रास्कोल्निकव का
चुम्बन :
जन्म,
जीवन, मृत्यु
इस स्मारक का अब
अस्तित्व नहीं है, जो सच है, वो
सच है. मगर उसकी छोटी सी ज़िंदगी – जन्म से लेकर मृत्यु तक – मेरी आँखों के सामने से
गुज़री : मैं बगल में ही रहता था, हर रोज़ उसके पास से गुज़रता
था. स्मारक के पश्चात् भी जीना, और न सिर्फ उससे ज़्यादा जीना
(स्मारकों की ज़िंदगी औसतन लम्बी नहीं होती), बल्कि उसके जन्म
का, और मृत्यु का भी गवाह होना - ये कोई मज़ाक नहीं है. मुझे
मालूम था, कि उसके साथ कोई ख़तरनाक चीज़ होने वाली है, मगर मुझे ये अनुमान नहीं था, कि ये इतनी जल्दी हो
जाएगा. हालाँकि उसके जीवन की डोर वाकई में अर्थपूर्ण अस्तित्व के आठवें वर्ष में
ही टूट गई, मगर मुझे ये एहसास है, कि
किस्सा अभी तक ख़तम नहीं हुआ है : ख़ाली हुए स्थान पर फिर से कुछ और प्रकट होगा,
क्योंकि पीटर्सबुर्ग के इस सबसे विशाल चौक की स्मारक के बिना कल्पना
करना असंभव है.
इसीलिए, कुछ
हिचकिचाहट के बाद मैंने अस्तित्वहीन हो चुके इस स्मारक के बारे में इस लेख को किताब
में शामिल करने का फ़ैसला कर लिया.
पुनरावृत्ति
से बचने के लिए,
अपने काफ़ी पहले लिखे हुए लेख का एक अंश प्रस्तुत करता हूँ *,
जो मैंने तब लिखा था, जब इस चीज़ को कोई ख़तरा
नहीं था.
शुरूआत
काफ़ी पहले से करते हैं, उससे जो प्रसिद्ध है.
1)
“अपराध और दण्ड” करीब दस या बीस (इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता), ‘प्रमुख’, ‘विश्व प्रसिद्ध’ उपन्यासों
की श्रेणी में शामिल है.
2) अगर
हम इन दस-बीस उपन्यासों में से ऐसे उपन्यास अलग करना चाहें, जिनमें
घटनास्थल अचूकता से वास्तविक भौगोलिक स्थान से मेल खाता हो, तो
हमें दो रचनाओं के नाम लेना होंगे – दस्तयेव्स्की का उपन्यास “अपराध और दण्ड” और
जॉयस का “युलिसिस”.
3) “युलिसिस”
में उल्लेखित डब्लिन के अनेक स्थानों में से किसी ऐसे विशेष स्थान को अलग करना
असंभव है, जो रचना की महत्वपूर्ण, क्लाइमेक्स
वाली, सार्थक घटना से जुड़ा हो, क्योंकि
उस स्थान के अनुरूप कोई प्रसंग है ही नहीं: पारंपरिक अर्थ में ‘क्लाइमेक्स’ नामक चीज़ “युलिसिस में है ही नहीं.
“अपराध और दण्ड” में वह है. तदनुसार, एक स्थान भी है,
जो इस प्रसंग से जुड़ा है, और उसे उपन्यास में
सही-सही दिखाया गया है : सेन्नाया चौक का बीच वाला भाग, चौराहा
(“चौराहे पर जाओ, लोगों के सामने सिर झुकाओ...”), वो स्थान, जहाँ रास्कोल्निकव – अपनी अंतरात्मा को
शुद्ध करने के जुनून में – इस “गंदी ज़मीन को” चूमता है. मगर,
जब ऐसा है, तो, इस तर्क के अनुसार,
ये स्वीकार करना पड़ेगा, कि सादोवाया स्ट्रीट
और मॉस्को प्रॉस्पेक्ट (तब का अबूखव्स्की प्रॉस्पेक्ट) का चौराहा, जो ग्रीव्त्सव (तब की देमिदव) गली से आगे बढ़ता है, पृथ्वी
का सर्वाधिक साहित्यिक विषय है. इससे अधिक साहित्यिक स्थान का ग्रह पर अस्तित्व है
ही नहीं. न जाने क्यों, इतना स्पष्ट
विचार किसी के दिमाग़ में आता ही नहीं है. मैंने ख़ुद भी हज़ारों बार बिना किसी हिचक
के इस हिस्से को, जो अब मिट्टी का नहीं, बल्कि डामर का है, पैरों तले रौन्दा है, अनेक बार ट्राम में बैठकर इसके ऊपर से गुज़रा हूँ, मगर
इस "नन्ही सी जगह" की रहस्यपूर्ण हैसियत के बारे में दिमाग़ में कभी ख़याल
ही नहीं आया.
जगह ने
ख़ुद ही अपनी याद दिला दी. वो भी इतने शानदार तरीके से, कि
अगर दस्तयेव्स्की के दिमाग में भी उसके द्वारा वर्णित पीटर्सबुर्ग की वास्तविकताओं
के बारे में सोचने का ख़याल आता, तो वह इस तरह की कल्पना भी
नहीं कर सकता था. जब रास्कोल्निकव ने घुटनों के बल गिर कर इस गंदी धरती को चूमा था,
उसके 138 साल बाद इस चूमी हुई धरती से एक अविश्वसनीय वस्तु ने जन्म लिया,
जिसका नाम रखा गया – ‘टॉवर ऑफ पीस’.
उसे
स्थापित नहीं किया गया, बल्कि वह वाकई में अपने आप उग आया, उसका निर्माण नहीं किया गया, बल्कि वह ख़ुद ही
निर्मित हो गया. दरअसल, मूल योजना के अनुसार कुछ इसी तरह का,
सैद्धांतिक रूप से काफ़ी ऊँचा और काँच-धातु का बना प्रकाश-स्तम्भ शहर
के समुद्री द्वार पर खड़ा करने की योजना थी, जो कम से कम
तर्कसंगत प्रतीत होता.
मगर पीटर्सबुर्ग
की 300वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में भेंट किए गए फ्रान्स के उपहार - “शांति के
प्रकाश स्तम्भ” को, कम से उस समय उसकी इसी रूप में कल्पना की गई थी,
खाड़ी के किनारे पर जगह ही नहीं मिली. चूँकि उपहारों को अस्वीकार
करने की प्रथा नहीं है, इसलिए इस संरचना को, “जहाँ जगह मिले” वहीं स्थापित करने
की योजना बनाई गई – जगह मिली सेन्नाया चौक पर. वह काफ़ी बड़ा है; कल्पना में भी सुधार कर दिया गया : प्रकाश-स्तम्भ नहीं, बल्कि टॉवर. सचमुच में, सेन्नाया चौक का नाम न जाने
कब से “शांति-चौक” हो गया था ना? ‘टॉवर ऑफ पीस’ को वहीं खड़ा रहने दो. इस जगह के चुनाव के पीछे किसी और ठोस कारण की ज़रूरत
नहीं थी. “सेंट पीटर्सबुर्ग को इस टॉवर की ज़रूरत क्या है?”
इस आलंकारिक प्रश्न का उत्तर भी उतना ही आलंकारिक था: “फ्रान्स दे
रहा है”.
वर्षगांठ-समारोहों
से दो महीने पहले एक अविश्वसनीय बात का खुलासा हुआ: फ्रान्स की सरकार का “टॉवर ऑफ
पीस” से कोई लेना-देना नहीं है. मगर सेंट पीटर्सबुर्ग की 300वीं वर्षगांठ के समारोहों
में शामिल हो रहे फ्रान्स के जनरल-कमिश्नरेट के कमिश्नर-जनरल का उससे सीधा संबंध
है. व्यक्तिगत रूप से. निजी हैसियत से उसने निजी तौर पर अपने निजी प्रोजेक्ट के
लिए प्रायोजक भी ढूँढ़ लिए, जिसके रचनाकारों में उसकी पत्नी भी
शामिल थी, जो एक शिल्पकार थी और जिसका प्रॉजेक्ट की संकल्पना
से संबंध था. उसने निजी तौर पर रशियन फेडेरेशन के राष्ट्रपति व्लादीमिर
व्लादिमिरोविच पूतिन को पहले ही पीटर्सबुर्ग में “टॉवर ऑफ़ पीस” की स्थापना के लिए
मना लिया था. और अचानक पता चलता है : ये प्रत्यक्ष फ्रान्स का उपहार नहीं, बल्कि उसके नागरिक की निजी पहल की उपज है.
प्रेस
वाले शोर मचाने लगे. जनता विरोध करने लगी. फ्रान्स के कमिश्नर पर पारिवारिक हितों
की पैरवी करने का आरोप लगाया गया. स्कैण्डल भड़कने लगा. भावी संरचना के ब्लॉक्स को
सीमा पर ही रोक दिया गया. सीमा शुल्क अधिकारियों ने शहर को बिल भेज दिया. ऐसा लगा, कि
टॉवर, वह चाहे जैसा भी हो, जो अब तक
हमारे यहाँ नहीं था, आगे भी नहीं होगा, हर बात उसके ख़िलाफ़ थी. मगर फिर भी वह प्रकट हो ही गया, जैसे ज़मीन से ऊग आया. क्यों? किसलिए? यहीं क्यों?
कहीं
इसलिए तो नहीं,
कि 138 साल पहले इसी जगह पर रास्कोल्निकव ने धरती को चूमा था?
टॉवर जगमगाता
है,
और उसका आंतरिक प्रकाश जैसे ख़ुद धरती से निकलता है.
घुटनों
के बल झुककर रास्कोल्निकव ने धरती को चूमा था, दो बार झुककर, - और ये है उसका परिणाम : 138 साल बाद प्रकाश-टॉवर से निकलती प्रकाश की दो
ऊर्ध्वाधर किरणें हाइपरबोलॉइड की तरह पीटर्सबुर्ग के आकाश को अर्थपूर्ण ढंग से छेदती
हुई चली गईं.
“...पहले
उस धरती को चूम,
जिसे तूने अपवित्र किया है, और फिर पूरी
दुनिया को प्रणाम कर...” रिवाज के अनुसार प्रदर्शित रास्कोल्निकव की इस मुद्रा का
अर्थ धरती से क्षमा याचना करना था, जिसके प्रति उसने पाप
किया था, उन लोगों के बीच लौटना था, जिनका
कानून उसने तोड़ा था, दुनिया से सुलह करना था. “...पूरी
दुनिया को प्रणाम करता है, राजधानी-शहर सेंट पीटर्सबुर्ग और
उसकी मिट्टी को चूमता है...” मगर, चलिए टॉवर की तरफ़ देखें. “शांति शांति शांति शांति...” – सिर्फ
रूसी में चालीस बार, और वही “शांति” शब्द दुनिया की बत्तीस
भाषाओं में!
पूतिन से
मुलाकात के बाद परियोजना के प्रणेता ने एक इंटरव्यू दिया: “व्लादीमिर ने मुझसे
कहा...कि वह पीटर्सबुर्ग के राजनीतिक महत्व को बढ़ाना चाहेंगे. “टॉवर ऑफ पीस” इस
मिशन को पूरा करेगा : उसके पास 50 देशों के राष्ट्रपति, जो
पीटर्सबुर्ग की 300वीं वर्षगांठ के उत्सवों के लिए आएँगे, “शांति
के साथ विशेष अनुबंध” पर हस्ताक्षर करेंगे. वे हमेशा के लिए अपने हस्ताक्षर छोड़ कर
जाएँगे. और ये परंपरा चलती रहेगी – अन्य देशों के राष्ट्रपति, जो बाद में पीटर्सबुर्ग आते रहेंगे, वे भी यहाँ अपने
हस्ताक्षर करेंगे.” **
मतलब, इस
शानदार परियोजना के, इस जगह के अनुसार, जहाँ रास्कोल्निकव को दुनिया के चारों कोनों के सामने झुकना था, दुनिया के हर कोने से, उसके हर भाग से शासकों को
यहाँ आना होगा और उस रस्म को पूरा करना होगा, जिसका निश्चय
रास्कोल्निकव ने किया था. क्योंकि रदिओन रमानोविच की पारंपरिक मुद्रा को अपनी ही
तरह के “शांति से समझौते” के रूप में भी देखा जा सकता है.
संभव है, कि पूरी दुनिया के शासक, जो
किसी अज्ञात शक्ति से खिंचकर यहाँ आएँगे, “टॉवर ऑफ पीस” पर
अपने-अपने हस्ताक्षर करते हुए, प्रतीकात्मक रूप से
रास्कोल्निकव की ही तरह, धरती-माँ से क्षमा की याचना करेंगे,
जिसके प्रति उन सब ने पाप किया है, और शायद, निश्चय ही आध्यात्मिक परिशुद्धि के क्षणों को भी महसूस करेंगे.
मगर, आश्चर्य
है, कि इस अविश्वसनीय टॉवर के बारे में सपने देखते हुए,
इसमें रुचि लेने वाले लोगों ने दस्तयेव्स्की के बारे में सोचा तक
नहीं. सब कुछ, जैसे, अपने आप हो गया,
साहित्यिक स्त्रोत की ओर इशारा किए बगैर. ***
अफ़सोस की
बात है,
कि यह प्रॉजेक्ट पूरी तरह कार्यान्वित नहीं हो सका. अगर हो जाता,
तो काफ़ी दिलचस्प होता. पाँच मंज़िला इमारत की ऊँचाई की, लिंग के आकार की ये वस्तु परिस्थितियों, मानवीय तर्क
और जनता की मनोदशा के विपरीत, जैसे काले जादू के प्रभाव से,
उत्पन्न तो हुई, धरती पर निर्मित हुई, पश्चात्तापदग्ध हत्यारे द्वारा चूमी भी गई, मगर बात
यहीं पर समाप्त हो गई. टॉवर आकर्षक नहीं बना. राष्ट्रपति उसके पास नहीं आए. समझौते
पर हस्ताक्षर नहीं किए गए. एक बार यहाँ एक्टर देपार्दे को लाया गया. सेन्नाया पर
कुछ देर ठहरने के बाद उसने कहा : “अत्यंत विलक्षण!”
उपरोक्त
वर्णन को पढ़ने वाले पाठक ने अंदाज़ लगा लिया होगा, कि ये मेरा सर्वाधिक प्रिय
स्मारक नहीं था. चाहे मैं अपने आप को सभी स्मारकों का, बिना
किसी भेदभाव के, संरक्षक क्यों न कहूँ, फिर भी उनमें से कुछ, स्वीकार करना पड़ेगा, मुझे प्रासंगिक नहीं लगते. “टॉवर ऑफ पीस” हरेक को पसन्द नहीं आता था,
पूरा शहर, उसकी सरकार सहित, इस बात को स्वीकार करने से डरता था.
ख़ासकर
सर्दियों में तो टॉवर बहुत ही दयनीय प्रतीत होता था, जब उसकी बगल में एक विशाल ‘सान्ता क्लॉज़’ प्रकट हो जाता था, अत्यंत भयावह किस्म का – एक वस्तु बिल्कुल दूसरी जैसी थी, और वे दोनों मिलकर एक अतियथार्थवादी चित्र बनाते थे. मगर साल के अन्य
दिनों में भी टॉवर अपने रूप से, अपने बेतुकेपन से, अपनी अयोग्यता से नागरिकों को सताता था – हाँ,
अयोग्यता से : यातायात के मार्ग में बाधा डालता था, जिसके बारे में यातायात के संकेत चेतावनी देते थे.
सन् 2010
की गर्मियाँ बेहद गर्म थीं. असामान्य गर्मी को बर्दाश्त न कर सकने के कारण (ऐसा
शासकीय स्पष्टीकरण था, जिस पर अविश्वास करने का हमारे पास कोई आधार
नहीं है), टॉवर के पैनल्स का काँच कई जगहों पर चटख गया (कम
से कम एक जगह पर तो चटखा ही था). टॉवर को 29 जुलै की रात में गिरा दिया गया,
और वो भी इतनी शीघ्रता से, कि उसे तोड़ते समय न
केवल सिग्नल लाइट्स टूट गए और ट्राम-वे के तारों को नुक्सान पहुँचा, बल्कि, सबसे महत्वपूर्ण बात ये हुई कि खुद टॉवर का धातु
का ढाँचा भी तोड़ दिया गया. उस रात टॉवर के
पुनर्निर्माण का प्रश्न हमेशा के लिए ख़त्म हो गया – व्यावहारिक रूप से. अगले
कुछ दिनों में भूतपूर्व रिपब्लिक्स के मज़दूरों ने जैक हैमर्स की सहायता से स्मारक
की कॉन्क्रीट की नींव को भी पूरी तरह नष्ट कर दिया. फ्रान्स में परियोजना के
शिल्पकारों ने विरोध करने का प्रयत्न किया, मगर, अफ़सोस, बदकिस्मती से “टॉवर ऑफ पीस” का पुनर्निर्माण
नहीं हो सकता.
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* “दस्तयेव्स्की
सेन्नाया पर,
या दस्तयेव्स्की रहित सेन्नाया” – एस. नोसव. परिस्थितियों का
संग्रहालय. – सेंट पीटर्सबुर्ग, पृ. 55-60
** गोलुब्येव ई.
पैरिस में रूसी द्वीप. (मारेक हाल्ट्येर से एक मुलाकात) – सेंट पीटर्सबुर्ग
युनिवर्सिटी. नं.6 31(3622). 31 दिसम्बर 2002.
*** सेन्नाया चौक पर
“टॉवर ऑफ पीस” के साथ-साथ एक और चीज़ का उद्घाटन हुआ था – पुनर्निर्मित पीने के पानी
के फ़व्वारे का,
जो पुराने शानदार ज़माने में त्सार्स्कोए सेलो के रास्ते पर था (वास्तुकार
तोमस द तोमन). उसी “दस्तयेव्स्की सेन्नाया पर ...” नामक लेख में इस संरचना के बारे
में इस तरह लिखा है : “कुल्हाड़ी से लैस, सेन्नाया से अधिकाधिक
दूर जाते हुए, रास्कोल्निकव हत्या करने जा रहा था. दिमाग़ में
ऐसे विचार आ रहे थे, जिनका अपराध की बोझिल कल्पना से कोई मेल
नहीं था. यह ज्ञात है, कि युसुफव गार्डन के पास से गुज़रते हुए
वह ऊँचे-ऊँचे फ़व्वारों की व्यवस्था करने के बारे में सोच रहा था और उसके दिमाग में
ये ख़याल भी आया, कि इससे सभी चौराहों पर हवा में कितनी ताज़गी
भर जाएगी.” इसके अलावा, हमें ज्ञात है, कि “उसे सेन्नाया के अपने सैर-सपाटों की भी याद आई”, मतलब, ये मान सकते हैं, कि थोड़े
से वक्त में वह ख़यालों में वापस सादोवाया पहुँच गया – 350-400 कदम, ठीक उसी जगह जहाँ रास्कोल्निकव के प्रलाप ने जन्म लिया : फव्वारा प्रकट हुआ.
मगर फ़ौरन नहीं. 138 साल बाद, सेंट पीटर्सबुर्ग की तीन सौवीं वर्षगांठ
पर. फव्वारा घोड़ों के पानी पीने के लिए है, उनकी अनुपस्थिति के
कारण वह ऊपर की ओर है. पानी ऊपर नहीं उछलता, चार धाराओं का रुख
नीचे की तरफ़ है. रास्कोल्निकव को शायद ही उससे ख़ुशी होती”. “परिस्थितियों का संग्रहालय
”. पृ, 55. इसमें ये भी जोड़ दें कि कई सालों से फव्वारा काम नहीं
करता है.


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