अदृश्य
गोगल
वैसे
तो यहाँ पहले ही एक स्मारक था – ग्रैण्ड ड्यूक निकोलाय निकोलायेविच का. घोड़े पर
सवार आकृति को प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व स्थापित किया गया था, मगर क्रांति के फ़ौरन बाद उसे हटा दिया गया. पाँच साल –
किसी स्मारक के लिए एक पल के समान हैं.
मगर
उस बंधक पत्थर के लिए,
जो शीघ्र ही किसी स्मारक
के निर्माण का वादा कर रहा था,
पचास साल – अनंत काल के
समान हैं.
ठीक
इतने ही समय यहाँ,
मानेझ चौक पर, वह ग्रेनाइट का नाचीज़ निशान पड़ा रहा, जिसका आकार कब्रों पर लगाये जाने वाले निशानों जैसा
था. उस पर ये शिलालेख था:
यहाँ
बनेगा
स्मारक
महान
रूसी लेखक
निकोलाय
वसील्येविच
गोगल का
1852-1952
और नीचे ये सूचित किया गया
था:
शिलान्यास : 4 मार्च 1952
सौ
साल पहले चार मार्च को गोगल का, जैसा कि विदित है,
देहांत हो गया था. और शिलान्यास के एक साल और एक दिन बाद स्टालिन का
निधन हो गया. अगर स्टालिन कुछ और समय ज़िंदा रहता तो यहाँ काँसे का गोगल होता,
क्योंकि स्टालिन के काल में अनिश्चितताओं और अधूरेपन को पसंद नहीं
किया जाता था. जैसा कि सूत्रों से ज्ञात होता है स्मारक का शिलान्यास काफ़ी धूमधाम
से किया गया, भाषण दिये गए, युक्रेनियन
समूह नृत्य प्रस्तुत किये गए, इरादों की स्पष्ट गंभीरता का
प्रदर्शन किया जा रहा था. मगर स्टालिन, जिसका समारोह में
अपरिहार्य उल्लेख किया जा रहा था, मर गया, एक भिन्न कालखण्ड आरंभ हुआ और शिलान्यास वाले पत्थर के बारे में भूल गए.
मगर उसने अपना अस्तित्व बनाए रखा.
समय
के साथ शिलालेख लगभग मिट गया, मगर अस्सी के दशक
के आरंभ में, जब मैंने अपने लिए इस वस्तु की खोज की थी,
तब इसे पढ़ा जा सकता था. शिलान्यास वाले पत्थर के अलावा चौक में कुछ
बेमतलब से ग्रेनाइट के खूंटे भी पड़े थे ( वे अभी भी वहीं हैं – कहीं ये ग्रैण्ड
ड्यूक के पैडेस्टल के टुकड़े तो नहीं हैं?), मतलब, घोषित-पत्थर उनसे अलग नज़र नहीं आ रहा था, कोई भी
उसकी ओर ध्यान नहीं देता था. जैसे वो था ही नहीं. मुझे याद है कि इन धूमिल होते
शब्दों ने मुझे बुरी तरह चौंका दिया था, ख़ासकर अंकों ने,
विशेष रूप से शिलान्यास की तारीख ने, मैंने
फ़ौरन ही ये इबारत अपनी नोटबुक में लिख ली और फ़ौरन यहाँ, मानेझ
पर अपने ‘पात्र’ को भेजा, - वैसे उन्हीं दिनों मैंने लिखना शुरू किया था. “कठिन
चीज़ें” (“टिप्पणियाँ और परिवर्तन”) का नायक ख़यालों में डूबा हुआ ‘मालाया सादोवाया’ से मुड़ता है: “और ये रहा गोगल का
स्मारक, बल्कि, स्मारक की अनुपस्थिति,
- सिर्फ गोगल के साथ ही ऐसा हो सकता है!” अब मेरे नायक के दिमाग़ में,
प्रकट रूप से अमूर्त स्मारक के बारे में एक मौलिक ख़याल आता है : “और,
हो सकता है, वह सचमुच में इस ईश्वर द्वारा
संरक्षित स्थान पर बना हो, बस हम उसे देख नहीं पाते, और अदृश्य निकोलाय वासिल्येविच ग्रेनाइट के पैडेस्टल पर बैठा है, जैसे उस इकलौती प्राचीन तस्वीर में कुर्सी पर बैठा हो, और थकी हुई नज़रों से घटनाओं को देख रहा हो. अदृश्य रूप से उपस्थित...ये तो
गोगल का सबसे बेहतरीन स्मारक है!”
मैं
अब भी यह मानता हूँ, कि गोगल के सभी संभावित
स्मारकों में ये सबसे अच्छा स्मारक था. चाहे कितना भी रहस्यमय, अप्रत्यक्ष हो. मगर – असली. दिमाग़ की कोई सनक नहीं, कोई
रूपक नहीं, “अदृश्य” शब्द से बनी कोई चालाक व्युत्पत्ति नहीं,
बल्कि गोगल का व्यावहारिक स्मारक – ज़रा भी आलंकारिक नहीं, बल्कि सीधे स्पष्ट अर्थ में. वाकई में, जैसे-जैसे
समय ग्रेनाइट के ऊपर लिखी इबारत को मिटा रहा था, नींव का
पत्थर स्मारक की प्रतीक्षा करना बंद कर रहा था, बल्कि वह ख़ुद
ही ‘प्रतीक्षित’ बन गया, - कुछ और “यहाँ”, इस जगह पर, प्रकट
नहीं हुआ. क्या यह तर्कसंगत है? मेरी राय में, हाँ.
सभी
लोग, जिनसे मैंने अपनी खोज साझा की थी, मुझसे सहमत हो रहे थे, और, मुझे
याद है, कि कभी हमारे यहाँ भी अपनी तरह का एक क्लब बन गया था,
जिसके सदस्य अदृश्य रूप से उपस्थित गोगल के स्मारक का सम्मान करते
थे. हम छबि की कल्पना नहीं करना चाहते थे और, ध्यान दीजिए,
मानेझ चौक से सटे हुए दूसरे पार्क में काँस्य तुर्गेनेव के प्रकट
होने पर भी काफ़ी शांत रहे. हालाँकि सन् 2001 के अगस्त में, शायद,
सब परेशान हो गए : यहाँ तुर्गेनेव किसलिए? तुर्गेनेव
क्यों? तुर्गेनेव इसलिए, कि वादा किया
गया था गोगल का.
समझाता
हूँ. रेडिओ स्टेशन के सामने तुर्गेनेव के होने का मतलब ये नहीं है,
कि वह तुर्गेनेव है. बल्कि ये है, कि ये गोगल
नहीं है. सही में, गैर-गोगल है. प्रदर्शनात्मक रूप से काँसे
के गैर-गोगल का उस जगह के पास प्रकट होना, जहाँ बरसों से
गोगल को देखने का इंतज़ार किया जा रहा था – इस बात का संकेत है कि गोगल का असली
स्मारक किसी अन्य वास्तविकता में है, जो उस वास्तविकता से
भिन्न है, जिसे गैर-गोगल-तुर्गेनेव अपने भारी-भरकम वज़न से
बोझिल बना रहा है. इस बात का संकेत है, कि गोगल कहीं पास में
ही है और वह अदृश्य है.
नब्बे
के दशक में जब फिर से मानेझ चौक पर गोगल के स्मारक की बात हो रही थी,
तब “नींव के पत्थर” को भी याद किया गया (इस अभिव्यक्ति को उद्धरण
चिह्नों में रखें, क्योंकि पैडेस्टल का वास्तविक अर्थ तो
हमें अच्छी तरह मालूम है), इस विषय का उत्सुकतावश अख़बारों
में ज़िक्र होने लगा. मगर लिखने वालों में से कोई भी उस अदृश्य स्मारक के अधिकांश
भाग में दृश्य तत्व को पहचान नहीं पाया.
गोगल
के लिए, चाहे अदृश्य ही सही, ये, मेरा ख़याल है कि कठिन समय था. ऐसा लगता था कि
मानेझ चौक के समूचे अंतराल में झगड़े हो रहे है. उनकी गूंज ही हमारी भौतिक जगत की
वास्तविकता को समझा सकती थी : जैसे ही चौक पर ग्रेनाइट की कोई चीज़ प्रकट होती,
उसके साथ फ़ौरन कोई शैतानी हादसा होने लगता. उदाहरण के लिए, सन् 1909 की पतझड़ में मानेझ के दूसरे छोर पर अचानक एक और नींव का पत्थर
प्रकट हो गया – आर्ट्स अकादमी के संस्थापक ई.ई. शुवालव के स्मारक का. जब मालाया
सादोवाया से गुज़रते हुए चौक पर जाने से पहले मैं उससे टकराया और मैंने पढ़ा : “यहाँ
बनेगा स्मारक...” – मैं फ़ौरन गोगल के बारे में परेशान हो गया, मगर, कुछ सोचकर मैंने अपने आप से कहा : इंतज़ार करते
रहो, यहाँ कुछ भी नहीं बनेगा! और मानो मैं पानी में देख रहा
था, जल्दी ही पत्थर गुम हो गया, और
शुवालव का स्मारक, ख़ुद शिल्पकार त्सेरेतेली की रचना, यहाँ नहीं, बल्कि यहाँ से बहुत दूर – नीवा के उस पार,
वासिल्येव्स्की द्वीप पर प्रकट हुआ, आर्ट्स
अकादमी के कम्पाऊण्ड में.
गोगल
का स्मारक भी बना – मालाया कन्यूशेन्नाया पर. ये हुआ सन् 1997 में,
शुवालव से पहले. फ़ौरन घोषणा की गई, कि ये गोगल
का वो ही स्मारक है, जिसका इतने लम्बे अर्से से मानेझ चौक पर
इंतज़ार हो रहा था. मगर किसलिए? वो, जो
मालाया कन्यूशेन्नाया पर खड़ा है – वही मालाया कन्यूशेन्नाया पर खड़ा है, और वो, जिसका वादा “यहाँ”, मानेझ
चौक पर किया गया था, उसे यहीं होना चाहिए – ख़ास तौर से मानेझ
पर. चाहे कितना ही लम्बा इंतज़ार क्यों न करना पड़ा उसका, जो
आख़िरकार मालाया कन्यूशेन्नाया पर प्रकट हो ही गया, और चाहे
कितनी ही उत्सुकता से वो लोगों का ध्यान आकर्षित करे, अदृश्य
गोगल वहीं रहा, जहाँ था.
अदृश्य
गोगल के लिए पैडेस्टल, जिसे लेखक की मृत्यु की
शताब्दी के उपलक्ष्य में बड़ी धूमधाम से किसी साधारण नींव के पत्थर की तरह बनाया
गया था, इस जगह पर आधी शताब्दी खड़ा रहा, जो धरती पर गोगल की आयु से अधिक है. नई सहस्त्राब्दि के आरंभ में चौक के
पुनर्निर्माण से समझौता करने में असमर्थ, रहस्यमय स्मारक
अपने दृश्य भाग में लुप्त हो गया. क्या अदृश्य गोगल लुप्त हो गया? क्योंकि वह स्थान, जिसे “यहाँ” से प्रदर्शित किया
जाता है, यहीं रह गया. और अब इस स्थान पर एक फ़व्वारा है. ये
सही है, कि पीटरबुर्ग के सभी फ़व्वारों की तरह, साल के अधिकांश भाग में वह निष्क्रिय रहता है, लकड़ी
का फ़र्श पाइप को ढांक देता है, जो ज़मीन के भीतर कहीं चला
जाता है. यकीन करना मुश्किल है, कि ये ही गोगल का नया स्मारक
है (या वही – पुनर्निर्मित?). ख़ैर, इस
जगह पर गोगल के अलावा और किसका स्मारक रह सकता है? सिर्फ
वही.
आजकल
यह जगह – नौजवानों के मिलने-जुलने के लिए है. लकड़ी की छत पर चाक से कुछ अनगढ़ शैली
में मनोरंजक चित्र बनाए गए हैं. फव्वारे के विचार को समझाने का मेरा कोई इरादा
नहीं है. हो सकता है, कि वह ख़ुद ही अपने बारे में
बता दे. क्योंकि जो कुछ भी इस जगह पर हुआ है, उस सब में एक
विशेष अर्थ छुपा हुआ है.
इटालियन
शिल्पकार पेत्रो कनोनिका ने, जिसने दुलकी चाल
वाले अर्लोव के चपल घोड़े पर शान से बैठे ग्रैण्ड ड्यूक की काँस्य प्रतिमा बनाई थी,
सोचा कि यह स्मारक हमेशा के लिए है. उसे, करीब-करीब
फ़ौरन ही नष्ट कर दिया गया, मगर पैडेस्टल सालों-साल खड़ा रहा.
तीस के दशक के आरंभ में उस पर (बिना घोड़े के) जर्मन कम्युनिस्टों के नेता कार्ल
लिब्क्नेख्त को स्थापित करने का विचार
किया गया. बात बनी नहीं. गोगल, सौम्य शब्दों में कहें तो,
जर्मनी को पसंद नहीं करता था, जर्मनों को
बर्दाश्त नहीं कर सकता था. मगर इटालियन्स को वह चाहता था और इटली का सम्मान करता
था. वह “रोम” नामक लघु उपन्यास भी लिखना चाहता था. कहते हैं, कि रोम में शिल्पकार पेत्रो कनोनिका के म्यूज़ियम में ग्रैण्ड ड्यूक
निकोलाय निकोलायेविच के नष्ट किए गए मॉडेल का शिल्पकार द्वारा बनाया गया मॉडेल
सुरक्षित रखा है, ये सच है, कि वो
प्लास्टर ऑफ़ पैरिस का है. और जहाँ तक हमारे फ़व्वारे का सवाल है, जो गर्मियों में ज़मीन के भीतर से फूटकर इस आश्चर्यजनक जगह की ओर मचलता है,
उसके चारों ओर आजकल इटालियन आर्किटेक्ट्स, या,
जैसा स्मारक पट्टिका पर लिखा है, “इटालियन मूल
के महान पीटरबुर्गी आर्किटेक्ट्स” हैं, जिन्हें उनके सिरों
द्वारा प्रदर्शित किया गया है. वे ध्यान से फव्वारे की ओर देखते हैं. न जाने क्यों
उनके काँसे के चेहरों के नाक-नक्श में कोई बेहद जानी-पहचाना, अपरिवर्तनीय गोगल जैसा दिखाई देता है. रास्त्रेली और रिनाल्दी को एक ओर
छोड़ दें. रोसी और क्वारेंगी की ओर देखें. रोसी – बिल्कुल ख्लेस्ताकोव (जैसी
ख्लेस्ताकोव ने प्रेरणा के क्षणों में स्वयम् की कल्पना की होगी), क्वारेंगी – बिल्कुल शहर का मेयर! चाहे तो दोनों को पैडेस्टल के स्तंभ से
उतारकर अलेक्सान्द्रिन्का के थियेटर-म्यूज़ियम में ले जाओ!...
ये
सब बहुत अजीब है, मैं आपको बताऊँगा.
वैसे,
क्या आपको मालूम है, कि मानेझ चौक अपने उद्गम
के लिए पर्शिया का शुक्रगुज़ार है? इन वीरान जगहों पर निर्माण
कार्य इसलिए आरंभ हुआ था, कि पर्शियन शाह ने आन्ना इवानोव्ना
को हाथी भेजे थे, - उन्हें अपने महावतों के साथ यहीं बसाया
गया था.
सैद्धांतिक
रूप से तो यहाँ पर्शियन प्रवृत्तियों का प्रभुत्व होना चाहिए था,
ना कि इटालियन प्रवृत्तियों का.
मगर
गोगल!...उसे इटली बेहद पसंद था.
अप्रैल
2007
P.S. (सितम्बर 2008)
जब
नवम्बर 2007 में शहरी मूर्तिकला संग्रहालय में पीटरबुर्ग के अधूरे स्मारकों की प्रदर्शनी
आयोजित की गई, तब यह लेख प्रकाशित हो चुका था. अन्य
स्मारकों के अलावा मानेझ चौक पर गोगल के स्मारक की परियोजनाओं को भी प्रदर्शित किया
गया था. ऐसा पता चला कि सबसे बेहतरीन परियोजना शिल्पकार वी.पी. बूब्लेव की थी,
इसीको तो स्थापित करने की सिफ़ारिश की गई थी, मगर,
आह, आह!....ये अविश्वसनीय प्रतीत होगा,
मगर अस्सी के दशक के आरंभ के मेरे पात्र ने, जिसका
ऊपर उल्लेख हो चुका है, उस समय “अदृश्य” गोगल की छबि का अनुमान
लगभग लगा लिया था: अमूर्त स्मारक को, जैसा कि पता चलता है,
सचमुच में इस विशेषता के अनुरूप होना चाहिए था “ग्रेनाइट के
पैडेस्टल पर, जैसे उस इकलौती प्राचीन तस्वीर में
कुर्सी पर बैठा हो”. मगर, क्या मूर्तिकार
की कल्पना के अनुसार उस अमूर्त शिल्प में गोगल दाएँ हाथ से छड़ी का सहारा लेना चाहता
था (जैसा उस क्लासिक तस्वीर में दिखाया गया है), मगर इस छड़ी को
मुड़े हुए घुटने के पास रख लिया. अपने पुराने पात्र की अतीन्द्रीय शक्तियों पर अचरज
करते हुए मैं मानेझ चौक वाले स्मारक के अंतिम डिज़ाइन पर आश्चर्य करता रहता हूँ. फिर
से तुर्गेनेव!...वो, तुर्गेनेव, जो ग़ैर-गोगल
है, अमूर्त गोगल से काफ़ी मिलता-जुलता है, बजाय उसके, जो परियिजना में शेष है, ऐतिहासिक कुर्सी पर बैठे गोगल के ज़्यादा निकट है!...मूर्त तुर्गेनेव और परियोजना
वाले गोगल के बीच समानता औपचारिक रूप में है : दोनों बैठे हैं और दोनों ही छड़ी पर झुके
हैं. क्या ये सचमुच में तुर्गेनेव है? और जहाँ तक तुर्गेनेव–ग़ैर-गोगल
है, क्या सचमुच में गैर-गोगल है?...इस तरह
के दसियों सवाल किए जा सकते हैं, मगर इस विषय को समाप्त करना
बेहतर है. मानव-मस्तिष्क इस समस्या का हल ढूँढ़ने में असमर्थ हैं.


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