शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

Curly Brackets - 07

मुझे याद आया – बिल्कुल छोटा कोस्त्या, गर्मियों की, जुलै की ही शाम को कामेन्का नदी के किनारे, उम्र छह साल, उसने अभी अभी बंसी के कांटे में कीड़ा फंसाना सीखा है; पिता, जो ख़ुद भी बंसी से लैस थे, कोस्त्या की डोंगी पर सतर्क नज़र रखे हुए थे. मुँह मारने का एहसास हुआ. बाँस की लम्बी बन्सी मूखिन के सामने झुकती है. उसने ज़िन्दगी में अपनी पहली मछली बाहर निकाली.
मैंने मूखिन को अपने नौजवान दोस्तों के साथ वनस्पति एवम् जीव-जंतुओं के मित्रों की सोसाइटी में शामिल होते हुए देखा था. वह रात जब वह बालिग हुआ था, जब उसने बेवकूफ़ी से ट्रेन को रोक दिया था. एक धुंधली सुबह को उसे अपनी मासूमियत खोते देखा था. देखा था कि कैसे मूखिन चट्टान पर रेंगा था. कैसे वह पीप भरे एपेंडिक्स से तड़पता अस्पताल में पड़ा था.
पीप भरा एपेंडिक्स सबसे अप्रिय याद नहीं है. मेरी दिमाग़ी नज़र को दिखाई देता है मूखिन एक दुमंज़िला बैरेक में जाते हुए; चरमराती सीढ़ियाँ, रेल-कर्मचारियों का दिन, ख़ाली कॉरीडोर, सब लोग बाहर हैं, उसने दरवाज़ा खोला, जिस पर चाकू से बेमतलब शब्द “शलजम” खुरचा हुआ था. तेज़ तेज़ क़दमों से वापस चला जाता है. एक घण्टे बाद वह रेस्टारेंट-कार में वोदका पीता नज़र आयेगा, भूल जाने के लिए. अपने आपको भूल जाने के लिए. कुछ हद तक वह इसमें सफ़ल भी होता है.
मूखिन मूखिन ही था.
मैं मूखिन के बारे में वह सब याद नहीं करना चाहता, जिसे वह कभी भी याद करना नहीं चाहता था.
नीचे लॉन में राख झटकते हुए मैंने दूसरे छोर से सोचना शुरू किया, या सरल शब्दों में कहूँ तो - - : अंत से, न कि आरंभ से. कोई चीज़ मुझसे कह रही थी कि ये हाल ही में हुआ है.
मुझे एक ‘शॉकिंग’ वाक़या याद आया, क्योंकि वह मुझे ‘शॉक’सहित याद आया था – - : साफ़-साफ़, स्पष्टता से, विरोधाभास सहित, जैसे वह अभी यहीं घटित हो रहा हो - - : मेरे दिमाग में नहीं, बल्कि मूखिन के किचन में (तब, जब मैं अभी बाल्कनी में था). हमारी - - : मेरी? उसकी - - : बीबी से बात हो रही थी - - : फिर से - - : क्या उसकी? क्या मेरी बीबी से? - - : ये निर्भर करता है.
मूखिन शून्य में देख रहा था.
बात पिछले से पिछले सप्ताह की है, मगर पिछले से पिछले बुधवार की नहीं, बल्कि तीसरे बुधवार पहले की. मैंने बाद में गिना था - - : पन्द्रह दिन पहले, मतलब इस गुरुवार से, या उन्नीस दिन पहले, अगर आज से गिना जाए, और आज, जब मैं ये लिख रहा हूँ, इतवार है.   
मूखिन शून्य में देख रहा था. ग़लती करने से डरता हूँ, मगर, मेरे ख़याल में, वह बीबी को बताना चाहता था कि उस दिन काम पे कैसे वह इस प्रश्न को सुनकर स्तब्ध रह गया था - - : क्या वह किसी की हत्या कर सकता है. जैसे, सौतेले बाप की. उसका तो कभी सौतेला बाप था ही नहीं. मज़ाक का सार ये है, कि असिस्टेंट अलीना को एन्थ्रोपोमेट्रिक-रिसर्च की फ़ाइल के फ़ोटो देखते हुए पता चला कि किसी अपराधी के नाक-नक्श बिल्कुल मूखिन से मिलते जुलते हैं. आयु में अंतर के बावजूद (मूखिन काफ़ी बड़ा था), आँखों के बीच का अंतर और ठोड़ी की ऊँचाई का अनुपात एक समान था (हालाँकि यहाँ आयु का मुश्किल से ही कोई महत्व है). सब को ये सुनकर बड़ा मज़ा आया, मगर मूखिन ताव खा गया; अपने रूप-रंग के बारे में वह काफ़ी संजीदा था और यदि उस पर कोई फ़ब्ती कसी जाती, तो उसे अच्छा नहीं लगता था.
मगर, मैं इस बात की पुष्टि नहीं करना चाहता, कि वह वाक़ई में बीबी को यह सब बताना चाहता था, मगर ये बात, कि शून्य में देखते हुए (और किचन में मौजूद रहकर), वह इसी के बारे में सोच रहा था - - : ये ऐसा तथ्य है जिसकी सच्चाई की ग्यारण्टी ले सकता हूँ.
टी.वी. पे गैस की क़ीमतों के बारे में बता रहे थे.
 “चाय या कॉफ़ी?” (बीबी ने पूछा).
जवाब दिया - - :
 “चाय”.
 “या कॉफ़ी?”
जवाब दिया - - :
 “कॉफ़ी”.
 “मैंने तुमसे पूछा कि तुम क्या पिओगे, और तुम क्या जवाब दे रहे हो?”
 “मैं जवाब ही दे रहा हूँ, कि क्या पिऊँगा”.
 “पूछती हूँ - - : चाय? तुम - - : चाय. पूछती हूँ - - : कॉफ़ी? तुम - - : कॉफ़ी”.
 “तो फिर तुम कॉफ़ी के बारे में क्यों पूछ रही हो, जब मैं जवाब दे चुका हूँ कि चाय पिऊँगा”.
 “टॉमेटो-जूस पियो. फ़ायदेमन्द है”.
 “मुझे टॉमेटो-जूस नहीं चाहिए. मुझे अकेला छोड़ दो. न तो मुझे चाय चाहिए, न ही कॉफ़ी”.
 “तुम ख़ुद ही नहीं जानते, कि तुम्हें क्या नहीं चाहिए. और, क्या चाहिए, ये भी नहीं जानते. तुम्हें कुछ भी नहीं चाहिए! - - : तुम्हें कुछ भी नहीं चाहिए! - - : ...कुछ भी नहीं! - - : ...कुछ नहीं- इत्ता  सा भी नहीं! - - :”
ये शब्द मेरे लिए कहे गए थे. पहला मूखिन ने उन्हें नहीं सुन रहा था. पहला मूखिन तेज़ी से ग़ायब हो रहा था, मैं उसे प्रतिस्थापित कर रहा था, फिर से उसका रूप ले रहा था. उसने दाँत भींचे और बाहर निकल गया. हाँ, मैं बाल्कनी में आया, खड़ा रहा, जैसे अभी खड़ा हूँ, और सिगरेट पीता रहा, जैसे अभी पी रहा हूँ, घरों की छतों को देखते हुए, जैसे अभी देख रहा हूँ. ये था मैं! और ये हुआ था पिछले से पिछले सप्ताह के बुधवार को! तभी मैं समझा था, कि ये सब कैसे हुआ! (और, ये मैं समझा गुरुवार को!)

मनुष्य के अंतिम शब्द हमेशा महत्वपूर्ण होते हैं. जैसे मूखिन के - - : “मुझे अकेला छोड़ दो. न तो मुझे चाय चाहिए, न ही कॉफ़ी!” - - : ये उसके अंतिम शब्द थे. तभी वह ग़ायब हो गया, सही कहूँ तो, मुक्त हो गया, और मैं इन शब्दों को भूल नहीं सकता था.

बाह्य जगत में इस बीच कुछ भी नहीं हुआ - - : न तो घड़ी रुकी, न बल्ब फ्यूज़ हुआ, न कॉर्निस गिरी, जिस पर परदा टांगते हैं. टी.वी. ने भी स्विच-ऑफ़ होना, या फिर स्क्रीन पर कोई असाधारण बात दिखाना ज़रूरी नहीं समझा. कॉफ़ी भी भाग नहीं गई. और, क्या कॉफ़ी थी? और, क्या मूखिन था? (मेरा पूछने को दिल चाहता है).
अगर मूखिन वास्तव में था, तो मैं जानना चाहता हूँ, कि क्या ग़ायब होते समय ख़ुद उसने कुछ महसूस किया था.
जैसे, मैंने, उसे प्रतिस्थापित करते हुए, कुछ भी महसूस नहीं किया. उदासीनता मुझ पर हावी थी. बाल्कनी में खड़ा था और कुछ भी महसूस नहीं कर रहा था; ऊँचाई को और उससे डरने की ज़रूरत को भी महसूस नहीं कर रहा था.
बस यही वो सीमा थी - - : मैं मूखिन को प्रतिस्थापित कर रहा था, तब तक ये न समझ पाते हुए कि क्या कर रहा हूँ.
उसे प्रतिस्थापित करने के पूरे पन्द्रह वास्तविक दिनों तक मैं समझ नहीं पाया कि मैं मूखिन नहीं हूँ!                
हो सकता है, मैंने सोचा, कि पहले की तरह, मूखिन हूँ और कोई विशेष बात नहीं हुई है.

हो सकता है, इन दो हफ़्तों में मैं पुराने मूखिन की अपेक्षा ज़्यादा ही मनोरंजन केन्द्र ‘तुम्हारा सुख’ में जाकर ‘एक हाथ के डाकू’ से अकेले युद्ध करता रहा.

सोमवार की शाम को शॉपिंग के लिए दी गई रकम हार गया - - : एक-एक कोपेक, और मंगलवार को अपनी बचत भी, जिसे घर से ले गया था.
मगर इस बात को मैं कब समझा, इस बारे में मैं पहली ही लिख चुका हूँ.}}}         

{{{ हाँ, स्वीकार करना पड़ेगा - - : मूखिन को लूडोमैनिया22 था, उसके बाद मैं भी कुछ-कुछ लूडोमैनियाक हो गया हूँ. अभी तक मुझे पक्का यक़ीन नहीं हुआ है कि वाक़ई में मैं कितना लूडोमैनियाक हूँ, हालाँकि सारे लक्षण साफ़ हैं, मगर उम्मीद करता हूँ कि, फिर भी, मैं मूखिन जितना लूडोमैनियाक नहीं हूँ. ये आशा मुझे देती है, वास्तविकता को समझने की मेरी योग्यता - - : अक्सर लूडोमैनियाक इस बात को स्वीकार नहीं करते कि वे लूडोमैनियाक हैं, मगर मैं तो स्वीकार करता हूँ - - : हाँ, मैं लूडोमैनियाक हूँ, हो सकता है, टिपिकल न होऊँ, मगर हूँ तो लूडोमैनियाक, और निःसंदेह मूखिन के लूडोमैनिया को स्वीकार करता हूँ.

एक और बात, ये कहना अतिशयोक्ति होगी कि मुझे लूडोमैनिया से परेशानी होती है; इतना ही काफ़ी है कि वह मुझमें है; अगर किसी को परेशानी होती है, तो वो है मेरी बीबी, हालाँकि, जब मेरी बीबी मूखिन की बीबी थी, वह, मुझे लगता है, कि काफ़ी ज़्यादा परेशान हो जाती थी. इसमें बहस की कोई बात ही नहीं है - - : उसने जुए के खेलों के मेरे शौक के कारण (मेरी वर्तमान क्षमता में) उतना दुख नहीं उठाया, जितना मूखिन के शौक के कारण, और मुश्किल से ही

02.00

मुझे इस बात के लिए उलाहना दिया जा सकता है कि मेरी हाल ही की हार ने उसके सब्र के प्याले को छलका दिया - - : अगर मूखिन मूखिन ही रहता, तो सब्र का प्याला और जल्दी छलक जाता - - : कहीं बीच में शामिल करने की इच्छा होती है “उसके” को - - : “उसके प्याले को सब्र के” या “प्याले को उसके सब्र के”, सिर्फ मैं किसी भी हालत में कल्पना नहीं कर सकता - - : उसकी - - : इस बोधगम्य प्याले के साथ. ये, वैसे, अप्रत्यक्ष रूप से मेरी अंतरात्मा की निर्मलता को दर्शाता है. मूखिन के पास स्वयम् को पीड़ा पहुँचाने के कई तरीके थे, और वह कभी कभी बदहवास आत्म-आलोचना और आत्म-पीड़न का भी शिकार हो जाता था. याद नहीं करना चाहता. उसकी अंतरात्मा का मामला है, मेरी नहीं. ये वो था, जो अपनी पूरी तनख़्वाह जुए में हार जाता था, ये वो था जिस पर कर्ज़ हो गया था, ये वो था जिसने अपनी बीबी की एक पुरातन चीज़ गिरवी रख दी थी, मगर पिंड छुड़ाना पड़ेगा मुझको और, मैं महसूस कर रहा हूँ कि जल्दी ही ऐसा करना होगा. पिछले दिनों हुईं मेरी छोटी-मोटी हारों का उन बड़ी-बड़ी हारों से कोई मुक़ाबला ही नहीं है, जो उसकी बीमारी के साथ-साथ पिछले डेढ़ साल में बढ़ती गईं, बिल्कुल उस दिन तक जब मूखिन, इस नाम के सीधे-सीधे अर्थ में, मूखिन होना बन्द हो गया. इसमें कोई शक ही नहीं है कि बीमारी तेज़ी से बढ़ती गई, मगर, इस बात से सहमत होते हुए कि ये हमारा साझा दुर्भाग्य है, मैं हर उस इन्सान का ज़ोरदार विरोध करूँगा, जो मूखिन के मैनिया की बढ़ती हुई उग्रता को उस मूखिन से जोड़ने की हिम्मत करेगा, जो मैं हूँ. गंभीर नज़र, जो मैंने ख़ुद ही अभी-अभी अपने आप को दिखाई है - - : इस बात का पक्का सुबूत है कि सब कुछ नियंत्रण में है. नहीं, कोई लक्षण तो है, मगर सिर्फ मेरा लूडोमैनिया उग्र स्वरूप धारण नहीं कर रहा है; बल्कि इसके विपरीत ही हो रहा है.

गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए, मैं इसे सौभाग्य ही कहूँगा कि मूखिन को ताशों के खेल में कोई दिलचस्पी नहीं थी, और न ही रुलेट23 में. वो तो सबसे पुरातन चीज़ पर बैठता था - - : लगभग हर शाम को काम से घर लौटते समय मनोरंजन-केन्द्र में घुस जाता, जो हमारी स्ट्रीट पर ही है, और वहाँ किसी  ऑटोमॅटिक गेम पर बैठ जाता. वह अपनी हार और जीत का रेकॉर्ड रखता था - - : जैसी कि अपेक्षा थी, ज़्यादातर हारता ही था. हम समझा नहीं सकते - - : न तो मूखिन को, न ही उसके बाद मुझे - - : इन नासपीटी मशीनों से हमारी दोस्ती-दुश्मनी की दास्तान को. एक ही शब्द  - - : छूत - - : मैं भी कहता हूँ, और वह भी यही कहता था. मगर हम खिंचते चले गए, खिंचते जा रहे हैं; शाम होगी, और, मैं जानता हूँ, कि कोई चीज़ हमें वहाँ खींचेगी, वापस न पलटाने के लिए!        
ख़ुद हमारे ही लिए सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि, हम - - : या नहीं, दुहरेपन के एहसास से बचने के लिए सिर्फ एक के बारे में ही बात करूँगा, मूखिन के बारे में - - : सबसे आश्चर्यजनक बात ये है, कि मूखिन को ‘थ्योरी ऑफ प्रॉबेबिलिटी’ के बारे में जानकारी थी, अंशतः, बड़ी संख्याओं के नियम के बारे में. मैं ये क्या कह रहा हूँ! जानकारी थी - - : ये सही शब्द नहीं है. वह इस क्षेत्र में एक तरह का विशेषज्ञ था; वह ‘ब्यूस्टे’ में काम करता था. ‘ब्यूस्टे’ क्या है? ओह, ये वह जगह है, जहाँ मैं सभी सहकर्मियों के साथ काम करता हूँ, जो मुझे मूखिन समझते हैं. ‘ब्यूस्टे’ – ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स, दूसरे शब्दों में कहें तो ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिकल इनवेस्टिगेशन्स. अगर मैं “प्राइवेट” शब्द जोड़ दूँ, तो वह, वाक़ई में कुछ भी नहीं बदलेगा. मतलब, मेरा संबंध रॅन्डम-प्रोसेसेज़ और रॅन्डम-वेरियेबल्स से है. मूखिन भी, ज़ाहिर है, यही करता था - - : स्टेटिस्टिकल डेटा का ‘कोरिलेशन’ आदि विधियों की सहायता से प्रसंस्करण करता था, कुछ परिणाम प्राप्त करता था, जिससे कि बाद में इन परिणामों के आधार पर दूसरे विशेषज्ञ खोजों के ग्राहकों को सुझाव दे सकें. थ्योरी ऑफ प्रोबेबिलिटी क्या बला है, मैं ठीक-ठाक जानता हूँ; मूखिन भी मेरे जितना ही जानता था.
”तुम्हारा सुख” में आने वालों में कोई और नहीं था, जो मूखिन की तरह (स्वयम् का उदाहरण नहीं दूँगा), इस बेहूदा खेल के हानिकारक प्रभाव के बारे में जानता था. मूखिन जानता था कि वह किस तरफ़ जा रहा है; जानता था और जा रहा था. मगर क्यों, ये वह नहीं जानता था और मैं इसका जवाब नहीं दूँगा.
मूखिन की बीबी पति के जुनून को दूसरी तरह से समझाती थी - - : स्वैराचार; परिवार के प्रति ग़ैरज़िम्मेदारी; आसानी से पैसा कमाने की इच्छा, (“अगर मेहनत से काम करता, एक-एक कोपेक बचाता!”); और अंत में आत्मपीड़न.

इस अंतिम बात से सहमत हुआ जा सकता है, अगर आत्मपीड़न से तात्पर्य है – जानबूझकर अपने हितों को नुक्सान पहुँचाना, और अंशत: - - : वित्तीय.  मगर आत्मपीड़न को मूखिन के अन्य कार्यकारी क्षेत्रों में भी प्रकट होना चहिए था, मगर ऐसा देखा नहीं गया. मेरी ही तरह, किसी अन्य बात में वह आत्मपीड़क जैसा नहीं था, बल्कि इसके विपरीत, मतलब “विपरीत” उस अर्थ में नहीं, कि वह या मैं, पर्याप्त मात्रा में अपनी-अपनी तरह के उत्पीड़नप्रिय थे या हैं, बल्कि उल्टे, इसके विपरीत, हम, अपनी क्रमिकता-पूर्वापरता के बावजूद, दुगुने नहीं, बल्कि एक इन्सान की तरह - - : दोनों ही समझदार हैं.

मुझे यक़ीन नहीं है कि इस ‘नोट’ को धनुषावृत्त करना चाहिए या नहीं, हालाँकि, इसे धनु-कोष्ठकों से ही शुरू किया था. हालाँकि - - : किसलिए? बल्कि, बेहद यक़ीन है! वह ज़रा भी हानिरहित नहीं है! मेरे और मूखिन के बीच की पृथक्करण रेखा को बिल्कुल ठीक खींचा गया है, समस्या को विस्तार से समझ लिया गया है; इसलिए उलझनों से बचने के लिए तिहरे धनु-कोष्ठकों से समाप्त करता हूँ.}}}

{{{ शुक्रवार को मैं काम पर गया. चलिए, दफ़्तर में मेरी कल्पना करें. मेरे सामने कम्प्यूटर है, जिस पर कुछ दिनों पहले तक मूखिन काम करता था. फ़िश-समोसों के ग्राहकों की पसन्द के डाइग्राम्स मेज़ पर पड़े हैं. शुक्रवार को तान्या ने उन्हें बनाया था, मुझे उनका अध्ययन करना है.
ये अफ़वाह कि तान्या मूखिन से प्यार करती है, कुछ ज़्यादा ही अतिरंजित है. मेरे साथ तो उसका कोई लफ़ड़ा नहीं था. ये सच है कि वह इस बात को नहीं जानती, क्योंकि वह मुझे मूखिन समझ रही है.

मूखिन एक टीम में था; अब इस टीम में हूँ मैं. टीम में पाँच व्यक्तियों का कोर-ग्रुप है. मूखिन कोर-ग्रुप में था; अब मैं कोर-ग्रुप में हूँ. कोर-ग्रुप के सब लोग दिमाग़ से काम करते हैं - - : सिर्फ दिमाग़ से - - : विश्लेषण करते हैं, परस्पर-संबंध स्थापित करते हैं, निष्कर्ष लिखते हैं. मैं यही करता हूँ.           

दिमाग़ से काम करना आसान नहीं है - - : बिल्कुल मनोवैज्ञानिक. मैं तो बिना काम के भी पूरे समय सोचता रहता हूँ. काम पर ज़रा ज़्यादा सोचता हूँ, मगर इसी पर तो काम है. मगर वो - - : काम है. और, जब काम नहीं होता, तब काम नहीं है. मुझे, स्वीकार करना पड़ेगा, इस बात से चिढ़ होती है कि काम करते समय मैं अपने लिए नहीं, बल्कि मूखिन के लिए सोचता हूँ. मैं तो जब काम पर नहीं होता, तब भी मूखिन के लिए सोचता हूँ, मगर काम पर मूखिन के लिए सोचना अच्छा नहीं लगता, क्योंकि ये काम तो अभी भी उसीका है.
काम पर सब लोग मुझे, जैसा कि मैं कह चुका हूँ, मूखिन समझते हैं.
मूखिन के काम पे, दो बार अंडरलाइन करता हूँ, सब मुझे मूखिन समझते हैं.
विचित्र बात होती, अगर कुछ और होता; मुझे इस बात को मानना पड़ेगा.
हमारा ऑफ़िस - - : मुझे “दफ़्तर” शब्द ज़्यादा अच्छा लगता - - : हमारा ऑफ़िस-दफ़्तर भूतपूर्व कम्युनिटी रेसिडेन्सी वाली बिल्डिंग में दूसरी मंज़िल पर है, इस बिल्डिंग को पूरी तरह हमारे ‘ब्यूस्टे’ जैसे दफ़्तरों को दे दिया गया है.
मेरे पास मेज़ है. ज़ाहिर है कि यह मेज़ मूखिन की थी. वह अभी भी मूखिन की ही है - - : क्योंकि पहली बात, अगर निष्पक्ष रूप से कहें, तो मूखिन, वास्तव में, मैं हूँ; और दूसरी बात, मैं मूखिन को प्रतिस्थापित कर रहा हूँ, आशा है, अस्थाई तौर पर, न कि स्थाई रूप से.

तो, हम दिमाग़ से काम करते हैं - - : या, ठीक-ठीक कहूँ तो, दिमागों से - - : क्योंकि आम विषयों पर काम करते-करते हमारे दिमाग़ संयुक्त हो गए हैं.
आम विषय - - : ये आम जगह नहीं है.
आम जगह - - : ये, जैसा कि ज्ञात है, सर्वविदित तथ्य है, घिसा-पिटा मुहावरा, दकियानूसी ख़याल है.
आम विषय, जो हमारे दिमागों को संगठित करते हैं, नियमानुसार, मौलिक हैं.

सोचता हूँ, कि अगर कोई बाहरी इन्सान हमारे यहाँ आ जाए, और सुन ले कि हम किस बारे में बात कर रहे हैं, तो कुछ भी समझ नहीं पाएगा. एक बार मूखिन की बीबी पति के पास एक डॉक्यूमेन्ट लाई, जिसे वह घर पे भूल आया था (ये काफ़ी पहले की बात है) - - : कॉफ़ी पीते-पीते उसने सुना कि किस बारे में बातें हो रही हैं, और कुछ भी समझ नहीं पाई.

उसने कुछ ऐसी बात सुनी - - : “जॉर्ज, क्या ख़याल है, उच्चतम समानता की विधि अपनाएँ, या लड़कियों को फ़िटिंग के लिए भेजें?”
या फिर, मिसाल के तौर पर - - : कपितोनोव, हमारे डेटा संतुलित नहीं हैं; सारी फ़सलों की फ़ैक्टोरियल विषमता का मूल्यांकन करो और फिर विसंगतियों का विश्लेषण करो!”

 “मृत्यु-दर की तालिका किसने मेज़ से उठाई?” - - : “मैंने, बोरिस कार्लोविच, मुझे रिग्रेशन मॉडेल पर कुछ आपत्तियाँ हैं - - :”
इस तरह हमारे यहाँ बातें करते थे; इस तरह हमारे यहाँ बातें करते हैं.
याद है - - : “आप लोग वहाँ क्या करते हो?” - - : रात को, बिस्तर में, मूखिन की आश्चर्यचकित बीबी ने पति से पूछा, और मूखिन ने, मुझे याद है, उसे सब समझाया, कुछ भी नहीं छुपाया, मगर उसकी बात समझ में नहीं आई.
ग़ायब होने से पहले वह ख़ुद फ़िश-समोसों की पसन्द का पैकिंग के वज़न और डेट ऑफ़ एक्स्पायरी के अनुसार इंटरब्लॉक विश्लेषण कर रहा था. इनरब्लॉक विश्लेषण - - : उनके फ़ेक्टोरियल एक्सपेरिमेंट के आधार पर - - : मैं पहले ही कर चुका था. आजकल सारे डेटा कपितोनोव को भेज दिए जाते हैं, मगर मुझे विश्वास नहीं है, कि वह समय पर रिपोर्ट तैयार कर लेगा. कपितोनोव बेहद लापरवाह हो गया है, काम उसे बोझ लगने लगा है; वह ‘सूटकेस-मूड़’ में है - - : नीना, कपितोनोव की
बीबी को, मॉस्को में काम का ‘ऑफ़र’ आया है - - : कपितोनोव अटैचमेन्ट की तरह जाएगा.
जहाँ तक एंथ्रोपोमेट्रिक खोजों का प्रश्न है, वह मेरा विषय नहीं है, उस पर एक बहुत बड़े प्रतिष्ठान की आपराधिक प्रयोगशाला के आदेश पर उदाल्त्सोव काम कर रहा है. वहाँ कोई लोम्ब्रोज़ो के विचारों पर एक शोध-प्रबन्ध लिख रहा था, हालाँकि, मैं वाक़ई में इस बारे में कुछ नहीं समझता, और ना ही समझना चाहता हूँ - - : मेरे लिए इतना ही बहुत है कि उस मोटी फ़ाइल में, जिसे अलीना देख रही है, कई अन्य फ़ोटोग्राफ़्स के बीच एक नौजवान हत्यारे की भी फ़ोटो पड़ी है, जो जवानी के बेहतरीन दिनों के मूखिन से मिलती-जुलती है. आम तौर से हमारे यहाँ लोग दूसरों के काम में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं. फ़िश-समोसों की माँग में व्यस्त रहने के कारण मैं, शायद, कभी भी चेहरे के अनुपातों के सूचकांकों, और कुछ विशिष्ठ बातों जैसे नाक के ऊपरी और नाक के नीचे वाले बिन्दुओं के बारे में, और जिस बात से आजकल उदाल्त्सोव परेशान है, उसका अता-पता भी नहीं जान पाता, अगर अलीना मूखिन को चिढ़ाने के मूड में न होती - - : वह प्रसंग याद है मुझे - - : वह मेज़ के पीछे बैठी थी, जो मेरी, मगर पहले मूखिन की मेज़ के सामने है, और उसने पूछा - - : तब तक के मूखिन से (मुझसे नहीं): “कन्स्तान्तीन अन्द्रेयेविच, क्या आपको कभी सौतेले बाप को मारने की इच्छा नहीं हुई?” - - : “मेरा कोई सौतेला बाप नहीं था (मूखिन ने चौंककर सारिणी से नज़र हटाते हुए जवाब दिया). ऐसा अजीब सवाल क्यों पूछ रही हो?” - - : “वो इसलिए, कि ये नौजवान आपसे काफ़ी मिलता-जुलता है. उसने सौतेले बाप को मार डाला”. उसने नौजवान की फ़ोटो दिखाई - - : उस शोधकर्ता की फ़ाईल से. वह ये तो नहीं जान सकती थी कि जवानी में मूखिन कैसा था; उसे ये समानता ज़बर्दस्ती थोपी हुई प्रतीत हुई; ये मज़ाक उसे अच्छा नहीं लगा. उसने पूछा - - : “क्या आँखों के बीच की दूरी नापी है?” - - : “वह भी शामिल है” (अलीना ने कहा).

लगता है, कि मैं इस बारे में पहले ही लिख चुका हूँ. हाँ, ये उसी दिन हुआ था, जब मूखिन देरी से हुए मेरे आत्मज्ञान के पश्चात् , मूखिन नहीं रह गया, और मैं बन गया. उस दिन की घटनाएँ मुझे निरंतर परेशान करती हैं, जिन्हें, मानना पड़ेगा, कि खींच-तान कर ही घटनाएँ कहा जा सकता है.

आसान शब्दों में कहूँ तो, उदाल्त्सोव कई अन्य विषयों पर भी काम कर रहा था, इसलिए वह असिस्टेंट अलीना को जल्दी करने के लिए नहीं कह रहा था, जो पूरे पूरे दिन सभी संभावित अपराधियों की तस्वीरों के पीछे स्केल और कम्पास लेकर डोलती रहती थी.
दूसरे शब्दों में ये सही नहीं है कि हम बेवकूफ़ी भरा काम करते हैं, और किसी को भी हमारी रिसर्च की ज़रूरत नहीं है. साल भर पहले मूखिन भी ऐसा ही सोचता था - - : कि उनकी ज़रूरत नहीं है, मगर बाद में अलग तरह से सोचने लगा. आजकल हमारा काम ख़ूब फल-फूल रहा है. हम फ़ैशन में आ गए हैं. हमारे ग्राहकों में मेडिकल और बिज़नेस इन्स्टीट्यूशन्स हैं, राजनीतिक संगठन हैं, जो प्रशासकीय अधिकारियों के चुनावों में काम करते हैं, शिपिंग-उद्योग, कन्फ़ेक्शनरी फ़ैक्टरी, पोल्ट्री-कॉम्प्लेक्स, शहरी प्रशासन की अनेक कमिटियाँ, जिनमें प्रमुख हैं शिक्षा-कमिटी. हमारे पार्टनर्स हैं - - : पब्लिक-ओपिनियन का अध्ययन करने वाली प्रमुख एजेन्सियाँ; हमारी सफ़लता को प्रमाणित करने वाले सर्टिफ़िकेट्स प्रमुख के कमरे में टंगे हैं. }}}
       
{{{ मूखिन की बीबी को यक़ीन है कि हाथ बाथरूम में धोना चाहिए, और बर्तन किचन में. जहाँ तक बर्तनों को किचन में धोने का सवाल है, इसमें मूखिन को कभी कोई आपत्ति नहीं हुई, मगर हाथों को धोने पर लगी पाबन्दियों का वह पूरी ताक़त से विरोध करता था. उसने किचन में हाथ न धोने से न सिर्फ इनकार किया, बल्कि बर्तनों को धोने के साधनों से हाथ धोने पर लगे प्रतिबन्ध को भी समझना नहीं चाहा, ख़ास तौर से जब साधारण साबुन सिद्धांतवश किचन की सिंक पर नज़र न आता. मैं अक्सर सोचता हूँ कि लगातार नियम तोड़कर वह साबित क्या करना चाहता था, – उसे नतीजा मिल ही गया.

मूखिन की बीबी ने पति को सुधारने की उम्मीद नहीं छोड़ी.
ग्यारह साल तक ये “रीमेकिंग” की, ‘रीफिनिशिंग’ की, “रीशेविंग” की, “रीफ़ोर्जिंग” की प्रक्रिया चलती रही - - : और परिणाम स्वरूप, हमारा परिणाम रहा - - : बिल्कुल ज़ीरो.
मूखिन होते हुए मैं अपनी आदतें नहीं बदलता. अपने ऊपर आग झेल लेता हूँ.

कोई बात नहीं, बर्दाश्त कर लूंगा!

अंत में, अपने आप को याद दिलाता हूँ कि बीबी वह मेरी नहीं है, बल्कि बीबी, मोटे तौर पर, कन्स्तान्तिन मूखिन की है, और मुझे बर्दाश्त करने की कोई ज़रूरत नहीं है, या, सही कहूँ तो, ज़रूरी है, बेशक, मूखिन की तरह - - : बर्दाश्त करना, मगर वैसे नहीं जैसे मूखिन करता, अगर वो मैं नहीं होता, मगर मूखिन ने ये बर्दाश्त कैसे कर लिया - - : ग्यारह साल? - - : दिमाग़ चकरा गया है.

मैंने हाथ धो लिए, और वो भी बाथरूम में नहीं - - : किचन में. इसके अलावा मैंने उस सब का इस्तेमाल कर लिया, जो सिंक पर था - - : बर्तन धोने के केमिकल से - - : न कि उस साबुन से जो बाथरूम में था! उससे भी बुरा काम ये किया कि हाथ भी मैंने बर्तनों वाले तौलिए से पोंछ लिए - - : और वो भी मूखिन की बीबी की आँखों के सामने!

“कोस्त्या” (कड़ी आवाज़ में बीबी ने कहा, जैसे कि ऐसे ही होना चाहिए, मतलब, नहीं होना चाहिए था, क्योंकि मैंने तीन-तीन गुनाह किए थे).  
उसकी आवाज़ में मुझे उलाहने का बोझिलपन महसूस हुआ; और तब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ - - :
 “कोस्त्या? क्या तुम्हें इतना यक़ीन है, कि मैं तुम्हारा कोस्त्या हूँ?”
अंतराल ज़्यादा देर नहीं चला.
 “तो फिर कौन हो?”
 “हो सकता है, आज मैं कोस्त्या हूँ, बहस नहीं करूँगा, और कल मैं - - : प्रेसिडेन्ट! या - - : पड़ोसी, जो हमारे नीचे रहता है! या बूगोर्का स्टेशन वाली बार-गर्ल ओल्या! क्या तुम कल्पना नहीं कर सकतीं?”
बेकार. कहना नहीं चाहिए था. प्रतिबन्ध लगा है.

बीबी हाथों में प्लेट लिए जम गई.

“ये कैसा मज़ाक है?” (और मैंने देखा, कि वह डर गई है).

मैं ख़ामोश रहा - - : ज़्यादा ही बोल गया था. नहीं बोलना चाहिए था.
 “कौन सी ओल्या - बार-गर्ल,  कौन सा प्रेसिडेन्ट” ( बीबी बड़बड़ाई).
 “ज़्याब्लिक 24 (मूखिन हमेशा उसे ज़्याब्लिक कहता था) - - : ज़्याब्लिक, मेरी प्यारी, मुझे कभी भी न उकसाना

02.30

अलग तरह का सच कहने के लिए” (और मैंने ऊँगली से ऊपर की ओर इशारा किया, सच के स्तर की ओर इशारा करते हुए, उच्चतम स्तर की ओर).
   
मेज़ से उठकर, हाथ के इशारे से आज्ञा दी, कि कोई सवाल न पूछे; अपने कमरे में चला गया.

अपने कमरे में दीवान पर लेट गया; अख़बार लिया. कैलिफ़ोर्निया में एक भूतपूर्व जज को गवाही के दौरान सार्वजनिक हस्तमैथुन करने के लिए एक साल के कारावास और दस हज़ार का जुर्माना देने की सज़ा सुनाई गई. उसने मेज़ के नीचे फ़िट किए गए एक विशेष उपकरण का प्रयोग किया था. उसकी विशेष आवाज़ ने आरोपी का पर्दाफ़ाश किया.
सोचने की कोशिश करता हूँ; कल्पनाशक्ति कम पड़ रही है.
वह मेरे पास आई.
 “मुझे डराओ मत, कोस्तेन्का, मैं देख रही हूँ कि तुम्हारे साथ कुछ ठीक नहीं है. जैसे कि तुम अपने नहीं हो”.
झूठ बोल रही है.
मैं अपना नहीं हूँ, ये वह देख नहीं सकती - - : क्योंकि मैं, बेशक, अपना हूँ - - : और मूखिन के समान हूँ.
 “क्या ये तुम ही हो?”
 ओह! उसकी नज़र बड़ी पैनी है. मगर, मैंने ख़ुद ही तो उसके सामने स्वीकार किया था. क्या समझ गई है?       
और इससे मुझे क्या हासिल हुआ? कुछ भी हासिल नहीं हुआ.
मैंने बात पलट दी - - :
”सब ठीक है”(चेहरे पर मुस्कान लाते हुए हौले से कहा).
बालों में हाथ फेरते हुए, उसने मेरा सिर सहलाया. मैंने आँखें बन्द कर लीं; मैं घुरघुराने लगा - - : घुर्र घुर्र घुर्र. मूखिन पर दया आ रही है. बिल्कुल बेवकूफ़ है.}}}

{{{ तो, अख़बार रखकर, मैं दीवान पर लेट गया, बगल में बीबी बैठी थी; मेरा माथा, जिसे वह अपनी गर्माहटभरी हथेलियों से सहला रही थी, सीधा होने लगा, हो सकता है, बल पड़े हों. मैंने उसके चेहरे की ओर देखा - - : उसकी आँखों से भय छलक रहा था. उसे डराकर मैं भी खूब डर गया था; ये बहुत ख़तरनाक है - - : फ़ालतू बातें बक जाना, विशेषकर मेरी परिस्थिति में. डर है कि मुझे इसकी क़ैफ़ियत देनी पड़ेगी - - : उसके सामने नहीं - - : और उसे भी नहीं - - : और इसी पल भी नहीं.
ग़ौर करना पड़ेगा, कि मूखिन की बीबी - - : एक आकर्षक औरत है.
इस वाक्य को समझने की कोशिश करते हैं. उसका विश्लेषण किया जाना चाहिए.
दूसरे भाग से शुरू करते हैं. मूखिन की बीबी -- : आकर्षक औरत है. ठीक, ऐसा ही है. उसे ख़ूबसूरत कहने से मैं बचता. मैं कलाकार नहीं हूँ, मगर मुझे मालूम है कि ख़ूबसूरती का पैमाना क्या है - - : कानों के सिरे आँखों के कोनों की सीध में होने चाहिए, और उनकी लौ नाक के निचले हिस्से के अनुरूप होना चाहिए. मूखिन की बीबी के या तो कान आवश्यकता से ज़्यादा ऊँचे हैं, या फिर नाक कुछ ज़्यादा नीचे है. शायद, इसीलिए वह लम्बी बालियाँ पहनती है. वे उस पर वाक़ई में जँचती हैं. मुझे ऐसा भी लगता है, कि उसका माथा नाक के बांसे तक निहायता नर्मी से उतरता है, जिससे, अगर उसके चेहरे को एक ओर से देखें, तो वह आगे की ओर उभरा हुआ प्रतीत होता है. अगर मूखिन अपनी बीबी की अत्यंत रियलिस्टिक पद्धति से बनाई गई तस्वीर देखता, और अगर वह नहीं जानता कि ये उसकी बीबी है, तो वह फ़ैसला करता - - : किसी अन्य दर्शक ही की तरह - - : कि - - : कलाकार जो कोई भी है - - : वह, पहली बात, मॉडेल के प्रति उदासीन नहीं है, क्योंकि बेजान- ठण्ड़ी नाक के साथ उसकी अप्रत्याशित सेक्स-अपील को प्रदर्शित करना असंभव होता, और दूसरी बात, रियलिस्ट से इस बात की न्यूनतम अपेक्षा है, क्योंकि वह स्वयँ को हल्के से बेतुकेपन की इजाज़त देकर एक सनकी झलक प्रकट करता है. सामान्य अनुपातों से ये साधारण से विचलन मूखिन की बीबी को एक विशिष्ठ लुभावनापन प्रदान करते हैं, उसे, जैसा कि मैंने कहा, आकर्षक बनाते हैं. एकदम सही शब्द है. वह आकर्षित करती है, और कोई चीज़ उसकी ओर खींचती है, उसके साथ आकर्षण को महसूस करना बिल्कुल आसान है. मतलब, मैं कहना चाहता हूँ - - : उसके प्रति आकर्षण.

अब वो, जो उस वाक्य के पहले भाग से संबंधित है. मैंने कहा  - - : ग़ौर करना पड़ेगा. पहले शब्द पर ज़ोर देता हूँ. ग़ौर करना. आकर्षण, जिसके बारे में अभी-अभी बात हो रही थी, उसके आकर्षण को मेरे द्वारा ग़ौर किया जाना बन्द हो गया है, और अधिक स्पष्ट कहूँ तो, वाक़ई में, मूखिन द्वारा पहले ही ग़ौर किया जाना बन्द हो गया था, मैंने तो, वैसे, ये बात नहीं है कि ग़ौर करना बन्द कर दिया है, बल्कि मुझे तो वो ख़ुशनसीब मौका मिला ही नहीं कि उस बात पर ग़ौर कर सकूँ, जिस पर, मूखिन होने के कारण, कब से मूखिन ने गौर करना बन्द कर दिया था - - : उसकी बीबी का आकर्षण. दूसरे शब्दों में, मूखिन की बीबी का आकर्षण मूखिन के लिए अनजाने ही उसके द्वारा ग़ौर किया जाना बन्द हो गया, जिस पर मेरे द्वारा अभी-अभी ग़ौर किया गया है, यह अंश लिखते समय. मूखिन को समझा जा सकता है, ग्यारह साल साथ रहते-रहते काफ़ी कुछ पर, शायद, प्रत्यक्ष पर भी ग़ौर किया जाना बन्द हो जाता है; और मेरे लिए भी, जो मूखिन बन गया है, अगर मेरी मूखिनियत की(ये शब्द मैंने कुछ समय बाद मेरे संशोधक से सुना और जिसकी आश्चर्यजनक सटीकता के कारण मैं उसे इस्तेमाल करने से नहीं रह सकता) अल्पावधि पर ध्यान दिया जाए, ये समझना मुश्किल नहीं है. उनके असहज विवाहित जीवन के ग्यारह सालों के अनुभव को मेरे द्वारा चुपचाप स्वीकार कर लिया गया था. एक साथ रहना उनके लिए अच्छा था या बुरा था, विगत को तो मैं बदल नहीं सकता, वह भी दूसरों के विगत को.
                              
तो ये मतलब है “ग़ौर करना पड़ेगा” से. और मैंने ग़ौर किया, मैंने वह ग़ौर किया, जिस पर मूखिन ने किसी समय ग़ौर करना बन्द कर दिया था - - : उसका ख़ामोश लुभावनापन, उसके आड़े-टेढ़े दांतों का आकर्षण, दिल को छू लेने वाला नाक का तीखापन, प्यारी कोमलता, उसकी स्नेहिल हथेलियाँ. बेशक, उसने तय कर लिया था, कि मैं पागल हो गया हूँ, और, अब दीवान पर लेटे मुझ पर दया करते हुए, अचानक उमड़ आई कोमलता से मेरा माथा सहला रही है, और मैं, जिसका माथा वह सहला रही है, मैं भी प्रत्युत्तर स्वरूप उस पर अधिकाधिक दया कर रहा हूँ, क्रमशः बढ़ती हुई तीव्रता से, क्योंकि ये सोचना ही कैसा लगता है कि तुम्हारा पति पूरी तरह पागल हो गया है? मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराया, जैसे, सब ठीक हो जाएगा, और वह आँखों के कोनों से मेरी ओर देखकर मुस्कुराई. शायद, उसने मूखिन के लिए मुझे माफ़ कर दिया? मूखिन को माफ़ कर दिया - - : मुझमें? मुझमें अपने मूखिन से बिदा ले ली? सब संभव है. मैं चुपके-चुपके मूखिन से नफ़रत कर रहा था. अधिकाधिक. मूखिन बेवकूफ़ था, ईडियट था. मुझे मूखिन पर दया नहीं आ रही थी; मुझे अपने आप पर दया आ रही थी, जो मूखिन बन गया था. मूखिन की बीबी के प्रति मेरी दया, जो उसकी मेरे प्रति दया में परावर्तित हो रही थी, फिर से मुझमें मेरे ही प्रति दया के रूप में प्रतिबिंबित हो रही थी, मगर इसका मूखिन से कोई संबंध नहीं था.
                   
उस समय से, जब से मेरे द्वारा मूखिन प्रतिस्थापित किया गया था, मैंने एक भी बार उसकी बीबी की तरफ़ ‘सेक्स-ऑब्जेक्ट’ की तरह नहीं देखा था. मूखिन को कुछ समय से - - : महीने, डेढ़, दो महीने से - - : बीबी के साथ प्रॉब्लेम्स थीं. और बीबी के साथ की इन प्रॉब्लेम्स को मूखिन से विरासत में मैंने पाया था! उनमें कुछ बेबनाव सा था. ये समय नहीं है उस पर बहस करने का. क्योंकि इस समय, मतलब, तब, दीवान पर पड़े-पड़े एक आश्चर्यजनक ख़याल मेरे दिमाग़ में आया - - : क्यों न इस मूखिन पर बीबी की बेवफ़ाई का ठप्पा लगाया जाए? - - : सीधे वहीं और सीधे तभी! मतलब यहाँ और अभी.
मतलब - - : फिर भी  - - : तब.

उसके बदन पर गहरा नीला गाऊन था, जिसमें वह दीवान पर लेटे हुए मेरे पास आई; किसी अजीब से साबुन की हल्की ख़ुशबू में मैंने बहुत स्पष्ट संदेश सुना:

 “समझौता और तत्परता”.

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