शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

Curly Brackets - 08


मैं देर क्यों कर रहा हूँ? मूखिन पर बीबी के व्यभिचार का ठप्पा - - : इस विचार मात्र से पल भर ही में मैं सुलग उठा. मेरे भीतर वासना हिलोरें ले रही थी. उसकी बगल में बैठकर, एक पल में मैंने उसे अपनी बांहों में लेकर और होठों की ताक़त से उसके होठों पर हमला कर दिया. मेरे लिए आकस्मिकता ये थी, कि उसके लिए ये आकस्मिकता नहीं थी, हालाँकि, शायद, उसके लिए मेरी ये आकस्मिकता आकस्मिक थी. मगर आश्चर्य मुझे सिर्फ पल भर को हुआ, जब मैंने महसूस किया कि कितने आवेग से वह मुझे प्रतिसाद दे रही है - - : जैसे कभी भी मूखिन को नहीं दिया होगा! सामने से - - : इस शब्द में सुनाई देता है “मुँह” - - : हमारे मुँह एक दूसरे से मिल गए, ज़बानें संघर्षरत हो गईं, और, अगर उनके पास, हमारी ज़बानों के पास, कोई जननांग होते, तो शक की गुंजाइश नहीं, कि ज़बानें हमसे पहले एक हो जातीं - - : हमें एक दूसरे की ऐसी ख़्वाहिश हो रही थी. हमने अपने आपको स्प्रिंग बॉक्स पर नहीं, बल्कि फ़र्श पर गिरा लिया - - : मूखिन के साथ ऐसा नहीं होता था. ये मैंने उसे गिराया था. उसी तरह फ़र्श पर लुढ़कते हुए अनावृत हो गए - - : तैश भरी छीना-झपटी में, ये समझे बगैर कि कौन किसके कपड़े खींच रहा है - - : अपने, या दूसरे के, ख़ैर - - : उसके बदन पर तो सिर्फ गाऊन था; कपड़े तो मैंने पहने हुए थे.
मैं वह सब जानता था, जो मूखिन जानता था, मूखिन की बीबी के बारे में. वह सब जो मूखिन की बीबी के बारे में मूखिन जानता था, मूखिन की बीबी के बारे में मैं जानता था. ये दूसरी बात है कि, मूखिन कितना जानता था. वह सोचता था कि काफ़ी जानता है. विशेषतः जिस्म के बारे में - - : उसके. हम दोनों ही कह सकते थे, मगर मैं सिर्फ अपने बारे में कहूँगा - - : मैं, न कि हम, मैं उसके जिस्म को अपने ख़ुद के जिस्म से ज़्यादा अच्छी तरह जानता था, और ये बिल्कुल सच है.  जैसे कि, अवलोकन के अभाव में मैं इस बात की धुंधली सी ही कल्पना कर सकता हूँ, कि मेरी पीठ कैसी दिखती है, मेरी स्कंधास्थियाँ कैसी नज़र आती हैं, आख़िर है वही पिछली बाज़ू, मगर, मैं कोई नार्सिसिस्ट25 नहीं हूँ और दुहरे आईनों का इस्तेमाल नहीं करता, मगर अब सामने नज़र आती उसकी लचीली पीठ, स्पष्ट रीढ़ की हड्डी, उसकी नुकीली स्कंधास्थियाँ और सामान्य तौर पर किसी चित्र की विशेषताओं जैसी ये सारी चीज़ें, पीछे से, किनारे से, सामने से - - : स्मृति में साफ़-साफ़ और हमेशा के लिए अंकित हो गई हैं, सूक्ष्म विवरणों सहित. पिछले सालों में, जब मूखिन ज़्यादा उत्सुक था, और वह कुछ ज़्यादा मेहेरबान, और, हो सकता है, आत्मविश्वास से परिपूर्ण, वह उसे किन्हीं परिस्थितियों में अपने बाह्य स्वरूप के कुछ सजीव और संवेदनशील अंगों को देखने की इजाज़त दे देती थी. मैग्निफ़ायिंग-ग्लास तक तो बात नहीं पहुँचती थी. मगर उसे सूक्ष्म विवरण में ही दिलचस्पी थी - - : नाभि के पास कोई तिल, कोई पतला बाल, कोई गढ़ा, कोई गहराई. ये मैं इसलिए बता रहा हूँ, कि अपने ज्ञान की मात्रा प्रदर्शित कर सकूँ. मगर इस समय, मूखिन की बीबी की नग्नता को मैं उसके पति की नज़र से नहीं देखना चाहता था. और देखने की फ़ुर्सत भी नहीं थी! जो देखा, सो देखा - - : पराई, और अपने परायेपन से अनजान ही सही, बीबी को. तेरी यही सज़ा है, मूखिन, अच्छा मज़ा चखाया! हम अत्यंत आवेग से एक हो गए. मैं मूखिन जैसा नहीं करना चाहता था, किसी भी बात से मैं उसे मूखिन की याद नहीं दिलाना चाहता था, और, मेरे ख़याल से, वह मूखिन के बारे में भूल गई, हाँ, हाँ, मुझे पूरा यक़ीन है! अगर कभी कोई, कहीं इसकी फ़िल्म बनाना चाहे, तो वह फूहड़ पोर्नोग्राफी की शूटिंग कर सकता है. मैं बस गुरगुराया नहीं. और, उसके पास, चिल्लाने के लिए आवाज़ ही नहीं थी! मूखिन सही था, जब पिछले कुछ सालों से उसे बीबी पर इस बात का संदेह था कि वह चीख़कर कामोत्तेजना का दिखावा करती है. ये है असली कामोत्तेजना! गूंगी, बेआवाज़!
जब आँखें खोलीं, तो मेरी ओर इस तरह देखा, जैसे पहली बार देख रही हो.
 “और मैं ये समझ बैठी थी, कि अब ये नहीं होगा - - : ”
मगर मैंने कहा - - :
 “बेवफ़ा”.
 “मतलब?” (उसने पूछा).
मतलब मैं समझाने नहीं बैठा. }}}

{{{ चाहता था कि मैं ग़लत होऊँ, मगर, लगता है कि किसी के द्वारा धनु-कोष्ठकों को खोलने की कोशिश की गई थी. किन्हीं ठोस सबूतों के आधार पर नहीं कह रहा हूँ, मगर मुझे - - : महसूस करवाया गया है.

शायद इसी संबंध में, मगर मैं कपितोन26 और रिज़ोनेन्ट एक्सेसेज़ (अनुनादी अधिकताओं) के बारे में सोचने लगा. रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इस तरह की घटना को कह सकते हैं “हद से बढ़ जाना”, मगर प्रस्तुत घटना के संदर्भ में ज़्यादा उचित होगा - - : फिर वही रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में - - : मुझे सूझता है शब्द - “बाउन्स”.

कपितोनोव और मूखिन लम्बे समय तक दोस्त रहे; मगर पहले का मरीना रोमानोव्ना से, मूखिन की भावी पत्नी से, काफ़ी पहले परिचय हो चुका था, दूसरे के मुक़ाबले में - - : बस, इसी संदर्भ में वह पहला था. पता नहीं, कि क्या मूखिन भी ऐसा ही सोचता था, मगर व्यक्तिगत रूप से मैं, जिसने मूखिन को प्रतिस्थापित किया है, कपितोन को एक साधारण औसत दर्जे का मानता हूँ, हालाँकि, बहस नहीं करूँगा, मैं मूखिन की अपेक्षा कपितोन को कम जानता हूँ. दो अंकों वाली संख्याओं के स्तर पे ‘अनुनादी अधिकताएँ’, पता नहीं मस्तिष्क की कौन सी उपलब्धि है - - : मतलब, मस्तिष्क - - : औसत दर्जे का क्यों नहीं हो सकता? मगर फिर भी, अचरज की बात है - - : कपितोन अपने ही बाउन्सेस पर प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर सकता! ये बाउन्सेस कभी कभी जिस तरह का प्रभाव प्रत्यक्षदर्शियों पर डालते हैं, उसे उनके प्रदर्शन से उस हद तक नहीं समझाया जा सकता, जितना, मेरी नज़र में, कपितोनोव की सहजता से.
कहते हैं - - : उदाल्त्सोव से मालूम हुआ - - : कपितोनोव में बेहद मानसिक तनाव के कारण इसका पता चला, जब उसकी छह साल की बेटी नदी में लगभग डूब ही गई थी - - : व्यक्तिगत रूप से मूखिन को तफ़सील में कोई दिलचस्पी नहीं थी; मगर मुझे, यदि ये कोई मिथक नहीं है, तो, फिर भी इस मिथक  की घिसी-पिटी बात परेशान करती है - - : मानसिक तनाव, बिजली गिरना और ऐसा ही बहुत कुछ.

अपने आपको  कपितोन की जगह पे रखता हूँ - - : दो अंकों वाली संख्याओं के स्तर पर उत्पन्न होने वाली अपनी ‘रिए’ (यहाँ रिज़ोनेन्ट एक्सेसेज़ - अनुनादी अधिकताओं से तात्पर्य है – अनु. ) के साथ मैं क्या करता? क्या इसे आकस्मिक पुरस्कार समझता सर्वोच्च शक्तियों का, जो मेरी समझ से परे हैं? या इसे किसी बीमारी का लक्षण समझता, जिसका रहस्यमय और विनाशक स्वरूप अभी तक प्रकट नहीं हुआ है? क्या इसमें अस्तित्व की विफ़लता को देखता - - : वैचारिक-विस्तार को देखता? क्या इसे अत्यंत जटिल और मुझसे छिपे हुए उपकरणों के आरंभिक प्रस्तुतिकरण का एक तत्व समझता, जिसके बारे में मुझे न कोई निर्देश, न कोई तकनीकी जानकारी, न ही किसी संबंधित उद्देश्य की रूपरेखा दी गई है? अपने आप से कुछ नहीं छुपाऊँगा - - : मुझे इन सवालों के जवाब मालूम नहीं हैं.
ये सोचना ख़तरनाक है कि मैं कपितोन से ईर्ष्या करता हूँ. मुझे मालूम है कि ऐसा कोई भी नहीं सोचता, मगर ऐसा सोचना ख़तरनाक है.
दुर्भाग्य से, कपितोन के मॉस्को चले जाने के बाद अस्पष्टता का कोहरा और गहरा जाएगा.

और एक बात - - : जिसके बारे में अभी सोच रहा था - - : और वाक़ई में - - : मूखिन ही क्यों? मुझे मूखिन को ही प्रतिस्थापित करने के लिए क्यों कहा गया, किसी और को नहीं, मिसाल के तौर पर, उसी कपितोनोव को नहीं?

 ये सिर्फ सवाल है; मगर बेहद दिलचस्प सवाल. }}}

{{{ जिसका ख़तरा था, वही हुआ - - : संशोधक ने मूर्त रूप धारण कर लिया.
ये तो अच्छा हुआ, कि वह मुझे ‘दयालु रूप’ में नज़र आया - - : दृश्य रूप में नहीं - - : शब्द-रूप में. बस, उतना ही.
उसी रात, किचन की ओर जाते हुए ( पानी पीने का मन हुआ) दरवाज़े के किनारे से बुरी तरह टकरा गया. मैंने कुछ कहा तो नहीं, मगर न जाने क्यों सोचने लगा - - : “किसलिए?” इस तरह नहीं सोचना चाहिए. सोचना इस तरह नहीं चाहिए. फ़ौरन जवाब मिल गया, और ख़ास बात ये थी - - : ख़यालों में - - :
  “ मरीचिकाओं और चौकीदारों के लिए”.
डर के मारे मैं जम गया. मैं जान गया कि कि ये किसकी आवाज़ है. हालाँक़ि नहीं भी जानता था, कि ये क्यों जानता हूँ.                               
हो सकता है, वह सोच रहा हो, कि मैं फ़ौरन बात शुरू करूँगा? नहीं, मैं ख़ामोश रहा. मेरी ख़ामोशी से स्पष्टतः अप्रसन्न, उसने आज्ञा दी कि मैं बाथरूम में जाऊँ.
अपने अपराध का मुझे आभास था, इसलिए मैंने बात मान ली.
उसने मांग की कि दरवाज़े को बोल्ट लगाकर बन्द कर दूँ. बन्द कर दिया.
थोड़ी देर तक कुछ नहीं हुआ. मैं बाथ-टब के किनारे पर बैठा था. मुझे एक मिनट से कम ही इंतज़ार करना पड़ा. बल्ब के सामने एक छोटा सा कीड़ा बेआवाज़ घूम रहा था - - : बकेट में गंदे कपड़ों के होने का सबूत. मैंने अपने आपको आईने में देखा, मैं अपने जैसा ही था - - : मतलब मूखिन जैसा. कीड़े का ख़याल आ गया : “जैसे पतंगा.” मुझे लगा कि वह चला गया है. मैंने पूछा - - :
 “बस?”
और तब शुरूआत हो गई - - :
 “ मैं यहाँ इसलिए नहीं आया हूँ कि तुम्हें बाथ-रूम में बन्द कर दूँ. मैं यहाँ इसलिए आया हूँ कि तुम्हें नियमों के पालन की ज़रूरत के बारे में आगाह कर दूँ. तुम, शायद, नहीं समझे, कि ये गंभीर बात है. तो, जान लो. तुमने उसका उल्लंघन किया है, जिसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए. तुम दोषी हो. तुम, ऐसे दोषी हो, जैसा कोई नहीं है”.
चुप हो गया. मुझे जवाब देना है. मगर, मैं तो जानता था, मुझे याद दिलाई जाती है - - : जैसे कि हाल ही में बीबी से हुई बातचीत में मैंने न जाने क्यों स्वीकार कर लिया था कि मैं कोई मूखिन-वूखिन नहीं हूँ. सिर्फ इसी एक बात के लिए मेरी हत्या की जा सकती थी. मगर मैंने अपनी मूर्तता के आयाम के बारे में इशारा तो कर दिया था - - : स्टेशन के रिफ्रेशमेन्ट रूम की परिचारिका से लेकर देश के प्रमुख तक. मैं दोषी था.
 “मैं दोषी हूँ” (मैंने अपना गुनाह क़ुबूल कर लिया).
 “दोषी? तुम्हारी स्वीकारोक्ति से क्या हासिल होगा? और प्लीज़, लाइट बन्द कर दो”.
 “हाँ, ये ज़्यादा अच्छा रहेगा” (मैंने लाइट बन्द कर दी).
अंधेरे में उसकी आवाज़ - - : अगर इसे किसी मनुष्य की आवाज़ कहा जाए तो - - : और ज़्यादा गूँजने लगी.
 “तुम्हारी भूल सुधारना मेरा कर्तव्य है. याद दिलाता हूँ - - : तुम्हारे गतिमार्ग का हर बिन्दु, तुम्हारे अस्तित्व का हर पल पूरी तरह स्कैन किया जाता है. तुम्हारा काम है, हर बात में मूखिन के समान बनो, जैसा कि प्रकृति उसे जानती थी और जानती है. तुम अपने बारे में चाहे जो सोचो, हमें सिर्फ मूखिन में दिलचस्पी है, न कि तुममें. फिर से कहता हूँ, उसके जैसे बनो”.
अपने विचारों में मैं उससे सहमत हो गया. क्योंकि वह विचारों में ही मुझे सुन सकता था, ऊपर से मेरे दिमाग़ में - - : वह वहीं पर तो स्थित था.
 “कोई सवाल?” (मेरे भीतर पूछा गया).
मैंने चैन की सांस ली. लगता है कि मुझे दोषी ठहराय गया था. मैं, मानता हूँ, कि इससे भी बुरी बात का अंदेशा था. वह सब, जो उसने मुझसे कहा, उसके बगैर भी मैं जानता था. क्या मैं नहीं जानता था कि मुझ पर दोष लगाया गया है.
 “हाँ, हाँ, बहुत सारे सवाल हैं! - - : ...मूखिन ही क्यों, कोई और क्यों नहीं? कपितोनोव क्यों नहीं, कीर्कोरोव, गायक, क्यों नहीं? मूखिन किस बात में बेहतर है?”
 “किसी भी बात में बेहतर नहीं है. मगर चुनाव की परिस्थितियों से तुम्हारा कोई संबंध नहीं है. चुनने का हक़ तुम्हें नहीं है. कुछ और पूछो”.
 “मूखिन मैं कुछ ही दिनों पहले बना हूँ. मूखिन से पहले मैं कौन था?”
 “क्या सवाल हैं! तुम्हें इससे क्या फ़रक पड़ता है कि तुम कौन थे? और, क्या तुम थे भी? तुम्हें पूछने के लिए कुछ और नहीं है?”
 “बस, यूँ ही - - : ये ऐसा मौक़ा मिला है - - : सीधे आपसे जानने का - - :”
 “लगान के बदले बछड़ा” (संशोधक ने कहा).
 “???”
 “अपंग की सुबह. आसरे की खोज में, निर्वासितों की बिदाई... विस्मृत आर्टिस्ट-पेरेद्विझ्निक27 निकोलाय वासिल्येविच ओर्लोव. सत्यशोधक. या, तुम्हें सत्यशोधक पसन्द नहीं हैं? और : तुम आसानी से प्योत्र पेत्रोविच पदमोर्कोव हो सकते थे, वह पीन्स्क शहर के लड़कियों के स्कूल में सुलेख सिखाया करता था. और बोर्या गूरेविच, इंजिनीनियर और उसकी पहली बीबी वलेंतीना के बारे में क्या ख़याल है?”
 “पति और पत्नी - - : एक साथ?”
 “एक साथ क्यों? - - : अलग अलग समय पे. जहाँ तक लिंग का प्रश्न है, वो हमारे लिए

03.00

प्रमुख नहीं है. तुम्हारी रूपरेखा - - : विशिष्ठ मानसिक टाइप की है - - : और क्षेत्र  - - : वर्तमान में ये क्षेत्र है उत्तर-पस्चिम”.              
मैं चौंक गया.
 “कुछ भी याद नहीं है - - : भूतकाल से”.
 “जब हुक्म देंगे, तब याद आ जाएगा”.
अगला सवाल पूछने से पहले विचारों को संयत करना होगा - - : “क्या मुझे लम्बे समय तक मूखिन बने रहना होगा?”
”इस प्रश्न पर विचार किया जा रहा है”.
 “मैं वास्तविक मूखिन से सामना नहीं करना चाहूँगा. उम्मीद करता हूँ, कि ऐसा नहीं होगा?”
संशोधक मेरे दिमाग़ में खाँसा.
 “वास्तविक मूखिन, जैसा कि तुम समझते हो, मरा नहीं है. वह अस्थाई तौर पे ग़ैर-अस्तित्वहीनता की स्थिति में है...”
 “ग़ैर - - : क्या? - - : किस स्थिति में है?”
 “ग़ैर-अस्तित्वहीनता की स्थिति में. ग़ैर-अस्तित्वहीनता से घबराओ नहीं. ग़ैर-अस्तित्वहीनता ग़ैर-अस्तित्व से इस तरह अलग है, जैसे, मिसाल के लिए, तुम मूखिन से अलग हो. मगर तुमने मेरी बात काट दी. तो, तुम्हारी वैध मूखिनियत के दौरान वह पूरे समय गैर-अस्तित्वहीनता की स्थिति में रहेगा. निश्चित समय पर मूखिन तुम्हारे हाथ से छड़ी ले लेगा, जैसे कि तुमने मूखिन की रिले-रेस वाली छड़ी ले ली थी - - : सिर्फ समानता दर्शाने के लिए स्पोर्ट्स के क्षेत्र से उदाहरण दे रहा हूँ. शारीरिक निरंतरता की ग्यारंटी है, वैसे ही जैसे परस्पर उपयोग के सिद्धांत की ग्यारंटी दी गई है. मूखिन से तुम्हारा सामना - - : ये बकवास है, वो असंभव है, तुम्हें तसल्ली देता हूँ. अगर, बेशक, किन्हीं विशिष्ठ बौद्धिक हालात पर ग़ौर न किया जाए - - : ”
मैं सतर्क हो गया - - :
 “ आख़िर कैसी?”
 “ मतलब, ऐसी कि, आप बिल्कुल ही जुदा न हुए हों. इस बारे में मत सोचो. मुलाक़ात नहीं होगी”.
 “मेरा मिशन क्या है?” (संशोधक से पूछा).
 “मूखिन होना”.
 “सिर्फ इतना ही? मुझे किसी की हत्या करने पर तो मजबूर नहीं किया जाएगा?”
 “नहीं, मूखिन तो मक्खी मारने लायक भी नहीं है” (अपनी टिप्पणी पर वह हँस पड़ा).
 “क्या मुझे रिपोर्ट्स लिखना होंगी?”
 “रिपोर्ट की ख़्वाहिश है! - - : ...क्या बात है! - - : ... ख़ुद ही पूछ रहा है! तुम, ब्यूरोक्रैट, दिमाग़ से ये कूड़ा निकाल दो! - - : ... समझ गए? ये कोई ‘एलिएन्स’ वाली फिल्म नहीं है! - - : ... फिर कहोगे ‘ऑर्डर्स’! - - : कहोगे ‘निर्देश’! - - : ‘ऑर्डर्स फ्रॉम स्पेस’! - - : (न जाने क्यों उसे ये ख़याल गुदगुदा गया - - : किसका ख़याल? - - : ‘ऑर्डर्स फ्रॉम स्पेस’ वाला; वह ज़ोर से हँसने लगा, मगर ये हँसी अच्छी नहीं थी). अब ये भी कहो कि तुम्हें आवाज़ें सुनाई देती हैं - - : ”
मैं समझ नहीं पाया कि क्या वह मेरी परीक्षा ले रहा है, या सिर्फ बेवकूफ़ बना रहा है.
 “मगर आप - - : क्या आप आवाज़ नहीं हैं?”
 “मैं - - : आवाज़?! अगर मैं आवाज़ हूँ, तो मामला गंभीर है. मेरी मुबारकबाद.”
 “मगर - - : मेरे दिमाग़ में - - : ”
उसने त्यौरियाँ चढ़ा लीं - - : मुझे ये भौतिक तौर पर महसूस हुआ - - : मेरे चेहरे के स्नायुओं द्वारा.
 “सिर्फ दिखावा मत करो! हमें ये पसन्द नहीं है! - - : नहीं, दोस्त, नाटक मत करो, तुम पूरी तरह स्वस्थ्य हो”.
 “इसमें कोई सन्देह नहीं, कि मैं स्वस्थ्य हूँ - - : मगर आपसे ये सुनना कुछ अजीब लग रहा है - - : ...आप तो इनकार नहीं करते हैं अपनी - - :...वास्तविकता से?”
 “क्या मेरी व्यक्तिगत राय चाहते हो? तो, सुनो, दोस्त. तुम्हारी ये सारी बातें शैतानों के साथ, हर तरह की रूहों के साथ, काले जादू वालों के साथ, डबल्स के साथ, दूतों के साथ, संदेशवाहकों के साथ - - : ...ये सब सिर्फ दिमाग़ी खेल हैं - - : ...इस तरह का साहित्य है, इस तरह का ...कहीं तुम ये तो नहीं सोच रहे हो कि हम और तुम वैसे ही डोनट्स की उम्मीद कर रहे हैं? - - : बस, ज़्यादा मा...(गाली) करने की ज़रूरत नहीं है! तुम समझ गए?”
 “मगर - - : ...ये मैं नहीं हूँ - - : ...(मैं विस्मित था) - - : ये तो - - : ...अभी अभी - - : ” (‘आप’ जोड़ना चाहिए था, मगर मैंने जीभ काट ली - - : संशोधक, शायद, बातों में बहक सकता है! - - : मेरे लिए ये एक आविष्कार था).
 जैसे कि डोनट्स वाली बात - - : ये किसलिए?
इस बीच उसने दृढ़ता से कहा - - :
 “तुम्हारे मुक़ाबले में मूखिन एक सम्पूर्ण व्यक्ति है; मूखिन - - :  पूर्ण है; वह एक इकाई है; मूखिन - - : टुकड़ों में नहीं बंट सकता! अगर मैं कहता हूँ ‘मूखिन होना’, तो मेरा मतलब है वाक़ई में ‘अपने जैसे रहो’. हमें चाहिए मूखिन सम्पूर्णता में, परिपूर्णता में. तुम्हारी तरफ़ से की गई कोई भी हेराफ़ेरी तुम्हारा - - : तुम समझे, किसका? - - : तुम्हारा अपराध समझा जाएगा. क्या मैंने साफ़-साफ़ समझा दिया? हमारे लिए तुम नहीं हो, है तो सिर्फ मूखिन!”
 “वाह, ऐसा कैसे! मैं हूँ, इसका ही मतलब है कि मूखिन नहीं है!”
 “जानबूझ कर बेवकूफ़ मत बनो (संशोधक ने कहा). अपने आप को बहुत समझ रहे हो. तुम हो कौन? मूखिन के बिना तुम हो कौन? क्या तुम सिर्फ मैथेमेटिकल ऑपरेटर नहीं हो? क्या तुम एक समुच्चय के तत्वों के बीच की अनुकूलता नहीं हो? तुम - - : कोई नहीं हो. तुम मूखिन के बगैर नहीं हो! तुम नहीं हो, मूखिन है! तुम - - : मूखिन हो! अपने आप में रहो, मूखिन! बेवकूफ़ी मत करो! मेरी बातों को सुनो!”
”कोन्स्तान्तिन! ये तुम किसके साथ बातें कर रहे हो?”
 “ये कौन है?” (संशोधक उतेजित हो गया).
 “घोड़ा है कोट में! (उसने मुझे ताव दिला ही दिया!) मेरी बीबी, मूखिन की बीबी!”
 “आ-आ - - : ... मरीनोच्का - - : ...तब ठीक है, कोई बात नहीं - - :”
 “कोस्त्या, तुमने लाइट क्यों बन्द कर दी? तुम बन्द क्यों हो गए हो? तुम वहाँ कर क्या रहे हो?” (
 “तो, तुमने लाइट क्यों बन्द कर दी? तुम बन्द क्यों हो गए हो? तुम यहाँ कर क्या रहे हो?” ( बीबी की नकल उतारते हुए, व्यंग्य से वह मुझसे मुख़ातिब हुआ).
मुझे इसमें कोई मज़ाक नज़र नहीं आया. शायद वह भी समझ गया कि कुछ ज़्यादा ही कर रहा है - - : उसने मुझे तसल्ली देने की ठानी - - :
 “बकवास. स्टैण्डर्ड सिचुएशन. हम इसे ‘मीडियन’ कहते हैं. तुमने कभी मीडियन के बारे में सुना है?”
 “त्रिकोण में - - : ...वह उसे दो भागों में बांट देती है - - :”
 “नहीं. हम मीडियन को दूसरी तरह से समझते हैं. मीडियन - - : ये , मतलब, जब हम-तुम बहस कर रहे होते हैं, और कोई तीसरा, अक्सर कोई औरत, सुनती है और बेकार के निष्कर्ष निकालती है. स्टैण्डर्ड सिचुएशन, मैंने कहा. साहित्य में और फ़िल्मों में छेद हो जाने तक घिस जाना, अश्लीलता की हद तक, वहाँ डोनट्स से काम नहीं चलता”.
फिर से डोनट्स के बारे में.                           
“कोस्त्या, प्लीज़, खोलो, मुझे बाथरूम में जाना है”.
 “झूठ बोल रही है (संशोधक ने कहा). उसे कहीं नहीं जाना है”.
 “बड़बड़ाना बन्द करो! (बीबी चीख़ी). मुझे डराओ मत!”
 “क्या तुम बड़बड़ाते हो? (संशोधक ने पूछा). तुम, क्या किसी को डराते हो?”
 “दरवाज़ा खोलो, मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ!”
 “व्वा-व्वा, जैसे कि टेक्स्ट बुक में होता है”.
 “कोस्त्या! क्या दरवाज़ा तोडना पड़ेगा, अच्छा सबक सिखाऊँगी!”
 “क्या ताक़त है! (संशोधक ने कहा). कितना उत्साह है!”
मैं अपने आपको रोक न सका - - :
 “क्या बिना कमेन्ट्स के काम नहीं चल सकता?”
अपने कमेन्ट्स से मुझे बेज़ार कर दिया. ये अपने आपको समझता क्या है? पराए घर में, पराए दिमाग़ में!...मैं बीबी को समझ सकता हूँ, वह परेशान हो रही है. मैं ख़ुद भी परेशान हो जाता, अगर वह बाथरूम में बन्द होकर, वहाँ किसी के साथ बातें कर रही होती. मैं यथासंभव ज़ोर से चिल्लाया:
 “परेशान न हो! जल्दी फ़ारिग हो जाऊँगा!”
ख़ामोशी छा गई. पत्नी, और वह, और मैं ख़ामोशी को टटोलते रहे. पहले वह बोला - - :
 “मीडियन को कई तरह से निष्क्रिय किया जा सकता है. आवाज़ को फुसफुसाहट की हद तक कम किया जा सकता है. मोबाइल वाली बातचीत की नकल कर सकते हैं. शोर मचाने वाले इलेक्ट्रिकल उपकरण चालू कर सकते हैं, जैसे, फ़ैन. अक्सर मीडियन की ओर ध्यान न देना फ़ायदेमन्द होता है, मगर ये थोड़ा अक्लमन्दी से करना चाहिए. तुम्हारे लिए ज़्यादा से ज़्यादा ख़तरा ये है - - : मेंटल हॉस्पिटल में ले जाएँगे; वहाँ भी लोग रहते ही हैं. ये ख़ौफ़नाक नहीं है”.
 “मैं पागल नहीं हूँ” (मैंने कहा).
 “और मैंने तुमसे क्या कहा? हम अपने आप को दुहरा रहे हैं”.
 “अगर तुम पागल नहीं हो (बीबी चिल्लाई), तो फ़ौरन बाथरूम से बाहर आओ!”
मैं चिल्लाया - - :
 “अभ्भी!”
 “कोई अभ्भी-वभ्भी नहीं! (संशोधक ने रोका). हमारी बात अभी ख़त्म नहीं हुई है!”
मगर तभी दरवाज़ा ख़तरनाक तौर से चरमराने लगा - - : उसने नीचे से कोई चीज़ से डाली थी.
 “ डरे बिना! (जल्दी से संशोधक ने कहा). टेलिफ़ोन वाला उपाय - - : चलो! शत-प्रतिशत ग्यारंटी”.
 मैं समझ गया, मैं चिल्लाया - - :
 “क्या तेरा ढक्कन उड़ गया है? तू क्या दरवाज़ा तोड़ने चली है? मैं टेलिफ़ोन पर बात कर रहा हूँ!...बहुत ज़रूरी बात है, और तुम हो कि डिस्टर्ब किए जा रही हो!”
और हम दोनों, और दरवाज़े के पीछे बीबी - - : एकदम चुप्पी, ख़ामोश हैं, सोच रहे हैं; इंतज़ार कर रहे हैं कि ख़ामोशी को पहले कौन तोड़ेगा. मैं संशोधक की विजय को महसूस कर रहा था, निःशब्द, कानों में कुछ भी न कहने वाली...मुझे ये बेहद बुरा लग रहा था. यहाँ पर मैं चाहे जो चिल्लाऊँ, मगर मैं था तो बीबी के पक्ष में - - : बीबी ने नहीं, बल्कि इसने मुझे बाथरूम में धकेला था.
संशोधक की आवाज़ पहले निकली, मगर बहुत धीमी. शायद, उसने ये कहा था - - :
 “ठीक है” - - : अगर मैंने ग़लत नहीं सुना. आगे - - : फुसफुसाहट से - - : 
“तुम्हारे साथ मूखिन की ख़तरनाक आदतों पर चर्चा करना चाहता हूँ, और सबसे पहले...”
मरीना - - :
 “झूठ बोल रहे हो, कोस्त्या. तुम्हारा टेलिफोन तो मेज़ पर पड़ा है”.
वह गुस्से से गुर्राया.
 “ ईडियट”. (मैंने अपनी दुर्भावनपूर्ण ख़ुशी को छुपाने की कोशिश नहीं की. होशियार है. अच्छा मज़ा चखाया इसको. तभी पहली बार मैंने उन शक्तियों की अपूर्णता पर विचार किया, जिनका वह प्रतिनिधित्व करता था. धनु-कोष्ठकों के संरक्षक गुणों को मैं तब तक अच्छी तरह समझ नहीं पाया था, ये तो बाद में हुआ, मगर तब - - : मीडियन को फ़ौरन हटाना था.) अब पहल करना मेरे हाथों में था; मैंने अपना सुझाव दिया - - :
 “मैं कहूँगा कि, मैं अपना भाषण तैयार कर रहा हूँ. शनिवार को मेर्द्याख़िन की ‘जुबिली’ है - - :”
 “कैसा मेर्द्याख़िन?! कैसी ‘जुबिली’?! ( संशोधक बुरी तरह तिलमिला गया). ठीक है, बस! आज के लिए इतना ही बहुत है. मैं मांग करता हूँ - - : सिग्नल दोगे”.
इस बात पर कम ही विश्वास हो रहा था, कि मैंने उसके भीतर ज़रूरत को महसूस किया हो, मगर पूछे बिना न रह सका - - :
 “सिग्नल - - : वो क्या है?”
  “तुम अपना दिमाग़ लड़ाओ. याद करो, इस शाल्यापिन को, रॉबिन्सन क्रूसो को - - फिर उसको - - : जिसने हवाई जहाज़ का आविष्कार किया - - : ”
 “उसका, जैसे, स्विच-ऑफ़ हो गया, मगर बिना खट् की आवाज़ किए. मैंने गहरी साँस ली; हाथ से स्विच टटोला; लाइट जल गई. मैं बाथ रूम से बाहर आया.
मरीना हिचकियाँ ले-लेकर रो रही थी, हाथ में हैमर पकड़े थी.
 “चोरनी – मोरनी” (मैंने आवाज़ में यथासंभव नज़ाकत लाते हुए कहा).
उसकी तरफ़ बढ़ा, उसे अपनी बाँहों में लेकर गालों को चूमा.

उसका गाल बेहद गर्म था, मानो जला रहा था. हो सकता है, मैंने सोचा, कि मेरे होंठ बेहद ठण्डे हैं. }}}     
           
{{{ आज मुझे बहुत बुरा सपना आया, जिसका संबंध मुझसे उतना नहीं, बल्कि मूखिन से था. ये बड़ी अप्रिय बात है – ऐसे सपने देखना, जो प्रकृति से, तुम्हारे न हों, और ख़ासकर, जिनका संबंध तुम्हारे अपने भूतकाल से न हो.
मैं ये सपना सुनाऊँगा नहीं. सिर्फ उसकी प्रकृति के बारे में बताता हूँ - - : या ये, कि उसकी विधा के बारे में. जैसे कि मूखिन के जीवन की एक घटना से संबंधित परिकल्पना से मेरा साक्षात्कार हुआ.                      
 वहाँ - - : सपने में, - - : वो परिकल्पना मुझे अत्यंत विश्वसनीय प्रतीत हुई, ऐसी जिससे मैं कभी सहमत नहीं हो सकता था, जब जागा, सौभाग्यवश, मैं जाग ही गया. ख़ैर, सुबह ‘ब्यूस्टे’ पहुँच कर, कुछ विशिष्ठ प्रमाणों को ढूँढ़ते हुए, क़िस्मत ने मुझ पर मेहेरबानी कर ही दी - - : सवाल ये है, किसकी किस्मत ने - - : मेरी अथवा मूखिन की?

ये इस तरह से हुआ. लंच ब्रेक में, जब हमेशा की तरह हमारे सब लोग पास वाले फ़ास्ट-फ़ूड सेंटर की ओर गए, तो मैंने अलीना की मेज़ का चक्कर लगाया और खिड़की के पास वाली उसकी अलमारी में रखी फ़ाइल्स को टटोला. जिन फ़ाइल्स पर अलीना काम कर रही थी, उन पर कुछ इस तरह लिखा था - - : “सधे हुए अपराधी”, “लैंगिक अपराध”, “तेज़-तर्रार दिमाग़”, “पिता के हत्यारे” इत्यादि. इस वर्गीकरण ने, सौम्य शब्दों में कहूँ तो, मुझे आश्चर्यचकित किया - - : एक ही चेहरा, एक सी क़ामयाबी के साथ एकदम कई फ़ाइल्स में हो सकता है. मुझे मालूम था कि फ़ाइल्स पर ये शीर्षक अलीना ने नहीं लिखे हैं और ये भी कि वे इसी तरह से हमारे ‘ब्यूस्टे’ में संशोधन करने वाले क्लाएन्ट के यहाँ से आई थीं, इन बेकार की चीज़ों के इस वर्गीकरण के प्रति ऐसे प्यार को समझना मेरे लिए काफ़ी कठिन था. अच्छा, ठीक है. मुझे “मायावी” शीर्षक वाली फ़ाइल ने आकर्षित किया. मैंने जल्दी से उसे खोला और, पन्ने पलटते हुए ‘उसको’ ढूँढ़ने लगा. ‘उसीका’ फ़ोटो. जो मेरे जैसा है. मेरे जैसा - - : जवानी में.


वही तो इस रात को मेरे सपने में आया था, वर्ना मैं उस फ़ाइल में नहीं घुसता.
अलीना ने चेहरे के मापदण्डों को, अंशतः, दूरी को नापने के लिए कम्पास का प्रयोग किया था, इसलिए चेहरों के विशिष्ठ बिन्दुओं पर चुभन के निशान थे, और आँखों के बारे में तो खुलकर कहा जा सकता है कि उन्हें निकाल दिया गया था. मुझे यह अच्छा नहीं लगा.      
मैंने जल्दी से उसकी फ़ोटो ढूँढ़ ली.
ये भी बाहर निकाल दी गई आँखों वाली थी.

बाहर निकाल दी गई आँखों वाले, जवानी में मेरे जैसे, उसके बारे में सोचना बहुत अप्रिय लग रहा था.
मगर क्या वह मेरे जैसा था, ये भी एक सवाल है. इसीका जवाब देना चाहता हूँ. यही मुख्य बात थी.
जहाँ तक चुभन के निशानों और आँखों को निकालने वाली बात है, ये आख़िरकार एक तकनीकी सवाल है, ये सीधे-साधे नापों का परिणाम है, यह बात मैं समझता था.          

मैंने उसकी ओर देखा - - : लगभग मेरे जैसा, मगर, वो मैं नहीं था. मैं ऐसा नहीं था. मगर कुछ समानता भी थी.

फ़ोटो को पलट कर देखा (हर तस्वीर के पीछे संक्षेप में लिखा गया था, कि कौन है, क्या है) - - : पेन्सिल से - - : “ईगर अलेक्सेयेविच झीलिन”, जन्म की तारीख़, जन्म स्थान और - - : “क्रूरता से सौतेले बाप को मार डाला. ‘वान्टेड’ ”.

मैं बड़ी देर तक इस इबारत को देखता रहा, मेरे ख़याल, जैसा कि इस समय कह सकता हूँ, काफ़ी उलझ गए थे; मेरी ऊँगलियों की थरथराहट के कारण इबारत एक ताल में काँप रही थी.

मैं ज़ेरोक्स मशीन के पास गया और दोनों तरफ़ से कॉपी निकाल ली.
फ़ोटो को वापस फ़ाइल में रख दिया. फ़ाइल को उसकी जगह पर वापस रख दिया. मेज़ पर बैठ गया - - : अपनी मेज़ पर. मेरी मेज़ काँच से ढँकी है, जिसके नीचे कई तस्वीरें हैं, जिनका उससे कोई संबंध नहीं है, जो फ़िलहाल मुझे परेशान कर रहा है, बावजूद इसके, कि मेज़ पर रखे कांच के ख़तरे का मुझे पूरा एहसास है, श्रम की सुरक्षा की दृष्टि से - - : वह गठिया से पीड़ित है.
मैंने, बेशक, काँच के नीचे उसे नहीं धकेला. काँच के बारे में मुझे ख़ुद ही पता नहीं है, किसलिए. मैंने तस्वीर मेज़ की दराज़ में रख दी - - : मेरी.
मगर इससे पहले मैं बड़ी देर तक ग़ौर से उसे देखता रहा.
मेरे जैसा है -- : मेरे जैसा नहीं है?
समानता है, समानता है! - - :
सबसे पहले - - : जन्म की तारीख़ और जन्म-स्थान.
मगर उपनाम मुझे याद नहीं रहा. बस इतना याद रहा कि वह बिरला था.

मुझे ऐसा लगा, कि मुझे सपने में याद आया था (कि मुझे सपने में कुछ-तो याद आया था), मगर इस समय याद नहीं रहा. या, सिर्फ, याद करने से डर रहा था.
तो हालत ये थी - - : मैं बार-बार तस्वीर को मेज़ की दराज़ से निकाल रहा था और ग़ौर से देख रहा था, और फिर उसे वापस रख रहा था. दुबारा निकालता और फिर से ध्यान से देखता. और फिर वापस  रख देता.
आख़िर में मैंने सोचा - - : स्टॉप! इस सबका संबंध मूखिन से है! मैं - मूखिन नहीं हूँ!  

उसकी वजह से परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. मूखिन को, जहाँ तक मैं जानता हूँ, ख़ुद भी वे परिस्थितियाँ याद नहीं हैं, और, परिणाम स्वरूप, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह उन्हें भूल गया हो - - : मैं किसलिए मूखिन की अपेक्षा और ज़्यादा याद रखूँ?

वाक़ई में, जब कुछ दिन पहले अलीना ने उसे तस्वीर दिखाई थी और कहा था, कि समानता ज़ाहिर है   ( हा-हा: चेहरे में?...), उस समय भी उसके 

03.30

दिमाग़ में वह बात नहीं आई, जो अभी मेरे दिमाग़ में आई है - - : और, क्या ये पूर्वाभास था या कुछ और, क्या-क्या नहीं होता? - - : वह उसी समय अदृश्य हो गया, और मैं प्रकट हो गया! ...क्या मुझे उसकी समस्याओं का हल ढूँढ़ना है?

मैं मूखिन नहीं हूँ, और इस बात से मुझे सांत्वना मिली, मगर थोड़ी ही देर के लिए.
जल्दी ही सब लोग वापस आ गए. मेरे सामने बैठकर अलीना ने पूछा - - :
 “तुम्हारी तबियत तो ठीक है? कुछ हुआ तो नहीं है?”
 “मैं बिल्कुल ठीक हूँ. कुछ भी नहीं हुआ है. ये कैसे सवाल हैं, अलीना?”
उसने कहा कि मेरे चेहरे का रंग उड़ गया है.

मैंने कहा कि कुछ खाया नहीं है. }}}

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें