मेन्देलेयेव, उसका रहस्य
साल में कम से
कम दो बार – बसन्त की परिक्षाएँ समाप्त होने पर और 1 सितम्बर को – टेक्नोलॉजी इन्स्टिट्यूट के छात्र कांसे के बने मेन्देलेयेव की, जो
19, मॉस्को एवेन्यू
इस पते पर बने पार्क में बैठा है,
नाक साफ़ करते हैं. मुझे शक है, कि वे
किसी केमिकल रीजेन्ट का उपयोग करते हैं.
वैसे
तो इन्स्टिट्यूट में उनका अपना मेन्देलेयेव है, जैसे
संस्थागत हो,
आंगन में, मगर उस मेंदेलेयेव का सिर पाँच मीटर की अप्राप्य ऊँचाई
पर है, जो एक भद्दे पैडेस्टल पर स्थित है. यहाँ सीढ़ी की ज़रूरत
पड़ती है. शहर वाले मेन्देलेयेव तक,
बेशक, सब आसानी से पहुँच सकते हैं.
दढ़ियल, लम्बे बालों वाला द्मित्री इवानोविच विद्यार्थियों द्वारा
अपमानित महसूस नहीं करता. धुंधले मौसम में भी चमकती उसकी नाक जंगलीपन से देखती है, मगर इन दिनों में स्मारक के चेहरे का भाव दयालु-भलमनसाहतभरा
होता है : ऐह,
बेवकूफ़, बेवकूफ़!...
वह
आरामकुर्सी पर बैठा है – रौब से,
पैर पर पैर रखे, उस घर के छोटे से चौक में, जिसमें
कभी ख़ुद रहता था. आसपास की हालत भी, इसीके अनुरूप, बेहद
घरेलू है. ये,
शायद, शहर का सर्वाधिक घरेलू स्मारक है. सबसे ज़्यादा अगोचर
स्मारकों में से एक. करीब से भी गुज़र जाओ, तो नज़र
नहीं जायेगी. कुर्सी के नीचे का कबाड़ दिलचस्प है – किताबों का गट्ठा, लपेटे हुए कागज़ों के कुछ मुट्ठे...सब कुछ एकदम विशिष्ट, ठोस,
शब्दशः है. यहाँ शब्दशः
रूप से “शब्दशः” : कुर्सी के नीचे पड़े हुए वैज्ञानिक ग्रंथों में से एक पर, टेढ़े-मेढ़े अक्षर देखे जा सकते हैं, जिनसे ये शब्द बनते हैं “नाप-तौल के मुख्य कक्ष का
वार्षिक इतिहास”. और वैज्ञानिक के पैर पर जो खुला हुआ ग्रंथ पड़ा है उसमें कौनसे
अक्षर, कौनसे अंक और सूत्र हैं, कहना
मुश्किल है. इसके लिए मॉस्को प्रॉस्पेक्ट पार करके टेक्निकल इन्स्टीट्यूट की कम से
कम तीसरी मंज़िल पर चढ़ना होगा और खिड़की से दूरबीन से देखना होगा; मगर पैडेस्टल पर चढ़ना ज़्यादा आसान होगा, वह ऊँचा नहीं है – सिर्फ एक मीटर. हमारे हाथ निराशा ही
लगती है. किताब के पन्ने एकदम कोरे हैं. मेन्देलेयेव सिर्फ बहाना बना रहा है, कि वह पढ़ रहा है. यही तो ख़ास बात है. बिना अक्षरों
वाली किताब में कोई क्या पढ़ सकता है?
(ये मान सकते हैं, कि किताब अभी लिखी नहीं गई है.) कुछ भी नहीं. तो फिर
किस काम में व्यस्त है?
किसी में भी नहीं.
बिल्कुल किसी में भी नहीं. और किताब भी उसने सिर्फ आँख़ को हटाने के लिए खोली है.
मुझे मेन्देलेयेव का रहस्य मालूम है. अगर हम द्मित्री इवानोविच के बाएँ हाथ पर ग़ौर
करें, तो बड़ा अचरज होगा कि स्मारक हमसे कुछ छुपा रहा है. ज़रा
पास चलकर देखते हैं. क्या देखते हैं?
हाथ में सिगरेट है!
मेन्देलेयेव अभी-अभी कश लेते-लेते रुक गया है और अब अपनी धुँआ छोड़ती हुई सिगरेट
छुपाने की कोशिश कर रहा है!
चौंकाने
वाली बात है. पीटर्सबुर्ग के स्मारकों के पूरे समाज में मैंने इससे ज़्यादा
हृदयस्पर्शी बात नहीं देखी. मृत्यु के बाद की प्रसिद्धी किस काम की, यादगार किस काम की, जब आप
सिगरेट भी नहीं पी सकते?
शिल्पकार गिन्सबुर्ग
इल्या याकव्लेविच जानता था,
कि उसने क्या किया है
(जब स्मारक का उद्घाटन हो रहा था,
तो वह सत्तर पार कर गया
था), ये वो,
शिक्षाविद्, जिसका अपना एक पैर कब्र में लटक रहा था, महान रसायनज्ञ की एक छोटी से कमज़ोरी की फिक्र कर रहा
था : पीने दो सिगरेट बेचारे को! प्रयोगशाला में इजाज़त नहीं है, मगर यहाँ तो पी सकता है. वर्ना तो हमेशा के लिए
बैठे-बैठे थक जाएगा.
वैसे, ये ही प्लिखानव का भी शिल्पकार है.
अगर
मेन्देलेयेव अपना सिर ज़रा सा दाईं ओर घुमाए, तो
यकीनन – बिल्कुल बगल में – कोई सौ कदम दूर, अपने
ही नाम वाली इन्स्टीट्यूट के प्रमुख द्वार के सामने, वह
प्लिखानव को देखेगा – गिओर्गी वालेन्तिनोविच को, जो
रसायनज्ञ नहीं है. मगर,
एक दूसरे की ओर देखना
स्मारकों के लिए हानिकारक होता है.
हल्के
दिल से मेन्देलेयेव का रहस्य बता रहा हूँ, क्योंकि
मुझे ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास है : सिगरेट वह मुझसे-आपसे नहीं छुपा रहा है (हमें
क्या फर्क पड़ता है,
हम उसे समझते हैं!...), बल्कि सन् 1932 के टाइप की किसी पाखण्डी कलात्मक परिषद
के सदस्यों से छुपा रहा है,
जो सिगरेट पीने वाले
स्मारक की कल्पना को भी बर्दाश्त करने में अक्षम हैं.
सिर्फ
किसी साज़िश की कल्पना करने से ही ऐश-ट्रे की अनुपस्थिति को समझाया जा सकता है. कुछ
नहीं कर सकते,
द्मित्री इवानोविच को
फर्श पर, मतलब लॉन पर ही राख झटकनी पड़ेगी.
2003
परिशिष्ठ
सन् 2003
की डायरी से : 19 जून
मेन्देलेयेव की
नाक चमक रही थी, स्मारक के पास एक औरत चीथड़ा लिए डोल रही थी. मैं पास
जाता हूँ : वाकई में स्मारक को पोंछ रही है – जहाँ तक उसका हाथ पहुँच सकता था.
मुझे दिलचस्पी हुई,
क्या उसे मालूम है, कि नाक कौन साफ़ करता है. बोली : “कैडेट्स. उसके कंधों
पर फीते भी चिपकाते हैं”. और मैंने सोचा, टेक्निकल
इन्स्टीट्यूट के छात्र होंगे. – “यहाँ टेक्नोलॉजी वाले कहाँ से होने लगे?” – “क्यों नहीं”, मैंने
कहा, “रसायनज्ञ जो है”. – “ये रसायनज्ञ है?” औरत को अचरज हुआ. “नहीं तो कौन? ये रहा उसका चार्ट (स्मारक के बाईं ओर वाले घर की सुरक्षा
दीवार पर लगी स्मारक-तालिका की ओर इशारा करता हूँ). अब वह मुझे कुछ अविश्वसनीय-सा बताने लगती है. जैसे “पेर्म के पास कैम्प
में कोई एक प्रोफेसर बी.
बैठा था, जिसने मेन्देलेयेव के चार्ट से भी दो हज़ार ज़्यादा एलिमेन्ट्स
की खोज की थी – वो था रसायनज्ञ. मेन्देलेयेव ख़ास तौर से उससे मिलने पेर्म गया था, लिथियम नाम के एलिमेन्ट के बारे में बात करने के लिए. इस
सबका सायन्स अकादमी की प्रेसिडेन्ट,
मैडम दाश्कोवा से भी कुछ
ताल्लुक था.”
“रुकिए,” मैं कहता हूँ, दाश्कोवा
रहती थी अठाहरवीं सदी में”
“और
मेन्देलेयेव कौन सी सदी में?”
औरत सतर्क हो गई.
मैं
जवाब देता हूँ: “उन्नीसवीं,
बीसवीं सदी के आरंभ में.”
“नहीं,” वह कहती है, अठाहरवीं
सदी में!” और आगे जोड़ती है : “आप ही ने उसकी नाक साफ़ की है!”
ये सब वह बड़े तैश से कह रही
थी – जैसे, मुझे बेवकूफ़ नहीं बना सकते, मैं सब जानती हूँ. दुबली-पतली, घर की चप्पलें. मुँह में दो
दाँत.
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