मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

Curly Brackets - 06


0.33

तीसरी मंज़िल पर सभी सो नहीं रहे हैं, इस बारे में कपितोनोव को लिफ्ट से बाहर निकलते ही एहसास होता है. शोर का स्त्रोत कॉरीडोर के दूसरे दरवाज़े के पीछे है: सहयोगी पी रहे हैं. दाईं ओर लॉबी-कॉर्नर है – कपितोनोव निकल जाता, अगर आंख के किनारे से बन्द टी.वी. के सामने कुर्सी में धंसे एक आदमी को न देखता. क्या ये सो रहा है? या इससे भी बुरा कुछ है? बेहाल, चेहरे पर पीड़ा के लक्षण, बिना आँखें खोले, उसने कहा:
 “क्या आप सोच रहे हैं कि स्वादिष्ट है, पौष्टिक है?”
 ‘मेरा पड़ोसी है’, कपितोनोव ने अंदाज़ लगाता है.
 “आप किस बारे में कह रहे हैं?”
 “मैं काल के बारे में कह रहा हूँ. वर्तमान काल के बारे में. बकवास, बकवास, बकवास.”
तो ये है कपितोनोव का पड़ोसी – काल-भक्षक, उसने अन्दाज़ लगाया.
 “शायद, आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?”
 “और हो सकता है, कि आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?”
 “ओह, माफ़ कीजिए.”
कपितोनोव कॉरीडोर से होते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ता है, मगर तभी दरवाज़ा खुलता है:
 “मास्टर, ये आप हैं? आइये, रोशनी में आपका स्वागत है!”
और कोई अज्ञात ख़तरनाक शक्ति कपितोनोव को उस ओर मोड़ देती है.
मेज़, खाने-पीने की चीज़ें, ब्रेड, फ़र्श पर बिखरे ताश के पत्ते.
हाइपर-पत्तेबाज़ों का, हाइपर-जुआखोरों का क्लब है – सब समझ में आ गया, कि कहाँ फँस गया था.
पलंग पर पैर ऊपर करके एक बेहद ख़ुश लड़की बैठी है. कपितोनोव को बड़ा अचरज हुआ – ये वही लड़की है जिसे उसने शाम को स्टेज पर देखा था.
नो, थैन्क्स, वह वोद्का नहीं पीता. नहीं, थैन्क्स, उसे अभी काम करना है. हाँ, ऐसा ही है, रात को काम करेगा. नहीं, अंकों पर नहीं, बल्कि किसी लेख पर. ठीक है, - अगर यहाँ सभी ऐसे प्रतीकवादी हैं, तो प्रतीकात्मक रूप से ‘हाँ’. प्रोटोकोल. आपकी सामूहिक सफ़लता और आपकी सेहत के लिए!
वे मांग करते हैं कि अपना कमाल दिखाए.
 “तान्का पर आज़माएँ.”
 “तान्, उसके लिए कोई अंक सोचो, वह दिखाएगा.”
 “सही में, हाँ? उसमें क्या है, मैं सोच सकती हूँ. और क्या, बूझेगा?”
कपितोनोव जोड़ने-घटाने को कहता है. ये बहुत आसान है: उसका अंक है 23.
तान्या चिल्लाती है, ‘ब्रेवो’, उस पर कोई यक़ीन नहीं करता, सब चिल्लाते हैं कि वह कपितोनोव की ख़ातिर झूठ बोल रही है, उसने कोई दूसरी ही संख्या चुनी थी. कपितोनोव वहाँ से जाना चाहता है, उसे छोड़ते नहीं हैं. पता चला कि अब तक सार्डीन16 का डिब्बा खुला ही नहीं है. तात्याना को ड्यूटी-ऑफ़िसर के पास कॅन-ओपनर लाने भेजते हैं. वह पलंग की साइड से कूदी और ख़ामोशी से चली जाती है.
कपितोनोव जाना चाहता है, उसे दुबारा रोक लेते हैं.
बोर्‍या सैप, हाइपर-चीट, ‘सेका’17 खेलने की पेशकश करता है. कपितोनोव जाना चाहता है.
 “वह हमें नीचा समझता है!”
 “ठीक है, ‘फ़ूल”18  – वन-टू-वन”
बोर्‍या सैप ताश की गड्डी फेंटता है, कपितोनोव को काटने के लिए देता है, बाँटता है.
 “आप ट्रम्प क्या चुनेंगे?”
 “डायमण्ड” कपितोनोव कहता है.
 गड्डी के नीचे डायमण्ड की छक्की पड़ी थी.
कपितोव के हाथों में सिर्फ ट्रम्प के ही पत्ते हैं – डायमण्ड के नहले से इक्के तक.
हारना तो बिल्कुल नामुमकिन था, मगर वह जानता है कि हारेगा, वर्ना तो कोई मतलब ही नहीं है. और, अब कोई और चिल्लाता है: “बेईमान! बेईमान!” – और वह कपितोनोव की आस्तीन में से दूसरा इक्का निकालता है, ये भी डायमण्ड का इक्का था, मगर इस गड्डी से नहीं. “वाक़ई में बेईमान है!” – और कई सारे हाथ उसकी ओर बढ़ते हैं और कपितोनोव की आस्तीनों से, कॉलर के नीचे से, जेबों से डायमण्ड के इक्के ही इक्के निकालते हैं...
वह विरोध करने की कोशिश करता है.
“शमादानों से मारना भी उसके लिए कम ही सज़ा है!”19
वह जाना चाहता है – जाने नहीं देते. खेल पूरा करे!
कपितोनोव ने पूरा खेल खेला.
कपितोनोव हार गया.
एक आवाज़ सुनता है:
”किसपे बाज़ी लगाई थी?”
 और दूसरे ने फ़ब्ती कसी:
 “मोबाइल फ़ोन पे!”
और तीसरा टपक पड़ा:
 “अमर आत्मा पे!”
 “ठीक है,”कपितोनोव उठता है. – “मैं आपके हुनर की क़दर करता हूँ.”
मगर तभी एक ने कोई संख्या भी सोच ली – उसे बूझना होगा.
 “दस जोड़िए,” भौंहे चढ़ाकर कपितोनोव कहता है.
 “ख़ुद ही जोड़ लो,” सोचने वाला उससे कहता है.
 “ठीक है, तब मेरे बिना खेलिए.”
 “अरे, जोड़ दे ना! क्या तुझे क्या अफ़सोस हो रहा है?” चीट्स-उस्ताद सोचने वाले से चिल्लाकर कहते हैं.
 “अच्छा, अच्छा, जोड़ दिए.”
 “सात निकाल दीजिए.”
 “मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. निकाल दिए.”
 “50.”
 “60.”
 “ग़लत.”
 “ग़लत का क्या मतलब है? क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ?”
 “50,” कपितोनोव ने संजीदगी से दुहराता है.
  “मैंने कहा 60! सिद्ध करो कि 50 है.”
 “50, और धोखा देने की कोई ज़रूरत नहीं है.”
 कपितोनोव जाना चाहता है, और वह कपितोनोव का गिरेबान पकड़ना चाहता है.
कपितोनोव उसके हाथों पर मारने लगता है. कपितोनोव तैश में आ गया. कन्स्ट्रक्शन- ब्रिगेड में उसका नाम था साइको-मैथेमैटिशियन.
वह मेज़ से दूर उछला, कुर्सी उठा ली, कुर्सी घुमाने लगा – अपने इरादे को गंभीरता से प्रदर्शित करने लगा.
 “तो?”
कोशिश तो करें!
वह आक्रमण का जवाब देने को तैयार है. सिर्फ जब खून देखता है, तभी उससे बर्दाश्त नहीं होता – धुंध छा जाती है.
इस बीच हाइपर-चीट्स “शांति! शांति!” चिल्लाते हैं, - उसे भी शांत करने की कोशिश करते हैं और कपितोनोव को भी.
 “सावधान, शीशा तोड़ दोगे!”
 “यहाँ से चले जाओ, आप हमारी परंपरा के नहीं हो!”
वह मूख़िन की नोट बुक वाला पैकेट उठाता है, जो ज़मीन पर गिर गया था, और बाहर निकल जाता है. उसके भीतर सब कुछ उबल रहा है, और हाथ जैसे कुर्सी की टांग को दबोच रहा है.
कॉरीडोर में तात्याना से टकराता है, जो कैन-ओपनर लेकर आ रही है.
 “आप तो एक्ट्रेस हैं! आप चमत्कार के बारे में कह रही थीं! आप यहाँ कैसे? भागिये, भाग जाईये!...”
 “मैं? एक्ट्रेस? क्या, पापा जी, मस्ती में आ गए क्या? ढक्कन सरक गया?”
वाक़ई में गलती हो गई थी. कोई और समझ बैठा था – शुरू में ही. स्टेज पर कोई और थी.
मगर संख्या उसने बिल्कुल ठीक पहचानी थी. इसमें कोई सन्देह नहीं है.

01.08

शॉवर. टॉयलेट. नींद नहीं आएगी. वह पढ़ता रहेगा.
01.20

लेट गया.  नोटबुक खोली.
पहला पैरेग्राफ़.

01.21

और फिर से – शुरू से. क्योंकि समझना कठिन है.

01.22

और फिर से – क्योंकि वाक़ई में कठिन है:

{{{ ये तीसरा हफ़्ता है जबसे मैं - - : कन्स्तान्तीन अन्द्रेयेविच मूखिन हूँ, उम्र उनचालीस साल, किन्हीं चीज़ों का स्पेशलिस्ट, शादी-शुदा, मिलनसार, प्रिय खाद्य पदार्थ - - : फ़्राईड वेजिटेबल कबाब; एक्स्ट्रा वज़न 8 किलोग्राम. अपरिहार्य प्रश्न - - : तब मूख़िन का क्या? क्या उसे मालूम है कि मूखिन वह नहीं, बल्कि मैं हूँ? उत्तर नकारार्थी है - - : नहीं. मूख़िन नहीं जानता और जानने योग्य भी नहीं है, जैसे कि ये न जानने योग्य भी नहीं है, अपनी स्वयम् की अनुपस्थिति के कारण, मैं हो जाने के कारण. जब मूखिन के स्थान पर मैं हूँ, तब वह नहीं है. मूख़िन तब मूखिन बनेगा, जब मैं मूखिन होना बन्द कर दूँगा. उम्मीद करता हूँ कि कभी मूखिन होना समाप्त कर दूँग़ा, क्योंकि मूखिन होना क़िस्मत का खेल है. - - प्रश्न - - : मैं मूखिन होना कब बन्द करूँगा? - - : उत्तर - -  : उत्तर नहीं दूँगा; वह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित है. }}}         
कपितोनोव ने इलेक्ट्रिक केटल चालू करता है. बाथरूम जाकर एक बार फिर मुँह धोता है – पहले के शॉवर के अतिरिक्त.
कपितोनोव शांत है. वह स्वस्थ्य है और पूरे होश में है. वह ‘नोट्स’ को ग्रहण करने और उसकी मीमांसा करने के लिए तैयार है.

01.28

{{{ पहले वाला ‘नोट’ परीक्षण के तौर पर लिखा था. मैं धनु-कोष्ठकों की विश्वसनीयता परखना चाहता था. जाँच सफ़ल रही. कोई भी सन्देहास्पद चीज़ नहीं देखी गई. दो घंटों के ‘मैन्टेनेन्स-ब्रेक’ के बाद फिर से लिखना जारी करता हूँ.
फ़िलहाल मुझे, मोटे तौर पर, जो हो चुका है, और जो हो रहा है उसका सार प्रस्तुत करना है. काम आसान नहीं है. मगर किसने कहा था, कि आसान होगा? कोशिश करूँगा. अगर सफ़ल हुआ, तो आगे बड़ा आसान होगा; मुझे इस पर यक़ीन है.
तो बात ये है.
बुधवार को मैं स्वयम् को मूख़िन महसूस कर रहा था, मगर गुरुवार को महसूस किया कि ये मेरा भ्रम था. ये प्रतिस्थापन तो काफ़ी पहले हो चुका था. मगर कब? जैसा कि आज, लक्षणों को याद करते हुए, मैं समझ गया कि प्रतिस्थापन पिछले से पिछले सप्ताह हुआ था, और अगर आज से उलटी गिनती करूँ तो - - : अठारह दिन पहले, उस दिन को गिनें तो. अजीब बात ये है कि इस गुरुवार तक मैं वाक़ई में स्वयम् को, मूखिन की तरह, असली मूखिन मान रहा था, जैसे कि प्रतिस्थापन हुआ ही न हो. ये बीच वाला समय ज़्यादा लम्बा खिंच गया, मगर अब सब गुज़र चुका है.

एक बार फिर से ‘पॉइन्टस’ के अनुसार.
1.      ढ़ाई हफ़्ते पहले प्रतिस्थापन हुआ. बाह्य नियंत्रक शक्ति के माध्यम से ‘ऑब्जेक्ट’ मूखिन का मूखिन होना बन्द हो गया, और वह ‘सब्जेक्ट’ ‘मैं’ बन गया, जो तब तक नहीं समझ रहा था, कि मैं मूखिन नहीं हूँ, और उसी मूखिन द्वारा स्वयम् को प्रतिस्थापित कर चुका हूँ. रूपांतरण की प्रक्रिया पन्द्रह दिन चली, इस गुरुवार तक, और इन पन्द्रह दिनों में, सबसे महत्वपूर्ण रहकर,  हालाँकि अनेक स्तरों वाली स्कैनिंग सिस्टम का निष्क्रिय तत्व होते हुए, मैं अनजाने ही रिवर्स ट्रेंचिंग का उद्देश्य पूरा करता रहा.
2.      गुरुवार को मुझे इस बात का अर्थ समझ में आया कि पिछले से पिछले हफ़्ते क्या हुआ था - - : मैं समझ गया कि वास्तविकता में मैं कौन हूँ. ज़्यादा सही होगा ये कहना, मैं इस बात को ज़्यादा अच्छी तरह समझ गया कि सबसे पहले मैं कौन नहीं हूँ - - : सैद्धांतिक रूप में मूखिन नहीं हूँ. जवाब देना मुश्किल लग रहा है, या तो वह सबकी भलाई के लिए हो या स्वयम् मेरे लिए हानिकारक हो, मैंने यही समझा है. मैं मानता हूँ कि प्रोजेक्ट के उद्देश्यों की दृष्टि से, जिन्हें मैं भी काफ़ी हद तक समझ नहीं पाया हूँ, मूखिन से भिन्न ‘सब्जेक्ट’ के तौर पर मेरे अपने बारे में अनुमान, न केवल किन्हीं संभावनाओं की खोज करेंगे, बल्कि वे किसी की समस्याओं से भी ग्रस्त हैं, और सच कहा जाए तो मेरी स्वयम् की समस्याओं से ग्रस्त हैं. चाहे जो भी हो, मुझे विश्वास है - - : मेरे द्वारा स्वयम् को मूखिन से भिन्न समझना, जिसने मूखिन को प्रतिस्थापित कर दिया है, प्राकृतिक विकास का कृत्य नहीं है, बल्कि ये नियंत्रक शक्ति द्वारा मुझे भेजा गया है.
3.      उसी पल मुझे सामान्य उद्देश्य की लगभग सभी सीमाओं का प्रतिनिधित्व दिया गया और सभी संभव क्षेत्रों के सहभागी की ज़िम्मेदारियों से अवगत कराया गया. बात हो रही है सीमाओं की, न कि ख़ुद उद्देश्य की, जिसका सार जानने की, ज़ाहिर है, मुझे इजाज़त नहीं है. साथ ही मुझे कुछ प्रमुख अवधारणाओं को समझने का काम दिया गया, जिनके बगैर मैं इस अर्थ को समझ ही नहीं पाता; ये अवधारणाएँ हैं - - : प्रोजेक्ट, नियंत्रक शक्ति, रिवर्स ट्रेन्चिंग, स्कैनिंग सिस्टम, संशोधक. साथ ही मुझे प्रतिबन्धों की, सीमाओं की, अनुमतियों की कल्पना दी गई. सबसे पहले मुझे मेरे द्वारा अवगत इस अर्थ को छुपाना होगा और किसी भी तरह से ये ज़ाहिर नहीं होने देना होगा, कि मैं मूखिन नहीं हूँ - - : न तो मौखिक रूप से, न ही लिखित में. मुझे ज्ञात है कि मैं इन प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा हूँ - - : अभी, स्वयम् को उस सार को प्रदर्शित करने की अनुमति देकर, जिसे मैं ख़ुद ही पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ.
4.      इस समय, ऊपर निर्दिष्ट को समझने के तीसरे दिन, मैं, स्वयम् को उस सार को प्रकट करने की अनुमति देकर, जिसे मैं ख़ुद ही पूरी तरह समझ नहीं पाया हूँ, प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ. मैं प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ, ये अपना ही विनीत पाठक होने के कारण मुझे स्पष्ट रूप से विदित हो गया है. मगर मैं बिना डरे प्रतिबंध का उल्लंघन कर रहा हूँ, बिना किसी सम्मान के, बहादुरी से, क्योंकि मुझे उस क्षेत्र का पता चल गया है, जो नियंत्रक शक्ति के अधिकार में नहीं है और जो संशोधक की नज़र से भी आज़ाद है. ये है मेरा आविष्कार - - : तिहरे धनु-कोष्ठकों का ऑपरेटर - - : {{{- - - - - }}}. अविश्वसनीय लगता है, मगर ये ऐसा ही है - - : अगर इबारत को तिहरे धनु-कोष्ठकों के बीच रख दिया जाए, तो नियंत्रक शक्ति को पता भी नहीं चलेगा! सरल और बुद्धिमत्तापूर्ण! मैं क़रीब-क़रीब ख़ुशनसीब हूँ. ये नहीं समझाऊँगा कि मुझे नियन्त्रक शक्ति के इस अंधेरे कोने का पता कैसे चला; कई महान आविष्कारों के समान, मेरा आविष्कार भी संयोगवश ही प्रतीत (Incidental Case) हुआ. मैंने पुनरुक्ति का प्रयोग तो नहीं किया - - :  “Incidental Case”? वैसे, “केस” ही तो घटना (Incident) होती है ना? मगर मैं पुनरुक्ति से नहीं डरता. चाहे जो भी घटित हुआ हो, एक घटना ज़रूर उत्पन्न हो जाती है. घटना की नियती ही है घटित होना, इसीलिए वह घटना है! “केस” प्रतीत होती है - - : ‘केस’ प्रतीत होती है - - : विश्वसनीयता सहित, न कि आवश्यकता सहित. ‘केस’ और घटना के बीच अंतर ये है - - : घटना प्रतीत नहीं होती, मगर ‘केस’ घटित हो सकती है. ‘केस’ ज़्यादा गतिमान और लचीलापन लिए होती है. इसलिए मैं इस बात से सहमत हूँ, कि इसे ‘केस’ कहेंगे, बहस नहीं करूँगा, ऊपर से बहस भी अपने आप से. ‘केस’ घटित हुई. धनु-कोष्ठक - - : संयोगवश! - - : विस्मयकारक गुणों वाले. मैंने अदृश्य होने का तरीक़ा ढूँढ़ लिया - - : लिखाई में. क्या इस आविष्कार से मुझे कुछ प्राप्त होगा? हाँ, मगर थोड़ा सा. आज़ादी का स्तर; सबसे निचला स्तर, मगर फिर भी - - : मुझे!  किसी और को नहीं, बल्कि मुझे. मूखिन को नहीं - - : मुझे! मैं समझने की कोशिश कर सकता हूँ, कि मैं कौन हूँ, क्यों मैं मूखिन नहीं हूँ, और क्यों सिर्फ मूखिन को मैंने पिछले से पिछले हफ़्ते प्रतिस्थापित किया, और क्या प्रतिस्थापन के भविष्य के बारे में मेरे अनुमान विश्वसनीय हैं, जिनके बारे में अभी बताने की मेरी कोई इच्छा नहीं है - - : शब्दों से खेलने की मेरी उल्लासदायी एवम् लुभावनी योग्यता के बावजूद, जो उम्मीद करता हूँ कि समझने में आसान है ( ओह, वह मुझे बेहद, बेहद समझ में आती है, आख़िर ख़ुद को कैसे नहीं समझूँगा?). इस समय, तीन धनु-कोष्ठकों के भीतर रखकर, मैं चाहे जो भी लिखूँ, उसमें कोई संशोधन न कर पाएगा. मैं अदृश्य हूँ. मेरा उल्लासोन्माद बाह्य शक्तियों के लिए अप्राप्य है, चाहे उन्होंने अपने ज़माने में मेरे दिमाग़ में कितनी भी शाख़ाएँ क्यों न खोल रखी हों! मगर अपने आविष्कार का दुरुपयोग मैं नहीं करूँगा. असल में वह कुछ नहीं बदलेगा. मैं बेवफ़ा नहीं हूँ; मैं विश्वासघाती नहीं हूँ; मैं किसी उद्देश्य को समर्पित हूँ, चाहे मैं ये भी नहीं जानता होऊँ कि किस उद्देश्य को. बस - - :...धनु-कोष्ठक, तिहरे - - ...कितना अच्छा है ये! - - : ...ख़ास बात - - : उन्हें बन्द करना नहीं भूलना चाहिए - - :...कल्पना करने में भी डर लगता है कि अगर भूल गया तो - - :...सब ख़तम! शुरूआत के लिए काफ़ी है. मैं बन्द करता हूँ}}}                          

01.33

कपितोनोव चाय बनाता है (कप, उबला हुआ पानी और पैकेट). वह सुनिश्चित कर लेता है कि दरवाज़े का ताला बन्द कर लिया है. कप को स्टूल पर रखकर बिस्तर पर लेट जाता है और बेड-लैम्प को ठीक करता है.

01.36


{{{ धनु-कोष्ठक बन्द करने के बाद चौबीस घण्टे बीत चुके हैं - - : कोई प्रतिबन्ध नहीं! - - : बहुत अच्छे! - - : फिर से खोलता हूँ! - - : खोल दिए!
अब विस्तार से. धनुषावृत लेख के क्रमांक 2 से शुरू करता हूँ (बहुत सांकेतिक शब्द है, उम्मीद है कि आगे भी इसका उपयोग करता रहूँगा).
इस गुरुवार को मुझे जिसकी इजाज़त दी गई थी, उसके विश्लेषण से आरंभ करता हूँ. तात्पर्य है, मेरी परिस्थिति के मेरे द्वारा किए गए विश्लेषण से.
हालात ऐसे हैं.
बारिश हो रही थी. बिना किसी संदेह के, कि मैं मूखिन हूँ, मैं काला अंग्रेज़ी छाता लिए मूखिन की धीमी चाल से घर जा रहा था. मूखिन की आदत के अनुसार मैं आसमान पर था, हर चीज़ के बारे में सोच रहा था - - : पराई चीज़ों के बारे में, मगर सिर्फ बाहरी प्रतिक्रियाओं के स्त्रोतों के बारे में नहीं सोच रहा था, जिनके अस्तित्व से अपने विचारों को उत्तेजित करने का मेरे पास तब ज़रा सा भी कारण नहीं था. ये भी जोड़ देता हूँ - - : साफ़, मूखिन जैसे स्पष्ट, शुद्ध विचारों को.

ख़ैर, उस समय जो बात मुझे परेशान कर रही थी, उसका वर्णन मैं प्रोटोकोल जैसी सटीकता के साथ कर सकता हूँ. सबसे पहले, एक खेदयुक्त जड़त्व की बदौलत मैं अपने परिश्रमी दिमाग़ को काम से संबंधित विचारों से परेशान कर बैठा, और वो भी तब जब मैं काम से घर लौट रहा था. बेहतर यही था कि उसे दिमाग़ से पूरी तरह निकाल दिया जाता. उपभोक्ताओं की प्राथमिकताओं के बारे में सैद्धांतिक प्रश्न अपने आप में दिलचस्प है, मगर हर बात का अपना समय होता है, ऊपर से दुनियादारी के लिहाज़ से वह मेरे लिए ज़रूरी नहीं था, क्योंकि उन दुख भरे दिनों में मुझे जीने के लिए आवश्यक साधनों से वंचित कर दिया गया था (स्वयम् ही अपने आप को वंचित कर दिया था). स्वाभाविक रूप से मेरे विचार देशवासियों के हित के विकास की ओर मुड़ गए, जैसी कि शासन को कल्पना करनी चाहिए. मतलब, मैं कल्पना कर रहा था कि कल्पना कैसी होनी चाहिए. शासन प्रमुख द्वारा भष्टाचार के विरुद्ध घोषित युद्ध पर मेरा ध्यान नहीं जा रहा था, मुझे कोई दूसरी ही चीज़ परेशान कर रही थी - - : प्रेसिडेन्ट द्वारा जुआ-घरों के बिज़नेस को सुनियोजित करने का वादा, जो मेरे घर से सौ क़दम दूर स्थित मनोरंजन केन्द्र ‘तुम्हारा सुख’ को बन्द करने के ख़तरे का सिग्नल है - - : क्या इस हानि को बर्दाश्त करने की ताक़त है मेरे पास?
इसके अलावा मैं उस हरे पाउडर के बारे में भी सोच रहा था, जो मुझे आज अपने ब्रीफ़केस में मिला था. मेरे पास एक बड़ी, पुरानी ब्रीफ़केस है, जिसका मैं आवश्यकता की नहीं, बल्कि स्टाईल की ख़ातिर इस्तेमाल करता हूँ, इसलिए उसका सावधानी पूर्वक इस्तेमाल करने में कोई परेशानी नहीं है. तो, आज अपने ब्रीफकेस से मैच-टेबल्स निकालते समय मैंने देखा कि उनके किनारों पर कुछ हरा रंग लगा हुआ है. ब्रीफकेस की तली में एक अनजान किस्म का पाउडर था. मैंने उसे आँगन में, गन्दे पानी के टैन्क में झटक दिया, जो हमारे ऑफ़िस के प्रवेशद्वार से कुछ दूर पर है. एक आवारा उम्मीद भरी नज़रों से मेरी ओर देख रहा था, शायद सोच रहा था कि अगर अचानक मैं पुरानी ब्रीफ़केस फेंक दूँ तो - - :
यही सब सोच रहा था मैं, काम से घर लौटते हुए, सब कुछ साफ़ समझ में आने से लगभग एक घण्टा पहले.
सीढ़ी चढ़ कर ऊपर गया, घण्टी बजाई; बीबी ने दरवाज़ा खोला और एक भी शब्द कहे बिना कमरे में टी.वी. देखने भागी. मेरे स्लिप्पर्स पर, अगर कोई तीसरी आँख सामने से देखे, तो, बड़ा सा अक्षर W है, पता नहीं निर्माता को इससे क्या प्रकट करना था - - : सांता क्लॉज़ को बड़ा मज़ेदार और ज्ञानवर्धक लगता, कि इन स्लिप्पर्स में मैं वो नहीं देखूँगा जो दूसरे देखते हैं - - : मेरा अक्षर M, बल्कि, दो अक्षर. गीली छतरी खोलकर, मैंने प्रवेश-कक्ष में सूखने के लिए रख दी. अगर टी.वी. के कारण मैं बीबी से ईर्ष्या करता, तो बड़ा हास्यास्पद लगता, मगर फिर भी, काम से लौटा हुआ पति, मेरी नज़र में, थोड़े से ध्यान के क़ाबिल तो है ही. हमारा किचन काफ़ी बड़ा और रोशनी भरा है, गमले में एलो वेरा लगा है, हाँ, ये मानना पड़ेगा कि पानी टपकने के निशानों से छत बहुत भद्दी हो गई है. गैस पर एक बर्तन में मुझे सॉसेज दिखाई दिया, देखना पड़ेगा, ठण्डा है. डिनर तो वह कहीं से भी नहीं लग रहा था, मगर फिर भी गैस के पास से हटे बिना मैं उसके तीन टुकड़े खा गया - - : भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी क़ाबिल बीबी को उलाहना देते हुए, जो पति से बातें करने के बदले टी.वी. के बॉक्स को ज़्यादा महत्व दे रही थी. मेरे हाव-भाव, हालाँकि, अनदेखे रह गए; नहीं उन्हें देख लिया गया, मगर उनका विश्लेषण मेरे अनुसार नहीं किया गया. बर्तन पर ढक्कन पटकने की आवाज़ सुनकर बीबी चीख़ी - - :
 “शायद, घर लौटते हुए तुम कुछ लाए हो? शायद, तुम कम से कम समोसे तो लाए ही होगे?”
ये बीबी के व्यंग्य-बाण थे. वह बड़ी अच्छी तरह से जानती थी - - : मैं कुछ नहीं लाया हूँ, क्योंकि ला ही नहीं सकता था.
जब मैं बीबी के बारे में कह रहा हूँ, तो मेरा मतलब, स्वाभाविक रूप से, मूखिन की बीबी से है; उम्मीद करता हूँ कि आगे इसे स्पष्ट करना ज़रूरी नहीं होगा.
मैं ख़ामोश रहा; कमरे में गया; टीवी-बॉक्स पे सीरियल आ रहा था. मुझे टीवी-बॉक्स में कुछ सन्देहास्पद नज़र आया. थोड़ी देर सोचकर, मैं, आश्चर्यचकित होकर, चहका - - :
 “उसे तो मार डाला था!”
 “किसी ने उसे नहीं मारा” (मेरी बीबी ने जवाब दिया).
 “मैं क्या, अंधा हूँ? कुछ एपिसोड्स पहले मार डाला था!”
 “तुम सीरियल देखते नहीं हो, बेवकूफ़ी की बात मत करो” (बीबी ने कहा).
 मुझे बेचैनी महसूस हुई - - : कुछ गड़बड़ है.
 “क्या फिर से ज़िन्दा हो गया?”
 “ये दूसरा है”.
 “कोई दूसरा-वूसरा नहीं है, मुझे याद है, वही है!”
 “ये दूसरा है, एक ही एक्टर इसका ‘रोल’ कर रहा है!”
 सही तो है - - : ये वाक़ई में ‘वो’ नहीं था, जिसे मैंने पिछले हफ़्ते परदे पर देखा था, उसे तो मार डाला गया था, वो भी मेरी आँखों के सामने, और ये - - : दूसरा है, हालाँकि एक ही एक्टर द्वारा प्रस्तुत किया गया. एक ही एक्टर, जैसे कुछ हुआ ही न हो, दूसरे को प्रदर्शित कर रहा है, जैसे कि ऐसा ही होना चाहिए; मैं चौंक गया.
 “क्या उनके पास एक्टर्स नहीं हैं?”
मैं इस बात को दुहराता, मगर बीबी का लिहाज़ करते हुए चुपचाप उसकी ख़ामोशी से सहमत हो गया - - : चलिए, मेरे प्रश्न को अत्युक्तिपूर्ण समझ लेंगे, जिसे किसी उत्तर की अपेक्षा नहीं होती.
तब, जब बीबी ख़ामोशी का खेल कुछ देर और जारी रखना चाह रही थी, अप्रत्याशित रूप से मेरे मुँह से निकला - - :
 “बॉक्स वाक़ई में ईडियट्स के लिए है!”
 “ बॉक्स ईडियट्स के लिए है?( पल भर में बीबी गुस्से से उबलने लगी). ब्रेवो, कोस्त्या, सुपर! एक हाथ के डाकू20 – ये बॉक्स ईडियट्स के लिए नहीं है! ये बॉक्स विद्वानों के लिए है!”
उसे उलाहना देने का बहाना मिल ही गया - - : एक हाथ का डाकू; कल ही तो मैं हार गया था.
हार माननी ही पड़ी - - :
 “माफ़ करना. मेरा मतलब था - - : ईडियट्स बॉक़्स के भीतर हैं, न कि बाहर. मैं तुम्हें अपमानित करना नहीं चाहता था. एक बुद्धिमान, ख़ूबसूरत औरत ईडियट्स को घूर रही है”.
और मैं कमरे से निकल गया, जो भी मिले वो खाने के लिए - - : अब पेट भर के खाऊँगा.
 “अपना मुँह देख लो!” (पीछे से सुनाई दिया).
मैंने फ्रिज खोला. और मुझे मक्खी21 की याद आई. ये रही. मक्खी - - : दरवाज़े के भीतरी ओर, अण्डों वाली शेल्फ के ऊपर. हमारे फ्रिज में मक्खी रहती है. कुछ ही समय से; हो सकता है कल से. कल शाम को मैंने पहली बार उसे देखा था. कल शाम को मैंने फ्रिज खोला और देखा कि कैसे एक उनींदी मक्खी उसके भीतर उड़ रही है. वह उड़कर बाहर नहीं आई, हालाँकि मैंने काफ़ी देर तक फ्रिज को खुला रखा था, और मैंने उसे भगाया नहीं. आज वह बेहोशी की हालत में थी. क्या उसे सपना आ रहा है? क्या मक्खियों को सपने आते हैं? क्या अगर मक्खियों को दो दिनों तक फ्रिज में बन्द करें तो उन्हें सपने आते हैं? मुझे इसमें सन्देह नहीं था कि मक्खी ज़िन्दा है. अगर मक्खी मरी हुई होती, तो वह दरवाज़े की दीवार पर न बैठी होती, बल्कि नीचे गिर जाती. वह यहाँ करती क्या है? हमारा फ्रिज तो ख़ाली है. वह यहाँ आई कैसे? वह इसमें घुस कैसे गई?             
 
मक्खी के बारे में और कुछ खाने की इच्छा को भूलकर मैंने फ्रिज का दरवाज़ा बन्द कर दिया, क्योंकि बिजली की कौंध के समान मेरे विचार स्पष्ट हो गए थे – - : दिमाग़ में अचानक ख़याल आया - - : और मैं? - - : और मैं कौन हूँ? - - : क्या मैं मूखिन हूँ?
मैं अचानक पूरी स्पष्टता से समझ गया कि मैं कोई मूखिन-वूखिन नहीं हूँ; मूखिन का अपना अस्तित्व है, और मेरा अपना; और ये कि न तो मैं मूखिन का भाई हूँ, न ही यार; और मूखिन हूँ मैं-- : सिर्फ कुछ समय के लिए मूखिन हूँ, न कि पूरी तरह मूखिन - - : सिर्फ रंग-रूप से मूखिन, रूप से.
इस खोज से चौंक कर मैंने अपना मुँह खोल दिया - - : ठीक ऐसा ही इस समय मैं हूँ.
मूखिन की हर चीज़ मेरे पास थी - - : सबसे पहले, उसकी स्मरणशक्ति, मैंने महसूस किया कि मूखिन की कोई भी बात न भूला हूँ, न भूलूँगा, ठीक वैसे ही जैसे मूखिन के अलावा किसी और चीज़ को आत्मसात् नहीं करूँगा. मेरे पास पर्याप्त मात्रा में मूखिन था, ज़रूरत से ज़्यादा ही था, मगर ये सब मेरा नहीं था.
तो मैं आख़िर कौन हूँ? (मैंने अपने आप से पूछा). कौन हूँ मैं? मगर मैं नहीं जानता था, कि मैं कौन हूँ.
मैं चाहे जो भी रहा हूँ, मैं मूखिन बन गया हूँ, बिल्कुल मूखिन न होते हुए.
मैं मूखिन था, मगर मूखिन नहीं था, और मूखिन नहीं था.
मगर सबसे महत्वपूर्ण बात अब मैं स्पष्टतः समझ गया हूँ, कि मूखिन अभी, इस समय ग़ायब नहीं हुआ था और मैं भी मूखिन में अभी, इस समय परिवर्तित नहीं हुआ था.
ये पहले ही हो गया था, काफ़ी पहले, मेरे फ्रिज खोलने से काफ़ी पहले.
कब? कल? पिछले हफ़्ते? सालों पहले?
मुझे क्या हो गया है? क्यों मैं सुन रहा हूँ और एक एक अक्षर देख रहा हूँ: प्रॉजेक्ट, नियंत्रक शक्ति, स्कैनिंग सिस्टम?
मैं क्यों इस बात को समझ रहा हूँ कि मुझे रूह को सर्द कर देने वाले रहस्यमय नियमों का पालन करना होगा, जो शब्दों के माध्यम से परावर्तित नहीं होते, मगर पूरी तरह समझ में आ जाते हैं?
मैं समझ गया कि मुझसे क्या अपेक्षाएँ हैं - - : गुप्त रहो और छुपाते रहो कि तुम वाक़ई में मूखिन नहीं हो.
मुझे डर का एहसास होने लगा; और ठण्ड का भी - - : मैं ख़ुद को मक्खी महसूस करने लगा, जो वहाँ बन्द थी.
उसे बाहर निकालना चाहिए; मैंने फ्रिज खोला. मक्खी दरवाज़े पर नहीं थी. कहीं गिर तो नहीं गई? क्या वह मर गई और गिर गई? क्या मेरे आत्म-ज्ञान के एक मिनट में मक्खी मर सकती है?
मैंने दरवाज़े के सारे शेल्फ़्स देख डाले - - : मक्खी कहीं भी नहीं थी, मैंने पूरा फ्रिज देखा, सब्ज़ियों की ट्रे भी बाहर निकाली - - : खाली फ्रिज के सामने घुटनों के बल खड़े होकर मैंने प्लास्टिक के डिब्बों के नीचे देख लिया, जहाँ सब्ज़ियों को अच्छे दिनों में सुरक्षित रखना होता है - - : मक्खी कहीं नहीं थी.
 “क्या पूरे पागल हो गए हो? (मेरे ऊपर से सुनाई दिया). क्या ‘चीज़’ का चूरा ढूँढ़ रहे हो?”
घुटनों से उठे बगैर मैंने कंधों के बीच अपना सिर समेट लिया. उसे क्या चाहिए? मूखिन की बीबी यहाँ क्यों आई है?
 “पड़ोसन के पास जाकर दो अण्डे मांग लाती हूँ, कम से कम स्क्रैम्बल्ड अण्डे बना लूँगी, या फिर उन्हें उबाल दूँगी - - : क्या दिन आ गए हैं, शर्मनाक!”
वह चली गई, और मैं, घुटनों से उठे बिना, फ्रिज में हाथ रखे रहा. जो हो गया है, उस सबके बाद मुझे मूखिन की बीबी से कैसा बर्ताव करना चाहिए? उसके साथ कैसे रहूँ?
बौद्धिक तौर पर आत्मसात् किए गए नियम, ख़ामोशी से कहे जा रहे थे - - : हिम्मत रखो, डटे रहो, कोई ऐसी बात न करो जो तुम्हारा भेद खोल दे (कि तुम मूखिन नहीं हो), किसी भी हालत में, किसी को भी हमारे रहस्य का राज़दार मत बनाना.
हमारे रहस्य का - - : उनका और मेरा!
और अब - - : थरथराते हुए (मेरे हाथ काँपने लगे, ओय-ओय!) - - : मैं, नियमों का उल्लंघनकर्ता, फ़िलहाल वह परेशानी दूर करने में समर्थ हूँ, जिसने अचानक मुझे दबोच लिया था, मदद के लिए तिहरे धनु कोष्ठकों को, जैसे राक्षसों को, बुलाता हूँ - - : टाइम हो गया, टाइम हो गया, और वैसे भी मैंने अपने आपको काफ़ी आज़ादी दे दी थी!}}}

{{{ फिर से खोले गए धनु कोष्ठकों और पहले बन्द किए गए कोष्ठकों के मध्य क़रीब ढ़ाई घण्टे का अंतर है. बाहरी तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गई. मैं इत्मीनान से हूँ; स्थिति पर मेरा नियंत्रण है; उम्मीद महसूस हो रही है. लिख रहा हूँ.
दयालु पड़ोसन ने अण्डों के अलावा बीबी के साथ दो कैबेज-रोल्स और ब्रेड का चूरा भी भेज दिया. मेरा ख़याल है, कि डिनर बढ़िया बन गया - - : इससे बुरा भी होता रहा है. कैबेज-रोल के बाद मैं बाल्कनी में चला गया - - : अस्पष्ट चीज़ों के बारे में सोचने के लिए. हवा में गर्माहट थी; जुलै का महीना था. वह अभी भी चल रहा है - - : जुलै का महीना - - : इस जुलै का आनन्द लूटने के लिए अभी काफ़ी समय है. मच्छर उड़ रहे थे; अंधेरा हो रहा था.
पॉइंट नं. 2 से पॉइंट नं. 1 पर आता हूँ (मेरे आरंभिक “धनुष” में दिए गए पॉइंट्स को देखिए). फ़िलहाल मेरी दिलचस्पी प्रतिस्थापन की प्रक्रिया में है.

तो, बालकनी में मैं इसके बारे में सोच रहा था - - : ये हुआ कब था?...

मुझे मूखिन की ज़िन्दगी का स्मरण हो आया - - : बचपन, किशोरावस्था, उसके विश्वविद्यालय, आरंभिक प्रौढ़ता. मैं उसकी ज़िन्दगी का वह ख़तरनाक मोड़ ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा था, जब मेरे द्वारा मूखिन प्रतिस्थापित कर दिया गया था.

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