किताब वाली
दृष्टिहीन लड़की
ख्रुश्चोव के
ज़माने के बने ब्लॉक्स की बिल्डिंग्स के बीच, बाकू के 26 कमिसार्स में से एक के नाम से प्रसिद्ध एवेन्यू
से थोड़ा सा हटकर,
कोरिन्थियन स्तम्भ के
साथ ये शिल्प-संरचना अटपटी प्रतीत होती, अगर
बगल वाली बिल्डिंग पर ये बोर्ड न लगा होता – “ के. के. गोर्त विशेष (सुधार)
बोर्डिंग स्कूल नं,
1”. ये उसी कन्स्तान्तिन
कार्लोविच गोर्त का स्मारक है, जो “गार्डियनशिप ऑफ द ब्लाइण्ड” के संस्थापक और इसकी
कौन्सिल के प्रथम प्रेसिडेन्ट थे.
साठ
के दशक के आरंभ में नेत्रहीनों और कमज़ोर नज़र वाले बच्चों का बोर्डिंग स्कूल शाउमेन
एवेन्यू पर स्थानांतरित हुआ,
और उसके साथ ही स्मारक
भी चला आया. तब तक स्कूल और स्मारक अप्तेकार्स्की द्वीप पर प्रोफेसर पोपव रोड पर
थे, जिसे पहले पिसोच्नाया स्ट्रीट कहा जाता था. बोर्डिंग
स्कूल अलेक्सान्द्र-मरीन्स्की संस्थान की ऐतिहासिक इमारत में आ गया. नेत्रहीनों के
इस संस्थान की स्थापना ग्रोत ने की थी. ईंटों की बड़ी इमारत (नं. 37) आज तक खड़ी है.
कभी इसे जर्मन अनुभव को नज़र में रखते हुए बनाया गया था और नेत्रहीनों के लिए वह
अत्यंत उपयुक्त थी. मगर आज इस इमारत का नेत्रहीनों की ज़रूरतों से कोई लेना-देना
नहीं है; उसके पूर्व उद्देश्य की याद सिर्फ आश्चर्यजनक रूप से
सीढ़ियों पर बच गई रेलिंग्स दिलाती हैं – जो दीवारों के साथ साथ लगाई गई थीं.
स्मारक
के उद्घाटन के अवसर पर एक वक्ता ने ग्रोत के लिए - “राजनेता, परोपकारी और नागरिक” – ये
शब्द कहे थे. उथल-पुथल भरे सन् 1906 का अक्टूबर था. यदि उस समय ग्रोत कहीं का
गवर्नर होता,
जैसे वह कभी समारा में
था, तो हो सकता है कि उस पर भी बम फेंका जाता. वैसे समारा
में आज भी गोर्त को भले आदमी के रूप में याद किया जाता है – इतना कहना काफ़ी है कि
शहर की सार्वजनिक लाइब्रेरी को उसने पुस्तकों का अपना अभूतपूर्व संग्रह उपहार में
दिया था. पीटर्सबुर्ग में वह ऊँचे पदों पर था, स्टेट कौन्सिल
का सदस्य था. जहाँ भी उसने काम किया,
हर जगह उसने ठोस काम किया
– जैसे, उत्पाद शुल्क का विकास और जेलों का सुधार...उस उम्र
में, जिसे अधेड़ कहा जाता है, उसने
स्वयम् को नेत्रहीनों की सहायता के विचार को पूरी तरह समर्पित कर दिया. अपनी
स्वाभाविक बेचैनी से वह जर्मनी गया,
जिससे नेत्रहीनों के लिए
स्कूलों के आयोजन के अनुभव को सीख सके – रूस में इस तरह का कुछ भी नहीं था...
पिसोच्नाया
स्ट्रीट का विद्यालय – ख़ुद ही ग्रोत का स्मारक है. जहाँ तक स्मारक का सवाल है, तो उसके निर्माण में बहुत लोगों ने हिस्सा लिया. आरंभ
में छोटी-मोटी रकम ही थी,
जो कब्र पर पुष्पचक्र
ख़रीदने के बाद बची थी,
उसमें लोग चन्दा देने
लगे, चंदा देने वालों में स्कूल के भूतपूर्व विद्यार्थियों
के परिवार भी शामिल थे – सदस्यता शुल्क भी वसूल किया गया. मार्क मत्वेयेविच अन्तोकोल्स्की ने, जिसे
ग्रोत के कार्य के प्रति सहानुभूति थी,
अपने पारिश्रमिक की मूल
राशि काफ़ी घटा दी. वह यूरोप का ख्यातिप्राप्त व्यक्ति था. परिस में रहते हुए वह दो
शर्तों पर इस काम को करने के लिए तैयार हुआ: पहली, उससे
किसी आरंभिक स्केच की मांग नहीं की जाएगी, और, दूसरी,
काम के ब्यौरे पर नज़र
रखने के लिए कोई कमिटी-वमिटी नहीं बनेगी. ये
उचित ही पाया गया. पूरा काम फ्रान्स में करने का प्रस्ताव था. वैसा ही हो भी जाता, अगर सन् 1902 में अन्तोकोल्स्की फेफ़ड़ों की बीमारी से
मर न गया होता. वह घुटनों पर किताब पकड़े नेत्रहीन लड़की का शिल्प बना पाया था. ख़ुद ग्रोत की अर्धप्रतिमा के निर्माण की
ज़िम्मेदारी शिल्पकार की पत्नी ने पैरिस की कार्यशालाओं में से एक – अन्तोकोल्स्की
के शिष्यों को सौंप दी. स्मारक के ग्रेनाइट वाले हिस्से की भी अपनी ही कहानी है. “बोर्ड
ऑफ़ ट्रस्टीज़ ने – जैसा कि रिपोर्ट से ज्ञात होता है, एम.
एम. अन्तोकोल्स्की के वारिसों को ग्रेनाइट वाले भागों की परेशानियों से मुक्त करने
का फ़ैसला किया,
और घोषित अनुमानों के
अनुसार स्मारक के लिए निर्धारित राशि से ही उनका मूल्य चुकाया”. ऐसा झितोमीर शहर के पत्थर-कटाई फ़ैक्ट्री
के मालिक एस. अलेश्केविच की बढ़िया सिफ़ारिशों के कारण किया गया, जिसकी सलाह को मानने का निर्णय किया गया. झितोमीर में
काम पैरिस और पीटर्सबुर्ग की तुलना में काफ़ी सस्ते में हो गया.
मगर
झीतोमीर सब कुछ इतनी आसानी से नहीं हुआ – काफ़ी दिनों तक मोनोलिथ (पत्थर की अखण्ड
शिला) को ढूँढ़ते रहे,
और उसके बाद हड़तालें
शुरू हो गईं. सन् 1905 की सर्दियों में ग्रेनाइट के हिस्सों को पीटर्सबुर्ग भेजना
संभव नहीं हुआ. ये काम,
कुल मिलाकर, उतना सस्ता भी नहीं पड़ा. मगर – काम अच्छा था, ख़ुद अर्थ-मन्त्री मे दख़ल दिया, स्टेट-सेक्रेटरी वी. एन. काकोव्त्सेव ने ग्रेनाइट के
हिस्सों को झीतोमीर से पीटर्सबुर्ग तक मुफ़्त में पहुँचाने की व्यवस्था की.
सिविल
इंजीनियर्स वी. ए.लूचिन्स्की और वी. ए. शेवेल्येव ने स्मारक के हिस्सों को जोड़ने
और उसे स्थापित करने के काम की देख-रेख की. इस विषय में सलाहकार थे प्रसिद्ध
अकादेमिशियन ए.एम. अपेकूशिन. एक अन्य अकादेमिशियन, शिल्पकार वी. पी. त्सैद्लेर ने स्थान का नियोजन किया.
इन
सुयोग्य व्यक्तियों के “विशेष सहयोग” का उल्लेख “ट्रस्टी-मेम्बर्स की असाधारण आम
सभा में किया गया,
जिसका आयोजन सम्राज्ञी
मारिया अलेक्सान्द्रोव्ना के नेत्रहीनों की गार्डियनशिप के पच्चीस वर्ष पूरे होने
के उपलक्ष्य में किया गया था”.15
“नेत्रहीन”
नामक पत्रिका ने इस समारोह की रिपोर्ट देते हुए कई पृष्ठ बधाई के टेलिग्रामों को
समर्पित किए हैं. अन्य बातों के अलावा “कन्स्तान्तिन कार्लोविच ग्रोत की यादें”
शीर्षक से एक कविता भी छपी है,
जो इस प्रकार समाप्त
होती है:
भविष्य में महान
कार्य को तुम्हारे
मिलेगा आशीर्वाद करोड़ों
ज़ुबानों का,
और छत्रछाया में
तुम्हारी आयेंगे
कई दुखी शरण
लेने.
हस्ताक्षर : नेत्रहीन शीलव, कस्त्रोम के नेत्रहीनों के
स्कूल का भूतपूर्व छात्र”.
हमें नेत्रहीनों के स्कूल की एक और भूतपूर्व
छात्रा – एलेना सूप्से का ज़िक्र भी करना होगा. इसी ने पैरिस में अन्तोकोल्स्की के
सामने ‘पोज़’ दिया था.
मतलब, ठण्डे स्तंभ से टिककर जो
लड़की बैठी है, वह काल्पनिक नहीं है, बल्कि एलेना सूप्से है –
ये उसकी छबि है.
हमें शिक्षाशास्त्री कन्स्तान्तिन द्मित्रियेविच
ऊषिन्स्की का भी ज़िक्र करना होगा. लड़की के घुटनों पर उसी की किताब : “बच्चों की
दुनिया” रखी है – ये किताब प्रारंभिक पठन के लिए है.
इतिहासकार, कृषकों के सुधार पर चार खण्डॉं के मौलिक ग्रंथ के
लेखक और नेत्र-विशेषज्ञ अलेक्सान्द्र इल्यिच स्क्रेबित्स्की का भी नाम लेना पड़ेगा. नेत्रहीनों की गार्डियनशिप
की स्थापना ग्रोत ने उसीके साथ मिलकर की थी. ऊषिन्स्की की पुस्तक, जो लड़की के घुटनों पर है –
ये सिर्फ “बच्चों की दुनिया” के अनगिनत प्रकाशनों में से एक नहीं है, बल्कि ये नेत्रहीनों के
लिए पहली रूसी किताब है, जिसकी 300 प्रतियों की आवृत्ति फरवरी 1882 में प्रकाशित हुई थी. इसका
प्रकाशन स्क्रेबित्स्की की ऊर्जा, इच्छा शक्ति, और जुनून की बदौलत ही हुआ था. लिपि का विकास, छपाई का ख़र्च, कई सारी तकनीकी समस्याओं का समाधान – इस सबकी
ज़िम्मेदारी उसने अपने ऊपर ली थी. बाद में स्क्रेबित्स्की ब्रैल का समर्थक बनने
वाला था, मगर उस समय सरकारी कागज़ को
तैयार करने के मिशन के अंतर्गत, जिसके तहत इस किताब को प्रकाश में लाना था (कैसा अद्भुत था ये अंधेरे और
प्रकाश का खेल!...) विशेष प्रकार के कागज़ का आविष्कार करना पड़ा, जो उभरी हुई लिपि के लिए
अनुकूल हो.
स्क्रेबित्स्की की लिपि विएन्ना में बन रही थी, और बीस वर्ष बाद, पैरिस में, अन्तोकोल्स्की ने
अविश्वसनीय सतर्कता से किताब के उन पन्नों के वास्तविक रूप को पुनर्निर्मित कर
दिया, जो नेत्रहीन लड़की ने उसके
स्टूडियो में खोले थे. स्मारक के पास जाकर देखा जा सकता है, कि किताब के उभरे हुए
अक्षरों को दाएँ हाथ की उँगलियों से छूते हुए नेत्रहीन लड़की क्या पढ़ रही है. ये
पृष्ठ नं. 95 है – उभरे हुए अक्षर स्पष्ट नज़र आ रहे हैं. बाईं ओर के पृष्ठ नं. 94
के अक्षर भी दिखाई दे रहे हैं, मगर वे दबे हुए हैं और आईने में प्रतिबिम्बित रूप में दिए गए हैं, ये पृष्ठ पढ़ने के लिए नहीं
है, ये सिर्फ हमारे लिए बंद
किए गए पृष्ठ नं 93 का पढ़ने लायक पिछला भाग है.
पृष्ठ नं 95 के पहले वाक्य का आरंभ पिछले पृष्ठ
पर है, उसे, यदि हम आईने वाले अंश से
यहाँ लाएँ तो लिखा है:
बहुत, बहुत ज़्यादा
...और आगे पृष्ठ 95 पर:
जानता है और करने के काबिल है किसान और उसे किसी
भी हालत में अनाड़ी नहीं कहा जा सकता, हालाँकि वह पढ़ना भी नहीं जानता था, मगर पढ़ना और कई विज्ञानों को सीखना काफ़ी आसान है, बजाय पूरी
- आगे का अंश उँगलियों से ढँक गया है.
अविश्वसनीय स्मारक. ये स्मारक किताब का भी है – मूर्तिमंत किताब का. पीटर्सबुर्ग में
कई “पढ़ते हुए” स्मारक हैं, मगर सिर्फ यहाँ – सचमुच में पढ़ा जा रहा है.
जो हम पढ़ते हैं, उसीके बारे में सोचते भी हैं. ये रही इस स्मारक
की एक और आश्चर्यजनक विशेषता. हमें पक्का मालूम है, कि इतने एकाग्र चेहरे से लड़की क्या सोच रही है.
ये किसी निश्चित विचार का भी स्मारक है.
पीटर्सबुर्ग का ये सबसे हृदयस्पर्शी स्मारक है.
और, हालाँकि यहाँ श्लेष का
उपयोग अनुचित है, फिर भी मैं कहूँगा, कि वह छूकर महसूस करने के लिए उकसाता है – उसे स्पर्श करने को जी चाहता
है. स्मारक निःसंदेह इसी बात को ध्यान में रखकर बनाया गया था, कि लोग उसे छुएँ, और ख़ासकर – पृष्ठ 95 के
शब्दों को. इसके लिए आपको ना तो पंजों पर खड़ा होना, और ना ही झुकना पड़ता है.
उँगलियों से अक्षरों में फ़रक महसूस करते हुए, मुझे याद आया कि कैसे मैं
एक बार हैम्बर्ग में एक असाधारण संवादात्मक प्रदर्शनी में गया था. हमें ये महसूस
करने के लिए कहा गया, कि एक नेत्रहीन की दुनिया कैसी होती है. हरेक को एक-एक छड़ी देकर, हमें ख़ासकर बनाए गए एक
अंधेरे स्थान पर छोड़ दिया गया. हम “रास्ते पर जा रहे थे”, गाड़ियों के शोर को सुनते
हुए हमने सड़क पार की; बाज़ार में पहुँचने पर, ख़रीदारी करने की कोशिश की, स्पर्श से ही फलों और सब्ज़ियों को चुना...आम चीज़ों से भरे हुए एक घर में
गए, मगर अब ये चीज़ें जानी-पहचानी नहीं लग रही थीं.
ऐसा एहसास जिसे प्रकट करना असंभव है. उन्हें मालूम है कि औरों की समस्याओं पर कैसे
ध्यान दिया जाता है.
ये मैं इसलिए कह रहा हूँ, कि काँसे के अक्षरों को
छूते हुए, स्पष्ट समझ में आ जाता है, कि कितने लोगों को ये
स्मारक “अपना” लगता है. और ये है छोटी सी गुप्त जगह जिसमें दो सिक्के समाए हुए
हैं...
पेसोच्नाया पर स्थित स्कूल के शताब्दी वर्ष में
किसी ने शाउम्यान स्कूल के सामने किताब वाली लड़की की मूर्ति चुराने की कोशिश की. कुछ देर
और हो जाती तो फ्रेम पूरी तरह कट जाती... मूर्ति को वहाँ से हटाना पड़ा, कुछ समय तक कन्स्तान्तिन कार्लोविच
की अर्धप्रतिमा नितान्त अकेली ही रही. किसी विशेष तरीके से लड़की की प्रतिमा को वेल्ड
करके बिठाया गया, कहते हैं, कि हमेशा के लिए - अकादमीशियन अपेकूशिन को ऐसा करामाती इंजीनियरिंग का तरीका
बुरे से बुरे सपने में भी नहीं दिखाई देता.
मगर मई 2000 में ग्रोत की अर्धप्रतिमा को चुरा लिया
गया. कुछ दिनों के बाद पुलिस ने उसे ढूँढ़ निकाला. ज़ाहिर है, उसे खरीदना पड़ा.
फ़िलहाल स्मारक पूरा है. चौक की लैण्डस्केपिंग की
गई है. बोर्डिंग स्कूल की तरफ़ से कॉन्क्रीट की जाली को रंग दिया गया है, उस पर विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ
बनाई गई हैं. रंगबिरंगी. सफ़ाई से. हालाँकि सभी नहीं देखते.
अप्रैल 2008
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15.
“नेत्रहीन”, 1906, नं.
11-12. पृ. 203

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