पाईप पर च्कालव *
कुछ साल पहले
च्कालव की पड़पोतियों ने “प्लेबॉय” पत्रिका के लिए एक फोटो खिंचवाई थी. इंटरनेट पर एक अपराध-नाटक के बारे में जानकर मुझे इस
घटना की याद आई. नाटक में अज़रबैझान के एक वयोवृद्ध शिल्पकार की, जो कभी लेनिनग्राद में काम करता था, हत्या हो जाती है.
उसके
स्टूडियो की खिड़कियाँ स्कूल के प्ले-ग्राउण्ड में खुलती थीं, जो पेरेस्त्रोयका के अंत में आराम से ग़ायब हो गया था; तब से यह जगह (च्कालव प्रॉस्पेक्ट और पायनियर स्ट्रीट
वाला चौराहा) बियर स्टाल्स और पेविलियन्स का अड्डा बन गया है. आजकल वहाँ काफ़ी सभ्य वातावरण है : वो दिन लद गए जब फैशनेबल
स्टाल के डिब्बों को रात के लुटेरों से बचाने के लिए जाली में बंद रखना पड़ता था, और जली हुई वोद्का न सिर्फ बोतल में, बल्कि प्लास्टिक के ढक्कनबन्द गिलास में भी बेची जाती
थी, जिसे खट्टे दही की तरह सावधानी से पैक किया जाता था.
मैं ख़ुद वहाँ,
ख़ास तौर से, बियर पिया करता था – यहीं
पर संयोगवश मेरी मुलाकात निकोलाय फ़्योदरोव से हुई, जो बगल
वाली गली में रहते थे. “नेव्स्की” का एक-एक डिब्बा खोलकर हम, जैसा कि यहाँ होता था, “च्कालव
के पास”, मतलब,
एक असाधारण कलाकृति की
बगल में बैठ गए,
जिसे स्टाल्स की दीवार
अजनबी लोगों की बेकार की नज़रों से छुपा रही थी. हम अजनबी नहीं थे, स्मारक को हमसे कोई शर्म नहीं थी, वह हमसे रूबरू था, खुला
हुआ था, वैसा था,
जैसा वह था. उसे देखना
मुझे अच्छा लगता था. फ्योदरोव से ही मुझे पता चला कि उसका निर्माता कौन है.
कल्पना
कीजिए एक कॉन्क्रीट के भारी-भरकम सिर की, जिसे
ज़मीन में गड़े हुए धातु के ऊँचे पाइप पर चढ़ाया गया है. सिर
भूरे रंग में रंगा है,
और पाइप – सफ़ेद. सिर का
रंग चटक गया है और उसके छिलके निकल रहे हैं, मगर
पाइप का रंग पक्का है – चाहे प्रशंसकों ने उस पर हस्ताक्षर करने के लिए कितनी ही
ताकत से क्यों न खुरचा हो. पाइप पर दो तख़्तियाँ लगी हैं; एक पर लिखा है – “वी.पी.च्कालव”, दूसरी पर – “हीरो” वाला सितारा और मेडल.
स्मारक
की हालत स्थान के वातावरण के अनुरूप ही है – ग़ैरकानूनी. अवैध, अनाधिकृत. इसे अस्सी और नब्बे के दशकों की सीमा पर
स्थापित किया गया था,
जो काफ़ी अराजकता का समय था, बिना अधिकारियों की इजाज़त के और बिना किसी मंज़ूरी के –
सिर्फ शिल्पकार याकूब अलीबाबायेविच इम्रानव की मर्ज़ी से – जिसका स्टूडियो यहाँ से
पन्द्रह मीटर दूर था (खिड़कियों के सामने की फेन्सिंग से घिरी खाली जगह पर अभी भी फफूँद
से ढँकी प्लास्टर ऑफ पैरिस की कुछ आकृतियाँ पड़ी हैं, मगर अब
ये किसी और शिल्पकार का निजी क्षेत्र है). बस एक बार इम्रानव क्रेन वाला ट्रक लाया, च्कालव को हुक से लटकाया जो उसके सिर से निकल रहा था, और आगे का काम टेक्नोलॉजी ने कर दिया. पाइप को फिट करने के काम में मदद करने
के शौकीन लोग यहाँ काफ़ी थे – पुराने निवासी वो दिन भूले नहीं हैं. जहाँ तक हुक का
सवाल है, वह अभी भी कठिन तकनीकी काम की याद में कॉन्क्रीट के
शिखर वाले भाग से झांक रहा है.
अगर
इम्रानव पीटर्सबुर्ग में ही रहता, तो वह,
शायद इस बात का ध्यान
रखता, कि इस हुक को सिर से काट दिया जाए, मगर – सोवियत संघ टूट रहा था, और कभी महान रह चुके पूरे साम्राज्य में अव्यवस्था
तांडव कर रही थी;
पूरी ज़िंदगी सोवियत
लोगों की नैतिक सुंदरता के गुण गाने वाला शिल्पकार अपनी ऐतिहासिक मातृभूमि –
स्वतन्त्र अज़रबैजान को चल पड़ा,
लेनिन के शहर के लिए
च्कालव का स्मारक छोड़ कर. वसीयत की तरह.
या
हो सकता है, एक उलाहने की तरह – बुद्धिहीन युग के लिए.
अगर
पीटर्सबुर्ग के स्मारकों में से कोई रहस्यमय जीवन जी रहा है, तो सबसे पहला – यही है. अवैध रूप से, बिना पासपोर्ट के. ग़ैरकानूनी होने के कारण – बगैर
रजिस्ट्रेशन के. इसके फलस्वरूप होने वाले सभी परिणामों के साथ, जिनमें प्रमुख है – धराशायी किये जाने का भय. अधिकारी
तो इस पर कब से दाँत गड़ाए बैठे हैं,
नामोनिशान मिटा देना
चाहते हैं, मगर कोई चीज़ रुकावट डाल रही है. जम कर बैठ गया! अपने
विशालकाय पाइप के साथ धरती में जम के बैठ गया!...हटा कर तो देखो...
आश्चर्यजनक
स्मारक है. कला की दृष्टि से बहस करने लायक कुछ भी नहीं है. मगर, शायद,
कोई बात तो है इसमें, ज़्यादा मूल्यवान. हाव-भाव का आशय. एक संदेश. बस ऐसा ही
– कोई बातचीत नहीं!...इच्छा - अस्तित्व की, विरोध
करने की, होने की. इस भद्दे और अत्यंत सीधे-सपाट शिल्प से दृढ़ विरोध की भावना प्रस्फुटित होती है, बावजूद इसके कि सोवियत काल में इसे सभी अनुमानों से
परे ही समझा जाता. आज ये दृश्य विरोध है. आज पाइप पर बैठा च्कालव – एक चेतावनी है –
ग्लैमर को, अधिकारियों को, और सिर
पर मौजूद हुक बिल्कुल सही जगह पर बैठा है. स्टाल्स के पीछे छुपने और अपने आप में
सिमट कर रहने की आवश्यकता स्मारक को एक अतिरिक्त नाटकीयता प्रदान करती है, और हम सबके लिए (बगल में बैठकर हम चाहे जो पी रहे हों)
एक सबक है – गरिमा को बनाए रखने का.
अधिकारियों की
स्थिति भी समझनी चाहिए, ख़ासकर
उसके बाद जब बिल्कुल बगल में,
मेट्रो के प्रवेश के पास, दूसरा च्कालव प्रकट हो गया हो – कांसे का, “असली”,
जिसने प्रस्थापित नियमों
के आधार पर प्रतियोगिता जीत ली हो और शासकीय अधिकारियों की उपस्थिति में जिसका
समारोहपूर्वक उद्घाटन हुआ हो. इस तथ्य के आधार पर ये वाला स्मारक बिल्कुल अमान्य
है. दो-दो च्कालव – ये बकवास है! मगर क्या किया जाए, अगर
शिल्पकार चार्किन की उत्कृष्ट कृति की तरफ़ मेट्रो से बाहर आने वाले किसी
चुनावपूर्ण पर्चे की तरह देखते हों,
- मतलब, उसके होने या न होने से कोई फ़रक नहीं पड़ता, मगर हुक जड़े कॉन्क्रीट वाले को “अपना” समझते हों और
अपने तरीके से प्यार करते हों?
जब
मैंने बियर के स्टाल्स पर काम कर रहे एक कुली से कहा, कि
“शायद, जल्दी ही इसे उठाकर ले जाएँगे” तो उसने जवाब दिया :
“कोशिश तो करने दो! ऐसा हंगामा खड़ा हो जाएगा...” और उसने मुझे बताया कि कैसे एक
बार दादियों-नानियों ने च्कालव को बचाया था, जब
“उसके लिए आए थे”.
ए.
एफ. मोझाय्स्की अकादमी के कैडेट्स ने (उनके सिवा और कौन कर सकता है?) कॉन्क्रीट के च्कालव को उड़ान वाला चष्मा पहना दिया. सिर बड़ा था, चष्मा
मुश्किल से नाक पर आ रहा था – नाक पर उसे बिठाने के लिए, तार का इस्तेमाल करना पड़ा. कल्पना कर सकता हूँ, कि एक कैडेट दूसरे के कंधों पर खड़ा है – वर्ना वहाँ तक
पहुँच नहीं पाओगे. ये भी अपनी ही तरह की मान्यता है. मज़ाक नहीं है. “सम्मान” उसी
तरह का, जैसे “कैथेरीन”- युग के सुवोरोव के सिर पर श्वेत ‘फेयरवेल-नाइट’ को उसके
कृतज्ञ अनुयायियों द्वारा पहनाई गई कैप या फ्रुन्ज़े एअरो-क्लब के प्रशिक्षार्थियों
द्वारा कांसे के क्रूज़ेन्श्तेर्न** को पहनाया गया वास्कट.
क्या
ऐसा प्यार पाने के काबिल है वो,
सरकारी – सही, कांसे का,
मेट्रो के पास वाला –
क्या आप कल्पना कर सकते हैं?
“पाइप
पर – च्कालव” वाकई में इस जगह का ‘हीरो’
है. पीने वाले और बेघर
उसकी ओर खिंचे चले आते हैं. किसी का कोई कुत्त्ता आता है और बगल में लेट जाता है.
शामों को पाइप-पैडेस्टल के पास अजीब नज़ारे दिखाई देते हैं. ऊपर से, वह चौकीदार भी है. अगर वह न होता, तो न जाने किस तरह का निर्माण कार्य इस कोने में हो
गया होता?
शायद
ये अविश्वसनीय प्रतीत हो,
मगर पहले ही व्यक्ति ने, जिससे
मैंने पूछा (मैं पियोनेर्स्काया स्ट्रीट पर कुत्ते के साथ घूम रहा था), कि क्या वह स्मारक के निर्माण के बारे में कुछ जानता
है, मुझे बताया, कि वह
ख़ुद ही शिल्पकार का मॉडेल था. “लड़कों के साथ चौक पर खेल रहा था, वह हमारे पास आया : सुन, दोस्त, मेरी मदद कर, थोड़ी
देर के लिए ‘पोज़’
दे दे – तो, मैं स्टूडियो में कुछ देर खड़ा हो गया, वह मेरी ओर देख-देखकर पायनियर की मूर्ति गढ़ता (सभी
पायनियर्स की मूर्तियाँ गढ़ता),
फिर चॉकलेट देता...”
मोझाय्स्की
मिलिट्री-स्पेस अकादमी – बगल में ही है. अकादमी के सबसे वरिष्ठ कर्मचारी रिटायर्ड
कर्नल तिमोन निकोलायेविच फ्योदरव (लेखक के पिता) विज्ञान और टेक्नोलॉजी के उन
सम्मानित व्यक्तियों के नाम गिनाते हैं जिनकी अर्ध-प्रतिमाएँ उन्होंने ख़ुद देखी
हैं. शिल्पकार को यहाँ सब लोग अपना दोस्त मानते थे, किसी
ने तो उसे इलेक्ट्रिशियन का दर्जा दे दिया था. अकादमी के कम्पाऊण्ड में उसकी
कलाकृति - “मातृ-भूमि” खड़ी है.
अज़रबैजान
जाने से पहले उसने हैदर अलीयेव की मूर्ति बनाई और ख़ुद उसे भेज दी. शायद, संभव हो पाया, क्योंकि, कहते हैं, कि कई लोगों को दिखाई थी.
इंटरनेट
पर (बेशक,
रूसी) मुझे उसके बारे
में कुछ नहीं मिला,
सिर्फ उसकी मृत्यु की
ख़बर के अलावा. अजीब मौत. इतनी अजीब,
कि – दुर्भाग्यपूर्ण
उत्सुकता के कारण – उसे दुर्घटनाओं की श्रेणी में शामिल कर लिया गया.
असल
में, उसके बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता – एक इन्सान के
रूप में. और व्यक्तिगत रूप से उसके बारे में कुछ कहना नहीं चाहता. मतलब, जो उसके,
किसी विशिष्ठ कलाकार के
बारे में न होकर,
किसी भी कलाकार के बारे
में होगा. एक नीतिकथा है. एक था ....
पायनियर्स की,
वैज्ञानिकों की, श्रमिक-हीरो की, समाजवादी
सरकार के कार्यकर्ताओं की,
सोवियत संघ के ‘हीरोज़’
की मूर्तियाँ बनाता था.
सोवियत संघ नहीं बचा,
और ख़ुद मूर्तिकार भी
बूढ़ा हो गया. समंदर,
आसमान, बचपन की ज़ुबान. दूर के उत्तरी शहर के ख़्वाब. बहत्तर
साल की उम्र,
और बगल में रहती है –
आँख़ें मलकर देखो – जवान ख़ूबसूरत–पड़ोसन. सौन्दर्य का आदर्श. और तू किस ओर जा रहा था, क्या पा सकता था, कलाकार? ख़याल स्पष्ट था, और
कल्पना में सोची हुई छबि पूरी हो चुकी थी. उसने अपने प्लान के बारे में बताया. उसे
वहीं मार डाला गया.
या
इसे दूसरे कोण से देखें.
सन्
’99 की जुलाई में “प्लेबॉय” का अंक निकला वालेरी च्कालव की पड़पोतियों की स्पष्ट
तस्वीरों वाला,
और सन् 2002 के जून में “पाइप
पर – च्कालव” के मूर्तिकार की उसकी मातृभूमि अज़रबैजान में इज़्ज़तदार पड़ोसी द्वारा
हत्या कर दी गई. किसलिए?
इस मासूम अनुरोध के कारण
की उसकी ख़ूबसूरत बेटी को नग्नावस्था में ‘पोज़’ देने की इजाज़त दे दे.
जिसे
भी मैंने इस अविश्वसनीय मृत्यु के बारे में बताया, सबने
एक-सा जवाब दिया: पूरब!
मतलब, आप,
सचमुच में, ये मान सकते हैं, कि हम
पश्चिम में रहते हैं.
तो फिर यहाँ लेना और झेन्या किसलिए? मालूम नहीं. शायद, उनका यहाँ कोई काम नहीं है.
फरवरी 2007
P.S. (सितम्बर
2008)
यह असंभव है, कि
“पीटर्सबुर्ग ऑन नेव्स्की” में इस लेख के प्रकाशन के कारण कहीं कोई परिवर्तन हुआ
हो. मैं बिल्कुल ये नहीं कहना चाहता था, कि “पाइप पर च्कालव”
को घेरने वाले बियर के स्टाल्स की आलोचना कर रहा हूँ. स्मारक के साथ-साथ, मुझे लगता है, कि उन्होंने भी अपना एक समूह बना लिया
था और ख़ुद भी स्मारक बन गए थे – अपने ज़माने का स्मारक. मगर फिर भी स्वीकार करना
पड़ेगा, कि मेरे लेख के प्रकाशन के बाद यहाँ काफ़ी कुछ
परिवर्तित होने लगा. सबसे पहले “घरेलू उपयोग की चीज़ें” के बोर्ड वाला स्टाल बंद कर
दिया गया, जिसमें मुझे याद है – टूथ-ब्रश और टिश्यू-पेपर के
अलावा स्प्रिट से बना एक पेय भी मिलता था, जो स्थानीय
पियक्कड़ों के बीच बहुत लोकप्रिय था. उसके बाद बियर के स्टाल्स बंद कर दिए गए. सन्
2007 की पतझड़ आते-आते इस क्षेत्र से सभी स्टाल्स हटा दिए गए, और आश्रय से वंचित “पाइप पर च्कालव” लोगों को वैसा दिखाई देने लगा,
जैसा वह है. उस जगह पर, जिसका सिर्फ एक कोना
लम्बी-चौडी दीवार से घिरा है, सुनसान चौक पर और बियर स्टाल्स
के बगैर वह पहले जैसा ही भावपूर्ण है,
बल्कि कुछ ज़्यादा ही....स्मारक अज्ञात जनों से भयभीत नहीं प्रतीत होता
(अज्ञात जनों से भयभीत होने वाले स्मारक
भी होते हैं); अब उसकी ज़िंदगी खुली किताब की तरह है. संस्कृति-वैज्ञानिक
किरिल करत्कोव ने, जिसने ये लेख पत्रिका में पहले पढ़ा था,
हाल ही में मुझे बताया कि उसने प्रशिक्षार्थियों को एक दूसरे के
कंधों पर चढ़कर च्कालव को चष्मा पहनाते देखा था. काफ़ी हद तक यह स्मारक अब अधिकारियों
के निशाने पर नहीं है, चौक को हौले-हौले दर्शनीय बनाने की
कोशिश कर रहे हैं, और पाइप-पैडेस्टल की बगल में चार
कॉन्क्रीट की तश्तरियाँ फिट कर दी गईं, ज़ाहिर है, कभी ये क्यारियाँ बन जाएँगी. पता चला कि च्कालव की बगल में अण्डरग्राउण्ड
तार जा रहे हैं. समय-समय पर धरती के नीचे कुछ टूटता है, और
फ़ौरन खुदाई शुरू हो जाती है. कई बार मैंने च्कालव को पानी की भाप से घिरे देखा,
जैसे तुर्की हम्माम से बाहर आने वाला व्यक्ति होता है. हालाँकि इस
भाप की बादलों से तुलना करना ज़्यादा ठीक होगा, क्योंकि बात
हो रही है पायलट की, आकाश के विजेता की.
इस समय, जब
मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, च्कालव के पीछे, अचानक पाइप-पैडेस्टल के पीछे एक खाई खोदी गई – हीटिंग पाइप्स बदल रहे हैं.
च्कालव फिर से उच्च स्तर की एरोबेटिक्स का और असाधारण सटीकता का प्रदर्शन करता है –
अगर उसका पाइप दीवार से और आधा मीटर निकट होता, तो स्मारक को
जायज़ कारणों के आधार पर इस जगह से हटाना पड़ता. अण्डरग्राउण्ड काम की मरम्मत के बाद
उसकी इसी जगह पर स्थापना करना मुश्किल ही होता.
मगर स्मारक गर्व से वहीं खड़ा है, जहाँ सिर्फ वो ही खड़ा रह
सकता है. और मुझे लगता है, कि वह सचमुच में खड़ा रहेगा.
----------------------------------------------------
* च्कालव –
वलेरी पाव्लविच च्कालव ( 1904 – 1938) – सोवियत टेस्ट-पायलट. हीरो ऑफ़ सोवियत
यूनियन. उन्होंने सन् 1937 में बिना कहीं रुके मॉस्को से उत्तरी ध्रुव होते हुए
वैंकोवर की पहली हवाई यात्रा की थी. उनकी मृत्यु सन् 1938 में एक नए लड़ाकू विमान
की टेस्ट–फ्लाइट में दुर्घटना के कारण हो गई.
**
क्रूज़ेन्श्तेर्न (1770 – 1846) : इवान फ्योदरोविच क्रूज़ेन्श्तेर्न समुद्री नाविक और
एडमिरल थे, जिन्होंने
समुद्र के रास्ते दुनिया की सैर के अभियान का सफ़ल नेतृत्व किया था. उनका नाम रूसी भूगोल और समुद्र विज्ञान
से अटूट रूप से जुड़ा है.


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें