मंगलवार, 10 जुलाई 2018

Monuments of Petersburg - 01



प्लिखानव- नहीं



याद नहीं, कि लिंडन के दो पेड़ कब लगाए गए थे. मैंने उन्हें बिल्कुल नहीं देखा था. उन पेडों की तरफ सिर्फ तभी ध्यान गया, जब गर्मियों में एक बार उनकी हरियाली में उसका ऊपरी आधा हिस्सा डूब गया, जिसे प्लिखानव कहने की हमें आदत पड़ गई थी. सिर्फ प्लिखानव का हाथ ही रोशनी में निकल रहा है. दाहिना.
साल के बाकी दिनों में, जब पत्ते नहीं होते, तब स्मारक सबकी नज़रों में पड़ता है.
प्लिखानव का स्मारक मुझे हमेशा इस बात से चौंकाता रहा, कि वह दो आकृतियों वाला है. जैसे कि स्मारक तो एक व्यक्ति का है, मगर दिखाए गए हैं दो. एक, बुद्धिजीवी किस्म का (ऐसा मानते हैं, कि यही गिओर्गी वलेन्तीनोविच है), ऊँचाई पे मंच पर खड़ा है और, दाहिने हाथ की मुद्रा को देखते हुए, कोई जोशीला भाषण दे रहा है; दूसरे की भी, जो आस्तीनें मोडे है, पूरी आकृति दिखाई गई है, मगर ऊपर वाले के आधे जिस्म के नीचे, - दाहिने हाथ से हथौड़े पर झुक रहा है, और बाएँ हाथ से ध्वज के डण्डे को दबा रहा है, समझ सकते हैं कि लाल ध्वज के, - ये कोई मज़दूर है.        
यहाँ “कोई” शब्द का प्रयोग पूरी तरह उचित नहीं है – ये मज़दूर कोई विशिष्ठ मज़दूर नहीं है, बल्कि, शायद, अमूर्त रूप है, समूचे मज़दूर वर्ग का रूपक है. हर हाल में, ऐसा ही सोचा जाता है. पहली नज़र में, ये वाकई में ऐसा ही है, मगर न जाने क्यों तर्क इसी बात से समझौता नहीं करना चाहता. वाकई में, अगर प्लिखानव (मंच पर खड़ा व्यक्ति) – ऐतिहासिक व्यक्ति है, तो उसके निकट उपस्थित व्यक्ति का भी कोई नाम, पिता का नाम और उपनाम होना चाहिए.
मगर नाम तो सिर्फ एक ही को दिया गया है “जी.वी.प्लिखानव”. 1856 – 1918)”
ऊपर से, मज़दूर न सिर्फ नाम से वंचित है, बल्कि आकार में भी ऊपर वाली आकृति से कम है. “प्लिखानव” की तुलना में वह बिल्कुल कोई किशोर प्रतीत होता है.
मुझे याद है, कि स्कूल के दिनों में, किताबों से ठसाठस भरी बैग लेकर, इस पहेली जैसी संरचना के करीब से गुज़रते हुए, मैं कोशिश करता था, कि उसकी ओर न देखूँ, मंच वाले भीमकाय के पीछे से फ़ौरन खिसक लूं. दोनों आकृतियों के आकार के बीच असमानता मेरे दिल में एक अस्पष्ट व्याकुलता पैदा कर देती थी. हो सकता है, कि अनचाहे ही स्वयम् की किशोर मज़दूर से तुलना करते हुए, मैं इस – सब कुछ जानने वाले और सब कुछ देखने वाले की महानता और अनाकलनीयता के सम्मुख खो जाता था, जो मुझे स्कूल के डाइरेक्टर की धुंधली सी याद दिला देता था, जो ऐसे गंभीर गुनाहों : फिर से जूतों की दूसरी जोड़ी घर भूल आने या, इससे भी बुरा, समाज शास्त्र की क्लास गोल करने का प्लान बनाने के लिए सज़ा देने को तत्पर रहता था.
अचानक याद आया : एक बार वोकेशनल ट्रेनिंग टीचर ने स्कूल के डाइरेक्टर का हाथ तोड़ दिया. उनमें मारपीट शुरू हो गई थी. हमारे वोकेशनल ट्रेनिंग टीचर ने पी रखी थी, वह नशे में झूमते हुए क्लास में आया. डाइरेक्टर जवानी में बॉक्सर था, वोकेशनल ट्रेनिंग टीचर पहलवान तो नहीं था, मगर किसी तरह उसने डाइरेक्टर का हाथ तोड़ दिया – दायाँ, और वह कुछ समय तक प्लास्टर बांधे घूमता रहा. मारपीट के बाद डाइरेक्टर ने वोकेशनल ट्रेनिंग टीचर को निकाल दिया.
वोकेशनल ट्रेनिंग टीचर की बेटी हमारी क्लास में पढ़ती थी. मुझे करीब-करीब उसकी याद नहीं है,  ख़ामोश, गुमसुम बच्ची; उसे दोनंबर दिए गए (दो नंबर का अर्थ है – अनुत्तीर्ण होना – अनु.). फिर उसे दूसरे स्कूल में भेज दिया गया.
वे इतने भिन्न क्यों हैं? वाकई में, क्यों?
आँखों में चुभती हुई इस भिन्नता को बड़ी आसानी से दो शिल्पकारों के काम के बीच असंगति से समझाया जा सकता है – वाकई में, ऊपर वाली आकृति के रचनाकार, जैसा अब मुझे पता चला है, इवान याकव्लेविच गिन्सबुर्ग थे, और नीचे वाली आकृति के – मत्वेइ याकव्लेविच खर्लामव, मगर ये बिल्कुल सतही स्पष्टीकरण है. आकृतियों के अनुपातों की विषमता निश्चित रूप से सोची-समझी है. यहाँ इस बात की ओर इशारा किया गया है, कि आकृतियाँ विभिन्न प्रकार की वास्तविकताओं को दर्शाती हैं. मगर कौनसी – किस वास्तविकता को?
और हमसे ये किसने कह दिया, कि उभरा हुआ शिलालेख “जी. वी. प्लिखानव” उस व्यक्तित्व के लिए है, जो मंच पर खड़ा है? इतना विश्वास कहाँ से आया?
आज मुझे यकीन है, कि मज़दूर, जो नीचे खड़ा है, हथौडे और झण्डे के साथ, वही असली गिओर्गी वलेन्तीनविच प्लिखानव है.
मार्स स्क्वेयर और ट्रिनिटी ब्रिज के बीच खड़े प्रसिद्ध सुवोरव के स्मारक को याद कीजिए. सुवोरव बिल्कुल अपने ख़ुद के जैसा नहीं है, वह कवच पहने, ढाल लिए, हाथ में नंगी तलवार लिए है. मगर वो – सुवोरव है! उसी तरह प्लिखानव भी है. सुवोरव के समान, जो हमें मार्स के रूप में दिखाया गया है, प्लिखानव भी जवान मज़दूर के रूप में प्रदर्शित किया गया है. उसका एप्रन – लगभग वही है, जो सुवोरव का रोमन कवच है. हथौड़ा और झण्डा – जैसे तलवार और ढाल. प्लिखानव रूपकात्मक है और साथ ही मानवोचित भी – वह लोगों से ऊपर नहीं खड़ा है, उसके जैसा, जो उसके ऊपर और हमारे ऊपर है – वो, जो मंच पर खड़ा है. तो फिर मंच पर आख़िर कौन खड़ा है?
ये बिल्कुल शुद्ध रूपक है. ये मार्क्सिज़्म की विशिष्टता है.
रूपक, देवता...अधिशेष मूल्य के सिद्धांत की शुद्ध प्रतिभा. वह. या वो.
ये उसने हरियाली में से हाथ फैलाया और डालियाँ दूर हटाना चाहता है. ताकि उसकी आँखें और ज़्यादा निश्चल न रहें – समय आ गया है! – और ख़ुद ही दुनिया के सामने प्रकट हो जाए...



             
             
2003

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