{{{ धनु-कोष्ठकों को खोलने की दो
कोशिशें दर्ज की गई हैं. अटैक का स्त्रोत फ़िलहाल स्पष्ट नहीं हुआ है. बुधवार तक
शांत रहूँगा. संभव है, कि बुधवार को एक ‘एब्स्ट्रेक्ट थीम’ पर भाषण दूँ. }}}
{{{ आप पूछते हैं कि क्या विसंगतियों
पर काबू करना मुश्किल है. आपको कैसे बताऊँ. अंशतः, हाँ, मगर अंशतः, नहीं भी है;
अगर सभी चीज़ों को समग्रता से लिया जाए, तो अंतिम परिणाम, निःसंदेह पूर्णांश ही होगा. काफ़ी कुछ सहायकों पर निर्भर
करता है; और भी ज़्यादा - - : उनकी बीबियों पर, और मोटे तौर से बीबियों पर, चाहे वे
किसीकी भी क्यों न हों, क्योंकि मर्दों की अपेक्षा औरतों को बहुत कुछ ज़्यादा दिया
गया है, मगर, यह एक नाज़ुक और काफ़ी विवादित प्रश्न है. ऊँगलियों पर समझाना मुश्किल
है, मगर इससे भी ज़्यादा मुश्किल है औरों के विचारों का केन्द्र होना. ऊपर से हर
विचार तो साकार नहीं किया जा सकता. हर विचार नहीं!
कल मैंने असंभाव्य घटनाओं की संभावनाओं
को सशक्त करने के बारे में एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए. रजिस्ट्रेशन शुरू हो
चुका है, मगर फ़िलहाल अनौपचारिक तौर पर. जब फ़ल पक जाएँगे, तब उन्हें काटेंगे. फ़ल फ़ल
में भी अंतर होता है, वर्ना तो वह भी हो जाता है, जो कभी हो ही नहीं सकता. }}}
03.32
पाण्डुलिपि समाप्त हो गई. कपितोनोव ने
नोट-बुक बन्द कर दी.
बाहर बर्फ़ का शोर हो रहा है, वह
खड़खड़ाते हुए पानी के पाइप से नीचे जा रही है. जैसे गर्माहट हो रही है. यही है
पीटरबुर्ग: दिन में माइनस ग्यारह डिग्री, रात में – गर्माहट, तापमान प्लस में.
सुबह फिर से बर्फ गिरेगी, और स्केटिंग रिंग बन जाएगी.
छत पर बूंदों का बहरा कर देने वाला शोर
है.
हॉटेल में सब कुछ कब का ख़ामोश हो गया
है. एक्सपर्ट–चीटर्स और अत्यंत सूक्ष्मधारी ख़ामोश हो गए थे. दीवार के पीछे
काल-भक्षक ख़ामोश हो गया था. क्या समय ठहर गया है?
03.34
साइड टेबल पर, खाली मग की बगल में, नोट
बुक रखकर कपितोनोव बिस्तर पर लेट जाता है और सिर के ऊपर वाला लैम्प ‘ऑफ़’ कर देता
है.
03.35
और इसके बाद ? – अपने आप से पूछना चाहता है (और
वाक़ई में कपितोनोव अपने आप से पूछता है).
मगर आगे क्या हुआ, इसमें क्यों
दिलचस्पी हो, जबकि ज़्यादा ज़रूरी है यह प्रश्न: कि क्या ये वास्तव में हुआ था?
कपितोनोव छत की ओर देखता है.
पहली बात, शैली. जहाँ तक कपितोनोव को
याद है, मूखिन की भाषा साधारण इन्सानी भाषा थी, असल ‘इन्सानी’ भाषा और ज़रा भी ‘इन्सानों
जैसी’ नहीं. कपितोनोव ने शायद मूखिन के लिखे हुए कुछ लेख पढ़े थे, जैसे कि, उदाहरण
के लिए, औरों की ही तरह मूखिन भी इंटरनेट की सोशल साइट्स पर काफ़ी लोकप्रिय था,
मगर, यदि कपितोनोव को वो लेख याद नहीं हैं, तो यह इस बात का प्रमाण है कि उनमें
कोई अतिशयोक्ति नहीं थी.
इस बात को मान सकते हैं कि मूखिन ने
किसी साहित्यिक-फ़ैन्टेसी की कल्पना की हो – प्रथम पुरुष में, क्यों नहीं? – मगर,
तब इसमें अपने जीवन की वास्तविक घटनाओं को ठूंसने की, वास्तविक नामों को ज़ाहिर
करने की क्या ज़रूरत थी? अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी को ऐसे विचित्र और अवास्तविक
स्वरूप में दिखाने की क्या ज़रूरत थी? और, इसमें कपितोनोव को घसीटने की क्या ज़रूरत
थी, वह भी उपहासात्मक संदर्भ में? कपितोनोव ने उसका क्या बिगाड़ा था?
और, सबसे प्रमुख बात “क्यों” : उसने
नोट बुक में ही क्यों लिखा – हाथ से? मरीना ठीक कहती है – यही सब कम्प्यूटर पे
लिखना कहीं ज़्यादा आसान होता!
‘हैण्डराइटिंग’ की बात तो छोड़ ही
दीजिए. उसने क्या कहीं शुद्ध एवम् सुन्दर लेखन का कोर्स किया था?
वैसे भी, कहीं एक भी धब्बा गिराए बिना
लिखा है.
और वैसे भी, ये सब लिखा क्यों है?
मूखिन ने कागज़ पर ये क्या बकवास उतारी है? किसलिए? किसके लिए? क्या अपने आप के
लिए?
कपितोनोव के दिमाग़ में दो ही तरह के
जवाब उभरते हैं:
- या तो मूखिन की गाड़ी पटरी से उतर गई थी;
- या ...उसे वाक़ई में प्रतिस्थापित किया गया था.
अगर उसे प्रतिस्थापित किया जाता, तो सब
कुछ ठीक हो जाता: ये मूखिन ने लिखा है, बिल्कुल उस वाले ने नहीं, जिसे कपितोनोव
जानता था.
मगर उस हालत में स्वरूप विषय-वस्तु के
अनुरूप होता. दूसरा इन्सान – उससे कुछ नहीं पूछ सकते.
कपितोनोव बाथरूम में जाता है, शॉवर लेता
है, दांत ब्रश करता है, और शेव करने लगता है (जल्दी ही सुबह होने वाली है – अभी
क्यों न कर लूँ?). ये काम करते हुए, कपितोनोव लगातार मूखिन के बारे में सोच रहा है.
वह सोच रहा था कि जवाब के दो विकल्पों
में ज़्यादा अंतर नहीं है. मूखिन, निःसंदेह पटरी से उतर गया था. और पटरी से उतरा
हुआ मूखिन – ये, बेशक, दूसरा मूखिन था. कह सकते हैं, दूसरा व्यक्तित्व.
कपितोनोव को उम्मीद है कि नींद आ
जाएगी. निरंतर निद्राहीनता के चलते तीन घण्टों की नींद भी उपहार स्वरूप होगी. मगर,
वह ब्रेकफ़ास्ट भी छोड़ना नहीं चाहता. उसने मोबाइल फोन पर 7.30 का अलार्म लगाया.
मगर अभी कितने बजे हैं?
4.07
वह लेट जाता है. आँखें बन्द करता है और
एकदम देखता है कि कई सारे धनु-कोष्ठक झाँक रहे हैं.
उसने फिर से छत पर नज़रें गड़ा दीं –
बाहर से आती हुई रोशनी से प्रकाशित खिड़की के धुंधले प्रतिबिम्ब पर. या ये बाहर की
तरफ़ से प्रकाशित खिड़की का प्रतिबिम्ब था, जो कपितोनोव पर नज़रें गड़ाए था?
हालाँकि खिड़की का परदा छत पर पड़ते हुए
आयत को बुझा रहा है, मगर वह असली खिड़की के पीछे गिरती हुई बर्फ को प्रतिबिम्बित
होने से नहीं रोक रहा है. वह टूटे-फूटे धब्बे बनाते हुए आयत की एक भुजा से दूसरी
भुजा के ओर फिसल रही है – खिड़की से लगी दीवार से दरवाज़े वाली दीवार तक. कपितोनोव
नज़र नहीं हटा रहा है. छत वाला आयत दूसरे आयाम में खुलते हुए तकनीकी ‘हैच’28 जैसा
लग रहा है, जिसमें बाएँ से दाएँ परछाईयाँ चल रही हैं. अचानक ऐसा लगा, कि ये
परछाइयाँ नहीं, बल्कि उनके सापेक्ष ख़ुद ‘हैच’ ही चल रहा है – कमरे के साथ – दाएँ
से बाएँ. और वे स्थिर हैं. और उसे लगा कि पीठ के बल लेटा हुआ कपितोनोव भी पलंग और
कमरे के साथ, घूम रहा है दाएँ से बाएँ, और परछाइयाँ, स्थिर धब्बों के रूप में, इस
तरह घिसटती जा रही हैं, जैसे टेक-ऑफ़ करते हुए हवाई जहाज़ के खुले ‘हैच’ में बालू पर
स्थिर कंकड . यह सोच कर भी डर लगता है कि कैसे तुम मुँह के बल इस ‘हैच’ में गिर
रहे हो, और वहीं रह जाते हो, अचल अवकाश में अचल परछाइयों के बीच, ये जानते हुए कि
पीठ के पीछे वाला ‘हैच’ कहीं बाईं ओर खिसक गया है, खाली हो चुके कमरे और तुम्हारी समूची
दुनिया के साथ, जिसका कमरा पहले ही की तरह एक हिस्सा है, मगर तुम अब नहीं हो. पलंग
का किनारा पकड़ने का भी मन हुआ, जिससे कि अगर अचानक विपरीत आकर्षण का बल प्रकट हो
जाए, तो उससे अलग न हो जाए और छत के
धुंधले ‘हैच’ में न गिर जाए. मगर वह ऐसा नहीं करता, बल्कि सिर्फ आँखें बन्द कर
लेता है.
धनु-कोष्ठक फिर से प्रकट हो गए. तब वह
अपने आप को ये समझाते हुए शांत करने की कोशिश करता है, कि ये उसके व्यक्तिगत नहीं
हैं, बल्कि मूखिन के बेसिरपैर वाले नोट्स से हैं. ऐसा ही है – कोष्ठक हल्के से एक
ओर को झुके हुए हैं, जो हाथ से लिखी इबारत की विशेषता है. वह फ़ैसला करता है कि
उपभोक्ता की तरह उनसे पेश आएगा और वह उन्हें गिनना शुरू करता है, जैसे वे हाथी
हों. एक कोष्ठक, दो कोष्ठक, तीन कोष्ठक... ग्यारह कोष्ठक...नैचुरल सिक्वेन्स –
गणित की दृष्टि से बेहद सरल गिनती, क्या उन्हें फ़िबोनाची सिक्वेन्स29
में रखना ज़्यादा अच्छा होगा? समस्या ये है, कि धनु कोष्ठक हाथी नहीं हैं, और वे अप्रत्याशित रूप से प्रकट होते
हैं, कभी एक, कभी जोड़े में, और समझते रहो कि कौन सा कहाँ देख रहा है. उनके अनधिकृत
अवतरण से छुटकारा पाने के लिए वह उपभोग्य पदार्थ के रूप में उनका इस्तेमाल करने का
विचार करता है और एक गणितीय फ़ॉर्मूला सोचने लगता है. मगर इसके लिए पहले छोटे और
फिर वर्गाकार कोष्ठकों को रखना पड़ेगा. उसमें, जो वर्गाकार कोष्ठकों में है, वह
आसानी के लिए एक का अंक जोड़ता है और इस सब को क्रमवार तरीक़े से हल करने का निश्चय
करता है...सब कुछ उसी वर्ग में – इस तरह धनु-कोष्ठकों पहली जोड़ी समाप्त हो गई.
उसने फिर से एक जोड़ा और धनु-कोष्ठकों की दूसरी जोड़ी को ख़त्म करने के बाद, इस सब
माल-मसाले को तीसरी सीढ़ी तक लाता है. इसके बाद, एक जोड़ने के बाद धनु-कोष्ठकों की
अगली जोड़ी को ख़तम करता है, इस सबको चौथी सीढ़ी तक लाता है. सीढ़ियों के बढ़ते क्रम के
साथ उसके दिमाग़ में धनु-कोष्ठकों की भीड़ होने लगती है. अब वह हाथियों की तरह सीढ़ियों
को गिनता है, जिन पर धनु-कोष्ठकों के भीतर जकड़ा हुआ रखा जा रहा है. नींद आ ही नहीं
रही है. तब उसे फिर से याद आता है कि ये उसके नहीं बल्कि पराए कोष्ठक हैं, और वह
मूखिन के बारे में सोचता रहता है. मूखिन के बारे में न सोचे, इसलिए वह बाईं करवट
पर मुड़ जाता है.
उसे सुनाई दिया कि कैसे घड़ी की तरह
05.15
तकिये से चिपकी बाईं कनपटी, खून
टिक-टिक कर रहा है.
खून. खून. खून. खून.
खून – खून का ब्लड ग्रुप और Rh.
तब उसे उसका ब्लड-ग्रुप पता नहीं था.
मूखिन ने बकवास लिखी है. कोई भी नहीं
डूब रहा था, न नदी में, न समुन्दर में, कुछ भी उस तरह नहीं हुआ था. किसी और ही तरह
से हुआ था.
टूटा हुआ शीशा था, प्लेटफॉर्म था और छह
साल की अन्यूता का खून था. और डॉक्टर्स थे. उसके ग्रुप का खून मंगवाना था. समय
बिल्कुल नहीं था, एक मिनट भी नहीं. टेलिफ़ोन था, भतीजे का नंबर था अंतिम दो अंकों
के बगैर. उसने नंबर दबाया – अंतिम दो अंक अंदाज़ से दबा दिए. आश्चर्य हो गया – नंबर
लग गया. हालाँकि नहीं: पहले वह एक अंक दबाना चाहता था, फिर दूसरा, मगर दबा दिया
तीसरा ही – और सही घुमाया. “वान्या, नीना आण्टी को बुला, वह पास में ही है? फ़ौरन”.
(नीना का फ़ोन उन दिनों खो गया था.) “नीना, इस समय कुछ भी मत पूछो, अन्यूता का ब्लड
ग्रुप और Rh बताओ”. उसने तुरंत,
साफ़-साफ़ कहा : “दूसरा, प्लस”.
कपितोनोव को अब कुछ भी याद नहीं है, कि
इसके बाद क्या हुआ था, और ये भी अच्छी तरह याद नहीं है कि उसके पहले क्या हुआ था.
मगर वह फ़ोन-कॉल उसे न केवल अच्छी तरह याद है, बल्कि वह उसके स्वामित्व में है,
जैसे वह कोई वस्तु हो – कोई ठोस वस्तु – जैसे उस ‘बीच’ पर लगे कंकालनुमा उपकरण के
दुहरे हुक की तरह, जिसके पंख हवा के साथ गिरते-उठते हैं.
कपितोनोव को वह अंक याद है, मगर वह
उसके बारे में नहीं भी सोच सकता है. ये उन तीन दुहरे अंकों वाली संख्याओं में से
एक है, जिसे कोई भी नहीं सोचता है.
वह जानता है, कि इस बारे में सोचना मना
है.
वह इस बारे में न सोचने की योग्यता
रखता है.
चाहे जिस बारे में सोचो, मगर किसी और चीज़ के बारे में सोचो (आदर्श
स्थिति में किसी भी बारे में नहीं), और यह ‘और’ उसे नज़र आता है किसी व्यक्ति या
किसी गुण के स्वरूप में – कभी जंगली चूहा, तो कभी निकोल मैरी किड़मैन, तो कभी किसी
घर के दर्शनी भाग पर बना शिल्प, तो कभी विनाश का सिद्धांत.
उसे यक़ीन है, कि किसी और चीज़ के बारे
में सोच रहा है और यह, कि जाग रहा है, सो नहीं रहा है, और सिर्फ सोना चाहता है.
मगर नींद जैसी कोई चीज़ आती तो है - सुबह-सुबह. वह फिर भी समझ रहा है, कि ये सपना
नहीं है, क्योंकि सो नहीं रहा है, और, जब मोबाइल का अलार्म बजने लगता है,
07.30
तो थकान से चूर, अफ़सोस के साथ आँखें
खोलता है, कि बेकार ही में बिस्तर में लेटा रहा. मगर वह, सपने जैसा,
भुलाया नहीं गया, जैसा कि उनके साथ, सपनों के साथ (उनके साथ और हमारे भी साथ), होता
है, और इसके विपरीत, याद आता रहता है. और याद आता है सिर्फ सारांश की दृष्टि से.
और जब वो है, तोवह भी सपने जैसा - सपना ही था. हो सकता है, सपना, थोड़ी ही देर के
लिए था, मगर फिर भी सपना तो था ही.
अलार्म बन्द करके, कपितोनोव बिस्तर में
ही रहा – सपने का सारांश पुनर्जीवित करना होगा.
07.31
जंगली चूहा. कपितोनोव के बचपन वाला. पिंजरा, उसमें लकड़ी
की छीलन, पानी का बर्तन, खाने का कटोरा और छोटा सा घर.
ख़ास बात – ख़ून के बारे में नहीं, टूटे
हुए कांच के बारे में भी नहीं...
छोटा सा घर, प्लास्टिक का क्यूब है,
नमक वाले जार से भी छोटा. एक छेद, गोल – अंदर जाने और बाहर आने के लिए. साइज़ में –
मोटा आलूबुखारा गुज़र सकता है, मगर मुर्गी का अण्डा - मुश्किल से ही जा पाएगा. जंगली
चूहा संकरी जगह में रहना ही पसन्द करता है – बाहर से खींच खींचकर लकड़ी की छीलन घर
के भीतर लाता है, पूरा घर उससे भर देता है. भीतर आने का दरवाज़ा लकड़ी की छीलन से
बंद हो गया. सच कहा जाए तो अभी तक ये सपना नहीं, बल्कि सपने का आगाज़ था. सारी
बातों को देखते हुए ऐसा ही लगता है. सपना तो है ये. अगर नींद है तो.
कपितोनोव ऊँगली से लकड़ी की छीलन को घर
से बाहर निकाल रहा है. पर चूहा हार नहीं मानता, मगर वह कैसे नहीं हारेगा? कपितोनोव
की ऊँगली छीलन तक पहुँचती है. देखता है कि उसे फिर से घसीट लिया गया है. वह उसे
फिर से ऊँगली से निकालता है. देखा, फिर से वापस. फिर ऊँगली से. देखा, फिर से.
ये सपना नहीं भी हो सकता था, बल्कि
सिर्फ कोई याद रही होगी (बचपन में एक बार ऐसा हुआ था : वह जंगली चूहे के घर से ऊँगली
से छीलन निकाल रहा था), बस, इस समय छीलन को एक बच्चा नहीं, बल्कि आदमी – अपने
होशो-हवास में बाहर निकाल रहा है.
अगर जंगली चूहे के फ़ौरन बाद कपितोनोव
के दिमाग़ में डॉक्टर फ्रायड न आता, तो वह सबसे बड़ा मूर्ख होता. जंगली चूहे को याद
करते हुए कपितोनोव अपने आप से पूछता है : कहीं इसमें सुप्त समलैंगिकता तो नहीं है?
ख़ुद ही उत्तर भी दे देता है कि ऐसा नहीं है. आम तौर पर कहा जाए तो, वह ये मानता है
कि सुप्त समलैंगिकता का आविष्कार वास्तविक लोगों ने किया था, न कि सुप्त लोगों ने,
मगर कहीं इस निष्कर्ष में भी कहीं सुप्त समलैंगिकता तो नहीं है? अगर कुछ
लोगों की बातों को सुना जाए, तो वह हर जगह है, ख़ासकर डॉन जुआन में तो वह अत्यधिक
है...और, जो इस नोटबुक में, मूखिन कपितोनोव के प्रति असाधारण लगाव दिखा रहा है,
कहीं उसमें भी तो सुप्त समलैंगिकता नहीं है? और, जो ‘तालाब’ ने कपितोनोव को कॉन्फ्रेंस
में निमंत्रित किया, कहीं उसके पीछे भी तो सुप्त समलैंगिकता नहीं है? और, वैसे भी,
कॉन्फ्रेंस में औरतें इतनी कम क्यों है?
उठा और कपड़े पहने. सुबह के कार्यक्रम,
जैसे पाठ्य पुस्तक में “My Morning” वाले पाठ में होते
हैं. ‘शेव’ करना चाहता है, मगर अचरज के साथ ग़ौर करता है कि, शायद, पहले ही कर चुका
है, - तभी ये भी याद आया कि तीन-चार घण्टे पहले ‘शेव’ कर चुका है.
और, क्या सु...
मगर चेहरे पर ठण्डा पानी उछालकर इस
विचार को हटा देता है. अफ़सोस, इससे उसे कोई ताज़गी नहीं मिली.
अपने आप को टूटा हुआ (‘शेव’ किया हुआ)
महसूस करते हुए, उनींदा (मगर ‘शेव’ कर चुका) कपितोनोव अपना बसेरा छोड़कर नाश्ता
करने के लिए निकलता है.
08.06
लिफ्ट से नीचे जाते हुए भी वह नोटबुक
के बारे में ही सोच रहा है. सबसे मुश्किल सवाल : वह उसे क्यों दी गई थी? किस
उद्देश्य से?
कैफ़े के प्रवेश द्वार पर खड़ी
ड्यूटी-गर्ल अपनी लिस्ट में वास्तव में आए हुए लोगों के नामों पर निशान लगा रही
थी.
“प्लीज़ – आपके कमरे का नंबर.”
”32” - अपने ही ख़यालों में खोए हुए
कपितोनोव यंत्रवत् सोचता है.
“माफ़ कीजिए, आपने अपना नंबर नहीं बताया.”
“32” कपितोनोव होश में आ गया.
08.11
हाथों में प्लेट लिए बुफ़े की मेज़ को
देख रहा है. “हर चीज़ थोड़ी थोड़ी” वाले सिद्धांत का पालन करते हुए भी वह चीज़ वाले
पैनकेक्स को नज़रअंदाज़ कर देता है, और फ्राइड-सॉसेज के बदले गोभी के कटलेट्स को चुनता
है.
अभी तक न जलाई गई ‘फ़ायरप्लेस’ के पास वाली मेज़ पर
बैठकर, उसने आराम से खाना शुरू करता है.
नाश्ता करने के इच्छुक लोगों से हॉल भर
रहा है. कपितोनोव ये जानने की कोशिश करता है कि आगंतुकों में कौन-कौन कॉन्फ्रेन्स
के डेलिगेट्स हैं, - पूरा का पूरा हॉटेल तो उनका नहीं है.
हाथों में प्लेटें लिए दो व्यक्ति उसकी
मेज़ पर बैठने की इजाज़त मांगते हैं (ख़ाली कुर्सियाँ अब दिखाई नहीं दे रही हैं).
उनके बैजों को देखकर पता चला कि उनमें
से एक माइक्रोमैग (माइक्रो-मैजिशियन – अनु.) अलेसान्द्र सीज़र है, दूसरा –
हेरा-फ़ेरी करने वाला सिर्गेइ वोरोब्योव. मेज़ पर वे अपनी बातचीत जारी रखते हैं.
“नहीं, मुझे लगता है कि यह वास्तविक नहीं है, -
सीज़र कहता है. “प्रमाणित करने के लिए कुछ अन्य मानदण्डों को चुनना होगा.
योग्यता-गुणांक नापने की कोई पद्धति नहीं है.
“ख़ास तौर से तब, जब योग्यता-गुणांक सौ
प्रतिशत से ज़्यादा हो,” वोरोब्योव सहमति दर्शाता है. “मैं कहता हूँ, कि मेरा दो सौ
है. और आप साबित कर दीजिए कि डेढ़ सौ है.”
“दो सौ – ज़्यादा नहीं है. मैं दृढ़तापूर्वक कहता
हूँ कि मेरा दो सौ बीस – दो सौ चालीस है, इससे कम नहीं.”
“माफ़ कीजिए, क्या आप योग्यता-गुणांक के बारे में
कह रहे हैं?” उनकी बातों से आश्चर्यचकित कपितोनोव अपनी नाक घुसेड़ता है.
“बिल्कुल, योग्यता-गुणांक के बारे में.”
“परिभाषा के अनुसार योग्यता-गुणांक सौ प्रतिशत
से ज़्यादा नहीं हो सकता.”
“क्यों?”
“ ‘क्यों’ क्या? क्योंकि योग्यता-गुणांक –
उपयोगी काम और नष्ट हुए काम का प्रतिशत अनुपात होता है. और उपयोगी काम हमेशा नष्ट
हुए काम से कम होता है.”
“सामान्य भौतिकशास्त्र में – बेशक ऐसा है,” फ़िसलते
हुए ज़ैतून में कांटा चुभोने की कोशिश करते हुए सीज़र जवाब देता है, “मगर जब बात
भौतिक-जादू की हो रही हो... जैसे, इस धारणा को लीजिए – चमत्कार. अगर प्रेक्षक को
अवलोकित किए जा रहे चमत्कार का योग्यता-गुणांक नापने की पद्धति का ज्ञान हो, तो
उसे कोई सन्देह न होगा – चमत्कार का योग्यता-गुणांक सौ प्रतिशत से अधिक होगा.
उपयोगी काम नष्ट हुए काम से ज़्यादा है.”
“ एकदम सौ प्रतिशत,” वोरोब्योव ने सहमति दर्शाता
है. “नष्ट हो चुका काम, हो सकता है, उतना ही हो, जो जादू के मंत्र पढ़ने, भविष्य
कथन के लिए पांसे तैयार करने, और कुछ आरंभिक तैयारियों से संबंधित हो. एमिल्या30
की याद है? उसे भी हर बार कहना पड़ता था “मछली की आज्ञा से”, अपनी शक्ति खर्च करनी
पड़ती थी, और फिर हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए, कि इस मछली को पकड़ने में भी उसकी
कुछ न कुछ शक्ति तो खर्च हुई ही थी. तो, नष्ट हुआ काम – ये किसी भी तरह का काम हो
सकता है, ऐसी चरम परिस्थितियों में भी, मगर उपयोगी काम उससे कहीं ज़्यादा है.”
“तर्क समझ में आ रहा है,” कपितोनोव मुस्कुराते
हुए कहता है, “मगर यदि ऐसा है, तो ये चमत्कार नहीं, बल्कि कुछ और ही है. चमत्कार
के लिए काम के नष्ट होने की आवश्यकता ही नहीं है, वह होता है बाहर से, आपके
परिश्रम के नष्ट होने की कड़ी के परे से.” उसने डबलरोटी को चाकू से काटा, जिससे
मक्खन लगा सके. “आप वो कह रहे हैं, जिसे कहते हैं....असल में, क्या कहते हैं?...
जादू, न कि चमत्कार. जादू बगैर पासों के नहीं होता, ये सही है, मतलब बिना नष्ट हुए
काम के जादू नहीं हो सकता. मगर चमत्कार तब होता है, जब नष्ट हुआ काम ज़ीरो हो. क्या
मैं ग़लत कह रहा हूँ?”
“आप ये कहना चाहते हैं कि चमत्कार के
योग्यता-गुणांक की गणना करने के लिए उपयोगी काम को ज़ीरो से भाग देना पड़ेगा?” अण्डे
के नुकीले हिस्से पर चाकू के सही वार से छिलके को तोड़ते हुए वोरोब्योव पूछता है.
“असल में तो ज़ीरो से भाग देना मना है. मगर यदि
ज़ीरो के स्थान पर डिनॉमिनेटर (विभाजक) में अत्यंत छोटी संख्या रखी जाए, जो लगभग
ज़ीरो के समान हो, तब भी परिणाम में आप ऐसी संख्या प्राप्त करेंगे जो लगभग
इन्फ़िनिटी (अनंत) जितनी होगी.”
“ चमत्कार का योग्यता-गुणांक – अनंत
प्रतिशत?”
“वैसे, हो सकता है, कि अनंत को प्रतिशत
में प्रदर्शित करने में कोई तुक न हो.”
“और जहाँ तक जादू का सवाल है, उसके
योग्यता-गुणांक को प्रतिशत में प्रदर्शित करना, क्या ये, आपके ख़याल से, सही है?”
अपने ही नाम के सलाद की ओर देखते हुए, जो उसकी बगल से काल-भक्षक ले जा रहा है,
सीज़र ने पूछता है.
कपितोनोव पास से गुज़रते हुए अपने पड़ोसी
से फ़ौरन आँखें फ़ेर लेता है.
“ये मैंने नहीं कहा है. ये आप कह रहे हैं,”
कपितोनोव सीज़र को जवाब देता है.
“माफ़ कीजिए, आप कौन हैं?”
“येव्गेनी कपितोनोव. मेंटलिस्ट, अगर आप चाहें
तो.”
“और अगर न हो तो? अगर कोई चमत्कार ही न हो तो?
अगर, आम तौर पर, कुछ भी न हो तो – मतलब, जैसे कि अभी, तो हमारी निष्क्रियता का
योग्यता-गुणांक क्या होगा?” वोरोब्योव पूछता है.
“ये किस बारे में?”
“उस बारे में कि नष्ट हुआ काम ज़ीरो हो और उपयोगी
काम भी ज़ीरो हो. योग्यता-गुणांक – क्या ज़ीरो को ज़ीरो से भाग देना पड़ॆगा?”
“योग्यता-गुणांक किसका?”
“किसी का नहीं. कुछ नहीं होने का.”
“अगर उपयोगी काम हो ही नहीं रहा है, तो
योग्यता-गुणांक कैसे निकालेंगे?” कपितोनोव समझ नहीं पा रहा है.
”ऐसे – ज़ीरो बटा ज़ीरो. किसी ऐसी मशीन
की कल्पना करें, जिसे ख़ास तौर से सैद्धांतिक निष्क्रियता के लिए बनाया गया हो.”
कपितोनोव जवाब देता है:
“ज़ीरो बटा ज़ीरो होगा अपरिमितता.”
“ये अपरिमितता कहाँ से आ गई?” सीज़र परेशान हो जाता
है. “कहीं इसलिए तो नहीं कि चमत्कार है ही नहीं?”
“नहीं, इसलिए कि डिनॉमिनेटर में नष्ट हुआ काम
अनुपस्थित है.”
“मगर डिनॉमिनेटर में ज़ीरो नष्ट हुए काम के चलते –
चमत्कार की परिस्थिति में, जैसा कि आपने अभी-अभी कहा है, हमें न्यूमरेटर (भाज्य) में
कोई प्रभाव मिलना चाहिए, चमत्कारी प्रभाव, एक शब्द में, ज़ीरो नहीं. और तब हमारा
योग्यता-गुणांक – इन्फ़िनिटी (अनंत) होगा.”
“हाँ, मगर ये हमारा योग्यता-गुणांक नहीं है.”
“योग्यता-गुणांक चमत्कार का.”
“स्टॉप,” वोरोब्योव कहता है, “वो कहाँ है,
चमत्कार? इससे यह सिद्ध हुआ कि हम हर समय अपरिमितता की स्थिति में रहते हैं.
उम्मीद की स्थिति में और चमत्कार की उम्मीद में? मैंने, जैसे, इस पल कोई काम नष्ट
नहीं किया, और क्या पाया? ज़ीरो बटा ज़ीरो – अपरिमितता. समझ नहीं पा रहा हूँ. मैं
अपनी निष्क्रियता का योग्यता-गुणांक जानना चाहता हूँ. वह ज़ीरो के बराबर क्यों नहीं
है? अगर वह – अपरिमितता है, मतलब, मुझे परिमितता की उम्मीद करने का अधिकार है? मतलब,
इस बात की, कि चमत्कार होगा?”
कुछ देर ख़ामोश रहे. कुछ सोचा. कपितोनोव
को लगा कि वे उसकी फ़िरकी ले रहे हैं.
“वैसे, यहाँ योग्यता-गुणांक की ज़रूरत क्या है?”
कपितोनोव पूछता है. “योग्यता-गुणांक – सिर्फ एक दूसरे के प्रतिशत संबंध को दर्शाता
है. योग्यता-गुणांक – न तो भगवान है, न विश्वकर्मा, न कोई काली या सफ़ेद ताक़त. वो
सिर्फ योग्यता-गुणांक है.”
“मगर सर्टिफ़िकेट के लिए वह हमसे मांगा जाता है.”
“और, ये भी उम्मीद की जाती है कि वह सौ प्रतिशत
से अधिक हो. इसका असर वेतन पर, हमारी श्रेणी पर पड़ता है.”
“क्या बात है!” कपितोनोव कहता है.
“क्या आप इस तरह से नहीं कमाते हैं?” वोरोब्योव पूछता
है.
“मैं दूसरी तरह से कमाता हूँ.” कपितोनोव कहता
है.
“’लकी’ हो.”
“ रुकिए, मगर आपके पास अधिकार है,” कपितोनोव
कहता है. “किसी न किसी को तो आपकी हिफ़ाज़त करनी होगी. क्या आपकी कोई यूनियन है?”
“कपितोनोव, ये बताईये कि क्या आप पाँच डबल
रोटियों से पाँच हज़ार आदमियों का पेट भर सकते हैं?” सीज़र पूछता है.
“ये कैसा सवाल है? बेशक, नहीं.”
“मैं भी.”
वह उठता है और जाने लगता है. वोरोब्योव
कहता है:
“बिल्कुल बहस करना नहीं आता. सिद्धांतवादी है.
ख़ासकर, जहाँ मूलभूत सिद्धांतों का प्रश्न हो. अरे, यहाँ मेरा कटलेट था, कहाँ गया?”
“मेरे पास भी था – यहाँ, प्लेट में.”
“मैंने नहीं खाया.”
“और मैंने भी नहीं खाया” कपितोनोव को विश्वास
नहीं होता. “कहीं ग़ायब हो गया.”
“अच्छा, भाड़ में जाएँ कटलेट्स,” वोरोब्योव कहता
है और, कपितोनोव को चौंकाते हुए, इन अजीब हालात से हौले से समझौता करके, जैसे कुछ
हुआ ही नहीं हो, अंजीर खाने लगता है.
“ऐसा कैसे?” कपितोव ने अटपटा-सा सवाल
पूछता है.
कपितोनोव परेशान हो गया. जब उसके साथ
कोई अविश्वसनीय बात हो जाती है, तो वह सबसे पहले अपने आप को समझने की कोशिश करता
है: क्या उसने बात को सही समझा है?
“हो सकता है... हम भूल गए हों,” और अपने कथन की
सत्यता पर स्वयँ ही अविश्वास करते हुए वह मुड़कर औरों की ओर देखने लगता है, वे सब
अपनी अपनी मेज़ों पे बैठे हुए बुफ़े वाली मेज़ से ली हुई खाने-पीने की चीज़ों का मज़ा
ले रहे हैं – कोई ऑमलेट ले रहा है, कोई बॉइल्ड सॉसेज, कोई सलाद और हैरिंग मछली,
कोई केक्स. सिर्फ काल-भक्षक, मेज़ के नीचे हाथ रखे उदासी से प्लेट की ओर देख रहा
है, ‘सीज़र’ सलाद की ओर. उदासी से देख रहा है और बुरा दिख रहा है : काल-भक्षक के
चेहरे के रंग को ‘सलादी’ कहना उचित होता. हरियाली लिए और सिलवटों वाला.
“माफ़ कीजिए. भूल गए – क्या?” (वोरोब्योव समझ
नहीं पाया कि कपितोनोव ने क्या कहा था.)
कपितोनोव अधसोची बात पर लौटा:
“क्या, खा लिए, भूल गए...कटलेट्स.”
“हम भूल गए? कि खा लिए? नहीं, मैं नहीं भूला,
मैंने नहीं खाए.”.
काल-भक्षक भाँप जाता है कि वे दोनों
उसकी ओर देख रहे हैं, उसका रंग और हरा हो जाता है. उसके चेहरे पर – जैसे उबकाई रोक
रहा हो. वह उठ जाता है, हथेली से मुँह बन्द कर लेता है और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ता है,
कुछ भी खाए बग़ैर.
“आया क्यों था?” वोरोब्योव कपितोनोव से पूछता है.
“हमारा खाना उसे रास नहीं आता.”
08.49
कपितोनोव फ़ायरप्लेस वाले हॉल से निकल
जाता है. लिफ़्ट में वह एक रूम-अटेंडर लड़की के साथ जा रहा है. उसकी नज़र कपितोनोव को
छूती हुई “कॉल फ़ॉर हेल्प” वाले बटन पर है, मगर वह देखता है कि चेहरे की मुस्कान
उसीके लिए है. इस मुस्कान में वह पढ़ता है, कि लड़की को उसके जादूगर होने की जानकारी
है, और यदि वह कोई जादू दिखाना चाहे तो उसे साभार स्वीकार करने की तत्परता भी. मगर
उसे एक और मंज़िल ऊपर जाना था.
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