कीरव माँस पैकिंग संयंत्र
में
इस स्मारक के बारे में बतलाते हुए, पहेलियाँ
बुझाने को जी चाहता है – किसी टी.वी. क्विज़ की तरह, जो “यकीन
है – नहीं है” के सिद्धांत पर बनाया गया है. सवाल, मिसाल के
तौर पर, इस तरह से बनाया जा सकता है : “क्या आपको यकीन है,
कि सेंट पीटर्सबुर्ग में पार्टी के कार्यकर्ता का एक स्मारक है,
जिसके पैडेस्टल पर ढले हुए, उभरे अक्षरों में
शब्द “शैतान”
प्रदर्शित किया गया है?”
सही जवाब : हाँ! यकीन
है!...वो तो ख़ुद ही स्पष्ट है – वर्ना पूछता ही नहीं. स्मारक को सन् 1937 में
स्थापित किया गया था. ऊँचा – पैडेस्टल समेत करीब आठ मीटर्स. एक तरह से स्मारक को गोपनीय
रखा गया है. बाहरी आदमियों के लिए प्रवेश निषिद्ध है,
वह उस संयंत्र के अहाते में खड़ा है, जिसे कई
सालों तक एस. एम. कीरव लेनिनग्राद माँस पैकिंग संयंत्र के नाम से जाना जाता था.
ज़ाहिर है, कि ये ही एस. एम. कीरव का स्मारक है, जो “भीमकाय माँस उद्योग” के निर्माण और आरंभ के
दौरान उसका प्रमुख संरक्षक था.
“भीमकाय” को “प्रथम-शिशु”
भी कहते थे, और इस शब्द में मॉस्को को चुनौती
का आभास होता है. लेनिनग्राद के देशभक्तों की मूर्तियाँ तब तक बनाई जा रही थीं.
उद्योग के अथक कार्य का एक साल पूरा होने पर प्रकाशित किए गए एल्बम में बड़े फ़ख्र
से सूचित किया गया था : “ ‘लेनमाँसयंत्र’ का निर्माण, जो मॉस्को और सेमिपलातीन्स्की के
संयंत्रों से करीब साल भर बाद शुरू हुआ था – तेईस महीनों में पूरा किया गया और
इसने मॉस्को वाले संयंत्र से पहले काम आरंभ कर दिया, भौतिक
कामों के अत्यंत व्यापक होने के बावजूद”. ये “पहले”, मतलब,
कहना पड़ेगा, कि सिर्फ एक दिन पहले हुआ था,
और “भौतिक कामों की व्यापकता” बिल्कुल सही है, बिना बेवकूफ़ों के भी – निर्माण शुरू किया गया था शहर की सीमा से बहुत दूर,
एक खुले खेत में (गंदे, बेशक...), जहाँ कुछ भी नहीं था, आने जाने का रास्ता तक नहीं...
प्रत्यक्षदर्शियों के
अनुसार, सन् ’36 के
अंत में शिल्पकार तोम्स्की की कार्यशाला कीरव के अनेक मॉडेल्स से भरी हुई थी. शिल्पकार,
जिसे अभी तक सम्पूर्ण सोवियत संघ में प्रसिद्धि प्राप्त नहीं हुई थी,
मगर जिसने प्रतिष्ठित प्रतियोगिता जीत ली थी, एक
साथ तीन-तीन कीरवों पर काम कर रहा था.
पहली दिसम्बर को – दो साल
पहले स्मोल्नी पर पिस्तौल की मनहूस गोली चलने की दूसरी सालगिरह पर – “प्राव्दा” ने
एक फोटो पुनःप्रकाशित किया था : पार्टी की XXVIIवी काँग्रेस
में कीरव स्टेज पर खड़ा है – उत्तेजित, उत्साह से भरपूर,
हाथ ऊपर उठाए. फोटो ने शिल्पकार और निर्माता – निकोलाय तोम्स्की और
नोय त्रोत्स्की- दोनों को समान रूप से प्रभावित किया. “साहित्यिक लेनिनग्राद”1
अख़बार के संवाददाता से बात करते हुए तोम्स्की ने स्मारक की अवधारणा की कल्पना इस
प्रकार की : “सुखी और प्रसन्न कीरव”. “सुखी और प्रसन्न” कीरव के विचार को प्रमुख
स्मारक के लिए, जो हाल ही में निर्मित (त्रोत्स्की के डिज़ाइन
के अनुसार) रीजनल कौन्सिल के सामने लगाया जाने वाला था, सुरक्षित
रखा गया, मगर सन्1938 आते-आते अवधारणा बदल गई – लेनिनग्राद
के कम्युनिस्टों का नेता “प्रसन्न” के स्थान पर “ज्वलन्त” और “सुखी” के स्थान पर
“आश्वस्त” बन गया.
और ये “सुखी और प्रसन्न”
अवतरित हुआ (सन् 1937में) माँस पैकिंग संयंत्र में.
पहली बात,
चेहरे के भाव : स्पष्ट है कि कोई वक्ता प्रकट रूप से प्रसन्नता से
भाषण दे रहा है. दूसरी, उसकी मुद्रा : हाथ का आशावादी
स्ट्रोक. तीसरी, जैकेट की जेब, जो दिल
के पास है : वह हौले से खुली हुई है, पहेली बूझने की ज़रूरत
नहीं है कि उसमें क्या है. पार्टी का टिकट.
चौथी,
बाएं हाथ के नीचे: मोटी किताब. नीचे से दिखाई नहीं देता, कि ये कैसी किताब है. खास तरह से तो मैंने उसकी फोटो नहीं ली, मगर, घर आकर पूरी तस्वीर को ज़ूम करने के बाद, बस बुरी तरह चौंक गया. “लेनिन.
स्तालिन”, पीठ पर स्पष्ट अक्षरों में लिखा था. तोम्स्की
ने, बेशक, स्टालिन की कब्र के लिए
क्रेमलिन की दीवार के निकट उसकी अर्धप्रतिमा बनाई थी, मगर ये
हुआ था ब्रेझ्नेव के ज़माने में, ये छोड़ दीजिए, - ख्रुश्चोव के ज़माने में लेनिनग्राद में तोम्स्की द्वारा निर्मित स्टालिन
के तीनों स्मारक, सचमुच में हटा दिए गए थे. मेरा ख़याल है,
कि माँस पैकिंग संयंत्र में कीरव का स्मारक – शहर में, और हो सकता है रूस में भी, इकलौता ऐसा स्मारक है,
जिसने स्टालिन के स्मारकों को शहीद होते हुए देखा है, और जिस पर “स्टालिन” का नाम बचा है. कोई उसे छू नहीं पाया! छुपा लिया कीरव
ने उसे.
पाँचवीं,
और ये महत्वपूर्ण है : शिलालेख. एकदम असाधारण शिलालेख:
“हमारी
सफ़लताएँ,
वाकई में महान हैं. शैतान ही जानता है. अगर इन्सान की तरह कहा जाए,
तो शिद्दत से दिल चाहता है – जीने को और ज़िंदा रहने को.”
ये बात, कि
ये शिलालेख एक बोर्ड पर है, जिसे हलाल-टुकड़े करने वाली इमारत
में रखी गई प्रेसिंग मशीन के एक महिला और एक पुरुष कर्मचारी पकड़े हुए हैं, “जीने और ज़िंदा रहने” के फ़ॉर्मूले को एक अति विशिष्ठ अर्थ प्रदान करती है,
मगर ख़ास बात ये नहीं है. ख़ास बात ये है कि पैडेस्टल्स पर इस तरह से
नहीं लिखा जाता. और ये “शैतान ही जानता है” क्या है? किसे
जानता है “शैतान”? क्या स्मारक पर ऐसा लिखने की कल्पना की जा
सकती है?!.
अपने दादाजी से धरोहर में
मुझे कुछ विशिष्ठ किताबें मिलीं. CPSU(B) की XXVIIवीं कॉंग्रेस की शब्दशः रिपोर्ट की एक प्रति, जो
मेरे पास है, जिसे एक दुर्लभ चीज़ समझा जा सकता है. बात ये थी,
कि पार्टी के सभी सदस्यों को जिनके हाथों में इस तरह की किताबें थीं,
संचालक मंडलों की सूचियों से जनता के दुश्मनों के नामों को स्याही
की कलम से मिटा देना था, - मेरे दादा ने अपनी मर्ज़ी से काम
किया : जनता के दुश्मनों के नाम उन्होंने साधारण पेन्सिल से काट दिए, जिससे वे आसानी से पढ़े जा सकते हैं. सेंट्रल कमिटी के 71 में से 63 नाम
काटे जा चुके हैं. तीन – अर्जोनिकीद्ज़े, कुइबीशेव और कीरव के
नामों पर पेन्सिल का घेरा बनाया गया है. उनके लिए ये अंतिम काँग्रेस भी थी.
तो,
पृष्ठ 258 पर कीरव के भाषण में वे, आशावाद से
भरे हुए शब्दों को ढूँढ़ने में ज़्यादा मुश्किल नहीं हुई. भाषण का शीर्षक था
“कॉम्रेड स्टालिन की रिपोर्ट – हमारी पूरी पार्टी का कार्यक्रम”. कीरव ने बड़े कठोर और, आज के हिसाब से, डरावने शब्दों का प्रयोग किया, मगर जब बात आलोचना और
आत्म-आलोचना तक पहुँची, तो वह अप्रत्याशित रूप से ख़ुश हो
गया. आत्म-आलोचना के बारे में उसने कहा (संदर्भ के लिए प्रस्तुत करता हूँ) : “इससे
सिर्फ कामों को सुधारने में सहायता मिलेगी, और पार्टी को ये मिथ्यागर्व
के ख़तरे से बचाएगी, जिसके बारे में कॉम्रेड स्टालिन ने
चेतावनी दी है”. इसके बाद, भावनाओं के आवेग को रोकने में
असमर्थ उसके मुँह से फूटा भावनात्मक वाक्य - “शैतान उसे जानता है”.
मगर सबसे दिलचस्प बात ये
है, कि “जीने को और ज़िंदा रहने को” से वाक्य समाप्त
नहीं होता! “जीने को और ज़िंदा रहने को” के बाद एक टिप्पणी है. रिपोर्ट में, जैसा कि होना चाहिए, वह इटालिक्स में है और उसे कोष्ठक में रखा गया है : “(हँसी)”
...मगर, ये भी सब कुछ नहीं है – वाक्य जारी रहता है :
“...वाकई में,
देखिए, क्या हो रहा है. ये तथ्य है!”
2 और आगे टिप्पणी है, काँग्रेस में
प्रदर्शित टिप्पणियों जैसी बिल्कुल नहीं है : “(शोर-गुल भरी तालियाँ)”.. ज़ोरदार नहीं,
देर तक नहीं, किसी और तरह की नहीं, बल्कि “शोर-गुल भरी” – किसी अत्यंत असामान्य बात जवाब में). टिप्पणियों को
देखते हुए, कीरव ने और तीन बार काँग्रेस को हँसाया था (इस
हास्य-व्यंग्य को इस समय हम नहीं समझ सकते), मगर हमारे विषय
से इसका कोई ताल्लुक भी नहीं है.
अगर और गहराई में जाएँ,
तो ज्ञात होगा, कि सन् 1936 के अंत में ही
शिल्पकार तोम्स्की ने, जैसा कि ऊपर निर्दिष्ट “साहित्यिक
लेनिनग्राद” के संवाददाता से हुई उसकी बातचीत से पता चलता है, पैडेस्टल के दर्शनीय भाग पर उसी वाक्य को पूरी शान से पुनः प्रस्तुत करने का
निश्चय किया था (मगर, ज़ाहिर है, बिना
टिप्पणी के). “स्मारक की ढलाई पर CPSU(B) लेनिनग्राद की
क्षेत्रीय समिति के संस्कृति और लेनिनवाद-प्रचार विभाग के प्रमुख कॉम्रेड बी. पी.
पोज़ेर्न की सीधी नज़र थी. मेरा अनुमान है, कि उसीने “वाकई
में, देखिए, क्या हो रहा है. ये
तथ्य है”. इस उद्गार को लिखने की इजाज़त नहीं दी.
चाहे
जो भी हुआ हो, वाक्य के अंत में गहरे अर्थ वाला ढला
हुआ पूर्णविराम का चिह्न कुछ और नहीं, बल्कि टिप्पणी (हँसी)
को छुपा रहा है. शायद पैडेस्टल पर दिए गए शब्दों को इसी तरह देखना होगा –
प्रसन्नता से, हँसते हुए. वैसे भी तोम्स्की की संकल्पना के
अनुसार काँसे के कीरव का चेहरा करीब-करीब हँसता हुआ ही है. फिर, जब 21 मार्च 1937को स्मारक का उद्घाटन किया गया, - तो
प्रसन्नता जैसी कोई बात ही महसूस ही नहीं हो रही थी....उद्घाटन समारोह की रिपोर्ट
उद्धृत करता हूँ, जो बेहद खपत वाले अख़बार “माँस-भीमकाय (Meat Giant)” में छपी थी:
“...पहली पंक्तियों में
अर्धवृत्त बनाते हुए बच्चे खड़े हैं – जो माँस पैकिंग संयंत्र के मिडल स्कूल में
पढ़ते हैं. वे गा रहे हैं:
“....सर्वहारा,
बैरिकेड्स पर,
क्षितिज
घिरा पूरा लपटों में...”
ये गीत संघर्ष और विजय का
आह्वान देता हुआ प्रतीत होता है. वह जनता के दुश्मनों – त्रोत्स्की- ज़िनोव्येव के
क्रांति विरोधी गुटों के बदमाशों के आकस्मिक हमलों के ख़िलाफ़ गरजता हुआ जवाब है –
जिन्होंने विश्वासघात से सिर्गेइ मिरोनोविच की ज़िंदगी छीन ली थी.” 3
त्रोत्स्की- ज़िनोव्येव गुट
के ख़िलाफ़ सज़ा का अभी ऐलान नहीं हुआ था, मगर “माँस-भीमकाय”
में इस तरह के शीर्षक प्रकट होने लगे थे : “ एक-एक करके सभी फ़ासिस्ट केंचुओं को
ख़त्म कर देना चाहिए”. स्मारक के उद्घाटन से संबंधित आयोजित मीटिंग से एक सप्ताह
पूर्व, संयंत्र में इंजीनियर-टेक्निशियन्स कार्यकर्ताओं की सभा हुई. आत्म-आलोचना की तर्ज़
पर स्वयम् की आलोचना इसलिए की गई कि आत्म-आलोचना का और, परिणामस्वरूप,
सतर्कता का अभाव है : अभी-अभी सॉसेज फ़ैक्ट्री में ख़तरनाक ग्रुप का
पर्दाफाश किया गया था, मगर सहयोगी कार्यकर्ताओं द्वारा नहीं,
बल्कि राष्ट्रीय आंतरिक-सुरक्षा कमिटी के कर्मचारियों द्वारा.
“कॉम्रेड अलेक्सेयेव ने इंजीनियर-टेक्निशियन्स
से हार्दिक अनुरोध किया, कि पृथकतावादी सोच को छोड़ दें,
क्रांतिकारी सतर्कता को बढ़ाएँ और दिन प्रतिदिन बोल्शेविज़्म आत्मसात्
करें” 4
“बोल्शेविज़्म आत्मसात्
करें” ये शब्द हाल ही में हुए प्लेनरी-सेशन में स्टालिन की रिपोर्ट से लिए गए
हैं.
“पार्टी के
कामकाज की कमियों और त्रोत्स्की तथा अन्य दोमुँहे तत्वों के विनाश के उपायों के
बारे में रिपोर्ट” अख़बार “माँस-भीमकाय” ने स्मारक के उद्घाटन के डेढ़ सप्ताह बाद
प्रकाशित की. आलोचना और आत्म-आलोचना के प्रचार को नई गति मिली. आर्थिक सम्पत्ति
निदेशक अलेक्सेयेव इस बात पर पश्चात्ताप व्यक्त करता है, कि
सॉसेज-यूनिट में आंतरिक सुरक्षा कमिटी द्वारा पर्दाफाश किए गए हानिकारक तत्वों को
“बचाने चला था”. “मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था, कि वे लोग,
जो हमारे यहाँ काफ़ी समय से काम कर रहे हैं, सोवियत
शासन के प्रति इस तरह का घिनौना काम कर सकते हैं. सिर्फ अभी, सेन्ट्रल कमिटी के प्लेनरी सेशन के निर्णय के बाद और कॉम्रेड स्टालिन
द्वारा इशारा किए जाने के बाद, मैं समझा हूँ, कि आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए, हम सभी पूंजीवादी
घेरे के बारे में भूल गए, क्रांतिकारी वर्ग सतर्कता के बारे
में भूल गए...”5 ख़ुद जी.एम. अलेक्सेयेव, माँस-संयंत्र
के डाइरेक्टर, का भी कुछ समय बाद दमन किया गया था.
“आलोचना”,
“आत्म आलोचना” और “सतर्कता” – ये उस काल के प्रमुख शब्द हैं,
जिनके बारे में, कम से कम “माँस-भीमकाय” के
संदर्भ से जानकारी प्राप्त हो सकती है.
मेरा ख़याल है कि
त्रोत्स्की-ज़िनोव्येव गुट पर चल रहे मुकदमे के दिनों में शिल्पकार त्रोत्स्की
(उसीने तो माँस पैकिंग संयन्त्र का डिज़ाइन तैयार किया था) बहुत असहज महसूस करता
था. और शिल्पकार तोम्स्की को भी, उसके बाद जब “त्रोत्स्की-ज़िनोव्येव
ब्लॉक से अपने संबंधों के कारण उलझ कर” छिटकने वाले तोम्स्की ने, ख़ुद को गोली मार ली थी, कई बार अफ़सोस हुआ था,
कि उसने अपने लिए ये छद्म नाम क्यों चुना था. ग्रीशिन ही बना रहता,
तो कोई परेशानी ही न होती.
बहुत हुआ दुख भरी बातों के
बारे में.
उभरी हुई आकृतियों के बारे
में बताना होगा. वे उतनी ही आशावादी हैं, जितना कि
काँस्य-कीरव द्वारा दिया गया भाषण.
ये है कीरव,
उस समय, जब वह सन् 1933 में मई के महीने में
संयंत्र में जा रहा था (अन्य सूत्रों के अनुसार जून में). उन दिनों यूरोप के सबसे
बड़े रेफ्रिजरेटर का इस्तेमाल किया जा रहा था. जहाँ तक मैं समझता हूँ, कीरव उस कार्यकर्ता को प्रोत्साहित कर रहा है, जिसने
600 किलो कैलोरी प्रतिघण्टा की शीतक-क्षमता वाले इम्पोर्टेड कम्प्रेसर “बारबिएरी”
की तकनीक को आत्मसात् कर लिया है (इस अमोनिया यूनिट की तस्वीरें व्यापारी-अख़बारों
में, और विशेष प्रकाशनों में देखी जा सकती हैं).
अन्य आकृतियों में कीरव
नहीं है. यहाँ कार्यकर्ता – स्वतंत्र रूप से, बगैर उसके
– बॉयलर “लाब्स” की शुरुआत कर रहे हैं. ये, ज़ाहिर है,
सूखी चर्बी अलग करने वाला सेक्शन है, जो हलाल
करने-टुकडे करने वाली बिल्डिंग की एक मंज़िल पर है.
आदमी और औरत – हाथ में
फावड़ा लिए. कोयला? ज़ाहिर है, कि
संयंत्र में पेचेर्स्की कोयले का इस्तेमाल होता था (लकड़ियाँ धुँआ देने के काम आती
थीं). संभावना यही है,कि सिर्फ एक ही बॉयलर का इस्तेमाल हो
रहा था, जो दिए गए चित्र में नहीं समा सका था. चर्बी को
पिघलाने के लिए ऊष्मा की ज़रूरत होती है.
“खाद्य-उद्योग के
प्रेरणास्त्रोत” अनास्तास इवानोविच मिकयान ने, जिसके नाम
से मॉस्को का माँस पैकिजिंग जाना जाने वाला था, पार्टी की
उसी XXVIIवीं कॉंग्रेस में प्रभावशाली ढंग से कहा था : “...अमेरिका
की माँस प्रौद्योगिकी के चमत्कार, हमारी सोवियत मिट्टी में स्थानांतरित
हो गए”.
चमत्कार हर जगह चमत्कार
हैं.
मगर हमारे यहाँ और भी
अद्भुत हैं.
जून 2007
टिप्पणियाँ
1. साहित्यिक लेनिनग्राद, 5 दिसम्बर 1936
2. सोवियत कम्युनिस्ट
पार्टी की XXVII काँग्रेस. मॉस्को, पार्टी
प्रकाशन, 1934, पृ. 258
3, “माँस-भीमकाय”, 22 मार्च 1937
4. एम. चोर्निख. “माँस-भीमकाय”, 22 मार्च 1937
5. “माँस-भीमकाय”, 25 मई 1937, नं. 39 (350).

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