मुर्दाघर की जगह पर पिरागोव
हर सुबह
पिछवाड़े वाले कम्पाऊण्ड की तरफ़ से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती थी. वहाँ ईंटों
की दीवार के पीछे – मिलिटरी-मेडिकल अकादमी है, जिसे पहले अबूखोव्स्की हॉस्पिटल कहते थे. कुत्ते नब्बे
के दशक के आरंभ तक चिल्लाते रहे,
फिर, ज़ाहिर है,
उन पर किये जाने वाले
प्रयोग रुक गए (हमारी बिल्डिंग में सब यही समझते थे, कि ये
कुत्ते प्रयोगों के लिए हैं) – अब पिछवाड़े वाले कम्पाऊण्ड में हमेशा ख़ामोशी रहती
है. उस ईंट की दीवार पर सन् ’33
में अन्य शरारती बच्चों
के साथ चढ़कर मेरे भावी पिता बाहरी बिल्डिंग्स की छत पर जाया करते थे, गुप्त सभाओं की जगह थी फूस वाली अटारी, और किस्सों के अनुसार एक बार तो अस्पताल का साईस हाथ
में चाबुक लिए छत पर चढ़ गया था,
ताकि कम से कम एक शरारती
बच्चे को तो पकड़ सके. उस बिल्डिंग में,
जिसमें मैं रहता हूँ, मेरे दादा परिवार के साथ सन् ’32 में ही आ गए थे, मतलब
ये जगहें पारिवारिक किस्से-कहानियों से सराबोर हैं. अभी कुछ ही दिन हुए, हमारे कम्पाऊण्ड में मैं परिचित कवि N से मिला,
जो करीब पंद्रह साल पहले
अमेरिका से लौटा था. पता चला,
कि उसे यहाँ मज़दूर के
रूप में नौकरी मिल गई है. उसने युनिफॉर्म पहनी थी, वह
निर्माण कार्य के मलबे से भरा बोरा खींच रहा था. प्रवेश वाले कम्पाऊण्ड में उसका
एक गोदाम है,
जो उसी दीवार से सटा हुआ
है, जिसके पीछे से कभी कुत्तों का भौंकना सुनाई देता था.
और दीवार के सामने,
तंग रास्ते के दूसरी ओर
वाली बिल्डिंग में एक बेकरी थी,
जहाँ कई सालों से केक्स
और पेस्ट्रीज़ बनाते हैं. ना तो गोदाम वाला कवि, ना ही
एप्रन वाले कुक्स ये अनुमान लगा सकते हैं, कि वे
किसके पडोस में काम करते हैं. दीवार के एकदम पीछे, उनसे
पाँच मीटर्स की दूरी पर – न सिर्फ अस्पताल है (वहाँ अस्पताल है, ये सबको मालूम है), बल्कि
दीवार के एकदम पीछे मुर्दाघर है.
मुर्दाघर
के विषय से ही जुड़ा हुआ है अस्पताल के बाग की गहराई में स्थापित एन. ई. पिरागोव का
स्मारक. देखने में साधारण,
मगर असल में – असाधारण
स्मारक.
हाँ, और ख़ुद पिरागोव भी तो असाधारण इन्सान ही था.
इसी
बारे में बात हो रही है.
महान
पिरागोव के स्मारक के बारे में.
मेरी
नज़र में, ये सेंट-पीटर्सबुर्ग के सर्वोत्तम स्मारकों में से एक
है. वह सीधा-सादा है,
संक्षिप्त है. इसका भूरा
ग्रेनाइट पैडेस्टल और ख़ुद अर्धप्रतिमा - दोनों के लिए एक-जैसा अच्छा है. पता नहीं, कि मूर्तिकार क्रेस्तोव्स्की ने इस बात पर गौर किया कि
नहीं, कि उसका पिरागोव कुछ-कुछ लेनिन जैसा है. दोनों के
जिस्म, जैसा सर्वविदित है, ‘ममी’ बनाये गए थे, मगर
समानता इसी बात से नहीं है – बेशक,
जीवित व्यक्तियों के
स्वभावों में भी काफ़ी समानता थी. स्मारक इस समानता को दर्शाते हैं – नज़र से, चेहरे के तनाव से, हठवादिता
और जुनून की मुद्रा से.
शहर
में ऐसा कोई अन्य स्मारक नहीं है,
जो उस जगह से इतनी
मज़बूती से जुड़ा हो,
जहाँ वह खड़ा है. बात इस
बारे में बिल्कुल नहीं है कि वह अबूखोव्स्की हॉस्पिटल की सीमा में है (आजकल ये भाग
मिलिटरी-मेडिकल अकादमी का हिस्सा है,
जहाँ, इत्तेफ़ाक से, अजनबियों
को प्रवेश करने की इजाज़त नहीं है);
बात पूरे क्लिनिक के
बारे में भी नहीं है,
बल्कि बात है ज़मीन के उस
छोटे से टुकड़े की,
जिसे स्मारक के रूप में
दिखाया गया है.
पैडेस्टल
के पार्श्व भाग पर बेहद दिलचस्प और...कैसे कहूँ...विशेष लेख है. इतना विशेष, कि शहर के आकर्षणीय स्थलों को समर्पित पुरानी लोकप्रिय
किताबें, अगर उसका हवाला भी देतीं, तो
जानबूझकर तोड़ मरोड़ कर पेश करतीं. जैसे,
सन् 1979 में प्रकाशित “लेनिनग्राद के स्मारक और स्मारक-फलक” नामक पुस्तिका
में ये इबारत इस तरह होनी चाहिए थी : “यहाँ वह अपने ‘एटलास
ऑफ टोपोग्राफिक एनाटोमी’
की रचना कर रहे थे”. ये
मान सकते हैं कि सर्वनाम “वह” व्यक्तिवाचक नाम “पिरागोव” के संदर्भ में है, जो पैडेस्टल के दर्शनीय भाग पर खुदा हुआ है, मगर सिर्फ उस पुस्तिका का सम्पादक ही इस तर्क का
समर्थन कर सकता था,
- वास्तव में तो ये बात पैडेस्टलों
पर इतने औपचारिक रूप से व्यक्त नहीं की जाती. वास्तविक इबारत को जानने के लिए, हमें मिलिटरी-मेडिकल अकादमी की सीमा के भीतर झाँकना
होगा, अस्पताल की बाग में ख़ुद स्मारक को ढूँढ़ना होगा और, उसके मार्ग में बाधा डाल रही बेंच की ओर ध्यान न देते
हुए, हिम्मत से लॉन पर चलकर, पीछे
से उसका चक्कर लगाना होगा.
ये तो कम ही है, कि शिलालेख बेहद धुँधला पड़ गया है और मुश्किल से समझ
में आता है, असल में तो वह पगडंडी से कभी दिखाई ही नहीं देता; जैसे उसे इसलिए नहीं बनाया गया, कि लोग उसकी तरफ़ देखें. साफ़-साफ़ कहें तो वह बनाया ही
इस तरह से गया है,
कि दिखाई न दे. बगैर
किसी अतिशयोक्ति के ये रहस्यमय शिलालेख है – उसके बारे में वे भी नहीं जानते, जो यहाँ दसियों सालों से काम कर रहे हैं और हर दिन काम
पर जाते हुए ग्रेनाइट के पिरागोव की बगल से होकर गुज़रते हैं (मैंने कई लोगों से
बात की थी). ये है वह – सही-सही:
यहाँ
मुर्दाघर था, जहाँ नि. इ. पिरागोव प्रशीतित
शवों के कटे हुए अंगों पर अपने “एटलास ऑफ टोपोग्राफिक एनाटमी” की रचना कर रहे थे. 8
संक्षिप्त
और अर्थपूर्ण.
स्मारक
की स्थापना सन् 1932 में उत्कृष्ट सर्जन इवान इवानोविच ग्रेकव की पहल पर की गई थी; संभव है कि वही शिलालेख के लेखक थे. अगर प्रोफेसर
ग्रेकव - “प्रशीतित शवों के कटे हुए अंगों पर”
– इस वाक्य को अनदेखा कर देते,
और शब्दों को इधर-उधर किए बिना काम चल जाता (शिल्पकार रुद्नेव ने
शायद ऐसा ही करने की सलाह दी थी) – नहीं, सिर्फ तुकबंदी की
ख़ातिर प्रसिद्ध डॉक्टर ने कथन की सत्यता को कम करने की इजाज़त नहीं दी. मेरा ख़याल
है, कि अगर बाहरी लोगों की नज़रों से छुपे हुए पैडेस्टल का
पिछला हिस्सा ज़्यादा अक्षरों को रखने की इजाज़त देता, तो हमें
इस वैज्ञानिक ग्रंथ का पूरा, विस्तृत नाम दिखाई देता,
मगर लैटिन में – क्योंकि एटलास के चार खण्डों में एक भी रूसी शब्द
नहीं है, और सात सौ पृष्ठों का एक स्वतन्त्र वर्णनात्मक
ग्रंथ – पूरा सिर्फ लैटिन में है, बिना किन्हीं चित्रों के. सौ
साल तक पिरागोव के ग्रंथ का नाम कुछ इस तरह अनुवादित किया जाता रहा : “टॉपोग्राफिकल
एनाटमी: प्रशीतित मानव लाशों पर तीन दिशाओं में की गई चीर-फ़ाड
के चित्रों सहित.” आजकल ज़्यादा सही अनुवाद किया जा रहा है, “मानव
लाशों” के स्थान पर “मानव शरीर” लिखा जाता है, मगर पैडेस्टल
पर पर अमर हो गई है वह सीधी-सादी स्पष्टवादिता, जिससे अनाटमी
के दिग्गज वास्तविकता का सामना करते थे.
मुझे इस एटलास के पन्ने
पलटने का मौका मिला. मैं चिकित्सक नहीं हूँ. ईमानदारी से कहता हूँ,
उसने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला. विशाल आकार की किताब में इन
शल्य-क्रियाओं के करीब एक हज़ार पूर्णाकृति चित्र हैं. तीन दिशाओं में. कुछ (उदाहरण
के लिए, वे जो लम्बाई में हैं) आजकल की “इज़्वेस्तिया” की ‘स्ट्रिप’ (पट्टी) के आकार के मोटे कागज़ पर नहीं समा
सके, तब ज़्यादा बड़े आकार के कागज़ का इस्तेमाल करना पड़ा,
जिसे पुस्तक के आकार में मोड़ कर भीतर रखा गया. एटलास की कुल मिलाकर
तीन सौ प्रतियाँ प्रकाशित की गई थीं – बेहद महंगी आवृत्ति के लिए शासन ने धन दिया
था. रशियन नेशनल लाइब्रेरी में, जिसे आजकल अपनी ‘पूब्लिच्का’ कहते हैं, सुरक्षित
प्रति पर, इम्पीरियल हेर्मिटेज फॉरेन लाइब्रेरी की पुस्तक
पट्टिका है, जिस पर अलमारी और शेल्फ नंबर लिखा हुआ है. इसमें
कोई शक नहीं, कि पहले खण्ड की उसी प्रति के पन्ने, जिसे मैं मुश्किल से मेज़ पर रख पाया था, सम्राट
निकोलाय पाव्लोविच ने पलटे होंगे, जिसने व्यक्तिगत रूप से इस
प्रोजेक्ट के लिए स्वीकृति दी थी; उसके चेहरे के भावों की
कल्पना करता हूँ, और ख़यालों में अपने चेहरे के भावों से
तुलना करता हूँ – उत्सुकता...अचरज...ख़ामोश भय?...
जब एटलास के प्रकट होने की
परिस्थितियों से परिचित होते हो, तो प्रभाव और भी
गहरा हो जाता है. दो लब्ज़ों में वे ये हैं.
एक बार निकोलाय इवानोविच पिरागोव
ने सेन्नाया के बाज़ार में टहलते हुए देखा कि कैसे एक कसाई सुअर के प्रशीतित जिस्म
को सीधा कर रहा है. शीत ऋतु के दिन थे. निकोलाय इवानोविच के दिमाग़ में बिजली कौंध
गई; हालाँकि कुछ जीवनीकार ये मानते हैं, कि पिरागोव के दिमाग़ में मूल विचार दीर्घ मनन के बाद आया था. चाहे जो हुआ
हो, तब तक चीरफ़ाड विशेषज्ञ गर्म शवों की चीर-फ़ाड करते थे (उस
अर्थ में ‘गर्म’, जिसमें मृत शरीर की
गर्माहट के बारे में बोलने की इजाज़त है). मगर चीरफाड विशेषज्ञ के उपकरण के नीचे शव
के भीतर “दबाव में कमी” आने के कारण उसके भीतरी अंग झूठी स्थिति दर्शाते थे,
जिससे पिरागोव से पहले शल्य-चिकित्सक सभी संभव अवयवों की सापेक्ष
स्थिति का काफ़ी गलत अनुमान लगाते थे. पिरागोव ने निश्चय किया कि प्रशीतित शवों पर चीरफाड करना
चाहिए. और उसने काम की शुरुआत कर दी. गरीबों वाले अबूखोव्स्की अस्पताल में हर रोज़
दो-तीन आदमी मरते थे. अस्पताल के बगीचे के बीच में एक लकड़ी का मुर्दाघर था,
वो ही वाला; सर्दियों में उसमें शव अकड़ जाते
थे. देर्प्त शहर का नौजवान प्रोफेसर, निकोलाय पिरागोव,
जो पीटर्सबुर्ग के चिकित्सा-जगत को चौंकाने वाला था, इस शोकपूर्ण संस्थान के दो में से एक तंग कमरों में शल्य-चिकित्सा पर पहले
ही भाषण दे चुका था – जर्मन भाषा में उसके छह हफ़्तों के कोर्स को सुनने के लिए
तत्कालीन दिग्गज उपस्थित थे, जिनमें शाही-चिकित्सक अरेन्द्त
भी था. मगर अब पिरागोव बिना किन्हीं अनावश्यक प्रत्यक्षदर्शियों के काम कर रहा था.
चीरफाड़ कर रहा था. दिन में कई-कई घण्टे, कभी-कभी रात भर भी
रह जाता था. मोमबत्तियों की रोशनी में. (सर्दियों में पीटर्सबुर्ग में दिन में भी
अंधेरा होता है.) भयानक सर्दी में. एक बात से डरते हुए : कहीं ताज़ा चीरा तब तक
गर्म न हो जाए, जब तक उस पर एक छोटे से सेल में रखा हुआ काँच
रखकर उसकी तस्वीर नहीं उतार ली जाती. ठण्ड जितनी ज़्यादा होती, पिरागोव के प्रयोग उतने ही बेहतर
होते. उसने कई-कई हज़ार शल्य क्रियाएँ कीं – एटलास में कुछ गिने चुने चित्र ही
दिखाए गए हैं. ख़ुद पिरागोव ने इस
प्रोजेक्ट को “आइस एनाटॉमी” का नाम दिया.
वह “आइस मूर्तिकला” के बारे में भी कहता है – ये तब होता है, जब छैनी और हथौड़े की सहायता से प्रशीतित शवों के किन्हीं अवयवों को
निकालने पर बनी रिक्त जगह को सख़्त हो रहे द्रव्य से भर दिया जाता है. ना तो गर्म
जर्मनी में और ना ही धूप वाली इटली में, बल्कि सिर्फ हमारे
यहाँ, रूस में ही “हिम के उपयोग का ख़ुशनुमा” ख़याल आ सकता है,
जैसा कि के.एम. बेर10 ने पिरागोव के मौलिक ग्रंथ का विश्लेषण करके देमिदव
पुरस्कार के लिए उसकी अनुशंसा करते हुए बड़ी ख़ूबसूरती से कहा था. इस एटलास ने
चिकित्सा जगत को हिलाकर रख दिया. पिरागोव ने बहुत कुछ अच्छे काम किये हैं –
प्लास्टर बैण्डेज का आविष्कार किया, पहली बार युद्ध के
क्षेत्र में एनेस्थेसिया दिया, कई सारे ऑपरेशन्स किए,
ढेर सारे ग्रंथ लिखे, गैरिबाल्डी का पैर बचाया,
मगर, जैसा कि उसके शिष्य कहते हैं, कि पिरागोव का नाम अमर किया “हिम
चिकित्सा” ने. कैसा विरोधाभास है : अमर बनाया उसने, जिसकी सामग्री मृतकों द्वारा प्रदान की गई थी.
मगर एक बात ने सतर्क समीक्षक
को परेशान कर दिया. “कुछ तस्वीरें,” – शिक्षाविद के. एम. बेर ने कहा था, - “ऐसे पात्रों से
ली गई थीं, जो लम्बी बीमारी से पूरी तरह जर्जर हो चुके थे,
और हो सकता है शल्य-कौशल के कारण भी. बेशक, अस्पताल सही-सलामत लाशों की तुलना में ज़्यादातर सड़ी हुई
लाशें ही देते हैं, सही-सलामत, ज़ाहिर
है, बिल्कुल भी नहीं दी जातीं, - फिर
भी अफ़सोस किए बिना नहीं रहा जाता, कि ऐसे काम के लिए,
जिस पर इतना ज़्यादा समय खर्च किया गया,
ऐसी
असाधारण परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं हटाया गया, जैसे,
कम से कम सड़ी हुई लाशें”.11
क्या करें. पिरागोव ने उसी
सामग्री पर काम किया, जो उसके पास थी.
ये कहना न्यायसंगत होगा,
कि प्रमुख चीरफाड पिरागोव ने वीबोर्ग्स्क वाले हिस्से में –
मेडिको-सर्जिकल एकाडमी में की थी. वहाँ उसे एक बहुत बड़ी डिस्क जैसी आरी उपलब्ध थी,
जैसी बहुमूल्य पेड़ों को काटने के काम आती है. अबूखोव्स्की अस्पताल
के मुर्दाघर में हर चीज़ बहुत निम्न स्तर की थी. मगर ई.ई. ग्रेकव इसी जगह को अमर बनाना
चाहता था, उसे तो मालूम था कि किसका क्या महत्व है.
वैसा ही है : “रहस्यमय”
शिलालेख से निष्कर्ष निकालें तो पिरागोव का स्मारक – सिर्फ पिरागोव का स्मारक ही
नहीं है (आम पिरागोव का), मगर पिरागोव का
है, जिसने इतने ज़िद्दी जुनून से इतना विशाल कार्य सम्पन्न
किया सीधे यहीं, न कि कहीं और, - ये
स्मारक है अविश्वसनीय, हमारे कलुषित दृष्टिकोण से, लगभग पागल, उपलब्धि का, जिसे
इस ऐतिहासिक स्थान पर सम्पन्न किया गया, जहाँ कभी लकड़ी का दयनीय
मुर्दाघर था. वास्तव में ये स्मारक है उन मृतकों का, अपनी ही
तरह का स्मारक किसी मुर्दाघर का.
सन् 1886 में,
पिरागोव की मृत्यु के बाद, बहुत सावधानीपूर्वक
अबूखोव्स्की अस्पताल का विवरण प्रकाशित हुआ था.12 अन्य बातों के अलावा
उस जगह का प्लान भी दिया गया था, सभी इमारतों और संरचनाओं की
जानकारी विशेष तालिकाओं में दी गई थी. पत्थर का नया मुर्दाघर, जो पिरागोव की मृत्यु के बाद बनाया गया था, पता चलता
है, कि छोटे गिरजाघर से जुड़ा हुआ है; दूसरी
मंज़िल पर चार संगमरमर की मेज़ें हैं, जिनकी महान एनाटोमिस्ट
कल्पना भी नहीं कर सकता था. पुराना लकड़ी का मुर्दाघर अभी तक गिराया नहीं गया है,
कभी-कभार इस्तेमाल किया जाता है, सिर्फ अत्यंत
आवश्यक परिस्थितियों में – वहाँ अब संक्रमित लाशों को लाया जाता है. उसके बारे में
जानकारी बहुत कम है, मगर तालिकाओं से कुछ जानकारी हासिल कर
सकते हैं. जैसे, इस जगह का क्षेत्रफल. यदि स्क्वेयर साझेन (लंबाई
का पुराना रूसी पैमाना, 1 साझेन = 7 फुट – अनु.) को स्क्वेयर मीटर्स में परिवर्तित करें, तो मिलता है
67 स्क्वेयर मीटर्स – जिसमें दो कमरे और एक कॉरीडोर शामिल है. खिड़कियों की संख्या –
1, मुर्दों को रोशनी की ज़रूरत नहीं होती. भट्टी- नहीं है (मगर
इस बात ने, जैसा कि हम जानते हैं, पिरागोव
को ज़रा भी परेशान नहीं किया). ऐसी ही परिस्थितियों में वह प्रतिदिन 10-10 घण्टे काम
करता रहा.
इस वर्णन के लेखक ने,
जिसका उपनाम - उग्र्यूमव (इस शब्द का अर्थ है – चिड़चिड़ा – अनु.)
- बहुत मुखर है नए और पुराने मुर्दाघरों की स्थिति की आलोचना की है. इन्हें कहीं किनारे
पर होना चाहिए था, न कि बाग के बीचोंबीच, जिसमें मरीज़ टहलते हैं. वर्तमान में इस गलती को सुधार दिया गया है – अब बाग
में कोई मुर्दाघर नहीं है. मुर्दाघर को दूर, क्लीनिक की उत्तर-पश्चिम
परिधि पर धकेल दिया गया है – उस दीवार की ओर जिसके पीछे हमारा कम्पाऊण्ड शुरू होता
है. यदि ग्रेनाइट का पिरागोव मुर्दाघर की ओर देखना चाहे, तो पिरागोव
को 1800 घुमाना होगा. मगर तब दुनिया को “रहस्यमय” शिलालेख का पता चल जाएगा.
मगर वैसा भी नहीं होना चाहिए.
मई
2007
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8. तस्वीर पूरी करने के लिए
इस बात पर ग़ौर करें, कि “topographical” शब्द की अंतिम मात्रा गोली के टुकड़े से नष्ट हो गई है.
9. Anatome topographica sectionibus per
corpus humanum congelatum triplici directione ductis illustrata.
10. के.एम. बेर. प्रोफेसर पिरागोव
के लेखों का विश्लेषण जो “Anatome topographica…” शीर्षक से प्रकाशित
हुआ है. सेंट पीटरबुर्ग, 1860, पृ. 6
11. के.एम. बेर. – लेखों का
विश्लेषण....पृ, 8
12. पी.के. उग्र्यूमव. अबूखव
सिटी हॉस्पिटल, सेंट पीटर्सबुर्ग, 1886

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