पागल हो गया है? मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराया, जैसे, सब ठीक हो जाएगा, और वह आँखों के कोनों से मेरी ओर देखकर मुस्कुराई. शायद, उसने मूखिन के लिए मुझे माफ़ कर दिया? मूखिन को माफ़ कर दिया - - : मुझमें? मुझमें अपने मूखिन से बिदा ले ली? सब संभव है. मैं चुपके-चुपके मूखिन से नफ़रत कर रहा था. अधिकाधिक. मूखिन बेवकूफ़ था, ईडियट था. मुझे मूखिन पर दया नहीं आ रही थी; मुझे अपने आप पर दया आ रही थी, जो मूखिन बन गया था. मूखिन की बीबी के प्रति मेरी दया, जो उसकी मेरे प्रति दया में परावर्तित हो रही थी, फिर से मुझमें मेरे ही प्रति दया के रूप में प्रतिबिंबित हो रही थी, मगर इसका मूखिन से कोई संबंध नहीं था.

                    उस समय से, जब से मेरे द्वारा मूखिन प्रतिस्थापित किया गया था, मैंने एक भी बार उसकी बीबी की तरफ़ ‘सेक्स-ऑब्जेक्ट’ की तरह नहीं देखा था. मूखिन को कुछ समय से - - : महीने, डेढ़, दो महीने से - - : बीबी के साथ प्रॉब्लेम्स थीं. और बीबी के साथ की इन प्रॉब्लेम्स को मूखिन से विरासत में मैंने पाया था! उनमें कुछ बेबनाव सा था. ये समय नहीं है उस पर बहस करने का. क्योंकि इस समय, मतलब, तब, दीवान पर पड़े-पड़े एक आश्चर्यजनक ख़याल मेरे दिमाग़ में आया - - : क्यों न इस मूखिन पर बीबी की बेवफ़ाई का ठप्पा लगाया जाए? - - : सीधे वहीं और सीधे तभी! मतलब यहाँ और अभी. मतलब - - : फिर भी  - - : तब.

उसके बदन पर गहरा नीला गाऊन था, जिसमें वह दीवान पर लेटे हुए मेरे पास आई; किसी अजीब से साबुन की हल्की ख़ुशबू में मैंने बहुत स्पष्ट संदेश सुना:  “समझौता और तत्परता”. 

मैं देर क्यों कर रहा हूँ? मूखिन पर बीबी के व्यभिचार का ठप्पा - - : इस विचार मात्र से पल भर ही में मैं सुलग उठा. मेरे भीतर वासना हिलोरें ले रही थी. उसकी बगल में बैठकर, एक पल में मैंने उसे अपनी बांहों में लेकर और होठों की ताक़त से उसके होठों पर हमला कर दिया. मेरे लिए आकस्मिकता ये थी, कि उसके लिए ये आकस्मिकता नहीं थी, हालाँकि, शायद, उसके लिए मेरी ये आकस्मिकता आकस्मिक थी. मगर आश्चर्य मुझे सिर्फ पल भर को हुआ, जब मैंने महसूस किया कि कितने आवेग से वह मुझे प्रतिसाद दे रही है - - : जैसे कभी भी मूखिन को नहीं दिया होगा! सामने से - - : इस शब्द में सुनाई देता है “मुँह” - - : हमारे मुँह एक दूसरे से मिल गए, ज़बानें संघर्षरत हो गईं, और, अगर उनके पास, हमारी ज़बानों के पास, कोई जननांग होते, तो शक की गुंजाइश नहीं, कि ज़बानें हमसे पहले एक हो जातीं - - : हमें एक दूसरे की ऐसी ख़्वाहिश हो रही थी. हमने अपने आपको स्प्रिंग बॉक्स पर नहीं, बल्कि फ़र्श पर गिरा लिया - - : मूखिन के साथ ऐसा नहीं होता था. ये मैंने उसे गिराया था. उसी तरह फ़र्श पर लुढ़कते हुए अनावृत हो गए - - : तैश भरी छीना-झपटी में, ये समझे बगैर कि कौन किसके कपड़े खींच रहा है - - : अपने, या दूसरे के, ख़ैर - - : उसके बदन पर तो सिर्फ गाऊन था; कपड़े तो मैंने पहने हुए थे. मैं वह सब जानता था, जो मूखिन जानता था, मूखिन की बीबी के बारे में. वह सब जो मूखिन की बीबी के बारे में मूखिन जानता था, मूखिन की बीबी के बारे में मैं जानता था. ये दूसरी बात है कि, मूखिन कितना जानता था. वह सोचता था कि काफ़ी जानता है. विशेषतः जिस्म के बारे में - - : उसके. हम दोनों ही कह सकते थे, मगर मैं सिर्फ अपने बारे में कहूँगा - - : मैं, न कि हम, मैं उसके जिस्म को अपने ख़ुद के जिस्म से ज़्यादा अच्छी तरह जानता था, और ये बिल्कुल सच है.  जैसे कि, अवलोकन के अभाव में मैं इस बात की धुंधली सी ही कल्पना कर सकता हूँ, कि मेरी पीठ कैसी दिखती है, मेरी स्कंधास्थियाँ कैसी नज़र आती हैं, आख़िर है वही पिछली बाज़ू, मगर, मैं कोई नार्सिसिस्ट25 नहीं हूँ और दुहरे आईनों का इस्तेमाल नहीं करता, मगर अब सामने नज़र आती उसकी लचीली पीठ, स्पष्ट रीढ़ की हड्डी, उसकी नुकीली स्कंधास्थियाँ और सामान्य तौर पर किसी चित्र की विशेषताओं जैसी ये सारी चीज़ें, पीछे से, किनारे से, सामने से - - : स्मृति में साफ़-साफ़ और हमेशा के लिए अंकित हो गई हैं, सूक्ष्म विवरणों सहित. पिछले सालों में, जब मूखिन ज़्यादा उत्सुक था, और वह कुछ ज़्यादा मेहेरबान, और, हो सकता है, आत्मविश्वास से परिपूर्ण, वह उसे किन्हीं परिस्थितियों में अपने बाह्य स्वरूप के कुछ सजीव और संवेदनशील अंगों को देखने की इजाज़त दे देती थी. मैग्निफ़ायिंग-ग्लास तक तो बात नहीं पहुँचती थी. मगर उसे सूक्ष्म विवरण में ही दिलचस्पी थी - - : नाभि के पास कोई तिल, कोई पतला बाल, कोई गढ़ा, कोई गहराई. ये मैं इसलिए बता रहा हूँ, कि अपने ज्ञान की मात्रा प्रदर्शित कर सकूँ. मगर इस समय, मूखिन की बीबी की नग्नता को मैं उसके पति की नज़र से नहीं देखना चाहता था. और देखने की फ़ुर्सत भी नहीं थी! जो देखा, सो देखा - - : पराई, और अपने परायेपन से अनजान ही सही, बीबी को. तेरी यही सज़ा है, मूखिन, अच्छा मज़ा चखाया! हम अत्यंत आवेग से एक हो गए. मैं मूखिन जैसा नहीं करना चाहता था, किसी भी बात से मैं उसे मूखिन की याद नहीं दिलाना चाहता था, और, मेरे ख़याल से, वह मूखिन के बारे में भूल गई, हाँ, हाँ, मुझे पूरा यक़ीन है! अगर कभी कोई, कहीं इसकी फ़िल्म बनाना चाहे, तो वह फूहड़ पोर्नोग्राफी की शूटिंग कर सकता है. मैं बस गुरगुराया नहीं. और, उसके पास, चिल्लाने के लिए आवाज़ ही नहीं थी! मूखिन सही था, जब पिछले कुछ सालों से उसे बीबी पर इस बात का संदेह था कि वह चीख़कर कामोत्तेजना का दिखावा करती है. ये है असली कामोत्तेजना! गूंगी, बेआवाज़!

जब आँखें खोलीं, तो मेरी ओर इस तरह देखा, जैसे पहली बार देख रही हो.  “और मैं ये समझ बैठी थी, कि अब ये नहीं होगा - - : ”

मगर मैंने कहा - - :

 “बेवफ़ा”.

 “मतलब?” (उसने पूछा). मतलब मैं समझाने नहीं बैठा. }}}


{{{ चाहता था कि मैं ग़लत होऊँ, मगर, लगता है कि किसी के द्वारा धनु-कोष्ठकों को खोलने की कोशिश की गई थी. किन्हीं ठोस सबूतों के आधार पर नहीं कह रहा हूँ, मगर मुझे - - : महसूस करवाया गया है.


शायद इसी संबंध में, मगर मैं कपितोन26 और रिज़ोनेन्ट एक्सेसेज़ (अनुनादी अधिकताओं) के बारे में सोचने लगा. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इस तरह की घटना को कह सकते हैं “हद से बढ़ जाना”, मगर प्रस्तुत घटना के संदर्भ में ज़्यादा उचित होगा - - : फिर वही रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में - - : मुझे सूझता है शब्द - “बाउन्स”.


कपितोनव  और मूखिन लम्बे समय तक दोस्त रहे; मगर पहले का मरीना रोमानोव्ना से, मूखिन की भावी पत्नी से, काफ़ी पहले परिचय हो चुका था, दूसरे के मुक़ाबले में - - : बस, इसी संदर्भ में वह पहला था. पता नहीं, कि क्या मूखिन भी ऐसा ही सोचता था, मगर व्यक्तिगत रूप से मैं, जिसने मूखिन को प्रतिस्थापित किया है, कपितोन को एक साधारण औसत दर्जे का मानता हूँ, हालाँकि, बहस नहीं करूँगा, मैं मूखिन की अपेक्षा कपितोन को कम जानता हूँ. दो अंकों वाली संख्याओं के स्तर पे ‘अनुनादी अधिकताएँ’, पता नहीं मस्तिष्क की कौन सी उपलब्धि है - - : मतलब, मस्तिष्क - - : औसत दर्जे का क्यों नहीं हो सकता? मगर फिर भी, अचरज की बात है - - : कपितोन अपने ही बाउन्सेस पर प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर सकता! ये बाउन्सेस कभी कभी जिस तरह का प्रभाव प्रत्यक्षदर्शियों पर डालते हैं, उसे उनके प्रदर्शन से उस हद तक नहीं समझाया जा सकता, जितना, मेरी नज़र में, कपितोन की सहजता से.


कहते हैं - - : उदाल्त्सोव से मालूम हुआ - - : कपितोन में बेहद मानसिक तनाव के कारण इसका पता चला, जब उसकी छह साल की बेटी नदी में लगभग डूब ही गई थी - - : व्यक्तिगत रूप से मूखिन को तफ़सील में कोई दिलचस्पी नहीं थी; मगर मुझे, यदि ये कोई मिथक नहीं है, तो, फिर भी इस मिथक की घिसी-पिटी बात परेशान करती है - - : मानसिक तनाव, बिजली गिरना और ऐसा ही बहुत कुछ. 


अपने आपको कपितोन की जगह पे रखता हूँ - - : दो अंकों वाली संख्याओं के स्तर पर उत्पन्न होने वाली अपनी ‘रिए’ (यहाँ रिज़ोनेन्ट एक्सेसेज़ - अनुनादी अधिकताओं - से तात्पर्य है – अनु. ) के साथ मैं क्या करता? क्या इसे आकस्मिक पुरस्कार समझता सर्वोच्च शक्तियों का, जो मेरी समझ से परे हैं? या इसे किसी बीमारी का लक्षण समझता, जिसका रहस्यमय और विनाशक स्वरूप अभी तक प्रकट नहीं हुआ है? क्या इसमें अस्तित्व की विफ़लता को देखता - - : वैचारिक-विस्तार को देखता? क्या इसे अत्यंत जटिल और मुझसे छिपे हुए उपकरणों के आरंभिक प्रस्तुतिकरण का एक तत्व समझता, जिसके बारे में मुझे न कोई निर्देश, न कोई तकनीकी जानकारी, न ही किसी संबंधित उद्देश्य की रूपरेखा दी गई है? अपने आप से कुछ नहीं छुपाऊँगा - - : मुझे इन सवालों के जवाब मालूम नहीं हैं. 

ये सोचना ख़तरनाक है कि मैं कपितोन से ईर्ष्या करता हूँ. मुझे मालूम है कि ऐसा कोई भी नहीं सोचता, मगर ऐसा सोचना ख़तरनाक है. दुर्भाग्य से, कपितोन के मॉस्को चले जाने के बाद अस्पष्टता का कोहरा और गहरा जाएगा. 


और एक बात - - : जिसके बारे में अभी सोच रहा था - - : और वाक़ई में - - : मूखिन ही क्यों? मुझे मूखिन को ही प्रतिस्थापित करने के लिए क्यों कहा गया, किसी और को नहीं, मिसाल के तौर पर, उसी कपितोनव  को नहीं?


 ये सिर्फ सवाल है; मगर बेहद दिलचस्प सवाल. }}} 


{{{ जिसका ख़तरा था, वही हुआ - - : संशोधक ने मूर्त रूप धारण कर लिया. 

ये तो अच्छा हुआ, कि वह मुझे ‘दयालु रूप’ में नज़र आया - - : दृश्य रूप में नहीं - - : शब्द-रूप में. बस, उतना ही.

उसी रात, किचन की ओर जाते हुए (पानी पीने का मन हुआ) दरवाज़े के किनारे से बुरी तरह टकरा गया. मैंने कुछ कहा तो नहीं, मगर न जाने क्यों सोचने लगा - - : “किसलिए?” इस तरह नहीं सोचना चाहिए. सोचना इस तरह नहीं चाहिए. फ़ौरन जवाब मिल गया, और ख़ास बात ये थी - - : ख़यालों में - - : 

  “मरीचिकाओं और चौकीदारों के लिए”. 

डर के मारे मैं जम गया. मैं जान गया कि कि ये किसकी आवाज़ है. हालाँक़ि नहीं भी जानता था, कि ये क्यों जानता हूँ.                               

 हो सकता है, वह सोच रहा हो, कि मैं फ़ौरन बात शुरू करूँगा? नहीं, मैं ख़ामोश रहा. मेरी ख़ामोशी से स्पष्टतः अप्रसन्न, उसने आज्ञा दी कि मैं बाथरूम में जाऊँ.

अपने अपराध का मुझे आभास था, इसलिए मैंने बात मान ली. उसने मांग की कि दरवाज़े को बोल्ट लगाकर बन्द कर दूँ. बन्द कर दिया. थोड़ी देर तक कुछ नहीं हुआ. मैं बाथ-टब के किनारे पर बैठा था. मुझे एक मिनट से कम ही इंतज़ार करना पड़ा. बल्ब के सामने एक छोटा सा कीड़ा बेआवाज़ घूम रहा था - - : बकेट में गंदे कपड़ों के होने का सबूत. मैंने अपने आपको आईने में देखा, मैं अपने जैसा ही था - - : मतलब मूखिन जैसा. कीड़े का ख़याल आ गया : “जैसे पतंगा.” मुझे लगा कि वह चला गया है. मैंने पूछा - - : 

 “बस?” 

और तब शुरूआत हो गई - - :  “ मैं यहाँ इसलिए नहीं आया हूँ कि तुम्हें बाथ-रूम में बन्द कर दूँ. मैं यहाँ इसलिए आया हूँ कि तुम्हें नियमों के पालन की ज़रूरत के बारे में आगाह कर दूँ. तुम, शायद, नहीं समझे, कि ये गंभीर बात है. तो, जान लो. तुमने उसका उल्लंघन किया है, जिसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए. तुम दोषी हो. तुम, ऐसे दोषी हो, जैसा कोई नहीं है”.

चुप हो गया. मुझे जवाब देना है. मगर, मैं तो जानता था, मुझे याद दिलाई जाती है - - : जैसे कि हाल ही में बीबी से हुई बातचीत में मैंने न जाने क्यों स्वीकार कर लिया था कि मैं कोई मूखिन-वूखिन नहीं हूँ. सिर्फ इसी एक बात के लिए मेरी हत्या की जा सकती थी. मगर मैंने अपनी मूर्तता के आयाम के बारे में इशारा तो कर दिया था - - : स्टेशन के रिफ्रेशमेन्ट रूम की परिचारिका से लेकर देश के प्रमुख तक. मैं दोषी था.  “मैं दोषी हूँ” (मैंने अपना गुनाह क़ुबूल कर लिया).  “दोषी? तुम्हारी स्वीकारोक्ति से क्या हासिल होगा? और प्लीज़, लाइट बन्द कर दो”. 

 “हाँ, ये ज़्यादा अच्छा रहेगा” (मैंने लाइट बन्द कर दी).

अंधेरे में उसकी आवाज़ - - : अगर इसे किसी मनुष्य की आवाज़ कहा जाए तो - - : और ज़्यादा गूँजने लगी.  “तुम्हारी भूल सुधारना मेरा कर्तव्य है. याद दिलाता हूँ - - : तुम्हारे गतिमार्ग का हर बिन्दु, तुम्हारे अस्तित्व का हर पल पूरी तरह स्कैन किया जाता है. तुम्हारा काम है, हर बात में मूखिन के समान बनो, जैसा कि प्रकृति उसे जानती थी और जानती है. तुम अपने बारे में चाहे जो सोचो, हमें सिर्फ मूखिन में दिलचस्पी है, न कि तुममें. फिर से कहता हूँ, उसके जैसे बनो”.

अपने विचारों में मैं उससे सहमत हो गया. क्योंकि वह विचारों में ही मुझे सुन सकता था, ऊपर से मेरे दिमाग़ में - - : वह वहीं पर तो स्थित था.

 “कोई सवाल?” (मेरे भीतर पूछा गया). मैंने चैन की सांस ली. लगता है कि मुझे दोषी ठहराय गया था. मैं, मानता हूँ, कि इससे भी बुरी बात का अंदेशा था. वह सब, जो उसने मुझसे कहा, उसके बगैर भी मैं जानता था. क्या मैं नहीं जानता था कि मुझ पर दोष लगाया गया है.  “हाँ, हाँ, बहुत सारे सवाल हैं! - - : ...मूखिन ही क्यों, कोई और क्यों नहीं? कपितोनव  क्यों नहीं, कीर्कोरोव, गायक, क्यों नहीं? मूखिन किस बात में बेहतर है?”  “किसी भी बात में बेहतर नहीं है. मगर चुनाव की परिस्थितियों से तुम्हारा कोई संबंध नहीं है. चुनने का हक़ तुम्हें नहीं है. कुछ और पूछो”.

 “मूखिन मैं कुछ ही दिनों पहले बना हूँ. मूखिन से पहले मैं कौन था?”  “क्या सवाल हैं! तुम्हें इससे क्या फ़रक पड़ता है कि तुम कौन थे? और, क्या तुम थे भी? तुम्हें पूछने के लिए कुछ और नहीं है?”  “बस, यूँ ही - - : ये ऐसा मौक़ा मिला है - - : सीधे आपसे जानने का - - :”

 “लगान के बदले बछड़ा” (संशोधक ने कहा).  “???”

 “अपंग की सुबह. आसरे की खोज में, निर्वासितों की बिदाई... विस्मृत आर्टिस्ट-पेरेद्विझ्निक27 निकलाय वासिल्येविच अर्लोव. सत्यशोधक. या, तुम्हें सत्यशोधक पसन्द नहीं हैं? और : तुम आसानी से प्योत्र पित्रोविच पदमर्कोव हो सकते थे, वह पीन्स्क शहर के लड़कियों के स्कूल में सुलेख सिखाया करता था. और बोर्या गूरेविच, इंजिनीयर और उसकी पहली बीबी वलेंतीना के बारे में क्या ख़याल है?”  “पति और पत्नी - - : एक साथ?”  “एक साथ क्यों? - - : अलग अलग समय पे. जहाँ तक लिंग का प्रश्न है, वो हमारे लिए 


03.30


प्रमुख नहीं है. तुम्हारी रूपरेखा - - : विशिष्ठ मानसिक टाइप की है - - : और क्षेत्र  - - : वर्तमान में ये क्षेत्र है उत्तर-पस्चिम”.               मैं चौंक गया.  “कुछ भी याद नहीं है - - : भूतकाल से”.

 “जब हुक्म देंगे, तब याद आ जाएगा”.

अगला सवाल पूछने से पहले विचारों को संयत करना होगा - - : “क्या मुझे लम्बे समय तक मूखिन बने रहना होगा?” ”इस प्रश्न पर विचार किया जा रहा है”.

 “मैं वास्तविक मूखिन से सामना नहीं करना चाहूँगा. उम्मीद करता हूँ, कि ऐसा नहीं होगा?”

संशोधक मेरे दिमाग़ में खाँसा.  “वास्तविक मूखिन, जैसा कि तुम समझते हो, मरा नहीं है. वह अस्थाई तौर पे ग़ैर-अस्तित्वहीनता की स्थिति में है...”

 “ग़ैर - - : क्या? - - : किस स्थिति में है?”  “ग़ैर-अस्तित्वहीनता की स्थिति में. ग़ैर-अस्तित्वहीनता से घबराओ नहीं. ग़ैर-अस्तित्वहीनता ग़ैर-अस्तित्व से इस तरह अलग है, जैसे, मिसाल के लिए, तुम मूखिन से अलग हो. मगर तुमने मेरी बात काट दी. तो, तुम्हारी वैध मूखिनियत के दौरान वह पूरे समय गैर-अस्तित्वहीनता की स्थिति में रहेगा. निश्चित समय पर मूखिन तुम्हारे हाथ से छड़ी ले लेगा, जैसे कि तुमने मूखिन की रिले-रेस वाली छड़ी ले ली थी - - : सिर्फ समानता दर्शाने के लिए स्पोर्ट्स के क्षेत्र से उदाहरण दे रहा हूँ. शारीरिक निरंतरता की ग्यारंटी है, वैसे ही जैसे परस्पर उपयोग के सिद्धांत की ग्यारंटी दी गई है. मूखिन से तुम्हारा सामना - - : ये बकवास है, वो असंभव है, तुम्हें तसल्ली देता हूँ. अगर, बेशक, किन्हीं विशिष्ठ बौद्धिक हालात पर ग़ौर न किया जाए - - : ”

मैं सतर्क हो गया - - :

 “ आख़िर कैसी?”

 “ मतलब, ऐसी कि, आप बिल्कुल ही जुदा न हुए हों. इस बारे में मत सोचो. मुलाक़ात नहीं होगी”.

 “मेरा मिशन क्या है?” (संशोधक से पूछा). 

 “मूखिन होना”.

 “सिर्फ इतना ही? मुझे किसी की हत्या करने पर तो मजबूर नहीं किया जाएगा?”  “नहीं, मूखिन तो मक्खी मारने लायक भी नहीं है” (अपनी टिप्पणी पर वह हँस पड़ा).  “क्या मुझे रिपोर्ट्स लिखना होंगी?”

 “रिपोर्ट की ख़्वाहिश है! - - : ...क्या बात है! - - : ... ख़ुद ही पूछ रहा है! तुम, ब्यूरोक्रैट, दिमाग़ से ये कूड़ा निकाल दो! - - : ... समझ गए? ये कोई ‘एलिएन्स’ वाली फिल्म नहीं है! - - : ... फिर कहोगे ‘ऑर्डर्स’! - - : कहोगे ‘निर्देश’! - - : ‘ऑर्डर्स फ्रॉम स्पेस’! - - : (न जाने क्यों उसे ये ख़याल गुदगुदा गया - - : किसका ख़याल? - - : ‘ऑर्डर्स फ्रॉम स्पेस’ वाला; वह ज़ोर से हँसने लगा, मगर ये हँसी अच्छी नहीं थी). अब ये भी कहो कि तुम्हें आवाज़ें सुनाई देती हैं - - : ”

मैं समझ नहीं पाया कि क्या वह मेरी परीक्षा ले रहा है, या सिर्फ बेवकूफ़ बना रहा है.

 “मगर आप - - : क्या आप आवाज़ नहीं हैं?”

 “मैं - - : आवाज़?! अगर मैं आवाज़ हूँ, तो मामला गंभीर है. मेरी मुबारकबाद.”

 “मगर - - : मेरे दिमाग़ में - - : ”

उसने त्यौरियाँ चढ़ा लीं - - : मुझे ये भौतिक तौर पर महसूस हुआ - - : मेरे चेहरे के स्नायुओं द्वारा.  “सिर्फ दिखावा मत करो! हमें ये पसन्द नहीं है! - - : नहीं, दोस्त, नाटक मत करो, तुम पूरी तरह स्वस्थ्य हो”. 

 “इसमें कोई सन्देह नहीं, कि मैं स्वस्थ्य हूँ - - : मगर आपसे ये सुनना कुछ अजीब लग रहा है - - : ...आप तो इनकार नहीं करते हैं अपनी - - :...वास्तविकता से?”

 “क्या मेरी व्यक्तिगत राय चाहते हो? तो, सुनो, दोस्त. तुम्हारी ये सारी बातें शैतानों के साथ, हर तरह की रूहों के साथ, काले जादू वालों के साथ, डबल्स के साथ, दूतों के साथ, संदेशवाहकों के साथ - - : ...ये सब सिर्फ दिमाग़ी खेल हैं - - : ...इस तरह का साहित्य है, इस तरह का ...कहीं तुम ये तो नहीं सोच रहे हो कि हम और तुम वैसे ही डोनट्स की उम्मीद कर रहे हैं? - - : बस, ज़्यादा मा...(गाली) करने की ज़रूरत नहीं है! तुम समझ गए?”  “मगर - - : ...ये मैं नहीं हूँ - - : ...(मैं विस्मित था) - - : ये तो - - : ...अभी अभी - - : ” (‘आप’ जोड़ना चाहिए था, मगर मैंने जीभ काट ली - - : संशोधक, शायद, बातों में बहक सकता है! - - : मेरे लिए ये एक आविष्कार था).  जैसे कि डोनट्स वाली बात - - : ये किसलिए? इस बीच उसने दृढ़ता से कहा - - : 

 “तुम्हारे मुक़ाबले में मूखिन एक सम्पूर्ण व्यक्ति है; मूखिन - - :  पूर्ण है; वह एक इकाई है; मूखिन - - : टुकड़ों में नहीं बंट सकता! अगर मैं कहता हूँ ‘मूखिन होना’, तो मेरा मतलब है वाक़ई में ‘अपने जैसे रहो’. हमें चाहिए मूखिन सम्पूर्णता में, परिपूर्णता में. तुम्हारी तरफ़ से की गई कोई भी हेराफ़ेरी तुम्हारा - - : तुम समझे, किसका? - - : तुम्हारा अपराध समझा जाएगा. क्या मैंने साफ़-साफ़ समझा दिया? हमारे लिए तुम नहीं हो, है तो सिर्फ मूखिन!”

 “वाह, ऐसा कैसे! मैं हूँ, इसका ही मतलब है कि मूखिन नहीं है!”  “जानबूझ कर बेवकूफ़ मत बनो (संशोधक ने कहा). अपने आप को बहुत समझ रहे हो. तुम हो कौन? मूखिन के बिना तुम हो कौन? क्या तुम सिर्फ मैथेमेटिकल ऑपरेटर नहीं हो? क्या तुम एक समुच्चय के तत्वों के बीच की अनुकूलता नहीं हो? तुम - - : कोई नहीं हो. तुम मूखिन के बगैर नहीं हो! तुम नहीं हो, मूखिन है! तुम - - : मूखिन हो! अपने आप में रहो, मूखिन! बेवकूफ़ी मत करो! मेरी बातों को सुनो!” ”कन्स्तान्तिन! ये तुम किसके साथ बातें कर रहे हो?”  “ये कौन है?” (संशोधक उतेजित हो गया).  “घोड़ा है कोट में! (उसने मुझे ताव दिला ही दिया!) मेरी बीबी, मूखिन की बीबी!”  “आ-आ - - : ... मरीनच्का - - : ...तब ठीक है, कोई बात नहीं - - :”  “कोस्त्या, तुमने लाइट क्यों बन्द कर दी? तुम बन्द क्यों हो गए हो? तुम वहाँ कर क्या रहे हो?”   “तो, तुमने लाइट क्यों बन्द कर दी? तुम बन्द क्यों हो गए हो? तुम यहाँ कर क्या रहे हो?” ( बीबी की नकल उतारते हुए, व्यंग्य से वह मुझसे मुख़ातिब हुआ).

मुझे इसमें कोई मज़ाक नज़र नहीं आया. शायद वह भी समझ गया कि कुछ ज़्यादा ही कर रहा है - - : उसने मुझे तसल्ली देने की ठानी - - :

 “बकवास. स्टैण्डर्ड सिचुएशन. हम इसे ‘मीडियन’ कहते हैं. तुमने कभी मीडियन के बारे में सुना है?”  “त्रिकोण में - - : ...वह उसे दो भागों में बांट देती है - - :”  “नहीं. हम मीडियन को दूसरी तरह से समझते हैं. मीडियन - - : ये , मतलब, जब हम-तुम बहस कर रहे होते हैं, और कोई तीसरा, अक्सर कोई औरत, सुनती है और बेकार के निष्कर्ष निकालती है. स्टैण्डर्ड सिचुएशन, मैंने कहा. साहित्य में और फ़िल्मों में छेद हो जाने तक घिस जाना, अश्लीलता की हद तक, वहाँ डोनट्स से काम नहीं चलता”. फिर से डोनट्स के बारे में.                         

“कोस्त्या, प्लीज़, खोलो, मुझे बाथरूम में जाना है”. 

 “झूठ बोल रही है (संशोधक ने कहा). उसे कहीं नहीं जाना है”.  “बड़बड़ाना बन्द करो! (बीबी चीख़ी). मुझे डराओ मत!”  “क्या तुम बड़बड़ाते हो? (संशोधक ने पूछा). तुम, क्या किसी को डराते हो?” 

 “दरवाज़ा खोलो, मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ!”  “व्वा-व्वा, जैसे कि टेक्स्ट बुक में होता है”.  “कोस्त्या! क्या दरवाज़ा तोडना पड़ेगा, अच्छा सबक सिखाऊँगी!”  “क्या ताक़त है! (संशोधक ने कहा). कितना उत्साह है!”

मैं अपने आपको रोक न सका - - :

 “क्या बिना कमेन्ट्स के काम नहीं चल सकता?” अपने कमेन्ट्स से मुझे बेज़ार कर दिया. ये अपने आपको समझता क्या है? पराए घर में, पराए दिमाग़ में!...मैं बीबी को समझ सकता हूँ, वह परेशान हो रही है. मैं ख़ुद भी परेशान हो जाता, अगर वह बाथरूम में बन्द होकर, वहाँ किसी के साथ बातें कर रही होती. मैं यथासंभव ज़ोर से चिल्लाया:  “परेशान न हो! जल्दी फ़ारिग हो जाऊँगा!”

 ख़ामोशी छा गई. पत्नी, और वह, और मैं ख़ामोशी को टटोलते रहे. पहले वह बोला - - :  “मीडियन को कई तरह से निष्क्रिय किया जा सकता है. आवाज़ को फुसफुसाहट की हद तक कम किया जा सकता है. मोबाइल वाली बातचीत की नकल कर सकते हैं. शोर मचाने वाले इलेक्ट्रिकल उपकरण चालू कर सकते हैं, जैसे, फ़ैन. अक्सर मीडियन की ओर ध्यान न देना फ़ायदेमन्द होता है, मगर ये थोड़ा अक्लमन्दी से करना चाहिए. तुम्हारे लिए ज़्यादा से ज़्यादा ख़तरा ये है - - : मेंटल हॉस्पिटल में ले जाएँगे; वहाँ भी लोग रहते ही हैं. ये ख़ौफ़नाक नहीं है”.  “मैं पागल नहीं हूँ” (मैंने कहा). 

 “और मैंने तुमसे क्या कहा? हम अपने आप को दुहरा रहे हैं”.

 “अगर तुम पागल नहीं हो (बीबी चिल्लाई), तो फ़ौरन बाथरूम से बाहर आओ!” मैं चिल्लाया - - :

 “अभ्भी!”

 “कोई अभ्भी-वभ्भी नहीं! (संशोधक ने रोका). हमारी बात अभी ख़त्म नहीं हुई है!” मगर तभी दरवाज़ा ख़तरनाक तौर से चरमराने लगा - - : उसने नीचे से कोई चीज़ डाली थी.

 “ डरे बिना! (जल्दी से संशोधक ने कहा). टेलिफ़ोन वाला उपाय - - : चलो! शत-प्रतिशत ग्यारंटी”.  मैं समझ गया, मैं चिल्लाया - - :  “क्या तेरा ढक्कन उड़ गया है? तू क्या दरवाज़ा तोड़ने चली है? मैं टेलिफ़ोन पर बात कर रहा हूँ!...बहुत ज़रूरी बात है, और तुम हो कि डिस्टर्ब किए जा रही हो!” और हम दोनों, और दरवाज़े के पीछे बीबी - - : एकदम चुप्पी, ख़ामोश हैं, सोच रहे हैं; इंतज़ार कर रहे हैं कि ख़ामोशी को पहले कौन तोड़ेगा. मैं संशोधक की विजय को महसूस कर रहा था, निःशब्द, कानों में कुछ भी न कहने वाली...मुझे ये बेहद बुरा लग रहा था. यहाँ पर मैं चाहे जो चिल्लाऊँ, मगर मैं था तो बीबी के पक्ष में - - : बीबी ने नहीं, बल्कि इसने मुझे बाथरूम में धकेला था. 

संशोधक की आवाज़ पहले निकली, मगर बहुत धीमी. शायद, उसने ये कहा था - - :

 “ठीक है” - - : अगर मैंने ग़लत नहीं सुना. आगे - - : फुसफुसाहट से - - :  

“तुम्हारे साथ मूखिन की ख़तरनाक आदतों पर चर्चा करना चाहता हूँ, और सबसे पहले...” मरीना - - :

 “झूठ बोल रहे हो, कोस्त्या. तुम्हारा टेलिफोन तो मेज़ पर पड़ा है”. 

वह गुस्से से गुर्राया.  “ ईडियट”. (मैंने अपनी दुर्भावनपूर्ण ख़ुशी को छुपाने की कोशिश नहीं की. होशियार है. अच्छा मज़ा चखाया इसको. तभी पहली बार मैंने उन शक्तियों की अपूर्णता पर विचार किया, जिनका वह प्रतिनिधित्व करता था. धनु-कोष्ठकों के संरक्षक गुणों को मैं तब तक अच्छी तरह समझ नहीं पाया था, ये तो बाद में हुआ, मगर तब - - : मीडियन को फ़ौरन हटाना था.) अब पहल करना मेरे हाथों में था; मैंने अपना सुझाव दिया - - :

 “मैं कहूँगा कि, मैं अपना भाषण तैयार कर रहा हूँ. शनिवार को मिर्द्याख़िन की ‘जुबिली’ है - - :”  “कैसा मिर्द्याख़िन?! कैसी ‘जुबिली’?! ( संशोधक बुरी तरह तिलमिला गया). ठीक है, बस! आज के लिए इतना ही बहुत है. मैं मांग करता हूँ - - : सिग्नल दोगे”.

इस बात पर कम ही विश्वास हो रहा था, कि मैंने उसके भीतर ज़रूरत को महसूस किया हो, मगर पूछे बिना न रह सका - - :  “सिग्नल - - : वो क्या है?”

  “तुम अपना दिमाग़ लड़ाओ. याद करो, इस शल्यापिन को, रॉबिन्सन क्रूसो को - - फिर उसको - - : जिसने हवाई जहाज़ का आविष्कार किया - - : ”

 “उसका, जैसे, स्विच-ऑफ़ हो गया, मगर बिना खट् की आवाज़ किए. मैंने गहरी साँस ली; हाथ से स्विच टटोला; लाइट जल गई. मैं बाथ रूम से बाहर आया. मरीना हिचकियाँ ले-लेकर रो रही थी, हाथ में हैमर पकड़े थी.  “चोरनी – मोरनी” (मैंने आवाज़ में यथासंभव नज़ाकत लाते हुए कहा). उसकी तरफ़ बढ़ा, उसे अपनी बाँहों में लेकर गालों को चूमा. 


उसका गाल बेहद गर्म था, मानो जला रहा था. हो सकता है, मैंने सोचा, कि मेरे होंठ बेहद ठण्डे हैं. }}}     

           

{{{ आज मुझे बहुत बुरा सपना आया, जिसका संबंध मुझसे उतना नहीं, बल्कि मूखिन से था. ये बड़ी अप्रिय बात है – ऐसे सपने देखना, जो प्रकृति से, तुम्हारे न हों, और ख़ासकर, जिनका संबंध तुम्हारे अपने भूतकाल से न हो. मैं ये सपना सुनाऊँगा नहीं. सिर्फ उसकी प्रकृति के बारे में बताता हूँ - - : या ये, कि उसकी विधा के बारे में. जैसे कि मूखिन के जीवन की एक घटना से संबंधित परिकल्पना से मेरा साक्षात्कार हुआ.                        वहाँ - - : सपने में, - - : वो परिकल्पना मुझे अत्यंत विश्वसनीय प्रतीत हुई, ऐसी जिससे मैं कभी सहमत नहीं हो सकता था, जब जागा, सौभाग्यवश, मैं जाग ही गया. ख़ैर, सुबह ‘ब्यूस्टे’ पहुँच कर, कुछ विशिष्ठ प्रमाणों को ढूँढ़ते हुए, क़िस्मत ने मुझ पर मेहेरबानी कर ही दी - - : सवाल ये है, किसकी किस्मत ने - - : मेरी अथवा मूखिन की?


ये इस तरह से हुआ. लंच ब्रेक में, जब हमेशा की तरह हमारे सब लोग पास वाले फ़ास्ट-फ़ूड सेंटर की ओर गए, तो मैंने अलीना की मेज़ का चक्कर लगाया और खिड़की के पास वाली उसकी अलमारी में रखी फ़ाइल्स को टटोला. जिन फ़ाइल्स पर अलीना काम कर रही थी, उन पर कुछ इस तरह लिखा था - - : “सधे हुए अपराधी”, “लैंगिक अपराध”, “तेज़-तर्रार दिमाग़”, “पिता के हत्यारे” इत्यादि. इस वर्गीकरण ने, सौम्य शब्दों में कहूँ तो, मुझे आश्चर्यचकित किया - - : एक ही चेहरा, एक सी क़ामयाबी के साथ एकदम कई फ़ाइल्स में हो सकता है. मुझे मालूम था कि फ़ाइल्स पर ये शीर्षक अलीना ने नहीं लिखे हैं और ये भी कि वे इसी तरह से हमारे ‘ब्यूस्टे’ में संशोधन करने वाले क्लाएन्ट के यहाँ से आई थीं, इन बेकार की चीज़ों के इस वर्गीकरण के प्रति ऐसे प्यार को समझना मेरे लिए काफ़ी कठिन था. अच्छा, ठीक है. मुझे “मायावी” शीर्षक वाली फ़ाइल ने आकर्षित किया. मैंने जल्दी से उसे खोला और, पन्ने पलटते हुए ‘उसको’ ढूँढ़ने लगा. ‘उसीका’ फ़ोटो. जो मेरे जैसा है. मेरे जैसा - - : जवानी में. 



वही तो इस रात को मेरे सपने में आया था, वर्ना मैं उस फ़ाइल में नहीं घुसता. 

अलीना ने चेहरे के मापदण्डों को, अंशतः, दूरी को नापने के लिए कम्पास का प्रयोग किया था, इसलिए चेहरों के विशिष्ठ बिन्दुओं पर चुभन के निशान थे, और आँखों के बारे में तो खुलकर कहा जा सकता है कि उन्हें निकाल दिया गया था. मुझे यह अच्छा नहीं लगा.      

मैंने जल्दी से उसकी फ़ोटो ढूँढ़ ली. ये भी बाहर निकाल दी गई आँखों वाली थी.


बाहर निकाल दी गई आँखों वाले, जवानी में मेरे जैसे, उसके बारे में सोचना बहुत अप्रिय लग रहा था. 

मगर क्या वह मेरे जैसा था, ये भी एक सवाल है. इसीका जवाब देना चाहता हूँ. यही मुख्य बात थी. 

जहाँ तक चुभन के निशानों और आँखों को निकालने वाली बात है, ये आख़िरकार एक तकनीकी सवाल है, ये सीधे-साधे नापों का परिणाम है, यह बात मैं समझता था.          


मैंने उसकी ओर देखा - - : लगभग मेरे जैसा, मगर, वो मैं नहीं था. मैं ऐसा नहीं था. मगर कुछ समानता भी थी.


फ़ोटो को पलट कर देखा (हर तस्वीर के पीछे संक्षेप में लिखा गया था, कि कौन है, क्या है) - - : पेन्सिल से - - : “ईगर अलेक्सेयेविच झीलिन”, जन्म की तारीख़, जन्म स्थान और - - : “क्रूरता से सौतेले बाप को मार डाला. ‘वान्टेड’ ”.


मैं बड़ी देर तक इस इबारत को देखता रहा, मेरे ख़याल, जैसा कि इस समय कह सकता हूँ, काफ़ी उलझ गए थे; मेरी ऊँगलियों की थरथराहट के कारण इबारत एक ताल में काँप रही थी.


मैं ज़ेरोक्स मशीन के पास गया और दोनों तरफ़ से कॉपी निकाल ली. 

फ़ोटो को वापस फ़ाइल में रख दिया. फ़ाइल को उसकी जगह पर वापस रख दिया. मेज़ पर बैठ गया - - : अपनी मेज़ पर. मेरी मेज़ काँच से ढँकी है, जिसके नीचे कई तस्वीरें हैं, जिनका उससे कोई संबंध नहीं है, जो फ़िलहाल मुझे परेशान कर रहा है, बावजूद इसके, कि मेज़ पर रखे कांच के ख़तरे का मुझे पूरा एहसास है, श्रम की सुरक्षा की दृष्टि से - - : वह गठिया से पीड़ित है.

 मैंने, बेशक, काँच के नीचे उसे नहीं धकेला. काँच के बारे में मुझे ख़ुद ही पता नहीं है, किसलिए. मैंने तस्वीर मेज़ की दराज़ में रख दी - - : मेरी. मगर इससे पहले मैं बड़ी देर तक ग़ौर से उसे देखता रहा. मेरे जैसा है -- : मेरे जैसा नहीं है?

समानता है, समानता है! - - :

सबसे पहले - - : जन्म की तारीख़ और जन्म-स्थान.

मगर उपनाम मुझे याद नहीं रहा. बस इतना याद रहा कि वह बिरला था. 


मुझे ऐसा लगा, कि मुझे सपने में याद आया था (कि मुझे सपने में कुछ-तो याद आया था), मगर इस समय याद नहीं रहा. या, सिर्फ, याद करने से डर रहा था. 

तो हालत ये थी - - : मैं बार-बार तस्वीर को मेज़ की दराज़ से निकाल रहा था और ग़ौर से देख रहा था, और फिर उसे वापस रख रहा था. दुबारा निकालता और फिर से ध्यान से देखता. और फिर वापस  रख देता. 

आख़िर में मैंने सोचा - - : स्टॉप! इस सबका संबंध मूखिन से है! मैं - मूखिन नहीं हूँ!   


उसकी वजह से परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. मूखिन को, जहाँ तक मैं जानता हूँ, ख़ुद भी वे परिस्थितियाँ याद नहीं हैं, और, परिणाम स्वरूप, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह उन्हें भूल गया हो - - : मैं किसलिए मूखिन की अपेक्षा और ज़्यादा याद रखूँ? 


वाक़ई में, जब कुछ दिन पहले अलीना ने उसे तस्वीर दिखाई थी और कहा था, कि समानता ज़ाहिर है   ( हा-हा: चेहरे में?...), उस समय भी उसके  


03.30


दिमाग़ में वह बात नहीं आई, जो अभी मेरे दिमाग़ में आई है - - : और, क्या ये पूर्वाभास था या कुछ और, क्या-क्या नहीं होता? - - : वह उसी समय अदृश्य हो गया, और मैं प्रकट हो गया! ...क्या मुझे उसकी समस्याओं का हल ढूँढ़ना है?


मैं मूखिन नहीं हूँ, और इस बात से मुझे सांत्वना मिली, मगर थोड़ी ही देर के लिए.

जल्दी ही सब लोग वापस आ गए. मेरे सामने बैठकर अलीना ने पूछा - - :

 “तुम्हारी तबियत तो ठीक है? कुछ हुआ तो नहीं है?”  “मैं बिल्कुल ठीक हूँ. कुछ भी नहीं हुआ है. ये कैसे सवाल हैं, अलीना?”

उसने कहा कि मेरे चेहरे का रंग उड़ गया है. मैंने कहा कि कुछ खाया नहीं है. }}}


{{{ धनु-कोष्ठकों को खोलने की दो कोशिशें दर्ज की गई हैं. अटैक का स्त्रोत फ़िलहाल स्पष्ट नहीं हुआ है. बुधवार तक शांत रहूँगा. संभव है, कि बुधवार को एक ‘एब्स्ट्रेक्ट थीम’ पर भाषण दूँ. }}}


{{{ आप पूछते हैं कि क्या विसंगतियों पर काबू करना मुश्किल है. आपको कैसे बताऊँ. अंशतः, हाँ, मगर अंशतः, नहीं भी है; अगर सभी चीज़ों को समग्रता से लिया जाए, तो अंतिम परिणाम, निःसंदेह  पूर्णांश ही होगा. काफ़ी कुछ सहायकों पर निर्भर करता है; और भी ज़्यादा - - : उनकी बीबियों पर, और मोटे तौर से बीबियों पर, चाहे वे किसीकी भी क्यों न हों, क्योंकि मर्दों की अपेक्षा औरतों को बहुत कुछ ज़्यादा दिया गया है, मगर, यह एक नाज़ुक और काफ़ी विवादित प्रश्न है. ऊँगलियों पर समझाना मुश्किल है, मगर इससे भी ज़्यादा मुश्किल है औरों के विचारों का केन्द्र होना. ऊपर से हर विचार तो साकार नहीं किया जा सकता. हर विचार नहीं!


कल मैंने असंभाव्य घटनाओं की संभावनाओं को सशक्त करने के बारे में एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए. रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुका है, मगर फ़िलहाल अनौपचारिक तौर पर. जब फ़ल पक जाएँगे, तब उन्हें काटेंगे. फ़ल फ़ल में भी अंतर होता है, वर्ना तो वह भी हो जाता है, जो कभी हो ही नहीं सकता. }}}


03.32



पाण्डुलिपि समाप्त हो गई. कपितोनव  ने नोट-बुक बन्द कर दी. 

बाहर बर्फ़ का शोर हो रहा है, वह खड़खड़ाते हुए पानी के पाइप से नीचे जा रही है. जैसे गर्माहट हो रही है. यही है पीटरबुर्ग: दिन में माइनस ग्यारह डिग्री, रात में – गर्माहट, तापमान प्लस में. सुबह फिर से बर्फ गिरेगी, और स्केटिंग रिंग बन जाएगी. 

छत पर बूंदों का बहरा कर देने वाला शोर है.


हॉटेल में सब कुछ कब का ख़ामोश हो गया है. एक्सपर्ट–चीटर्स और अत्यंत सूक्ष्मधारी ख़ामोश हो गए थे. दीवार के पीछे काल-भक्षक ख़ामोश हो गया था. क्या समय ठहर गया है?


03.34         


साइड टेबल पर, खाली मग की बगल में, नोट बुक रखकर कपितोनव  बिस्तर पर लेट जाता है और सिर के ऊपर वाला लैम्प ‘ऑफ़’ कर देता है. 


03.35


 और इसके बाद ? – अपने आप से पूछना चाहता है (और वाक़ई में कपितोनव  अपने आप से पूछता है). 


मगर आगे क्या हुआ, इसमें क्यों दिलचस्पी हो, जबकि ज़्यादा ज़रूरी है यह प्रश्न: कि क्या ये वास्तव में हुआ था? 

कपितोनव  छत की ओर देखता है. 

पहली बात, शैली. जहाँ तक कपितोनव  को याद है, मूखिन की भाषा साधारण इन्सानी भाषा थी, असल ‘इन्सानी’ भाषा और ज़रा भी ‘इन्सानों जैसी’ नहीं. कपितोनव  ने शायद मूखिन के लिखे हुए कुछ लेख पढ़े थे, जैसे कि, उदाहरण के लिए, औरों की ही तरह मूखिन भी इंटरनेट की सोशल साइट्स पर काफ़ी लोकप्रिय था, मगर, यदि कपितोनव  को वो लेख याद नहीं हैं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि उनमें कोई अतिशयोक्ति नहीं थी. 

इस बात को मान सकते हैं कि मूखिन ने किसी साहित्यिक-फ़ैन्टेसी की कल्पना की हो – प्रथम पुरुष में, क्यों नहीं? – मगर, तब इसमें अपने जीवन की वास्तविक घटनाओं को ठूंसने की, वास्तविक नामों को ज़ाहिर करने की क्या ज़रूरत थी? अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी को ऐसे विचित्र और अवास्तविक स्वरूप में दिखाने की क्या ज़रूरत थी? और, इसमें कपितोनव  को घसीटने की क्या ज़रूरत थी, वह भी उपहासात्मक संदर्भ में? कपितोनव ने उसका क्या बिगाड़ा था?

और, सबसे प्रमुख बात “क्यों” : उसने नोट बुक में ही क्यों लिखा – हाथ से? मरीना ठीक कहती है – यही सब कम्प्यूटर पे लिखना कहीं ज़्यादा आसान होता!

‘हैण्डराइटिंग’ की बात तो छोड़ ही दीजिए. उसने क्या कहीं शुद्ध एवम् सुन्दर लेखन का कोर्स किया था? 

वैसे भी, कहीं एक भी धब्बा गिराए बिना लिखा है. 

और वैसे भी, ये सब लिखा क्यों है? मूखिन ने कागज़ पर ये क्या बकवास उतारी है? किसलिए? किसके लिए? क्या अपने आप के लिए? 


कपितोनव  के दिमाग़ में दो ही तरह के जवाब उभरते हैं:  - या तो मूखिन की गाड़ी पटरी से उतर गई थी;

 - या ...उसे वाक़ई में प्रतिस्थापित किया गया था.


अगर उसे प्रतिस्थापित किया जाता, तो सब कुछ ठीक हो जाता: ये मूखिन ने लिखा है, बिल्कुल उस वाले ने नहीं, जिसे कपितोनव  जानता था.


मगर उस हालत में स्वरूप विषय-वस्तु के अनुरूप होता. दूसरा इन्सान – उससे कुछ नहीं पूछ सकते. 


कपितोनव  बाथरूम में जाता है, शॉवर लेता है, दांत ब्रश करता है, और शेव करने लगता है (जल्दी ही सुबह होने वाली है – अभी क्यों न कर लूँ?). ये काम करते हुए, कपितोनव लगातार मूखिन के बारे में सोच रहा है.

 वह सोच रहा है कि जवाब के दो विकल्पों में ज़्यादा अंतर नहीं है. मूखिन, निःसंदेह पटरी से उतर गया था. और पटरी से उतरा हुआ मूखिन – ये, बेशक, दूसरा मूखिन था. कह सकते हैं, दूसरा व्यक्तित्व. 

कपितोनव को उम्मीद है कि नींद आ जाएगी. निरंतर निद्राहीनता के चलते तीन घण्टों की नींद भी उपहार स्वरूप होगी. मगर, वह ब्रेकफ़ास्ट भी छोड़ना नहीं चाहता. उसने मोबाइल फोन पर 7.30 का अलार्म लगाया. 

मगर अभी कितने बजे हैं? 

4.07


वह लेट जाता है. आँखें बन्द करता है और एकदम देखता है कि कई सारे धनु-कोष्ठक झाँक रहे हैं.


उसने फिर से छत पर नज़रें गड़ा दीं – बाहर से आती हुई रोशनी से प्रकाशित खिड़की के धुंधले प्रतिबिम्ब पर. या ये बाहर की तरफ़ से प्रकाशित खिड़की का प्रतिबिम्ब था, जो कपितोनव  पर नज़रें गड़ाए था?


हालाँकि खिड़की का परदा छत पर पड़ते हुए आयत को बुझा रहा है, मगर वह असली खिड़की के पीछे गिरती हुई बर्फ को प्रतिबिम्बित होने से नहीं रोक रहा है. वह टूटे-फूटे धब्बे बनाते हुए आयत की एक भुजा से दूसरी भुजा की ओर फिसल रही है – खिड़की से लगी दीवार से दरवाज़े वाली दीवार तक. कपितोनव  नज़र नहीं हटा रहा है. छत वाला आयत दूसरे आयाम में खुलते हुए तकनीकी ‘हैच’28 जैसा लग रहा है, जिसमें बाएँ से दाएँ परछाईयाँ चल रही हैं. अचानक ऐसा लगा, कि ये परछाइयाँ नहीं, बल्कि उनके सापेक्ष ख़ुद ‘हैच’ ही चल रहा है – कमरे के साथ – दाएँ से बाएँ. और वे स्थिर हैं. और उसे लगा कि पीठ के बल लेटा हुआ कपितोनव  भी पलंग और कमरे के साथ, घूम रहा है दाएँ से बाएँ, और परछाइयाँ, स्थिर धब्बों के रूप में, इस तरह घिसटती जा रही हैं, जैसे टेक-ऑफ़ करते हुए हवाई जहाज़ के खुले ‘हैच’ में बालू पर स्थिर कंकड. यह सोच कर भी डर लगता है कि कैसे तुम मुँह के बल इस ‘हैच’ में गिर रहे हो, और वहीं रह जाते हो, अचल अवकाश में अचल परछाइयों के बीच, ये जानते हुए कि पीठ के पीछे वाला ‘हैच’ कहीं बाईं ओर खिसक गया है, खाली हो चुके कमरे और तुम्हारी समूची दुनिया के साथ, जिसका कमरा पहले ही की तरह एक हिस्सा है, मगर तुम अब नहीं हो. पलंग का किनारा पकड़ने का भी मन हुआ, जिससे कि अगर अचानक विपरीत आकर्षण का बल प्रकट हो जाए, तो  उससे अलग न हो जाए और छत के धुंधले ‘हैच’ में न गिर जाए. मगर वह ऐसा नहीं करता, बल्कि सिर्फ आँखें बन्द कर लेता है.

धनु-कोष्ठक फिर से प्रकट हो गए. तब वह अपने आप को ये समझाते हुए शांत करने की कोशिश करता है, कि ये उसके व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि मूखिन के बेसिरपैर वाले नोट्स से हैं. ऐसा ही है – कोष्ठक हल्के से एक ओर को झुके हुए हैं, जो हाथ से लिखी इबारत की विशेषता है. वह फ़ैसला करता है कि उपभोक्ता की तरह उनसे पेश आएगा और वह उन्हें गिनना शुरू करता है, जैसे वे हाथी हों. एक कोष्ठक, दो कोष्ठक, तीन कोष्ठक... ग्यारह कोष्ठक...नैचुरल सिक्वेन्स – गणित की दृष्टि से बेहद सरल गिनती, क्या उन्हें फ़िबोनाची सिक्वेन्स29 में रखना ज़्यादा अच्छा होगा? समस्या ये है, कि धनु कोष्ठक हाथी नहीं हैं, और वे अप्रत्याशित रूप से प्रकट होते हैं, कभी एक, कभी जोड़े में, और समझते रहो कि कौन सा कहाँ देख रहा है. उनके अनधिकृत अवतरण से छुटकारा पाने के लिए वह उपभोग्य पदार्थ के रूप में उनका इस्तेमाल करने का विचार करता है और एक गणितीय फ़ॉर्मूला सोचने लगता है. मगर इसके लिए पहले छोटे और फिर वर्गाकार कोष्ठकों को रखना पड़ेगा. उसमें, जो वर्गाकार कोष्ठकों में है, वह आसानी के लिए एक का अंक जोड़ता है और इस सब को क्रमवार तरीक़े से हल करने का निश्चय करता है...सब कुछ उसी वर्ग में – इस तरह धनु-कोष्ठकों पहली जोड़ी समाप्त हो गई. उसने फिर से एक जोड़ा और धनु-कोष्ठकों की दूसरी जोड़ी को ख़त्म करने के बाद, इस सब माल-मसाले को तीसरी सीढ़ी तक लाता है. इसके बाद, एक जोड़ने के बाद धनु-कोष्ठकों की अगली जोड़ी को ख़तम करता है, इस सबको चौथी सीढ़ी तक लाता है. सीढ़ियों के बढ़ते क्रम के साथ उसके दिमाग़ में धनु-कोष्ठकों की भीड़ होने लगती है. अब वह हाथियों की तरह सीढ़ियों को गिनता है, जिन पर धनु-कोष्ठकों के भीतर जकड़ा हुआ रखा जा रहा है. नींद आ ही नहीं रही है. तब उसे फिर से याद आता है कि ये उसके नहीं बल्कि पराए कोष्ठक हैं, और वह मूखिन के बारे में सोचता रहता है. मूखिन के बारे में न सोचे, इसलिए वह बाईं करवट पर मुड़ जाता है. 

वह सुनता है कि कैसे घड़ी की तरह 


05.15


तकिये से चिपकी बाईं कनपटी, खून टिक-टिक कर रहा है. खून. खून. खून. खून. खून – खून का ब्लड ग्रुप और Rh.  

तब उसे उसका ब्लड-ग्रुप पता नहीं था. मूखिन ने बकवास लिखी है. कोई भी नहीं डूब रहा था, न नदी में, न समुन्दर में, कुछ भी उस तरह नहीं हुआ था. किसी और ही तरह से हुआ था.

टूटा हुआ शीशा था, प्लेटफॉर्म था और छह साल की अन्यूता का खून था. और डॉक्टर्स थे. उसके ग्रुप का खून मंगवाना था. समय बिल्कुल नहीं था, एक मिनट भी नहीं. टेलिफ़ोन था, भतीजे का नंबर था अंतिम दो अंकों के बगैर. उसने नंबर दबाया – अंतिम दो अंक अंदाज़ से दबा दिए. आश्चर्य हो गया – नंबर लग गया. हालाँकि नहीं: पहले वह एक अंक दबाना चाहता था, फिर दूसरा, मगर दबा दिया तीसरा ही – और सही घुमाया. “वान्या, नीना आण्टी को बुला, वह पास में ही है? फ़ौरन”. (नीना का फ़ोन उन दिनों खो गया था.) “नीना, इस समय कुछ भी मत पूछो, अन्यूता का ब्लड ग्रुप और Rh बताओ”. उसने तुरंत, साफ़-साफ़ कहा : “दूसरा, प्लस”.

कपितोनव  को अब कुछ भी याद नहीं है, कि इसके बाद क्या हुआ था, और ये भी अच्छी तरह याद नहीं है कि उसके पहले क्या हुआ था. मगर वह फ़ोन-कॉल उसे न केवल अच्छी तरह याद है, बल्कि वह उसके स्वामित्व में है, जैसे वह कोई वस्तु हो – कोई ठोस वस्तु – जैसे उस ‘बीच’ पर लगे कंकालनुमा उपकरण के दुहरे हुक की तरह, जिसके पंख हवा के साथ गिरते-उठते हैं.

कपितोनव  को वह अंक याद है, मगर वह उसके बारे में नहीं भी सोच सकता है. ये उन तीन दुहरे अंकों वाली संख्याओं में से एक है, जिसे कोई भी नहीं सोचता है. वह जानता है, कि इस बारे में सोचना मना है. 

वह इस बारे में न सोचने की योग्यता रखता है. चाहे जिस बारे में सोचो, मगर किसी और चीज़ के बारे में सोचो (आदर्श स्थिति में किसी भी बारे में नहीं), और यह ‘और’ उसे नज़र आता है किसी व्यक्ति या किसी गुण के स्वरूप में – कभी जंगली चूहा, तो कभी निकोल मैरी किड़मैन, तो कभी किसी घर के दर्शनी भाग पर बनी बरसाती, तो कभी विनाश का सिद्धांत.

उसे यक़ीन है, कि किसी और चीज़ के बारे में सोच रहा है और यह, कि जाग रहा है, सो नहीं रहा है, और सिर्फ सोना चाहता है. मगर नींद जैसी कोई चीज़ आती तो है - सुबह-सुबह. वह फिर भी समझ रहा है, कि ये सपना नहीं है, क्योंकि सो नहीं रहा है, और, जब मोबाइल का अलार्म बजने लगता है,


07.30


तो थकान से चूर, अफ़सोस के साथ आँखें खोलता है, कि बेकार ही में बिस्तर में लेटा रहा. मगर वह, सपने जैसा, भुलाया नहीं गया, जैसा कि उनके साथ, हमारे साथ (उनके साथ और हमारे भी साथ), होता है, और इसके विपरीत, याद आता रहता है. और याद आता है सिर्फ सारांश की दृष्टि से. और जब वो है, तो वह भी सपने जैसा - सपना ही था. हो सकता है, सपना, थोड़ी ही देर के लिए था, मगर फिर भी सपना तो था ही.


अलार्म बन्द करके, कपितोनव  बिस्तर में ही रहा – सपने का सारांश पुनर्जीवित करना होगा. 


07.31


जंगली चूहा. कपितोनव  के बचपन वाला. पिंजरा, उसमें लकड़ी की छीलन, पानी का बर्तन, खाने का कटोरा और छोटा सा घर. ख़ास बात – ख़ून के बारे में नहीं, टूटे हुए कांच के बारे में भी नहीं... छोटा सा घर, प्लास्टिक का क्यूब है, नमक वाले जार से भी छोटा. एक छेद, गोल – अंदर जाने और बाहर आने के लिए. साइज़ में – मोटा आलूबुखारा गुज़र सकता है, मगर मुर्गी का अण्डा - मुश्किल से ही जा पाएगा. जंगली चूहा संकरी जगह में रहना ही पसन्द करता है – बाहर से खींच खींचकर लकड़ी की छीलन घर के भीतर लाता है, पूरा घर उससे भर देता है. भीतर आने का दरवाज़ा लकड़ी की छीलन से बंद हो गया. सच कहा जाए तो अभी तक ये सपना नहीं, बल्कि सपने का आगाज़ था. सारी बातों को देखते हुए ऐसा ही लगता है. सपना तो है ये. अगर नींद है तो.

 कपितोनव  ऊँगली से लकड़ी की छीलन को घर से बाहर निकाल रहा है. पर चूहा हार नहीं मानता, मगर वह कैसे नहीं हारेगा? कपितोनव  की ऊँगली छीलन तक पहुँचती है. देखता है कि उसे फिर से घसीट लिया गया है. वह उसे फिर से ऊँगली से निकालता है. देखा, फिर से वापस. फिर ऊँगली से. देखा, फिर से. 

ये सपना नहीं भी हो सकता था, बल्कि सिर्फ कोई याद रही होगी (बचपन में एक बार ऐसा हुआ था : वह जंगली चूहे के घर से ऊँगली से छीलन निकाल रहा था), बस, इस समय छीलन को एक बच्चा नहीं, बल्कि आदमी – अपने होशो-हवास में बाहर निकाल रहा है.

अगर जंगली चूहे के फ़ौरन बाद कपितोनव के दिमाग़ में डॉक्टर फ्रायड न आता, तो वह सबसे बड़ा मूर्ख होता. जंगली चूहे को याद करते हुए कपितोनव अपने आप से पूछता है : कहीं इसमें सुप्त समलैंगिकता तो नहीं है? ख़ुद ही उत्तर भी दे देता है कि ऐसा नहीं है. आम तौर पर कहा जाए तो, वह ये मानता है कि सुप्त समलैंगिकता का आविष्कार वास्तविक लोगों ने किया था, न कि गुप्त लोगों ने, मगर कहीं इसमें वह सुप्त समलैंगिकता को कटघरे में तो खड़ा नहीं कर रहा है? अगर कुछ लोगों की बातों को सुना जाए, तो वह हर जगह है, ख़ासकर डॉन जुआन में तो वह अत्यधिक है...और, जो इस नोटबुक में, मूखिन कपितोनव के प्रति असाधारण लगाव दिखा रहा है, कहीं उसमें भी तो सुप्त समलैंगिकता नहीं है? और, जो ‘तालाब’ ने कपितोनव  को कॉन्फ्रेंस में निमंत्रित किया, कहीं उसके पीछे भी तो सुप्त समलैंगिकता नहीं है? और, वैसे भी, कॉन्फ्रेंस में औरतें इतनी कम क्यों है? 

उठा और कपड़े पहने. सुबह के कार्यक्रम, जैसे पाठ्य पुस्तक में  “My Morning” वाले पाठ में होते हैं. ‘शेव’ करना चाहता है, मगर अचरज के साथ ग़ौर करता है कि, शायद, पहले ही कर चुका है, - तभी ये भी याद आया कि तीन-चार घण्टे पहले ‘शेव’ कर चुका है. 

और, क्या सु...

 मगर चेहरे पर ठण्डा पानी उछालकर इस विचार को हटा देता है. अफ़सोस, इससे उसे कोई ताज़गी नहीं मिली. 

अपने आप को टूटा हुआ (‘शेव’ किया हुआ) महसूस करते हुए, उनींदा (मगर ‘शेव’ कर चुका) कपितोनव अपना बसेरा छोड़कर नाश्ता करने के लिए निकलता है. 



08.06


लिफ्ट से नीचे जाते हुए भी वह नोटबुक के बारे में ही सोच रहा है. सबसे मुश्किल सवाल : वह उसे क्यों दी गई थी? किस उद्देश्य से?

कैफ़े के प्रवेश द्वार पर खड़ी ड्यूटी-गर्ल अपनी लिस्ट में वास्तव में आए हुए लोगों के नामों पर निशान लगा रही थी.

 “प्लीज़ – आपके कमरे का नंबर.” ”32” - अपने ही ख़यालों में खोए हुए कपितोनव यंत्रवत् सोचता है.  “माफ़ कीजिए, आपने अपना नंबर नहीं बताया.”  “32” कपितोनव होश में आ गया. 


08.11         


हाथों में प्लेट लिए बुफ़े की मेज़ को देख रहा है. “हर चीज़ थोड़ी थोड़ी” वाले सिद्धांत का पालन करते हुए भी वह चीज़ वाले पैनकेक्स को नज़रअंदाज़ कर देता है, और सींक-कबाब के बदले गोभी के कटलेट्स को चुनता है.

 

अभी तक न जलाई गई ‘फ़ायरप्लेस’ के पास वाली मेज़ पर बैठकर आराम से खाना शुरू करता है.


नाश्ता करने के इच्छुक लोगों से हॉल भर रहा है. कपितोनव  ये जानने की कोशिश करता है कि आगंतुकों में कौन-कौन कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट्स हैं, - पूरा का पूरा हॉटेल तो उनका नहीं है.


हाथों में प्लेटें लिए दो व्यक्ति उसकी मेज़ पर बैठने की इजाज़त मांगते हैं (ख़ाली कुर्सियाँ अब दिखाई नहीं दे रही हैं). 

उनके बैजों को देखकर पता चला कि उनमें से एक माइक्रोमैग (माइक्रोमैजिशियन – अनु.) अलेसान्द्र सीज़र है, दूसरा – हेरा-फ़ेरी करने वाला सिर्गेइ वराब्योव. मेज़ पर वे अपनी बातचीत जारी रखते हैं.

 “नहीं, मुझे लगता है कि यह वास्तविक नहीं है, - सीज़र कहता है. “प्रमाणित करने के लिए कुछ अन्य मानदण्डों को चुनना होगा. योग्यता-गुणांक नापने की कोई पद्धति नहीं है. 

“ख़ास तौर से तब, जब योग्यता-गुणांक सौ प्रतिशत से ज़्यादा हो,” वराब्योव सहमति दर्शाता है. “मैं कहता हूँ, कि मेरा दो सौ है. और आप साबित कर दीजिए कि डेढ़ सौ है.”  “दो सौ – ज़्यादा नहीं है. मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूँ कि मेरा दो सौ बीस – दो सौ चालीस है, इससे कम नहीं.”

 “माफ़ कीजिए, क्या आप योग्यता-गुणांक के बारे में कह रहे हैं?” उनकी बातों से आश्चर्यचकित कपितोनव अपनी नाक घुसेड़ता है.

 “बिल्कुल, योग्यता-गुणांक के बारे में.”  “परिभाषा के अनुसार योग्यता-गुणांक सौ प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकता.”  “क्यों?”  “ ‘क्यों’ क्या? क्योंकि योग्यता-गुणांक – उपयोगी काम और नष्ट हुए काम का प्रतिशत अनुपात होता है. और उपयोगी काम हमेशा नष्ट हुए काम से कम होता है.” 

 “सामान्य भौतिकशास्त्र में – बेशक ऐसा है,” फ़िसलते हुए ज़ैतून में कांटा चुभोने की कोशिश करते हुए सीज़र जवाब देता है, “मगर जब बात भौतिक-जादू की हो रही हो... जैसे, इस धारणा को लीजिए – चमत्कार. अगर प्रेक्षक को अवलोकित किए जा रहे चमत्कार का योग्यता-गुणांक नापने की पद्धति का ज्ञान हो, तो उसे कोई सन्देह न होगा – चमत्कार का योग्यता-गुणांक सौ प्रतिशत से अधिक होगा. उपयोगी काम नष्ट हुए काम से ज़्यादा है.”

 “ एकदम सौ प्रतिशत,” वराब्योव सहमति दर्शाता है. “नष्ट हो चुका काम, हो सकता है, उतना ही हो, जो जादू के मंत्र पढ़ने, भविष्य कथन के लिए पांसे तैयार करने, और कुछ आरंभिक तैयारियों से संबंधित हो. एमिल्या30 की याद है? उसे भी हर बार कहना पड़ता था “मछली की आज्ञा से”, अपनी शक्ति खर्च करनी पड़ती थी, और फिर हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए, कि इस मछली को पकड़ने में भी उसकी कुछ न कुछ शक्ति तो खर्च हुई ही थी. तो, नष्ट हुआ काम – ये किसी भी तरह का काम हो सकता है, ऐसी चरम परिस्थितियों में भी, मगर उपयोगी काम उससे कहीं ज़्यादा है.” 

 “तर्क समझ में आ रहा है,” कपितोनव  मुस्कुराते हुए कहता है, “मगर यदि ऐसा है, तो ये चमत्कार नहीं, बल्कि कुछ और ही है. चमत्कार के लिए काम के नष्ट होने की आवश्यकता ही नहीं है, वह होता है बाहर से, आपके परिश्रम के नष्ट होने की कड़ी के परे से.” उसने डबलरोटी को चाकू से काटा, जिससे मक्खन लगा सके. “आप वो कह रहे हैं, जिसे कहते हैं....असल में, क्या कहते हैं?... जादू, न कि चमत्कार. जादू बगैर पासों के नहीं होता, ये सही है, मतलब बिना नष्ट हुए काम के जादू नहीं हो सकता. मगर चमत्कार तब होता है, जब नष्ट हुआ काम ज़ीरो हो. क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?”

 “आप ये कहना चाहते हैं कि चमत्कार के योग्यता-गुणांक की गणना करने के लिए उपयोगी काम को ज़ीरो से भाग देना पड़ेगा?” अण्डे के नुकीले हिस्से पर चाकू के सही वार से छिलके को तोड़ते हुए वराब्योव पूछता है.    “असल में तो ज़ीरो से भाग देना मना है. मगर यदि ज़ीरो के स्थान पर डिनॉमिनेटर (विभाजक) में अत्यंत छोटी संख्या रखी जाए, जो लगभग ज़ीरो के समान हो, तब भी परिणाम में आप ऐसी संख्या प्राप्त करेंगे जो लगभग इन्फ़िनिटी (अनंत) जितनी होगी.” 

“ चमत्कार का योग्यता-गुणांक – अनंत प्रतिशत?”

“वैसे, हो सकता है, कि अनंत को प्रतिशत में प्रदर्शित करने में कोई तुक न हो.”


“और जहाँ तक जादू का सवाल है, उसके योग्यता-गुणांक को प्रतिशत में प्रदर्शित करना, क्या ये, आपके ख़याल से, सही है?” अपने ही नाम के सलाद की ओर देखते हुए, जो उसकी बगल से काल-भक्षक ले जा रहा है, सीज़र पूछता है. 

कपितोनव पास से गुज़रते हुए अपने पड़ोसी से फ़ौरन आँखें फ़ेर लेता है.

 “ये मैंने नहीं कहा है. ये आप कह रहे हैं,” कपितोनव सीज़र को जवाब देता है.  “माफ़ कीजिए, आप कौन हैं?”

 “येव्गेनी कपितोनव . मेन्टलिस्ट, अगर आप चाहें तो.”

 “और अगर न हो तो? अगर कोई चमत्कार ही न हो तो? अगर, आम तौर पर, कुछ भी न हो तो – मतलब, जैसे कि अभी, तो हमारी निष्क्रियता का योग्यता-गुणांक क्या होगा?” वराब्योव पूछता है.  “ये किस बारे में?”                              “उस बारे में कि नष्ट हुआ काम ज़ीरो हो और उपयोगी काम भी ज़ीरो हो. योग्यता-गुणांक – क्या ज़ीरो को ज़ीरो से भाग देना पड़ॆगा?”  “योग्यता-गुणांक किसका?”  “किसी का नहीं. कुछ नहीं होने का.”

“अगर उपयोगी काम हो ही नहीं रहा है, तो योग्यता-गुणांक कैसे निकालेंगे?” कपितोनव समझ नहीं पा रहा है. ”ऐसे – ज़ीरो बटा ज़ीरो. किसी ऐसी मशीन की कल्पना करें, जिसे ख़ास तौर से सैद्धांतिक निष्क्रियता के लिए बनाया गया हो.”

 कपितोनव  जवाब देता है:  “ज़ीरो बटा ज़ीरो होगा अपरिमितता.”

 “ये अपरिमितता कहाँ से आ गई?” सीज़र परेशान हो जाता है. “कहीं इसलिए तो नहीं कि चमत्कार है ही नहीं?”  “नहीं, इसलिए कि डिनॉमिनेटर में नष्ट हुआ काम अनुपस्थित है.”

 “मगर डिनॉमिनेटर में ज़ीरो नष्ट हुए काम के चलते – चमत्कार की परिस्थिति में, जैसा कि आपने अभी-अभी कहा है, हमें न्यूमरेटर (भाज्य) में कोई प्रभाव मिलना चाहिए, चमत्कारी प्रभाव, एक शब्द में, ज़ीरो नहीं. और तब हमारा योग्यता-गुणांक – इन्फ़िनिटी (अनंत) होगा.”  “हाँ, मगर ये हमारा योग्यता-गुणांक नहीं है.”  “योग्यता-गुणांक चमत्कार का.”

 “स्टॉप,” वराब्योव कहता है, “वो कहाँ है, चमत्कार? इससे यह सिद्ध हुआ कि हम हर समय अपरिमितता की स्थिति में रहते हैं. उम्मीद की स्थिति में और चमत्कार की उम्मीद में? मैंने, जैसे, इस पल कोई काम नष्ट नहीं किया, और क्या पाया? ज़ीरो बटा ज़ीरो – अपरिमितता. समझ नहीं पा रहा हूँ. मैं अपनी निष्क्रियता का योग्यता-गुणांक जानना चाहता हूँ. वह ज़ीरो के बराबर क्यों नहीं है? अगर वह – अपरिमितता है, मतलब, मुझे परिमितता की उम्मीद करने का अधिकार है? मतलब, इस बात की, कि चमत्कार होगा?” कुछ देर ख़ामोश रहे. कुछ सोचा. कपितोनव  को लगा कि वे उसकी फ़िरकी ले रहे हैं. 

 “वैसे, यहाँ योग्यता-गुणांक की ज़रूरत क्या है?” कपितोनव  पूछता है. “योग्यता-गुणांक – सिर्फ एक दूसरे के प्रतिशत संबंध को दर्शाता है. योग्यता-गुणांक – न तो भगवान है, न विश्वकर्मा, न कोई काली या सफ़ेद ताक़त. वो सिर्फ योग्यता-गुणांक है.”

 “मगर सर्टिफ़िकेट के लिए वह हमसे मांगा जाता है.”  “और, ये भी उम्मीद की जाती है कि वह सौ प्रतिशत से अधिक हो. इसका असर वेतन पर, हमारी श्रेणी पर पड़ता है.”  “क्या बात है!” कपितोनव  कहता है.

 “क्या आप इस तरह से नहीं कमाते हैं?” वराब्योव पूछता है.  “मैं दूसरी तरह से कमाता हूँ.” कपितोनव  कहता है.   “’लकी’ हो.”  “ रुकिए, मगर आपके पास अधिकार है,” कपितोनव  कहता है. “किसी न किसी को तो आपकी हिफ़ाज़त करनी होगी. क्या आपकी कोई यूनियन है?”  “कपितोनव, ये बताईये कि क्या आप पाँच डबल रोटियों से पाँच हज़ार आदमियों का पेट भर सकते हैं?” सीज़र पूछता है. 

 “ये कैसा सवाल है? बेशक, नहीं.”  “मैं भी.”

वह उठता है और जाने लगता है. वराब्योव कहता है:  “बिल्कुल बहस करना नहीं आता. सिद्धांतवादी है. ख़ासकर, जहाँ मूलभूत सिद्धांतों का प्रश्न हो. अरे, यहाँ मेरा कटलेट था, कहाँ गया?”  “मेरे पास भी था – यहाँ, प्लेट में.”  “मैंने नहीं खाया.”  “और मैंने भी नहीं खाया” कपितोनव को विश्वास नहीं होता. “कहीं ग़ायब हो गया.”

 “अच्छा, भाड़ में जाएँ कटलेट्स,” वराब्योव कहता है और, कपितोनव  को चौंकाते हुए, इन अजीब हालात से हौले से समझौता करके, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो, अंजीर खाने लगता है.

“ऐसा कैसे?” कपितोव अटपटा-सा सवाल पूछता है.

कपितोनव  परेशान हो गया. जब उसके साथ कोई अविश्वसनीय बात हो जाती है, तो वह सबसे पहले अपने आप को समझने की कोशिश करता है: क्या उसने बात को सही समझा है?

 “हो सकता है... हम भूल गए हों,” और अपने कथन की सत्यता पर स्वयँ ही अविश्वास करते हुए वह मुड़कर औरों की ओर देखने लगता है, वे सब अपनी अपनी मेज़ों पे बैठे हुए बुफ़े वाली मेज़ से ली हुई खाने-पीने की चीज़ों का मज़ा ले रहे हैं – कोई ऑमलेट ले रहा है, कोई बॉइल्ड सॉसेज, कोई सलाद और हैरिंग मछली, कोई केक्स. सिर्फ काल-भक्षक, मेज़ के नीचे हाथ रखे उदासी से प्लेट की ओर देख रहा है, ‘सीज़र’ सलाद की ओर. उदासी से देख रहा है और बुरा दिख रहा है : काल-भक्षक के चेहरे के रंग को ‘सलादी’ कहना उचित होता. हरियाली लिए और सिलवटों वाला. 

 “माफ़ कीजिए. भूल गए – क्या?” (वराब्योव समझ नहीं पाया कि कपितोनव  ने क्या कहा था.)

कपितोनव  अधसोची बात पर लौटा:  “क्या, खा लिए, भूल गए...कटलेट्स.”  “हम भूल गए? कि खा लिए? नहीं, मैं नहीं भूला, मैंने नहीं खाए.”.

काल-भक्षक भाँप जाता है कि वे दोनों उसकी ओर देख रहे हैं, उसका रंग और हरा हो जाता है. उसके चेहरे पर – जैसे उबकाई रोक रहा हो. वह उठ जाता है, हथेली से मुँह बन्द कर लेता है और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ता है, कुछ भी खाए बग़ैर.

 “आया क्यों था?” वराब्योव कपितोनव  से पूछता है. “हमारा खाना उसे रास नहीं आता.” 

08.49


कपितोनव  फ़ायरप्लेस वाले हॉल से निकल जाता है. लिफ़्ट में वह एक रूम-अटेंडर लड़की के साथ जा रहा है. उसकी नज़र कपितोनव  को छूती हुई “कॉल फ़ॉर हेल्प” वाले बटन पर है, मगर वह देखता है कि चेहरे की मुस्कान उसीके लिए है. इस मुस्कान में वह पढ़ता है, कि लड़की को उसके जादूगर होने की जानकारी है, और यदि वह कोई जादू दिखाना चाहे तो उसे साभार स्वीकार करने की तत्परता भी. मगर उसे एक और मंज़िल ऊपर जाना था.

अपने कमरे में (अभी समय है) 

08.55


वह टेलिविजन ऑन करता है और कपड़े बदलता है.                      


वह भेंट में मिली ब्रीफ़केस खोलता है और सोचता है, कि क्या कॉन्फ्रेन्स में ज़रूरी काग़ज़ात और ‘जादुई छड़ी’ ले जाए या नहीं. वह फ़ैसला करता है कि ब्रीफ़केस में से कुछ भी बाहर नहीं निकालेगा और उसीके साथ मूखिन की नोटबुक रख देगा – जिससे कि किसी तरह मरीना को लौटा दे.


तभी मरीना का फ़ोन आया. जल्दी ही है. उसने सोचा कि बातचीत बाद में होगी. इस समय वह बातचीत के लिए तैयार नहीं है. इसलिए फ़ौरन कनेक्ट नहीं किया.  “पढ़ लिया?”  “पढ़ लिया.”  “क्या कहोगे?”  “क्या कहूँगा... तुम क्या सुनना चाहती हो?”  “ये संशोधक कौन है?”  “मरीनच्का, मुझे नहीं मालूम. उन नोट्स को देखते हुए, तुम, शायद, मुझसे बेहतर जानती हो.”  “मैं नहीं जानती कि संशोधक कौन है,” मरीना ने जवाब दिया. “मगर ये सब डरावना था. मैं वाक़ई में दरवाज़ा तोड़ना चाहती थी. बताओ तो, क्या मैंने सही किया? मुझे घसीटा गया, पूछताछ की गई...मेरी आइडेंटिटी जानने के बाद भी. मुझ पर शक किया गया, क्या तुम कल्पना कर सकते हो? और मैंने भी नोटबुक नहीं दिखाई. क्या दिखानी चाहिए थी? मैंने ठीक किया ना, जो नहीं दिखाई?”  “मरीन, अगर तुम उन्हें दिखा भी देतीं, तो कुछ बेहतर नहीं होता. तुम हर चीज़ बस उलझा देतीं, उसमें बहुत सारे अंधेरे कोने हैं, जिन्हें समझाया ही नहीं जा सकता. तुमने बिल्कुल ठीक किया.”  “तुम, फिर भी, क्या सोचते हो, उसने यह सब क्यों लिखा?”  “मरीनच्का, मैं नहीं जानता.”  “क्या वह पागल हो गया था? वह पागल नहीं था. या था?”  “अगर तुम समझती हो कि नहीं था, मतलब, नहीं था. इस सवाल का जवाब इस समय तुम्हारे अलावा और कोई नहीं दे सकता. जैसा तुम समझती हो, वैसा ही है. जैसा तुम कहोगी, वैसा ही होगा.” ”और, क्या नोटबुक सुबूत नहीं है?”  “नोटबुक – नोटबुक है.” आगे वह ये भी कहना चाहता है कि वह बुरा शेर्लोक होम्स है, मगर मरीना ने बात काट दी:  “बाद में फ़ोन करूँगी. गुड लक.” शायद, पति आ गया था. कपितोनव  को सिग्नल सुनाई देते हैं.

 वह नोटबुक वाली ब्रीफ़केस को बन्द करता है. 


कपितोनव  की आँखें लाल हैं (वह आईने में देखता है). यदि किसी और का ऐसा थोबड़ा होता तो कपितोनव समझता कि उस आदमी का नशा अभी-अभी टूटा है. बुरा हाल है. हरेक को तो वह समझा नहीं सकता कि वह अनिद्रा से परेशान है. 


हॉटल में आग लगने की सूचना देते हैं. – शायद इण्डिया में या बांग्लादेश में. 17 आदमी मर गए. क्या बांग्लादेश में या इण्डिया में?

और ये है एक लड़का और लड़की, नवीं क्लास में पढ़ने वाले, एक दूसरे का हाथ पकड़कर ग्यारहवीं मंज़िल की खिड़की से बाहर कूद गए. 

दीवार के पीछे काल-भक्षक (कपितोनव का पड़ोसी वही है) गुरगुरा रहा है और ज़ोर लगा रहा है, ज़ोर लगा रहा है – वह उल्टी करने की कोशिश कर रहा है. 

09.12


कपितोनव  नीचे हॉल में आया. काली ब्रीफ़केसें लिए कॉन्फ़्रेन्स के डेलिगेट्स आने लगे हैं – अब तक क़रीब दस-पन्द्रह लोग आ चुके हैं: दीवान पे और कुर्सियों में बैठे हैं, कुछ लोग चहल-क़दमी कर रहे हैं. ब्रोश्यूर में देखे फ़ोटो से वह फ़ौरन महाशय नेक्रोमैन्सर (ओझा) को पहचान लेता है, जुपितेर्स्की को पहचान लेता है, औरों के बीच में ‘तालाब’ को देख लेता है...कल की घटना के कारण हॉटेल के प्रशासन ने   कॉन्फ्रेन्स-हॉल को मीटिंग्स और अन्य कार्यक्रमों के लिए बन्द कर दिया था, इसलिए आज दूसरी बिल्डिंग में मीटिंग होगी, जो यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं है. सब लोग इकट्ठे हो जाएँगे तो उन्हें वहाँ ले जाएँगे. कपितोनव  के बदन पर है ओवरकोट और कैप. 


उसके पास हाथ मिलाने को तत्पर ‘तालाब’ आता है, - अभिनन्दन करने वाले से नज़रें मिलाते हुए लाल आँखों वाले कपितोनव  को उसकी आँखों में उत्सुकता की झलक दिखाई दे जाती है और वह फ़ौरन बिना पूछे गए प्रश्न का उत्तर देता है:  “अनिद्रा.” ”ओह, आप भी क्या! यहाँ भी? यहाँ कौन सी चीज़ आपको आराम नहीं करने दे रही है?” ‘तालाब’ शिकायत के सुर में कहता है. “वैसे, बाइ द वे,” वह कपितोनव  को एक आदमी के पास लाता है, जो गुड़ियों वाली ‘शो-केस’ के पास खड़ा उकता रहा था. “इनसे मिलिए – सिर्फ आप दोनों यहाँ  ‘मेन्टलिस्ट्स’ हैं. दूसरे मेन्टलिस्ट का नाम है मिखाइल श्राम, उसका स्पेशलाइज़ेशन है – छुपाई गई चीज़ों को खोज निकालना. इसके अलावा वह ‘सम्मोहन’ की प्रक्रिया से भी अवगत है, और ‘तालाब’ ये चाहता है कि जब भी एकाध मिनट की फ़ुर्सत हो, श्राम31 कपितोनव  को नींद पूरी करने में, या कम से कम ऊँघने में ही मदद करे.  

दोनों के कंधों को एक सा थपथपाता है.  “उम्मीद करता हूँ कि आप की ख़ूब बनेगी,” कहते हुए, सड़क से आती हुई टेलिविजन-टीम को दोस्ताना अंदाज़ में हाथ से इशारा करते हुए जाने लगता है.  

श्राम कपितोनव  से पूछता है:  “संख्याओं पर, शायद, दो अंकों वाली? तो फिर, मैं कोई संख्या सोचूँ?”

 “अगर चाहें तो,” कपितोनव  ने कहा. वह जोड़ने को, घटाने को कहता है, सोची हुई संख्या बताता है.

 “समझ गया,” श्राम को आश्चर्य नहीं होता. “मेरा सम्मोहन आप पर असर नहीं करेगा.”  “मैं सम्मोहन के ख़िलाफ़ हूँ.”  “ऐसा क्यों? क्या डरते हैं कि चुरा लूँगा? मैं दिमाग़-चोर नहीं हूँ.”  “ ‘कौन’ नहीं हैं?”

 “देखिए, उठाईगीर होते हैं, जेबक़तरे होते हैं, और दिमाग़-चोर भी होते हैं. उम्मीद करता हूँ कि आप भी दिमाग़-चोर नहीं हैं.”

 “नहीं, ये आप क्या कह रहे हैं, मैं दिमाग़-चोर नहीं हूँ.”  “बेचेंगे तो नहीं? हम ख़रीद लेते. आपकी क़ीमत कितनी है?”  “प्रोग्राम? दिमाग़? आप किस बारे में कह रहे हैं?”  “ज़ाहिर है, प्रोग्राम.”

“ये व्यावसायिक सिक्रेट है,” कपितोनव  जवाब देने से बचना चाहता है. “आप तो नहीं बताएँगे कि आप वाले की कितनी क़ीमत है.” 

 “क्यों नहीं बताऊँगा? मेरी प्राइस-लिस्ट सबको मालूम है. प्रोग्राम्स कई सारे हैं – कौन सा चाहिए? दिखाए गए प्रोग्राम्स में सबसे सस्ता है – “कागज़ ढूँढो”, पाँच हज़ार डॉलर्स, “छुपाया गया गोला” – पचास. पूरी निर्देश-पत्रिका सहित, गोलों के सेट सहित, ट्रेनिंग क्लासेस सहित. तीन क्लासेज़ पर्याप्त हैं. फिर भी, आप वाला कितने का है? नख़रे दिखाने की ज़रूरत नहीं है.”  “मेरा – सिर्फ दिमाग़ों से.”  “नम्रता से धन्यवाद देता हूँ. एक्स्ट्रा झंझट नहीं खरीदेंगे.”

हॉटेल में रहने वाले सारे लोग नहीं जानते कि मीटिंग यहीं कहीं नहीं होगी और बर्फ पे चलकर जाना पड़ेगा. ब्रीफ़केसों को हॉल में छोड़कर, वे ऊपर के गरम कपड़े पहनने अपने-अपने कमरों में जाते हैं. काली ब्रीफ़केसेस फ़र्श पे खड़ी हैं, और रिसेप्शन-काऊंटर वाले उनकी ओर हिकारत से देख रहे हैं.   “कल की घटनाओं के संदर्भ में ये वाक़ई में चिंताजनक लग रहा है...विपत्ती सूचक न कहूँ तो,” श्राम ने सूटकेसेस पर जैसे आँखों से निशाना साधते हुए कहा. 

 “मगर, अगर कुछ है, तो आप तो बाहर से देखकर ही भाँप सकते हैं.”  “बाहर से देखने पर नहीं, बल्कि आमतौर से.”  “चिंता करने की ज़रूरत तो नहीं है?”


मिखाइल श्राम चुप रहा. मानो वह कपितोनव  के हुनर का जवाब अपने किसी विशिष्ठ कारनामे से देना चाहता हो. उसकी नज़र ड्रैगन वाले चीनी फूलदान के पास रखे ब्रीफ़केस पर ठहर जाती है.  “ये मेरी है,” कपितोनव  ने आगाह किया, जिससे कोई ग़लतफ़हमी न हो.  “इसमें कोई बाहरी चीज़ है.”  “एक आदमी की नोटबुक है,” कपितोनव ख़ुशी-ख़ुशी मान लेता है. श्राम के चेहरे पर लिखा है “मैंने तो नहीं पूछा था”; कपितोनव की सहमति से दुखी होकर वह इस टिप्पणी पर ग़ौर नहीं करता:  “नहीं, वहाँ कुछ और है.”

 और वह शो-केस की ओर मुड़ जाता है, चेहरे पर ऐसा भाव है, जैसे ज़रूरत से ज़्यादा बोल गया हो.


अपनी मुस्कुराहट को रोकने में असमर्थ कपितोनव भी शो-केस की तरफ़ हट जाता है – दूसरी वाली: इसमें पीटरबुर्ग से संबंधित हर तरह के स्मृति-चिह्न रखे हैं. उसे बड़ा हास्यास्पद लग रहा है, वह कुर्सी पर बैठ जाता है.

अधिकाधिक डेलिगेट्स आ रहे हैं, और क़रीब-क़रीब सभी के पास काली ब्रीफ़केसेस हैं. 


कपितोनव  से तीन क़दम दूर ‘तालाब’ टेलिविजन वालों को इंटरव्यू दे रहा है. 


09.25


“नॉनस्टेजर्स कौन होते हैं?” कपितोनव रिपोर्टर की खनखनाती आवाज़ सुनता है (जिस आत्मविश्वास से वह कठिन शब्दों का उच्चारण कर रही थी, उससे प्रतीत होता था कि लड़की अच्छी तैयारी करके आई थी).

 “नॉनस्टेजर्स – हम हैं,” ‘तालाब’ गर्व से कहता है. “जादूगर, जो प्रदर्शनों के लिए प्रयुक्त स्थानों से नहीं जुड़े होते, - चाहे वह सर्कस का एरेना हो, रॉम्प हो, या फिर कोई स्टेज हो, इस शब्द के सभी निहितार्थों के साथ. हम अपनी कला का प्रदर्शन दुनिया के किसी भी कोने में, और किन्हीं भी परिस्थितियों में कर सकते हैं. ऑफ़िस में कोई छोटी सी पार्टी है? प्लीज़. कोई कॉर्पोरेट आया है? जितना चाहें. ट्रेन का रेस्टॉरेंट? क्यों नहीं? जहाज़-दुर्घटना झेल चुके लोगों की नौका? वहाँ भी हम आपकी मदद करेंगे. क्योंकि हमारा काम है – लोगों का ‘मूड’ अच्छा करना, उन्हें ख़ुशी देना, सबसे ज़रूरी है, उन्हें आश्चर्यचकित करना, आश्चर्यचकित करना और कई कई बार आश्चर्यचकित करना!”


“आज के इन्सान को आप कैसे आश्चर्यचकित कर सकते हैं? साधारण जादुई खेलों से?”  “ कौशल से! नॉनस्टेजिंग – अत्यंत उच्चकोटि का कौशल है. वह दर्शक से बहुत कम दूरी पर प्रदर्शित किया जाता है, जब आपके और मेरे बीच की दूरी सिर्फ वार्तालाप के माध्यम से दर्शाई जा सकती है. हमारी असोसिएशन में यूँ ही सबसे ज़्यादा भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग नहीं हैं – माइक्रो मैजिशियन्स, ये आजकल प्रचलित नाम है, मगर आपने, शायद, इनके बारे में नहीं सुना है? ...आप कहती हैं “साधारण जादुई खेल”. मगर माइक्रो मैजिशियन आपको ऐसे ऐसे जादू दिखाएगा...माचिस की डिबिया से या साधारण चश्मे से... आपकी बोलती बन्द हो जाएगी! माइक्रो मैजिशियन – सुपर जादूगर है, सीधी-सादी, जानी-पहचानी चीज़ों से चमत्कार करता है. वह, मिसाल के तौर पर आपका माइक्रोफ़ोन लेकर देखते-देखते उसे खीरे में बदल सकता है, या, जैसे मैं आपकी अँगूठी देख रहा हूँ...  “ओय, ओय, रहने दीजिए! यहाँ ‘पत्ताचोर’ और ‘ठग’ भी हैं...” 

 “मैं विरोध करता हूँ! हाइपर-पत्ताचोर और हाइपर-ठग. कृपया साधारण पत्ताचोरों और ठगों से इनका मुक़ाबला न करें. हालाँकि वे भी काम करते हैं, अंगुश्तानों और ताश के पत्तों के साथ. मगर हमारे वाले, वो, जो हाइपर हैं, ऐसे आर्टिस्ट्स हैं, जिनके साधारण पत्ताचोरों और ठगों से इस तरह के संबंध हैं, जैसे कानून का पालन करने वाले ऑस्ट्रेलियन्स के – अपने पूर्वजों के साथ, हर तरह के अपराधियों के साथ, जिन्हें दुनिया के दूसरे छोर पर निष्कासित कर दिया गया हो. हमारे पत्ताचोर और ठग उस्तादों के लिए अंगुश्तान और ताश के पत्ते – दर्शकों के लिए शानदार खेल की महान सामग्री है, इस खेल में जागरूक दर्शक बढ़-चढ़ कर भाग लेता है, अच्छी तरह से ये समझते हुए कि उसे... कैसे कहूँ...हराया जा रहा है. मगर वह समझ ही नहीं पाता – किस तरह से.

 “हाथ की सफ़ाई और बिना किसी धोखाधड़ी के.”  “ठीक, बिना किसी धोखाधड़ी के. और धोखाधड़ी हो भी किसलिए? ये तो आर्ट है. जहाँ तक हाथ की सफ़ाई का सवाल है, तो इसके बिना काम कैसे चलेगा, मगर यहाँ न सिर्फ हाथ की सफ़ाई है, बल्कि मनोविज्ञान से वाक़िफ़ होना ज़रूरी है, विश्लेषणात्मक बुद्धि की भी आवश्यकता है. ऐसी भी घटनाएँ होती हैं, जब हाथों से काम ही नहीं लिया जाता. मेन्टलिस्ट जादूगर, मिसाल के तौर पर, हाथ की सफ़ाई का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि वे असाधारण कौशल से, इस शब्द के प्रयोग के लिए मुझे माफ़ करें, आपके दिलो-दिमाग़ पर कब्ज़ा करते हैं. हमारे बीच एक मेन्टलिस्ट है, जो किसी भी छुपाई गई चीज़ को ढूँढ़ लेता है, बगैर आपसे कोई सवाल किए, चाहे वह ख़ुद भी नहीं जानता हो कि आपने कौन सी चीज़ छुपाई है. मतलब, उसे तो मालूम है, प्रेज़ेन्टेशन के दौरान सब कुछ जान लेता है. ये है एक और मेन्टलिस्ट. आप कोई संख्या सोचिए, वह बूझ लेगा. कपितोनव महाशय, प्लीज़...

 कुर्सी में धँसा हुआ कपितोनव चेहरे से ये दिखाता है कि ये ज़रूरी नहीं है, मगर लड़की उसकी तरफ़ देखे बिना ही ‘तालाब’ से बोली:

 “ज़रूरत नहीं है! मुझे सवाल पूछ-पूछकर बेहाल कर देंगे, फ़्रेम में सिर्फ आप बोलेंगे, अकेले, इसलिए मुझे कुछ बूझने की ज़रूरत नहीं है, मैं बाद में ख़ुद ही बूझूंगी, चलिए, आगे बढ़ते हैं. और, क्या आपके यहाँ अतिरिक्त संवेदी हैं?”  “अतिरिक्त संवेदी – ये दूसरी बात है. हम, मैं फिर से दुहराता हूँ, एक्टर्स हैं.”  “मगर आपके पास ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट्स, स्थान एवम् काल-भक्षक तो हैं...”  “उनके लिए  बहुवचन की ज़रूरत नहीं है. उनमें से हर एक लाजवाब है, बेजोड़ है. हमारे पास एक काल-भक्षक है, वह स्थान का भक्षण नहीं करता...एक ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट है...” – वह जोड़ना चाहता है “एक नेक्रोमैन्सर” (ओझा), मगर उसे दरवाज़े के पास खड़ा देखकर, उसकी तरफ़ ज़्यादा ध्यान न खींचने का फ़ैसला करता है, वर्ना रिपोर्टर अचानक उसका इंटरव्यू लेने चली जाएगी, और गड़बड़ा कर फिर से अपने विचारों को व्यवस्थित करने लगता है. – “दूसरे शब्दों में,” ‘तालाब’ आगे कहता है, “विधा की दृष्टि से हमने अपने समूह में विविधता लाने की कोशिश की है, इसलिए हमने तथाकथित रिमोटिस्ट्स को, नई, मगर प्राचीन रिवाजों पर आधारित, प्रणाली के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया है. इनके बारे में दर्शकों और विशेषज्ञों की राय हमेशा एक जैसी नहीं रहती, मगर अपनी ही तरह के इन मास्टर्स के साथ सहयोग करना बहुत दिलचस्प है.”             “क्या नेक्रोमैन्सर भी उन्हीं में से एक है? क्या वह मृतकों के साथ काम करता है?”

 “एक बार फिर दुहराऊँगा, हम आर्टिस्ट्स हैं, आर्टिस्ट अपने अपने पात्र को बख़ूबी निभाते हैं. और फिर, बुल्गाकव के नायक की स्थिति में स्वयम् को रखने का मेरा कोई इरादा नहीं है, जो पब्लिक को समझाता है कि काले जादू का अस्तित्व नहीं होता.”

 “मगर क्या उसका अस्तित्व होता है?”  “आधुनिक मायावाद में एक ख़ूबसूरत प्रणाली का अस्तित्व है, जिसके प्रतिनिधि – हम, जादूगर-नॉनस्टेजर्स हैं, और मैं विनती करता हूँ कि हमसे इस रूप में प्यार किया जाए, और हमारी सहायता की जाए.”  

09.31


“चलो, दोस्तों! समय हो गया! बिगुल मार्च के लिए बुला रहा है!”

 कोई बिगुल-विगुल नहीं था, मगर बिना बिगुल के ही – ऑर्गेनाइज़िंग़ कमिटी के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार – माइक्रोमैजिशियन र्‍यूमिन लीडर का कर्तव्य निभाने सामने आया. दरवाज़े के पास खड़े होकर वह ज़ोर से घोषणा करता है: “हमारा दूसरी बिल्डिंग में जाना ज़रूरी है, ये पास ही में, इसी सड़क पर है. मगर सावधान कर देता हूँ, महाशयों, ख़ास तौर से जो लोग दूसरे शहरों से आए हैं: रास्ते पर बेहद फ़िसलन है!”

 जादूगर हरकत में आ जाते हैं और एक के बाद एक हॉटेल छोड़ने लगते हैं.

 “एक-एक करके, एक-एक करके! साज़िश के बारे में भूलिए नहीं!”


ये मज़ाक सबको अच्छा लगता है – काली ब्रीफ़केसों के साथ देखकर इन्हें कोई भी सीक्रेट ऑर्गेनाइज़ेशन का मेम्बर समझ सकता था, जो काली रात को अज्ञात गश्तों के बाद बाहर निकलते हैं (इस शहर में श्वेत-रातें होती हैं, मगर सर्दियों के मौसम में नहीं; और सर्दियों में तो यहाँ काली रात जैसा लगता है – देर सुबह तक भी).


रास्ते पर निकलकर कपितोनव पहला ऋतुजैविकी अवलोकन करता है: बर्फ जम गई थी. वह अपना स्कार्फ़ ठीक करता है और, बाएँ पैर से धक्का देकर, क़रीब डेढ़ मीटर तलवों से घिसट जाता है. हमेशा की तरह इन परिस्थितियों में, उसे याद आता है, कि उसे याद है, कि बचपन में उसे मालूम था – रास्ते को ढाँकती बर्फ और फ़िसलन भरी बर्फ में क्या अंतर है. फुटपाथ का हिस्सा, जो बर्फ और हिम से ख़ाली था, हॉटेल के प्रवेशद्वार से दस क़दम पर ख़तम हो जाता है. 

 “बैलेन्स रखने के लिए, प्लीज़ जोड़ियाँ बना लीजिए!” क्या इस समय माइक्रोमैजिशियन र्‍यूमिन मज़ाक कर रहा है, समझना मुश्किल है – लगता है, हाँ: जोड़ों में जाना बहुत ही मुश्किल है, सिर्फ – एक के पीछे एक, बर्फ साफ़ करने वाले फ़ावड़े जितनी चौड़ाई में और सामने से आने वाले पैदल चलने वालों की भलमनसाहत पर ही चलना होगा. 

सबसे पहले र्‍यूमिन ही गिरता है, लीडर – उसे उठाया जाता है और बदन से बर्फ झटक दी जाती है, वह परेशान सा चारों ओर देखता है: अचानक कैसे गिर गया. 


‘तालाब’ पीछे से आकर कपितोनव  को पकड़ लेता है, ‘थैन्क्यू’ बुदबुदाते हुए, इसलिए कि कपितोनव एक ओर को हट गया था. फिर मुड़कर कहता है:

 “बाइ द वे! मुझे अभी अभी ‘काले-वन’ ने फ़ोन किया था, ऑडिट-कमिटी के लिए बाइ-इलेक्शन्स होंगे. हम – आप को.”

 “मुझे?”   “आप मैथेमेटिशियन हैं, और हम आप पर विश्वास करते हैं. किसी और पर विश्वास नहीं किया जा सकता. वर्ना वैसों की तो बोर्ड में भरमार है!...बहस तो ना ही कीजिए, कोई बहाना नहीं!” और वह आगे लपका, जल्दी जल्दी पहले पहुँचने के लिए. 

 “कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, जल्दी ही सर्दियों का समय ख़त्म होने वाला है,” कपितोनव के पीछे से कोई भिनभिनाया, मगर कपितोनव किसी से बात नहीं करना चाहता और ऐसा दिखाता है कि उसने काल-भक्षक को सुना ही नहीं.                  सामने आइसिकल्स टूट-टूट कर गिर रहे हैं – जाने का रास्ता नहीं है. सब लोग सही-सलामत बर्फ के जम चुके टीले पार कर लेते हैं, जिससे कि सड़क के फ़ेन्सिंग लगे हिस्से से बचकर वाहनों वाले रास्ते पर जा सकें. सड़क के दूसरे किनारे पर चीनी खड़े हैं और देख रहे हैं कि आइसिकल्स कैसे गिर रहे हैं. कपितोनव  चीनियों की ओर देखता है, और तभी 


09.37


उसकी बारी आती है – वह फ़िसल कर गिर जाता है.

बुरी तरह गिरा – पीठ के बल. बर्फ से सिर टकरा गया. कराह उठा. ब्रीफ़केस एक ओर को जा गिरी, ये तो अच्छा हुआ कि कार के नीचे नहीं आई. और, फ़ौरन ख़ुद ही उछल कर खड़ा हो गया, किसी बॉक्सर की तरह, जिसे नॉकडाऊन कर दिया गया हो, और जो यह दिखाना चाहता है, कि वह ठीक-ठाक है. 


ओवर कोट की जेब से फ़ोन निकालता है, क्योंकि तभी कॉल आई थी. 

 “हाँ, मरीना?”  “तुम ‘बिज़ी’ तो नहीं हो? बात कर सकते हो?”  बहादुरी से कहता है:  “हाँ, बिल्कुल कर सकता हूँ! (इसी समय उसे ब्रीफ़केस देते हैं.)

 “कुछ हुआ तो नहीं?” 

 “ओह, नहीं, कुछ नहीं, सिर्फ यहाँ बर्फ है...फिसलन भरी बर्फ...(सिर झुकाकर साथियों को धन्यवाद देता है और मुस्कुराकर होठों को खींचकर OK व्यक्त करता है.)

 “और, तुम इस बारे में मुझसे क्या कहोगे?”  “याद दिलाओ, किस बारे में.. (कपितोनव आगे चलता है.)

“क्या तुम सोचते हो, कि वह, जो उसने वहाँ लिखा, उसका, जो हुआ उससे कोई संबंध नहीं है?”  “उससे, जो हुआ?”  “उसकी मौत से,” मरीना ने जोड़ा. वह फिर से बात करने के लिए तैयार नहीं है. मगर, जब बातचीत में शामिल होने की ज़रूरत होती है, कपितोनव अक्सर शामिल हो जाता है. 

“मरीन, प्लीज़, समझने की कोशिश करो,” कपितोनव  पैरों के नीचे देखते हुए कहता है, “मैं कोई शेरलॉक  होम्स नहीं हूँ, मुझे मालूम नहीं है कि क्या सोचना चाहिए. हम यहाँ पास ही में क्लब “सी-9” में जा रहे हैं, वहीं मीटिंग होगी.” 

“तो सुनो. तब – ख़ास बात. क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगा कि वह सब, जो उसने लिखा था, सच है? कि वो – वो नहीं है? और अगर ऐसा है, तो फिर मैं किसके साथ रह रही थी? और वो कहाँ है, मेरा वाला?”


मैजिशियन्स दो बाहर निकली खिड़कियों वाली बिल्डिंग के पास आए, पुराने ज़माने में ये बिल्डिंग दिवालिया लोगों की वेल्फ़ेयर-सोसाइटी की थी (कपितोनव को यह कैसे मालूम है?), और अब समूची दूसरी मंज़िल पर क्लब “सी-9” है, पहली मंज़िल पर (कपितोनव को अभी पता नहीं है) फ़ोटो-गैलरी और वार्डरोब है. 

“मरीनच्का, मैं प्रत्यक्षवादी हूँ.”  “तुम किस तरह के प्रत्यक्षवादी हो!”  “किसी-न-किसी तरह का, मगर मैं ये मानता हूँ, कि हर चीज़ के पीछे कोई तर्क ज़रूर होता है. और उसे अनुभव पर आधारित होना चाहिए. तुम्हारे सवालों को मैं समझ नहीं पा रहा हूँ. हाँ, दुर्भाग्यपूर्ण, दुखभरी घटना है. मगर, यदि वैसा न होता और वह तुम्हें नोटबुक दिखाता और कहता, मरीना, देखो, मैंने कुछ कल्पना की है, पढ़ो, ये मेरी कुछ लिखने की कोशिश है, तुम्हारा क्या ख़याल है, क्या मैं इसे वैज्ञानिक फ़ैन्टेसी की प्रतियोगिता में भेज सकता हूँ, तब तुम उसे क्या जवाब देतीं?”

मरीना ने कहा:  “मेरा ख़याल है कि फ़ैन्टेसी-प्रतियोगिता के लिए रचनाएँ दूसरी तरह से लिखी जाती हैं.”  “मुझे नहीं मालूम कि कैसे लिखी जाती हैं,” प्रवेशद्वार के पास भीड़ से अलग होते हुए कपितोनव जवाब देता है (सिर्फ दरवाज़ों के पास ही अन्दर जाने वालों की भीड़ बढ़ जाती है). “और, क्या तुम जानती हो? वह ख़ुद भी तो नहीं जानता था, वह कोई लेखक तो नहीं था, फ़ैन्टेसी-लेखक नहीं था, वह सोच सकता था, कि इस तरह से भी लिखा जा सकता है, सही है न, मरीना?” 

उसे लगता है कि वह उसे ढ़ाढ़स बंधा रहा है.


मरीना ने पूछा: 

 “तुम उस नौजवान अपराधी के बारे में क्या कहोगे? वही, जिसका चेहरा तुम्हारे ब्यूस्टे में कम्पास से नापा गया था?” भीतर गया. लॉबी. कपितोनव एक तरफ़ हट कर, लोगों की तरफ़ पीठ करके खड़ा हो गया:  “मुझे ऐसे किसीकी याद नहीं है. मैं, शायद, पहले ही निकल गया था.”  “तो ऐसी बात है. मुझे सपना आया. मुझे सपना आया कि मेरा मूखिन...अभी भी कन्स्ट्रक्शन-टीम में है...और तुम तो उसके साथ कन्स्ट्रक्शन-टीम में थे? तुम तो थे?”  “ठीक है, कभी था, तो फिर क्या?”  “और, कि मूखिन...तुम्हें तो याद है, वह किसके साथ?...ये तो तुम्हें मालूम होना चाहिए था?”  “मालूम नहीं कि तुम्हें क्या-क्या सपने आते हैं,” वह रूखेपन से कहता है.

 “उस स्टोरकीपर के साथ. मुझे उसका नाम भी मालूम है. मालूम है, क्या?”  “नहीं.”

 “उसका नाम था याना.”  “क्या ये सब तुमने सपने में देखा?” कपितोनव  दीवार के पास सरकता है (पीठ के पीछे है भीड़, पैरों का पोंछना, क्लोक-रूम, सड़क से आती हुई ठण्ड).

  “हाँ, ये बड़ा अजीब सपना था, बिना किसी फ़ैन्टेसी के, और भी अजीब इसलिए था, कि उसमें कोई भी अजीब बात नहीं थी. उसका नाम था याना. शराबी थी. पीती ही रहती थी. सबको देती थी. सबको. तुमको नहीं दी?”  “मरीना, मैं ऐसी किन्हीं यानाओं को नहीं जानता था, और अगर मैं तुम्हारे सपने में आया था, तो मैं वो नहीं, जो तुम्हारे सपने में आया था, तुम समझ रही हो?”

 “नहीं, तुम मेरे सपने में नहीं आए. मेरे मूखिन ने नशे में उसके साथ संभोग किया, जब वह भी धुत थी. स्टोर में, चौथे सेक्शन में...”  “तुम कौन से सेक्शनों की बात कर रही हो? कोई सेक्शन-वेक्शन नहीं थे...”  “स्टोर में, चौथे सेक्शन के पीछे. परदे के नीचे, जाने के दिन. गैस की बू आ रही थी, वह पूरी तरह धुत थी, जब वह जा रहा था. गैस लीक हो रही थी...वहाँ बहुत सारे रूई के जैकेट्स थे, रूई के जैकेट्स का पहाड़ था...और रेल्वे स्टेशन पर उसने सुना, कैसे उलटियाँ हो रही थीं...तुम सब धुत थे, घबराओ नहीं...और फिर, वह वाक़ई में चली गई, जाने में क़ामयाब हो गई...और ये, उसका बेटा, मूखिन का बेटा बड़ा हुआ...सौतेले बाप को मार डाला...अपने बाप के बारे में पता लगाया...और उसे भी मार डालने का फ़ैसला किया...मगर वह तब तक उस विषय पर आ चुका था...तुम लोगों की खोजों के दायरे में...उसे ढूँढ़ रहे थे...और, ये, उसीको कम्पास से...”  “मरीना, फ़ौरन चुप हो जाओ! ऐसे सपने नहीं हुआ करते! तुम कह क्या रही हो! कोई याना नहीं थी, कोई स्टोर्स नहीं थे, हम लैण्ड-रिक्लेमेशन (भूमि-सुधार) पर काम कर रहे थे...उस समय हर जगह पर लैण्ड-रिक्लेमेशन हो रहा था!...तुम्हें हुआ क्या है? तुम कहाँ हो? अपने दिमाग़ से इस बकवास को निकाल फेंको! तुम्हें इस नोटबुक को भूल जाना चाहिए!”  “नहीं! मैंने जैसे ही तुम्हें वह नोटबुक दी, ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर का कोई हिस्सा टूट कर गिर गया हो. उसके बगैर नहीं रह सकती. मैं उसे लेने के लिए आ रही हूँ, ठीक है? क्या वह तुम्हारे पास है?”  “मेरे पास है. मगर तुम्हें उससे अपना ध्यान हटाना होगा.”  “क्लब “सी-9”...मुझे मालूम है, वहाँ मास्क्स की एक्ज़ीबिशन लगी थी...और जब तुम पढ़ रहे थे, तो क्या तुम्हें नहीं लगा कि मूखिन...” वह ख़ामोश हो गई. मोबाइल एक हाथ से दूसरे हाथ में लेते हुए वह ओवरकोट उतारता है.  “मूखिन क्या?...”

 “ये, कि मूखिन तुम्हारे जैसा है?”  “नहीं, मरीना, हम दोनों में ज़रा भी समानता नहीं थी.”  “मैं असली मूखिन की बात कर रही हूँ, मैं उसके बारे में नहीं कह रही हूँ, जिसने ये सब लिखा था.”

कपितोनव की सांस जम गई.  “मैं उससे बहुत प्यार करती थी.”  अब वह चुप रहता है.  “मैं आकर ले लूँगी.”  “ठीक है,” कपितोनव  ने कहा. 

09.49


वह अपने आप को दूसरी मंज़िल पर इन्स्टेंट कॉफ़ी में उबला हुआ पानी डालता हुआ पाता है: मूखिन से कोई कैसे प्यार कर सकता है?... केतली वापस अपनी जगह पर रख देता है. ख़यालों को झटक कर, एक चम्मच से शक्कर लेता है. ब्रीफ़केस पैर के पास रखी है, और पैर नोटबुक वाली ब्रीफ़केस को अपने पास रखा हुआ महसूस कर रहा है. इन्स्टेंट कॉफ़ी को कपितोनव अक्सर टाल देता है, अक्सर वह उबली हुई कॉफ़ी पीता है, उसके पास तांबे की कॉफ़ीदानी है – सचमुच की, नीना ने ही इस्ताम्बुल में ख़रीदी थी. बिस्कुट लिया, एक टुकड़ा मुँह में डाला. प्रवेश द्वार के पास मेज़ के निकट रजिस्ट्रेशन चल रहा है, कपितोनव  वहाँ जाना चाहता है, मगर सही वक़्त पर उसे याद आया कि वह यंत्रवत् रजिस्ट्रेशन करवा चुका है: जैसे ही वह लॉबी में दाख़िल हुआ, उससे नाम पूछा गया था. एक घूँट लेकर कपितोनव  सोचता है: मैं कोई ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट नहीं हूँ (उसकी याद आ गई – हॉटल में काऊंटर के पास वाले). 

डेलिगेट्स समय के अवकाश में बातचीत कर रहे हैं 

09.53


और स्थान के अवकाश में बिल्कुल भी हलचल नहीं कर रहे हैं – अपनी जगह पर खड़े हैं, ज़्यादातर – जोड़ियों में, और जहाँ कहीं ग्रुप बना है, तो वहाँ पर वे ही हैं – हाइपर-चीट्स और हाइपर-जेबों वाले, ये न जाने क्यों ग्रुप्स में रहना पसन्द करते हैं. 

टी.वी. वाले यहाँ पहले ही आ चुके हैं. कॉरेस्पोंडेंट लड़की जुपितेर्स्की का इंटरव्यू ले रही है. अब कपितोनव उसका चेहरा एक किनारे से नहीं, जैसा तब देखा था, बल्कि सामने से देख रहा है, और वह उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से हैरत में पड़ गया है. दिल चाहता है कि पास जाकर देखे, कहीं नज़र का धोखा तो नहीं है, या मेक-अप का करिश्मा तो नहीं है?

मगर तभी ‘तालाब’ उसके पास आता है: “आपके प्रोग्राम को एक डाइरेक्टर की ज़रूरत है. मेरे पास एक है. मगर, मुझे डर है कि उसे देर हो रही है, इसलिए बाद में... आपसे मिलना चाहता है, बेहद. बाइ दि वे, महाशय नेक्रोमैन्सर (ओझा) कहाँ हैं? क्या वह हॉटेल से निकले थे?”  “नहीं, मैंने सिर्फ काल-भक्षक को देखा था. बल्कि, सही कहूँ तो, सुना था. वह मेरे पीछे चल रहा था, और सर्दियों के मौसम के ख़त्म होने के बारे में कुछ बुदबुदा रहा था.” “उससे सहानुभूति का व्यवहार करेंगे,” तालाब ने हौले से कहा. “हमारे लड़के - रिमोटिस्ट्स हैं. समस्या एक ही है – वे एक दूसरे को पसन्द नहीं करते. काल-भक्षक की तो ज़्यादा समस्या नहीं है, मगर वो दोनों...”  और जुपितेर्स्की के बारे में ‘तालाब’ बताता है:  “जानते हैं, अभी वह किस बारे में बता रहा है? ये, कि पीटरबुर्ग के नॉनस्टेजर्स मॉस्को के नॉनस्टेजर्स से किस तरह भिन्न हैं. जैसे सिर्फ भिन्नताओं के बारे में ही बताना चाहिए! और आपने सुना, मैं कैसे इंटरव्यू दे रहा था? मैंने सबके बारे में अच्छा ही कहा. सभी के बारे में. किसी को अलग-थलग नहीं रखा, किसी को छोड़ा नहीं. अब देखिए, कितना फ़र्क है हम दोनों में?” 

हॉल में आने का अनाउन्समेंट होता है. 

कपितोनव से ये कहकर कि, “बाईं ओर बैठना”, ‘तालाब’ सबसे पहले लॉबी छोड़ कर जाता है. जान छुड़ाता हुआ जुपितेर्स्की, इस डर से कि कहीं पीछे न रह जाए, उसके पीछे भागता है, मगर अपने लोगों को साथ बुलाता है. कपितोनव कॉफ़ी ख़त्म करता है, और तभी उसकी नज़र कॉरेस्पोंडेंट लड़की पर पड़ती हैं. वह मुस्कुराती है और ऑपरेटर से कुछ कहती है. वे उसके पास आते हैं.  “हमने आपकी भी वीडियो लेने का फ़ैसला किया है. कोई आपत्ति तो नहीं है? आप तो संख्याएँ बूझते हैं ना?”  “हाँ,” कपितोनव  ने अत्यंत संक्षिप्त उत्तर देता है.  “मैं बगल में खड़ी रहूँगी. तो, वितालिक?” वह ऑपरेटर से पूछती है.  “थोड़ा सा और बाएँ...बस, बस. ले रहा हूँ.”               

  “तो, हम मन में संख्याएँ सोचते हैं और बूझते हैं,” वह कैमेरे के सामने जानबूझकर उकसाने वाले अंदाज़ में कहती है. “कुछ असंभव सी चीज़ होने वाली है! अभ्भी! आपकी नज़रों के सामने...” 

बड़ी-बड़ी आँखों के सामने बड़ी-बड़ी पलकें भी हैं... ‘मेरे बीस साल कहाँ हैं?’ – कपितोनव कहना चाहता है. वह उसकी ओर देखती है. और – कुछ-कुछ सांस खींचकर कहती है:

  “मैं तैयार हूँ.”  “दो अंकों वाली संख्या सोचिए.”  “दो अंकों वाली?” और उसकी आवाज़ में कपितोनव को निराशा की झलक सुनाई देती है. “क्या बड़ी संख्या सोच सकते हैं?”  “कोई भी. बस, सिर्फ दो अंकों वाली.”  “सोच ली!” वह तीन जोड़ने को और दो घटाने को कहता है. जोड़ते और घटाते हुए, वह छत की ओर आँखें घुमाती है.

 “हो गया. बताऊँ?”  “किसी हालत में नहीं! मैं ख़ुद बताऊँगा.” यहाँ वह समझ जाता है, कि कहने के लिए उसके पास कुछ नहीं है. वह नहीं जानता कि उसने कौन सी संख्या सोची थी. वह उसकी अथाह आँखों में देखता है और पाता है कि वह चाहती है कि उसका जवाब सही निकले. वह भौंहे थोड़ा सा ऊपर उठाती है, अपनी लम्बी, पतली गर्दन निकालती है, होठों का बिगुल बनाते हुए मुँह कुछ खोलती है, जैसे वह उसकी अंतिम बार कडा ज़ोर लगाने में मदद कर रही है, और इंतज़ार करती है, इंतज़ार करती है, मगर वह – नहीं बता सकता.        “नहीं.” सांस बाहर छोड़ता है.


वह सहानुभूति से मुस्कुराती है. वह परेशान हो जाता है. ऑपरेटर कैमेरा बन्द कर देता है. 

“क्या आपने सचमुच में सोची थी?”  “बेशक, हाँ!”  “दो अंकों वाली संख्या?”

 “ज़ाहिर है. आप ही ने तो कहा था.”  “नहीं हो सका. ओफ़.”

 “सॉरी,” वह कहती है, “ बस, आप परेशान न होईए, दूसरी बार हो जाएगा. हर बार तो नहीं ना हो सकता.”  “अगर सिक्रेट न हो तो, आपने कौन सी संख्या सोची थी?”  “222.”

 “मगर ये तो तीन अंकों वाली है!”  “नहीं, आप क्या कह रहे हैं! तीन अंकों वाली होगी – 333.” इसी समय कपितोनव  को हॉल में बुलाया जाता है – वह आख़िरी डेलिगेट है, जो भीतर नहीं गया था.  “माफ़ कीजिए,” कपितोनव  कहता है.  

10.05


हॉल, स्टेज, मेज़. हाथों की सफ़ाई वाला मोर्शिन ए. वी. – मीटिंग का अध्यक्ष.  “आदरणीय साथियों! कॉन्फ्रेन्स के दूसरे दिन का काम काज शुरू करने की घोषणा करते हुए, मुझे स्वागत आदि के बिना आगे बढ़ने की अनुमति दें. अगर मैं ये कहता कि इस हॉल में आपका स्वागत करते हुए मुझे प्रसन्नता हो रही है, तो मैं झूठ कहता. नहीं, बेशक, आपका स्वागत करने में मुझे ख़ुशी हो रही है, मगर फिर भी मेरी, और साथ ही आपकी भी ख़ुशी, मेरा ख़याल है, तब पूरी ख़ुशी होती, अगर हमारी मीटिंग यहाँ नहीं, बल्कि, कल के समान – हॉटेल के बड़े हॉल में हुई होती, मगर, अफ़सोस की बात है कि हमारे लिए अज्ञात षड़यंत्रकारी की उस गुण्डागर्दी वाली, स्पष्ट कहूँ तो, आपराधिक हरकत के बाद, हम सही शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं डरेंगे: षड़यंत्रकारी! – मैं फिर से दुहराऊँगा : षड़यंत्रकारी! – उस सब के बाद हॉटेल के एडमिनिस्ट्रेशन ने, हम उनकी परिस्थिति समझ सकते हैं, हमें आपकी परिचित बिल्डिंग को किराए पर देने से इनकार कर दिया, मगर इससे इस आर्ट क्लब “सी-9” के प्रति हमारी कृतज्ञता में कोई फ़रक नहीं पड़ता, जिसने हमें यहाँ आसरा दिया. एक बार फिर से हार्दिक धन्यवाद.”              

 “और रात्रि-भोज?” हॉल में एक आवाज़ गूंजी.  “क्या रात्रि-भोज? रात्रि-भोज के कार्यक्रम में फ़िलहाल कोई परिवर्तन नहीं है. फ़ायर-प्लेस वाला हॉल, उम्मीद करता हूँ कि हमसे नहीं छीनेंगे. मगर सिर्फ इसलिए, कि ये आयोजन अन-ऑफ़िशियल है. एडमिनिस्ट्रेशन की पाबन्दी सिर्फ ऑफ़िशियल आयोजनों पर है. मगर, मैं रात्रि-भोज के मूड को प्रोत्साहन नहीं देना चाहता. हमारे सामने अभी कामकाज का दिन पड़ा है, और अगर कल के दिन के बारे में कहें, तो हम मुश्किल में हैं. और एक बार – जहाँ तक बीते हुए कल का सवाल है – जिससे विषय को ख़त्म कर सकूँ. कॉन्फ्रेन्स को ख़त्म करने की दुर्भावनापूर्ण कोशिश की गई. हम किसी की राह में रोड़ा बन रहे थे. मैं याद दिलाऊँगा कि हॉल में बम रखे जाने के बारे में पुलिस को अज्ञात फ़ोन ठीक उसी समय मिला, जब हमारे ‘गिल्ड के चार्टर’ के बारे में ज़ोरदार बहस हो रही थी. मैं उम्मीद करता हूँ कि ये दुश्मन हमारे अपनों में से न हो, बल्कि कोई बाहरी व्यक्ति हो. हर हाल में, मैं याद दिलाऊँगा कि ऐसी ग़ैरकानूनी हरकतें, सही कहूँ तो अपराध, सीधे क़ानून के दायरे में आते हैं, और मुझे मालूम नहीं कि पुलिस क्या कार्रवाई करेगी, मगर, यदि अचानक हमारे ही बीच में वह विलन, वह षडयंत्रकारी निकल आए, चाहे मैं भी क्यों न होऊँ, या फिर यहाँ उपस्थित लोगों में से कोई और क्यों न हो, सही शब्दों का इस्तेमाल करने से नहीं डरेंगे: विलन, षड़यंत्रकारी...फिर से: षड़यंत्रकारी!...उसके प्रति कोई दया नहीं दिखाई जाएगी, उसके समर्थन में कोई संयुक्त पत्र नहीं लिखे जाएँगे!...हमसे वह दया की ज़रा सी भी उम्मीद न रखे! अपने कामों की ज़िम्मेदारी लेनी होगी! और फ़ुल-स्टॉप लगाते हैं.”

तालियाँ.  “और, अगर किसी को हमारे सहारे की ज़रूरत है, तो वह हैं हमारे मित्र, उच्च श्रेणी के जादूगर-हाथों की सफ़ाई, वदीम वदीमविच पेरेदाश को, मुझे इस बारे में बताते हुए अफ़सोस हो रहा है, मगर उसे कल अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. अगर किसी को मालूम नहीं है, तो मैं बताता हूँ: वदीम पेरेदाश कल शाम को सड़क पर फ़िसल कर गिर पड़े थे और अपना पैर तुड़वा बैठे. अगर आपको याद हो, कि कॉन्फ्रेन्स की ऑर्गेनाइज़िंग कमिटी ने दूसरे शहरों से आए हुए मेहमानों को चेतावनी दी थी, कि सेंट-पीटरबर्ग जमी हुई सख़्त बर्फ की दृष्टि से बेहद ख़तरनाक जगह है. गर्मियों में पीटरबर्ग में श्वेत-रातें होती हैं, मगर सर्दियों में कड़ी बर्फ़, बेहद फ़िसलन भरी. आइसिकल्स की तो बात ही न करें. कृपया सावधान रहें, याद रहे कि आप कहाँ हैं...मैं संपादकीय समिती से प्रार्थना करता हूँ कि कॉन्फ्रेन्स की ओर से पेरेदाश को नैतिक समर्थन व्यक्त करते हुए पत्र भेज दे, हम मरीन्स्की हॉस्पिटल में अपनी शुभ कामनाएँ भेज देंगे, जहाँ पेरेदाश पड़ा है, उसे अच्छा लगेगा. वदीम पेरेदाश जल्दी से ठीक हो जाए. कोई आपत्ति तो नहीं है?” 

तालियों से जवाब दिया जाता है.  

”धन्यवाद,” प्रेसिडेंट कहता है, “ मगर फिर भी, हमने कल कुछ काम तो किया ही है. हमारे पास है प्रेसिडियम, सेक्रेटरी, कॉन्फ्रेन्स का अध्यक्ष, ये मैं, याने मैं अध्यक्ष हूँ, समय पर चुनी गईं कुछ कार्य-समितियाँ हैं – संपादन समिति, मैन्डेट कमिटी, ऑडिट कमिटी, और – इसकी मुझे उम्मीद है – हमारे पास प्रमुख चीज़ है: प्रॉडक्टिव काम के लिए ‘मूड’. आज अन्य बातों के अलावा हमें अपने चार्टर को मंज़ूरी देनी है, गिल्ड के बोर्ड का और प्रेसिडेंट का चुनाव करना है. मगर अभी... अभी हमारे सामने एक टेक्निकल प्रॉब्लम है...मिखाइल विताल्येविच,” वह ऑडिट कमिटी के अध्यक्ष से मुख़ातिब होता है, “प्रॉब्लेम के बारे में बताएँ.” 

ऑडिट कमिटी का अध्यक्ष माईक के पास आता है.  “प्रॉब्लेम वही है. कॉन्फ़्रेन्स के निर्णय के अनुसार, ऑडिट कमिटी में तीन आदमी होने चाहिए. मगर वदीम वदीमविच पेरेदाश अपना पैर तुड़वा बैठे और ऑडिट कमिटी के सदस्य की ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकते. फिर से चुनाव करना होगा.”  “धन्यवाद,” कॉन्फ्रेन्स के अध्यक्ष ने कहा. वदीम वदीमविच की बीमारी को देखते हुए ऑडिट कमिटी के सदस्य के दुबारा चुनाव करवाने के प्रस्ताव को मैं मतदान के लिए प्रस्तुत करता हूँ. कौन पक्ष में है? कौन विरोध करता है? कौन अपना वोट नहीं दे रहा है? क्या सर्व सहमति से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया? नहीं? माफ़ कीजिए – सिर्फ एक ने अपना वोट नहीं दिया. इस सकारात्मक दृष्टिकोण के लिए धन्यवाद. कृपया अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम दें.”


‘तालाब’ उठता है. 

 “ऑडिट कमिटी के लिए मैं एव्गेनी गिन्नादेविच कपितोनव का नाम प्रस्तुत करता हूँ. वह प्रोफ़ेशनल मैथेमेटिशियन है, और मैं समझता हूँ कि उसकी उम्मीदवारी सबसे अच्छी है.” जुपितेर्स्की के कैम्प में फ़ौरन हलचल होने लगी: उन्होंने फ़ौरन कपितोनव  के हमनाम - जादूगर एव्गेनी अर्कादेविच बोझ्को के नाम का प्रस्ताव रख दिया. वजह: बोझ्को ऑडिट कमिटी से निकल चुके पेरेदाश ही की तरह डाइनिंग टेबल पर जादुई कारनामे दिखाने में माहिर है. कभी वे एक साथ साल्ट-पेपर शेकर्स का खेल दिखाया करते थे. 

अध्यक्ष दोनों उम्मीदवारों के लिए वोटिंग का सुझाव देने ही वाला था, कि कॉन्फ्रेन्स ने (ख़ास तौर से जुपितेर्स्की के ख़ेमे के लोगों ने) आरंभिक चर्चा करने का प्रस्ताव रखा. बोझ्को की उम्मीदवारी के बारे में तो कोई सवाल ही नहीं है, मगर कपितोनव  की उम्मीदवारी पर जम के बहस होती है.


चर्चा का आरंभ करता है लिओनीदव-ज़ापोल्स्की, जो काफ़ी पहुँचा हुआ माइक्रोमैजिशियन है. 

 “ इस तथ्य को, कि आदरणीय कपितोनव महाशय एक प्रोफेशनल मैथेमेटिशियन हैं, ऑडिट कमिटी की सदस्यता के लिए उनकी उम्मीदवारी की योग्यता के रूप में नहीं देखा जा सकता. हम अपने सम्माननीय सहयोगी की दो अंकों वाली संख्याएँ बूझने की कला का बहुत सम्मान करते हैं, मगर प्रस्तुत परिस्थिति में मैथेमेटिक्स की मूलभूत मान्यताओं के साथ कमाल करने की योग्यता हमारे लिए, जो मैथेमेटिशियन्स नहीं हैं, और जो हर चीज़ की सीधी-सादी गिनती में ही दिलचस्पी रखते हैं, कोई गंभीर समस्या खड़ी कर सकती है. कपितोनव महाशय का मैं बेहद सम्मान करता हूँ, मगर इसके बावजूद मैं अपील करता हूँ कि उन्हें वोट न दें.” ’तालाब’ इस पर आपत्ति करता है: 

 “प्यारे साथियों, ये व्यावसायिक गुण कब से हमें बुरे लगने लगे? किसी ज़माने में ऑडिट कमिटी में काऊण्टिंग से संबंधित, संख्याओं के विषेशज्ञ, सांख्यिक सिद्धांत के विद्वान प्रोफ़ेशनल को प्रधानता दी जाती थी, और यहाँ हम उसी विशेषता के कारण उसके साथ भेद-भाव कर रहे हैं. हमारे बीच सिर्फ एक ही मैथेमेटिशियन है. ऑडिट कमिटी में अगर उसे नहीं, तो फिर किसे होना चाहिए?” 


लिओनीदव-ज़ापोल्स्की इसका विरोध करता है:  “माफ़ कीजिए, अगर ये जादूगरों-नॉनस्टेजरों की न होकर कोई और, जैसे जंगली जानवरों के ट्रेनर्स की, या फिर कोई और कॉन्फ्रेन्स होती, या फिर मैथेमेटिशियन्स की ही होती, तो फिर कौन बहस करता? उस हालत में हम निश्चय ही मैथेमेटिक्स के विद्वान को ऑडिट कमिटी के लिए चुनते, मगर न तो हम ट्रेनर्स हैं, न ही कोई और, हम, आप ख़ुद ही समझते हैं, जादूगर हैं, और हमारे विशेषज्ञ को किसी अटपटी परिस्थिति में क्यों डालें, जब उसके प्रति पूरे विश्वास की भावना रखते हुए, हम किसी भी तरह से उसके प्रति अविश्वास की भावना को दूर नहीं कर सकते? कृपया इसे व्यावसायिक अविश्वास समझें.” 

हेरा-फेरी वाला माखव:  “मैं पिछले वक्ता से सहमत हूँ. किसी का भी अपमान नहीं करना चाहता, मगर आप सब जानते हैं, कि बगीचे में, मैं नहीं बताऊँगा, किसे नहीं छोड़ना चाहिए. मुझे, मिसाल के तौर पर, मैंडेट कमिटी में इस उम्मीदवारी पर कोई आपत्ति नहीं है. मगर, सिर्फ ऑडिट कमिटी में नहीं!” 

 “ये सरासर बेइज़्ज़ती है!” लोग अपनी-अपनी जगह से चिल्लाए. “उसने इन्सान का अपमान किया है! इसने कॉन्फ्रेन्स का अपमान किया है!”  “मैंने अपमान किया है! कहाँ अपमान किया है?”  “माखव महाशय, हम बग़ीचा नहीं हैं!” कॉन्फ्रेन्स के अध्यक्ष ने कहा. “सभी से अपील करता हूँ कि शांत रहें. चलिए, आख़िरकार वोटिंग कर लेते हैं. ये सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है. वलेन्तीन ल्वोविच, आप तो पहले ही बोल चुके हैं...”

 “एक सेकंड, एक सेकंड!” ‘तालाब’ बेहद परेशान है : उसे बोलना ही है.  “वलेन्तीन ल्वोविच, प्लीज़, समय को तो बख़्श दीजिए!”


10.27


“दोस्तों-जादूगरों!” ‘तालाब’ माइक्रोफोन से दूर नहीं हटता, “ईमानदारी से बात करेंगे, यहाँ, हम सब जादूगर हैं, हम सब मैनिप्युलेटर्स हैं, ये हमारी कला है, और उसमें हम प्रवीण हैं. मगर, आप ख़ुद ही सोचिए, इस सवाल का जवाब दीजिए: मैनिप्युलेशन के विषय की दृष्टि से संख्याएँ ताश के पत्तों से, रुमाल से, दोमिनो के पांसों से और इसी तरह की हमारी दूसरी पसन्दीदा चीज़ों से किस बात में अलग हैं? अगर हम संख्याओं के मैनिप्युलेटर को ऑडिट कमिटी का सदस्य बनाने से इनकार करते हैं, तो उसी आधार पर मैण्डेट कमिटी में भी न तो ताश के पत्तों के विशेषज्ञ को, न तीलियों के माइक्रोमैजिशियन को, और न ही स्लीव्ज़-जादूगर को शामिल करना चाहिए. और वे अचानक हमारी वैधता के साथ हेरा-फेरी करने लगेंगे, मैण्डेट्स के साथ जादू करने लगें तो? अगर हम कपितोनव  को ऑडिट कमिटी में इस आधार पर नहीं चुनते हैं, कि वह मैथेमेटिशियन है, तो हम एक ख़तरनाक मिसाल क़ायम करेंगे, हम ख़ुद ही अपने पैरों के नीचे टाइम-बम रख रहे होंगे, अपने आप को विकलांगता की ओर मोड़ रहे होंगे, समस्याओं का जेनेरेटर स्थापित कर रहे होंगे, जो कभी न कभी हमारी कार्यक्षमता पर सवालिया निशान लगा रही होंगी! कम से कम इसीलिए हमें कपितोनव  को वोट देना चाहिए!”

 अनुभवी जादूगर म्शीन्स्की स्टेज पर आता है – वह शांत है, उसके चेहरे पर – ज्ञान की गरिमा झलक रही है.  “आप मुझे जानते हैं, मैं पुराना जादूगर हूं. मुझे बताइए, क्या हमारे बीच कोई ऐसा है, जो सौ तक की गिनती न जानता हो? और एक सौ पचास तक? बहुत ख़ूब! सब जानते हैं. मैं आपके सामने ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ, कि इंटीग्रल-कैल्कुलस क्या होता है, मैं नहीं जानता, मगर मैं ये जानता हूँ कि 62 और 67 में कौन सी संख्या बड़ी है. मुझे यक़ीन है कि आप भी जानते हैं, कि 62 से 67 कितना ज़्यादा है.”

 “पाँच!” सब अपनी-अपनी जगह से चिल्लाए. “पूरे पाँच!”

 “बिल्कुल सही! तो, फिर प्रॉब्लेम कहाँ है? प्रॉब्लेम ये है कि कपितोनव  को, इंटीग्रल-कैल्कुलस के विद्वान को ऑडिट कमिटी में लेने का मतलब है – तार्किक बुद्धि का मज़ाक उड़ाना! ये चिड़ियों को मारने के लिए तोप का इस्तेमाल करने जैसा हुआ! ये... तथ्यों को अतिरंजित करना हुआ! और, ऑडिट कमिटी का तथ्य सिर्फ एक है – गिनने की योग्यता होना! – एक, दो, तीन!... सौ तक गिनने की योग्यता होना! ज़्यादा से ज़्यादा डेढ़ सौ तक!” 

वोटिंग की गई. कपितोनव  ऑडिट कमिटी में नहीं चुना जाता. बोझ्को को चुन लिया जाता है. 


 “बुरा न मानिए,” दाईं ओर बैठा माइक्रोमैजिशियन ज़ाद्नेप्रोव्स्की फुसफुसाकर कपितोनव  से कहता है. 

 “क्या कह रहे हैं, मैं तो ख़ुश हूँ.”

 “फिर भी, अपमान तो लगता ही है.”  “हूँ, “अपमान”. अपमान – जब अपमान होता है, तब, वाक़ई में – अपमान लगता है!” कपितोनव  शुरुआत करता है.   

उसे अच्छा नहीं लगता कि उसका सांत्वन किया जा रहा है.  “माफ़ कीजिए. बस, काफ़ी समय से मीटिंग्स में नहीं गया हूँ.”

 “बोर हो रहे हैं?”  “बहुत नहीं.” 

बहस में एक ही बात छाई रही, - और वो ये कि, कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट्स द्वारा कपितोनव पर जैसे दो पहलुओं से विचार किया जा रहा था: एक तरफ़ से - सिर्फ कपितोनव  और दूसरी तरफ़ से - सिर्फ कपितोनव  की उम्मीदवारी. समझना मुश्किल है, कि इनमें से किस पहलू की हार हुई थी – हो सकता है, दोनों की ही हुई हो?

 हार जिसकी हुई, वह था ‘तालाब’. हालाँकि वह इसे ज़ाहिर नहीं होने दे रहा था. 

 “साथियों, हमारे सामने काफ़ी काम है. आपसे सक्रियता की उम्मीद करता हूँ!” 

अध्यक्ष ने घड़ी की ओर देखा. 

10.41                          


मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेंट बोलने की इजाज़त चाहता है. प्लीज़. 

मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेंट माइक्रोफ़ोन के पास आता है.

 “साथियों, दो बातों की तरफ़ आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ.”

 “बोलिए,” कॉन्फ्रेन्स का अध्यक्ष कहता है और फिर से घड़ी देखता है. 

10.43                                  

 “पहली बात. हमने अभी-अभी वदीम वदीमविच पेरेदाश को ऑडिट कमिटी से बाहर निकाल दिया है, सवाल ये है, कि क्या हम, आम तौर से, उसे कॉन्फ्रेन्स का डेलिगेट समझते रहेंगे, बावजूद इसके कि वह अनुपस्थित है, और काफ़ी हद तक कार्य सक्षम नहीं है?”  “ये कैसा सवाल है? बेशक, समझते रहेंगे!” हॉल से जुपितेर्स्की के लोग चिल्लाते हैं.

 “वर्ना कैसे?” कॉन्फ्रेन्स के अध्यक्ष ने कहा. “इसमें पेरेदाश का तो कोई क़ुसूर नहीं है कि पीटरबुर्ग की सड़कों पर चलना ख़तरनाक है. दुर्घटना तो हममें से किसी के भी साथ हो सकती थी. मैं समझता हूँ कि वोटिंग के समय पेरेदाश की स्थिति के बारे में सवाल उठाने की कोई ज़रूरत नहीं है. हाँ, वह अनुपस्थित है. उसकी अनुपस्थिति से कोरम पर कोई असर नहीं पड़ेगा. कोरम पूरा न होने का कोई डर नहीं है. और फिर, आपने ख़ुद ही उसे कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट का अधिकार दिया है!” 

 “तो, उस हालत में,” मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेंट कहता है, “जब गुप्त मतदान होगा, तो हमें उसके लिए अस्पताल में बैलेट-बॉक्स भेजना पड़ेगा.”  “भेजेंगे! कोई बात नहीं!” जुपितेर्स्की के ख़ेमे से लोग चिल्लाते हैं.  “उस हालत में हम कभी भी ख़तम नहीं कर पाएँगे! कभी भी यहाँ से नहीं जा पाएँगे!” ‘काले-वन’ के ख़ेमे से लोग चिल्लाते हैं.           “हाँ, ये सवाल आसान नहीं है,” अध्यक्ष फिर घड़ी पर नज़र डालता है. 


10.45


“चलिए, वोटिंग से पहले उसे सुलझाने की कोशिश करते हैं. दोस्तों, मैण्डेट कमिटी और ऑडिट कमिटी से निवेदन करते हैं, कि इस सवाल पर वे मिलकर ग़ौर करें और बोर्ड एवम् प्रेसिडेंट के चुनाव से पहले अपना सुझाव दें.”

 “तो फ़िर, मैं कॉन्फ्रेन्स को सूचित करता हूँ, कि कल के मुक़ाबले कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट्स की संख्या में इस तरह से परिवर्तन हुआ है. ‘आऊट’ – पेरेदाश के संबंध में कोई निर्णय होने तक यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा. ‘इन’ – दो. पहला – आपका परिचित कपितोनव , जहाँ तक दूसरे का सवाल है, तो मेरे भाषण का संबंध इसी बात से है.”  “प्लीज़, अगर संभव हो तो संक्षेप में कहें,” कॉन्फ्रेन्स का अध्यक्ष विनती करता है.

 “संक्षेप में कहूँगा. आप जानते हैं कि हमारे बीच तथाकथित ‘रिमोटिस्ट्स’ भी  उपस्थित हैं...”  “ ये ’तथाकथित’ क्यों?!” ‘तालाब’ उत्तेजित हो जाता है.  “माफ़ी चाहता हूँ, सिर्फ ‘रिमोटिस्ट्स’. हालाँकि उनके साथ सब कुछ इतना आसान नहीं है. एक रिमोटिस्ट ने, जो ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट के नाम से जाना जाता है, जो कल हमारे यहाँ आया था और आज हमारे बीच है, हम पर पाबन्दी लगा दी है कि उसे न केवल अपने नाम, पिता के नाम और कुलनाम से न बुलाया जाए, बल्कि किन्हीं भी ऑफ़िशियल डॉक्यूमेन्ट्स में उसके नाम, पिता के नाम और कुलनाम का उल्लेख न किया जाए, और ख़ासकर - मैण्डेट कमिटी के मसौदे में. बातों बातों में ये भी बता दूँ, कि दो अन्य रिमोटिस्ट्स, महाशय नेक्रोमैन्सर (ओझा) और काल-भक्षक, काफ़ी देर तक मनाने के बाद इस बात के लिए तैयार हो गए कि ऑफ़िशियल डॉक्यूमेंट्स में उनके कुलनाम, नाम और पिता के नाम को पासपोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार लिखा जाए. सिर्फ ईवेंट-आर्किटेक्ट अपनी बात पर अड़ा है. मैं कॉन्फ्रेन्स से विनती करता हूँ कि यहाँ उपस्थित ईवेंट्स-आर्किटेक्ट पर ज़ोर डालें.”

 सब लोगों को नहीं मालूम है, कि ईवेंट्स-आर्किटेक्ट देखने में कैसा है और वह कहाँ बैठा है. यदि काल-भक्षक, अपनी दुर्बोधता के बावजूद लोगों की नज़र में आ चुका है, और नेक्रोमैन्सर महाशय सबकी आँखों का कांटा बन गया है, तो कॉन्फ्रेन्स में देर से पहुँचने के कारण ईवेंट्स-आर्किटेक्ट का अभी तक किसी से परिचय नहीं हो पाया था. लोग अपने सिर घुमाते हैं, एक दूसरे से ये पूछते हुए, कि वह कहाँ है.


मगर वह छुप कर कुर्सी में सिकुड़ गया.


मगर मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेंट उसे अज्ञात नहीं रहने देता. 

 “ये रहा!” उसकी ओर ऊँगली से इशारा करता है.  “आप क्या कर रहे हो, प्यारे? ऐसा क्यों कर रहे हो? ये बेहूदगी है!” उसकी बगल में बैठे हुए कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट्स उलाहने देते हैं.                      


कपितोनव अपनी क़तार से ग़ौर करता है कि इस समय ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट कल वाले जैसा नहीं लग रहा है, जैसा कि उसने रिसेप्शन के पास उसे पाया था – आज वह तरोताज़ा लग रहा है और आज उसने बिल्कुल इन्सानों जैसे कपड़े पहने हैं, हालाँकि ये भी चौंकाने वाले ही थे – कुछ सहायक मज़दूर के ‘ओवर-आल’ (चोगा) जैसा, साफ़-सुथरा, नीले रंग का, मगर, लगता है, किसी और का ही उतरा हुआ. 


ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट उछलता है और कहता है:  “मैं ‘कोई’ नहीं हूँ! मैं कोई नाम-वाम नहीं हूँ! मैं ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट हूँ! मैंने कल हॉटेल में भी अपना नाम नहीं बताया था!”   

 “हाँ, सही कहता है,” ‘तालाब’ कहता है. “वाक़ई में उसने हॉटेल में रहने से इनकार कर दिया था.”  “क्योंकि वे रजिस्ट्रेशन के लिए मुझ पर ज़ोर डाल रहे थे – मेरे असली नाम के साथ! मगर मैं – न तो सीदरोव हूँ, ना ही पित्रोव! ना माइकल जैक्सन, ना ही रबिनोविच! मैं – ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट हूँ!”  “आपने रात कहाँ गुज़ारी?” कॉन्फ्रेन्स के अध्यक्ष ने पूछा. 

 “बाकुनिन एवेन्यू पर बाथ-हाऊस में!” ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट ने गर्व से कहा. 

हॉल में किसी ने सीटी बजाई, किसी ने ‘आह!’ कहा, कोई ठहाके लगाने लगा.  

 “क्या वहाँ कोई हॉटेल है?”  

 “वहाँ जेटी मज़दूरों का मुसाफ़िरखाना है, वे मेरे शागिर्द हैं!”

अध्यक्ष के चेहरे पर चरम विस्मय का भाव छा गया.

 “आपके सिद्धांतों के प्रति आदर का भाव रखते हुए हम आपको कोई फ्लैट दे सकते थे! आप ऑर्गेनाइज़िंग कमिटी से क्यों नहीं मिले?”  “अजीब बात है, कि इसे बिना पासपोर्ट के टिकट किसने दिया होगा?” पीले सूट में माइक्रो-मैजिशियन चिल्लाया.  “क्या वे भी शागिर्द हैं? ये पीटर तक आया कैसे?”  “ ‘लिफ्ट’ ले लेकर!”  “ ‘लिफ्ट’ ले लेकर?...सर्दियों में?...” 

हॉल में शोर-गुल मच गया. अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएँ सुनाई दे रही थीं: “शाबाश!” , “क्लीनिक!”


 “मगर, फिर भी मैण्डेट कमिटी की ओर से,” प्रेसिडेण्ट ने घोषणा की, “मैं यहाँ उपस्थित रिमोटिस्ट्स से निवेदन करता हूँ. काल-भक्षक, महाशय नेक्रोमैन्सर! अपने कॉम्रेड को समझाइये!”

 “नेक्रोमैन्सर नहीं है! वह कॉन्फ्रेन्स को ‘इग्नोर’ कर रहा है!” लोग अपनी-अपनी जगह से चिल्लाते हैं. “नेक्रोमैन्सर क्यों नहीं है?” 

मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेंट विनती करता है: 

 “काल भक्षक, कम से कम आप ही उसे मनाइये!”


वह बड़ी मुश्किल से उठा. चेहरे पर हरियाली, पलकें सूजी हुईं. कपितोनव  ने अपनी अनिद्रा के बारे में सोचा, कि इसकी बीमारियों के मुक़ाबले में तो वो कुछ भी नहीं है.  “हम कॉम्रेड नहीं हैं,” काल-भक्षक ने हौले से कहा. “हममें से हरेक अपने आप में परिपूर्ण है.”

 “एक विशेष प्रस्ताव,” ‘तालाब’ ने हाथ उठाया. “सारे कार्यकारी कागज़ात में उसका नाम वैसे ही रखें, जैसे वह चाहता है, मगर कुछ ख़ास रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए, जिनमें कुलनाम, नाम, और पिता का नाम दर्शाया गया हो.”

 “ये और कौन सी सीक्रेट रिपोर्ट्स हैं?” मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेण्ट ‘तालाब’ का मतलब नहीं समझता. 

 “मतलब, जो सीक्रेट हैं!” ‘तालाब’ कहता है.

 “मैं विरोध करता हूँ,” ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट की आवाज़ निकलती है.  “आपको तो उनके बारे में कभी पता ही नहीं चलेगा!”

 “इसमें कोई बात है, कोई सकारात्मक,” कॉन्फ्रेन्स का अध्यक्ष ‘तालाब’ का समर्थन करता है. “मैण्डेट कमिटी इस बारे में सही ढंग से सोचे. और एडिटोरियल बोर्ड भी सोचे. यह विषय समाप्त हुआ. बहुत हुआ. वर्ना तो हम कभी भी,” उसने घड़ी पर नज़र डाली. 

11.02


 “मुख्य बात तक पहुँच ही नहीं पायेंगे.”  माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी, बड़ी बो-टाई लगाए, और वैसे भी सम्माननीय व्यक्तित्व वाला, माइक्रोफोन पर कब्ज़ा कर लेता है. 

 “मैं बहुमत के विचारों से अंशत: और पूर्णत: सहमत हूँ, मगर, हमें ये पूरी तरह व्यक्तिगत किस्म की समस्याएँ क्यों परेशान कर रही हैं? ज़रा देखिए, कि देश में क्या हो रहा है. और प्लेनेट पर? और हममें से हरेक के भीतर? आपने कल मुझे अपनी बात पूरी नहीं करने दी, इसलिए मैं आज कह रहा हूँ. आपको प्रचलित वैधानिकता की बारीकियों की फ़िक्र है, जबकि मानवता अपनी तरह से ज़िन्दगी गुज़ार रही है! ऐसा कैसे हो सकता है? अगर समस्या की तरफ़ व्यवस्था की ऊँचाई से देखा जाए, तो हम पाते हैं कि हमारी सिस्टम को, चाहे वह कितनी ही प्रभावशाली क्यों न हो, एक चीज़ मारे डाल रही हैं: काग़ज़ात का अनियंत्रित प्रवाह. और निरंतरता की ख़ातिर हमें इससे लड़ना होगा!”

 “ठीक है,” अध्यक्ष सहमति दर्शाता है, मगर, बोली गई हर चीज़ से नहीं. “काग़ज़ात का प्रवाह, हमारे कार्यक्षेत्र में नहीं है. बैठ जाईये.”

 “मैं बैठ जाता हूँ! “ माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी कहता है और अपनी जगह पर बैठ जाता है. “मैं बैठ गया. मगर फिर भी हमारा! हमारा कार्यक्षेत्र! हमारा!”  “दोस्तों, चार्टर के ड्राफ्ट की ओर बढ़ते हैं,” अध्यक्ष कामकाजी भाव से कागज़ों को उलट-पुलट करते हुए कहता है. “इसका मसौदा आपके हाथों में है, आप सब उससे परिचित हैं. हमारी गिल्ड के चार्टर को मंज़ूर करने का प्रस्ताव रखता हूँ. कौन पक्ष में है? कौन विरोध में? कौन अनुपस्थित है? एकमत से.”

 कुछ पल के लिए हॉल में ख़ामोशी छाई रही, फिर इक्का-दुक्का तालियाँ सुनाई दीं, बस, इससे ज़्यादा कुछ नहीं. अचानक कोई चिल्लाता है: “ये जादू की ट्रिक है!”  “कोई ट्रिक-विक नहीं है!” अध्यक्ष गरिमापूर्वक कहता है, उसे ख़ुद भी यक़ीन नहीं था, कि ये इतनी अच्छी तरह से हो जाएगा.  “ये ट्रिक है! कृपया इसे मिनट्स में नोट करें!” 

अध्यक्ष अपनी आस्तीनें दिखाते हुए हाथ ऊपर उठा देता है. उसके लिए तालियाँ बजती हैं. 

“और अब - बोर्ड के चुनाव!” अध्यक्ष घोषणा करता है . चार्टर के मुताबिक़ बोर्ड में सात सदस्य होंगे. कृपया गुप्त रेटिंग की वोटिंग के लिए नामांकन प्रस्तुत करें.”

 मीटिंग में उत्तेजना फ़ैल गई. कुछ लोग शोर मचा रहे हैं, कुछ नामांकन दे रहे हैं, फिर वे भी शोर बन्द किए बिना नामांकन प्रस्तुत करने लगते हैं. गुप्त रेटिंग की वोटिंग के लिए नामांकन प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को रोकना अब असंभव है. कॉन्फ़्रेन्स द्वारा एक के बाद एक बारह नामांकन प्रस्तुत किए गए, और तेरहवें नामांकन के लिए ‘तालाब’ कपितोनव की उम्मीदवारी का प्रस्ताव पेश करता है. 


 “व्हाट द हेल!” कपितोनव  मुड़ता है, मगर ‘तालाब’ हाथ के इशारे से बताता है, कि सब ठीक है, गरम होने की ज़रूरत नहीं है.” “सिर्फ अपना नाम वापस मत लो,” बाईं तरफ़ का पड़ोसी कपितोनव  के कान में फुसफुसाता है. “ ‘तालाब’ जानता है, कि वह क्या कर रहा है.”  “अरे, मुझे बोर्ड में काम नहीं करना है!”

 “तुमको कोई चुनने वाला नहीं है, फ़िक्र न करो. ये होशियारी से चली गई चाल है.” 

अध्यक्ष उम्मीदवारों के नामों की सूची पढ़ने लगता है, मगर ज़ोर की चीख़ के कारण पूरी पढ़े बिना ही रुक जाता है:  “मेरी घड़ी! मेरी घड़ी खो गई!” वो बदनसीब चाहे कोई भी क्यों न हो, मगर पहल ख़याल सभीको उसके बारे में नहीं, बल्कि समय के बारे में आता है: कितने बजे हैं? डेलिगेट्स, चुपचाप अपने बाएँ हाथ की कलाई की ओर देखने लगे. 

11.29


 “मेरी घड़ी कहाँ है?”  “मेरी भी!” कॉन्फ़्रेन्स का अध्यक्ष मुट्ठियों से मेज़ का सहारा लेकर धीरे से उठता है, अपने जिस्म को आगे की ओर झुकाकर कहता है:  “ये क्या ट्रिक्स हैं, महाशयों? जब मैंने कल त्यौहार जैसे वातावरण को बनाए रखने की गुज़ारिश की थी, तो मेरा मतलब बिल्कुल दूसरा था. वो, जो आप अभी कर रहे हैं, ये हमारे कौशल को कलंकित करना  है!”...  “ये भड़का रहा है!” लोग अपनी अपनी जगह से चिल्लाते हैं.  “कॉन्फ्रेन्स को बर्बाद नहीं करने देंगे!” 

कपितोनव  हाथ-घड़ी नहीं पहनता, उसके लिए मोबाइल फोन ही काफ़ी है, मगर क़िस्मत से मोबाइल अपनी जगह पर ही था. 

 “जिसकी घड़ी खो गई है, वो मेहेरबानी से अपना हाथ ऊपर उठाए,” अध्यक्ष कॉन्फ्रेन्स से मुख़ातिब होता है. 


 “कृपया ध्यान दें,” माइक्रोमैजिशियन झ्दानव कहता है, “सिर्फ उन्हीं लोगों का नुक्सान हुआ है, जिन्हें उम्मीदवार बनाया गया था! – गिल्ड के बोर्ड में!... मुझे झूठा साबित कीजिए! मगर, यदि मैं सही हूँ, तो यह बड़े शर्म की बात है!” 

 “ये रहीं घड़ियाँ!” वस्तुओं को ढूँढ़ने वाला मिखाइल श्राम चिल्लाता है, और सब उस तरफ़ देखते हैं, जिधर श्राम इशारा कर रहा है: खिड़की की सिल पर पाँच लिटर्स वाला “पवित्र झरना” पानी का कैन रखा है, और उसकी तली में – घड़ियाँ.


उनके संभावित मालिक फ़ौरन खिड़की की ओर लपकते हैं.  “ख़ैर, शाबाश!” हॉल से एक आवाज़.  “शाबाश, शाबाश!”

 “कोई ‘शाबाश-वाबाश’ नहीं! शेम!”  “कोई बड़ी शिद्दत से,” दुखी होकर अध्यक्ष कहता है, “हमारी मीटिंग को बर्बाद करना चाहता है. दोस्तों, मैं आपसे शांत रहने और व्यवस्था बनाए रखने की अपील करता हूँ! अपनी एकता बनाए रखें! वास्तविकता के एहसास को भूलें नहीं!” 

 “पवित्र झरने” की तली से निकाली गईं घड़ियाँ फिर से अपने अपने मालिकों के पास पहुँच जाती हैं. 

 हॉल से सुनाई देता है “सैबटाझ”.


कपितोनव  के कान में जैसे कोई फुसफुसाकर कहता है: ब्रीफ़केस खोलो. 


वह खोलता है. 

उसमें कैबेज के कटलेट्स हैं. पॉलिथीन के पारदर्शक पैकेट में. 

 “ये मेरे नहीं हैं! किसी ने बदल दिया है!” कपितोनव  उछल पड़ा.  “आपके पास क्या है? आपके ब्रीफ़केस में क्या घुसेड़ दिया है?”  “कटलेट्स! कैबेज के!” सब अपनी-अपनी ब्रीफ़केस खोलकर देखते हैं. मगर कोई भी परेशान नहीं होता, औरों की ब्रीफ़केसों में सब कुछ ठीक ठाक है. “मेरी ब्रीफ़केस से एक बेहद महत्वपूर्ण चीज़ चुरा ली गई है,” कपितोनव  पूरे हॉल में घोषणा करता है, “बेहद महत्वपूर्ण चीज़!” 

 “अगर महत्वपूर्ण चीज़ है तो उसे ढूँढ़ना चाहिए!” माइक्रो मैजिशियन मक्रानोगव (‘गीले-पैर’ – अनु.) घोषणा करता है. 

 “महाशय!” कालावन उठता है. “गिल्ड की कौंसिल के चुनावों के परिणामों से कोई पहले से ही अप्रसन्न है. उन चुनावों से जो अभी तक हुए ही नहीं हैं, मगर वे होंगे अवश्य!” कुर्सियों के बीच वाले गलियारे में ख़रगोश उछल रहा था.  “माफ़ कीजिए, ये मेरा है!”  “कतोव्स्की, अपनी बेहूदगी बन्द करो!”

कतोव्स्की के हाथ में एक काली चपटी चीज़ दिखाई देती है, जले हुए पैनकेक जैसी.  “आर्थर, मेरे पास!” पैनकेक को फ़र्श पर रखकर कतोव्स्की चिल्लाता है: ख़रगोश मुड़ जाता है, और फ़ौरन उछलते हुए पीछे की ओर आने लगता है.

पलक झपकते ही पैनकेक की “ऊँचाई” का परिमाण बदलने लगता है और दर्शकों की आँखों के सामने (सब लोग कतोव्स्की की ओर देख रहे हैं) वह सिर पर पहनने वाली चीज़ में बदल जाता है, जिसे बोलचाल की भाषा में ‘सिलिण्डर’ कह सकते हैं. कतोव्स्की ख़रगोश के सामने सिलिण्डर रखता है, और वह ज़्यादा सोचे बगैर, सिलिण्डर में ग़ायब हो जाता है.   “माफ़ी चाहता हूँ, माफ़ी चाहता हूँ, ऐसा करना नहीं चाहता था,” कतोव्स्की झुक-झुककर कहता है. सिलिण्डर जादूगर के सिर पर दिखाई देता है, कुछ तालियाँ और हँसी सुनाई देती हैं. कुछ लोग उत्तेजित हैं:  “कतोव्स्की, अपनी सस्ती ट्रिक्स बन्द करो!”  “स्टाइल-बदलू!”

 “अपना नंबर नहीं है!”  “मैं लॉबी में करना चाहता था,” कतोव्स्की सफ़ाई देता है. “मौक़ा चूक गया. बड़े दिल से माफ़ कर दीजिए.”  “इंटरवल होता है,” अध्यक्ष घोषणा करता है. “इस तरह काम नहीं चलेगा. बाद में निपट लेंगे. कॉफ़ी-ब्रेक.” 

11.51


कॉफ़ी-ब्रेक. प्रवेश-हॉल.


कपितोनव  ब्रीफ़केस लिए खड़ा है और कॉफ़ी नहीं पी रहा है. वह अप्रसन्नता से डेलिगेट्स की ओर देख रहा है, उसे हरेक में दुश्मन नज़र आ रहा है. इस बीच उसके साथ लोग सहानुभूति प्रकट करते हैं. कालावन ख़ुद उसके पास आकर सांत्वना देते हुए कहता है:  “आपको टार्गेट किया जा रहा है, क्योंकि हमने गिल्ड-कौंसिल में आपकी उम्मीदवारी पेश की थी. आप हौसला रखिए, हम इसे सुलझा लेंगे, यूँ ही नहीं छोड़ेंगे!”  “इसमें कुछ समय लग सकता है,” जादूगर झराप्योन्किन कहता है, “आप सिर्फ ये समझ लें : हर ट्रिक की कोई काउंटर-ट्रिक ज़रूर होती है.” 

 “मेरी उम्मीदवारी के पीछे क्या मक़सद है?” कपितोनव  ठण्डी आवाज़ में ‘तालाब’ से पूछता है.  “”साइकोलोजिकल अटैक,” तालाब उसे जवाब देता है, “ छोटा-सा - हमारे-आपके विरोधियों पर. हमने बिल्कुल सही समय पर उनके खेल को गड्ड-मड्ड कर दिया. क्या आपने नहीं देखा कि जब मैं आपका नाम पेश कर रहा था, तो वे कितने परेशान हो रहे थे? आप किसी बात से परेशान हैं? वर्तमान परिस्थिति में आपके जीतने का कोई चान्स नहीं है, और आप ख़ुद भी तो बोर्ड में नहीं जाना चाहते हैं, मैं आपको ठीक समझ रहा हूँ? मगर इफ़ेक्ट...ज़बर्दस्त रहा, इफ़ेक्ट.” 

मिखाइल श्राम, चीज़ों को ढूँढ़ने वाला जादूगर क़रीब आया:  “तब, हॉटेल में, आप मुझे सुनना नहीं चाहते थे, मगर ब्रीफ़केस तो खोलना चाहिए था...”


अब कपितोनव ब्रीफ़केस से दूर नहीं हटता है, उसे हाथ में पकड़े हुए है. ब्रीफ़केस – कम से कम एक सुबूत तो है. कपितोनव की शक भरी निगाहें चेहरों से फ़िसलती हैं, इस उम्मीद में कि किसी गुनहगार को ढूँढ़ लेंगी. पकड़ो-तो, कोशिश तो करो. नहीं पकड़ पाओगे.

कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट्स का मूड़ उखड़ा-उखड़ा सा है. सामान्य तौर से, सीमा के भीतर रहकर ही बातें कर रहे हैं. अधिकारियों से, मौसम से, पक्के दोस्त और साथी का मुखौटा लगाए इन्सानियत की चालाकियों से परेशान कोई अपने कप में चाय का पैकेट डाल रहा है, तो कोई इन्स्टेन्ट कॉफ़ी का एकाध चम्मच. प्यालों में बॉयलर से उबला हुआ पानी डाल रहे हैं. प्लेटों से कोई रस्क, कोई वेफ़र्स, कोई क्रीम-जैम बिस्किट्स उठा रहा है. 

कुछ लोग कपितोनव से उन नासपीटे कटलेट्स को दिखाने की विनती करते हैं, और जब पब्लिक का मूड देखकर वह तत्परता से ब्रीफ़केस में रखे हुए कटलेट्स दिखाता है, तो लोगों को याद आता है, कि ऐसे ही कटलेट्स तो बुफ़े की मेज़ पर थे, और कई लोगों की प्लेटों में से वे ग़ायब हो गए थे. 

वराब्योव कहता है:


 “हम आपके साथ एक ही मेज़ पर बैठे थे, और आपको, बेशक इस बारे में याद है...मैं मानता हूँ, कि आपको मेरी प्रतिष्ठा पर मन ही मन संदेह हो रहा है, और मैं ये घोषणा करना चाहता हूँ, कि मेरा न तो इस लफ़ड़े से कोई संबंध है, बल्कि, मैं ख़ुद भी, कटलेट्स से महरूम होकर, इस ट्रिक की निंदा करने के लिए तैयार हूँ.”  “और मैं मेज़ से पहले ही उठ गया था,” सीज़र ने याद दिलाया. “आपसे ईमानदारी से कहता हूँ, मैं अपना कटलेट खा चुका था, मगर इससे कुछ फ़र्क नहीं पडता. टेक्निकल पॉइंट ऑफ़ व्यू से, ये ज़रा भी मुश्किल नहीं है – एक  साथ, मतलब, एक ही समय पर, पब्लिक से कोई छोटी-मोटी चीज़ छीन लेना. किन्हीं दूसरी परिस्थितियों में मैं भी ये कर सकता था, मगर मैं कभी भी सारे के सारे कटलेट्स आपके मत्थे नहीं मढ़ देता.” 

’तालाब’ फिर से टपकता है:  “मुँह न लटकाओ, प्यारे! मैं आपको ख़ुश कर देता हूँ. मिलिए. नीनेल. आपके प्रोग्राम की डाइरेक्टर. जैसा कि मैंने वादा किया था. ये आपके प्रोग्राम का आयोजन करेगी. बढ़िया रहेगा!”  “बड़ी ख़ुशी हुई, नीनेल,” कपितोनव क़रीब चालीस साल की, साँवली महिला से कहता है. “और आप,” (तालाब से) कहता है, “किसी और को क्यों नहीं ढूँढ़ लेते, जो इस प्रोग्राम को पेशेवर तरीक़े से प्रस्तुत कर सके?”

“आपके बग़ैर?” नीनेल व्यंग्य को समझ नहीं पाई. 

 “माफ़ कीजिए, मुझे फ़ोन करना है,” कपितोनव  सीढ़ी से ऊपर जाता है. 


वहाँ वह खिड़की के पास रुक जाता है, ब्रीफ़केस खिड़की की सिल पर रख देता है और सोचने लगता है, कि वह मरीना से क्या कहेगा. बर्फ़ के फ़ाहे गिर रहे हैं, मगर वे इतने कम हैं कि बर्फ जैसे प्रतीत नहीं होते. और, वे भी रुक जाते हैं. कपितोनव  इस बात की पुष्टि करने के लिए तैयार नहीं है, कि क्या उसे आभास हुआ था, या वे सचमुच में गिर रहे थे. सड़क के दूसरी तरफ़ वह कैफ़े देखता है – जल्दी ही उन्हें लंच के लिए वहाँ ले जाएँगे. उसने फ़ैसला कर लिया कि फ़ोन नहीं करेगा – मैसेज भेज देता है:  छोटी सी प्रॉब्लेम. नोटबुक बाद में लौटाऊँगा. सब ठीक है.


12.05


निचली मंज़िल के टॉयलेट से बाहर निकलकर नीले चोग़े में ईवेंट्स-आर्किटेक्ट बोझिल क़दमों से ऊपर आ रहा है. कपितोनव  को उसकी एकटक नज़र चुभने लगती है, वह ख़ुद भी तन जाता है, जैसे कि उसके और सीढ़ियों से ऊपर आने वाले के बीच कोई डोर खींच दी गई हो. ईवेंट्स-आर्किटॆक्ट ने पास आकर कहा:  “ एड्स, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, पहचान खो देना, युद्ध, और आपको, देख रहे हैं ना, किन्हीं कटलेट्स के खो जाने का दुख. मानव-विज्ञान के स्थिरांक ख़तरे में हैं, और आप कटलेट्स के बारे में परेशान हो रहे हैं. क्या आपका कोई दृष्टिकोण है? आपका क्या दृष्टिकोण है, क्या जान सकता हूँ?” वह ऊपर आकर गहरी-गहरी सांसे लेने लगा. 

 “अभी आपने कुछ कहा था,” कपितोनव  ने फ़ोन हटा लिया. “मगर क्या आपको यक़ीन है, कि जो कहा था, उसे समझ रहे हैं?” एक दूसरे की आँखों में देखते हैं.        

 “और आप... क्या आप जो कर रहे हैं, उसमें यक़ीन करते हैं?” सूँ-सूँ करते हुए ईवेंट्स-आर्किटेक्ट कहता है.  “इसमें एक नोटबुक थी,” कपितोनव नज़र हटाए बिना कहता है, “एक इन्सान की मैनुस्क्रिप्ट, जो अब इस दुनिया में नहीं है. उसकी मुझे नहीं, बल्कि किसी दूसरे इन्सान को ज़रूरत है. वह उसे बहुत प्यारी है. और बड़े विश्वास के साथ उसे मुझे दिया गया था. और मेरे पास उसे कटलेट्स से बदल दिया गया! मगर आप ये नहीं समझ पाएँगे, आप बस ब्ला-ब्ला-ब्ला ही कर सकते हैं! ज़रा बताइये तो, आप कौन से ईंवेट्स के आर्किटेक्ट हैं?” “क्या आप इस बात का इशारा कर रहे हैं, कि इस मामले में मेरा हाथ है?” कपितोनव  की तरफ़ से मुँह मोड़ते हुए ईवेंट्स-आर्किटेक्ट कहता है. “मेरे लिए ये मामूली है, बेहद मामूली,” और जाते जाते फ़ब्ती कस गया: “मत सोचिए.” 

12.12


मगर कपितोनव  सोचता रहा. हॉल में अपनी पुरानी जगह पर बैठे हुए, वह इस बारे में नहीं सोच रहा है कि वक्ता क्या कह रहा है, वह अपनी ही किसी बात के बारे में सोच रहा है, जिसके बारे में दूसरे नहीं सोच रहे हैं. अध्यक्ष के सिर के ऊपर - छत से चिपके गुब्बारे की ओर देखते हुए कपितोनव  ख़यालों में खो जाता है. गुब्बारे के प्रकट होने से किसी को अचरज नहीं हुआ. कपितोनव को छोड़कर कोई भी गुब्बारे की ओर ध्यान नहीं दे रहा है, कोई गुब्बारे को देखना ही नहीं चाहता, मगर उसे, कपितोनव को, कैसे पता कि कोई भी नहीं? ये सच नहीं है कि कपितोनव औरों की खोपड़ियों के डिब्बों में झाँक सकता है, - इस अंग के संबंध में वह सिर्फ इतना ही कर सकता है कि सोची गई संख्याओं को बूझे, और वो भी सिर्फ दो अंकों वाली. और, बेशक, वह कोई दिमाग़ में घुसने वाला चोर नहीं है – वैसे ही, जैसे वह रोशनदान में घुसने वाला, अटारी से घुसने वाला चोर नहीं है; न ही जेबक़तरा है, न घर में घुसने वाला और सबसे बड़ी बात, न ही ब्रीफ़केस में घुसने वाला चोर है. और अपनी ब्रीफ़केस की ही तरह, चाहे उसमें कुछ भी क्यों न पड़ा हो, वह किसी को भी अपनी खोपड़ी के डिब्बे में घुसने नहीं देगा, चाहे उसके बारे में कोई कुछ भी क्यों न सोचे. इसलिए, प्रस्तुत परिस्थिति में कपितोनव  क्या सोच रहा है, ये उसका अपना मामला है, और कोई दूसरा कपितोनव के ख़यालों के बारे चाहे कुछ भी सोचे, वह, दूसरा, प्रस्तुत परिस्थिति में ग़लत ही होगा. 

मध्यांतर में वेण्टिलेटर्स खोलकर ताज़ी हवा को हॉल में आने दिया गया, अब ताज़गी और ठण्ड महसूस होने लगी. लोगों के दिमाग़ भी ठण्डे हो गए, या फिर मुख्य वक्ता नेम्योत्किन के भाषण ने उन्हें शांत कर दिया था?...( नेम्योत्किन ...पदम्योत्किन?...अत्म्योत्किन?...कपितोनव  अब अपने आस-पास हो रही घटनाओं में दिलचस्पी नहीं ले रहा था.) कपितोनव  को यह भी नहीं मालूम कि ये मरियल नाम्योत्किन, इसका नाम  गिल्ड के प्रेसिडेंट की पोस्ट के लिए किसने प्रस्तावित किया था – क्या जुपितेर्स्की की पार्टी ने, या फिर कालावन की पार्टी ने. कपितोनव  को अचरज हो रहा है ( हालाँकि, अचरज से इस बारे में नहीं सोच रहा है), कि न तो जुपितेर्स्की, न ही कालावन (मगर वह इस बारे में नहीं सोच रहा है), न अध्यक्ष मोर्शिन, न ही ‘तालाब’, प्रसिद्ध व्यक्तियों में से कोई भी न जाने क्यों प्रेसिडेंट के पद का प्रत्याशी नहीं है. अण्ट-शण्ट लोगों को ही भेज रहे हैं. (और इस बारे में भी नहीं.) ज़ामेत्किन के मुक़ाबले में खड़ा किया है रेचूगिन को (...लाचूगिन?...पिचूगिन?...), उसका भाषण अभी होने वाला है. 

आश्चर्यजनक ढंग से कपितोनव  किसी और ही चीज़ के बारे में सोच रहा है.  “क्या आप सो रहे हैं?”  “नहीं.” कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद:  “और अगर ‘हाँ’ तो? क्या जगाना ज़रूरी है?”  “मैंने बस, यूँ ही देखा, कि आप सो नहीं रहे हैं.” 

कपितोनव  ने अपने आप पर क़ाबू किया कि बाईं ओर के पड़ोसी को कोई तीखी बात न कह दे. बुज़ुर्ग आदमी है और उसे मालूम होना चाहिए कि कुछ लोग खुली आँखों से सो सकते हैं, ऐसा अक्सर होता है, ख़ासकर आजकल. मगर कपितोनव  अपना ध्यान वक्ता की तरफ़ मोड़ता है: वह योग्यता सूचकांक के बारे में बात कर रहा है, जादू के प्रभावों के योग्यता सूचकांक की गणना करने के प्रभावहीन तरीके के बारे में. ऐसा लगता है कि यह औद्यौगिक समस्या वहाँ एकत्रित लोगों को बेहद परेशान कर रही है. गिल्ड-प्रेसिडेंटशिप का उम्मीदवार वादा करता है कि जादूगरों को सर्टिफ़िकेट देने के लिए 100% से अधिक वांछित योग्यता-सूचकांक की प्रणाली को समाप्त कर देगा. प्रोग्राम के इस मुद्दे का हॉल में गर्मजोशी से स्वागत किया जाता है.

 “बस, अब समय आ गया है, हमारे हुनर को नापने के पैमाने को बदलने का ! समय आ गया है संदिग्ध योग्यता-सूचकांक के दुरुपयोग को “ना” कहने का !


दो बार बीप-बीप हुआ. 

कपितोनव  को मैसेज मिला:  {{{ वो मेरे पास है }}}


कपितोनव  प्रयत्नपूर्वक आँखें झपकाता है, जैसे इस इबारत पर आँखें झपकाई जा सकतीं हैं. पहली झलक में तो वह इबारत ही प्रतीत नहीं हुई, बल्कि जबरन घुस आई एक तस्वीर लगी, और कोई अप्रिय बात थी इन धनु-कोष्ठकों में, जो जबर्दस्ती की मुस्कुराहट के कारण फ़ैल गए मुंह के कोनों की याद दिला रहे थे. उसने अक्षरों को समझा और अब ख़ाली नज़रों से ‘वो मेरे पास है’ को देख रहा है, जो न जाने क्यों दोनों तरफ़ से मुस्कुराते धनु-कोष्ठकों के बीच में है.    


एक डरावना सा ख़याल आता है कि उसे मूखिन से कोई मैसेज प्राप्त हुआ है, मगर ये मरीना ने भेजा था, और अब सवाल ये है – क्या उसे भेजा था?

ये - “वो” – कौन है – उसके पास? कपितोनव  लिखता है:

कौन?

मगर भेजता नहीं है. कोई चीज़ उसे फ़ौरन पूछने से रोकती है. वह हिचकिचाता है, अस्पष्टता से महसूस करते हुए, कि उसे कुछ और भी करना है. यह करने से पहले, वह मुड़ता है, कहीं लोग उसकी ओर देख तो नहीं रहे हैं. और अगर देख भी रहे हों, तो उन्हें क्या पता चलेगा? वह वो कर रहा है, जिसे ख़ुद को भी समझा नहीं सकता: प्रश्नार्थक चिह्न के बाद धनु-कोष्ठक बनाता है – पहला, दूसरा और तीसरा. इसके बाद वह कर्सर को बाईं ओर ले जाता है और आरंभ में तीन धनु-कोष्ठक बना देता है. 

वह उसकी ओर देखता है, जो बना है, और उसे लगता है, कि उसने कोई सीमा-रेखा पार कर ली हो.        

भेज दिया:  {{{ कौन? }}}

जवाब फ़ौरन आ जाता है:

{{{ इन्नोकेन्ती पित्रोविच }}}


चलिए, मज़ाक छोड़िए (अगर ये मज़ाक होता, तो सब कुछ समझ में आ जाता), मगर मरीना मज़ाक नहीं करेगी. मगर, क्या ये मरीना है? अचानक पता चले कि मरीना नहीं है? मगर प्रेषक निश्चित रूप से “मरीना” ही है. मगर, हो सकता है, कि उसके मोबाइल से उसे वह न लिख रही हो?


वह धनु-कोष्ठकों और नोटबुक के बारे में हुई कल की बातचीत को याद करता है, जिसके बारे में, अगर उसकी बात पर विश्वास किया जाए, तो कोई नहीं जानता था. 

मरीना. सिर्फ मरीना. और, उसी का एक और मैसेज: {{{ थैंक्यू }}}

उसे ज़रूर फोन करना चाहिए. वह उठता है, और ब्रीफ़केस लेकर दरवाज़े की ओर बढ़ता है.  “जहाँ तक ‘माइक्रोमैजिशियन’ नाम का सवाल है. मेरे ख़याल से, वह ठीक नहीं लगता है, मुझे मालूम है कि बहुत सारे लोगों को ये अटपटा सा ‘माइक्रो’ अपमानजनक लगता है, मगर प्यारे साथियों...” उसे अपनी पीठ के पीछे सुनाई देता है. शायद, उसके चेहरे पर कुछ बदहवासी है, क्योंकि फॉयर में मेज़ों की सफ़ाई करती हुई दोनों असिस्टेंट्स कप-प्लेट्स को छोड़कर कुछ भय से उसकी तरफ़ देखती हैं. वह उनके सामने से सीढ़ियों की लैण्डिंग पर जाता है, और वहाँ से, पहले ही की तरह, खिड़की से बाहर देखते हुए मरीना को फोन करता है. नीचे एक कार आकर रुकी, दो लोग डिक्की में से चुनाव-पेटियाँ निकालते हैं, वे जल्दी में हैं, यहाँ कार रोकना मना है, बर्फ़ के ढेर उनके काम में बाधा डाल रहे हैं. वह काफ़ी देर इंतज़ार करता है – बीप्स, और बीप्स, - हो सकता है, मरीना को सिग्नल नहीं सुनाई दे रहा हो, हालाँकि, ऐसा मुश्किल लगता है, अभी-अभी तो उसने कोष्ठकों से घिरा हुआ “थैंक्यू” भेजा था. क्या उससे बात नहीं करना चाहती? 

वह फिर से फोन करता है, मगर उसका फोन स्विच-ऑफ है.

 कपितोनव  उनके सभी मैसेजेस को देखता है, शुरू से, और, जैसे कुछ-कुछ समझ में आ रहा है – कम से कम जहाँ तक मैसेजेस के मतलब का ताल्लुक है.  “वो मेरे पास है” किसी इन्सान से संबंधित नहीं है, जैसा कि उसने सोचा था, बल्कि इसका संबंध नोटबुक से था, उसी ने तो इससे पहले नोटबुक के बारे में लिखा था – कि बाद में लौटाएगा. उस हालत में उसके सवाल “कौन?” को, जिसका सर्वनाम “वो” से ताल्लुक था, मरीना द्वारा यूँ समझा गया कि “किसने लौटाई?” और वह उस आदमी का नाम बताती है “इन्नोकेन्ती पेत्रोविच”. इसके आगे कपितोनव  का दिमाग़ वो समझने से इनकार करता है, जो, लगता है, कि समझ से परे है (मगर, ऐसा नहीं है कि कपितोनव  ने सोचने से इनकार कर दिया हो).            


        

12.55


वह देखता है कि उसके पास हेरा-फ़ेरी जादूगर किनीकिन आ रहा है (वह भी हॉल से बाहर आ गया था).

“ मैं आपके पीछे-पीछे ही चला आया. परेशानी के लिए माफ़ी चाहता हूँ. सिर्फ, यहाँ हम अकेले हैं, मैं सबके सामने आपसे मिलना नहीं चाहता था.”

 “क्या बात है?” कपितोनव  पूछता है. 

 “मुझे पहले ही स्वीकार कर लेना चाहिए था,” किनीकिन कहता है. “मगर, मैं डर गया कि कहीं मज़ाक का पात्र न बन जाऊँ. अपना गुनाह क़ुबूल करना चाहता हूँ.”  “आप किस बारे में कह रहे हैं?” कपितोनव  पूछता है.  “वही, सब इन कटलेट्स की ही वजह से हुआ. ये बिल्लियों के लिए हैं, पालतू बिल्लियों के लिए. चौंकिए नहीं, वे कैबेज वाले भी खाती हैं. हम तो बस पुराने ढर्रे पर चलने के आदी हैं, मगर ख़ास पीटरबुर्ग में पालतू बिल्लियाँ कैबेज के कटलेट्स बेहद पसन्द करती हैं, वो भी मीट के और मछली के कटलेट्स से ज़्यादा. इस पर बहुत पहले ही ध्यान गया था, इस बारे में कुछ लेख भी प्रकाशित हुए हैं, मैं इस पर नज़र रखता हूँ. दूसरी बात, अब तो बिल्लियाँ भी क़रीब क़रीब हैं ही नहीं. हर जगह गोदाम बन्द कर देते हैं, ठण्ड कड़ाके की, चूहों का शिकार.....आप मुझे माफ़ कीजिए, मगर बिल्लियाँ मेरी कमज़ोरी हैं, मैं बिल्लियों का फ़ैन हूँ...और यहाँ आँगन में...बॉयलर रूम के पीछे...बस, प्लीज़ इस बारे में ढिंढोरा न पीटिए. मैं, मतलब, क्या कहना चाहता हूँ? मैं हेरा-फेरी करने वाला, उचक्का जादूगर हूँ, मुझे अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं. मैंने कटलेट्स बिल्लियों के लिए. आपको किसी ने धोखा नहीं दिया. ब्रीफ़केस के संबंध में. हम बस गड़बड़ा गए. हॉटेल में ही, हॉल में. आपके पास मेरी है.”  “और क्या आपके पास मेरी है?” कपितोनव  जैसे जी उठा. 

 “एकदम आपकी नहीं. आप विश्वास नहीं करेंगे, मगर मेरे पास आपकी नहीं है. आपकी – मेरे पास नहीं है. दुहरी गड़बड़ हो गई है.”  “ऐसा कैसे? क्या ऐसा भी होता है?”

 “बेशक, होता है! जैसे, डबल मर्डर भी होता है, तो फिर दुहरी गड़बड़ क्यों नहीं हो सकती?”  “मेरी – किसके पास है?”  “मेरे पास वाली के अन्दर की चीज़ों को देखते हुए, जो, आप समझ रहे हैं ना, कि मेरी नहीं है, आपकी ब्रीफ़ केस दबाए बैठा है, महाशय नेक्रोमैन्सर.”  “और आपके पास – नेक्रोमैन्सर की है?”  “एकदम सही फ़रमाया.”  “और नेक्रोमैन्सर ख़ुद कहाँ है?”  “ये कौन बता सकता है! अगर यहाँ होता, तो मैं फ़ौरन उससे बात कर लेता. और फिर आपसे. मगर वो यहाँ नहीं है, सुबह देखा था, मगर इसके बाद वो कहीं ग़ायब हो गया. आप परेशान न होईये. डर की कोई बात नहीं है. वो आ जाएगा.” वो दोनों सीढ़ियों से ऊपर जाते हैं, हरेक के पास एक एक चुनाव-पेटी है.

 “ ऐसे कैसे ‘डर की कोई बात नहीं’ है? और अगर मेरी ब्रीफ़केस में कोई ऐसी चीज़ हो, जिसे मुझे किसी को दिखाना नहीं चाहिए, तो?”  “सब ठीक हो जाएगा, विश्वास कीजिए. आप मुझे मेरी लौटाएँगे?”  “आपकी वाली दीजिए. मतलब उसकी.”  “नहीं दे सकता.”  “क्यों नहीं दे सकते?” फ़ॉयर में दोनों चुनाव-पेटियाँ ले जाते हुए ऑडिट कमिटी के सदस्यों को देखते हुए कपितोनव चौंक कर कहता है.

 “नहीं दे सकता, ये पराई ब्रीफ़केस है. ना तो मेरी है, ना ही आपकी.”  “ इससे क्या फ़रक पड़ता है, कि वो किसके पास रहे – आपके पास या मेरे पास?” कपितोनव उचक्के जादूगर पर नज़रें गड़ाए कहता है.

 “और अगर कोई फ़रक नहीं पड़ता, तो फिर सवाल किस बात का है? चलिए, नेक्रोमैन्सर के वापस लौटने तक सब ऐसा ही रहने देते हैं. वह आयेगा, मैं उससे बात करूँगा, उसे उसकी ब्रीफ़केस दे दूँगा, आपकी ले लूँगा और फ़ौरन आपकी ब्रीफकेस आपको सही-सलामत लौटा दूँगा, और हम ग़लफ़हमी दूर कर लेंगे. आप मुझे बस मेरी वाली दे दीजिए, कटलेट्स वाली, आप तो उन्हें खाएँगे नहीं?...”

 “आपके पास दो-दो हो जाएँगी, और मेरे पास एक भी नहीं,” कपितोनव  कल्पना करता है. “बड़ा दिलचस्प लॉजिक है.”  “आप मुझ पर यक़ीन नहीं करते?”  “मैं सिर्फ ये बात समझ नहीं पा रहा हूँ कि अभी मुझसे ब्रीफ़केस बदलने में आपको क्या परेशानी है; और खेल से बाहर होने में. नेक्रोमैन्सर से तो मैं आपके बग़ैर भी निपट लूँगा. आपके लिए ये ज़्यादा आसान रहेगा.”    “ठीक है, मैं जवाब दूँगा. ये बड़ा नाज़ुक सवाल है. अभी, इस पल, नेक्रोमैन्सर की ब्रीफ़केस के भीतर क्या है, इस बारे में ख़ुद नेक्रोमैन्सर के अलावा, सिर्फ एक आदमी जानता है, वो हूँ मैं, और अगर हम ब्रीफ़केसों की अदला बदली कर लेते हैं, तो दो लोग जान जाएँगे.”  “मैं नेक्रोमैन्सर की ब्रीफ़केस की चीज़ों पर थूकता हूँ! मैं जानना भी नहीं चाहता कि उसके अन्दर क्या है.”  “बिल्कुल सही! मगर आप स्वयम् को मेरी स्थिति में रखकर देखिए, मैं तो जानता हूँ ना, बस यही प्रॉब्लेम है! अगर मैं इस ब्रीफ़केस के भीतर की चीज़ों के बारे में न जानता होता, तो मैं बिना सोचे, आपकी ब्रीफ़केस से बदल लेता. मगर, अब, जब मैं जानता हूँ कि इसके भीतर क्या है – ऐसा नहीं कर सकता, मुझे नैतिक अधिकार नहीं है.”  “उसके भीतर आख़िर ऐसा क्या है? क्या किसी की हड्डियाँ हैं?”

 “ नो कमेन्ट्स, प्लीज़.”  “बहुत अच्छे,” कपितोनव  ने कहा, “आपकी बिल्लियों को भूखा रहना पड़ेगा.” सख़्ती से. क्रूरता से. मगर यही तरीक़ा है. कपितोनव  अपने आप से कहता है. 

13.07  


घुड़सवार. मॉनेस्ट्रीज़. नदी का झुलसा हुआ तल. लकड़ी के खंभे, समान रूप से एक ओर को झुके हुए, स्तेपी से अनंत की ओर बिजली के तारों को खींच रहे हैं...

किनीकिन के पीछे पीछे हॉल में वापस न लौटना पड़े, इसलिए कपितोनव कॉरीडोर में प्रदर्शित तस्वीरों को देखता है. किसी की मंगोलिया यात्रा का विवरण था इन तस्वीरों में. कपितोनव पर्यटन का ख़ास शौकीन नहीं था. वह ख़ास घरघुस्सू है. 

हर पर्यटक दो पहियों वाली गाड़ी पर सामान ले जा रहा है – ये सींगों वाले याक हैं:  मंगोल एक स्थान से दूसरे स्थान को जा रहा है. फ़ोल्ड किया हुआ तंबू, घरेलू सामान, पोटलियाँ, सोलर-बैटरीज़ और डिश-एन्टेना. 

वह जानता था कि वहाँ ख़ूब सारे तालाब हैं, मगर सोचा नहीं था कि वो इतने बड़े-बड़े होंगे. जैसे कोई समुन्दर हो – लहरें चट्टानों से टकरा रही हैं. कहीं पढ़ा था कि मंगोल लोग मछली नहीं खाते. मछली – हमारी दुनिया का जीव नहीं है, दूसरी दुनिया का है. 

सुबह की इंटरव्यू-सुन्दरी, “तीन अंकों वाली संख्या”, कपितोनव  से पूछती है कि मैथेमेटिक्स की सभी शाखाओं में से उसने कॉन्फॉर्मल ट्रान्सफॉर्मेशन्स को ही क्यों चुना. येव्गेनी गिन्नादेविच, कहीं ये जादू की याद तो नहीं दिलाते? आप वास्तविक वैल्यूज़ से संबंधित हमारे क्षेत्र को काल्पनिक वैल्यूज़ वाली दूसरी दुनिया में ले जाते हैं, क्योंकि लाप्लास ऑपरेटर अपरिवर्तनीय है, और वहाँ वह सब हल करते हैं, जिसे यहाँ करने की अनुमति नहीं है. कहीं इसमें शैमानिज़्म तो नहीं है?   “वीका (न जाने क्यों उसने तय कर लिया कि उसका नाम वीका है), तुम प्रतिकूल सिद्धांतों का प्रतिपादन कर रही हो.”  “एव्गेनी गिन्नादेविच, प्लीज़, लाप्लास ऑपरेटर के बारे में बताइए और ये भी बताइए, कि उन जगहों पे असाधारण क्या है...क्या वहाँ मछली होती है?”  “मैं बहुत बड़ा घरघुस्सू हूँ.” 

वह एक पैर से दूसरे पर खड़ा हुआ, गिरते गिरते बचा. आँखें फाड़ कर देखा. नहीं, पैरों पर मज़बूती से खड़ा है. ये है शमान अपनी लम्बी ढोलक के साथ. दूसरी तस्वीर में – बच्चे और एक बड़ा कुत्ता. 

घर से, बाइ द वे, कुछ नहीं आया था – कपितोनव  ने देखा कि कोई मैसेज तो नहीं है. माफ़ करने की प्रार्थना की, बेशक, वह उम्मीद नहीं करता, और उसे माफ़ी के लब्ज़ों की ज़रूरत भी नहीं है. मगर जहाँ तक वह आन्ना एव्गेनेव्ना को जानता है, बेटी को चाहिए कि इस परिस्थिति में अपने बारे में याद दिलाये. उदासीनता से. कम से कम उदासीनता से ही सही. मगर चुप्पी साधे हुए है. कहीं कुछ हो तो नहीं गया? 

इस बीच अपने समय पर


13.18 

मीटिंग ख़त्म हो गई, और कॉन्फ्रेन्स के डेलिगेट्स, भूखे और परेशान, फिर से हॉल से बाहर आ जाते हैं. 

अब वे बातें कर रहे हैं, इधर-उधर डोलते हुए – कॉरीडोर में, सीढ़ियों पर, हॉल में (जो वहाँ रह गए थे), मगर फॉयर में नहीं, क्योंकि फॉयर – अब चुनावी गतिविधियों का क्षेत्र बन गया है और चतुर जादूगरों को समय से पहले चुनावी-पेटियों के क़रीब आने की इजाज़त नहीं है. दो मज़बूती से सील की गईं चुनावी पेटियाँ मेज़ों पर रखी गई हैं: एक गिल्ड के बोर्ड के चुनाव के लिए, दूसरी उसके प्रेसिडेंट के चुनाव के लिए. पहली चुनाव पेटी के लिए मत-पत्र छप गये हैं और सेक्रेटरी ने उन पर हस्ताक्षर भी कर दिए हैं, और दूसरी के लिए – अभी-अभी समाप्त हुई मीटिंग के परिणामों के मुताबिक – प्रिंटर मत-पत्र छाप रहा है. 

प्रेसिडेंट साथियों का उत्साह बढ़ाता है: 

 “महाशय, बस थोड़ा इंतज़ार और कीजिए. अभी वोट देंगे और फिर लंच के लिए जाएँगे!”


डेलिगेट्स सन्देह से चुनाव पेटियों की ओर देख रहे हैं: वे स्टेज-जादूगरों के पारंपरिक बक्सों जैसी ही लग रही हैं. और ऑडिट कमिटी के सदस्य भी संदेह से डेलिगेट्स की तरफ़ देख रहे हैं, जो वोटिंग-पेटियों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं.

 “चलिए, चलिए. रिबन के अन्दर मत आइये!” ये रिबन आने जाने के रास्ते को फॉयर – भावी चुनावी-ज़ोन – से अलग करता है. 

 “प्लीज़, चुनावी-पेटियों को सम्मोहित न करें. आगे चलिए, प्लीज़.”


मगर हर इन्सान, आगे चलने से पहले चुनावी-पेटियों के बारे में ज़रूर कुछ न कुछ कहता है, - पूछता है कि कहीं उसमें दुहरी तली तो नहीं है, और कहीं उनमें एक-एक लड़की तो छुपी हुई नहीं है, मिसाल के तौर पर, झिलमिलाते स्विमिंग सूट में.


‘तालाब’ ने कपितोनव  को सोफ़े के एक कोने में गोबी के रेगिस्तान की तस्वीर के नीचे बैठे हुए देखा.  “आप चले गए, मैं डर गया था.”  “मैं कहाँ जा सकता हूँ?” कपितोनव  कहता है.  “मैंने आपका प्रोग्राम-डाइरेक्टर से परिचय करवाया था, मगर लगता है कि वह आपके दिमाग़ में ‘नोट’ नहीं हुआ है.”  “क्यों नहीं? बिल्कुल नोट हो गया है. और आदमी नहीं, औरत है.”

 “तब, बढ़िया है. पता है, मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि आप अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर ही वोट देंगे, मगर, इसलिए, कि मेरी अंतरात्मा मुझे न कचोटे, मैं आपको बताऊँगा, कि आपके दोस्त, जिनमें, उम्मीद करता हूँ, कि मैं पहला हूँ, कैसे वोटिंग करते हैं.”

 किनीकिन से बात करने के बाद कपितोनव  के दिल का बोझ हल्का हो गया था, इसलिए उसे इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता था कि कैसे वोटिंग की जाए. मगर, नहीं. वह इतना भी नीचे नहीं गिरेगा कि ताशबाज़ों और हाइपरचीटर्स के साथ कल हुए झगड़े के बाद उनको वोट दे दे, और यहाँ वह तालाब के सम्पर्क में है. वह वादा करता है कि सही सही वोट देगा.

 “क्या आपके पास नेक्रोमैन्सर का फ़ोन नंबर है?” कपितोनव  पूछता है.  “आपको किसलिए चाहिए?” ‘तालाब’ चौकन्ना हो जाता है.  “उसके पास मेरी ब्रीफ़केस है. वापस लेना चाहता था.”  “फ़ोन नंबर नहीं दे सकता. मगर आप परेशान न हों, वह अभी आ जाएगा. एक भी वोट खोना नहीं चाहिए. उसने अभी-अभी मुझे फ़ोन किया है.”

 “और वह गया कहाँ था, क्या उसने कुछ बताया?”  “मैंने नहीं पूछा.”  “सच? वह पूरे दिन सेशन्स में नहीं था, और आपने नहीं पूछा?” 

 “जब वह आएगा, तो आप ख़ुद ही पूछ लीजिए. मगर ये बुरी सलाह है. अच्छी ये है: बेहतर है, कि किसी भी बारे में न पूछें. जैसे कि मैं. क्या आपके लिए ये ज़रूरी है?”  “क्या मैं कम से कम इतना जान सकता हूँ कि नेक्रोमैन्सर महाशय का नाम क्या है. मैण्डेट कमिटी के प्रेसिडेण्ट ने कहा कि ये कोई सीक्रेट नहीं है.”  “तब आप मैण्डेट कमिटी के प्रेसिडेण्ट से ही पूछ लेते.”  “इन्नोकेन्ती पित्रोविच, है ना?”  “मैं मैण्डेट कमिटी का प्रेसिडेण्ट नहीं हूँ. बाइ द वे, आपने मुझसे वादा किया था कि पार्टीशन के पीछे मुझे अपना प्रोग्राम दिखाएँगे.”  “ ‘बाइ द वे’?” कपितोनव  दुहराता है. “क्या कोई संबंध है?”  “कैसे नहीं है? हमारी दुनिया में हर चीज़ संबंधित है, हरेक चीज़ से.”


कपितोनव  प्रतिवाद करना चाहता है: उसे लगता है कि हमारी दुनिया में रैण्डम-फ़ैक्टर बहुत बड़ा है, मगर तभी घोषणा होती है कि सब तैयार है और शुरू करने का समय आ गया है. 

13.25


चुनाव अनुशासित रूप से सम्पन्न होते हैं, बिना किसी गड़बड़ी के. 

वोट दे चुके लोग सड़क के पार वाले कैफ़े में लंच के लिए जाते हैं. 

कपितोनव  अपने वादे के मुताबिक़ जिसका नाम काटना है, काट देता है, और अपना भी (वह भूल गया था, कि वह भी एक उम्मीदवार है, और उसे अपना नाम बुलेटिन में देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था).


13.58


कैफ़े सड़क के पार ही है. खाना वैसा ही है. 

और ये ‘खाना’ क्या होता है? नहीं, ये तो समझ में आता है कि ‘खाना’ क्या होता है, ये समझ में नहीं आता कि ‘खाने’ के साथ क्या करते हैं – किस क्रिया को वह अपने ऊपर होने देता है? ’खाना’ खाया जाता है, - और ‘खाने’ के बारे में सब कुछ सही-सही बताया जा सकता है, मगर फिर भी, ज़्यादा एब्स्ट्रेक्ट रूप में कहें, तो ‘खाने’ के साथ क्या होता है, अगर ‘खाना’ शब्द से मेज़ पर हो रही लम्बी प्रक्रिया के बारे में सोचें, जिसमें भोजन की नितांत आवश्यकता होती है?

‘खाना’ लम्बा खिंच रहा है? ‘खाना’ हो रहा है? क्या ‘खाने’ के होने की कोई जगह होती है? आम तौर से, ’खाना’, जिसमें कपितोनव  हिस्सा लेता है, उसकी एक जगह है, निःसंदेह, उसका अस्तित्व है, वह लम्बा खिंचता है, चलता है, पूरा होता है – दोस्ताना और सुकून भरे ‘दोस्तों के खाने’ के वातावरण में.

‘खाना’ अच्छी तरह खाया जाता है.

कपितोनव  को याद आया, कि ‘खाने’ के बारे में क्या कहते हैं: ‘खाना’ चल रहा है. 

इस दृष्टि से ‘खाना’ जीवन की याद दिलाता है. या जीवन ‘खाने’ की याद दिलाता है. 

14.00


ये है कपितोनव, वो ठण्ड़ा वेजिटेबल सूप खा रहा है. डेलिगेट्स को लंच के दो विकल्प दिए गए थे – पहले में सामान्य सूप, दूसरे में ठण्डा सूप. कल हरेक ने अपने व्यक्तिगत मेन्यू में ‘सही’ निशान बनाया था. सर्दियों के कारण ज़्यादातर लोग गरम सूप ले रहे थे. इस कॉन्फ़्रेन्स में देर से आने के कारण कपितोनव के पास सीमित विकल्प हैं. ऊपर से उसे ठण्डा सूप अच्छा लगता है. सर्दियों में भी. 

खाना, या डिनर कह लीजिए – मेज़ों पर हो रहा है: यहाँ छह-छह सीटों वाली मेज़ें हैं. नीले लबादे में ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट और कपितोनव को, कॉन्फ़्रेन्स में देर से पहुँचने के कारण, आख़िरी, लम्बी मेज़ पर बैठना पड़ा. इस तंग मेज़ पर उनके साथ बैठे थे – हेराफ़ेरी वाला पित्रोव और माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी. दो कुर्सियाँ ख़ाली थीं. 

हेरा फेरी वाले पित्रोव ने सूप का एक चम्मच चखकर नेक्रोमैन्सर के बारे में दिलचस्पी दिखाना शुरू किया. 

 “नेक्रोमैन्सर महाशय,” ईवेंट्स-आर्किटेक्ट जवाब देता है, “शायद ही आए.”  “ऐसा क्यों?” कपितोनव  चौकन्ना हो गया.  “क्योंकि यहाँ मैं हूँ,” ईवेंट्स-आर्किटेक्ट जवाब देता है.  “और काल-भक्षक?” अदिनोच्नी पूछता है.

 “काल-भक्षक किसी अन्य कारण से नहीं आएगा.” 

वे खा रहे हैं. 

खाने के दौरान हर जगह बातचीत चल रही है. आवाज़ें आती हैं:  “काश, आपको पता होता, कि इंडिया में हमें कैसे खिलाया गया था – फ़कीरों के फ़ेस्टिवल में!”  “क्या कोई फ़िश-मीटबॉल्स को चॉकलेट-ट्रफ़ल्स में बदल सकता है?”  “ये सवाल श्राम के लिए है, उसे ‘सम्मोहन’ की क्रिया आती है.”  “मीशा, तुम तो गए!”

  “ट्रफ़ल्स, ट्रफ़ल्स!”

 “मगर, सब के लिए!”   “साथियों, जो भी आपको दिया जा रहा है, खाइए,” श्राम जवाब देता है. “आप तो समझ सकते हैं कि फ़िश-मीटबॉल्स और ट्रफ़ल्स की क़ीमत में कितना फ़र्क होता है? ये बड़ी महंगी चीज़ है.” 

खाने ने सबको शांत कर दिया है – खाने के दौरान सबके पास एक ही काम है: खाने पर काम करना.

 “दोस्तों, अटेन्शन! मैक्सिम नेगराज़्दक, अपना जादू दिखा रहे हैं!”

 “ये ढिबरी देख रहे हैं?” मैक्सिम नेगराज़्दक उठ कर खड़ा हो गया. “बड़ी, भारी. अब मैं इसे निगल जाऊँगा.” ढिबरी तर्जनी पर चढ़ी हुई थी. हेराफेरी वाला – निगलखोर मैक्सिम नेगराज़्दक फ़ोर्क से ढिबरी पर मारता है, धातु की आवाज़ दिखाते हुए. ढिबरी से मेज़ पर ठकठक करता है, लकड़ी की आवाज़ प्रदर्शित करते हुए. मुँह खोलता है, वहाँ ढिबरी घुसाता है, और कुछ रुक कर निगल लेता है.

उसकी आँखें सामान्य रूप से बाहर निकलती हैं, और कपितोनव समझ नहीं पाता, कि क्या ये  आर्टिस्टिक ट्रिक थी या शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया.  

मैक्सिम नेगराज़्दक क्रैनबेरी-जूस पीकर ढिबरी को अन्दर धकेल देता है. 

लोग तालियाँ बजाते हैं, मगर सब नहीं. 

 “क्या वह सचमुच में निगल गया है?” कपितोनव  अपने साथ खाना खा रहे व्यक्तियों से पूछता है.  “जोकर ही जाने,” माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी कहता है. “अगर मेरे बस में होता, तो मैं अखाद्य वस्तुओं वाले प्रोग्राम पर रोक लगा देता.”  “ऐसा नहीं हो सकता,” हेराफ़ेरी वाला पित्रोव कहता है. “इसके पीछे बड़ी परंपरा है. तलवार खाने वाले, कांच खाने वाले...” फ़िश-मीटबॉल्स के बदले फ़िश का एक और प्रकार पेश किया जाता है, ‘कॉड’ भरे आलू वड़े.

 “साथियों,” मोबाइल हटाते हुए ‘तालाब’ उठकर कहता है. “गुड एपेटाइट, मगर मेरे पास दो ख़बरें हैं, और दोनों ही अच्छी हैं. पहली : ऑडिट कमिटी साढ़े तीन बजे तक काम पूरा कर लेगी. और दूसरी : अभी अभी पक्की ख़बर आई है कि हॉटेल का फ़ायरप्लेस वाला हॉल हमारे पास रहेगा. ग्राण्ड-डिनर सही समय पर और अपनी ही जगह पर होगा!” डेलिगेट्स यंत्रवत् तालियाँ बजाते हैं, और उनके मुँह से “हुर्रे” भी निकलता है. और कोई व्यक्ति चिल्लाता है:  “माफ़ किया!” खाने के दौरान हेराफ़ेरी वाला पित्रोव ईवेंट्स-आर्किटेक्ट को कनखियों से देख लेता था, आख़िर में उसने पूछ ही लिया:  “मैं समझ नहीं पाया कि आप करते क्या हैं, मगर मुझे ये जानने में दिलचस्पी है, कि अपनी कला के बारे में आपकी ख़ुद की क्या राय है? क्या आप समझते हैं कि उसका जादूगरी से कोई संबंध है?”  “मतलब, आप कहना चाहते हैं कि जादू के खेलों से?” अपने ओवर-ऑल का स्ट्रैप ठीक करते हुए ईवेंट्स-आर्किटेक्ट उसे सुधारता है.

 “हाँ, आपकी कला के लिए इस शब्द का प्रयोग करने से मैं घबरा रहा था.” “ ‘जादू’ शब्द से मुझे डर नहीं लगता. प्रोफ़ेशनल क्षेत्र में हालाँकि वह काफ़ी घिसापिटा हो गया है. मगर जब हम ‘जादू’ शब्द का प्रयोग करते हैं, तो हमें इस महान शब्द के सारे अर्थों पर ध्यान देना होगा. ”

 “ख़ासकर आपके मुँह से ये सुनकर ख़ुशी हुई.”

 “और फिर, ऐसी चीज़ लेते हैं, जैसे युनिवर्स. युनिवर्स का प्रादुर्भाव, ये बड़ा जादू नहीं तो और क्या है. वह, जिसे हम ‘बड़ा-विस्फ़ोट’ कहते हैं, उसे ‘बड़ा-जादू’ कहना चाहिए.”

 “और क्या कोई विस्फ़ोट हुआ था? कुछ लोग ये मानते हैं कि कोई विस्फ़ोट-बिस्फ़ोट नहीं हुआ था.”  “हो सकता है कि ये ध्यान बंटाने का तरीक़ा हो?” माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी बातचीत में कूद पड़ा  “युनिवर्स के संदर्भ में ‘ध्यान हटाने का तरीक़ा’ कहना, निःसंदेह अपमानजनक है. मगर पहली बार में ऐसा भी कह सकते हैं. आप सही कह रहे हैं, सबको ‘असाधारणता’ में दिलचस्पी है. मगर इसकी कोई गारंटी नहीं है, मुख्य बात – कुछ और ही है.”    


15.05


खाना खाने के बाद कपितोनव शो-केस की तरफ़ आता है. मुरब्बे से भरे डिब्बे रखे हैं – रास्पबेरी, स्ट्राबेरी, ब्लूबेरी के. क्या आन्का के लिए खरीदूँ – पीटर से गिफ्ट? याद आया उसका झाँइयों भरा, ब्लूबेरी के धब्बे पड़ा चेहरा, जब वे तीनों जंगल में बेरीज़ चुन रहे थे – तब नीन्का का मुँह भी बैंगनी हो गया था, और शाम को, जब वे बरामदे में बैठकर बाऊल में से खा रहे थे, तो नीन्का के होंठ और भी गहरे काले हो गए थे, जैसे ख़ूबसूरत डायन के होते हैं, और, आन्का को सुलाने के बाद भी उसने उन्हें धोया नहीं था...मगर, कपितोनव  अपने आप से कहता है, ये डिब्बा ब्रीफ़केस में नहीं समाएगा, फ़िलहाल इसे कहीं रखने की जगह भी नहीं है. ख़रीदना चाहिए, मगर बाद में. किनीकिन उसके पास आता है:  “वो इंतज़ार कर रहा है.”


15.07

  “और आप इतने परेशान हो रहे थे. चलिए.”

 ये बड़ी बेपरवाही से कहा गया था. अपने समूचे हाव-भाव से किनीकिन कपितोनव  को यह जता देना चाहता है कि ब्रीफ़केसों की अदला बदली उसके मुक़ाबले कपितोनव  के लिए ज़्यादा ज़रूरी है, और इस बात से कपितोनव सहमत होने के लिए तैयार है – वह समझ नहीं पा रहा है कि इस हेरा फ़ेरी वाले- उचक्के जादूगर को कैबेज के कटलेट्स में क्या ख़ास बात नज़र आई है. बर्फ़ के ढेरों से बचते हुए वे रास्ता पार करते हैं, भूतपूर्व दीवालिया लोगों की सहायता करने वाली सोसाइटी की बिल्डिंग में जाते हैं. चलते हुए “सी-9” के कॉरीडोर में आते हैं.

 “नहीं, बेशक, मैं समझता हूँ,” किनीकिन के पीछे-पीछे चलते हुए कपितोनव  कहता है, “बिल्लियाँ खाना चाहती हैं, आप बिल्लियों से प्यार करते हैं...मगर आप इन कटलेट्स के पीछे इतने बदहवास क्यों हो रहे हैं? हो सकता है, आपने उन पर कुछ कर दिया हो? हो सकता है, वो ज़हरीले हों?”  “मैं आपको सुन नहीं पा रहा हूँ,” किनीकिन बिना मुड़े कहता है.  “सच? और, मैं ये कह रहा हूँ कि पैसा कमाने के सैंकड़ों बेहतर तरीके हैं...आप जैसी योग्यता के चलते...जैसे लंच में मछली दी गई थी...इन कटलेट्स में ऐसी क्या बात है?”  “मुझे डर है, कि आप नहीं समझ पाएँगे,” अपनी चाल धीमी करते हुए किनीकिन जवाब देता है, “हरेक का अपना अपना एजेंडा होता है. मेरा – कटलेट्स हैं. और मैं इसे किसी फ़ूहड़ ग़लतफ़हमी की वजह से बदलना नहीं चाहता. बहुत सारी चीज़ों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करना चाहिए, बिल्कुल नहीं.”  ‘वाक़ई मैं, मुझे क्या फ़रक पड़ता है’  - बेकार की उत्सुकता के लिए अपने आप को उलाहना देते हुए कपितोनव  सोचता है. और वाक़ई में, इस बात से उसे क्या फ़रक पड़ता है, कि अपने कार्यकलापों के लिए किनीकिन को कहाँ से प्रेरणा मिलती है. और किनीकिन के दिमाग़ में एक नया विचार आता है – अचानक वह रुक जाता है और एकटक कपितोनव  की ओर देखता है.  “मुझे ऐसा लगता है कि आप मुझे कोई छोटा-मोटा बदमाश, चोर समझ रहे हैं. आप समझ रहे हैं, कि आप मुझसे क्या कह रहे हैं? क्या आप समझते हैं कि बुफ़े और ‘ला कार्ते’ में क्या फ़रक होता है? उस समय बुफ़े चल रहा था. हर कोई, जिसके कटलेट्स ग़ायब हो गए थे, दुबारा जाकर वैसा ही एक या ज़्यादा भी, कटलेट्स ले सकता था. ताज्जुब की बात है, और अगर अभी आपकी प्लेट से मछली ग़ायब हो जाती, तो क्या – दुबारा देने की मांग करते, हाँ? अगर मैं वैसा करता, जैसा आप कह रहे हैं, तो मैं आपका खाना ही ग़ायब कर देता. मगर, मैं चोर नहीं हूँ. बेहतर है, आप ये बात समझ लें.”  “मगर,” मगर इस ‘मगर’ के आगे क्या कहे, कपितोनव  नहीं जानता.  “मेरे पीछे-पीछे आइए,” किनीकिन कहता है.

 नेक्रोमैन्सर कॉरीडोर में खड़ा है और दीवार पर लगे मंगोलियन चित्र देख रहा है. उसके हाथ पीठ के पीछे हैं, और दोनों हाथों से उसने हैण्डिल से ब्रीफ़केस पकड़ रखी है.

 “तो,” किनीकिन कहता है, “नेक्रोमैन्सर महाशय, कृपया प्रेमपूर्वक मेहेरबानी करें.”

  “अच्छी एक्ज़िबीशन है,” नेक्रोमैन्सर कपितोनव  से कहता है. “गोबी का रेगिस्तान, स्तेपी, तालाब. कहते हैं कि उनके यहाँ भेड़ों की संख्या वहाँ के निवासियों की संख्या से दस गुना ज़्यादा है. क्या आप मंगोलिया गए हैं?” कपितोनव  ने संक्षेप में उत्तर देने का फ़ैसला किया:  “नहीं.”  “मैं भी,” किनीकिन ने जवाब दिया, हालाँकि उससे किसीने पूछा नहीं था. “क्या आपने खाना नहीं खाया?”  “मैंने किसी के घर में खा लिया,” नेक्रोमैन्सर महाशय ने लापरवाही से कह दिया.  “चलिए, तब बदल लेते हैं. आपके पास कपितोनव महाशय की ब्रीफ़केस है, मेरे पास – आपकी, और कपितोनव  महाशय के पास – मेरी. हर कोई खिड़की की सिल पर ब्रीफ़केस रखेगा, और हर कोई अपनी अपनी ले लेगा.” रख दीं – ले लीं. किनीकिन फ़ौरन अपनी ब्रीफ़केस लपक लेता है, खोलता है और, कटलेट्स को देखकर, राहत की सांस लेता है:  “सब ठीक है, मैं चला.” कपितोनव किनीकिन के दूर जाने का इंतज़ार करता है, और तब अपनी ब्रीफ़केस खोलता है.  “मैंने ऐसा ही सोचा था!” कपितोनव चहका. “और, मेरी नोटबुक कहाँ है?”  “वो आपकी नोटबुक नहीं है,” नेक्रोमैन्सर महाशय जवाब देते हैं. “ये मरीना वालेरेव्ना मूखिना की प्रॉपर्टी है.”  “आपको कैसे मालूम?”  “उसमें उसका विज़िटिंग कार्ड पड़ा था. स्वाभाविक है, कि मैंने वो नोटबुक उसे लौटा दी, मरीना वालेरेव्ना को फ़ोन करके, उससे मीटिंग फ़िक्स करके. आपको ये मालूम है.”  “आपको कैसे पता कि मुझे मालूम है?”

 “आपको मरीना वालेरेव्ना का मैसेज आया था. उसने आपको सूचित किया था कि नोटबुक उसके पास है, और ये भी लिखा कि किसने उसे दी थी.”  “इन्नोकेन्ती पित्रोविच.”  “हाँ, उसके लिए,” नेक्रोमैन्सर कहता है, “मैं इन्नोकेन्ती पित्रोविच हूँ. साथियों के बीच मुझे मेरे विशिष्ठ नाम से बुलाया जाता है – नेक्रोमैन्सर महाशय. दुनिया के लिए मैं – इन्नोकेन्ती पित्रोविच हूँ.”

 सब ठीक है, वह सही कह रहा है: कपितोनव तभी, लंच से पहले ही समझ गया था, कि इन्नोकेन्ती पित्रोविच – ये नेक्रोमैन्सर महाशय ही है. मगर.  “रुकिए. आपको कैसे मालूम कि मुझे मैसेज मिला है?”  “मरीना वालेरेव्ना ने मेरे सामने ही लिखा था. और, कुछ हद तक मेरी ही सलाह पे.”  “आपने उसे सलाह दी – मुझे मैसेज भेजने की?! आपने – उसे?!”  “वह आपको तसल्ली देना चाहती थी. उसे मालूम था, कि नोटबुक की वजह से आप परेशान हो जाएँगे और आप अंदाज़ भी नहीं लगा पाएँगे कि नोटबुक वापस लौटा दी गई है. आपको तो मालूम ही है कि नोटबुक के लिए वह कॉन्फ्रेन्स में आने की तैयारी कर रही थी – आपके पास, यहाँ, मगर परिस्थितियाँ बदल गईं. मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप क्यों उत्तेजित हो रहे हैं. सब कुछ ठीक ठाक हो गया है. हम कुछ देर बैठे, बातें कीं. उसका किचन बड़ा आरामदेह है. वह, बाइ द वे, मेरे द्वारा आपको नींद वाली दवाई लौटाना चाहती थी, जो आप उसके यहाँ भूल आए थे. मगर मैं सैद्धांतिक रूप से वालोकोर्दीन के ख़िलाफ़ हूँ. माफ़ कीजिए, मैंने नहीं ली.”  “ये सब, न जाने क्यों मेरे दिमाग़ में नहीं बैठ रहा है...सुनिए. मगर ये मेरी ब्रीफ़केस है, नोटबुक मेरी ब्रीफ़केस में पड़ी थी!...ये मेरा मामला है, न कि आपका, कि उसके अन्दर रखी हुई चीज़ों का क्या किया जाए!...नोटबुक मुझे लौटानी चाहिए थी, न कि आपको.”  “अफ़सोस की बात है कि ब्रीफ़केस पे ये नहीं लिखा था कि वो किसकी है. मगर विज़िटिंग कार्ड ने मुझे सही निर्णय लेने में मदद की : मैं उस पते पर गया. मरीना वालेरेव्ना और कन्स्तान्तिन अन्द्रेयेविच बड़े भाग्यवान हैं, कि नोटबुक मेरे हाथों में पड़ी.”  “कन्स्तान्तिन अन्द्रेयेविच इस दुनिया में नहीं है.”  “मुझे मालूम है.”  “तो फिर ये मत कहिए कि वो भाग्यवान है. मैंने नोटबुक की मालकिन से वादा किया था, कि मेरे अलावा कोई और इन नोट्स को नहीं देखेगा. और आप, स्वीकार करते हैं कि आपने नोटबुक में झाँका है, हाँ?”

 “झाँका है? मैंने पूरा पढ़ भी लिया है – शुरू से आख़िर तक. फ़ौरन – जैसे ही नोटबुक को खोला. इसीने मुझे फ़ौरन हरकत में आने की प्रेरणा दी.”

 “आपने बिना इजाज़त ग़ैरों के नोट्स पढ़ लिए.”  “मरीना वालेरेव्ना ने न सिर्फ मुझे माफ़ किया, बल्कि बड़ी दिलचस्पी से उसके बारे में मेरी राय भी सुनी. पहले तो वह सतर्कता से पेश आ रही थी, मगर, जब समझ गई कि किससे पाला पड़ा है, तो उसने काफ़ी सारी बातें मुझे बताईं. उसे बहुत सारे सवाल पूछने थे.”  “ऐसा कैसे?... और आपने सारे सवालों के जवाब दिए?”  “कई सवालों के जवाब न जानना ही उसके लिए बेहतर है. ऐसे सवालों के, स्वाभाविक है, मैंने जवाब नहीं दिए.”  “हाँ, बेशक...और भी...” कपितोनव अपने आप से बुदबुदाता है, ये देखकर, कि नेक्रोमैन्सर को अपनी ब्रीफ़केस खोलने की कोई जल्दी नहीं है. “और फिर,” नेक्रोमैन्सर महाशय, वही इन्नोकेन्ती पित्रोविच है, कहते हैं, “चलिए, ईमानदारी से बात करें. “इस सवाल के संदर्भ में आपको मरीना वालेरेव्ना से कुछ नहीं कहना था. और मुझे कुछ कहना था.”  “क्या इस बात में आपको यक़ीन है?”  “पूरा-पूरा.”  “और पति?” “क्या पति?” नेक्रोमैन्सन ने प्रतिप्रश्न किया.        “क्या आपकी मुलाक़ात के दौरान वह उपस्थित था?”  “सौभाग्य से, पति घर पे नहीं था. वर्ना बातचीत नहीं हो पाती. उसे तो नोटबुक के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है.”  “आपको ये जानकारी भी है...तो, ये ‘डेवलपर’ कौन है?”   “संशोधक,” नेक्रोमैन्सर महाशय ग़लती सुधारता है. “आपको इस बारे में सोचने की क्या ज़रूरत है? आप संख्याएँ बूझते रहिए. और उस मामले से आप को दूर रहना चाहिए. मैं ख़ुद ही सुलझा लूँगा. बेहतर है कि आप सोने की कोशिश करें, आपको सोना चाहिए. बिना टैब्लेट्स और वालोकार्दीन के.”

 “पता है, मुझे लगता है, कि आप अपने ऊपर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ले रहे हैं!”  “ओह, हाँ,” नेक्रोमैन्सर सहमति दिखाता है. “मैं वाक़ई में अपने ऊपर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ले रहा हूँ.”  

कपितोनव  ब्रीफ़केस बन्द करने ही वाला था, मगर तभी उसे लगा कि किसी चीज़ की कमी है. डेलिगेट्स के नामों वाला ब्रोशूर, नोटपैड, पेन्स, पीटरबुर्ग के स्मारकों की रहस्यमय ज़िन्दगी के बारे में किताब-सुवेनीर – ये सब तो था, मगर जादुई-छड़ी नहीं थी. इस ‘जादुई-छड़ी की उसे ज़रा भी ज़रूरत नहीं थी, मगर नेक्रोमैन्सर इन्नोकेन्ती पित्रोविच ने उसके भीतर इतनी घृणा भर दी थी, कि जब मौका मिला है, तो उसे प्रकट न करना पाप होता.

 “मेरे हिसाब से इसमें एक और चीज़ थी,” प्रतिशोध वाली मुस्कान के साथ कपितोनव  कहता है.  “आह, हाँ,” थोड़ी देर सोचने के बाद नेक्रोमैन्सर को याद आता है. “उसे मैंने ले लिया. माफ़ी चाहता हूँ.” वह कोट के अन्दर की जेब से एक चमड़े का ‘केस’ निकालता है, ऐसा जैसे तालों की चाभियों के लिए होता है, मगर उसमें न तो चाभियाँ थीं, न ही कैंची, अगर, मिसाल के तौर पर वह चाकुओं का ‘केस’ होता, बल्कि उसमें से दो छड़ियाँ बाहर निकल रही थीं. कपितोनव  की ओर बढ़ाता है, और जब कपितोनव  पहली छड़ी की ओर हाथ बढ़ाता है, तो उसे सुधारता है:  “ये मेरी है. आपकी दूसरी है.”

कपितोनव  जो अपनी नहीं है, वह छड़ी लौटाता है और अपनी, दूसरी वाली, एकदम वैसी ही छड़ी ले लेता है. छड़ियों में ज़रा भी फ़र्क नहीं है. उसे अफ़सोस हुआ कि उसने क्यों ये खेल शुरू किया – अपने आप को बेवकूफ़ महसूस करना ख़ुशी नहीं देता. 

15.21


इंटरवल ख़त्म हुआ. हॉल में लोग कुर्सियों पर बैठने लगे हैं. कपितोनव  भी एक ख़ाली कुर्सी की ओर बढ ही रहा था कि ‘तालाब’ ने उसे रोक दिया:

 “आपने कल पार्टीशन के साथ अपना कार्यक्रम दिखाने का वादा किया था. चलिए, हो जाएगा. अभी पाँच मिनट हैं.” ’तालाब’ के साथ हॉल के अंत तक जाना ही पड़ता है. एक दरवाज़ा प्रकाश-व्यवस्था वाले कमरे की तरफ़ जाता था, और दूसरा उस कमरे में जहाँ माइक्रोफ़ोन्स, फ़ालतू की कुर्सियाँ और हर तरह का कबाड़ पड़ा था, - दरवाज़ा खोलकर ‘तालाब’ कपितोनव  को यहीं लाता है.

  “आप कुछ नाराज़ लग रहे हैं. क्या आपको ख़ुश करूँ? तो सुनिए. जैसा कि आप चाहते थे, बोर्ड के लिए आपका चुनाव नहीं हुआ है. अभी अभी रिज़ल्ट्स सुनकर आया हूँ. मगर, ये सीक्रेट है. ख़ैर, अभी घोषणा हो ही जाएगी.”  “वाक़ई में, ये ख़ुश-ख़बर है,” कपितोनव  सहमति दर्शाता है.       

 दीवार से कुछ दूर, दो टांगों, और क्रॉस के आधार पर प्लायवुड की एक फ्रेम खड़ी है – उस पर नये साल के क्रिसमस ट्री का इश्तेहार चिपका है: सांता क्लाज़, बायाँ हाथ छड़ी पर टिकाए और दायाँ हाथ लेनिन की स्टाइल में फ़ैलाए खड़ा है. फ़रवरी के आरंभ में ये अटपटा लगता है.  “ये पार्टीशन तो नहीं है, मगर चलेगा,” ‘तालाब’ कहता है और उस फ्रेम की टांग उठाता है. कपितोनव दूसरी टांग उठाता है.  “आपके पक्ष में सिर्फ दो वोट थे. एक मेरा था.” दोनों मिलकर पार्टीशन सरकाते हैं.

 “मगर, आपको, उम्मीद है कि चुन लिया गया है?”

 “बेशक. प्लीज़ इजाज़त दीजिए, मैं ये नहीं बताऊँगा कि मेरे पक्ष में कितने वोट पड़े. जल्दी ही पता चल जाएगा. आप यहाँ खड़े हो जाइए, और मैं वहाँ रहूँगा – ‘तालाब’ निर्देश देता है और पार्टीशन के पीछे कपितोनव से छुप जाता है.  “मैं अभी भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरा नाम क्यों देना था,” कपितोनव  कहता है.  “हमने सब ठीक ही किया था. और आपने हमारी मदद इस तरह से की, कि अपनी उम्मीदवारी का विरोध नहीं किया. समझाने में लम्बा समय लगेगा. मगर आपको – धन्यवाद.” 

 दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर हॉल से कोई भीतर झाँका.


 “प्लीज़ डिस्टर्ब न करें! हमारे बीच मर्दों वाली बातचीत हो रही है!” पार्टीशन के पीछे से ‘तालाब’ चिल्लाता है, और पलक झपकते ही दरवाज़ा बन्द हो जाता है.

 “आप तैयार हैं?” कपितोनव  पूछता है.  “मैं हमेशा तैयार रहता हूँ. मुझे क्या करना है. और क्या आप तैयार हैं? ध्यान केन्द्रित करेंगे?”

 “नहीं करूँगा.” कपितोनव  गहरी साँस लेता है.  “दो अंकों वाली संख्या सोचिए,” हमेशा की तरह कपितोनव  कहता है.  “सोच ली.”  “उसमें 13 जोड़िए.”

 “जोड़ दिए.”  “11 निकाल दीजिए.”  “निकाल दिए.”  “आपने 21 सोचा था.”   “ब्लैक जैक.” (ताश का एक खेल – अनु.)  “क्या ब्लैक जैक?”  “फिर से ताश.”  “ आप समझ रहे हैं कि मेरे पास सुपर-इन्ट्यूशन है.”  “ठीक है. सोच ली.”   “उसमें 8 जोड़िए.”  “और अगर न जोडूँ तो?”

 “आप जोड़िए भी!”  “ठीक है, जोड़ दिए.”  “4 निकाल दीजिए.”  “यही तो, किसलिए, किसलिए? ठीक है, निकाल दिए.”

 “73” ’तालाब’ आधा मिनट चुप रहता है, फिर निर्णयपूर्वक घोषणा करता है:  “सब साफ़ है. आप चेहरा नहीं देखते, मगर आवाज़ सुनते हैं. ये, आवाज़ से. फिर से, मगर इस बार मैं चुप रहूँगा.  “संख्या सोचिए,” कपितोनव  कहता है, “दो अंकों वाली.” ’तालाब’ जवाब नहीं देता. तब कपितोनव  कहता है:  “उसमें पांच जोड़िए.” ’तालाब’ चुप रहता है.  “तीन निकाल दीजिए,” कपितोनव  कहता है. उसे जवाब नहीं मिलता.  “आपने सोची थी 99.” उस तरफ़ से पार्टीशन पर ज़ोर की मार पड़ी. ये ‘तालाब’ नीचे गिर रहा है. कमज़ोर आधार के कारण एक कोने से कपितोनव के चेहरे को छूते हुए, पार्टीशन उछलता है.

पार्टीशन के साथ साथ तालाब भी धम् से फ़र्श पर गिरता है.

कपितोनव  उसकी तरफ़ लपकता है, और डर के मारे जम जाता है. ‘तालाब’ पीठ के बल गिरा है. उसका चेहरा विकृत हो रहा है. उसकी आँखें खुली हैं. वह अभी तक सांस ले रहा है (या कपितोनव  को ऐसा लगता है कि वह अभी तक सांस ले रहा है).  “एम्बुलेन्स! एम्बुलेन्स!” कपितोनव  चिल्लाता है, और हाथ के तेज़ झटके से जेब से निकला हुआ मोबाइल छत की ओर उछलता है.                     दरवाज़ा धड़ाम से खुलता है, और कोई व्यक्ति फ़र्श से मोबाइल उठाते हुए कपितोनव  से टकराता है. दो और जादूगर भागते हुए कमरे में आते हैं.

और, कपितोनव  के हाथों से मोबाइल फिर से मेंढक के समान उछलता है.  “उसने संख्या सोची थी...99...मैंने नहीं सोचा था...मैं नहीं चाहता था...कोई एम्बुलेन्स बुलाइए.”

उसे बुला लिया गया था. आवाज़ें सुनाई देती हैं:  “उसने उसके साथ क्या कर दिया?”  “आपने उसके साथ क्या कर दिया?”

 “वो तो मर चुका है!”

 “क्या कोई हार्ट की मसाज कर सकता है?”

 “नेक्रोमैन्सर को बुलाइए!”  “वो नेक्रोमैन्सर (ओझा) है, न कि जीवनरक्षक!”  “देखिए, यहाँ खून है!”

खून कपितोनव  के चेहरे पर है – पार्टीशन के कोने से उसकी ठोढ़ी पे खरोंच आ गई थी.


अंधेरा हो गया, कोहरा घना हो गया, धुंध छा गई, हर चीज़ तैरती सी लगने लगी, गहराने लगी – ये सब उसकी आँखों में था, वह एक के भीतर एक रखे गिलासों की तरह रखी गईं प्लास्टिक की कुर्सियों के टॉवर का सहारा लिए खड़ा है. ‘तालाब’ की खुली हुई आँखों के बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है : आँखों की पुतलियाँ स्थिर हैं. 

कमरे में लोगों की भीड़ बढ़ने लगी. सबको यही परेशानी है कि कपितोनव कैसे बर्ताव कर रहा है, ‘तालाब’ कैसे पड़ा है. विचार-विमर्श करते हैं :  “क्या लड़ाई हुई थी?”  “ ‘तालाब’ ने कहा था कि उनके बीच मर्दों वाली बातचीत होने वाली है!” ज्युपितेर्स्की ने सबको बाहर निकालने की ज़िम्मेदारी ले ली. प्रबंधक आता है, वह दुहराता है : “ये भयानक है! ये भयानक है!” इस बात को सब लोग जान गए हैं कि ‘तालाब’ ने 99 संख्या सोची थी.     


15.42

लिओन्ती करास, ड्राइंगरूम मैजिक का मास्टर, जिसने आंगन में एम्बुलेन्स की टीम का स्वागत किया था, उसे लेकर मृत देह के पास आता है: एक महिला-डॉक्टर और दो जोशीले सहायक कमरे में तेज़ी से दाख़िल होते हैं, उन्हें अभी भी कुछ उम्मीद है.  

 “कमरा ख़ाली कर दीजिए,” डॉक्टर हुक्म ने दिया.

कमरा सिर्फ दो ही लोग ख़ाली कर सकते हैं (बाकी लोग ख़ाली कर चुके थे) – कपितोनव, जो जैसे खड़ा था, वैसे ही खड़ा है, और जादूगर-माइक्रोमैजिशियन झ्दानव, जिसे चौंकन्ने ज्युपितेर्स्की ने ख़ुद कपितोनव  का ख़याल रखने की हिदायत दी थी.

दोनों दरवाज़े की तरफ़ जा ही रहे थे, कि उनकी पीठ के पीछे डॉक्टर चीख़ी. 

वापस मुड़े.  “ये क्या है???”

‘तालाब’ के कोट की आस्तीन से सफ़ेद चूहा बाहर निकला. वह ‘तालाब’ की ठण्डी पड़ चुकी हथेली पर नाक से टक-टक कर रहा है. 

‘तालाब’ न केवल ताश के जादू का स्पेशलिस्ट था, बल्कि वह और भी कई तरह के जादू जानता था. 

“ज़्यूज़्या,” झ्दानव कहता है. झ्दानव ज़्यूज़्या को उठाता है और अपने धारियों वाले कोट की चौड़ी जेब में रख लेता है, कपितोनव  को रास्ता देकर ख़ुद उसके पीछे पीछे बाहर निकलता है. 

15.47


हॉल में जादूगर यूँ ही इधर-उधर घूम रहे हैं. कुछ लोग कुर्सियों पर बैठे हैं. और, चूँकि वे उस दरवाज़े की तरफ़ पीठ करके बैठे हैं, जिसमें से कपितोनव  और झ्दानव बाहर निकले थे, तो कपितोनव  के हॉल में वापस लौटने के बारे में उन्हें सिर्फ तभी पता चलता है, जब हॉल में घूम रहे लोग अपनी-अपनी जगह पर जम जाते हैं. वे, जो बैठे हैं, मुड़े और चुपचाप कपितोनव  की ओर देखने लगे. “मैं फिर कभी नहीं...कभी भी नहीं...” कपितोनव जैसे स्वयम् की आवाज़ में नहीं बोल रहा है, “ कभी भी...किसीसे भी...नहीं कहूँगा...संख्या सोचने के लिए.”

जितना वह कहना चाहता था, उससे ज़्यादा ही कह गया, और ज़ोर देकर:  “कभी नहीं..” कपितोनव  ने कहा.  मगर:   “चुप हो जाइए, चुप हो जाइए!” अपने सामने नीनेल को देखता है. उसने मुँह बनाया – वह ठोढ़ी के ज़ख़्म के नीचे रूमाल रखती है.  “एक भी शब्द न कहिए. जो कुछ भी आप कहेंगे, उसका आपके ख़िलाफ़ उपयोग हो सकता है.” 

दोनों सहायकों में से एक – कपितोनव  ने दोनों में फ़रक करना ज़रूरी नहीं समझा – कमरे से बाहर निकल कर उसके पास आता है:  “क्या आप गवाह हैं? मुझे कुछ सवाल पूछने हैं.”  “किसलिए?” नीनेल सख़्ती से पूछती है.  “कॉल-चार्ट भर रहे हैं. मौत का समय, आपके हिसाब से, पन्द्रह मिनट पहले? क्या नोट किया था?”  “ये सही है, मैंने उसे सिर्फ संख्या सोचने के लिए ही कहा था!”  “क्या ये लगभग है?” 

15.51


मृतक को कमरे में उसके हाल पर छोड़ दिया गया है. एम्बुलेन्स की पूरी टीम (ड्राइवर को छोड़कर) हॉल में बैठी है. कहीं जाने की जल्दी है ही नहीं. कागज़ात भर रहे हैं. डॉक्टर कॉल-कार्ड पर नज़र डालती है, जिसे सहायक ने पकड़ रखा है.  “ठीक है, सेन्या, स्टेटमेंट में तीन मिनट पहले का टाइम डाल दो...हालाँकि, नहीं, रुको, हम पहुँचे कब थे?...और मौत तुम्हारे पास कब हुई?...अभी जितना है, वही लिखो. अभी कितना बजा है?” 

15.57        


मेडिकल टीम अब कपितोनव  में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है. यहाँ और भी हैं, जो कपितोनव के मुक़ाबले में ज़्यादा अच्छी तरह बता सकते हैं. जादूगर-माइक्रोमैजिशियन डॉक्टर को सूचित करता है कि “उनके बीच ‘मर्दों वाली बातचीत हो रही थी’, और सिर्फ अभी कपितोनव अंदाज़ लगता है कि ये झ्दानव था, जिसने तब कमरे में झांका था. अगर कपितोनव  को छोड़ दें, तो जादूगर-मैजिशियन झ्दानव वह अंतिम व्यक्ति था, जिसने मृत ‘तालाब’ को आख़िरी बार सुना था (मगर सान्ताक्लाज़ वाले पार्टीशन की वजह से देखा नहीं था!). 

डॉक्टर को किसी और ही बात में दिलचस्पी थी. क्या कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा जो सही-सही ये बता सके कि क्या ‘तालाब’ एथेरोस्क्लेरोसिस का इलाज करवा रहा था. प्रमाण विरोधाभासी हैं.

 “बाइ चान्स, यहाँ कोई रिश्तेदार हैं?” यहाँ कहाँ से आए रिश्तेदार? मगर उन्हें सूचित कर दिया गया है. भाई जल्दी ही यहाँ पहुँच रहा है. ये विनती की जाती है कि – और इस शब्द समूह से सब पर बड़ा भारी प्रभाव पड़ता है – सर्जिकल-इन्वेस्टिगेशन ग्रुप के आने तक कोई भी कमरे में न आए.

 “क्या किसी पर शक है? बात, आख़िर क्या है?” नीनेल उठकर पूछती है.  “आकस्मिक मृत्यु, हमें उन्हें बुलाना ही पड़ेगा.” कपितोनव खिड़की के पास बैठा है. नीनेल उसके पास आई.  “परेशान न हों, उन्हें बुलाना ही पड़ता है.” 

16.04


 डॉक्टर:  “आपकी ठोढ़ी.”  “ठोढ़ी – जहन्नुम में जाए, मगर क्या नींद की दवाई है?”  “आपको सेडेटिव की ज़रूरत है.” नीनेल:  “उसे सेडेटिव की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं ख़ुद ही उन्हें शांत कर दूँगी.” उसके पास बैठकर, उसके हाथ पर हाथ रखती है.  “कपितोनव, शांत रहिए, मैं यहाँ हूँ.” वह उठकर गलियारे में आगे-पीछे घूमने लगता है.


16.06               

डॉक्टर और सहायक जा रहे हैं. पोडियम के पास महाशय नेक्रोमैन्सर खड़ा है, रिमोटिस्ट से बचकर जाना असंभव है. डॉक्टर और सहायक रुक गए. “साथियों,” नेक्रोमैन्सर कहता है. “ होमिओस्टेसिस (समस्थापन – अनु.). फ़ीडबैक. नाज़ुक, सब बेहद कुछ नाज़ुक, साथियों.” डॉक्टर:  “क्या आप डॉक्टर हैं?”  “मैं नेक्रोमैन्सर हूँ.” वे बचते, बचते उसके पास से गुज़रते हैं, जाते जाते उसे देखते हैं.


16.13


महाशय, लगता है, कि सब कुछ साफ़ है. क्या हम वलेन्तीन ल्वोविच की याद में एक मिनट का मौन रखकर फिर ऑडिट कमिटी की रिपोर्ट सुन सकते हैं?” कपितोनव  को ये भी सुनाई देता है:

 “रुकिए, जिस्म अभी ठण्डा नहीं हुआ है.”  “कम से कम जिस्म के ठण्डा होने तक तो इंतज़ार कर लें.”  “जिस्म - जिस्म है, और काम - काम.”

 “सर्जिकल-इन्वेस्टिगेशन ग्रुप के आने तक तो रुकना ही चाहिए और सिर्फ उसके चले जाने के बाद ही सेशन आगे बढ़ाएँ.”

 “इंतज़ार करेंगे. जल्दी मचाने की ज़रूरत नहीं है.” 

16.38 

“कपितोनव, सुन रहे हैं? मैं नीनेल पिरागोवा हूँ. परेशान मत होइए, सब ठीक है. आपको आपकी योग्यताओं के बारे में बताना चाहती हूँ. आप सोचते हैं, कि आप बस यूँ ही हैं. सोचिए, संख्याएँ! और हो सकता है, संख्याएँ – ये सिर्फ आइसबर्ग का वो भाग हो, जो दिखाई देता है, वो भी आपको सबसे ज़्यादा दिखाई देने वाला. हो सकता है, आप...जानते हों...जैसे प्राचीन हीरो...पर्सियस या हर्क्युलस... या बेहतर! आप प्राचीन ईश्वर हों, सिर्फ आप ख़ुद ही इस बारे में नहीं जानते. कपितोनव , मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ, आप ख़ुदा हैं. वर्ना संख्याएँ...सोचिए, संख्याएँ!”  “नीनेल, मैं थोड़ा थक गया हूँ. आप मुझे अकेला छोड़ सकती हैं?”  “हाँ, बेशक, सिर्फ अपना आत्मविश्वास न खोइए.”


16.51


हॉल में ‘तालाब’ का भाई प्रवेश करता है, जैसे ख़ुद ‘तालाब’ ही हो, मगर बड़ा. 

उतारा हुआ ओवरकोट कुर्सी पर फेंकता है, ओवरकोट के कंधों पर बर्फ के पिघल चुके फ़ाहों के निशान हैं. बुनी हुई टोपी वह नहीं उतारता है.

न जाने क्यों, सभी जो उसे देख रहे हैं, अंदाज़ लगा रहे हैं, कि वह रिश्तेदार है, भाई ही है, जैसे ख़ुद ‘तालाब’ हो, मगर - बड़ा.

“अगर कुछ देर के लिए यहाँ रुकना चाहें,” मौत वाले कमरे का दरवाज़ा खोलते हुए ज्युपितेर्स्की कहता है, “तो, प्लीज़ आइए, मगर सिर्फ कुछ ही देर यहाँ ठहरिए, देख लीजिए, मतलब, हाथ न लगाइए. हम इन्वेस्टिगेशन टीम का इंतज़ार कर रहे हैं.”


‘तालाब’ का भाई ख़ामोशी से भीतर जाता है. 

एक-दो मिनट वहाँ रुककर बाहर आ जाता है. 

हेराफ़ेरी वाला जादूगर चुबार उसकी बगल में ही था, वह उससे कुछ कहता है, हौले से, आँखों से इधर-उधर इशारे करते हुए. ‘तालाब’ का भाई पैनी नज़र से हॉल को देखता है, और कपितोनव को महसूस होता है कि उसे ही ढूँढ़ा जा रहा है. 

जादूगर-माइक्रोमैजिशियन पहले ही की तरह कपितोनव से दूर नहीं हटता है, इसलिए ‘तालाब’ का भाई, जब पास में आया, तो उन दोनों ही के पास आया. कपितोनव , इस बात के लिए तैयार था कि उससे कुछ पूछा जाएगा, मगर वह ग़लती कर गया – ‘तालाब’ का भाई झ्दानव से मुख़ातिब होता है:  “मुझे बताया गया है कि आप वो आख़िरी व्यक्ति हैं, जिसने मेरे भाई की आवाज़ सुनी थी.”  “आख़िरी से पहले वाला,” झ्दानव जवाब देता है. “मैंने दरवाज़ा खोला, और आपके भाई ने मुझसे कहा कि उनके बीच ‘मर्दों वाली बात’ हो रही है – इसके साथ. मुझे नहीं मालूम कि बाद में उन्होंने किस बारे में बात की. 

 “किस बारे में?” ‘तालाब’ का भाई कपितोनव  की आँखों में देखता है.  “जहाँ तक मुझे याद है,” कपितोनव कहता है, “वह चुप था, हमने तय किया था कि बोलूँगा सिर्फ मैं. “और ‘मर्दों वाली बात’ – ये सिर्फ अलंकार है, मेरा विश्वास कीजिए, उससे ज़्यादा कुछ नहीं. उसने सिर्फ संख्या सोची, मैंने बूझी, और...मेरी संवेदनाएँ स्वीकार करें. मुझे वाक़ई में बेहद अफ़सोस है.”  “कौन सी संख्या?”  “99.”  “मेरे भाई ने और कौन सी संख्या सोची थी?”  कपितोनव  ने सब कुछ नहीं दुहराया.  “और कौन सी ‘मर्दों वाली बात’ हो सकती है? ज़्यूज़्या कहाँ है?”  झ्दानव ने ऐसे दिखाया जैसे सुना ही न हो. 

 “ज़्यूज़्या कहाँ है?” ‘तालाब के भाई ने फिर से पूछा. झ्दानव जाना चाहता है, मगर तभी कपितोनव  ने कहा:  “झ्दानव, रुकिए!” झ्दानव अनिच्छा से सफ़ेद चूहे को जेब से बाहर निकालता है, ‘तालाब’ का भाई बाएँ हाथ में उसे लेता है, दाहिने हाथ से सिर से बुनी हुई टोपी उतारता है और उसमें चूहे को रख देता है. जहाँ तक टोपी का सवाल है, वह उसे अब थैली की तरह पकड़े हुए है. ज़्यूज़्या अब थैली में है.

‘तालाब’ का भाई आख़िरी पंक्ति तक जाता है, कुर्सी पर बैठता है और हाथ में टोपी-थैली पकड़े बैठा रहता है.                 17.22 


 “वह कहता था, कि एक बिल्लोचन ने उससे कहा था कि वह 99 साल जिएगा.”      “मगर जिया सिर्फ 58.” तब काल-भक्षक ने कहा:  “ये मैंने उसके 41 साल खा लिए.” आधे मिनट के लिए सब ख़ामोश रहते हैं. आख़िर में माइक्रोमैजिशियन एस्त्रोव उठता है.  “मैं नहीं रह सकता इसके साथ...इसके साथ...एक ही छत के नीचे!” उसके पीछे निगलू-जादूगर मैक्सिम नेगराज़्दक और अन्य दो माइक्रोमैजिशियन भी चले जाते हैं.

कपितोनव और काल-भक्षक अकेले रह जाते हैं. कपितोनव  सुनता है:  “अपने आप को दोष मत दीजिए. मैं महसूस कर रहा हूँ, कि मैंने उसे, न कि आपने.”  “सुनिए, आप यहाँ कैसे आए?”  “ ‘तालाब’ के माध्यम से. वैसे ही जैसे आप भी आए हैं.”

 “हाँ, उसने बताया था.”  “मुझे ‘पागल’ समझे जाने की आदत नहीं हुई है. मुझे पता है, वो सब कहते हैं : चार पागल! देखिए – ये रहे चार पागल! मगर चार कहाँ हैं? चलिए, मान लेते हैं, ईवेन्ट्स आर्किटेक्ट और महाशय नेक्रोमैन्सर, वे सचमुच में सामान्य नहीं हैं. मगर वे दो ही हुए. और वो? वो कहते हैं : ये रहे चार!”  “माफ़ कीजिए, और चौथा कौन है?”  “आप.”  “मैं?”  “क्या आपको नहीं मालूम, कि आपको चौथा पागल कहते हैं?” 

17.30 

 “हाँ, मेरा जी हमेशा मिचलाता है. पहले ऐसा नहीं था. मगर, क्या इसमें मेरा कोई दोष है, कि समय ही ऐसा है? ये भयानक है. समय ख़राब हो गया है. ये समय नहीं है. शैतान ही जानता है ये क्या है.” 

17.35


 “सोएँ नहीं.”

 “क्या आपकी राय में, मैं सो रहा हूँ?”  “मैंने ऐसा तो नहीं कहा.”  “आपने ऐसा ही कहा: सोएँ नहीं.”  “कपितोनव, क्या आपने ग़ौर किया कि मेरी उपस्थिति में आपका समय किसी और तरह से गुज़र रहा है?” 

17.39 

 “तुम्हें तो मार डालना भी कम है.” कोई कह रहा है.  

 17.40


कपितोनव अन्दाज़ा लगाता है कि ये काल-भक्षक के लिए कहा गया है और कहने वाला नेक्रोमैन्सर है. 


17.45


काल-भक्षक ग़ायब हो गया, और महाशय नेक्रोमैन्सर कपितोनव की बगल में बैठ गया. 

17.47                                                

समय आगे-आगे चल रहा है. इस लिहाज़ से सब ठीक है. नीनेल फिर से आ गई.  “आप यहाँ क्या कर रहे हैं,” वह नेक्रोमैन्सर से पूछती है. 

17.54


महाशय नेक्रोमैन्सर: “मैं सिर्फ दिवंगत और मृतकों के साथ ही काम करता हूँ, और वो भी रूसी बोलने वालों से, मगर लाशों के साथ कदापि नहीं.”  “ये आप क्या बकवास कर रहे हैं?” नीनेल परेशान हो जाती है. “कैसे रूसी बोलने वाले? लाशें दिवंगतों और मृतकों से कैसे अलग हैं?”  “सिर्फ रूसी भाषा में ही दिवंगत और मृतक – सजीव वस्तुएँ हैं, जबकि लाश – निर्जीव चीज़ है.”  “क्या बकवास है!”

 “बिल्कुल बकवास नहीं है. पुल्लिंगी शब्द, जो स्वर से समाप्त होते हैं, कर्म कारक में अंत में ‘आ’ लगा लेते हैं (ये रूसी व्याकरण का नियम है – अनु.) , यदि वे सजीव हैं; और अंत में कुछ नहीं लगाते, यदि वे निर्जीव हैं... जैसे, बैल, छछूंदर, पायलेट. सजीव हैं. किसको देखता हूँ? बैल-को, छछूंदर-को, पायलेट-को. और ये देखिए: खंभा, कुकुरमुत्ता, छिद्रक. निर्जीव हैं. क्या देखता हूँ? खंभा, कुकुरमुत्ता, छिद्रक. अंत में कोई व्यंजन नहीं है.”  “क्या आप देख नहीं रहे हैं, कि कपितोनव  की तबियत आपके बगैर भी ख़राब है? ये सब किसलिए?”

 “ इसलिए. क्या देखता हूँ? लाश देखता हूँ. मगर ये नहीं कह सकते कि ‘लाश को देखता हूँ’. मतलब, निर्जीव. दूसरी ओर: किसको देखता हूँ? मृतक को, दिवंगत को देखता हूँ. मगर ऐसा नहीं कह सकते कि ‘मृतक देखता हूँ’, ‘दिवंगत देखता हूँ’. मतलब, सजीव वस्तुएँ हैं. समझ रही हैं? लाश – जैसे मेज़ और ईंट, निर्जीव चीज़ है. मगर दिवंगत और मृतक – जैसे बढ़ई और बाज़, सजीव वस्तुएँ हैं. दिवंगत और मृतक के साथ फिर भी काम किया जा सकता है.”  “दिवंगत और मृतक में क्या फ़रक है?”  “सूक्ष्म अंतर है. मगर ज़्यादा महत्वपूर्ण वो है, जो इन्हें एक श्रेणी में रखता है. सजीवता. हाँ, वे सब बेजान हैं – लाश भी, दिवंगत भी, मृतक भी; मगर इसके बावजूद दिवंगत और मृतक सजीव हैं. लाश – निर्जीव है. और, मुख्य बात ये है. निर्जीव को ज़िन्दा नहीं किया जा सकता, क्योंकि वो अपरिहार्य रूप से निर्जीव है. और बेजान को, यदि वह सजीव है, तो जीवित किया जा सकता है. लाश को – नहीं, और दिवंगत और मृतक को – संभव है.”  “बकवास.” ”ध्यान दें, कि ये रूसी भाषा की प्रकृति के अनुरूप है, इसीलिए मैं विशिष्ट रूप से सिर्फ रूसी-भाषियों के साथ काम करता हूँ...सिर्फ इसीलिए, न कि राष्ट्रभक्ति की भावना से, कोई ऐसा भी सोच सकता है. और ये है महत्वपूर्ण बात : पुनर्जीवित, मतलब जो अब मृतक या दिवंगत नहीं है, उसे रूसी भाषा निश्चित रूप से भुला देती है और वह किसी और भाषा में चला जाता है. अगर वह रूसी-भाषी बना रहता है, तो उसे फिर से ज़िन्दा किया जा सकता है, यदि वो कभी फिर से मृतक या दिवंगत बन जाए तो, और ऐसा अनगिनत बार हो सकता है. मगर, अफ़सोस, कि ऐसा संभव नहीं है. दिवंगत को और मृतक को सिर्फ एक बार जीवित किया जा सकता है, और वह फिर कभी भी रूसी नहीं बोलेगा.”  “बकवास, बकवास, बकवास.” “ बहरहाल, मूखिन की प्रॉब्लेम को मैंने क़रीब-क़रीब हल कर लिया है.”

 “मूखिन – वो कौन है?” नीनेल चौंकन्नी हो गई.  “ये वो है, जिसके सामने अब कोई प्रॉब्लेम नहीं है,” कपितोनव कहता है, जो अब तक बातचीत में हिस्सा नहीं ले रहा था.  “बहस नहीं करूँगा,” महाशय नेक्रोमैन्सर कहता है. “मगर, ‘तालाब’ की प्रॉब्लेम भी इसी तरह से हल हो रही है.”  “आप वाक़ई में बकवास कर रहे हैं,” कपितोनव  मुँह फेर लेता है.  “मैं और क्या कह रही हूँ!” नीनेल चहकी.  “नहीं, दोस्तों, बकवास आप लोग कर रहे हैं, न कि मैं. और आप, कपितोनव , औरों से ज़्यादा.” 

18.09 

आँखें अपने आप बन्द हो रही हैं, और नज़र आ रहा है मूखिन, जैसा कि, शायद, उसे अठारह मंज़िल की बिल्डिंग की समतल छत पर पाया गया था. हिंसक मृत्यु के कोई चिह्न नहीं हैं. उसके बदन पर नया सूट है, जिसके अस्तित्व के बारे में मरीना को पता नहीं था. कपितोनव को दिखाई देता है, कि मूखिन पीठ के बल पड़ा है और हाथ फ़ैलाए हुए है. 

 ‘बोलेरो’ गरज रहा था.

 “पापा, नमस्ते. सब ठीक तो है? अच्छी तरह एडजस्ट हो गए?”  “हाँ, सब बढ़िया है. कुछ कहना चाहती हो?”  “पहली बात, तुम चाभियाँ छोड़ गए.”  “उम्मीद है, कि मुझे कोई-तो फ्लैट में आने देगा...”   “अफ़कोर्स, कोई तो. मगर तुमने चाभियाँ बाहर से ताले में छोड़ दीं. मैं अन्दर से दरवाज़ा ही नहीं खोल पाई. पड़ोसियों की मेहेरबानी से...”

उसे बड़ा सदमा लगा. वह कहता है:  “ग़लती हो गई.”

फ़ोन कट गया.


18.17


 “इन्वेस्टिगेशन टीम” – ‘तालाब’ के मृत शरीर वाले कमरे की ओर जाते हुए लोगों को देखकर माइक्रोमैजिशियन एस्त्रोव कहता है. “मतलब, ये कोई हल्की-फ़ुल्की बात नहीं है.”  “काँव-काँव मत करो,” नीनेल कहती है. “इसका कोई मतलब नहीं है.”

 “आप ऐसा सोचती हैं? कल काल्पनिक बॉम्ब, आज वास्तविक मौत.” 

18.20


 “ध्यान दीजिए, कपितोनव, अब आपसे सवाल पूछे जाएँगे... ध्यान रहे...” नीनेल अपनी बात पूरी नहीं कर पाई – वो आ भी गया :  “क्या आप प्रत्यक्षदर्शी हैं?”  “हाँ, मैं गवाह हूँ.”  “फ़िलहाल प्रत्यक्षदर्शी.”  “क्या कोई फ़रक है?” न जाने क्यों कपितोनव  पूछता है.  “बहुत बड़ा.”  “और आप?” नीनेल बीच में कूदती है. “क्या आप इन्वेस्टिगेटर हैं?”  “ऑपरेशन्स ऑफ़िसर.”  “माफ़ कीजिए, समझ नहीं पाई.”  “ऑपर...” ऑपरेशन्स ऑफ़िसर ने कहा. 

 “और इन्वेस्टिगेटर कहाँ है? इन्वेस्टिगेटर को होना चाहिए. मुझे इन्वेस्टिगेटर दिखाइए.”  “मैं इन्वेस्टिगेटर के बदले आया हूँ.”  “आह, ये बात है, पूरा ग्रुप नहीं आया! चलिए, हाँ, आज तो इतवार है.”  “ये हम ख़ुद ही सुलझा लेंगे.”  “हाँ, बेशक, मैं तो भूल ही गई थी कि इतवार के दिन मरने की सिफ़ारिश नहीं की जाती है.”  “कौन नहीं करता है सिफ़ारिश? किसीने ऐसी सिफ़ारिश नहीं की है!”

 “और, क्या ये सही है, कि इन्वेस्टिगेटर के अभाव में ऑपरेशन्स ऑफ़िसर क्रिमिनल केस शुरू करे?”  “माफ़ कीजिए, मैं क्रिमिनल केस शुरू नहीं कर रहा हूँ. और क्रिमिनल केस शुरू मैं नहीं करता.”  “ख़ैर पूछिए...”  “मैं पूछ नहीं रहा हूँ, मगर आप मुझे बहुत डिस्टर्ब कर रही हैं.”  “अपना काम जारी रखें. मगर मैं उसके साथ रहूँगी. कपितोनव, मैं यहाँ हूँ!”  “क्या आप एडवोकेट हैं?”  “मैं ट्रिक्स-डाइरेक्टर हूँ!”  “नीनेल,” कपितोनव  कहता है, “प्लीज़, मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा.”  “ठीक है. बस इतना याद रखिए, कि मैंने क्या कहा था.” वह दूर जाती है. 

18.25


छोटे कमरे में. “मैं यहाँ खड़ा था, वो – यहाँ. पार्टीशन के पीछे. मैं उसे नहीं देख रहा था, और हमने तय किया था कि वह चुप रहेगा. उसने संख्या सोची. मैंने उससे कहा...कुछ करने के लिए. फिर मैंने कहा: 99. वह गिरने लगा, पार्टीशन मुझ पर गिरा दिया, और ख़ुद मर गया.  “कुछ करने के लिए – मतलब, क्या करने के लिए?”  “पाँच जोड़ने के लिए, तीन घटाने के लिए...सही सही संख्याएँ तो याद नहीं हैं. भूल गया.”  “क्या ये जादू है?”  “पता नहीं. शायद, जादू है. यहाँ सभी जादूगर हैं.”  “सब के बारे में जानना ज़रूरी नहीं है. अभी हम आपके बारे में और उसके बारे में बात कर रहे हैं. ठीक है, मोटे तौर पर समझ में आ गया है.” 

18.29


वह काफ़ी देर तक किसी से फ़ोन पर बात करता रहा.


18.35


 “जहाँ तक इन्वेस्टिगेटर का सवाल है... मैं लिखकर देता हूँ कि क्या नाम है” ऑपरेशन्स ऑफ़िसर फ़ाइल से ’नोट-पैड’ निकालता है. “आपको कल आना पड़ेगा.”  “कल मेरी फ़्लाईट है...क़रीब दो बजे के कुछ बाद.” ऑपरेशन्स ऑफिसर ने ऊपर के कागज़ पर नाम और पता लिखा. पैड में से वह कागज़ फ़ाड़ता है.  “तो, ग्यारह बजे आइए,” नीनेल पर नज़र डालते हुए कागज़ कपितोनव  को देता है.  “क्या ये नोटिस के बदले है? ध्यान रखें, कपितोनव , आपके लिए वहाँ जाना ज़रूरी नहीं है!”  “एक अच्छी सलाह देता हूँ. आ जाइए, इन्वेस्टिगेटर चिर्नोव आपका इंतज़ार करेंगे, मैंने अभी अभी उनसे बात की है. ये आपके लिए बेहतर होगा.  कपितोनव पूछता है:  “सम्मन पे?”

 “आप क्या सम्मन लगवाना चाहते हैं?”  “नहीं, सम्मन लगाएँगे, तो नहीं आऊँगा,” कपितोनव दृढ़ता से जवाब देता है.  “ठीक है, आप सिर्फ यूँ ही आइए.” 

18.40


ऑपरेशन्स ऑफ़िसर के जाने से कॉन्फ्रेन्स में जान आ गई. ‘तालाब’ की लाश अभी कमरे में ही पड़ी है, और उसके लिए मुर्दाघर से कर्मचारी आने वाले हैं, और डेलिगेट्स, बिना कुछ कहे हॉल में अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठने लगते हैं. कपितोनव इसमें से कुछ भी नहीं देखता. वह, जैसे बैठा था, वैसे ही बैठा है. वह गौर करता है, जब उससे उठने के लिए कहा जा रहा है. अध्यक्ष ‘तालाब’ के सम्मान में एक मिनट का मौन रखने का प्रस्ताव रखता है. 

सब खड़े हो जाते हैं, और एक मिनट मौन रहकर ‘तालाब’ को श्रद्धांजली देते हैं.  “कृपया बैठ जाइए,” अध्यक्ष कहता है.

सारे लोग बैठ भी नहीं पाए थे, कि माइक्रोफोन के पास महाशय नेक्रोमैन्सर आता है.  “कुछ लोग मेरी प्रोफेशनल योग्यता पर ऊँगली उठाते हैं. तो, मैं तैयार हूँ. मैं इसी समय सिद्ध करने के लिए तैयार हूँ...”  “बैठ जाइए, प्लीज़, मैंने आपको बोलने के लिए नहीं कहा है...” “दोस्तों, मैं आपके दिल और दिमाग़ से कह रहा हूँ, मौत – ये हमेशा एक अप्रत्याशित घटना होती है, और उसके लिए कोई नियम नहीं होता...”  “बैठ जाइए!...बस हो गया!... अपनी जगह पे!” हॉल से आवाज़ें आती हैं.

 “तब, एक ऐतिहासिक भूल-सुधार!” चिल्लाहट को, तालियों को, हूटिंग को दबाते हुए महाशय नेक्रोमैन्सर आवाज़ ऊँची करता है. “छठी विश्व-परिषद में...मेरे पूर्ववर्तियों में से एक को... इजाज़त दी गई थी...एक मृत व्यक्ति को पुनर्जीवित करने की...ये पुनर्जीवन की प्रक्रिया कितनी यशस्वी रही, मैं मानता हूँ, कि इस बारे में कोई प्रमाण नहीं हैं...कुछ स्रोतों के अनुसार, प्रयोग यशस्वी नहीं हुआ...मगर महत्वपूर्ण बात कुछ और है...छठी विश्व-परिषद ने...जो अपने नियमों की कठोरता के लिए जानी जाती है... पुनर्जीवन की प्रक्रिया को इजाज़त देने को संभव समझा....जबकि हम...” 

हॉल में भयानक हो-हल्ला होने लगता है, ऊपर से कई जादूगर ख़तरनाक इरादों के साथ नेक्रोमैन्सर के पास दौड़ते हैं – एक ने माइक्रोफ़ोन का स्टैण्ड पकड़ लिया और उसे वक्ता के हाथों से खींचने लगा, दूसरे दो जादूगर नेक्रोमैन्सर को हाथों से रोकने की कोशिश करते हैं, एक और जादूगर तो स्वयँ को बचाने की कोशिश कर रहे नेक्रोमैन्सर की गर्दन पकड़ कर उसकी पीठ से लटक गया. नेक्रोमैन्सर के हाथ से माइक्रोफ़ोन छूट गया, मगर कुछ देर तक तो वह अपने ऊपर टूट पड़ने वाले जादूगरों का मुक़ाबला करता रहा. मगर असमान ताक़त के चलते, और हॉल में उसके प्रति कोई समर्थन न होने के कारण, और, हालाँकि, वह दमनकारियों से स्वयम् को मुक्त करने में सफ़ल हो जाता है, मगर अपने भाषण को जारी रखने का उसका इरादा नहीं है – वह ग़रूर के साथ स्टेज से उतरता है और हॉल में अपनी कुर्सी की ओर जाता है.   

 “साथियों, मैं समझ रहा हूँ कि हमारी मानसिक परेशानी चरम सीमा तक पहुँच चुकी है, मगर आइए, हम सब गिल्ड के बोर्ड के चुनावों पर अपने वोट देकर उनका अनुमोदन करें. हमारे पास समय बेहद कम है! मैं ऑडिट कमिटी के प्रेसिडेंट से दरख़्वास्त करता हूँ कि वोटिंग के परिणामों का निष्कर्ष बताएँ.  “नतीजे बड़े दिलचस्प रहे,” ऑडिट कमिटी का प्रेसिडेण्ट रिपोर्ट पेश करता है, “ कई पहलुओं से असाधारण. मुझे डर है, कि आप मुझ पर विश्वास नहीं करेंगे, मगर आँकडों के लिहाज़ से निष्कर्ष इस प्रकार है: तेरह उम्मीदवारों में से सात को एक समान वोट मिले हैं, हरेक को ठीक 51 (उसने नाम गिनाए). हॉल में परेशानी की लहर दौड़ गई. “ऐसा थोड़े ही होता है!”

 “मेन्टलिस्ट कपितोनव को दो वोट मिले हैं. और अन्य पाँच उम्मीदवारों को एक-एक वोट मिला है.”  “जादू, जादू!” हॉल में लोग चिल्लाते हैं. ऑडिट कमिटी के प्रेसिडेण्ट घोषणा करता है, कि ये जादू नहीं है, बल्कि संभावना-सिद्धांत पर आधारित है, मगर उस पर कोई विश्वास नहीं करता.

 “ख़ैर, हारने वालों को समझ सकते हैं,” माइक्रोमैजिशियन पित्रोव कपितोनव  से कहता है. “उनमें से हरेक ने अपने आप को ही वोट दिया है. मगर आपके लिए दूसरा वोट था ‘तालाब’ का. इसलिए दो वोटों के साथ आपका रेकॉर्ड अच्छा रहा.”  “क्या आप सचमुच में ये सोचते हैं, कि मैं अपने आपको वोट देने के लायक हूँ?” कपितोनव  विश्लेषण करने वाले पड़ोसी की ओर देखता है.  “क्या ऐसा है? मतलब, किसी और ने. किसी और ने भी आपको वोट दिया है, मुबारक हो.”

 “मैंने! मैंने,” नीनेल कहती है, “कपितोनव को वोट दिया है. कपितोनव, धीरज रखिए, इसके लिए आपको माफ़ नहीं किया जाएगा...”  “इस बीच कॉन्फ़्रेन्स में ऑडिट कमिटी के प्रेसिडेंट के ख़िलाफ़ तीव्र अप्रसन्नता दिखाई देती है. पता चलता है, कि वोटों की संख्या वोटरों की संख्या से मेल नहीं खाती है.”

 “यहाँ कोई अपराधी नहीं है, ऐसा हो जाता है,” ऑडिट कमिटी का प्रेसिडेण्ट सफ़ाई देते हुए कहता है. “हमारा एक मतपत्र कम पड़ रहा था. ये सामान्य बात है.”  “शायद आपने अस्पताल में पेरेदाश के पास बैलेट-बॉक्स नहीं भेजा,” हॉल से आवाज़ें आईं. 

 “अस्पताल में उसको हमने एक अतिरिक्त बॉक्स भेजा था, और उसने अपने टूटे पैर के बावजूद चुनाव में हिस्सा लिया. मगर, जहाँ तक मेरा ख़याल है, उसने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. क्योंकि, जब ऑडिट कमिटी ने वापस आकर अतिरिक्त बॉक्स को खोला, तो वह ख़ाली था...”

 “मगर, उसने तो बॉक्स में मतपत्र डाला था ना?”  “शायद, हाँ.”  “इस ‘शायद’ का क्या मतलब है?”  “बैलेट-बॉक्स में कौन, क्या डालता है ये देखना ऑडिट कमिटी के सदस्यों की ज़िम्मेदारी नहीं है.”  “चलिए, पेरेदाश को अस्पताल में फ़ोन करते हैं – और उससे पूछते हैं कि क्या उसने बॉक्स में मतपत्र डाला था.”  “नहीं, इसकी इजाज़त नहीं है,” कॉन्फ़्रेन्स का अध्यक्ष कहता है. “ये गुप्त-मतदान है. हमें इस बात में दिलचस्पी नहीं दिखानी चाहिए कि पेरेदाश ने किसे वोट दिया.” ”हमें इस बात में दिलचस्पी नहीं है कि उसने किसे वोट दिया. हमें ये जानने में दिलचस्पी है, कि मतपत्र कहाँ गया.”  “जादू, जादू!” हॉल में लोग फिर चिल्लाते हैं.  “नहीं, रुकिए,” कॉन्फ़्रेन्स का अध्यक्ष प्रतिवाद करता है. “पेरेदाश को इस बात का पूरा अधिकार था कि वो वोटिंग में हिस्सा न ले. वह मतपत्र बॉक्स में नहीं भी डाल सकता था. वह ऐसा दिखा सकता था, कि डाल रहा है, जबकि ख़ुद वोट डालने के बारे में सोच भी नहीं रहा था. हाँ, जादू. मगर उसका अधिकार है जादू दिखाने का.”  “ये जादू नहीं है, ये धोखा है!” 

  “ठहरिए, ठहरिए. पेरेदाश ने चुनाव में हिस्सा लिया, मतलब, अगर आप चाहें, तो समझ सकते हैं, कि उसने सामान्य संख्या को पूरा किया. चुनाव में हिस्सा लेने वालों की संख्या – 100%. इसके लिए पेरेदाश को धन्यवाद. मगर किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से, मतपत्र मिलने के बाद, उसने उसे वोटिंग-बॉक्स में डालने से इनकार कर दिया, मतलब, उसने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया. बाइ द वे, ऐसा कुछ लोग बड़े, सरकारी चुनावों में करते हैं – ऐसा ज़्यादातर मतपत्रों के संग्रहकर्ता करते हैं...”  “क्या आप ये कहना चाहते हैं, कि पेरेदाश ने मतपत्र को यादगार के तौर पर रख लिया?”  “क्यों नहीं? पीटरबुर्ग की याद के बारे में, हमारी कॉन्फ़्रेन्स की याद के बारे में, उसके अस्पताल जाने के बारे में, पैर टूटने के बारे में...” ये तर्क कॉन्फ़्रेन्स को विश्वासजनक प्रतीत नहीं होते.

 “मगर, संभव है, कि कारण कुछ और हो,” कॉन्फ़्रेन्स का अध्यक्ष विश्लेषण जारी रखता है. “संभव है, कि सामान्य वाद-विवाद से बलात् हटा दिए गए पेरेदाश ने, ये समझा कि उसे इस प्रक्रिया पर असर डालने का कोई अधिकार नहीं है, और चाहे परिणाम जो भी हो, उसने इन आगामी चुनावों से समझौता कर लिया – वास्तविक रूप से वोट नहीं दिया, मतलब, मतपत्र को चुनाव-बॉक्स में नहीं डाला, हालाँकि चुनावों में हिस्सा लेकर हम सबके प्रति अपने सम्मान को प्रदर्शित किया.”


इस तर्क से कई लोग सहमत हो गए. 

 “कृपया ऑडिट कमिटी की रिपोर्ट की पुष्टि करें. कौन – पक्ष में है? कौन - विरोध में? किसने – हिस्सा नहीं लिया? ऑडिट कमिटी की रिपोर्ट की पुष्टि कर दी गई. कृपया ऑडिट कमिटी के निष्कर्षों के अनुसार सात सदस्यों वाली बोर्ड की कार्यकारिणी के गठन की पुष्टि करें. कौन - पक्ष में है?”  “स्टॉप, स्टॉप!...और ‘तालाब?” हॉल में से लोग चिल्लाए. “क्या वह बाहर निकल गया? क्या अब वह बोर्ड में नहीं है?”  “ ‘तालाब’ की जगह पर ऑटोमेटिकली हारे हुए उम्मीदवारों में से वो आ जाएगा, जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिले हैं. और ऐसा है – कपितोनव .” 

कपितोनव  ने थकावट से हाथ ऊपर उठाया. 

  “मैं अपनी उम्मीदवारी वापस लेता हूँ,” वह कहता है.  “कोई वापस-बापस नहीं होगी!” कालावन चहकता है. “उम्मीदवारी वापस लेने के लिए बहुत देर हो चुकी है.”

 “हाँ, ऐसा ही है,” अध्यक्ष कहता है. “उम्मीदवारी वापस लेने का प्रावधान गुप्त मतदान तक ही था, अब हमें चुनावों के परिणामों को वोटों के गणितीय वितरण एवम् ‘तालाब’ से जुड़ी घातक घटनाओं के संदर्भ में एक तथ्य के रूप में स्वीकार करना होगा.” 

 माइक्रोमैजिशियन अपेकूनी भागते हुए माइक्रोफ़ोन की ओर आता है: 

 “मैं विरोध करता हूँ! ऐसी “घटनाओं” के चलते कपितोनव  को बोर्ड में जगह नहीं मिलनी चाहिए! वह ‘तालाब’ को जादू दिखा रहा था. जादू के दौरान दर्शक की मौत – ये सरासर नॉन-प्रोफेशनल है! ये ऐसा ही है, जैसे हम किसी महिला को आरी से घिस रहे हों, और घिसते-घिसते उसके दो हिस्से कर दें!”

 “यहाँ कोई किसी महिला को नहीं घिस रहा है! हम माइक्रोमैजिक के उस्ताद हैं!” हॉल से लोग चिल्लाते हैं.

 “सभी माइक्रोमैजिशियन्स नहीं हैं! मैं मेक्रोमैजिशियन हूँ!” ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट खनखनाती आवाज़ में कहता है.

 “दि ग्रेट मैनियाक!” महाशय नेक्रोमैन्सर, जो अब अपने होश संभाल चुका था और गहरी-गहरी साँसें ले रहा था, चीख़कर उसे जवाब देता है.

 “ठीक है, ठीक है,” अध्यक्ष कहता है, “हम सब भिन्न-भिन्न हैं, हाँ, हमारे बीच मेक्रोमैजिशियन्स भी हैं, और, कौन नहीं है हमारे बीच, मगर, यदि हम मुश्किल से पूरी की गई – गुप्त ! – मतदान की प्रक्रिया को, नए उम्मीदवारों वगैरह से दुहराना नहीं चाहते, तो मेरी बात सुनिए – हमें चुन लिए गए, दुहराता हूँ, चुन लिए गए कार्यकारिणी के सदस्यों की पुष्टि करना होगी, कुछ छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखकर, जिनके बारे में मैं बता चुका हूँ, और उसके बाद ही, अगर आप चाहें, तो कपितोनव के कार्यकलापों के प्रति हम अपनी राय दे सकते हैं, मगर वैधानिक नहीं, बल्कि व्यावसायिक, और पूरी तरह से प्रारंभिक, इन निष्कर्षों के साथ कि वह कार्यकारिणी का सदस्य है, जिसकी हम पुष्टि कर रहे हैं, मगर ये न भूलते हुए कि इन कार्यकलापों को उसने, आप सुन रहे हैं – पहले! – हमारे कार्यकारिणी का अनुमोदन करने से पहले किया था. संक्षेप में – वोटिंग के लिए प्रस्तुत करता हूँ : कौन- पक्ष में है, कि बोर्ड की कार्यकारिणी की पुष्टि की जाए? कृपया हाथ उठाएँ. कौन - विरोध करता है? कौन - कुछ भी नहीं कहता है?” 


अध्यक्ष ने स्वयँ उठे हुए हाथों को गिना.  “बहुमत से बोर्ड की कार्यकारिणी की पुष्टि हो गई है. सबको बधाई देता हूँ.” 

माइक्रोफ़ोन के पास माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी प्रकट होता है.  “मुझे लगता है, कि हमारी कॉन्फ़्रेन्स समाप्त हो रही है, हमने अपनी व्यक्तिगत समस्याओं पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया, मगर हमने राष्ट्रीय स्तर पर काग़ज़ातों के अत्यधिक प्रवाह की बर्बादी की निंदा करने का प्रस्ताव नहीं पारित किया....” 

हॉल में तालियाँ बजने लगीं, और उसके लिए भी तालियाँ बजने लगीं. माइक्रोमैजिशियन रीख्ली को माइक्रोमैजिशियन अदिनोच्नी को माइक्रोफ़ोन से हटाने के लिए ज़रा-सी भी कोशिश नहीं करनी पड़ी. 

 “अपनी भेड़ों की ओर लौटते हुए...ये क्या हो रहा है, महाशयों? क्या आपको ये अजीब नहीं लगता? जाँच अभी शुरू नहीं हुई है, और हमारी कार्यकारिणी में ऐसा सदस्य है, जो जाँच के घेरे में आने वाला है! मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि इस भयानक ग़लती को सुधारा जाए, और कपितोनव  को हमारी कार्यकारिणी का सदस्य न माना जाए. कम से कम जाँच पूरी होने तक!”  “न माना जाए – ये क्या है? निकाल दिया जाए?”  “निकाल दिया जाए! निकाल दिया जाए!” ज्युपितेर्स्की के ग्रुप वाले लोग चिल्लाते हैं.

कालावन के ग्रुप के लोग जवाब में सीटियाँ बजाते हैं और ‘हूट’ करते हैं.

 “प्लीज़, मुझे अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की इजाज़त दें,” कपितोनव  उठता है.

 “अरे, आख़िर, आप बैठ भी जाइए, ये आपका मामला नहीं रहा, यहाँ सिद्धांत की बात है!”  “शांति! शांति!” अध्यक्ष व्यवस्था बनाए रखने की अपील करता है. “मैं भी समझ नहीं पा रहा हूँ कि हम ‘निर्दोषिता का अनुमान’ वाले सिद्धांत की अनदेखी कैसे कर सकते हैं. उस कमरे में कपितोनव और ‘तालाब’ के बीच चाहे जो भी हुआ हो, अभी तक मुक़दमा नहीं बना है और हमें सिर्फ अविश्वास के आधार पर कपितोनव  के बारे में राय बनाने का अधिकार नहीं है.” अब माइक्रोफ़ोन के पास व्लादिस्लाव हेर्त्स आता है, ये जादूगरों के उस ग्रुप का लीडर है, जिसे ‘तालाब’ प्राइवेट बातचीत में जुआरी कहता था.  “ये सही है, हमें क़ानून की इज़्ज़त करना चाहिए. ‘निर्दोषिता का अनुमान’– ये पवित्र बात है. मगर इस समस्या को दूसरी तरह से भी देखें. हमारे साथी ने क़रीब दो ही घण्टे पहले” उसने घड़ी पर नज़र डाली. 

19.25


 “...ओके, हो सकता है, तीन... कई सारे लोगों की उपस्थिति में एक गंभीर घोषणा की थी. उसने कहा था : मैं फिर कभी भी ये जादू नहीं दिखाऊँगा. और, अगर बात ये है, तो क्या ये ‘नॉनसेन्स’ नहीं है, कि वो आदमी, जो अपने प्रोफ़ेशन को छोड़ चुका है, बोर्ड की कार्यकारिणी का सदस्य हो?” 

इस तर्क का ऑडिटोरियम पर गहरा प्रभाव पड़ता है – कुछ लोग उत्तेजित हो जाते गए हैं, और चिल्लाने  लगते हैं : “ ‘नॉनसेन्स! नॉनसेन्स!’, कुछ लोग हताश हो जाते हैं, और उनके विरोधात्मक ‘नो! नो!’ पहले वालों की चीख़ों में दब जाते हैं.

माइक्रोमैजिशियन ज़्वेनिगरोद्स्की माइक्रोफ़ोन पर कब्ज़ा कर लेता है:  “ यहाँ क़ानूनी जाँच और उसके परिणामों का राग अलाप रहे हैं, मगर, प्लीज़ ये बताइए, सिद्धांततः परिणाम, चाहे कोई भी परिणाम क्यों न हो, क्या हमारी कॉन्फ़्रेन्स के बगैर उतनी ही स्पष्टता से इस बात पर प्रकाश डाल सकता है, जिसे हमारी कॉन्फ़्रेन्स ने...अपने आप कामकाज के दौरान.. अभी-अभी इतना स्पष्ट कर दिया है? मैं किस बारे में कह रहा हूँ? इस बारे में! कपितोनव  के पास वजह थी! ...हाँ, हाँ, हम सबके दिमाग़ में ये भयानक शब्द घूम रहा था, मगर किसी न किसी को इसे कहना भर था!” 

तब माइक्रोफ़ोन के पास हेराफेरी वाला जादूगर पित्रोव दिखाई देता है:

 “होश में आइए, साथियों! अमानुष न बनिए! हमने अभी-अभी ‘तालाब’ की स्मृति में एक मिनट का मौन रखा था. कार्यकारिणी के लिए कपितोनव  के नाम का सुझाव किसी और ने नहीं, बल्कि ‘तालाब’ ने ही दिया था. ‘तालाब’ की याद की ख़ातिर, आपसे विनती करता हूँ, कि इस विषय को समाप्त करें! कपितोनव वो इन्सान नहीं है, जो कार्यकारिणी में शामिल होने के लिए ‘तालाब’ की लाश पर से गुज़र जाए!”

माइक्रोमैजिशियन पाव्लेन्को ने फ़ौरन उसका विरोध किया: “मैं भी ‘निर्दोषिता के अनुमान’ का सम्मान करता हूँ, मगर उसके प्रति मेरे तमाम प्यार के बावजूद मेरा ख़याल है कि आपने जो कहा है, वह सिर्फ भड़काऊ बात है, और ऐसा कहकर आप ‘तालाब’ की स्मृति का अपमान कर रहे हैं!”


न जाने कहाँ से एक सफ़ेद कबूतर प्रकट हो जाता है, वह एक दीवार से दूसरी दीवार की ओर उड़ रहा है.                                 


 अध्यक्ष खड़ा हो जाता है:  “अब अगर एक भी ख़रगोश, तोता या कोई और चीज़ दिखाई दी, तो मैं कॉन्फ़्रेन्स ख़त्म कर दूँगा!” 

कबूतर उड़कर उसके पास जाता है और कंधे पर बैठ जाता है. अध्यक्ष कबूतर को भगाना नहीं चाहता, वह उसके साथ सावधानी से अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है.

 “उसका बहिष्कार करने के प्रस्ताव पर वोटिंग करवाइए!” हॉल से लोग चिल्लाकर कहते हैं.  “नहीं, मत करवाइए!”   

 “बहिष्कार! बहिष्कार!” कंधे पर कबूतर लिए अध्यक्ष कहता है:  “कपितोनव के कार्यकारिणी से बहिष्कार के प्रस्ताव पर वोटिंग करवाने में मेरा कुछ नहीं जाता है, मगर मुझे गहरा विश्वास है, कि कार्यकारिणी से - जिसका अनुमोदन हमने अभी-अभी हुए चुनावों के परिणामों के आधार पर किया है - किसी के भी बहिष्कार का प्रस्ताव हमारी राजनैतिक अपरिपक्वता का प्रमाण है. चलिए, पहले एक कमिटी बनाएँ, नैतिकता पर, ये मुश्किल नहीं है और ये ज़रूरी है, उसे ही ...” उसे अपनी बात पूरी नहीं करने दी जाती:  “कमिटी की कोई ज़रूरत नहीं है!”  “ख़ूब जानते हैं हम इन कमिटियों को!”  

कबूतर अध्यक्ष के कंधे से फ़ड़फड़ाकर उड़ा, और दो बार हॉल का चक्कर लगाकर कपितोनव से दो मीटर्स दूर खिड़की की सिल पर बैठ गया.

कपितोनव गहरी नज़र से कबूतर की नज़र में उलझ गया. वो कपितोनव  की तरफ़ तिरछे खड़े होकर एक आँख से उसे देख रहा है. कपितोनव काफ़ी देर से कॉन्फ्रेन्स की कार्रवाई पर ध्यान नहीं दे रहा है. यदि कबूतर के बदले वहाँ प्लैटिपस कबूतर भी आ जाता, तो भी कपितोनव  को अचरज नहीं होता. 

 इस समय 

19.48


दो माइक्रोमैजिशियन्स माइक्रोफोन के पास जगह पाने के लिए लड़ रहे हैं.                          

खिड़की की सिल पर कबूतर मानो डान्स कर रहा है: कभी एक पंजा उठाता है, तो कभी दूसरा – जैसे कुछ कहना चाहता हो.

 “वो कुछ कहना चाहता है,” कपितोनव  कहता है, मगर उसकी बात कोई नहीं सुनता. और वह भी अपनी तरफ़ से नहीं सुनता (हाँ, उन दो माइक्रोमैजिशियन्स के कारण कुछ भी सुनना मुश्किल था), कि अध्यक्ष कैसे रेंक रहा है : “आप कौन?” – उससे मुख़ातिब होकर, जो तेज़ी से हॉल में घुसा था. और वो था – एक लिलिपुट. उसके अप्रत्याशित आगमन को कुछ लोगों ने देखा, तब भी, जब कुर्सियों के बीच के रास्ते को पार करके, वह पंक्तियों के बीच से होकर खिड़की की ओर जाने लगता है. कपितोनव लिलिपुट को तभी देखता है, जब वह अपनी मुट्ठी से कपितोनव  के घुटने को दूर करता है और खिड़की की सिल के पास नज़र आता है. पंजों के बल खड़े होकर, लिलिपुट कबूतर को हाथ में लेता है, कहता है : “ये मेरा है”, और अपने रास्ते वापस जाने लगता है.


अब तो सभी ने उसे देखा. भागने वाले को देखने की उम्मीद में कॉन्फ़्रेन्स के डेलिगेट्स थोड़ा सा उचकते हैं. माइक्रोफ़ोन के पास वाले दोनों भी अपना झगड़ा छोड़कर नीचे की तरफ़ देखने लगते हैं.  “क्या आपको यक़ीन है, कि ये आपका है?” अध्यक्ष पूछता है.  “बेशक!” जाते जाते लिलिपुट जवाब देता है और दरवाज़े के पीछे ग़ायब हो जाता है.

 “ये कौन है? ये क्या है?” हॉल में लोग चहकने लगते हैं. “वो हमारे साथ क्यों नहीं है?”   “बैठ जाइए!” अध्यक्ष उन दोनों माइक्रोमैजिशियन्स को आज्ञा देता है, और वे, ‘सॉरी’ कहते हुए स्टेज छोड़ देते हैं. “ मैं बहस रोकता हूँ. बस हो गया. अभी हमारे सामने अनौपचारिक काम भी पड़े हैं. शांति! कृपया शांत रहें!” 

वह स्वयम् ही ख़ामोश हो जाता है – खड़ा है और ख़ामोश है, जैसे उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हो. इस इशारे का पब्लिक पर असर हुआ: ख़ामोशी की ताक़त धीरे धीरे शोर के राक्षसों पर काबू पा लेती है. जब काफ़ी मात्रा में शांति छा गई, तो एक सकुचाती हुई, मगर ज़िद करती हुई आवाज़ सुनाई देती है:  “डॉक्यूमेन्ट्स का प्रवाह...”  “चुप रहें!” अध्यक्ष मेज़ पर हथेली मारते हुए कहता है.

और पूरी शांति छा जाती है.

 “एक विकल्प है,” अध्यक्ष कहता है. “कपितोनव को कार्यकारिणी से बाहर न निकाला जाए, मगर कार्यकारिणी में उसकी सदस्यता को तब तक निलम्बित रखा जाए, जब तक इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की जाँच सभी पहलुओं से नहीं कर ली जाती, जिसमें यह बात भी शामिल है, कि हमारे साथी ने इस प्रोफ़ेशन से निकल जाने की घोषणा कर दी थी, जिसके बारे में समय आने पर हम अपनी राय दे सकेंगे. मेरे ख़याल से ये बेहद अच्छा समझौता है. हम तुरंत इस पर वोटिंग कर लेते हैं. जैसे, हम अपने साथी को कोष्ठकों के बाहर ले आएँगे.”  “बल्कि, इसके विपरीत,” अपनी जगह से कोई सुधारता है, “कोष्ठकों में बन्द कर देंगे.”

 “मगर हम उसे रफ़ा-दफ़ा नहीं करेंगे!” अध्यक्ष अपनी आवाज़ को अधिकाधिक गंभीरता प्रदान करते हुए बहस को समेटने की कोशिश करता है. मगर नेक्रोमैन्सर बीच में टपकता है: “कोष्ठकों में तो इसे रखना चाहिए!” वह ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट की ओर तर्जनी से इशारा करता है. “या वह किसी काम का नहीं है? और, अगर वह किसी काम का नहीं है, तो यहाँ क्या कर रहा है?” ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट लाल होकर तनी हुई तर्जनी की दिशा में फ़ुफ़कारता है:  “और तू ख़ुद तो...और तू उसे ज़िन्दा कर...कर ज़िन्दा!...हम भी देखेंगे कि कैसे ज़िन्दा करता है.”  “मैं तो तैयार हूँ! मुझे करने ही नहीं दे रहे!”  “इन पागलों को यहाँ से निकाल दो!” पिछली पंक्तियों से लोग चिल्लाए.  “यहाँ कोई पागल नहीं है!”

 ‘प्लीज़, अपमान न करें!”  “बस! बस! बस! मैं प्रस्ताव वोटिंग के लिए रखता हूँ! कौन इसके पक्ष में है, कि कोष्ठकों से बाहर निकाला जाए? कौन विरोध में है? कौन कुछ नहीं कह रहा है?” अधिकांश लोगों ने “इसके” – “कोष्ठकों से बाहर” - के पक्ष में वोट दिया.

अध्यक्ष ने सबको मुबारकबाद दी. सब लोग उठते हैं और बाहर जाते हैं. क्योंकि उन्हें मालूम है कि कहाँ जाना है. 


20.01


कपितोनव  सबके जाने का इंतज़ार करता है, - क्लोकरूम में उनकी नज़रों का कांटा नहीं बनना चाहता. उलाहने और सहानुभूति की नज़रों के प्रति उदासीनता दिखाते हुए अपने सामने देख रहा है. ये भी, और वो भी – हैं तो सही, मगर उन्हें किस हद तक महत्व दिया जा सकता है, ये एक बड़ा सवाल है, क्योंकि जिस पर वे डाली जा रही हैं, वह उन पर ध्यान ही नहीं दे रहा है, हालाँकि पास से गुज़रते हुए कोई संदेश तो देते हैं: ज्युपितेर्स्की की पार्टी के अशुभचिंतक लोग उस पर कड़ी नज़र डालते हैं, या सिर्फ मुँह फ़ेर लेते हैं; और कालेवन की पार्टी के साथी, उन्हें छोड़कर जो कपितोनव  को ‘तालाब’ की मौत का ज़िम्मेदार मानते हैं (अपनों में भी ऐसे कुछ लोग हैं), जो यदि कपितोनव  की नज़र से उनकी नज़र मिल जाती, तो उसकी तरफ़ गर्दन हिलाकर अभिवादन करने को या उँगलियों से ‘विक्टरी’ का निशान बनाने को तत्पर हैं.                                     

संक्षेप में, वह इंतज़ार करता है. वो चले जाते हैं. सिर्फ नीनेल उसके पास आई:  “आपने बड़े संयम से काम लिया.”

हाँ, और कॉन्फ़्रेन्स का अध्यक्ष भी, जो कामकाज के कागज़ात समेटते हुए, औरों से पिछड़ गया था, अपनी ब्रीफ़केस लिए उसके पास आता है. हाँ, महाशय नेक्रोमैन्सर भी, शायद, पास आना चाहता था, क्योंकि वह अपनी जगह पर खड़ा है, और हॉल से बाहर नहीं जा रहा है.  “मैंने वह सब किया, जो मेरे बस में था,” अध्यक्ष कहता है. “परिस्थिति काफ़ी बुरी भी हो सकती थी. आगे से कभी जल्दबाज़ी में कोई घोषणा न कीजिए.” शायद उसे आभार प्रदर्शन करने वाले शब्दों का इंतज़ार था. कपितोनव  ख़ामोश रहता है. 

 “और, जो मैंने तब कोष्ठकों के बारे में कहा था, उस पर ध्यान मत दीजिए,” अध्यक्ष सलाह देता है और, अपनी पीठ के पीछे निकट आते हुए नेक्रोमैन्सर को महसूस करके, वह अपनी जगह से इधर उधर हिलने लगता है, ताकि नेक्रोमैन्सर पीठ के पीछे न रहे. “कोष्ठक – एक प्रतीक है...”  “मगर धनु-कोष्ठक नहीं!” आगे बढ़ते हुए नेक्रोमैन्सर कहता है. 

अब  

 20.07


कपितोनव  बैठा नहीं है, बल्कि खड़ा हो गया है. न तो उसे या किसी और को ही नेक्रोमैन्सर से किसी अच्छी बात की उम्मीद थी, मगर, वो जो नेक्रोमैन्सर ने किया किसी को भी चौंका सकता था. उसने कपितोनव  के कंधे को चूमा, मुड़ा और तेज़ क़दमों से हॉल के बाहर निकल गया. 

कपितोनव  का जैसे दम घुटने लगा, मगर अध्यक्ष और नीनेल ने यूँ दिखाया, जैसे नेक्रोमैन्सर की हरकत को उन्होंने देखा ही नहीं.  “आपने बड़ी हिम्मत दिखाई,” अभी तक दरवाज़े की ओर देखते हुए नीनेल ने प्रशंसा के स्वर में कहा, “डटे रहिए और डटे रहिए. मैं आपकी प्रशंसक हूँ.”

वह उसका हाथ पकड़ती है.  “बैन्क्वेट (भोज) में जाने का टाइम हो गया है.”

 “मैं? बैन्क्वेट में?” कपितोनव  के मुँह से निकलता है.

 “नहीं, ये बैन्क्वेट नहीं होगा,” नेक्रोमैन्सर की अनुपस्थिति से प्रसन्न होकर अध्यक्ष कहता है. “ये कुछ और होगा. मेमोरियल-ईवनिंग होगी. फ़्यूनरल-फ़ीस्ट.”

 “चलिए, कपितोनव .”  “प्लीज़, मुझे छोड़ दीजिए.” वह उसकी हथेली से हाथ खींचता है. “लाश अभी तक उठाई नहीं गई है, और आप लोग बैन्क्वेट में जाने को तैयार हो गए.”

 “अगर ‘तालाब’ ज़िन्दा होता, तो वो भी हमारे साथ चलता,” अध्यक्ष कहता है. “तो, इस तरह से हम उसे श्रद्धांजली दे रहे हैं – सब मिलकर, इन्सानों की तरह. पूरी इन्डस्ट्री. लाश...लाश में क्या है? लाश हमारे बगैर ले जाएँगे.”  “आप मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं?” नीनेल समझती नहीं है. “आप बिल्कुल ऐसे नहीं हैं, आप बड़े सलोने हैं, बड़े अच्छे हैं.”  “कहीं आप सीरियसली तो नहीं सोच रहे हैं, कि मैं मेमोरियल-ईवनिंग में आऊँगा?” कपितोनव उनसे दूर हटता है.

 “क्या कह रहे हैं,” अध्यक्ष उसे रोकता है, “बल्कि, आपके बगैर तो इस मेमोरियल-ईवनिंग की कल्पना ही नहीं कर सकता! किसी और के बगैर तो समझ सकता हूँ, मगर आपके बगैर नहीं. आख़िर आप यहाँ ‘तालाब’ की मेहेरबानी से ही तो हैं ना? क्या उसीने आपको नहीं ढूँढ़ा था? जाना चाहिए. अगर नहीं जाएँगे, तो बुरा होगा, ग़लत होगा. सब सोचेंगे, कि आप गुनाह के एहसास से परेशान हो रहे हैं, मतलब, आप गुनहगार हैं. या फिर, इससे भी बुरा होगा, कि आप इस बेकार के हंगामे से रूठ गए हैं, और वाक़ई में ये बेकार का ही है!...मगर आप तो इस शोरगुल से ऊपर हैं? हमारे षडयंत्रों से ऊपर. और महत्वपूर्ण बात, अपने आप को क़ातिल न समझें. आप क़ातिल नहीं हैं, नहीं ना?”

 “सुनिए, मैंने कुछ भी नहीं किया था. मुझे नहीं मालूम था कि वह 99 का अंक सोच रहा है. और अगर जानता तो? उसमें ऐसा क्या है? नहीं. मैं आपको बताऊँगा. मुझे याद आ रहा है. किसी ने भी आज तक...सुन रहे हैं?... अब तक किसी ने भी, कभी भी 99 संख्या नहीं बूझी थी. चौंकाने वाली बात है. मगर ऐसा ही है!”  “मैं भी उसी बारे में कह रहा हूँ, थोडी ही देर के लिए रुकिए, और फिर चले जाइए. बस सिर्फ आना और जाना ही चाहिए. फिर ये आयोजन आपके हॉटेल में ही तो हो रहा है. आप वैसे भी वहीं जा रहे हैं ना? फ़ायरप्लेस वाले हॉल में पहुँचिए, कुछ देर ठहरिये और चले जाइए. ”  “पहुँचेंगे और निकल पड़ेंगे, कपितोनव ,” नीनेल कहती है. “पहुँचेंगे और निकल पड़ेंगे.” 

20.21


 “कपितोनव , बेवकूफ़ न बनो,” क्लोक-रूम में उससे कहती है. उससे पहले ही कोट के बटन बन्द कर लिए, और दस्ताने पहन लिए, और वह सोच ही नहीं पाया कि दूसरा दस्ताना कहाँ है: दोनों ही तो बाईं जेब में थे.  ‘सी-9’ से हॉटेल तक, कपितोनव अभी तक भूला नहीं था, काफ़ी नज़दीक है. अध्यक्ष तो बाहर निकलते ही सीधा लपका, जिससे, जैसा कि उसने कहा, लोगों की नब्ज़ पकड़ कर रखे, - सब लोग रेस्टॉरेंट में जमा हो चुके हैं, बस इन दोनों को छोड़कर: कपितोनव  जाना नहीं चाहता और वहाँ इसलिए खिंचा जा रहा है, क्योंकि नीनेल उसे खींच कर ले जा रही है.

उसका हाथ पकड़कर आत्मविश्वास से ले जा रही है.

कपितोनव  के दिमाग़ में आख़िरी साँस छोड़ता हुआ फ़ेरो ख़ुफ़ू 32 कौंध गया.

पीटरबुर्ग की सर्दियाँ आइसिकल्स और कड़ी बर्फ (हिम), दोनों के कारण अच्छी लगती हैं. इस रास्ते पर कड़ी, जमी हुई बर्फ़ आइसिकल्स से ज़्यादा डरावनी है. 

ज़रा सा आड़ा-तिरछा क़दम पड़ा – और या तो गर्दन तुड़वा बैठोगे, या कूल्हे की हड्डी.  “औरतें, कपितोनव , बड़ी भारी जादूगरनियाँ होती हैं,” नीनेल कहती है. “स्टेज पर नहीं, वहाँ तो मर्दों का राज चलता है, बल्कि जीवन में, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में...हाँ और सपनों में भी!...ज़िन्दगी हमें मजबूर करती है. मजबूर करती है चालाकी करने के लिए, संख्याएँ बनाने के लिए, सीधे-साधे लोगों को रहस्यमय बनाने के लिए. उम्र को ही ले लीजिए. क्या ख़याल है, मेरी उम्र कितनी होगी?”  “मैं इस बारे में नहीं सोच रहा हूँ,” चलते हुए - आगे बढ़ते हुए (कभी यहाँ, कभी वहाँ पैदल चलने वाले गिर रहे हैं) कपितोनव  जवाब देता है.

 “क्यों नहीं सोच रहे हैं? आप सोचिए! क्या सोचने में मुश्किल हो रही है? चलिए, सोचिए, सोचिए, मेरी उम्र कितनी है?” कपितोनव  के दिमाग़ में, अचानक, अपने आप, दिमाग़ के मालिक की इच्छा पर निर्भर हुए बिना, 36 का अंक बनता है. जहाँ तक ख़ुद कपितोनव  का सवाल है, वह ख़ामोश रहता है.  “आपने सोचा: 36! फ़ेन्टास्टिक, कपितोनव , मैं आपके प्यार में गिरफ़्तार होने के लिए तैयार हूँ, मगर, नहीं, घबराइए नहीं, मैं किसी भी हालत में ऐसा नहीं करूँगी!”  “आपको कैसे मालूम कि मैंने क्या सोचा था?”  “मैंने आपके ख़याल को पढ़ लिया! यक़ीन कीजिए, वो जटिल नहीं है! क्या आपको मेरा जादू अच्छा लगा? अगर आप चाहें तो आपको इसका राज़ बता दूँ?” कपितोनव  जवाब नहीं देता.  “कपितोनव , ये तो एलिमेन्ट्री है! मैं बिल्कुल अपनी उम्र की ही लगती हूँ.” और वह मानो संक्रामक हँसी से सराबोर हो गई, मगर इतनी भी संक्रामक नहीं, कि कपितोनव  को संक्रमित कर दे. वो ख़ामोश है. वैसे ही चलते हैं.  “कपितोनव , आपको क्या हो गया है? होश में आइए! मैं नीनेल पिरागोवा हूँ. याद आया? मैं ट्रिक्स-डाइरेक्टर हूँ. और आप बहादुर हैं. आपने बड़े संयम से काम लिया. मगर, यदि आपने ट्रिक से इनकार कर दिया, तो मैं आपके लिए ट्रिक का आयोजन कैसे करूँगी?”  “नीनेल,” कपितोनव  कहता है, “मगर ये वाक़ई में ऐसा ही है: वो पहला था, जिसने 99 की संख्या सोची थी. उम्मीद करता हूँ कि वो ही आख़िरी भी होगा.”  “आह!” वह फ़िसलती है, मगर उसकी मदद से, अपनी जगह पर जमी रहती है.

 “देखिए,” कपितोनव  कहता है. “वहाँ नेक्रोमैन्सर जा रहा है. वो क़रीब-क़रीब गिर ही गया था.”

 “मतलब, ऐसा करना चाहिए. चलते रहिए, चलते रहिए. अगर पैर ले जा रहे हैं, तो इसका मतलब है, कि चलना चाहिए.”  “न तो पैर ही ले जा रहे हैं, और न ही दिमाग़ चाहता है!” कपितोनव  शिकायत के सुर में कहता है. 

 “और, क्या वो चाहता था? क्या वो मरना चाहता था? आपने उससे नहीं पूछा?” 

 20.38


 “आप अन्दर जाइए, मैं नहीं जाऊँगा.”  “फिर वही? फ़ौरन बन्द कीजिए! आप मुझे गुस्सा दिला रहे हैं.”

हॉल में – चौकीदार है, उसे देखकर तो कहना मुश्किल था कि वह सचमुच का  सिक्यूरिटी-ऑफ़िसर है, या दिखाने के लिए किसी को भी खड़ा कर दिया था.  “शोक-सभा के अपने-अपने आयोजन होते हैं,” नीनेल समझाती है, “परिस्थिति को देखते हुए, यहाँ हमारा आदमी होना चाहिए था. हो सकता है, कि मेरे पर्स में कोई ग्रेनेड हो, आपकी आस्तीन में - हेरोइन का पैकेट हो. मगर ये मज़ाक का समय नहीं है.” रेस्टॉरेन्ट के क्लॉक-रूम का कर्मचारी दूसरे, सफ़ाई कर्मचारियों जैसा लग रहा है. शायद, उसे हिदायत दी गई थी कि शोक-सभा होने वाली है. हॉल के काँच के दरवाज़े के सामने रुकते हैं.   “साथ में अन्दर जाएँगे. लोगों को देखने दीजिए, कि आप अकेले नहीं हैं."

 भीतर आए. U – आकार की मेज़. बोतलें, खाने पीने की चीज़ें. कुर्सियाँ बाहर को खींची हुई. फ़ायरप्लेस में आग जल रही है. सब लोग दीवारों के साथ खड़े हैं, अपनी ख़ामोश हरकतों को छोड़कर नीनेल पिरागोवा और कपितोनव  की ओर मुड़कर देखते हैं.

कपितोनव  और नीनेल पिरागोवा ठहरते हैं, क्योंकि अन्दर जाते ही कुछ देर ज़रूर ठहरना पड़ता है. उन्हें औरों से कोई मतलब नहीं है. और दूसरे भी, नीनेल पिरागोवा और कपितोनव की ओर नज़र डालकर अपने-अपने ख़ामोश कामों में जुट गए, असल में, ये एक ही काम था: अवश्यंभावी का इंतज़ार. अब कुछ लोग, जैसे कि होना चाहिए, पहले भी होता था, दो-दो या तीन-तीन के समूहों में अलसाई हुई बातचीत शुरू करते हैं. बाकी लोग अकेले-अकेले खड़े हैं. माइक्रोमैजिशियन झ्दानोव, हॉल में टहलते हुए माचिस की तीलियों वाला जादू दिखाता है (‘तालाब’ ज़रूर प्रशंसा करता). महाशय नेक्रोमैन्सर पीठ के पीछे हाथ बांधे बोत्तिचेल्ली33-शैली में बनाया गया बड़ा पैनल देख रहा है.

 

ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट – तिरछे-तिरछे - चुपचाप नए प्रविष्ट हुए लोगों के पास पहुँचता है. नज़रों से ही नीनेल से गवाह बनने की प्रार्थना करता है, कपितोनव से ज़ोर से फुसफुसाते हुए पूछता है:  “मैं चाहता हूँ, कि आप ये जान लें. नेक्रोमैन्सर ने सबके सामने मुझ पर आरोप लगाया है, और मैं चाहता हूँ कि आप मुझे समझें और मुझ पर दोषारोपण न करें. सैद्धांतिक रूप से, मैं निकटवर्ती स्थानों पे काम नहीं करता हूँ. आप मैथेमेटिशियन हैं, आपको शायद आईन्स्टीन का समीकरण याद होगी – e=mc2  नहीं, बल्कि दूसरी – कॉस्मोलॉजिकल स्थिरांक वाली. उसमें उसका रिक्की टेन्सर (गणित से संबंधित – अनु.) से गुणा किया जाता है, आप जानते हैं. बेहद छोटी संख्या, क़रीब-क़रीब – शून्य, मगर अधिक दूरियों पर ऐसे ऐसे परिणाम देती है!...मगर, सिर्फ बेहद-बेहद ज़्यादा दूरियों पर ही! कम दूरियों पर बिल्कुल नहीं!...मुझ से पूरी-पूरी समानता है. मैं किसी काली ऊर्जा के समान हूँ, समझ रहे हैं? मैं माक्रोइफ़ेक्ट दे सकता हूँ. ..वो भी बेहद दूरी वाला...सेंट्रल अफ़्रीका में हो रही घटनाओं पर प्रभाव डाल सकता हूँ...और न केवल डाल सकता हूँ – बल्कि प्रभाव डालता हूँ!...और ख़तरनाक प्रभाव डालता हूँ – अमेरिका में हो रहे चुनावों पर, मगर ‘तालाब’ पर मैं, सिद्धांततः, प्रभाव डालने के क़ाबिल नहीं था, अगर चाहता, तो भी नहीं – वह – क़रीब था, वह यहाँ था. और जितना ज़्यादा दूर कोई चीज़ होती है, मेरा प्रभाव उतना ही गहरा होता है...” नीनेल ने उतनी ही ज़ोर से फुसफुसाते हुए तर्क रखा:

 “आपकी बात समझ ली गई है. अब चुप हो जाइए.” कुछ देर चुप रहकर ईवेन्ट्स-आर्किटेक्ट अपनी बात जारी रखता है:

 “और ये मुझसे हमेशा खार क्यों खाता है? उसे तो अच्छी तरह मालूम है कि मैं सिर्फ दूर से ही काम करता हूँ...वह सिर्फ मेरे आयाम से जलता है...वह ख़ुद भी, मेरे ही जैसा, सिर्फ काफ़ी दूरी से...क्या आप समझते हैं कि वह सीधे यहीं कर सकता है...बिना अपनी जगह से हिले?...क्यों नहीं! ये सिर्फ दिखावा है!...मुझे तो उसकी सीमाएँ और योग्यताएँ मालूम हैं, मुझे बताने की ज़रूरत नहीं है...ये ग्रबावोय ने उसे बिगाड़ा है...ग्रबावोय याद है? वही सिस्टम, वही तरीक़ा...जैसे आप मॉस्को में कोई अफ़सर हैं और आप मर गए हैं, और आपको कहीं फ़िलीपीन्स में प्रमाणित किया जाता है – एक स्थानीय बेघर के रूप में...आपको कभी भी याद नहीं आएगा, कि आप मॉस्को में अफ़सर थे...  “प्लीज़, फ़ौरन बन्द कीजिए,” नीनेल फ़ुफ़कारती है. “कपितोनव  आपकी बातें नहीं सुन रहा है.”  “हाँ, हाँ, आप यहाँ पुरानी दुर्लभ वस्तुओं का व्यापार करते थे, मगर अब कहीं बांग्लादेश में कछुए मारते हैं... और, याद रखिए, उसकी हैसियत हमेशा कम रहती है. मैं समझता हूँ, कि हर कोई जीना चाहता है. मगर मैं इस तरह नहीं करता. मैं उद्देश्यपूर्वक, पूरी एकाग्रता से करता हूँ. ब्राज़ील में ग्यारह लोग जेल से भाग गए...क्या इसके लिए आप मुझ पर मुकदमा चलाएँगे? मगर, मेरे अपने सिद्धांत, अपनी मान्यताएँ हैं... इंसाफ़ के बारे में अपनी कल्पनाएँ हैं...”

नीनेल एक-एक शब्द को तौलते हुए कहती है:  “निकल जाइए. पीछे मुड़ – एक क़दम आगे – मार्च.” वह चला जाता है, मगर फ़ौरन वापस लौट आता है.

 “मैं, बेशक, अद्वितीय हूँ, कोई भी ऐसा नहीं कर सकता, जैसे मैं करता हूँ, मगर क्या मुझे प्रोफ़ेशनल कहना उचित होगा? अपने काम का मैंने किसी से भी एक कोपेक तक नहीं लिया. मैं यहाँ किसलिए हूँ? आपके बीच मैं पराया हूँ. मगर, यदि मैं न होता, तो दुनिया में सब कुछ किसी और ही तरह से होता.” मुड़ता है और हॉल के दूसरे सिरे पर जाता है.

 “ ’तालाब’ का भाई यहाँ है,” नीनेल पिरागोवा कहती है, “और आप ये नहीं चाहते थे.”        

‘तालाब’ का भाई हाथ में कैप-थैली पकड़े हुए है.

हेरा फेरी–उठाईगिरी करने वाला किनीकिन ग़ौर से मेज़ की ओर देख रहा है. फ्रेम में रखे ’तालाब’ के साथ दो माइक्रोमैजिशियन्स अन्दर आते हैं. फ़ोटो आज ही खींची गई थी. जब ‘तालाब’ भाषण दे रहा था.  

कालावन और ज्युपितेर्स्की लाने वालों के हाथों से पोर्ट्रेट लेते हैं और उसे फ़ायरप्लेस के ऊपर वाली शेल्फ़ में रखते हैं. 

इस कदम को सबने सुलह का संकेत समझा.

इसी की राह देख रहे थे. 

 “कृपया मेज़ पर आइये, महोदय, खड़े रहने में कोई तुक नहीं है,” अध्यक्ष कहता है. सब बैठ जाते हैं.

“आपको वहाँ,” माइक्रोमैजिशियन बिल्देर्लिंग कपितोनव  से कहता है. “वहाँ कार्यकारिणी के सदस्य हैं.”  “वह कोष्ठकों के बाहर है,” उसका पड़ोसी, हेरा-फेरी वाला इवानेन्का बीच में टपकता है. “अगर ये सही नहीं है तो, माफ़ कीजिए,” वह कपितोनव  से कहता है.

कहीं बैठ गए. अध्यक्ष उठा. 


21.06


 “महाशयों, साथियों. दोस्तों. इन्सान सोचता तो बहुत कुछ है, मगर होता वही है, जो ख़ुदा को मंज़ूर है. कुछ ही देर पहले मैंने सोचा था, कि कुछ बोलूंगा, अभी भी यहाँ बोलूंगा, किसी और चीज़ के बारे में, न कि इस बारे में. मैंने सोचा था, कि बोलूंगा हमारी, हो सकता है, पहली नज़र में बेहद छोटी, मगर, असल में, हम सबके लिए ज़रूरी विजय के बारे में, और स्वयम् पर विजय के बारे में, उस बारे में कि चाहे दुश्मनों ने कितनी ही बाधाएँ क्यों न डाली हों, हमारी ‘गिल्ड’ की कॉन्फ़्रेन्स होकर ही रही, और उस बारे में, कि ऐसा हो ही नहीं सकता था, कि उसकी मीटिंग न हो, उसकी स्थापना न हो, उसकी रचना न हो... वह अस्तित्व में न आए!...क्योंकि ये चाहते थे, हम ख़ुद. मैंने सोचा था कि इस बारे में बोलूंगा कि हमारा प्रमुख शत्रु हमारे बीच में ही है और उसका नाम है – अपनी ही शक्तियों और अपनी ही  संभावनाओं पर अविश्वास. गिल्ड की स्थापना के अवसर पर आपको मुबारकबाद देते हुए, मैंने सोचा था कि इस बारे में भी बोलूंगा, कि आज, जब आख़िरकार हमें संगठित होने का मौका मिला है, हमारी विचारधाराओं और मान्यताओं की विविधता के बावजूद, किसी को भी, किसी को भी अपने अकेलेपन से, बेसहारापन से डरने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि अब हम एक साथ हैं, जैसे पहले कभी नहीं थे, - बस, इसी बारे में मैं कहना चाहता था, और, हो सकता है, कुछ देर बाद किन्हीं और शब्दों में, कुछ और भी कहूँगा. मगर फ़िलहाल, मुझे यह नहीं कहना चाहिए. वलेन्तीन ल्वोविच ‘तालाब’ आज परलोक सिधार गए, जैसा कि आपको मालूम है, और, हालाँकि उसने ख़ुद ने नहीं, बल्कि उसके लिए लोगों ने गाया, अंतिम समय तक वह अपनी ड्यूटी पर रहा. चिर स्मृति.          


ज़ोर-ज़ोर से कुर्सियों को हटाते हुए सब लोग उठ गए, और सबके साथ – कपितोनव  भी. पीते हैं और, एक भी शब्द कहे बिना, आँखें झुकाए, मेज़ के चारों ओर अपनी अपनी जगह पर बैठ जाते हैं. सलाद की ओर, खाने-पीने की चीज़ों की ओर हाथ बढ़े. कपितोनव आधा मिनट ख़ाली प्लेट की ओर देखता रहा, फिर, माँस की ठण्डी स्लाइसेस वाली प्लेट की तरफ़ नज़र घुमाते हुए, मानो उसीसे मुख़ातिब हो रहा हो, ख़ामोशी को तोड़ता है : “उसकी आत्मा को शांति मिले. समय हो गया. गुड बाय.” वह हॉल से बाहर निकलता है. सीढ़ियों पर नीनेल उसे पकड़ लेती है.  “आपने सोचा, कि मैं आपको अकेले जाने दूँगी?”  “माफ़ कीजिए,” कपितोनव  कहता है, “मुझे टॉयलेट जाना है.”


21.27  

     उसे टॉयलेट नहीं जाना, मगर जब अन्दर घुस ही गया, तो वह यूरिनल्स की तरफ़ बढ़ता है. अब स्वयम् को परिस्थितिजन्य प्रतिक्रिया के आधीन करना है. वह करता है. यूरिनल्स के ऊपर टंगी हुई दो तख़्तियों को न देखना असंभव है: एक पर इश्तेहार है आईनों का, दूसरी पर प्रोस्टेटाइटिस के लिए दवाई लिखी है.   

हमेशा की तरह सिंक की तरफ़ जाता है, पानी चालू करता है और शीशे में अपने आप को देखता है. परेशान हो जाता है. उसकी तरफ़ देख रहा है – नहीं, ये पराया चेहरा नहीं है. ऐसा नहीं है. बल्कि ऐसा है. – अगर इस परेशानी को उसे बनाने वाले तीन घटकों के योग के रूप में देखा जा सकता, तो वे समय के क्रमबद्ध अंतरालों के अनुरूप प्रतीत होते. – पहले पल में वह अपने आप को देखता है. दूसरे में, दिल की धड़कन के समानुपात में, - समझता है, कि वह  - वह नहीं है. तीसरे पल में – कि वह (क्योंकि, बेशक, वह है), मगर इस पल में वह ये जान गया है, उसे, जिसने उसे डरा दिया था. चश्मा ! उसने कभी भी चश्मा नहीं पहना था. 

उसके चेहरे पर चश्मा था, और चश्मा बिना कांच का. वह अपनी नाक से उसे खींच लेता है और फर्श पर पटक देता है. 

चश्मा उछलता है और नीली टाइल्स से गुज़रते हुए – रुक जाता है और ख़ाली नज़रों से उसके घुटनों की ओर देखने लगता है. वह पैरों से उसे – बिना कांच की फ्रेम को - मसल देता है. और जब वह नाक वाली डंडी पर टूट जाता है, तो वह पैर की ठोकर से पहले आधे हिस्से को क्यूबिकल में धकेल देता है – और नज़रों से दूर कर देता है और दूसरे को – दूसरे क्यूबिकल में.     

अचानक उसे ऐसा लगा कि क्यूबिकल्स में कोई है और उस पर नज़र रख रहा है. 

न सिर्फ कोई है, बल्कि उस पर नज़र रख रहा है. कुल चार क्यूबिकल्स हैं, और वह हरेक को खोलता है. कोई नहीं है. कोई नहीं. कपितोनव मूखिन के भय को याद करता है (मगर क्या वह भय था?), मतलब, तब, जब उसने पहली बार ग़ौर किया कि उसकी हर हरकत पर लगातार पैनी नज़र रखी जा रही है.

वह मुँह धोता है. और बाहर निकलता है.            

“क्या मैंने चश्मा पहना था? क्या मेरे चेहरे पर चश्मा था?”

 “माय गॉड, क्या हुआ?”  “मैं पूछ रहा हूँ, क्या मेरे चेहरे पर चश्मा था?”  “बेशक था – चश्मा.”

 “बिना काँच वाला?”  “बिना काँच वाला क्यों?”  “क्योंकि मेरी नज़र अच्छी है. मैं चश्मा लगाता ही नहीं हूँ!”  “तुम पूरे दिन चश्मे में थे.”  “पूरे दिन चश्मे में? तुमने मुझे सुबह देखा था?”  “मैंने तुम्हें लंच से पहले देखा था. तुमने चश्मा लगाया था. और फिर उसके बाद, जब तुम्हारी ठोढ़ी का ज़ख़्म पोंछ रही थी. मैंने सोचा भी: चेहरे को छूते हुए पार्टीशन गिरा था, मगर चश्मे को कुछ नहीं हुआ. परेशान मत हो, तुम अच्छे ही लगते हो – चश्मे में भी और बिना चश्मे के भी. सुनो, तुम्हारे होंठ बेजान नज़र आ रहे हैं...ये सब बन्द करो, होश में आओ, कपितोनव .”


21.43


 “आसमानी जन्नत, वो कितनी अच्छी तरह ‘किस’ करता है, कपितोनव !”  “कौन?”  “तुम, कपितोनव ! मैं तुम्हारे बारे में कह रही हूँ!” उसने उसकी ‘किस’ को बस, झिड़क नहीं दिया था – जब वह लिफ्ट में उससे लिपट गई थी – होठों सहित पूरे जिस्म से. उसे महसूस हुआ कि वह उसे प्रतिसाद दे रहा है.  

और फिर से प्रतिसाद देता है.


लिफ्ट के दरवाज़े अपनी कसरत करते रहते हैं “खुल गए-बन्द हो गए”. तीसरी कोशिश में दोनों बाहर निकलते हैं.  21.48


 “...कपितोनव , क्या तुमने सचमुच में समझ लिया, कि ऐसे समय पर मैं तुम्हें छोड़ दूँगी?...तब, जब सबने तुम्हें छोड़ दिया है?... मैं वैसी नहीं हूँ... मैं देख रही हूँ कि तुम्हें किस चीज़ की ज़रूरत है...तुम्हें औरत की ज़रूरत है, तुम्हें गरमाहट की ज़रूरत है, तुम्हें अपने विलक्षण जादू के लिए डाइरेक्टर की ज़रूरत है!...मैंने सोच लिया है: तुम चाँदी जैसे चमचमाते सूट में अपना कार्यक्रम पेश करोगे...नहीं? क्यों?...तुम्हें अपनी क़ीमत का अंदाज़ा ही नहीं है... तुम्हारा स्वाभिमान कम हो गया है...कपितोनव, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है, तुम एक साथ दो-दो दो अंकों वाली संख्याएँ बूझ सकते हो!...और चार भी!...और आठ भी!...  “...और सिर्फ एक नज़र से ताला खोलना?...झूठ, तुम कर सकते हो! चलो, प्लीज़ – नज़र से! सिर्फ नज़र से... चलो, उसकी तरफ़ देखो, चलो ना, प्लीज़...यहाँ पीठ पर...

 “...व्वा! खोल दिया!...तुमने! सिर्फ तुमने!...नहीं, वह ख़ुद नहीं खुला!... ‘ख़ुद’ का क्या मतलब है? और मैंने भी नहीं!...कपितोनव, बस करो, मेरा अपमान करने की ज़रूरत नहीं है! तुम नज़र से ही खोल सकते हो!...ये तुम्हारा जादू है! मेरा नहीं!...’सीक्रेट’ जानना नहीं चाहती...  “...आसमानी जन्नत, आह, ख़ामोश-तबियत वालों से मैं कितना प्यार करती हूँ! मुझे तुम्हारे सामने स्वीकार करना होगा, कपितोनव ...मैंने कभी भी, किसी से भी इस बारे में नहीं कहा...मेरा कभी भी तीस साल से ज़्यादा आयु के पुरुषों से संबंध नहीं रहा...ईमानदारी से!...मैं हमेशा, ऐसे, तुम्हारे जैसे पुरुष का सपना देखती रही, कपितोनव !...

 “...कपितोनव ! तुम – दिमाग़ हो, तुम – शक्ति हो. तुम – ताक़त हो. तुम – पायथन (अजगर- अनु.) हो.  “...कपितोनव , हम कहाँ हैं?...मैं समझ नहीं पा रही हूँ, तुम मुझे अपने हॉटेल के कमरे में ले आये?

. “..कपितोनव, मैं, बस, तुम्हें फ़ौरन आगाह कर देना चाहती हूँ...मैं चिल्लाऊँगी...इजाज़त है?...तुम डर तो नहीं रहे हो ना, कि मैं तुमसे समझौता करूँगी?” .....

 जब अपने पैरों को उसके चारों ओर लपेटती है, लगभग उसे अपने भीतर दबाते हुए, और पहले गुर्राती है, फिर चिल्लाती है : “कपितोनव !”, वह वापस अपने ख़यालों पर लौटता है, क्या वह कपितोनव ही है. या वह कोई और है, जिसने कपितोनव  को प्रतिस्थापित कर दिया है?


इससे पहले, इतनी शिद्दत से उसे किसी ने यक़ीन नहीं दिलाया था, कि वह कपितोनव है, और इससे पहले, उसके दिल में कभी ये सन्देह भी नहीं उठा था. 


काले बाल धब्बे के समान बिखरे थे. कहीं ये मेदूसा34 गॉर्गोन तो नहीं? गॉड्स, सेव मी, - मेदूसा गॉर्गोन की सुन्दरता का ख़याल कपितोनव  को मानो चीर गया! उसकी सुन्दरता का साक्षी कौन हो सकता था, यदि सब प्रत्यक्षदर्शियों की मृत्यु हो जाती थी, और वह, जो सही-सलामत बचा था, बिना बुर्ज़ वाला, क्या नाम था उसका...हर्क्युलस नहीं...पेर्सेइ...वह भी दयनीय प्रतिबिम्ब के अलावा क्या देख सका था?...

 [बस, वह उसे पहले ही खो चुका था (कपितोनव  – आकस्मिक ख़याल को).] 

उसके कानों में बड़े-बड़े इयर-रिंग्स हैं – पतले, चौड़े, लहरियेदार प्लेटों वाले, अल्टार के द्वार की याद दिलाते. क्या ये इयर-रिंग्स हैं? कवच के बचे-खुचे टुकड़े – पोषाक की आख़िरी चीज़, जो उसके बदन पर बची थी.  “क-पि-तो-नव!... क-पि-तो-नव!...” जैसे वह डर रही हो, कि अगर पूरा भी नहीं, तो कपितोनव के अस्तित्व का एक हिस्सा खो जाएगा – का, या पि, या तो, या नव.

कपितोनव, सिर्फ ऐसे ही, किसी और तरह से नहीं.                

     ..............


 इसके बाद उसे ऐसा लगता है, कि यही ख़ामोशी है – वो, जिसे सुना जाए, वो असल में साधारण किस्म की बारीक़ आवाज़ों से सराबोर है – खिड़की के परे वाली, दरवाज़े के परे वाली, दीवारों के परे वाली और बस, इन्हीं कमरों की : कहीं श्च्श्च्श्श्च, कहीं प्त्स्क, कहीं चरमराहट, कहीं ब्रूम, कहीं टाक-टिक-टाक-टिक, कहीं “तीसरा, तुमसे कह रही हूँ” (कॉरीडोर के अंत में).


एक दूसरे की बगल में लेटने के लिए जगह काफ़ी है. वह, उसकी तरफ़ मुँह मोड़कर, थोड़ा सा दूर हटता है, जिससे एक किनारे से उसे अच्छी तरह देख सके. उसका मुँह कुछ खुला है, पलकें झुकी हैं. वह बिना तकिए के है, और नीनेल का सिर तकिए में धंसा है, जिससे उसकी नुकीली ठोढ़ी, छत की ओर हो गई है, और अल्टार का द्वार न्यून कोण बनाते हुए कपितोनव  की ओर है. चांदी? मगर वो तो भारी होती है...तब ये कवच नहीं, बल्कि – जंज़ीरें भी नहीं है.


कपितोनव  धातु के इस आभूषण को ऊँगली से छूता है – सावधानी से, जिससे कि उसे जगा न दे, क्योंकि उसे विश्वास है कि यह औरत दूर किसी दूसरी दुनिया में चली गई है: वह यहाँ नहीं है, वह समय और स्थान की किसी और ही परिधि में है. 

वह उसकी साँस की गति का निरीक्षण करता है, जो उसके पेट से प्रकट हो रही है, और सीने में कोई हलचल नहीं हो रही है. 

एक ओर से देखने पर उसका वक्षस्थल धनु-कोष्ठक जैसा प्रतीत हो रहा है. 


कपितोनव  दूसरी ओर सिर घुमाता है – उससे दो मीटर्स की दूरी पर दीवार में आईना जड़ा है. तर्कसंगत है : निर्वस्त्र, हड्डियाँ निकला, और उसके पीछे वह, धनुकोष्ठकों वाली. 

वे चार हैं. 

अगर दोनों कपितोनोवों को एक गिना जाए, तो कपितोनव  धनुकोष्ठकों के बीच में दब गया है.

वह – जैसे घोंसले में है. वह उठता है और स्वयम् को कोष्ठकों से निकालकर मिनिबार की ओर जाता है.

वह फ़ौरन होश में आती है, और जैसे कुछ हुआ ही न हो, कंधों तक कंबल के नीचे छुप जाती है – अब कोई कोष्ठक नहीं हैं.  “कपितोनव , क्या तुम्हारे बच्चे हैं?”  “बेटी. उन्नीस की.”  “और मेरा एक बेटा है. ग्यारह का. तुम्हें क्या हुआ है, कपितोनव ?”  “यहाँ... मक्खी है,” कपितोनव कहता है.  “फ्रिज में?”  “हाँ.”  “मरी हुई?”  “नहीं.”  “तुम खड़े थे और तुमने ध्यान नहीं दिया, कपितोनव ?” कुहनियों पर थोड़ा सा उठती है. “तुम इतना चौंक क्यों गए? आख़िर, ऐसी क्या बात है?... सर्दियों की मक्खी. हॉटेल की. मिनिबार से...अरे, तुम्हें हुआ क्या है, कपितोनव? क्या तुम मक्खियों से डरते हो? ये कोई कॉक्रोच थोडे ही है.”  “सब ठीक है,” कपितोनव  ने अपने आप पर काबू किया. “क्या वाइन लोगी? या, यहाँ और क्या है? श्नेप्स – दो घूँट...वोद्का ‘रशियन स्टैण्डर्ड’ ...ओहो, पूरे सौ ग्राम!”  “चलो, आधी आधी. नहीं बोतल से ही पियेंगे. जिससे जाम न टकराना पड़े.” पहले वह गटकती है, मगर बोतल से पूरा घूंट उसके मुँह में नहीं जाता – बोतल का मुँह बहुत संकरा है. वह अपना घूँट पीता है.  “और, तुम्हारे उसके साथ संबंध कैसे हैं, सब ठीक है?”

 “किसके साथ ठीक है?”  “बेटी के साथ – सब ठीक तो है?”  “हाँ, ठीक है. बुरा क्यों होने लगा?”  “नहीं, बस, ऐसे ही पूछ लिया. प्यार से रहते हो?”

 “प्यार से, बेशक.”  “ ये, ‘बेशक’ भी? हाँ, बेशक – वह बड़ी है...अभी शादी नहीं हुई?” “एंगेजमेंट हो गई है.”  “क्या बात है! होना ही चाहिए...और तुम? तुम तो शादी-शुदा हो?”  “फ़िलहाल हम,” कपितोनव  कहता है – “बिल्कुल एक साथ नहीं हैं. तुम्हारे कानों में ये क्या है – चांदी का है?”

 “इयर-रिंग्स अच्छे लगते हैं?”  “शायद, क्या भारी हैं?”

 “मेरे ख़याल से वे मुझ पर जँचते हैं.”  “हाँ, बेशक, जँचते हैं.” 

वो चीज़, जिसके बिना आज का इन्सान, चाहे वो कहीं भी हो, बेहद परेशानी महसूस करता है, उसके हाथों में दिखाई दिया. वो छोटे से परदे पर देखती है:

 “पूछते हैं कि मैं किसके पक्ष में हूँ – स्मेत्किन के या चिचूगिन के? टु हेल!...वॉव!...गिल्ड के प्रेसिडेंट के बारे में भूल गए. ये सब तुम्हारी वजह से हुआ, कपितोनव ! बोर्ड की पुष्टि तो कर दी, मगर प्रेसिडेंट तो है ही नहीं. अभी वहाँ रेस्टॉरेंट में चुनाव हो रहा है...और, क्या तुम्हारे पास मेसेज नहीं आया? तुमने, क्या फ़ोन बन्द कर दिया है?”  “मुझे कोई फ़रक नहीं पड़ता कि वे किसे चुनते हैं.” 

 “अगर तुम्हें चुनते, तो बढ़िया होता.”

 “उहूँ,” कपितोनव  ने कहा.  “क्या ‘उहूँ’, कपितोनव ? तुम एक बेहतरीन प्रेसिडेंट साबित होते.”  “मगर, क्या वोटिंग सीक्रेट नहीं है?”  “देखा, तुम्हें फ़रक पड़ता है!”

 “आज कौन सी तारीख़ है?” कपितोनव  ने पूछा.  “ओह, ये हुई न बात! बूझो.”  “ठीक है, ज़रूरी नहीं है.” “नहीं बूझ सकते? क्योंकि वो दो अंकों वाली नहीं है, इसीलिए तुम नहीं बूझ सकते!...मगर, मैंने अपनी बूझ ली. तुम मेरी बूझो...हूँ? ख़ामोश क्यों हो? मैंने दो अंकों वाली सोच ली.”

 “बस करो, मैं ये नहीं करूँगा.”  “ओह, प्लीज़. मैंने सोच ली है.”  “कहा तो, कि नहीं करूँगा.”  “अच्छा, मैं उसमें कुछ जोड़ दूँ..कितना जोडूँ?...चार?”  “मुझे कोई फ़रक नहीं पड़ता.”  “और कितने निकालूँ...दो?”  “मुझे कोई फ़रक नहीं पड़ता.”  “तो? मैंने जोड़ दिया और घटा भी दिया. बोलो भी! ...ख़ामोश हो?...चौबीस!”  “मुझे कोई फ़रक नहीं पड़ता. मुझे नहीं मालूम कि तुमने क्या सोचा था.”  “झूठ बोलते हो! तुमने बूझ ली! चौबीस!”  “मैंने कुछ भी नहीं बूझा. ये तुम मुझे उकसा रही हो. मुझे नहीं मालूम, कि तुमने क्या सोचा था.”

 “तुम बुरे हो, कपितोनव . और, क्या तुम्हारा ख़याल है, कि मैं हर रोज़ इन्हें पहनती हूँ?...अच्छा बताओ तो, कपितोनव, मैं क्यों तुम्हें ‘कपितोनव, कपितोनव !’ कह कर बुलाती हूँ, मगर तुमने एक भी बार मुझे नाम से नहीं बुलाया? क्या तुम बिस्तर में सबके साथ ऐसे ही होते हो? ये तुम्हारा सिद्धांत है?”  “नहीं, किसलिए...”  “पूरे कपड़े उतारने चाहिए थे, जिससे कि तुम मुझ पर इयर-रिंग़्स देख सकते.”  “मैं उन्हें पहले भी देख चुका हूँ.”  “कब? हम तो कुछ ही घंटों पहले मिले हैं.”  “बस, देख लिए.”  “हाँ, तुम अपने आप पर चश्मा नहीं देख सके? तुमने मेरे इयर-रिंग्स कैसे देख लिए? कपितोनव , कंबल के नीचे आ जाओ, प्लीज़. वोद्का गर्माहट नहीं दे रही है. मुझे ठण्ड लग रही है.” 

23.16

            इसके बाद वह “कपितोनव !” कहकर नहीं चीख़ी, और चीखती ही नहीं है.          और फिर 


23.28


वह कहती है (क्योंकि कॉरीडोर में कुछ लोग शोर मचा रहे हैं):  

 “ये ‘हमारे लोग’ बैन्क्वेट से लौट रहे हैं.”  ‘हमारे लोग बैन्क्वेट से’ चलते हुए किसी महत्वपूर्ण बात पर बहस कर रहे हैं – किसे चुना गया और खाने के बारे में...  

वह टैक्सी बुलाती है.  “आर यू श्युअर?”

 “बिल्कुल. मैं सिर्फ घर में ही रात बिताती हूँ.”


तभी 

23.32


दीवार के उस ओर वाला पड़ोसी – वह भी बैन्क्वेट से लौटा है.

 “काल-भक्षक, वह पूरे समय उल्टियाँ निकालता रहता है,” कपितोनव  कहता है.

 “पता है, पता है... प्लीज़ मेहेरबानी करो, मेरे टाइट्स फ़ट गए हैं.” कपितोनव ने भी कपड़े पहन लिए, कपितोनव उसे छोड़ने जाना चाहता है.  “मुझे यहाँ किसी ने थर्मल्स बेचे, बेलारूसी-रूसी प्रॉडक्शन. इस बात की गारंटी देते हैं कि चलते समय ये घर्षण को कम करते हैं. मैंने तो जाँच तो नहीं की.” 

 “क्या यादगार के तौर पर दोगे?” “ओके, गुड लक. चलते समय घर्षण कम करते हैं – ये तो अच्छी बात है.”  “मर्दाना. मतलब, यादगार के तौर पे... दो.”


23.56


सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए वह उससे कहती है:  “क्या तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता, कि वाक़ई में कोई उसे खा रहा है, या, पता नहीं, पूरा खाए जा रहा है?”

 “क्या तुम समय के बारे में कह रही हो?”  “हाँ, व्यक्तिगत समय के बारे में, जो हम सबको दिया गया है. कोई उसका पूरा गूदा खा रहा है, पूरा रसभरा गूदा, और बच रहता है भूसा. सिर्फ भूसा, घटनाओं का भूसा. और बस.”  “अगर तुम उसके बारे में कह रही हो, जो मेरी दीवार के परे है, तो मुझे डर है कि उसके साथ ऐसा नहीं है. ऐसा नहीं लगता कि वह स्वादिष्ट चीज़ें खाता होगा. तुमने तो सुना कि वह कैसे उल्टियाँ निकालता है...”  “नहीं - मैं आम तौर पे कह रही थी.”  “और मेरे लिए ये दो दिन अंतहीन थे. वो इसलिए कि, शायद, मैं सोता नहीं हूँ. या, किसे पता, हो सकता है, कि ये उसने मेरी आंतों को इस क़दर बेहाल कर दिया हो...”  “माफ़ करना, कपितोनव, मगर तुम्हारे चेहरे पर बेहद थकावट दिखाई दे रही है.”  “बस, एक दिन और, हो सकता है, सब ख़त्म न हो.”

 “सब ख़त्म हो जाएगा, परेशान मत हो. “ और ये वाक़ई में उस दिन के अंतिम शब्द थे. आगमन हुआ 


सोमवार का. 

00.00         

    बर्फ गिरना शुरू हो गई थी. टैक्सी वाला इंतज़ार कर रहा है, इंजिन बिना बन्द किए, और विंडस्क्रीन पर वाइपर्स घूम रहे हैं.

 “तुम्हारे सामने स्वीकार करती हूँ, मैं, हो सकता है, तुम पर बिल्कुल हावी न होती, अगर तुमने ये न किया होता. सिर्फ मैं ठीक से तुम्हें देख नहीं पाई. हालाँकि ये तुम्हारा ‘गेम’ नहीं था, मगर उसके नियमों पर भी तुमने उसे बख़ूबी खेला. तुम ‘तालाब’ को अभी भी नहीं पहचान पाए? यह सब उसी का किया-धरा  था. ‘तालाब’ सिर्फ मिलनसार दिखना चाहता था, असल में तो वह बेहद बुरा इन्सान था, एकदम ख़ाली, दुष्ट, असहनीय. मैं यह बात औरों से ज़्यादा अच्छी तरह जानती हूँ. उसने तुम्हें भी इस्तेमाल किया. तुम्हारा पता लगाया, मॉस्को से खींचकर लाया, उस स्टोर-रूम में खींच कर ले गया. क्या तुम सचमुच में कुछ नहीं समझते? ये आत्महत्या थी! तुम उसके लिए थे...किसी सोने की पिस्तौल के समान! तुम्हें अपने आप को ज़रा भी दोष नहीं देना चाहिए. तुम किसी भी सोने की पिस्तौल से बेहतर हो! तुम लाजवाब थे, सिर्फ लाजवाब! इन्सानियत की दृष्टि से मुझे ‘तालाब’ का अफ़सोस है, मगर एक औरत की दृष्टि से – ज़रा भी नहीं. अपनी हिफ़ाज़त करना, कपितोनव . नीनेल को याद रखना. बाय, कॉम्रेड! मैं कभी भी हत्यारों के साथ नहीं सोई.” 

कपितोनव  नज़रों से जाती हुई कार को देखता रहा. उसका हॉटेल में लौटने का मन नहीं है. वह बेचैन है, जैसे उसने कोई भारी स्क्रू निगल लिया हो. वह लैम्प के नीचे बेंच पर बैठा रहता, मगर वह भुरभुरी बर्फ़ से ढँक गया था.                 उस पर नज़र रखी जा रही है. 

वह तेज़ी से पलटता है – धीरे-धीरे आती हुई कार की ओर: ये पुरानी ‘झिगूली’ थी, हेडलैम्प टूटा हुआ था. उसने उन्हें तभी देख लिया था, जब नीनेल बिदा होते समय ‘तालाब’ की नीचता के बारे में अपना स्वगत भाषण दे रही थी, - उस समय कार यहाँ से उतने ही धीमे गुज़री थी, जैसी अब जा रही है, मगर विपरीत दिशा में, और चौराहे पर ‘झिगूली’ वापस मुड़ गई.

कपितोनव  के क़रीब आकर कार रुक जाती है, और ड्राइवर, झुक कर कपितोनव  के लिए दरवाज़ा खोलता है.  “मालिक, चलें! कहाँ?” ये है मिसाल असंगठित कैब्स पर टैक्सी नामक संस्था की विजय की. 

कपितोनव सिर्फ बैठना चाहता है. दरवाज़ा पहली बार में बन्द नहीं होता – और ज़ोर से बन्द करना पड़ता है.

पूरबी आदमी कपितोनव की ओर देखकर मुस्कुराता है, इंतज़ार कर रहा है. 

 “एक मिनट,” कपितोनव  कहता है. “अभी सोचते हैं,” कुछ सोचता है, पूछता है: “तुम्हारा नाम क्या है?”  “तुर्गून.”

 “तुर्गून, क्या तुम बहुत दिनों से हो पीटर में?”  “एक साल, पाँच महीने से.”  “क्या कन्स्ट्रक्शन साइट पर काम करते थे?”

 “नहीं, भाई के पास.”  “क्या पहाड़ों की याद आती है?”  “परिवार की याद आती है. बहनों की. हमारे यहाँ पहाड़ नहीं हैं.”  “क्या पीटरबुर्ग तुम्हें अच्छा लगता हि?”  “अच्छा शहर है, बड़ा. बेहद ठण्डा. कहाँ जाएँगे?”  “कहीं नहीं,” कपितोनव  दो नोट निकालता है. “तुम मुझे बस यूँ ही घुमाओ.”  “नहीं, मैं नहीं! मैं नशेबाज़ों को नहीं !” कपितोनव  उसकी जेब में पैसे ठूँस देता है.

 “तुर्गून, मैं तुमसे इन्सान की तरह पेश आ रहा हूँ. तुम मेरी बात सुन रहे हो, हाँ? मैं पीटरबुर्ग देखना चाहता हूँ. काफ़ी अर्से से यहाँ नहीं आया. याद आती थी. तुम्हें सेन्ट इसाकोव्स्की-केथेड्रल मालूम है? ऐडमिरैल्टी-छोटे से जहाज़ के साथ? मुझे सिर्फ ले जा सकते हो? नेवा, मोयका, ग्रिबायेदव-कैनाल...अगर कोई तुम्हारी पसन्दीदा जगह हो, तो वहाँ भी ले चलो. जहाँ चाहो, ले चलो. मेरी फ़्लाइट कल है. पता नहीं, फिर कब आऊँगा?”

 “क्या दूर जा रहे हो? अमेरिका जा रहे हो?”  “कहाँ का अमेरिका?” कपितोनव  बुदबुदाता है, ये महसूस करते हुए कि उसने तुर्गून से जगह बदल ली है, अब वो सवाल कर रहा है. “क़रीब ही जाना है. अमेरिका ही क्यों जाया जाए?” जोश में आकर तुर्गून पूछता है:  “क्या सुबह तक चलते रहेंगे?”  “जब तक उकता न जाऊँ.” चल पड़े. तुर्गून को अभी तक अपनी सफ़लता में विश्वास नहीं हुआ था – वह पैसेंजर को देखता है: कहीं उसका इरादा न बदल जाए, कहीं पैसे वापस न मांगने लगे. यहाँ कुछ गर्माहट है. कपितोनव ओवरकोट के बटन खोलता है और स्कार्फ उतारता है. सर्दियों की बर्फ़ीली रात में पीटरबुर्ग को देखना – कपितोनव  को सबसे ज़्यादा इसी बात की ख़्वाहिश थी. किसी चीज़ को याद करके, या किसी बारे में कल्पना करके, वह आँखें बन्द करता है, और फ़ौरन सो जाता है. 


0.41


 “मालिक, आ गए.”  “आँ? क्या?”  “इसाकोव्स्की-कैथेड्रल.”

 “कहाँ?”  “ये रहा. इसाकोव्स्की-कैथेड्रल.”  “तुर्गून, तुम – तुर्गून?...तुर्गून, ये इसाकोव्स्की-कैथेड्रल नहीं है, ये ट्रिनिटी कैथेड्रल है, इसी को इज़माइलोव्स्की कहते हैं...और मैं क्या सो गया था?”  “सो रहे थे, जब हम जा रहे थे.”  “तुमने मुझे क्यों जगाया?”  “इसाकोव्स्की-कैथेड्रल, ख़ुद ही ने तो कहा था दिखाने के लिए.”     “ट्रिनिटी, मैं तुम्हें समझाता हूँ. ये भी बड़ा है, मगर इसाकोव्स्की से थोड़ा कम. इसाकोव्स्की का गुम्बद सोने का है. तू भी क्या...अगर मुझे इसाकोव्स्की दिखाना चाहता है, तो लेर्मन्तव्स्की पर मुड़ जाना, और वहाँ रीम्स्की-कर्साकोव पर, और फिर ग्लिन्का स्ट्रीट पर बल्शाया-मर्स्काया स्ट्रीट तक...कुछ इस तरह. या फिर इज़माइलोव्स्की पर, मगर वहाँ वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट पर ट्रैफ़िक वन-वे है, सदोवाया पर बल्शाया पद्याचेस्काया पर निकलना पड़ेगा, और फ़नार्नी तक...मगर, यदि मैं सो जाऊँ, तो मुझे जगाना ज़रूरी नहीं है.”  “क्या सोओगे?”  “नहीं, तुर्गून, मेरे पास सोने के लिए जगह है. मैंने तुम्हें इसलिए नहीं लिया. मैं तीन रातों से सोया नहीं हूँ, क्या मैं कुछ देर सो नहीं सकता? समझे? मैं एक आदमी को, कह सकते हैं, कि उस दुनिया में भेज कर आया हूँ. सुबह इन्वेस्टिगेटर मुझे बेज़ार कर देगा. हो सकता है, कि मैं कहीं भी न जा पाऊँ. समझ गए? और तुम कहते हो “सोओगे”. तुम मुझे नहीं जानते, तुर्गून. मुझे जादू अच्छा नहीं लगता. मगर सिर्फ इतना जान लो, कि अगर अचानक मैं सो जाऊँ, तो ध्यान रख कि मैं सब देखता हूँ, मैं ख़ुद ही जानता हूँ कि मुझे कहाँ उठना है.” कपितोनव  एक नौचालक की तरह ग़ौर से देखता है कि तुर्गून लेर्मन्तोव्स्की प्रॉस्पेकट पर मुड़ जाए. जब पुल के ऊपर से गुज़रते हैं, तो वह उत्साहपूर्वक तुर्गून से कहता है: “फ़व्वारा, देख रहे हो, पूरा बर्फ के नीचे है...” मगर सदोवाया से पहले, जब सिग्नल के पास रुकते हैं, तो कपितोनव  की आँखें फिर से बन्द हो जाती हैं, और वह रीम्स्की-कर्साकोव प्रॉस्पेक्ट वाले मोड़ को नहीं देख पाता. क्र्यूकव कैनाल के ऊपर वाला पुल तुर्गून बहुत धीरे-धीरे पार करता है – वह चाहता है कि पैसेंजर ऊँचे घण्टे को देखे, मगर उसे उठाने की हिम्मत नहीं कर पाया. ये रहा गुम्बज़ों वाला मन्दिर, और सब कुछ चकाचौंध करते प्रकाश से आलोकित है, मगर तुर्गून जानता है कि ये भी इसाकोव्स्की-कैथेड्रल नहीं है, - कैथेड्रल के बारे में उसे सब कुछ याद था, मगर ट्रिनिटी-कैथेड्रल को इसाकोव्स्की–कैथेड्रल इसलिए समझ बैठा कि ट्रिनिटी-कैथेड्रल के पास ट्रिनिटी मार्केट है, वहाँ तुर्गून अपने भाई की मदद करता था.

 बाईं ओर मुड़कर, तुर्गून ट्राम की पटरियों को पार करता है – हो सकता है, पैसेंजर को दो स्मारक देखने में दिलचस्पी हो – एक खड़ा है, और दूसरा बैठा है, ख़ासकर बैठा हुआ ज़्यादा अच्छा है – उसके सिर पर बड़ी सी बर्फ़ की टोपी थी. मगर, आगे और भी दिलचस्प चीज़ें होंगी, और इस सड़क को तुर्गून काफ़ी तेज़ी से पार कर लेता है – उतनी तेज़ी से जितने की सिमेंट पर पिघलती बर्फ इजाज़त देती थी. 

बल्शाया-मर्स्काया पर बर्फ़ तोड़ने वाले काम कर रहे थे. मगर यहाँ समुद्र कहाँ है, ये तुर्गून नहीं जानता. पीटरबुर्ग में डेढ़ साल से रह रहा है, मगर आज तक समुद्र नहीं देखा. 

ये रहा वो – इसाकोव्स्की-कैथेड्रल, और उसके सामने घोड़े पर सवार स्मारक, और उसके पीछे दूसरा स्मारक – घोड़े पर : तुर्गून धीरे-धीरे जा रहा है, जैसे पैसेंजर को दिखा रहा हो वह चीज़ जिसे वह देखना चाहता था – पीटरबुर्ग के ये महान दर्शनीय स्थल. बड़ी मुश्किल से तुर्गून अपने आप को रोकता है, ताकि कपितोनव  को जगा न दे. अब उसके सामने है नेवा. आसमान की कालिमा में उस तरफ़ की मीनार चमचमा रही है.               

तुर्गून कुछ-कुछ ख़ुद कपितोनव  बन चुका है – उस लिहाज़ से नहीं, कि वह भी सोना चाहता है, बल्कि इसलिए, कि वह ये सब उसकी नज़रों से देखने की कोशिश करता है, जो लम्बे समय तक इस सब के लिए तरसा था. और, जब वह ब्लागोविश्शेन्स्की ब्रिज पार करता है, तो नेवा की तरफ़ ऐसी नज़र डालता है, मानो सोते हुए कपितोनव की ख़ातिर उसे देख रहा है. 


तुर्गून बड़ी ख़ूबसूरत जगहों पर गाड़ी ले जाता है, और जितनी ख़ूबसूरत वह जगह होती है, उतने ही धीरे वह गाड़ी चलाता है. बुर्ज़ रहा दाहिने हाथ को, और बाईं ओर – म्यूज़ियम, और यहाँ, तोप की फ़ेन्सिंग के पीछे, और, और भी कई जगहों पर वह क़रीब-क़रीब रुक ही जाता है. मुश्किल ही लगता है, कि इस पैसेंजर ने किसी को मार डाला है, - तुर्गून, शायद, पैसेंजर के शब्दों को ठीक से समझ नहीं पाया. शायद, कोई इसे ही मारना चाहता था, न कि उसने किसी को मारा था. ये देखो, वह अभी सो गया है. 


इसके बाद वह मस्जिद की तरफ़ आते हैं. तुर्गून रुक जाता है, और दुर्घटना वाली बत्तियों को जला देता है, क्योंकि यहाँ पार्किंग करना मना है, और एक मिनट के लिए इंजिन भी बन्द कर देता है इस उम्मीद में कि पैसेंजर उठ जाएगा, और ख़ुद उसके लिए सम्मानपूर्वक मस्जिद को देखने लगता है. 

बर्फ से ढंकी गलियों से होकर वह पुराने जंगी जहाज़ की ओर जाता है, जहाँ से यहाँ क्रांति का आरंभ हुआ था. और फिर, पुल पार करने के बाद, न जाने किस तरफ़ चल पड़ा. पैसेंजर को यहाँ अच्छा न लगता, और तुर्गून फुर्ती से इस इण्डस्ट्रियल एरिया से निकलता है. 

पैसेंजर तब भी नहीं उठता जब पेट्रोल पम्प के पास तुर्गून गाड़ी रोकता है, और, हालाँकि कार की शैफ्ट में कोई प्रॉब्लम है, तुर्गून पैसेंजर को नेवा के किनारे की सैर करवाना अपना कर्तव्य समझता है. पहले वह नेवा के किनारे-किनारे पूरब से पश्चिम की ओर जाते हैं (इस समय


03.10


नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर भी बहुत कम गाड़ियाँ चल रही हैं और पैदल चलने वाले तो बिल्कुल ही नहीं हैं), और फिर वह पैसेंजर को नेवा के किनारे-किनारे पश्चिम से पूरब की ओर ले जाता है. पूरबी छोर पर उसे याद आता है कि इस सड़क पर, जिसे कोन्नाया स्ट्रीट कहते हैं, एक प्रसिद्ध इमारत है. वैसे तो ये किसी साधारण इमारत ही की तरह है, ऐसी इमारतें पीटरबुर्ग में अनगिनत हैं, मगर उसके लिए ये ख़ास है. उसकी दीवार पर स्ट्रा से साबुन के बुलबुले उड़ाते हुए बच्चे की तस्वीर बनी है. पीटरबुर्ग में तो सब कुछ बड़ा कठोर है, मगर तुर्गून को यह तस्वीर गुदगुदा गई. और वह अब 


04.02


हौले से मुस्कुराता है. 

कपितोनव  आँखें खोलता है.  


तुर्गून ऊँगली से नक्काशी की ओर इशारा करता है, मगर शब्दों में समझा नहीं सकता. वह सिर्फ एक ही शब्द कहता है:  “तस्वीर.” कपितोनव  नज़र उठाता है – देखता है – सिर हिलाता है. और कहता है:  “चल, घर ले चल.”  “क्या समर-गार्डन दिखाऊँ?”  “ठीक है,” कपितोनव  कहता है, और आँखें बन्द कर लेता है. 

 04.51


  “तुर्गून, क्या मैंने तुम्हें पैसे दे दिए?”  “हाँ, हाँ, अच्छे पैसे दिए हैं.”  “तेरा नाम बड़ा भारी-भरकम है – तुर्गून. क्या तुझे मालूम है कि इसका क्या मतलब है?”  “मालूम है,” तुर्गून जवाब देता है. “जो ज़िन्दा है.”  “सिर्फ ज़िन्दा है?”  “जो ज़िन्दा है. धरती पर चलता है.”  “ऐसा ही होना चाहिए. और मैंने सोचा, कोई लीडर होगा. विजेता.”  “नहीं. जो ज़िन्दा है.”  “अच्छा, ऐसे ही रहो, जो ज़िन्दा है. थैंक्यू.”                        


कपितोनव को याद नहीं कि वह अपने कमरे तक कैसे पहुँचा और, सिर्फ ओवरकोट उतार कर बिस्तर में दुबक गया.


10.00


ब्रेकफ़ास्ट नींद की भेंट चढ़ गया. बाकी की चीज़ें भी वह नींद के कारण खो देता. 


11.09  


कागज़ पर नज़र डालकर कपितोनव  खिड़की की ओर बढ़ता है:  “मुझे इन्वेस्टिगेटर चिर्नोव के पास जाना है.”  “क्या सम्मन पे?”  “नहीं इन्विटेशन है.” कपितोनव  के पासपोर्ट को पढ़ने के बाद, ड्यूटी-ऑफ़िसर चोंग़ा उठाता है, कुछ देर किसी से बात करता है.  “रूम नं 11.” इन्वेस्टिगेटर चिर्नोव, मेयर ऑफ़ जस्टिस, ऑफ़िस की मेज़ पे बैठा है, उसके सामने कम्प्यूटर रखा है. इन्वेस्टिगेटर की पीठ के पीछे, कमरे के कोने में गन्दे-हरे रंग की बड़ी भारी सेफ़ रखी है, उसके ऊपर माइक्रोवेव और इलेक्ट्रिक-केटल है. इन्वेस्टिगेटर का चेहरा हाइपर टेंशन के मरीज़ जैसा फूला-फूला है.  “बैठिए, येव्गेनी गिन्नाद्येविच. ये तो अच्छा हुआ कि आप भागे नहीं. मगर देर करना – बुरी बात है.” कपितोनव  ख़ाली कुर्सी को मेज़ से दूर खिसका कर उस पर बैठ जाता है. कमरे में एक और कुर्सी है, मगर उस पर बैग रखी है.  “आप तो कल जाने वाले हैं ना, क्या टिकट खरीद लिया है?”  “कल क्यों? आज ही.”  “आज,” इन्वेस्टिगेटर ने बिना झिझके कहा. “ये कुछ समझ में नहीं आता...” कपितोनव  ख़ामोश रहता है. ये कहना ठीक नहीं है, कि फ्लाइट ढ़ाई घण्टे बाद है, ख़तरनाक होता, उसे पकड़ कर बन्द भी कर सकते थे.  “पहले मुझे इस बात का जवाब दीजिए. क्या ‘तालाब’ के साथ आपके संबंध अप्रिय थे?”  “नहीं, हमारे संबंध अप्रिय नहीं थे.”  “तो फिर बताइए, आप दोनों के बीच वहाँ हो क्या रहा था. और ये भी, संक्षेप में, कि आप दोनों ही वहाँ, गोदाम में, कैसे पहुँचे, बगैर किसी प्रत्यक्षदर्शी के.”  “जानते हैं, मैं दो अंकों वाली संख्याएँ बूझता हूँ.”  “हाँ, मुझे इस बारे में बताया गया है.”  “कॉन्फ़्रेन्स थी. इंटरवल था. इंटरवल ख़त्म हो रहा था, सेशन शुरू होने में सिर्फ पाँच मिनट बचे थे. ‘तालाब’ मेरे पास आया और बोला, कि अभी काफ़ी  समय है दिखाने के लिए...मतलब, वो, जिसका मैंने उससे वादा किया था...इससे पहले...स्क्रीन रखकर. और उस कमरे में था एक पार्टीशन, एक बुलेटिन-बोर्ड, उस पर नए साल का इश्तेहार लटक रहा था...”  “नए साल वाला?”  “हाँ, पुराना. और ये पार्टीशन, ‘तालाब’ की राय में, हमारे लिए स्क्रीन का काम दे सकता था. ‘तालाब’ ये सोचता था, कि उसके चेहरे पर, जैसे, लिखा होता है, कि वह क्या सोच रहा है...और मैं पढ़ सकता हूँ, कि उसने कौन सी संख्या सोची है. इसीलिए स्क्रीन की ज़रूरत थी. मतलब, उस परिस्थिति में, वह पार्टीशन...हम उसे सरका कर कमरे के बीचोंबीच ले आए. ‘तालाब’ उसके पीछे चला गया, मैं इस तरफ़ रह गया. मैंने उससे दो अंकों वाली संख्या सोचने की विनती की, हमेशा की तरह. उसने सोचा 21. फिर उसने एक और संख्या सोची, और मैंने वह भी बूझ ली, अब याद नहीं है कि कौन सी थी.” 

“ताज्जुब की बात है कि आपको याद नहीं है.”  “मगर मैं याद क्यों रखूँ? 21 भी मुझे इसलिए याद रही, क्योंकि ये ‘ब्लैकजैक’35 है. हमने इस बारे में बहस भी की. वह ताशों वाले जादू करता था, और उसके लिए इस संख्या का महत्व था. मगर, उसे लग रहा था कि वह किसी न किसी तरह अपना राज़ खोल रहा है. कुछ संदर्भों से, जैसे नज़र से, आवाज़ से...तीसरी बार हमने ये तय किया कि पार्टीशन के पीछे वह ख़ामोश रहेगा, और मैं बोलता रहूँगा, जैसा हमेशा करता हूँ. मैं उसे न देख रहा हूँ, न सुन रहा हूँ, ऐसा प्रयोग, समझ रहे हैं? और उसने सोचा : 99.”      

यहाँ विस्तार से बताइए.” “मैं पार्टीशन के पीछे से उसे कोई संख्या सोचने के लिए कहता हूँ, दो अंकों वाली. वह ख़ामोश रहता है. तब मैं उसमें पांच जोड़ने के लिए कहता हूँ. वह ख़ामोश रहता है. मैं कुछ देर इंतज़ार करता हूँ और इस योग में से तीन घटाने के लिए कहता हूँ. फिर मैं चुप रहता हूँ और कहता हूँ: आपने 99 सोचा था. और तभी फर्श पर धम् की आवाज़ सुनता हूँ.”  “समझ गया. एक बात समझ में नहीं आई. आपको कैसे मालूम कि उसने 99 ही सोचा था?”  “मालूम है, बस, इतना ही.”  “मतलब, आप ये कहना चाहते हैं कि उसे आपके दो 9 ने मार डाला?”  “पहली बात, मेरे नहीं, बल्कि उसके, और दूसरे, ऐसी कोई भी बात मैं नहीं कहना चाहता. आप मुझ पर उन विचारों को लाद रहे हैं, जो मेरे नहीं हैं.” 

 “ठीक है. और आपने उसे क्यों पहले पांच जोड़ने को और बाद में तीन घटाने की आज्ञा दी?”

 “आज्ञा नहीं दी, बल्कि विनती की.”  “हाँ. क्यों”

 “मैं इसका जवाब नहीं दे सकता.”  “क्यों नहीं दे सकते?”  “ऊफ़. चलिए, ऐसा समझ लीजिए. ये मेरा प्रोग्राम है. सिर्फ मेरा, लेखक का. वह कॉपीराइट कानून से सुरक्षित है. प्लीज़, मुझ पर इसे समझाने के लिए दबाव न डालें, कि क्यों और कितने जोड़ने के लिए मैं कहता हूँ, और क्यों और कितने घटाने के लिए कहता हूँ.”  “आपका सीक्रेट है.”  “क़रीब-क़रीब वही समझ लीजिए.”  “मैं भी एक जादू जानता हूँ. देखिए.” मेयर पेन्सिल उठाता है और, दोनों हथेलियों को एक दूसरे के ऊपर चिपका कर उसे अँगूठों से दबाता है. इसके बाद हथेलियों को इस तरह से घुमाता है कि एक अँगूठा दूसरे का चक्कर लगाता है – इस प्रक्रिया में पेन्सिल 180 डिग्री घूम जाती है और वह नीचे से दोनों अंगूठों द्वारा हथेलियों के बीच दबी हुई प्रतीत होती है - मेज़ के समांतर तल पर और कपितोनव  की ओर तनी हुई.”  “आप दुहराइए.” कपितोनव  इन्वेस्टिगेटर के हाथों से पेन्सिल लेता है और उसी ट्रिक को दुहरा नहीं पाता है. उसके हाथ बेडौल तरीके से घूमते हैं.

 “ये सिर्फ इसलिए, कि आपके हाथों की मूवमेन्ट किसी दूसरे धरातल पर होती है,” मेयर अपनी ख़ुशी को छुपा नहीं पाता. “आपकी गतिविधियाँ बाईं ओर होती हैं, जबकि मेरी – दाईं ओर. है ना?” 

कपितोनव  ने चुपचाप पेन्सिल मेज़ पर रख दी.  “देखिए, आपको विश्वास नहीं हुआ कि हमारे हाथों की गतिविधि भिन्न-भिन्न धरातलों पर होती है, तो मैं क्यों विश्वास कर लूँ कि उसने 99 ही सोचा था?”  “इससे क्या फ़रक पड़ता है, कि उसने क्या सोचा था. चाहे 27 ही सही.”

“अब आप विषय से हट रहे हैं.” कपितोनव  ख़ामोश रहता है, हालाँकि इन्वेस्टिगेटर को किसी ज़ोरदार प्रतिक्रिया की अपेक्षा थी.  “दिखाइए, प्लीज़.”  “क्या दिखाऊँ?”  “आपका जादू. आप और क्या दिखा सकते हैं?”

 “मैंने वादा किया है कि उसे अब कभी भी नहीं दिखाऊँगा.”  “आपने मुझसे कोई वादा नहीं किया है. इसे इन्वेस्टिगेटिंग एक्सपेरिमेंट समझ लीजिए.”  “क्या मैं दिखाने के लिए बाध्य हूँ?”

 “ओह, अचानक ये ‘बाध्य’ क्यों? ऐसा करेंगे तो हम दोनों के लिए बेहतर होगा. आपके लिए – ख़ासकर.”  “ईमानदारी से कहूँ, तो जी नहीं चाहता.”  “जान लीजिए कि क्या बात है. ‘जी नहीं चाहता’ को छोड़ दीजिए. हम कोई बच्चों के खेल तो नहीं खेल रहे हैं.”

 “कोई संख्या सोचिए,” थके हुए सुर में कपितोनव  कहता है, “दो अंकों वाली.”  “और?”  “उसमें सात जोड़िए.”  “पाँच क्यों नहीं?”  “क्योंकि सात ही जोड़ना है.”

 “जोड़ दिए.”  “दो घटाइए.”  “मान लेते हैं.”

 “क्या ‘मान लेते हैं’? आपने 99 सोचा था.”  “इसमें क्या जादू है?”  “आपने 99 सोचा था,” कपितोनव  ने दुहराया.

 “ये तो कोई मच्छर भी समझ सकता है. जो कुछ भी हुआ, उसके बाद मैं और क्या सोच सकता था?”  “जो कुछ हुआ, उसके बाद आपने 99 का अंक सोचा, इसमें मेरा कोई क़ुसूर नहीं है.”  “मैं आप को क़ुसूरवार घोषित भी नहीं कर रहा हूँ.” ये आख़िरी वाक्य कुछ ज़्यादा कठोरता से कहा गया था – उसका लहज़ा मतलब से मेल नहीं खा रहा था.

 “पहले किसी ने भी 99 नहीं सोचा था. वो पहला था.” मगर ये स्वीकारोक्ति के समान प्रतीत हुआ. कपितोनव को स्वयम् से ऐसे लहज़े की उम्मीद नहीं थी.  “मैं दूसरा हूँ,” इन्वेस्टिगेटर कहता है. “तो एक छोटी सी प्रॉब्लेम है. उसने सोचा 99 – और वह मॉर्ग (मुर्दाघर) में है, और मैंने सोचा – 99 – और आप देख रहे हैं, कि ज़िन्दा हूँ, तन्दुरुस्त हूँ, मेज़ के पीछे बैठा हूँ और आगे भी ज़िन्दा रहना चाहता हूँ. क्या आपको ये अजीब नहीं लगता?”     “आप मुझसे क्या सुनना चाहते हैं? आपको क्या चाहिए? आप मुझसे क्या निकलवाना चाहते हैं?”  “नहीं, कुछ भी निकलवाना नहीं चाहता. सिर्फ, इस बात पर ज़ोर देना, कि उसने 99 ही सोचा था – जल्दबाज़ी होगी. आप इस बारे में बहुत ज़्यादा सोच रहे हैं.”  “उम्मीद करता हूँ कि जाँच हो चुकी होगी. क्या मृत्यु के कारण का पता चला?”  “मृत्यु के कारण का यहाँ क्या काम है? उसके बारे में तो आप के बिना भी फ़ैसला कर लेंगे.”

 इन्वेस्टिगेटर मेज़ की दराज़ बाहर निकालता है, वहाँ से हाइजिनिक नैपकिन्स का पैक निकालता है, एक नैपकिन लेकर उसमें नाक छिनकता है, डस्ट-बिन में फेंकता है.  “आयडिया ये है कि आपसे ये ग्यारंटी ली जाए कि आप शहर छोड़कर बाहर नहीं जाएँगे. मगर, आप यहाँ, मेरे सामने, आए ही क्यों? जाइए अपने...मालूम नहीं, कहाँ. मगर पहले लिख कर – सब कुछ, जैसा हुआ था.”           कपितोनव  के सामने कोरा कागज़ पड़ा है.  “ठहरिए. मैं समझ सकता हूँ कि आप क्या लिखने वाले हैं. बाद में प्रॉब्लेम सुलझा नहीं पाएँगे. आप लिखिए - सारांश में, मोटे तौर पर. बात कर रहे थे. और अचानक उसकी तबियत बिगड़ गई. वो मर गया.”  “बिना जादू के?”  “बिल्कुल बिना जादू के,” इन्वेस्टिगेटर कहता है. कपितोनव चार वाक्यों में घटनाओं का स्पष्टीकरण देता है – संक्षेप में, स्पष्ट तौर पे. 

 “और ये किसलिए? ये कोष्ठक?” -  इन्वेस्टिगेटर ने टेक्स्ट के आरंभ में और फिर अंत में भी धनु-कोष्ठक देखे. हस्ताक्षर के साथ क्या हुआ? क्या आप हमेशा धनु-कोष्ठकों के बीच में हस्ताक्षर करते हैं? किसलिए?”  “चलता है,” कपितोनव  कहता है. 

13.45


अचरज की बात ये नहीं थी कि वह हवाई अड्डे पर वक़्त से पहले पहुँच गया, अचरज की बात ये थी कि मेटल-डिटेक्टर की कमान के पार जाना संभव नहीं हो रहा है. उसने मोबाइल फ़ोन बाहर निकाल कर रख दिया है, और जेब से सारी चिल्लर निकाल दी है, और बेल्ट भी उतार दिया है, मगर ये बेवकूफ़ कमान बजे जा रही है, बजे जा रही है.  “शायद आपके जिस्म में कोई धातु फ़िक्स की गई हो?” और यहाँ कपितोनव पल भर के लिए कांप गया – उसे शक हुआ कि कहीं ये भेस बदले हुए माइक्रोमैजिशियन्स उसे फ़ेस-, मेटल- आदि जाँचों से नहीं गुज़ारेंगे: और, वाक़ई में, पेट में भारी ‘नट’ का पता लगा लेंगे, जिसके बारे में एक बुरे ख़याल ने उसे परेशान कर रखा था.

हाथ वाले मेटल-डिटेक्टर से गुज़र रहे कपितोनव  के जिस्म का एक भी हिस्सा नहीं झनझनाता – जैसे कपितोनव के भीतर कोई प्रतिक्रिया आरंभ हो गई है, जो सन्देहास्पद कारणों को निष्क्रिय कर रही है.

मगर सभी कारणों को नहीं. उसे इन्ट्रोस्कोप से गुज़रते हुए पर्स को खोलने के लिए कहा गया. उसमें छोटी सी ब्रीफ़केस क्यों रखी है? इसलिए, कि पूरी तरह पर्स में समा गई, और कपितोनव  ने एक लगेज कम करने का फ़ैसला कर लिया. ये तो अच्छा हुआ कि ब्रीफ़केस में ऐसी कोई चीज़ नहीं है – कैबेज के कटलेट्स भी नहीं हैं. 

कपितोनव  ख़ुद भी नहीं जानता, कि इस ब्रीफ़केस को वह मॉस्को क्यों ले जा रहा है. क्या उसे इस ब्रीफ़केस की ज़रूरत है? मगर अब इसे हवाई अड्डे की बिल्डिंग में भी तो नहीं छोड़ा जा सकता. वह वहाँ से दूर नहीं जा पाया – अजीब सी यूनिफॉर्म में गश्ती दल के दो आदमियों ने पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा. एक के हाथ में जंज़ीर से बंधा कुत्ता था, जो कुछ कर सकता था – कम से कम अनगिनत पैसेंजर्स का ध्यान तो अपनी ओर आकर्षित न करे.   “क्या मुझमें कोई कमी नज़र आ रही है?” कपितोनव  स्वयम् पर ध्यान न देने की, और अपनी तरफ़ से – कुत्ते का ध्यान आकर्षित न करने की कोशिश करते हुए पूछता है.        

  “क्या आपको यक़ीन है, कि ये पासपोर्ट आपका है?”  “वहाँ मेरी फ़ोटो है!”  “सिर्फ इसीलिए?” ये तो अच्छा है कि कुत्ता उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा है.

 “और हस्ताक्षर!” धारक को पासपोर्ट लौटा देते हैं:  “हैप्पी जर्नी, येव्गेनी गिन्नाद्येविच.” रजिस्ट्रेशन बिना किसी झंझट के पूरा हो गया. कॉफ़ी पीने लायक समय है, मगर एक फ़ेस-टू-फ़ेस मुलाक़ात ने इससे भी परावृत्त कर दिया:  “वॉव! क्या बात है?”

ज़िनाइदा और झेन्या, उसका डाउन बेटा.   “आपकी मैथेमेटिक्स वाली कॉन्फ़्रेन्स कैसी रही?” ज़िनाइदा दिलचस्पी दिखाती है.  “ठीक रही. और आप यहाँ क्या कर रही हैं?” ”हाँ, देखिए, सब गड़बड़ हो गया, बहन को स्ट्रोक आ गया, फ़ौरन वरोनेझ की फ़्लाइट पकड़नी है. और वहाँ से फिर घर, जैसे भी होगा.” 

 “आप क्या कह रही हैं! रुकिए, आपकी बहन तो पीटर्सबुर्ग में है.”  “ये दूसरी है.”  “अफ़सोस है,” कपितोनव  कहता है. “लगता है कि आप सिर्फ एक दिन पीटरबुर्ग में रहीं?”  “कआब्लिक, कआब्लिक!” हमनाम येव्गेनी चहकता है. कपितोनव उससे कहता है:  “कआब्लिक देखा?”  “क्या तुमने कआब्लिक देखा?” सवाल कपितोनव की ओर मुड़ जाता है.  “कैसे नहीं देखता,” कपितोनव कहता है. याद आता है.   

“ये ले. अब ये तेरी हो गई.” छड़ी लेकर, हमनाम झेन्या उसे ऐसे झटकता है, जैसे वो थर्मामीटर हो, और कुछ अपना ही, समझ में न आने वाला, बड़बड़ाने लगता है.  “लिखा है, कि जादुई है.”  “मैं समझ रही हूँ,” ज़िनाइदा खोई-खोई सी मुस्कुराती है. “मगर आपने ‘सिर्फ एक दिन’ क्यों कहा? हम तो यहाँ एक हफ़्ते से ऊपर रहे.”  “क्या मैं आपके साथ यहाँ परसों नहीं आया था – इस शनिवार को?”  “इस शनिवार को कैसे?...इस शनिवार को नहीं, बल्कि उस शनिवार को...आप क्या मज़ाक कर रहे हैं?” कपितोनव  मज़ाक नहीं करता. जब और लोग मज़ाक कर रहे होते हैं, उसने, शायद, समझना बन्द कर दिया है. वह बिदा लेकर वहाँ से चल पड़ता है. 

14.18


कपितोनव डिपार्चर हॉल में बैठा है, बेटी को मैसेज भेजना चाहता है. न जाने क्यों उसे लगता है कि अपने पहुँचने के बारे में उसे बता देना चाहिए. कुछ ऐसे: “फ्लाइट से आ रहा हूँ.” या ऐसे: “डिपार्चर हॉल. जल्दी.”

जल्दी ही सभी इलेक्ट्रिक उपकरणों को बन्द करने की घोषणा की जाएगी. डिपार्चर हॉल में कुछ लोग जल्दी-जल्दी जी भरके बात कर लेना चाहते हैं. मुफ़्त अख़बारों वाले स्टैण्ड के पास बच्चे भाग रहे हैं. शीशे के पार काला आसमान है. हवाई जहाज़ हर मौसम में टेक-ऑफ़ करते हैं. 

{{{‘तालाब’ कौन है?}}}

ये मरीना है. ये जानती है कि आपकी विकेट कैसे डाउन की जाए. कपितोनव  फ़ौरन जवाब नहीं देता.  {{{ वो मर गया. तुम क्यों पूछ रही हो?}}}

मरीना – उसे:  {{{ वो ज़िन्दा है.}}}    

उसे फिर से ऐसा लगता है कि पेट में एक भारी ‘नट’ है.

 {{{ क्या तुम्हें यक़ीन है?}}}

इंतज़ार करता है. जवाब आता है. {{{ वो मेरे मूखिन का भाई है और वे दोनों मंगोलिया में रहते हैं, खदान में काम करते हैं.}}}

 “आसमानी क्षेत्र,” कपितोनव  ज़ोर से पराई आवाज़ में कहता है. मैसेज आता है: {{{ थैंक्यू.}}}

{{{ किसलिए?}}}

जवाब आता है:  {{{ हर चीज़ के लिए.}}} 

कपितोनव मोबाइल स्विच-ऑफ़ कर देता है. कुछ करना चाहता है. फिर से ‘ऑन’ करता है. आन्का को लिखता है: 

{{{ तुमसे बहुत प्यार करता हूँ}}} क्या ‘पापा’ शब्द लिखे? मगर सोचता है: समझ जाएगी. फ्लाइट के तीस मिनट लेट होने की घोषणा होती है. अब ये और किसलिए? क्या हो गया? क्या हो रहा है?  ‘और मैं भी तुमसे बेहद.’ सिर्फ टेक्स्ट – बिना कोष्ठकों के.  

वह उठकर हॉल में घूमने लगता है – इस डिपार्चर हॉल में, इंतज़ार करता है. घड़ी की तरफ़ देखता है. 



****

 

           

   


















टिप्पणियाँ


1. सप्सान – मॉस्को से पीटर्सबर्ग जाने वाली फ़ास्ट ट्रेन. 

2. एडमिरैल्टी – पीटर महान द्वारा बनवाई गई एक बिल्डिंग, जिसके सुनहरे गुम्बज़ पर एक छोटा सा जहाज़ है. 

3. ईवेंट्स-आर्किटेक्ट – इस व्यक्ति ने अपना कुलनाम यही बताया है. 

4. तालाब – रूसी में ये नाम है वदायोमव, जिसका तात्पर्य है तालाब. चूँकि उपन्यास में ऐसे कई कुलनाम हैं, जिनका उस वस्तु के गुणों से संबंध है. इसीलिए अनुवादिका ने नामों का भी अनुवाद किया है. 

5. नेक्रोमैन्सर - ओझा   

6. काल-भक्षक –  ये वाक़ई में समय भक्षण करता था. 

7. काला-वन – इस जादूगर का भी असली नाम नहीं दिया गया है. 

8. कार्ड – रूसी शब्द है ‘कार्ता’ जिसका एक और अर्थ होता है – नक्शा. जब इसके साथ ‘खेलने वाला’ जोड़ दिया जाता है, तो यह ‘ताश का पत्ता’ बन जाता है. 

9. एव्गेनी को प्यार से संक्षेप में ‘झेन्या’, ‘झेनेच्का’ भी कहते हैं.

10. पीटरबुर्ग को बोलचाल में अक्सर पीटर कह देते हैं 

11. योघर्ट - चूंकि बात तोडोर के सही उच्चारण की हो रही है, अत: इस शब्द को वैसे ही रहने दिया है, जैसा मूल पाठ में है. ‘दही’ शब्द के प्रयोग से स्वराघात वाली बात स्पष्ट नहीं हो सकती थी.  

12. आइसिकल्स - क्रमशः टपकते हुए जल बिन्दुओं के जमने से बनी बर्फ की छड़ी, बर्फ की कलम.

13. लैब्नित्ज़ (1646-1716) – प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक एवम् गणितज्ञ, मैथेमेटिक्स के इतिहास में इनका महत्वपूर्ण स्थान है.

14. रीगेंट - एक रासायनिक पदार्थ

15. सार्डीन – एक प्रकार की छोटी मछली, जो प्रायः डिब्बा-बन्द की जाती है.

16. ‘सेका’ – ताश का एक खेल जो सोवियत संघ में लोकप्रिय था.  

17. “फूल” – यह भी ताश का एक आसान खेल है. 

18. एक हाथ का डाकू – कैसीनो में खेला जाने वाला जुए का खेल. इसे ऑनलाइन भी खेला जाता है. 

19. मख्खी – रूसी में मक्खी के लिए शब्द है – मूख़ा. मूखिन इसी से बना है. 

20. लूडोमैनिया – लूडो खेलने की सनक 

21. रूलेट – जुए का एक खेल-विशेष 

22. ज़्याब्लिक – चैफ़िन्च ( ब्रिटेन में पाई जाने वाली) छोटी गाने वाली चिड़िया

23. नार्सिसिस्ट – स्वयम् पर मोहित होने वाला. 

24. कपितोन – यहाँ कपितोनव  से तात्पर्य है. 

25. आर्टिस्ट-पेरेद्विझ्निक – उन्नीसवीं शताब्दी के रूसी वास्तववादी स्कूल का पेंटर, जिनमें लोकतंत्रिक झुकाव भी था.

26. फ़िबोनाची क्रम -  लिओनार्दो फिबोनाची द्वारा आविष्कृत संख्याओं का निम्नलिखित अनुक्रम फिबोनाची श्रेणी (Fibonacci number) कहलाता हैं:

 

  परिभाषा के अनुसार, पहली दो फिबोनाची संख्याएँ 0 और 1 हैं। इसके बाद आने वाली प्रत्येक संख्या पिछली दो संख्याओं का योग है। कुछ लोग आरंभिक 0 को छोड़ देते हैं, जिसकी जगह दो 1 के साथ अनुक्रम की शुरूआत की जाती है।

27. एमिल्या  - ‘मूर्ख एमिल्या और मछली’ नामक रूसी लोक कथा का पात्र.

28. श्राम – इस शब्द का मतलब है – घाव आदि का निशान

29. फ़ेरो ख़ुफ़ू – प्राचीन इजिप्ट का शासक, जिसे पिरामिड्स बनवाने का श्रेय जाता है.

30. बोत्तिचेल्ली (1445-1510) – रेनासां कालखण्ड का प्रसिद्ध इटालियन चित्रकार. 

31. मेदूसा गॉर्गोन – ग्रीक पौराणिक कथाओं की पात्र, जो शैतान थी. उसके सिर पर बालों के स्थान पर साँप थे. जो भी उसकी तरफ़ देखता, वह पत्थर बन जाता. पर्सियस ने उसका सिर काटकर अपने शत्रुओं के ख़िलाफ़ ढाल के रूप में उसका उपयोग किया था.

32. ब्लैकजैक – कैसिनो में खेला जाने वाला ताश का लोकप्रिय खेल. 

                 






अनुवादिका के बारे में

आ. चारुमति रामदास का सन् 1945 में नागपुर में जन्म. सन् 2010 में अंग्रेज़ी तथा विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद  से  सेवानिवृत्त.

रूसी साहित्य के हिंदी अनुवाद में सक्रिय. प्रमुख अनुवाद हैं :

“कसांद्रा दाग” – चिंगिज़ आइत्मातव

“नास्टर और मार्गारीटा” – मिखाइल बुल्गाकव,

“प्रतिनिधि कहानियाँ”, “प्रेम कहानियाँ” - अलेक्सान्द्र पूश्किन

“गाँव” – इवान बूनिन

“वड़वानल” (मराठी से हिंदी में) – राजगुरू दत्तात्रेय आगरकर

फ़िलहाल बच्चों के लिये रूसी बाल-साहिय का अनुवाद कर रही हैं.



                       

                     

                

  

         

    

                 

    


  

                      


 

    

                                          

              

                                                                   

            

                       


         

                        

              

 

      

       

         

     

 

        

      

                            

   

     

                               

                        

                                                                              

  

          

                                  


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