स्मारक जो मुझे बेज़ार करता है
किसी कारण से यह
वस्तु मुझे अपने से दूर हटाती रही. पीटर्सबुर्ग के स्मारकों के जीवन के बारे में
पहला भाग लिखते समय मैंने इसे ग़ौर से देखा था, काफ़ी देर तक
सोचता रहा कि उससे जुड़ना चाहिए या नहीं, मगर मेरे भीतर की हर चीज़
मुझसे कह रही थी, कि ये मेरा विषय नहीं है. मुझे ये समझाने
में भी मुश्किल हो रही है, कि मैं उसके इतना ख़िलाफ़ क्यों था.
मेरे कुलनाम के कारण ऐसा हुआ हो1 - ये असंभव था. सबसे अधिक संभावना इस बात की है, कि
रीम्स्की-कर्साकव और वज़्नेसेन्स्की – इन दो प्रॉस्पेक्ट्स के कोने पर स्थित मेजर
कवाल्योव की नाक – चाहे जो कहो, एक स्मारक है, आरंभ में अर्थहीन, मगर इसके अर्थ और महत्व को समझाने
का या, इसके विपरीत, इस पर बहस करने का
मतलब है – किसी और का ‘गेम’ खेलना और
ख़ुद को झूठी स्थिति में रखना. मैंने ख़ुद ही तो गेनादी ग्रिगोरेव की मशहूर कविता “द
बोर्ड” पर टिप्पणियों में लिखा था : “क्या यहाँ किसी और साहित्यिक पात्र की
प्रतिमा को अमर बनाना उचित नहीं होता – इस जगह पर गाड़ीवान ने मर्मिलादव को कुचल
दिया था...” * हालाँकि, यदि
सच कहा जाए, तो मर्मिलादव का स्मारक-पत्थर, सिम्योन ज़खारविच के प्रति मेरे पूरे सम्मान के बावजूद, यहाँ और भी भद्दा लगता. तो, मैं स्वीकार करता हूँ,
कि तब मैंने मर्मिलादव का उल्लेख अपनी बात को असरदार बनाने के लिए
किया था, बस इतना ही. जहाँ तक इस जगह पर नाक के
स्मारक के प्रकट होने का सवाल है, तो उसके पीछे छुपे रहस्यमय कारणों
के बारे में हम मिखाइल ज़ोलतानोसव से पूछ
सकते हैं, जिसने उस नाक को “संकल्पनात्मक यथार्थवाद” की
श्रेणी में रखा था, - अपनी किताब “काँस्य युग” में वह लिखता
है : “हालाँकि गोगल ने कहा था, कि नाई इवान याकव्लेविच
वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट पर रहता था (मगर इसाकोव्स्की चौक
के काफ़ी पास, वर्ना वह नाक को मोयका में नहीं बल्कि
एकातेरिनिन्स्की कॅनाल में डुबोने की कोशिश करता), मगर नाक का
स्मारक रीम्स्की-कर्साकव और वज़्नेसेन्स्की चौराहों के कोने पर अजीब लगता है –
सिर्फ आर्थिक-वित्तीय समूह “रोस्को” ने <…> , जिसने “गोल्डन अस्ताप”
उत्सव के आयोजन और इस वस्तु का निर्माण करने के लिए वित्तीय सहायता दी थी, इस बिल्डिंग में एक कमरा किराए पर लिया था. यहीं पर “गोल्डन अस्ताप” <…>उत्सव के प्रशासनिक कार्यालय और “हाउस ऑफ ह्यूमर एण्ड सटायर” था.** ये बात
है,
और आप कहते हैं – गोगल.
और फिर, ये
आख़िर है क्या – स्मारक या सिर्फ स्मारक-पट्टिका? और
महत्वपूर्ण बात, ये वस्तु चाहे जो भी प्रतीत हो, वह आख़िर किसे समर्पित है? हाँ, बेशक, अपने सम्पूर्ण आकार में प्रदर्शित फूले हुए
नथुनों वाली नाक यूँ ही स्मारक नहीं कहलाती. और स्मारक – नाक का, गोगल
के पात्र का. “मेजर कवाल्योव की नाक” – चूना पत्थर के बोर्ड पर लिखा है. मगर
दूसरी तरफ़,
“सेंट पीटर्सबुर्ग की स्मारक पट्टिकाएँ” नामक विस्तृत संदर्भ पुस्तिका
में (1999) इस वस्तु को नियमित रूप से स्मारक-पट्टिकाओं में शामिल किया गया है,
ऊपर से व्यक्तिगत रूप से गोगल को समर्पित पट्टिकाओं में – शीर्षक
में ऐसा ही कहा गया है : “एन. वी. गोगल को समर्पित (मेजर
कवाल्योव की नाक)”.*** मतलब
- “नाक” के रचनाकार को, न
कि ख़ुद नाक को
समर्पित है ये स्मारक-पट्टिका (या स्मारक?). गोगल को – नाक.
मेहेरबानी
करके इतना तो बताइये, कि मेजर कवाल्योव की नाक की
ख़ातिर ख़ास गोगल की मातृभूमि से गुलाबी संगमरमर लाने की क्या ज़रूरत थी?
यह
कृत्रिम “संकल्पनावाद” किसलिए?
उसी को
पहले स्थापित किया गया, इस नाक को, ठीक बिल्डिंग
के कोने में, जिससे वह शब्दश: - बाहर
निकले, मानो साहसी कारनामों की तलाश कर रही हो. बेशक,
उन्हें ढूँढ़ने के लिए उसने स्वयम् को मजबूर नहीं किया. नाक एक बार
ग़ायब हो गई. मगर मेजर कवाल्योव की नाक से आपको और क्या चाहिए? सबको
ऐसा लगने लगा कि उससे सिर्फ ऐसी ही किसी बात की उम्मीद थी. मगर, जब, एक साल बाद, वह अचानक मिल
गई, वो भी लगभग पड़ोस के घर की सीढ़ियों की लैण्डिंग पर,
तब पूरा शहर ख़यालों में उसके लिए तालियाँ बजाने लगा, जैसे दर्शकों को ख़ुश करने वाले जादूगर के लिए बजाते हैं.
उसके
सारे “रहस्य” जैसे आपके सामने हों, ये साहसी कारनामे जैसे वह जानबूझकर
कर रही हो. जैसे वह आपकी अपेक्षाओं को झुठलाना नहीं चाहती.
और ये, - कि जब वह अनुपस्थित थी, उस दौरान गड़बड़ करके उसके
स्थान पर एक अन्य नाक बिठा दी गई और शहर में लगभग एक जैसी दो-दो नाकें हो गईं,
- इसमें भी कुछ विशेष बात है. और ये विशेषता है – मस्सा, जिसे जानबूझकर दूसरी नाक पर (नाक को?)
“उगाया” गया है, जबकि पहली नाक पर कोई मस्सा-वस्सा नहीं
था...
और हाँ, वह
सबकी प्यारी है. और अच्छी बात है. उसके लिए खुश हूँ. उसे अपने हाल पर रहने दें और
मेरी किताब अपनी राह पर चलती रहे. ये स्मारक – मेरा पात्र नहीं है. और मैंने फ़ैसला
कर लिया कि उसे हाथ नहीं लगाऊँगा.
और अभी
हाल ही तक हाथ भी नहीं लगाया.
मगर फिर
भी वह मेरे इरादों को बदलने पर उतारू है.
तीन दिन
पहले हमनाम मेजर का एक संदेश मिला.
“नमस्ते!
मेरा नाम व्लाद कवाल्योव है. मैं फ़िल्म और टी.वी. युनिवर्सिटी का विद्यार्थी हूँ, टी.वी.
प्रोग्राम-डाइरेक्टर का कोर्स कर रहा हूँ. हालात कुछ ऐसे बने,
कि इत्तेफ़ाक से या किस्मत से आप मुझे मिल गए. बात ये है, कि युनिवर्सिटी में हमें घर के बारे में फिल्म बनाने का काम दिया गया है,
और मैं वज़्नेसेन्स्की पर 36 नंबर के घर के बारे में फ़िल्म बना रहा
हूँ, जहाँ मेजर कवाल्योव की नाक (गोगल के
अनुसार) रहती थी. फिल्म “रहस्यवादी” शैली में आभासी-डॉक्यूमेन्ट्री होगी. कई सारे
विचार और कल्पनाएँ हैं, मगर दो महीनों से मैं कथावस्तु और नाटक पर ही
अटका हूँ. कल, मेट्रो में जाते हुए, पूरी
तरह से निराश, मैंने आपकी किताब “पीटर्सबुर्ग के स्मारकों का
रहस्यमय जीवन” का इश्तेहार देखा... मैं समझ गया कि विषय बिल्कुल मेरे विषय जैसा ही
है. और, श्लेष के लिए क्षमा करें, कुलनाम
नोसव ने मेरा ध्यान और ज़्यादा आकर्षित किया, जिससे मेरा मिजाज़
ख़ास रहस्यमय हो गया. हालाँकि मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं है, कि आप इस संदेश को पढेंगे और मेरी मदद करने का निश्चय करेंगे, मगर यदि हमारे जीवन में रहस्यात्मकता है, तो हम
मिलकर बेहद दिलचस्प प्रॉजेक्ट बना सकते हैं. जवाब का बेसब्री से इंतज़ार करूँगा,
क्योंकि समय करीब-करीब है ही नहीं”.
मेरे पास
भी बिल्कुल समय नहीं है, ऐसा ही मैंने उस नौजवान को अपने जवाब में
समझाया, और साथ ही स्मारक के बारे में अपनी थोड़ी-बहुत
जानकारी उसके साथ बाँटी – क्या पता, अचानक उसके काम आ जाए.
उसने मुझे फ़ौरन लिखा, कि “इस घर और ख़ुद नाक के बारे
में उसके पास ढेर सारे तथ्य और खूब सारे किस्से हैं” और वह ख़ुद “ये सब सुलझाने में
एकदम असमर्थ है”. साथ ही उसने मुझे फिल्म बनाने के लिए आवेदन और दो मिनट की तैयार
फिल्म भी भेजी,
जिससे उसके इरादों की गंभीरता और इस कला में उसकी योग्यता की पुष्टि
होती थी. “हो सकता है, आपके साथ एक ही मुलाकात मेरे लिए
मददगार होगी?” – विद्यार्थी कवाल्योव ने लिखा.
किसी न
किसी तरह से नाक मेरे
पीछे पड़ी थी – अजनबियों के माध्यम से. उससे बचने का कोई रास्ता नहीं था.
हमने
मिलने का फ़ैसला किया, और, जब नियत समय पर मैं
लोगों से खचाखच भरे कैफे में पहुँचा, तो मैं फ़ौरन समझ गया,
कि उनमें व्लाद कवाल्योव कौन है – नौजवान, जिसकी
हर चीज़ में रचनात्मकता की खोज छलक रही थी. उसके सामने मेज़ पर खुली हुई नोटबुक पड़ी
थी. हमने एक दूसरे का अभिवादन किया.
हमारी
बातचीत दिलचस्प रही – लगता है, कि आख़िर में मैं उस नौसिखिये डाइरेक्टर
को कुछ निर्णय लेने के लिए प्रेरित करने में कामयाब हो गया, मगर
फ़िलहाल बात किसी और के बारे में है : उसने ख़ुद मुझे मज़ेदार बातें सुनाईं. उसी घर
के बारे में जिस पर नाक स्थापित है.
मुझे तो
इस घर के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था.
संक्षेप
में,
घर सीधा-सादा नहीं है – डरावनी सीढियों, उलझे
हुए गलियारों और सुनसान आँगन वाले इस घर को न जाने क्यों एक लालटेन से ढाँक दिया
गया था. घर में फिलहाल कोई नहीं रहता (लोगों में से कोई नहीं रहता). आँगन में छज्जे
तक पेड़ बढ़ गए हैं, लालटेन के अधिकांश हिस्से में काँच टूट
चुका है. फिल्म के लिए बेहतरीन ‘सेट’… आसपास
के क्षेत्र में इस घर के बारे में क्या-क्या कहते हैं, इसमें
अचरज की कोई बात नहीं है. घर पे तो, शायद, शैतान का साया है.
अच्छा-अच्छा.
ऐसा ही अनुमान लगाया जा सकता है. मगर शैतानियत किस बात से पता चलती है?
इस बात
में. जैसे,
पिछले करीब बीस सालों में उस घर में अजीब-अजीब घटनाएँ हुई हैं,
जैसे कोई शैतानी ताकत उसमें घुस गई हो. इस शताब्दी में भी कम से कम
छह बार उसमें रहने के लिए लोग आए – और हमेशा लफ़डों और ज़्यादतियों के बाद उन्होंने
घर छोड़ दिया. चाहे किन्हीं भी शर्तों पर लोग यहाँ रहने के लिए क्यों न आए हों,
रखरखाव में हमेशा समस्याएँ आती रहीं. इन परित्यक्त कमरों ने, सौम्य शब्दों में कहें तो, अत्यंत रहस्यमय
व्यक्तियों को आकर्षित किया था. एक अड्डा गायब
हो जाता, उसकी जगह दूसरा प्रकट हो जाता. उत्साही लोगों ने “N.O.S.”
( New Education Society)- इस विशिष्ट नाम से आर्ट-स्पेस बनाने की कोशिश की और वे, जैसे, इसमें कामयाब भी हो गए, मगर “नाक में प्रदर्शनियों” की श्रृंखला, “ध्वनि यंत्रों की स्थापना” और नौजवानों के अन्य प्रॉजेक्ट्स अचानक आग लगने
से, कानून के रक्षकों के छापों के कारण, बेदखल करने के कारण और, काल्पनिक मकान-मालिक के
ख़िलाफ़ कोर्ट केस के कारण बर्बाद हो गए, पता चला कि ये
काल्पनिक मकान मालिक पराई सम्पत्ति को हड़पना चाहता था. मेरे साथ बातचीत करने वाला
विद्यार्थी ख़ुद भी यहाँ के तहख़ाने में गया था और उसने घर के भीतर की ज़िंदगी के
बारे में जानकारी हासिल की, मगर विस्तार में नहीं गया,
और मैंने भी नहीं पूछा, - चलो, ये सब उसकी फिल्म के लिए रहने दो, और वैसे भी पता है,
कि घर “अभिशप्त” है, शायद, मॉस्को की बल्शाया सादोवाया स्ट्रीट
वाले “अभिशप्त क्वार्टर” से भी ज़्यादा “ख़तरनाक” है. (बल्शाया सादोवाया पर स्थित
अपार्टमेंट बिल्डिंग का फ्लैट नं. 302, जहाँ मिखाइल बुल्गाकव के
उपन्यास “मास्टर और मार्गारीटा” की घटनाएँ घटित होती हैं –
अनु.)
इतने से
ही सब समझ में आ जाता है. कुछ और हो ही नहीं सकता. असल में मुझे सचमुच में सिर्फ
एक घटना ने आश्चर्यचकित किया : कवाल्योव के अनुसार – क्या ऐसा संभव है? – उस घर का, जिसके दर्शनीय भाग पर बदमाश नाक
स्थापित है,
कोई नम्बर ही नहीं है. घर की जैसे, कहीं भी
रजिस्ट्री नहीं हुई है”. “ऐसा नहीं हो सकता”, मैंने कहा.
“हाँ, मैं तो जानता हूँ”, कवाल्योव ने
कहा. अजीब बात है. नहीं, अगर ऐसा है, तो
ये वाकई में बेहद अजीब है, है ना?
हम इसी
तरह कैफे में बैठे थे, दो आदमी – कवाल्योव और नोसव, और बातें करते रहे मेजर कवाल्योव की नाक के बारे में, वास्तविकता
पर उसके प्रभाव के बारे में. कवाल्योव स्वभाव से रहस्यमय था. उसे तो ये बात भी रहस्यमय
प्रतीत हो रही थी, कि उसका काम हेड ऑफ द डिपार्टमेन्ट
स्वीकार करने वाला है, जिसका कुलनाम क्रिवानोस है. “ओह!” मैं
चहका. “अलेक्सान्द्र पित्रोविच को मेरा नमस्ते कहिए”. “आप, क्या
एक दूसरे को जानते हैं?” कवाल्योव ने भँवें चढ़ाईं. “हाँ, हमने एक साथ मिलकर
“कल्चर” चैनल पर सौ से ज़्यादा कार्यक्रम किये हैं!...” और तब तस्वीर पूरी करने के
लिए मैंने कवाल्योव को मिखाइल ज़ोलतानोसव (ऊपर उल्लेखित), मेरे
कट्टर प्रतिद्वंद्वी और मेरी पहले वाली किताब**** के
जोशीले आलोचक के बारे में बताया. आधुनिक स्मारकों के विशेषज्ञ, ज़ोलतानोसव
एम.एन. मेजर कवाल्योव की नाक के बारे में विस्तार से लिख चुके हैं, इसलिए
संदर्भों के लिए असल में – उसके पास जाना चाहिए. विद्यार्थी कवाल्योव ने ज़ोलतानोसव
के बारे में लिंक को अपनी मोटी नोटबुक में लिख लिया और जैसे उससे सम्पर्क करने के
लिए भी उत्सुक हो गया.
और ये
सही है. ज़ोलतानोसव एम. एन. उसे स्मारक नाक के बारे में सब-सब बताएगा. और मैं आधुनिक
स्मारकों में दिलचस्पी पूरी तरह खो चुका हूँ, और कुछ हद तक मिखाइल
नफ्ताल्येविच ज़ोलतानोसव के कारण. ये मेरा
नहीं – उसका विषय है.
मगर ये
विषय मेरी इच्छा के ख़िलाफ़, अपने आप प्रकट हो जाता है....
आप कहते
हैं,
मैं रहस्य चाहता था? देखिए, सब कुछ साफ़ है. सिर्फ इस ख़याल से इनकार करना होगा कि गोगल के पात्र का इस
जगह से कोई संबंध है. “घर, जिसमें ‘नाक’ रहती
थी”. ये गलत है. इसी घर में वह नहीं रहती थी, और हम इस बारे में बात कर
चुके हैं. सिर्फ इस घर पर संगमरमर की नाक (ज़ोलतानोसव की
किताब में,
वैसे, ग्रेनाइट की है) फ़टाफ़ट चिपका दी गई, और यहाँ उत्सव के आयोजकों ने जैसे एक गूढ़ पाप किया है – न सिर्फ
साहित्यिक वास्तविकता के प्रति, बल्कि इस घर के मेहमानों के
रूप में वास्तविकता के प्रति भी. नाक बेवकूफ़ थोड़े ही थी, उसने
भी अपना रंग दिखाना और घर पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया. और बड़ी सफ़लता से. इस समय नाक ही इस
अभागे घर की इकलौती मालिक है. कुसूर किसका है? ज़ाहिर है, किसका. इस कल्पना के जनक वदीम झूक, शिल्पकार वसीली
अज़ेम्शा, वास्तुकार विचेस्लाव बुखायेव, कलाकार रेज़ो गब्रिआज़े...और इसके आगे – “गोल्डन अस्ताप”.
हाँ, मुझे
ये काफ़ी दिलचस्प लगा...मतलब नाक का स्मारक – ये, जैसे
कोई गोलेम हो. उसमें जान फूँक दी, और अब वह किसी के बस में
नहीं आ रहा है.
आँ?
मगर अभी
बात पूरी नहीं हुई. आगे चलते हैं. “नाक” घर के कोने से गायब हो गई, फिर
अचानक मिल भी गई, वह दर्शनीय भाग पर लटकी थी. आप कहेंगे, चुरा लिया. और
फिर वापस फेंक दिया? चुरा कर तो देखिए ऐसी भारी-भरकम चीज़ को,
और फिर वापस भी फेंक दीजिए. मगर इससे क्या फ़र्क पड़ता है, कि उसके साथ क्या हुआ, यदि इस घटना के फलस्वरूप नाक का
प्रतिरूप उत्पन्न हो गया? अपने गायब होने का उसे ये फ़ायदा
हुआ – अपने लिए उसने एक प्रतिरूप तैयार कर लिया. और फिर ऐसे लौट आई, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था. समझ रहे हैं ना? वह ख़ुद ही
घटना का संचालन करती है. ये उसे नहीं चुराते–वापस करते हैं, बल्कि
वह ख़ुद ही अपनी इच्छा पूरी कर लेती है. पहले एक थी – अब दो हो गईं. परिणामस्वरूप अब
वह “म्यूज़ियम ऑफ अर्बन स्कल्प्चर” के आँगन में भी दीवार पे टंगी है. और इस क्षेत्र
में भी उसका विस्तार हो रहा है.
और इसी
तरह का बहुत कुछ. मेरे साथ वार्तालाप कर रहा व्लाद कवाल्योव भी इसी रौ में बहस कर
रहा था. हमारी बातचीत बहुत अच्छी रही – वह ख़ुश हो गया, मैं
ख़ुश हो गया, और एक दूसरे से ख़ुश, वार्तालाप
से प्रेरित होकर हम दोनों अपने-अपने घरों को चल पड़े.
वापस लौट
कर,
मैं नाक के बारे में न सोचने का विचार ही न कर
सका. सबसे पहले,
मैंने इस बात की जाँच करने का निश्चय किया कि क्या वाकई में उस कोने
वाले घर पे कोई नंबर नहीं है, जिसके बारे में हम इतनी देर तक
कैफे में बात करते रहे थे. पता चला कि इस पते के बारे में काफ़ी घोटाला है.
रीम्स्की-कर्साकव प्रॉस्पेक्ट पर कुछ नक्शों में उसे 11वें नंबर से दिखाया गया है,
अन्य नक्शों में – 13 से (यहाँ उसे दो घरों में विभाजित किया गया है
– 11 और 13, हालाँकि वहाँ असल में सिर्फ एक ही घर है). और
वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट पर उसे कोई नंबर नहीं दिया गया है. अगला घर – 36 है,
मगर ये – पड़ोस में है, अगला, न कि ये वाला. इस बीच विभिन्न स्त्रोतों में, अलग-अलग
मौकों पर, हालाँकि नाक के स्मारक के
पते के ही संदर्भ में, आजकल इस वीरान घर का नंबर अक्सर इस तरह दिखाया
जाता है : 36/11. मगर 36, मैं कह रहा हूँ, अगला वाला है, और इस वाले का वज़्नेसेन्स्की के
अनुसार सचमुच में कोई नंबर ही नहीं है. नंबर 34 – रीम्स्की-कर्साकव प्रॉस्पेक्ट के
दूसरी ओर है. और 36 और 34 के बीच वाला घर वाकई में बे-नंबर है. नतीजा ये निकला कि
विद्यार्थी कवाल्योव ने मुझ पर कोई जादू नहीं किया! सब कुछ ऐसा ही है!
नहीं, ऐसा
भी होता है – कोने वाले घर को एक तरफ़ की सड़क से नम्बर नहीं दिया जाता, मगर, ये, अगर मैं गलती नहीं कर
रहा, तो तब होता है, जब इस सड़क से घर
का प्रवेश द्वार नहीं होता. मगर यहाँ सब कुछ ठीक-ठाक है – प्रमुख द्वार
वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट की तरफ़ से है. मगर नंबर नहीं है.
ये क्या
बात हुई?
क्या मेजर कवाल्योव की नाक का स्मारक उस
घर पर स्थापित किया गया है, जो अस्तित्वहीन है?
मगर जब
वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट मयोरव (रूसी में मेजर को ‘मयोर’
कहते हैं – अनु.) प्रॉस्पेक्ट था, क्या
तब इस घर का अपना कोई नम्बर था?
वैसे
अपनी ज़िंदगी के काफ़ी सालों तक मैं वज़्नेसेन्स्की को मयोरव प्रॉस्पेक्ट कहता रहा.
मयोरव प्रॉस्पेकट से ही चलकर इन्सटीट्यूट जाया करता था. चेबुरेच्नाया (स्नैक्स
हाउस – अनु.) मयोरव पर था, और इस स्नैक्स हाउस की बदौलत
प्रॉस्पेक्ट का तब का नाम आज तक सुनाई देता है. वह प्रसिद्ध जगह आज भी इसी नाम से
जानी जाती है – “मयोरव का चेबुरेच्नाया”.
और मुझे
याद आया,
कि मैंने इस मयोरव से जुड़ी किसी ग़लतफ़हमी के बारे में कहीं पढ़ा था.
शेल्फ़ से
“पीटर्सबुर्ग के भौगोलिक स्थानों का एन्सिक्लोपीडिया” निकाला, “वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट” वाला पृष्ठ खोला और उसके एक नाम के बारे में
पढ़ता हूँ. आम तौर से इस एन्सिक्लोपीडिया में हर जगह के बारे में रूखी-सी जानकारी
होती है, मगर यहाँ तो पूरा ऐतिहासिक झुकाव था, इस हद तक...पूरा उद्धरण देना होगा, बिना किसी
काट-छांट के. इस प्रॉस्पेक्ट के बारे में कहा गया है:
“9 जून
1923 से 4 ऑक्टोबर 1991 तक इसका नाम था प्रॉस्पेक्ट मयोरव – ऐसा मानते हैं कि ये
रूस में 1918-1920 के गृह-युद्ध में शामिल पी.वी, मयोरव के सम्मान में था,
जो चौथी फौज के कमिसार थे. मगर, लेनिनग्राद
वार सर्कल की एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी के सेक्रेटरी कन्द्रात्येव के संग्रह से प्राप्त
पत्र से सन् 1927 में यह स्पष्ट हुआ कि चौथी आर्मी के कमिसार की शिनाख़्त करना संभव
नहीं हो सका : “चौथी आर्मी के श्रमजीवियों की पहल पर लेनिनग्राद एक्ज़ेक्यूटिव
कमिटी के प्रेसिडियम ने 9 जून 1923 की अपनी मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा किया कि
वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट का नाम बदल कर चौथी आर्मी के राजनीतिक कमिसार, कॉम्रेड मयोरव के नाम पर रखा जाए, जिनकी युराल
मोर्चे पर सन् 1919 में मृत्यु हो गई थी. उपर्युक्त कॉम्रेड
मयोरव के बारे में कोई लिखित प्रमाण न होने के कारण लेनिनग्राद एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी
का प्रेसिडियम कॉम्रेड मयोरव की विशेषताओं और उनकी क्रांतिकारी सेवाओं के बारे में
जानकारी, तथा उसका नाम और पिता का नाम देने की विनती करता
है”. एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी के सेक्रेटरी कन्द्रात्येव को दिये गए जवाब से पता चलता
है, कि “ लेनिनग्राद वार सर्कल के पास कॉम्रेड मयोरव के बारे
में कोई जानकारी नहीं है”. *****
अद्भुत!
इतने सालों से शहर के एक प्रमुख हाइ-वे को मयोरव प्रॉस्पेक्ट के नाम से जाना जाता
था,
और किसी को पता नहीं था, कि किसके सम्मान में
और क्यों? अनचाहे ही “बेजान रूहों” का विषय याद आया, और न सिर्फ इतना – वही “नाक” दिमाग पर छा गई : गोगल का हमे सलाम.
तो, हो
सकता है, कि अगर नाई इवान याकव्लेविच को वज़्नेसेन्स्की
प्रॉस्पेक्ट पर अपने घर में पकी हुई डबल रोटी में फ़ौरन नाक मिली थी, तो ये प्रॉस्पेक्ट न सिर्फ मयोरव प्रॉस्पेक्ट हुआ, बल्कि
मयोर की नाक का
प्रॉस्पेक्ट हुआ.
तब सब
कुछ ठीक हो जाएगा. प्रॉस्पेक्ट मयोर की नाक – इसमें कुछ मतलब तो होता.
वर्ना – बेहूदा,
टोटल बकवास. प्रॉस्पेक्ट मयोरव – ये तो कोई असंभव सी बात हुई.
रुकिए, मामला
गंभीर है.
यहाँ कोई
रहस्य है या नहीं,
मगर उपलब्ध सामग्री के संदर्भ में ये सब कहीं ज़्यादा बेहतर है,
उसके मुकाबले, जो व्लाद कवाल्योव नाक के
बारे में अपनी फिल्म में दिखाना चाहता है.
नाक के
संबंधित इस इतिहास से मेरे सकारात्मक विचार हार जाते हैं.
हर बात
को संक्षिप्त करके समस्या को यथासंभव विस्तृत दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करते
हैं.
आइये, शुरू
से देखते हैं – “नाक” पहले ही लिखी जा चुकी है, सबके द्वारा
पढ़ी जा चुकी है और वह पाठकों के दिमाग में एक विरोधाभासी छबि की तरह पैंठ गई है.
कल्पना कीजिए कि ये छबि, हमारी अनुभवजन्य वास्तविकता में
यथासंभव योग्यता से, दिमाग़ के तरल पदार्थ की तरह, स्वयँ को स्थापित करना (खुद ही यथार्थ, मूर्तिमंत
रूप प्राप्त करना) चाहती थी. ये संभव हो, इसके लिए मेजर कवाल्योव
की नाक की छबि
(दूसरे शब्दों में – तरल पदार्थ) को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोगों के आचरण
को नियंत्रित करना होगा, जैसे, तुलना के लिए माफ़ी
चाहता हूँ, कोई जैविक परजीवी कभी कभी अपने स्वामी के आचरण को
नियंत्रित करता है. लेनिनग्राद एक्ज़ेक्यूटिव कमिटी के प्रेसिडियम की 9 जून 1923 की
मीटिंग का विवरण तो मुझे ज्ञात नहीं है, मगर शायद सभासदों पर
जैसे कोई पागलपन सवार हो गया : उन संदेहरहित प्राणियों को किसी बात ने
वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट का नाम बदल कर उसे गोगल के सबसे विचित्र पात्र – मयोर
की नाक...मतलब
मयोरव
की नाक...मतलब, सीधा
सादा मयोरव का नाम
देने पर मजबूर किया. उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया कि इस काल्पनिक कमिसार का नाम
उन्हींके द्वारा किसी आवरण की तरह, किसी और को छुपाने के लिए पर्दे की
तरह इस्तेमाल किया गया है, जो उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से
अंतहीन दूरी पर है. शायद, उसी मानसिक प्रतिक्रिया की शिकार
अस्सी साल बाद कवि, एक्टर और डाइरेक्टर वदीम झूक की चेतना
होने वाली थी. उसके दिमाग में कल्पना कौंध जाएगी. वह इस स्मारक की कल्पना का जनक होने
वाला है. सचमुच में इस कल्पना ने – वज़्नेसेन्स्की प्रॉस्पेक्ट पर (जो मयोरव प्रॉस्पेक्ट
नहीं रहा) नाक के स्मारक की कल्पना ने - साधन के रूप में झूक का उपयोग किया. वदीम
झूक अपनी कल्पना से औरों को, जैसे रेज़ो गब्रिआद्ज़े, वसीली अज़ेम्शा, विचेस्लाव बुखाएव, एवम् अन्य को संक्रमित करता है, जिनकी वित्तीय एवम्
प्रशासनिक सहायता के बिना नाक को मूर्तरूप देना संभव न होता. उपरोक्त रचनाकार
बेहतरीन तरीके से अपना काम पूरा करते हैं, और मेजर कवाल्योव
की नाक, जिसका वज़न करीब एक सौ किलोग्राम है, ख़ुद को उसी घर के कोने पर पाती है,जो आजकल बिना नंबर
का है.
आगे का
किस्सा हमें मालूम है. घर की हालत ख़स्ता बताई जाती है, नाक को
छोड़कर सभी किराएदारों को, उनको भी जो नाक से जुड़े होने की
कसम खाते थे, घर से निकाल दिया गया, और
नाक जिसका
यहाँ पर रजिस्ट्रेशन संदेहास्पद से भी कुछ ज़्यादा है, घर
की असली मालिक बन बैठी. साथ ही संगमरमर की नाक ने सिर्फ गायब होने की प्रक्रिया से
अपने रचनाकारों को एक बैक-अप प्रतिलिपि लेने पर मजबूर कर दिया. मस्से वाला
प्रतिरूप शहरी शिल्पकला के म्यूज़ियम में बेहतरीन जगह पर बैठा है, ऐसे कि म्यूज़ियम के प्रमुख द्वार को “देख रहा हो”, मानो
वह पीटर्सबुर्ग के सभी स्मारकों पर नज़र रखे हुए हो.
पत्रकारों
का ध्यान आकर्षित करते हुए मेजर कवाल्योव की खोने के बाद ढूँढ़ ली गई नाक ने
आसानी से पूरे शहर का प्यार पा लिया है. सभी ये सोच रहे हैं कि वह वाकई में इसी घर
में रहती थी.
आख़िर में, विद्यार्थी
कवाल्योव मेजर कवाल्योव की नाक के स्मारक के बारे में शैक्षिक फिल्म
बनाएगा,
जिसका मूल्यांकन हेड ऑफ द डिपार्टमेन्ट क्रिवानोस ए. पी. करेगा,
जिसके साथ मैं, नोसव एस. ए. - जो नाक वाले
इतिहास में उलझ गया - रचनात्मक कार्य में सहयोग कर चुका हूँ... जहाँ तक ज़ोलतानोसव
एम. एन. का सवाल है, वह नाक के स्मारक के
बारे में जो चाहता था, सब लिख चुका है.
मैं भी, ऐसा
लगता है, कि करीब-करीब नाक के स्मारक के
बारे में लिख चुका हूँ, जबकि मैंने इस संदेहास्पद विषय के बारे में कभी
भी न लिखने की कसम खाई थी...
हाँ, मैंने
नहीं लिखा – लेख अपने आप लिखा गया!
ऐसा कैसे?
ऐसा ही
हुआ!
मगर अब
क्या करें?
जितनी
जल्दी हो सके,
पूर्ण विराम लगा दें.
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1. निकोलाय गोगल की
सुप्रसिद्ध कहानी “नाक” में मेजर कवाल्योव की नाक अचानक गायब हो जाती है, और उसी
तरह वापस भी लौट आती है. नाक को रूसी में कहते हैं Nos. प्रस्तुत
पुस्तक के लेखक का कुलनाम है Nosov, जो Nos शब्द से बना है.
* ग्रिगोरेव जी.ए. , नोसव एस.
ए. “द बोर्ड, या सेन्नाया पर मुलाकातें: सत्य कथा-कविता बारह
भागों में चित्रों और टिप्पणियों सहित”. से.पीटर्सबुर्ग, 2003, पृ. 97.
** ज़ोलतानोसव एम.
एन. काँस्य युग : 1985-2003 के लेनिनग्राद-पीटर्सबुर्ग के स्मारकों, स्मारक
चिह्नों, शहरी और सजावटी शिल्पकला की सचित्र सूची. सेंट
पीटर्सबुर्ग, 2005, पृ. 416
*** पीटर्सबुर्ग
की स्मारक पट्टिकाएँ. सेंट पीटर्सबुर्ग, 1999, पृ. 258.
**** शायद, इस बारे
में कहना नहीं चाहिए था, मगर – शेखी मारने के लिए नहीं,
बल्कि संदर्भ के लिए – बताऊँगा, कि पीटर्सबुर्ग
के स्मारकों के रहस्यमय जीवन के बारे में इस किताब की पहली आवृति “नोस” (नया
साहित्य) पुरस्कार की शॉर्ट-लिस्ट में शामिल थी, जो मिखाइल
प्रोखरोव फण्ड द्वारा स्थापित किया गया है. एक और “नोस” भी है – “सर्वोत्तम
हास्य-व्यंग्य की रचना” के लिए नामांकन है – ये एन, वी,
गोगल पुरस्कार है, जो अप्रत्याशित रूप से “कौए उड़ गए” उपन्यास को मिला, जो बिल्कुल
हास्य-व्यंग्य की रचना नहीं है. इस तरह, दोनों “नोस” का,
जो पुरस्कारों की दुनिया में प्रसिद्ध हैं (कोई अन्य थे ही नहीं),
न जाने क्यों मेरी जीवनी से संबंध है. और - कृत्रिम रूप से नाक को घसीटने का. मेरे
उपन्यास “मिस्ट्रेस ऑफ हिस्ट्री” की आलोचक का ये मानना है, कि उसने
गोगल को वहाँ भी देखा, जहाँ उसका उल्लेख भी नहीं था : “
वैसे: मैं सोचती हूँ, कि ये बिल्कुल इत्तेफ़ाक नहीं है,
कि नायिका का कुलनाम कवाल्योवा है. (उम्मीद है, कि गोगल की “नाक” को याद रखने वाले पाठकों के दिमाग़ से मेजर कवाल्योव उड़
नहीं गया होगा.) उपन्यास के साथ संलग्न नामों की सूची में ( जिनका डॉकुमेंटरी जैसा
वर्णन किया गया है – गोगल की तरह!) कई नाम हैं: दान्ते से बूनिन और बुन्युएल तक,
बोद्लेर से कवि ई.ई. द्मित्रियेव तक; मगर गोगल
का नाम नहीं है...छुपा हुआ है, जैसे जंगल में कोई पत्ती छुप
जाती है”. – नताल्या इवानव्ना, “बकरी के थोबड़े जैसा चाँद”.
“द्रूझ्बा नरोदव”, 2002, नं. 1. मगर, माफ़
कीजिए, लेखक को उसे छुपाने की क्या ज़रूरत पद्अ गई, जो उपन्यास में वैसे भी नहीं है? कवाल्योव को – काफ़ी
लोकप्रिय कुलनाम है, नायिका को इस नाम से क्यों नहीं पुकारा
जा सकता – गोगल की ओर कोई इशारा किए बगैर? यहाँ नाक की क्या ज़रूरत
पड़ गई? और एक बात. अभी-अभी डाइरेक्टर गलीना द्मित्रेन्का का फोन आया था, जिसके साथ हमने “रेडिओ रशिया” में काफ़ी काम किया है, आजकल वह एक्टर विचेस्लाव ज़खारव की रेकॉर्डिंग कर रही है, जो रेडिओ के लिए मेरे “स्मारक” पढ़ रहे हैं (पहले भाग से). “म्यूज़िक के
बारे में सलाह करना चाहती हूँ. शस्ताकोविच से लिया है...” – “ऑपेरा ‘नोस’?” फ़ौरन
मेरी प्रतिक्रिया. “हाँ, बेशक. किसी अजीब-सी चीज़ की ज़रूरत
है...’नाक’
”
***** पीटर्सबुर्ग के भौगोलिक स्थानों का
एन्सिक्लोपीडिया” सेंट पीटर्सबुर्ग,
2002, पृ. 79,80.
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