सिर्गेइ अनातोल्येविच नोसव
पीटर्सबुर्ग के स्मारकों का रहस्यमय जीवन
हिंदी
अनुवाद
आ.
चारुमति रामदास
टिप्पणी
स्मारकों के “रहस्यमय
जीवन” के बारे में लिखी गई यह असाधारण पुस्तक, निःसंदेह,
पीटर्सबुर्ग के पाठक को शहर का एक और चक्कर लगाने पर मजबूर कर देगी,
और अपीटर्सबुर्गवासी को – पीटर्सबुर्ग जाने के लिए. इसे लिखा है
स्मारकों के मित्र और हितैषी - लेखक सिर्गेइ नोसव ने. इसकी
तुलना जानवरों के बारे में दिलचस्प किताबों से की जा सकती है, जिनके बीच शोधकर्ता लम्बे समय से रह रहा है.
हमारे बीच
स्मारकों
का अस्तित्व है, और अत्यंत मौलिक अस्तित्व है. जैविक वस्तु न होते हुए
भी, वे समय के विभिन्न अंतरालों में विशिष्ठ, हालांकि अप्रकट, सक्रियता
प्रकट करते हैं – अगर कोई गौर से निरीक्षण करे तो. हमारे जीवन की परिधि में उनकी
उपस्थिति के तरीके को जीवन से ही,
इस शब्द के सामान्य
मानवीय अर्थ में, संबद्ध किया जा सकता है. वे वाकई में “जीते हैं”.
हालांकि इन्सान की तरह बिल्कुल नहीं.
उनके साथ
सह-अस्तित्व आसपास की दुनिया की हमारी समझ को विस्तीर्ण बनाता है. हमारे संबंध में
उनकी स्थिति दोहरी है. कलाकृतियों के रूप में वे निश्चय ही हमारे, अर्थात्
मानव संस्कृति के क्षेत्र में आते हैं,
मगर दूसरी ओर, ख़ास तौर से हमें, इन्सानों
को, उनकी ओर हमारे आध्यात्मिक मूल्यों से परे – किसी
वास्तविकता की तरह देखना न्यायसंगत होगा. और यहाँ हम स्मारकों को प्रकृति के सजीव
साम्राज्य और निर्जीव साम्राज्य के बीच कहीं रख सकते हैं. बल्कि, सजीव साम्राज्य के अधिक निकट. सिर्फ इस बात का ध्यान
रखना होगा, कि उनके लिए ‘सजीव
श्रेणी’ लागू नहीं होती. किसी भी वस्तु को सजीव या निर्जीव
होना ही पड़ता है – किसी भी वस्तु को,
मगर स्मारक को नहीं. मानवीय
भाषा, आम तौर से, उनके अस्तित्व को दर्शाने में कम ही सक्षम है.
स्मारकों
से संवाद साधने का हमारा अनुभव काफ़ी अशिष्ठ एवम् अनगढ़ है. इस संबंध में यदि हम
ज़्यादा संवेदनशील होते,
तो हम, संभवतः,
उन शब्दों को जान पाते, जो स्मारकों के अस्तित्व का वर्णन करने के लिए आवश्यक
हैं. उचित अनुभव के अभाव में उन्हीं का सहारा लेना पड़ेगा, जो हमारे पास है – सरल, मानव
द्वारा सत्यापित क्रियाओं द्वारा – जीते हैं, महसूस
करते हैं,
समझते हैं, चाहते हैं...
अगर
हम अन्य ग्रहों के निवासियों की उपस्थिति को अपने इर्द गिर्द अनुभव करते, तो शायद उनके बारे में भी, शायद, ऐसा ही कहते.
वे, स्मारक,
सबसे ज़्यादा अन्य ग्रहों
के निवासियों की ही याद दिलाते हैं.
जैसे
एक ख़ामोश सभ्यता मौजूद है, हमारी सभ्यता के समानांतर. उनकी बढ़ती हुई उपस्थिति
अधिकाधिक स्पष्ट होती जा रही है. और ऐसा लगता है, कि वे
सम्पर्क करने के लिए तैयार हैं...
कोई
भी स्मारक मानव निर्मित है और कुछ हद तक स्वावलम्बी नहीं है. अपनी पूरी ज़िंदगी
(अपने पैमाने के अनुसार) वह लोगों के साथ परस्पर सम्पर्क में ही जीता है. ये
परस्पर सम्पर्क,
अक्सर बेहद नाटकीय होता
है, स्मारक की उपस्थिति को एक विचार से, बल्कि सही-सही कहें तो विचारों से, परिपूर्ण करता है, जिनमें
से कई, मानव की दूसरी नज़र में, अक्सर
परजीवी, आकस्मिक प्रतीत होते हैं. मगर, कहीं इन्हीं वैचारिक विचलनों में ही तो हमारे लिए
निहित सूचना नहीं है?
सिर्फ इतना जानना ज़रूरी
है, कि उसका कूटानुवाद कैसे किया जाए.
मोटे
शब्दों में कहा जाए,
तो मनुष्य की नज़र में
किसी स्मारक का ये उद्देश्य होता है,
कि “उसे याद करें”.
स्मारक को अपनी ये ज़िम्मेदारी निभाते हुए ख़ुशी ही होती है, मगर लोग,
ऐसी परिस्थितियों की वजह
से, जिन्हें वे ख़ुद ही अक्सर ऐतिहासिक कहते हैं, किसी न किसी तरह, स्मारक
के मत्थे एक अलग तरह का रिश्ता मढ़ देते हैं. स्मारक के लिए लोगों को समझना काफ़ी
मुश्किल है, बनिस्बत इसके, जैसा
लोग उसे समझते हैं. अनंत काल की ओर उन्मुख को अपने सामने डोलते हुए लोगों को समझना
मुश्किल होता है, जबकि गुज़रती हुई पीढियों के लिए अक्सर हमेशा और सब
कुछ स्पष्ट होता है.
हमें, मिसाल के तौर पर, साफ़
तौर पर मालूम है,
कि हमारे दुर्दैव के लिए
कौन दोषी है. अगर दोषी नज़रों के सामने नहीं है, तो हम
अपनी नज़र स्मारकों पर गड़ाते हैं.. हम उनसे उत्तरदायित्व की मांग करते हैं, और सबसे पहले, उत्तरदायित्व
उनके लिए, जिन्हें वे समर्पित हैं. लोगों के कारनामों के लिए लोग
स्मारकों को जवाब देने पर मजबूर करते हैं!... स्मारक – सज़ा देने के लिए आदर्श पात्र
हैं. वे न केवल सहनशील हैं,
वे जानते हैं, कि कैसे सहन करना है.
शायद, यहाँ
कोई जादू-वादू है : उन ऐतिहासिक व्यक्तियों को सज़ा देने की संभावना न होते हुए, जो कब
के इस दुनिया को छोड़कर चले गए हैं,
लोग उनके स्मारकों को ही
दण्डित करते हैं. अनुभवों के प्रदर्शन की सूची लम्बी है – हाव-भाव से अपमानित करने
से लेकर पूरी तरह विनाश करने तक. उन्हें, उदाहरण
के लिए, अनिवार्य एकान्तवास दे दिया जाता है (दूसरे शब्दों में
“स्टोअर” में भेजना),
जैसा, कहें तो,
बैरोनेट जेम्स विली के
स्मारक के साथ किया गया – सन् 1948 में, पुरानी
तारीख़ से, रूस में सैन्य-चिकित्सा के संयोजक को अंग्रेज़ गुप्तचर
घोषित किया गया,
जिसके बाद उसके स्मारक
को विघटित करके लकड़ी की पेटियों में उतने समय के लिए बंद कर दिया गया, जितनी सज़ा वास्तविक जासूस को दी जाती है. अलेक्सान्द्रIII के अश्वारोही शिल्प को तो, लगता
है, हर तरह की सज़ाएँ झेलनी पड़ी थीं – घर में नज़र बंद करने
की, जेल के अलग-थलग कमरे में (लकड़ी की ‘केस’
में), और प्रतीकात्मक जेलखाने में (महान अक्टूबर क्रांति की
दसवीं वर्षगांठ पर). ऊपर से,
इसे – फिर से खड़ा करने
की प्रक्रिया से भी गुज़रना पड़ा – पारंपरिक अनुष्ठानों से, पैडेस्टल पर नए शिलालेख का उद्घाटन करके, इसका पुनःप्रतिष्ठापन किया गया. कभी कभी स्मारकों को
खदेड़ दिया जाता है,
अक्सर – उनकी न्यायसंगत
जगह से दूर भेज दिया जाता है. स्मारक अपनी विशेषताएँ खो सकते हैं – विभिन्न भाग
(सहायक उपकरण और लक्षण),
और कभी तो ख़ुद अचलता ही
खो जाती है, जिसका तात्पर्य पैडेस्टल से है. जैसे, उसी अलेक्सान्द्रIII के शानदार
पैडेस्टल का उपयोग एक फ़ायदेमंद काम के लिए किया गया – दूसरे स्मारकों के पैडेस्टल
के रूप में – रीम्स्की कोर्साकोव के स्मारक के लिए और दो बार सोवियत संघ के वीरों
के स्मारकों के लिए.
अक्सर
दूसरी तरह से भी होता है : स्मारक अपने पैडेस्टल से ज़्यादा जीता है. बल्कि
पैडेस्टल – स्मारक से ज़्यादा उम्र गुज़ार लेता है. पीटर्सबुर्ग में कई खाली
पैडेस्टल मिल जाएँगे. चाहे तू त्सार का स्मारक हो, या
क्रांतिकारी का,
तेरा पैडेस्टल एक ही तरह
से तुझसे वंचित हो सकता है. उदाहरण के लिए, बाबुश्किन
के स्मारक का पैडेस्टल पार्क में दुर्लक्षित खड़ा है, जिस पर
अभी हाल ही तक इस क्रांतिकारी का नाम लिखा था, उसी
तरह, जैसे अस्पताल के सामने, जिसे
कभी त्सार अलेक्सान्द्र II
के सम्मान में अलेक्सान्द्रोव्स्की
अस्पताल कहते थे,
अभी तक त्सार-मुक्तिदाता
के स्मारक के पैडेस्टल का एक हिस्सा खड़ा है. कभी-कभी एक स्वतंत्र पैडेस्टल ख़ुद ही
जैसे नया स्मारक बन जाता है – ऐसा हुआ
था ग्रेनाइट प्रिज़्म के साथ,
जो क्रांति से पूर्व, नेपोलियन के साथ हुए युद्ध के वीर ग्रेनेडियर लिओन्ती
कोरेन्नी के स्मारक के लिए पैडेस्टल
के रूप में इस्तेमाल हुआ था. वसिल्येव्स्की द्वीप से हटकर सुवोरव म्यूज़ियम के आंग़न
में प्रतिस्थापित होने के बाद पैडेस्टल, उस पर
बचे “मूल रेजिमेंट को” – इस शिलालेख की बदौलत फिनलैण्ड की रेजिमेंट के स्टाफ़ को
समर्पित स्मारक समझा जाने लगा,
जो , वैसे,
न्यायसंगत है : स्मारक
को रेजिमेंट की सालगिरह के मौके पर आयोजित
ऑफ़िसर्स की मीटिंग में दर्शनीय सीढ़ी पर स्थापित किया गया था.
“अमर
बनाना” इस शब्द का उच्चारण करते हुए,
हम इस बारे में सोचते भी
नहीं हैं, कि स्मारक कितने नश्वर हैं. चाहे कितने ही “अनंत काल
के उद्देश्य से” उनका निर्माण क्यों न किया गया हो, उनके
जीवन की औसत अवधि मनुष्य के जीवन के अनुपात में ही होती है. सदियों तक तो कुछ ही
स्मारक ज़िंदा रहते हैं,
वे व्यक्तिगत रूप से
अच्छी तरह परिचित होते हैं,
और उन सभी को, कभी न कभी,
किसी न किसी तरह के ख़तरे
का सामना करना ही पड़ा था. और,
फिर “सदियों” से क्या
मतलब है? पीटर
I के स्मारक का निर्माण, जो पीटर्सबुर्ग का प्राचीनतम स्मारक है, सिर्फ 1755 के लगभग पूरा हुआ था, जिसके बाद और पैंतालीस साल वह लावारिस के समान गोदाम
में धूल खाता रहा,
जब तक कि उसे पावेल
मिखाइलोव्स्की महल के सामने स्थापित करने के लिए बाहर नहीं लाया. और ये,
“ब्राँज़ हॉर्समैन” (1782)
की बगल में, आयु की ऊपरी सीमा है. और, महान राजकुमार निकोलाय निकोलाएविच (ज्येष्ठ) का
स्मारक – एक और घुड़सवार शिल्प,
पीटर्सबुर्ग में पांचवां
– मानेझ चौक पर चार साल खड़ा रहा (1914-1918). या स्टालिन को ही लीजिए. जो मज़बूत और
अचल लग रहे थे – शहर में वे कुल पाँच थे, उनमें से
तांबे के चार का अनावरण करीब-करीब एक साथ किया गया – सन् 1949 के नवम्बर के
उत्सवों से पूर्व (“लेनिनग्राद केस” से संबंधित आरंभिक मृत्युदण्डों के एक महीने
बाद), और पांचवां और साल भर के बाद, - बारह और ग्यारह से कुछ कम साल खड़े रहे, ठीक पार्टी की 22वीं कॉंग्रेस तक, जिसमें प्रसिद्ध निर्णय लिया गया था.
लेनिनों
की संख्या भी काफ़ी कम हो गई. जैसे, उदाहरण के लिए, लेनिनों
में से एक सबसे ज़्यादा “जवान”,
जिसे उसीके नाम के
स्टेडियम के आगे स्थापित किया गया था,
ग्रेनाइट का होने के
कारण सिर्फ चौदह साल टिका रहा – बिल्कुल स्टेडियम का नाम बदले जाने तक. यहाँ
अनावश्यक हो जाने के कारण,
वह ‘पल्यार्नीए ज़ोरी’ शहर के
निवासियों को पसंद आ गया,
जहाँ उनकी विनती पर उसे
भेज दिया गया. उसके स्थान पर सन् 1994 में पीटर I की कांसे
की अर्ध प्रतिमा प्रकट हुई (इल्यिच को हटाकर पीटर को लगाना परंपरा बन गई थी), मगर कुछ ही महीनों बाद त्सार का चालीस किलोग्राम वज़न
का कांसे का सिर दुष्टों ने चुरा लिया. तब यहाँ दूसरे पीटर – प्रसिद्ध फुटबॉल
प्लेयर पीटर देमेन्त्येव - के स्मारक का समारोह पूर्वक अनावरण किया गया. जनता ने
मासूमियत से स्मारक को कांसे का समझ लिया, मगर उस
पर तो सिर्फ कांसे जैसा रंग लगाया गया था. स्मारक टूटने लगा, और दो साल भी नहीं बीते थे, कि उसका, सौम्य शब्दों में कहें तो, इस्तेमाल
कर लिया गया.
स्मारकों
के लिए कुछ ख़ास क्षेत्र हैं – स्टेडियम “पेत्रोव्स्की”, मानेझ
चौक, और कुछ और.
जहाँ
तक “कामचलाऊ सामग्री” का सवाल है,
तो गृहयुद्ध के सालों
में उनमें दिलचस्पी पैदा हुई थी. ठीक है, कि
वलोदार्स्की का स्मारक, जिसे क्रांति-विरोधियों ने उड़ा दिया था, अपनी ही तरह का, शहीद
होने वाला इकलौता स्मारक था,
मगर “अभूतपूर्व प्रचार” के अन्य नमूनों की, जो स्वाभाविक कारणों (सामग्री की अस्थिरता) से समाप्त
हो गए, संख्या बीस के दशक में ही दर्जनों तक पहुँच गई थी. और
यदि उनकी गिनती न की जाए,
जो अधिकांश प्लास्टर ऑफ
पेरिस से बने थे,
तो हमारे शहर में खो गए
स्मारकों की संख्या आज की तारीख में करीब सत्तर होगी.
क्या
इस बात पर आश्चर्य होना चाहिए,
कि प्रदर्शन के लिए रखे
गए स्मारकों को हमेशा ही सबकी नज़र में आने की प्यास नहीं होती. अक्सर स्मारक
अदृश्य बनने की कोशिश करते हैं,
फैक्टरियों की टूटी-फूटी
दीवारों के साथ एकरूप होना चाहते हैं,
झाड़ियों में छुपना चाहते
हैं, जो,
संयोगवश, संस्थाओं में स्थापित इल्यिचों के लिए ख़ास बात है. उन्हें
तो वाकई में डरने की ज़रूरत है,
वे न जाने कब से ‘जोखिम’ के समूह में हैं. ऊँचे रुतबे वाले लेनिनों को भी –
वैसे, जैसे फिनलैण्ड रेल्वे स्टेशन पर और मॉस्को स्क्वेयर पर
हैं परेशानी का एहसास होता ही है. हालाँकि इनके बारे में भी विचार किया जा रहा है.
ये फ़ैसला किया गया है – उनके वास्तविक जुनून का गला घोंट दिया जाए, उनका ग्लैमर बढ़ाया जाए. उन्हें फ़व्वारों से घेर दिया
गया. बख़्तरबंद गाड़ी वाला लेनिन,
और अनिकूशिन्स्की
स्क्वेयर पर खुले ओवरकोट वाला लेनिन,
दोनों ने ही, लगता है,
खेल के नियमों को मान
लिया है – अब वे,
जल प्रवाहों के
डाइरेक्टर जैसे,
फ़व्वारे के वाल्व जैसे
हैं. उनमें से हर एक अब,
करीब-करीब पीटरगोफ़ के
सैम्सन जैसा ही है.
अगस्त
2008
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