गुरुवार, 24 सितंबर 2015

Curly Brackets - 04


 कपितोनोव अपेक्षा कर रहा था कि यह तथाकथित ‘बिग’ हॉल वाक़ई में बड़ा होगा – वह बड़ा इसलिए भी लग रहा था कि कॉन्फ्रेन्स के अधिकांश डेलिगेट्स इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में नहीं आए थे.
कपितोनोव अंतिम पंक्ति के किनारे पर बैठ जाता है, यहाँ से उसे सिर्फ इधर-उधर बैठे दर्शकों के सिर ही दिखाई दे रहे हैं. चेहरे तो वह सिर्फ उन्हींके देख सकता है जो कोने वाले दरवाज़े से भीतर आ रहे हैं, - फिर, उसने ब्रोश्यूर में दी गई तस्वीरों को इतने ध्यान से नहीं देखा था कि भीतर आते हुए लोगों में से किसी को तो पहचान सके. मगर, क्यों : ये रहा माइक्रोमैजिशियन अस्त्रोव, वही, फ़ोटो में जिसकी मुस्कान को उसीकी धृष्ठ नज़र ने बर्बाद कर दिया था. अब अस्त्रोव के चेहरे पर शांति और निडरता थी. और आम तौर से, वे हॉल में निर्विकार चेहरों से ही प्रवेश करते हैं. या तो उच्च कोटि की कला से मुलाक़ात जारी रखने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे होते हैं, या फिर पहले अंक से भावविभोर हो चुके हैं.
सब बैठ गए, और लाईट बुझ जाती है.
स्टेज पर हैं दो जवान व्यक्ति, जो निश्चित रूप से अठारहवीं सदी के कपड़ों में नहीं हैं. लड़का कुर्सी पर बैठकर हॉल की तरफ़ देख रहा है, और लड़की उसकी पीठ के पीछे खड़ी कैंची की आवाज़ करती है, यह दर्शाते हुए कि बाल काटे जा चुके हैं.
लड़की ने पहनी है सफ़ेद गोलों वाली नीली स्कर्ट, फ़ुटबॉल-जर्सी, और वह नंगे पैर है. लड़के ने क्या पहना है, इस पर कपितोनोव ध्यान नहीं देता – कोई भूरी स्पोर्ट्स-शर्ट थी.
वह बोली:
 “कोई बात नहीं. बेहद अच्छा है. घबराओ नहीं, मैंने थोड़ा-थोड़ा. अब तुम वैसे ही हो, जैसे महीना भर पहले थे...तो, तुम्हें याद है, जब...”
वह बोला:
 “अगर पारिभाषिक शब्दावली से चिपके रहें, तो कह सकते हैं कि आज हमारा ‘मधु-मास’ पूरा हो गया.”
वह बोली:
 “बेवकूफ़ नाम है. और, कुछ भी पूरा नहीं होता...”
गले पे लपेटे हुए तौलिए से उसे मुक्त करके वह कहती है:
 “जाओ, आईने में देख लो.”
वह जवाब देता है:
 “ज़रूरत नहीं है. मुझे तुम पर यक़ीन है.”
 “बाथरूम में जाओ,” वह कहती है, “आलस न करो, आईने में देख लो.”
 “जाकर क्या टपकती हुई छत देखूँ? आज ये देखने का दिन नहीं है कि छत से कैसे पानी टपकता है...”
फिर भी वह उठकर एक ओर को जाता है, ये दिखाते हुए कि ख़ुद को आईने में देखने के लिए बाथरूम में गया है. इस बीच लड़की पुराने टेलिफ़ोन पर नंबर घुमाती है और प्लम्बर को बुलाती है.
कोई भी गाता नहीं है.
ये तो ऑपेरा जैसा नहीं है.
 “प्ल-अ--म्ब-अ-र” वह जैसे बाथरूम से आवाज़ देता है. – “ये शब्द हमें कितना बोरिंग लगता है, मगर तुम सुनो, वह महान लगता है, एकदम शानदार. प्ल-अ--म्ब-अ-र!”
लड़की उससे कहती है:
 “कभी कभी मुझे ऐसा महसूस होता है...कि हम पूरी तरह से किसी न किसी पर निर्भर हैं... मानो हम किसी अजीब ही दुनिया के हैं, जिसे किसी ने सोचा था...”
कपितोनोव फ़ैसला करता है, कि ये आधुनिक ऑपेरा है. ड्रामा के तत्वों सहित. अब वे गाना शुरू करेंगे.
 “मैं नहीं जानता कि ये आत्मनिर्भरता वाली बात क्या है,” ख़यालों में डूबकर नायक कहता है, “मगर हम वाक़ई में सही अनुपात में सोचे गए हैं. तुम मुझे सोचती हो, मैं – तुम्हें, हम दोनों को – मान लो, ग्रीशा ने, जिसे सोचा था आस्या ने. हम सब एक दूसरे को सोचते हैं, एक दूसरे की कल्पना करते हैं. ये नैसर्गिक है. हम, ज़ाहिर है, हैं, मगर महत्वपूर्ण बात ये नहीं है, कि हम कैसे हैं, बल्कि ये है, कि हम एक दूसरे को कैसे देखते हैं, एक दूसरे की कैसी कल्पना करते हैं...”
 “और, नतीजा ये निकलता है कि तुम किसी प्लम्बर की कल्पना का फल हो.”
आस पास के लोगों की प्रतिक्रिया देखने के लिए कपितोनोव इधर उधर नज़र घुमाता है, ये भूलकर कि वह अंतिम पंक्ति में है.
इस बीच कलाकार स्टेज पर प्यार के बारे में बातें करते हैं. लड़की पूछती है:
 “ऐसा क्यों है, कि जब प्यार करते हो, तो एडवेन्चरस महसूस करते हो?”
वह समझाता है कि वह कारनामा, जो उसने किया था, (ज़ाहिर है, पहले अंक में), बिल्कुल एडवेन्चर नहीं था. इस पर वह कहती है:
 “कभी कभी मैं कल्पना करती हूँ कि बैंक-रॉबर बन गई हूँ. सांताक्लाज़ का मास्क पहन कर घुस जाती हूँ: सब खड़े हो जाओ! ...ये डाका पड़ रहा है!...जिससे कहा है, वो लेटा रहे!... कोई अपनी जगह से न हिले!”
तब लड़का भी चिल्लाता है, जैसे वह भी खेल में शामिल हो गया हो:
“हाथ सिर के पीछे!...कोई हिले नहीं!... बटन से हाथ हटा, तेरी माँ..., क्या पागल है!...”
 स्टेज पर कोई बटन-वटन नहीं है.
हालाँक़ि कपितोनोव दर्शकों के चेहरे नहीं देख सकता, मगर वह समझ रहा है कि वे बेचैन नहीं हो रहे हैं. उन्होंने पहला अंक देखा था, मगर कपितोनोव को इसका ओर-छोर तक पता नहीं है. संभव है कि वे अभी गाने भी गायेंगे और शायद केलिओस्त्रो भी प्रकट हो जाए.
अब स्टेज पर एक तीसरा, बड़ी उम्र का, व्यक्ति प्रकट होता है – स्पष्ट है कि वह केलिओस्त्रो नहीं है. उसके हाथों में चेस-बोर्ड है, वह प्रकट में सोचता है:
 “स्ट्राँग मूव. इसका जवाब सोचना पड़ेगा...”
लड़की:
 “संगीतकार, महाशय!”
वह उसे सुधारता है:
 “संगीत-निर्देशक.”
 “संगीत-निर्देशक महाशय, क्या मैं आपके बाल काट दूँ?”
आगे हो रही बातचीत से कपितोनोव समझ जाता है कि संगीत-निर्देशक इन नौजवान लोगों के घर में रहता है, क्योंकि उसकी चाभी खो गई है. और अब वह, न जाने क्यों गार्डन की ओर चला जाता है.
 कपितोनोव अपनी ही पंक्ति में दो सीटें खिसक जाता है और सामने की ओर झुककर सबसे पास वाले दर्शक से पूछता है:
 “ये ऑपेरा तो नहीं है?”
उसने जवाब दिया:
 “और बैले भी नहीं है.”
 कपितोनोव कुर्सी की पीठ से टिक जाता है. अच्छा-अच्छा.
 “मेरे दिल में उन सबके प्रति गहरे सम्मान की भावना होती है, जिनकी चाभियाँ खो जाती हैं,” – नायिका कहती है. “मैं अपने पिता को भूलने लगी हूँ, मैं सात साल की थी, जब वह डूब गए थे. और, मम्मा के साथ मेरे...ऊँ... पता नहीं, हमारे संबंधों को क्या नाम दूँ...आदर्श. बस, आदर्श तरह के संबंध हैं. कभी कभी तो मुझे डर भी लगने लगता है कि मेरे और उसके बीच सब कुछ कितना अच्छा है...”
 “ऐसा कम होता है...और चाभियों का क्या?”
कपितोनोव आँख़ें बन्द कर लेता है, क्योंकि नायिका कोई किस्सा सुनाने जा रही थी, और उसकी आवाज़ सुखद, ढाढस बंधाती सी थी.
 “मुझे तो, असल में, इस दुनिया में होना ही नहीं था. मैं तो संयोगवश ही पैदा हो गई. अगर मेरे पापा सही समय पर भले लोगों के साथ वोद्का न पी रहे होते और अगर उनकी चाभियाँ न खो गई होतीं, च्-च्, तो अंजेलिनोच्का इस दुनिया में न होती...कुछ लोग नशे के कारण गर्भ में आते हैं, मगर मुझे नशे के कारण माँ के गर्भ में सुरक्षित रखा गया. अपने जन्म के लिए मैं पापा के नशे की आभारी हूँ. और चाभियों के खो जाने की.”
 “क्या पहेलियों में बात कर रही हो...” उसका साथी कहता है, जैसे वह कपितोनोव के अनचाहे विचार को दुहरा रहा हो.
आगे की बात कपितोनोव ने आँखें बन्द करके सुनता है:
 “वे मुझे नहीं चाहते थे, यही सारी पहेली है. व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं, बल्कि बच्चे ही नहीं...मेरे साथ सब कुछ नॉर्मल ही था...जब मैं पैदा हुई थी. मगर तब, मम्मा क्लिनिक में पड़ी थी, मुझसे छुटकारा पाने के लिए. और, पापा के पास घर पे दोस्त आ गए और वोद्का पीना शुरू कर दिया. फिर किसीने पूछा: तेरी अल्योना कहाँ है, क्या काम पे गई है? पापा ने बता दिया कि कौनसे काम के लिए गई है. अस्पताल में है – एबॉर्शन करवा रही है. दोस्त बोले, तूने बेवकूफ़ी की जो उसे अस्पताल भेज दिया, बच्चा पैदा करने दे, बोले. तुझे क्यों चाहिए एबॉर्शन?...क्या सठिया गया है? बच्चे – जीवन का प्रकाश होते हैं, बच्चे – बढ़िया बात है!... उसे फ़ौरन वापस ले आ, बेवकूफ़!...वो बोले, छोकरों, देर हो गई है, बोले, ट्रेन तो छूट गई. कोई देर-वेर नहीं हुई, पट्ठे. टैक्सी ले और चला जा!...नहीं, बोले, देर हो गई, पहले जाना चाहिए था. बेहतर है कि अल्योना की सेहत के लिए पिएँ, और आप सबके लिए, और धरती के सभी प्राणियों की सुख के लिए, और उनके लिए, जो समन्दर पे हैं...और जो समन्दर पे नहीं हैं...मतलब, उन्होंने जितनी भी वोद्का थी, पी ली, दोस्त घर जाने लगे, वह दरवाज़े पर उनसे बिदा लेने लगा, साथ जाना चाहता था, मगर तभी पता चला कि उसके पास चाभियाँ ही नहीं हैं. खो दीं. बोला, अल्योना के पास उसकी चाभियों के लिए जाना पड़ेगा, वर्ना बिना चाभियों के कैसे...अंकल झोरा घर पे रुक गए, ड्यूटी पे. और अंकल पेत्या और मेरे पप्पा ने टैक्सी ली और चल पड़े क्लिनिक. क्लिनिक पहुँचे, मम्मा को नीचे बुलाया, वो सीधे क्लिनिक के गाऊन में ही नीचे आ गई. क्या हुआ, क्या बात है? वे नशे में थे, बहक रहे थे. कुछ भी नहीं हुआ, चाभियाँ खो गई हैं, तुम्हारी वाली दो. मगर फिर उन्होंने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को इशारा किया: ये होती है किस्मत. ठीक है, प्रोग्राम बदल गया, हम तुम्हें लेने आए हैं. ये तुम्हारा मामला है. वह जैसी थी, वैसे ही उठाकर उसे टैक्सी में डाल दिया. अगर, ज़रा भी रुकते, तो देर हो जाती. बस, यही क़िस्सा है. उसे घर लाए. और दूसरे दिन मेरे पप्पा क्लिनिक गए उसका सामान लेने, पूरे होश में. और हाँ, चाभियाँ दूसरे कोट में मिल गईं”.
 “मम्मा ने बताया?” नायिका का साथी मानो कपितोनोव के दिल की बात पूछ लेता है.
 “मुझे – मम्मा ने, और उसे – अंकल झोरा और अंकल पेत्या ने, और मेरे पप्पा ने भी...झूठ नहीं बोलने दिया. जब मैं सत्रह साल की हुई तो उसने मेरे जन्म का रहस्य बता दिया. भावविह्वल होकर. वह मुझसे बहुत प्यार करती है. तेरे बिना ज़िन्दगी की कल्पना भी नहीं कर सकती, बच्ची. असल में मुझे जन्म दिन नहीं मनाना चाहिए, बल्कि एबॉशन से बचने का दिन मनाना चाहिए. जान बचने का दिन. ये कब हुआ था: अप्रैल के अंत में, बसंत में. ये, बस, चमत्कार ही है, कि मैं हूँ”.
 “ग्रेट.”
 “मैं भी सोचती हूँ, ग्रेट.”
 ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, बुरी कहानी नहीं है’, कपितोनोव सोचता है, उसने महसूस किया कि वह अभी तक सोया नहीं, और मुश्किल से ही सो पाएगा, मगर, ख़ैर, वह आँखें बन्द किए ही सुनता रहता है.
 “सुनो...चमत्कार के बारे में,” नायक ने कहता है और अचानक बढ़ते हुए जोश से सुनाने लगता है. “ मैं कभी कभी अपने जन्म के बारे में सोचता हूँ – बदन पे जैसे चीटियाँ चलने लगती हैं!... बाप को जवानी में चाकू घोंप दिया था. दादा लड़ाई पे थे, सिर ज़ख़्मी हो गया था...और, हर पुरखे के साथ, शायद, ऐसा ही कुछ-कुछ हुआ था...मगर मैं दूसरे ही बारे में, ऐसे हालात के बारे में, जो जीवनी से संबंधित नहीं थे....बस! और वे सौ करोड़ हैं. सब किसी न किसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं. मगर लक्ष्य प्राप्त करता है सिर्फ एक. इकलौता एक!...”
 “तुम किसके बारे में कह रहे हो?”
 “स्पर्म्स के बारे में.”
कपितोनोव ने आँखें खोल दीं.
कोई नई बात नहीं है. स्टेज पर दो व्यक्ति हैं. वे बातें कर रहे हैं.
वह अपनी बात जारी रखता है:
 “और सिर्फ इसी निश्चित स्पर्म की बदौलत उत्पन्न होता हूँ, ख़ास मैं. कोई और नहीं, बल्कि सिर्फ मैं! अगर कोई आगे निकल जाता, सौ करोड़ में से कोई भी, तब मेरा ‘डबल’ होता, मतलब, मेरा भाई, उसी वंश परम्परा के साथ...जैसे जुड़वाँ – वैसा ही, जैसा मैं हूँ, मगर मैं नहीं!...”
 “अगर कोई और तुमसे आगे निकल जाता और तुम तुम न होते? क्या तुम्हें यक़ीन है, कि तुम नहीं?”
 “दूसरा, एंजेलिना, दूसरा! मेरी बात सुनो. एक विशिष्ठ इन्सान अपने स्वरूप के लिए किसी विशिष्ठ स्पर्म की सफ़लता का आभारी होता है. मान लो, गर्भधारणा तो किसी भी हालत में हो ही जाती है, मगर इस बात की कितनी संभावना है कि वह गर्भ मेरा ही है – वैसा नहीं, जैसा मैं हूँ, बल्कि सिर्फ मैं?... अत्यंत ही अल्प संभावना होती है!...अण्डाणु के बारे में चुप ही रहूँगा...इस उद्देश्य से कि मेरा निर्माण हो, सिर्फ मेरा, जो इस समय तुम्हारे सामने खड़ा होकर हाथ नचा रहा है, दो विशिष्ठ सेल्स को, सूक्ष्म...अति सूक्ष्म...अत्यंत सूक्ष्म सेल्स को मिलना पड़ता है...सिर्फ उन्हीं दो को, किन्हीं और को नहीं – उनके जैसे अनगिनत सेल्स में से!...और यदि उस बात पर ग़ौर किया जाए, जो तुमने कही थी...ये सारे जीवन संबंधित केसेज़...तो क्या परिणाम निकलता है?... कोई एकदम बेमलब की बात!...ये सारे युद्ध, महामारियाँ, एबॉर्शन्स, दुर्घटनाएँ...असफ़ल माता-पिता की असमय हुई मौतें – ये सब हमारे विरुद्ध है, सब हमारे ख़िलाफ़ है, व्यक्तियों के ख़िलाफ़ – वास्तव में अवतरित हुए लोगों के ख़िलाफ़!...हम ख़ुद कोई अवतार धारण करने में असमर्थ हैं!...समझ रही हो, एन्जेलीनूश्का? तुम असमर्थ हो. और मैं भी असमर्थ हूँ.”
 “मगर हमने तो जन्म लिया है. और, सभी जन्म लेते हैं.”
 “लोग जन्म लेते हैं, ये एक सामान्य बात है, इसमें कोई अजीब बात नहीं है. अजीब बात कुछ और है : वो ये कि इन जन्म लेने वालों में तुम हो, मैं हूँ, मिसाल के तौर पर, आस्या है, जो इस समय अपनी स्कीज़ पर पहाड़ से नीचे उतर रही है, ग्रीशा है, जिसकी कुर्सी की पीठ उसने तोड़ दी और जिसे संगीतकार बाग में घुमा रहा है...किसी फ्रिज के लिए खिड़की से बाहर छलांग लगाना आसान है, बनिस्बत मेरे और तुम्हारे धरती पर जन्म लेने के! हमारे जन्म लेने की संभावना – बिल्कुल शून्य है! ये आश्चर्य है, प्राकृतिक आश्चर्य!”
“और हमने एक दूसरे से मिलने की अक्लमन्दी भी दिखाई!” वह चहकी.
कपितोव का फ़ोन साइलेन्ट मोड़ पर कसमसा रहा है. अब, स्टेज पर अचानक म्यूज़िक और कुछ चकाचौंध होने लगती है. बाहर जाने का दरवाज़ा बगल में ही है: कपितोनोव उछलता है – और बाहर लॉबी में निकल जाता है.
मरीना का फ़ोन है.

20.42           


“झेनेच्का 10, नमस्ते, प्यारे, सिर्फ ये मत कहो कि तुम पीटर11 में नहीं हो.”
 “तुम्हें कैसे पता मरीना?”
 “अरे, तुम्हारी कॉफ्रेन्स के बारे में दिन भर ‘समाचारों’ में दिखा रहे हैं. तुम्हारे उस बेवकूफ़ बॉम्ब के कारण... कहीं ये तुम्हारी हरकत तो नहीं है?”
 “मेरी? मैं तो अभी शाम को आया हूँ, मुझे ख़ुद भी कुछ पता नहीं है. मगर, तुम्हें किसने बताया कि मैं डेलिगेट हूँ?”
 “ख़ुद ही अंदाज़ लगाया.”
 “नहीं, ये नहीं हो सकता.”
 “ओह, तुम्हारा ज़िक्र किया गया था,...स्पेशलाइज़ेशन के साथ...बोले कि संख्या बूझने वाला भी है. मैं समझ गई कि ये तुम ही हो.”
 “बूझने वाले मेरे अलावा और भी हैं. मुझे तो कल सुबह तक पता नहीं था कि कॉन्फ्रेन्स में जाऊँगा.”
 “मतलब, तुम्हारे बारे में मैं तुमसे ज़्यादा जानती हूँ.”
 “चमत्कार की बात है. वैसे, यहाँ अभी-अभी चमत्कार ही की बात हो रही थी...सुनो, ज़िन्दगी कैसी कट रही है?”
 “आ जाओ, ख़ुद ही देख लेना. पति से भी मिला दूंगी. अभी तुम कहाँ हो?”
 “कौन बेवकूफ़ जानता है, कि कहाँ हूँ. ऑपेरा देख रहा हूँ.”
 “मारीन्स्की में?”
 “ओह, नहीं, यहीं हॉटेल में...कोई गेस्ट-रूम जैसी, क्लब जैसी चीज़ है. बिल्कुल ऑपेरा जैसा नहीं है. वे गद्य में बात कर रहे हैं और स्पर्म्स के बारे में...”
 “हो सकता है, लेक्चर हो?”
 “नहीं, मरीना, ‘शो’ है.”
 “वैसे तुम हो कहाँ? हॉटेल का नाम क्या है?”
उसने नाम बताया. स्ट्रीट का नाम भी बताया.
 “ओह, तब तो तुम्हें आने में कोई कठिनाई नहीं होगी.”
वह समझाती है कि कहाँ और कैसे आना है.
 “तुम तो शायद फोन भी नहीं करते. मुझे याद भी नहीं करते.”
 “मरीना, मैं कह तो रहा हूँ कि अभी-अभी पहुँचा हूँ...”
 “ठीक है. बस, सिर्फ कुछ ख़रीदना मत. घर में सब कुछ है.”
कपितोनोव ने फ़ोन रख दिया.
ओल्या-दूसरी (वो ही वाली) सीढ़ियाँ उतर रही है.
 “येव्गेनी गेनादेविच, कितना अच्छा हुआ कि आप यहाँ मिल गए. आप हवाई जहाज़ से मॉस्को जाएँगे. टिकट 14.51 का है, सोमवार को. ठीक है? या रुकना चाहेंगे?”
 “नहीं, थैंक्यू, मंगलवार को मुझे काम पर जाना है. ओल्या! क्या आपको मालूम है कि वहाँ क्या दिखा रहे हैं? ये तो ऑपेरा “केग्लिओस्त्रो” नहीं है?”
 “बदल दिया है. ये नाटक है, “चमत्कार है, कि मैं हूँ.” ये भी जादू और चमत्कारों के बारे में है...क्या आपको पसन्द नहीं आया?”
 “थोड़ा ही देखा, मुझे जाना है.”
21.20

बाहर जाने वाला दरवाज़ा बन्द है, क्योंकि छत से जमी हुई बर्फ गिरा रहे हैं. आँगन में निकलकर कपितोनोव बॉइलर-रूम के पास से जाता है. बर्फ के फ़ाहे स्ट्रीट-लैम्प के नीचे पतंगों जैसे घूम रहे हैं. भूरी बिल्ली उसका रास्ता काटती है.
ये जगह ख़ासकर बिल्लियों वाली है, यहाँ उन्हें, कम्पाऊण्ड की बिल्लियों को, खिलाते हैं. भुने हुए सॉसेज की, और न जाने क्यों गोभी की ख़ुशबू आ रही है.            

21.32

ये है कपितोनोव, और वह रूट-टैक्सी (यहाँ रूट-बस से तात्पर्य है – अनु.) में जा रहा है. आजकल इस शहर में परिवहन के इस साधन को, जैसे कि कपितोनोव को पता चला, कहते हैं “टेश्की” – अक्षर Т के सम्मान में, जिसके पीछे रूट नं. लिखा होता है. ये बात गले से नीचे नहीं उतर रही है. पहले ऐसा नहीं कहते थे, मगर ये तब की बात है, जब कपितोव ख़ुद ही पीटरबुर्गवासी था.
खिड़कियाँ जम गई थीं. खिड़कियों से ये पता लगाना मुश्किल है कि ये पीटरबुर्ग है, मगर सिर्फ उसीके लिए, जो ये नहीं जानता कि किस शहर में जा रहा है.  
क़रीब-क़रीब हर आदमी अपने इलेक्ट्रोनिक खिलौने में व्यस्त है. कुछ लोग इन खिलौनों के माध्यम से किसी से बात कर रहे हैं. स्टीयरिंग पर बैठा ड्राइवर भी (वो अपनी भाषा में), वे भी जो पैसेज में खड़े हैं, बोल रहे हैं  – लगभग आधी बस बोल रही है, और काफ़ी ज़ोर से बोल रही है. मॉस्को में भी ऐसी ही तस्वीर है.
कपितोनोव मोबाइल निकालता है, ये देखने के लिए कि कहीं कोई ‘मिस्ड-कॉल तो नहीं है? चार ‘स्पैम’ हैं. फ़र्नीचर की पेशकश है, फ्लैट्स बेचे जा रहे हैं, एंटेलिया जाने का इनाम है, कुछ और भी है. न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि आन्का का कोई मैसेज ज़रूर होगा. बेटी ख़ामोश है. ठीक है, हम भी ख़ामोश रहेंगे.
            
उसकी बगल में, ज़िन्दा पड़ोसी की ओर ध्यान न देते हुए, ज़ोर ज़ोर से लगातार बकवास किए जा रही है, ज़रा सोचिए, एक स्टूडेण्ट. वह किसी को यक़ीन दिला रही है कि उन दोनों की परिचित महिला पर भरोसा न करे. तुम चाहो या न चाहो, सुनना ही पड़ेगा :
 “क्या तुम पागल हो गई हो! उस पर भरोसा करने की बात सोचना भी नहीं, वह सबको धोखा देती है! उसकी किसी भी बात का यक़ीन मत करो. तुम्हें भी धोखा देगी! वो ऐसी ही है! तुम नहीं जानतीं, हम शिशिर के कैम्प में “सच” वाला खेल खेल रहे थे, संक्षेप में.... किसी ने उससे कोई संख्या बोलने के लिए कहा. संक्षेप में, ये कि कितने खिलाड़ी थे. मालूम है, उसने क्या कहा? तेरह! ये तो बड़ी ग़ज़ब की बात हुई. खुल्लम खुल्ला ऐसा झूठ क्यों बोलना? सब समझ गए कि वह काफ़ी कम बता रही है. नहीं, किसी किसी के लिए ये भयानक-भयानक है, मैं समझती हूँ, मगर हम, हम तो उसे जानते हैं, हम अच्छी तरह उसे पहचानते हैं. संक्षेप में, वह समझ गई कि किसी ने उसकी बात पर यक़ीन नहीं किया, उसे शर्म आई कि ऐसा झूठ क्यों बोला, कि उसका झूठ पकड़ लिया गया है.... तो, क्या सोचती हो, उसने क्या किया? क्या बेईमानी को स्वीकार कर लिया?...ये कैसे हो सकता था!...अगर वह स्वीकार कर लेती, तो हम, शायद, उसके झूठ को माफ़ कर देते, मगर वो तो अपनी बात सही साबित करने लगी...मानो वह काफ़ी समय से चर्च जाती रही हो...मतलब, शर्मनाक, बिल्कुल शर्मनाक...सोच सकती हो? उस पर भरोसा करना ही नहीं चाहिए. धोखा देगी.”
कपितोनोव उठ जाता है और तिरछे होकर पैसेज की ओर, और पैसेज से होते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ता है.
22.09

 “येव्गेनी”, मरीना कपितोनोव का अपने पति से परिचय करवाती है, और कपितोनोव से अपने पति का: “तोडोर.” और झूठी शान के साथ आगे कहती है: “असली बेल्जियन.”
 “मगर पुआरो नहीं,” तोडोर ऊँगली से अपनी नाक के नीचे गुदगुदाते हुए मूँछों की अनुपस्थिति दर्शाता है.
कपितोनोव को उसकी बोली में किसी विशेष लहज़े का आभास नहीं होता.
असली बेल्जियन – हट्टा कट्टा, साँवला.
स्वर्गीय मूखिन से एकदम विपरीत. 
 “मेरी माँ – बुल्गारियन थी और पापा ब्रूसेल्स के.”
’नाटो’ का हेडक्वार्टर. गोभी. लेसें, बीयर.
संदर्भ झट् से याद आ जाता है.
क्या कपितोनोव को अपने माता-पिता के बारे में बताना चाहिए?
 “संक्षेप में, रूसी,” मरीना बात पूरी करती है.
 “संक्षिप्त रूसी,” तोडोर ने पुश्ती जोड़ता है.
 “तुम क्यों संक्षिप्त होने लगे?”
 “तो फिर कैसे? तुम्हारे लोगों में से किसीने कहा था: चौड़ा है रूसी इन्सान, छोटा करना होगा.”
 “मेरा ख़याल है कि वहाँ था, “सिकोड़ना”.
 “ये महत्वपूर्ण नहीं है.”
कमरे में बातचीत चलती रही.
 “झेन्या भी ब्यूस्टे में काम कर चुका है,” मरीना ने पति को बताया.
 “ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स में,” पति कहता है, कपितोनोव पर ये ज़ाहिर करते हुए कि वह पत्नी की बात समझ रहा है.
(ब्यूस्टे में, मूखिन के साथ – ये मतलब भी छुपा हुआ है.)
तोडोर ने बल्गारियन रेड-वाईन की बोतल खोलते हुए (मेहमान ने वोद्का से इनकार कर दिया था) बताना शुरू किया कि वह क्या काम करता है: वह काम करता है...मगर कपितोनोव समझ नहीं पाया कि ये कौनसा क्षेत्र है: फूड-इण्डस्ट्री, मेडिसिन, PR? कहानी के बीच में एक सवाल पूछकर कपितोनोव समझ गया कि न पूछना ही बेहतर है: असली बेल्जियन काफ़ी पहुँची हुई चीज़ है. उसका काम दही के किसी पेय से संबंधित था, जिसका बल्गारिया के एक पहाड़ी प्रदेश में परंपरागत ढंग से उत्पादन किया जाता था. इस प्रदेश में पिछली से पिछली शताब्दी में भी लम्बी उम्र तक जीने वालों की काफ़ी बड़ी संख्या थी. अपने समय में मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रोफ़ेसर मेच्निकोव ने इसमें काफ़ी दिलचस्पी दिखाई थी – अपनी खोज के अधिकांश प्रयोग उन्होंने पैरिस के पाश्चर इन्स्टिट्यूट में किए, जहाँ उनका अस्थि कलश सुरक्षित है.

 “मुलाक़ात के लिए,” मरीना ने जाम उठाया.
जब तोडोर वर्णन कर रहा है, तो वह एक किनारे देख रही है, मेज़ के उस हिस्से की ओर जहाँ स्टैण्ड में नैपकिन्स रखे हैं, और उसके चेहरे पर सिवाय तनावपूर्ण उत्सुकता के कोई और भाव नहीं है.
तोडोर की रूसी इतनी स्पष्ट है, कि उसके ग़ैर रूसी होने का भेद खोल रही है. मगर, हो सकता है कि कपितोनोव ख़ुद ही अपने पैनेपन की चापलूसी कर रहा हो.
 “योगूर्त12 (दही – अनु.)( दूसरे स्वर पर स्वराघात सहित, जो रूसी भाषा के नए नियमानुसार है और ऐतिहासिक दृष्टि से सही है – जिसका सही उच्चारण तोडोर ने सीख लिया था), जिसका उत्पादन पश्चिम में होता है, बिल्कुल योगूर्त नहीं है. बिल्कुल उसी तरह जैसे रूस में पश्चिमी तकनीक से उसे बनाया जाता है. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि मेच्निकोव ने दूध के जीवाणुओं और उनके लाभ के बारे क्या लिखा है. मेच्निकोव की दिलचस्पी नैसर्गिक मृत्यु की समस्या में थी. ये तब होता है जब जीवन से सराबोर शरीर में मृत्यु का भय कुंद हो जाता है, और इसे संभव बनाता है सही आहार.”
तोडोर ने ख़ुद ही कहता है:
 “सेहत के लिए.”
कपितोनोव को अचरज हो रहा था कि वह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि तोडोर वाक़ई में संजीदा है, या वह इतनी बारीक़ी से व्यंग्य को छुपा रहा है.
असली बेल्जियन को ये जानने में दिलचस्पी है कि क्या कपितोनोव को पीटरबुर्ग पसन्द है.
 “मैं अभी हाल ही में तो यहाँ से गया हूँ.”
 “हाँ. मुझे ये मालूम है. मगर मैं ये जानना चाहता था कि क्या आपको कोई परिवर्तन नज़र आए.”
 “आइसिकल्स13.” कपितोनोव की ओर से मरीना जवाब देती है.
 “क्या किया जाए, ऐसी सर्दी है!” तोडोर चहकता है. “आप ‘बोर’ तो नहीं हो रहे हैं? मॉस्को – सेंट पीटरबुर्ग नहीं है.”
 “टाइम नहीं है, वर्ना शहर में घूमता.”
 “फ़िसलन, फ़िसलन! सब पैर तोड़ लेते हैं. अभी तात्याना इग्नात्येव्ना अपनी कूल्हे की हड्डी तोड़ बैठी!”
कपितोनोव नहीं पूछता कि ये तात्याना इग्नात्येव्ना कौन है. और मरीना भी नहीं बताती. मरीना उससे कॉन्फ्रेन्स के बारे में बताने के लिए कहती है. कपितोनोव संक्षेप में बताता है कि जिसमें उसे भाग लेना है उस कॉन्फ्रेन्स का उद्देश्य, उसकी नज़र में, क्या है, मगर वह कॉपरफ़ील्ड के बारे में पूछे गए तोडोर के सवाल का जवाब नहीं दे सका – उसे नहीं पता कि बहुत दिनों से कॉपरफ़ील्ड की कोई ख़बर क्यों नहीं है.
 “तब मैं ख़ुद ही आपको बताऊँगा.”
वह बताता है.
अगर तोडोर की बात का यक़ीन किया जाए, तो संयुक्त राज्य में जादू के कारनामों का ‘पेटेंट’ किया जाता है, इस अनिवार्य शर्त के साथ कि सात साल बाद उसके रहस्य को प्रकाशित किया जाएगा.  हर्षोल्लास के दिन गुज़र गए, और अब ‘पेटेन्ट्स’ इंटरनेट पर लगा दिए गए हैं. तोडोर ने अंग्रेज़ी में उन्हें पढ़ा और उनका अध्ययन किया, वह अब सब कुछ जानता है.
 “मगर, वह उड़ कैसे सका?” मरीना पूछती है. “वह तो सचमुच में उड़ा था न?”
तोडोर खूब मज़बूत पतले प्लास्टिक के तारों और ख़ास तरीक़े से घूमती हुई रिंग्स की सहायता से समझाता है. कपितोनोव को कॉपरफ़ील्ड के रहस्यों में कोई दिलचस्पी नहीं है.
 “और आप, मतलब, दो अंकों वाली संख्याएँ बूझ सकते हैं? क्या मैं कोई संख्या सोच सकता हूँ?”
  “प्लीज़,” कपितोनोव ने कहा.
 “हाँ, सोच ली.”
 “मगर, सिर्फ दो अंकों वाली!” मरीना बीच में टपकती है.
 “ज़ाइन्का, मैं समझता हूँ.”
 “उसमें बारह जोड़िए,” कपितोनोव ने कहता है.
 “हाँ.” तोडोर जवाब देता है.
 “ग्यारह घटाइए.”
 “हाँ.”
कपितोनोव सोच में पड़ गया.
 “या तो मैं ग़लती कर रहा हूँ, या – दस.”
 “हाँ.”
 “दस?”
 “हाँ. हाँ.”
 “मुझे याद नहीं है कि कभी किसी ने ‘दस’ संख्या सोची थी. दो अंकों वाली संख्याओं में सबसे छोटी.
 “तोडोर ‘मिनिमलिस्ट’ (कम से कम स्वीकार करने वाला – अनु.) है,” मरीना ने कहा.
 “नहीं, मैं ‘मिनिमलिस्ट’ नहीं हूँ. क्या और सोचूँ?”
 “नहीं,” मरीना कहती है.
 “क्यों नहीं? बिल्कुल सोच सकते हैं,” कपितोनोव इजाज़त देता है.
 “नहीं. बस हो गया.”
 “आख़िर क्यों?”
 “हो सकता है, दूसरी बार न हो पाए..”
 “बकवास, बिल्कुल होगा. और, अगर न भी हो तो क्या होगा?”
 “झेन्या,” मरीना ने जवाब देती है, “जानते हो, मुझे बचपन से ही जादूगर क्यों नहीं अच्छे लगते? वे कितनी चीज़ें उछालते हैं, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है. मगर मुझे इस बात का इंतज़ार करना बड़ा असहज लगता है कि कोई एक बार ही चूक जाए.”
 “ठीक है,” तोडोर ने कहा, “आप जादूगर हैं और मैं डिबेटर. चलिए, बहस करते हैं कि अगर आप मुझे एक हज़ार रूबल्स देंगे, तो मैं आपको पाँच हज़ार रूबल्स दूँगा.”
 “मैं आसानी से आप पर विश्वास करता हूँ. बहस किसलिए?”
 “क्या आपको विश्वास है कि अगर आप मुझे एक देंगे, तो मैं आपको पाँच हज़ार दूँगा?”
 “मगर आपने ख़ुद ही तो ऐसा कहा है?”
 “और आपने मुझ पर विश्वास कर लिया?”
 “मगर, मुझे विश्वास क्यों नहीं करना चाहिए?”
 “रुकिए. क्या आप ये कहना चाहते हैं कि मैं ईडियट हूँ?”
 “मेरे सूरज, झेन्या ने ऐसा तो नहीं कहा.”
 “कौन किससे बहस करना चाहता है?” कपितोनोव पूछता है. “आप मुझसे या मैं आपसे?”
 “तो, हम बहस कर रहे हैं? मुझे एक दीजिए, और पाँच ले लीजिए.”
 “कितने पर बहस करेंगे?”
 “जितने पे चाहें. एक रूबल पे.”
 “झेन्या और तोडोर, बन्द करो.”
 “ये रहे आपके लिए एक हज़ार.”
 “थैन्क्यू. मैं आपको पाँच हज़ार नहीं दे सकता. मतलब, अफ़सोस है, कि मैं हार गया. आपकी जीत का माल लीजिए.” वह रूबल वापस देता है.
 “ये बच्चों वाली बहस गार्डनेर की किताब “मैथेमैटिकल गेम्स” में लिखी है, मैंने सातवीं क्लास में पढ़ी थी.”
 “मतलब, आप फिर भी कहना चाहते हैं कि मैं ईडियट हूँ.”
 “मेरे सूरज, झेन्या ने ऐसा नहीं कहा. उसे पैसे वापस दे दो.”
तोडोर हज़ार रूबल्स वापस करने की कोशिश करता है, मगर कपितोनोव वापस नहीं लेना चाहता.
 “”कोई वापस-बापस नहीं. मैं जीत गया, और मैंने ईमानदारी से रूबल कमाया है.”
 “बेवकूफ़ी मत दिखाओ. ये रहे आपके एक हज़ार. उठाइये. ये केवल मज़ाक था.”
 “हर चीज़ ईमानदारी से,” कपितोनोव तन जाता है. “एक हज़ार अब आपके हुए, यहाँ मज़ाक कहाँ से आ गया?”
 “ये बहस सिर्फ नमूने के लिए थी.”
 “ऐसा तो हमने तय नहीं किया था.”
 “जब आप जानते थे कि हारने वाले हैं, तो आपने बहस क्यों की?”
 “और मैं तो जीत गया!”
 “झेन्या,” मरीना कठोरता से कहती है, “अगर तुम पैसे वापस नहीं लोगे तो मैं गुस्सा करूँगी.”
 “बहुत अच्छे,” एक हज़ार जेब में रखते हुए कपितोनोव बुदबुदाता है. “मुझसे मेरी जीत छीनी जा रही है.” वह रूबल मेज़ पर रखता है.
 “हाँ,” रूबल उठाते हुए तोडोर कहता है.
एक ऐसा अंतराल छा गया जिसे असहज कहते हैं.
 “अगर ईमानदारी से कहूँ तो मैं ये ट्रिक भूल चुका हूँ,” कपितोव ने कहा. “इत्तेफ़ाकन याद आ गई.”
 “ठीक है,” तोडोर जवाब देता है. “क्या चुटकुला सुनना चाहेंगे?”
सुनाने के बाद, बिना रुके बोला:
 “अब मुझे माफ़ कीजिए. आपसे मिलकर ख़ुशी हुई. मुझे जल्दी उठना है. हमारे यहाँ रुक जाइए, होटल की क्या ज़रूरत है?”
तोडोर कमरे से निकल जाता है, कपितोनोव घड़ी पर नज़र डालता है.

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