पायनियर्स्काया स्ट्रीट
पर पायनियर्स
पायनियर्स–संस्था
की पचासवीं सालगिरह विशेष धूमधाम से मनाई गई. मार्च, रैलियाँ,
परेड्स. “कीरव संयंत्र
में पायनियर्स-स्मेल्टिंग यूनिट”. पायनियर्स-कन्स्ट्रक्शन यूनिट. “बच्चों, आपको मालूम ही है कि लेनिनग्राद की पायनियर्स-कन्स्ट्रक्शन
का मुख्य उद्देश्य था – पायनियर्स्काया स्ट्रीट का निर्माण”, “लेनिन स्पार्क्स”16 ने अपने पाठकों से कहा
था. तो मैं उसके – पायनियर्स्काया स्ट्रीट के, भूतपूर्व
ग्रेट ग्रेबेत्स्काया स्ट्रीट के बारे में बताने जा रहा हूँ, जहाँ पर कभी गैली बेड़े के खिवैये रहते थे.
यहीं
पर पायनियर्स-संस्था की पचासवीं वर्षगाठ के उपलक्ष्य में यादगार स्मारक-संरचना का
निर्माण किया गया था.
इसकी शुरुआत
स्ट्रीट के आरंभ में एक स्मृति-स्तंभ से होती है जिस पर लेनिन के ऑर्डर की आकृति
की उभरी हुई छबि है. स्मारक इस लिहाज़ से दिलचस्प है, कि जब उसे बनाया जा रहा था, तब “लेनिन
अखिल सोवियत पायनियर्स संस्था” को दूसरी बार लेनिन के ऑर्डर से सम्मानित किया जा
रहा था, - फ़ौरन एक और ऐसा ही स्मारक बनाना उचित होता, जिससे दोनों ऑर्डर्स (1962, 1972) मौजूद रहते, मगर, नहीं,
ऐसा नहीं हुआ.
पायनिर्स्काया
और कोर्पूस्नाया स्ट्रीट्स वाला चौराहा. काफ़ी समय से बंद पड़ी “क्रास्नोए ज़्नाम्या”
होज़ियरी फैक्ट्री के पॉवर हाउस के सामने प्रथम पेट्रोग्राद पायनियर्स टुकड़ी का
स्मारक है. इस टुकड़ी के सम्मान में, जिसका गठन फैक्ट्री के क्लब में किया गया था, सन् 1932 में बिग-ग्रेबेत्स्काया स्ट्रीट का नाम बदलकर
पायनियर्स्काया स्ट्रीट रखा गया था. स्मारक, साफ़
कहेंगे, साधारण-सा है. स्मारक इसलिए दिलचस्प है, कि (अगर स्त्रोत गलत नहीं हैं तो) उसमें एक रहस्यमय कैप्सूल
छुपाई गई है,
जिसमें सन् 2022 के
पायनियर्स के लिए एक पत्र है17, मगर
मुझे पता नहीं चला कि उसे कहाँ छुपाया गया है – शायद भावी पायनियर्स, कल्पना कर सकता हूं, ज़्यादा
समझदार होंगे.
स्मारक का मुख्य तत्व है – स्तम्भ. उसे पायनियर बैज के
आकार का ताज पहनाया गया है – पंचकोणी सितारे और तीन लपटों वाली मशाल समेत. 5:3 का
ये सांख्यिक अनुपात अपने व्युत्क्रम (3:5) तक उस प्रतीक को दर्शाता है, जो आरंभिक पायनियर्स के नीले हेल्मेट्स पर लगा था, जो ड्रम्स की आवाज़ के साथ ग्रेट ग्रेबेत्स्काया
स्ट्रीट पर मार्च कर रहे थे. ग्रेट ग्रेबेत्स्काया का नाम तब तक परिवर्तित नहीं
हुआ था. उस प्रतीक पर मशाल का चित्र था – तीन कुंदे, जो
“थर्ड इन्टरनेशनल” के प्रतीक थे,
और पाँच लपटें, जो पाँच महाद्वीपों की संख्या दर्शाती थीं. ये मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि पायनियर्स के विचारकों के लिए 3 और 5 – इन
संख्याओं का बहुत महत्व है. ख़ास तौर से 5 का. पायनियर्स की संस्था की पचासवीं
वर्षगाठ के उपलक्ष्य में पायनियर्स्काया स्ट्रीट पर पाँच स्थानों पर “रूबी” के
पंचकोणी सितारे प्रकट हुए थे. वे आज भी ज़ंग लगे ब्रेकेट्स पर फुटपाथ के ऊपर लटक
रहे हैं – काँच टूट चुके हैं,
मगर ‘सेट’
पूरा है.
जादुई
अंक 5 की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति “रेड-टाई हाइवे” पर नायकों की संख्या से हुई थी.
अक्टूबर क्रांति की घटनाओं के पचास साल बाद क्रांतिकारी-विगत को संवारने में लगे
विशेषज्ञों ने नौजवान बालकों की वीरता के प्रश्न पर गंभीरता से ध्यान दिया: ये
स्पष्ट है, कि “लेनिनग्राद पायनियर्स” की मुख्य सड़क पर श्रमिकों
के बच्चे क्रांतिकारी कारनामे न करें ये असंभव था. इन नौजवान-वीरों की संख्या थी, बेशक,
5.
मेमोरियल-कॉम्प्लेक्स
में इन पाँच वीरों को दो स्मारक समर्पित हैं.
पहला
– च्कालव एवेन्यू के कोने पर है. ये पत्थर की बड़ी तख़्ती है, और बगल में, छोटे-छोटे
पत्थरों के चौकोर पर कोई धातु की चीज़ है, जो
तोपखाने को दर्शाती है. लोहे का टुकड़ा ख़ास दिलचस्प नहीं है, मगर पत्थर की तख़्ती ध्यान देने लायक है. असल में, ये स्मारक-तख़्ती है. सिर्फ बिन-अक्षरों वाली. सारे
अक्षर चुरा लिए गए. अक्षरों की अनुपस्थिति से तख़्ती को आज तक सेंट-पीटर्सबुर्ग की
सबसे बड़ी स्मारक–तख़्तियों में से एक बने रहने में कोई परेशानी नहीं है. वह अनधिकृत
लिखित इश्तेहारों का परीक्षण-स्थल है. उसमें रोज़मर्रा की सेवाओं के बारे में विशेष
टिप्पणियाँ हैं,
जो मेन-होल्स तक की दूरी
को दर्शाते हैं.
शायद, सब भूल गए हैं कि ये एक स्मारक है. फिर भी – ये वाकई
में स्मारक है.
मेरी
नज़र में, लेख के खो जाने से यह वस्तु निरर्थक नहीं हो गई है, बल्कि,
इसने संदेश को असीमित
विस्तार की दिशा में मोड़ दिया है. उभरे हुए अक्षरों को खोकर, ये वस्तु लोगों की (जैसे, अलौह
धातुओं के शौकीन) इच्छा की परवाह किए बगैर ख़ुद ही पुनःआत्मसमर्पित हो गई है – किसे, ये एक अलग सवाल है. मगर इससे तख़्ती का स्मारक-तख़्ती
होना बन्द नहीं हो जाता. मतलब,
इसे बेकार ही में
आधिकारिक दर्जे से वंचित करके “सेंट पीटर्सबुर्ग की स्मारक-तख़्तियाँ” (सेंट पीटर्सबुर्ग, 1999) नामक मूल निर्देशिका में शामिल नहीं किया गया, जिसमें करीब दो हज़ार ऐसी ही, मगर अक्षरों वाली, तख़्तियों
का वर्णन है.
वैसे
खो चुके शब्दों का संयोजन इस प्रकार था: “इस स्थान से 29 अक्तूबर 1917 को श्रमिकों
ने विद्रोह कर रहे “कैडेट-स्कूल” पर तोप से गोलीबारी की थी. पीटर्सबुर्ग के पाँच
बच्चे गोले लाए थे. क्रांति के युवा सेनानियों को कीर्ति और सम्मान.”
जहाँ तक गोलों का सवाल है, तो सब
सही है: यहीं कहीं “तीन इंची तोप” थी,
जिससे सीधे व्लादीमिर
इन्फैन्ट्री स्कूल पर गोले दागे गए थे. जवाब में कैडेट्स ने मशीनगनें चलाईं. दोनों
तरफ़ खून-खराबा हुआ. लगभग रक्तहीन तख़्तापलट के चार दिन बाद और भावी गृहयुद्ध की
संभावना में ये खुल्लम खुल्ला बर्बरता और क्रूरता का अतिरेक था. “बच्चे” कहाँ से
आए!...”क्रांति विरोधी अड्डे” का ख़तरनाक हत्याओं और लूटपाट से अंत हुआ.
वैसे,
तत्कालीन प्रेस में शब्द
“नौजवान” का प्रयोग कैडेट्स के लिए किया गया था. विद्रोही “मातृभूमि और क्रांति की
रक्षक कमिटी” के प्रति समर्पित थे,
जिसका संचालन दक्षिणपंथी
सोशलिस्ट डेमोक्रेट्स द्वारा होता था. “बेवकूफ़ छोकरे”, “नौजवान
कैडेट्स” (जैसा कि ताज़ा घटनाओं के संदर्भ में “सेन्ट्रल एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी के
इज़्वेस्तिया” में उनका उल्लेख किया
गया था)18 ख़ुद को न सिर्फ मातृभूमि के रक्षक, बल्कि क्रांति के सेनानी भी समझते थे. परस्पर संघर्षरत
पक्षों की आयु के संतुलन को बनाए रखने के लिए ही कहीं लगभग आधी शताब्दी के बाद –
पुरानी तारीख में, “श्रमिकों” की सहायता के लिए उन्हीं के बच्चों को
बुलाने का निर्णय तो नहीं लिया गया,
जिन्होंने, मिसाल के तौर पर, तोप के
गोले ला-लाकर दिए थे?
पायनियर्स की सालगिरह से पहले तक तोप के गोले लाने
वाले किन्हीं भी “ग्राव्रोशों” * के बारे में किसी को भी याद नहीं था.
सन् 1932 में भी,
जब पायनियर्स संस्था की
दसवीं वर्षगाठ के उपलक्ष्य में ग्रेट ग्रेबेत्स्काया का नाम बदल कर पायनियर्स्काया
रखा गया था. पायनियर्स्काया के अनाम “गव्रोश” – ये सत्तर के दशक के आरंभ का विशेष
आविष्कार है. देखिये अख़बार “स्मेना” की शैली : “कोई भी उनके नाम नहीं जानता, उन्हें पहचानने की फुर्सत भी नहीं थी. बड़ों के साथ, बाप और भाइयों के साथ, पाँच
गव्रोशों ने इतिहास रच डाला”.19 और आगे : “ उस समय पायनियर्स की
टुकड़ियाँ नहीं थीं,
मगर ग्रेट
ग्रेबेत्स्काया स्ट्रीट के पाँच लड़कों ने तभी पायनियर्स की भूमिका निभाई, बड़ों के कंधे से कंधे मिलाकर, आश्चर्यजनक निडरता दिखाते हुए, ‘अक्टूबर क्रांति
के महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए जान निछावर करने की तत्परता दिखाई”. “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा”
का जोश देखिये: “अक्टूबर क्रांति के बच्चे, जिसने पैरिस कम्यून की ज्वलंत मशाल थामी थी”.20
बर्बरता
के समर्थन में नहीं, बल्कि मानवीय न्याय की ख़ातिर
: पत्थर की तख़्ती से अक्षरों के ग़ायब होने का कोई मतलब तो है. बिना अक्षरों की
इबारत भी इबारत हो सकती है. निःशब्दता स्मारक हो सकती है. और इस स्मारक को नज़रों के
सामने नहीं आना चाहिए.
ख़ुद
‘हीरोज़’ का स्मारक तो और
ज़्यादा दिलचस्प है. उसके लिए बिल्डिंग नं. 41 के निकट एक छोटा सा चौक दिया गया.
“पायनियरस्त्रोय नक्शे” पर उसे इसी नाम से दिखाया गया है – “गव्रोश स्क्वेयर” सन् ‘71 की पतझड़ से पायनियर्स – मुख्यतः “झ्दानव स्ट्रीट वाले” (शहर के एक भाग
के नाम पर) – इस पार्क को सुधारने में लग गए. ज़मीन खोदी गई, पेड़
और पौधे लगाए गए. अक्टूबर क्रांति के वयोवृद्ध सिपाही, बूढ़े
नाविक ने, जिसने हालाँकि कैडेट-स्कूल के विनाश में भाग नहीं
लिया था, मगर जिसके पास ये गुण था कि वह पायनिर्स्काया
स्ट्रीट पर रहता था, पायनियर्स के साथ ऐश-ट्री के दो पौधे
लगाए थे (जो आज भी बढ़ रहे हैं). जल्दी ही यहाँ स्मारक प्रकट हो गया: “पाँच बच्चों”
की छबि वाले दो आड़े पत्थर (लेनिनग्राद के प्रेक्षणीय स्थलों की डाइरेक्टरी से
लिंगों के बारे में स्पष्टीकरण याद रखें) और इबारत: “ पीटर्सबुर्ग के श्रमिकों के
बच्चों के सम्मान और शान में, जिन्होंने सन् 1917 के अक्टूबर
में कैडेट्स के क्रांतिविरोधी विद्रोह को कुचलने में भाग लिया था”. 21
मुझे
याद है कि कैसे इस स्मारक की तोड़-फोड़ की गई थी. बच्चों के चेहरे विद्रूप कर दिए
गए: जैसे उभरी हुई मूर्तियों पर पत्थर फेंके गए हों – चेहरों के धातुई आवरण पिचक
गए थे. भयानक दृश्य... फिर बच्चों के सिर बिल्कुल गायब हो गए,
उभरे हुए अक्षरों समेत – बचे सिर्फ पत्थर-खंभे, जो कुछ भी प्रकट नहीं कर सकते थे. ये सही है, कि एक
बार किसी ने (कहते हैं, रात को) काले रंग से पुरानी इबारत को
पुनर्जीवित कर दिया. उसी हालत में स्मारक कई साल खड़ा रहा.
मगर
सन् 2006 में, जैसा कि हमें याद है, एक शिखर सम्मेलन हुआ. इस अवसर के लिए शहर की हर चीज़ को रंगा किया, उसका नवीनीकरण किया गया, पुनर्निर्माण किया गया.
स्मारकों का भी पुनरुद्धार किया गया, सही कहें तो, उन्हें फिर से बनाया गया. तभी एक चमत्कार हुआ!...बेहद अजीब चमत्कार.
“श्रमिकों
के बच्चों” में से आधों ने अपने लिंग बदल दिये. पहले “पाँच लड़के” थे,
“पाँच बच्चे”, अब हो गए दो लड़के और दो लड़कियाँ,
और बीच में – पता नहीं कौन : शायद लड़का था या लड़की. मतलब, ये मान सकते हैं, कि राजनीतिक शुद्धता की वजह से
लड़के और लड़कियों की संख्या बराबर रखी गई. उभरे हुए अक्षरों को भी फिर से बनाया गया,
मगर इस बार उनकी संख्या कम की गई और उन्हें एक अलग क्रम से रखा गया –
राजनीतिक रूप से ज़्यादा शुद्ध: “पीटर्सबर्ग के श्रमिकों के बच्चों की शान और
सम्मान में, जो सन् 1917 के अक्टूबर में मर गए थे”. घटना के
बारे में एक भी शब्द नहीं. “प्रतिक्रान्ति” का ज़रा सा भी उल्लेख नहीं. (ख़ैर,
ये बात समझ में आती है : “विनाश”, “कैडेट्स”...-
इनसे संबंध न रखने का फ़ैसला किया गया.) मगर – ये अगला कदम कैसा था! इस बारे में
सन् बहत्तर में नहीं सोचा था...बच्चे, पता चला, कि मर गए थे! ढाई लड़के और ढ़ाई लड़कियाँ!
कैसे
मर गए? कौनसे बच्चे? उन्हें सन् 1917
के अक्टूबर में क्यों मरना था?,,,ये स्मारक
किसका है? इसका क्या महत्व है?
मासूम
बच्चों को कब्र में दफ़नाने का फ़ैसला क्यों लिया गया?
विस्फ़ारित
आँखों और चेहरों के भावों को देखकर ऐसा लगता है, कि ये
बच्चे ख़ुद ही नहीं समझते हैं कि वे किसके हैं और यहाँ क्या कर रहे हैं.
विगत
से मिथिकल तत्वों को हटाने की मेरी मंशा नहीं है.
जब
मैं स्मारक की फोटो ले रहा था, तो सचमुच के दो बच्चे
एक तरफ़ खड़े थे और न जाने क्यों मेरी तरफ़ देख रहे थे. मैंने उनसे पूछा, कि क्या वे जानते हैं कि यह स्मारक किसका है. “जानते हैं” – उनमें से एक
ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया, - “उन्होंने शीत महल पर हमला
किया था”.
तो
क्या, - हो सकता है. कोई भी स्मारक, चाहे वह कितना ही बेतुका क्यों न हो – आगे या पीछे ख़यालों को जन्म देता ही
है. बस, सिर्फ सोचना चाहिए.
या
– इंतज़ार करना चाहिए.
मई
2007
पुनश्च
(सितम्बर 2008)
इस
लेख के प्रकाशन को छह महीने भी नहीं बीते थे, और
पायनियर्स्काया स्ट्रीट पर काफ़ी कुछ बदल गया. दो सितारे गिर गए. वजह एक ही थी : पुराने
हो गए थे. पहले सितारे के पाँच मीटर्स की ऊँचाई से सिमेन्ट पर (पायनिर्स्काया और
कोर्पुस्नाया स्ट्रीट के चौराहे पर) गिरने की तारीख थी – घटना बड़ी प्रतीकात्मक थी –
सही-सही बताता हूँ: 3 सितम्बर 2007. निकोलाय फ़्योदरव ने, जो
बगल से बाइसिकल पर गुज़र रहे थे, फोटो खींचने में देर नहीं
की. मगर बस, इतिहास के लिए. यहाँ, मुझे
मानना पड़ेगा, कि पायनिर्स्काया स्ट्रीट पर, जाँचे-परखे आँकडों के अनुसार, सितारे पाँच नहीं,
जैसा मैंने लिखा है, बल्कि – सात थे. मगर
मैंने लेख में सुधार नहीं किया, महत्वपूर्ण नहीं है. इससे भी
ज़्यादा महत्वपूर्ण थी वह घटना जो अक्टूबर 2007 के अंत में हुई थी. इन दिनों
भूतपूर्व व्लादीमिर इन्फेन्ट्री स्कूल की बिल्डिंग तोड़ने के लिए आए थे, और शुरुआत इस तरह की, कि “टर्मिनेटर” नामक
एक्स्केवेटर की बाल्टी के माध्यम से उस पार्श्व को धराशायी कर दिया, जिसकी खिड़कियाँ म्यूज़िशियन्स-गली में खुलती थीं. 29 अक्टूबर 1917 को,
ठीक यहीं से, कोने से, दूसरी
मंज़िल की खिड़की से, मशीनगन से फायरिंग हुई थी, और यहीं से बोल्शेविकों की “तोप” ने सीधे गोले दागे थे. मानना पड़ेगा कि ये
एक अविश्वसनीय संयोग था - ऐतिहासिक दीवारों को गिराने का काम
“कैडेट्स के विद्रोह” के 90 वर्ष पूरे होने के दिन ही किया गया. सन् 1917 के अक्टूबर
में बोल्शेविकों की गोलाबारी ने इमारत को दो दरारों के रूप में क्षति पहुँचाई (जिसका
प्रमाण इन घटनाओं के फ़ौरन बाद जारी किए गए पोस्टकार्ड से मिलता है); इन दरारों को तभी बंद कर दिया गया था. मगर सन् 2007 के अक्टूबर में,
ठीक उसी तारीख़ को, इमारत को पूरी तरह गिरा दिया
गया. स्मारक-तोप अभी तक तो वहीं खड़ी है, जहाँ थी, च्कालव्स्की प्रॉस्पेक्ट के निकट – स्मारक दीवार के सामने, जो कब के अपने काँसे के अक्षरों को खो चुकी है. स्मारक-तोप का मुँह – यहाँ
भी निर्माणकर्ताओं की ऐतिहासिक अचूकता की दाद देनी होगी – सही दिशा में है,
ठीक उसी खिड़की की ओर, जहाँ से पहले मशीनगन बाहर
निकली थीं. लक्ष्य गायब हो गया. और अब इस प्रतीकात्मक तोप का निशाना किस तरफ़ है,
बिल्कुल स्पष्ट नहीं है. जल्दी ही उसे भी हटा लिया जाएगा. ऊपर से वह
पार्किंग में बाधा डालती है.
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* गव्रोश – विक्टर ह्यूगो के “Les Miserables” का पात्र.
16. “लेनिन्स्काया इस्क्रा” 30 जून 1971.
17. “सदा तत्पर!” संकलन ए. एल, मोझेस.
ले. 1978, पृ. 295.
18. “...बेवकूफ़ कैडेट्स,
जिन्हें बेवजह ही गोलों की मार में
धकेला गया था”. – “इज़्वेस्तिया” सेन्ट्रल एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी”, 8 नवम्बर 1917.
19. “स्मेना”. 18 मई 1972.
20. “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा”, 19 मई 1972.
21 30 जून के “लेनिनस्काया
इस्क्रा” में चित्र है : तीन लड़के तोप
के गोलों से भरे दो बक्से घसीट रहे हैं. इसका शीर्षक है “पायनियर्स्काया स्ट्रीट
पर’, अध्याय “पायनियर्स
गव्रोशी” 
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