मूली?...कद्दू?...दलिया?
पुराने मानेझ
चौक को तुर्गेनेव के स्मारक के लिए ख़ास तौर से इस वजह से उपयुक्त पाया गया, कि बगल
में ही, मालाया सादोवाया पर देमिदोव्स्की होटल में (जो प्रवासी
कलाकारों के लिए है) भावी क्लासिक की मुलाकात पलीना विआर्दो से हुई थी. मगर उसी
तर्क से यहाँ पर तुर्गेनेव का नहीं,
बल्कि ख़ुद विआर्दो का
स्मारक बनाना चाहिए था. ऊपर से,
अगर अंत तक विचार करें, तो मानना पड़ेगा कि पलीना विआर्दो का स्मारक यहाँ
ज़्यादा उचित होता.
वाकई
में, पार्श्वभूमि के रूप में यह अत्यंत उत्कृष्ट इमारत (न
जाने क्यों) अधेड़ उम्र के तुर्गेनेव के लिए सर्वोत्तम स्थान नहीं है, मगर जवान विआर्दो के स्मारक के लिए वह पूरी तरह उचित
होता. बाईस साल की विआर्दो समूची यूरोपीय ख़्याति के प्रकाश में दमक रही थी, वह उससे तीन साल बड़ा था, और तब
तक सफ़ल कवियों में उसकी गिनती नहीं होती थी. फ्रांसीसी, स्पैनिश
बाप की बेटी,
पलीना विआर्दो, काँसे में ढलकर, इटालियन
शिल्पकारों द्वारा प्रदर्शित अनुशासित-आकर्षक मर्दों की कम्पनी को सुशोभित करती, जिनकी अर्ध आकृतियाँ वहीं, मानेझ
चौक पर लगाई गई हैं… और ये बात,
कि तुर्गेनेव
अलेक्सान्द्रीन्स्की थियेटर जाया करता था, जो
यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं है,
ये भी तुर्गेनेव के
स्मारक के बारे में कोई ठोस तर्क नहीं है, - प्यार
में डूबा हुआ कवि इतने उत्साह से “सेविल्ले के नाई” के अलावा और कहाँ जा सकता है –
विआर्दो के अभिनय पर तालियाँ बजाने,
जो रोज़ीना का रोल कर रही
थी? अगर उस समय तुर्गेनेव से पूछते, कि पीटर्सबुर्ग में किसका स्मारक बनना चाहिए, उसका या उसकी प्रियतमा का, तो वह
निःसंदेह कहता कि प्रियतमा का. इन बंधनों के बारे में हम जो चाहें, सोच सकते हैं, मगर
तुर्गेनेव का सर्वोत्तम स्मारक होता – विआर्दो का स्मारक. कम से कम यहाँ, इस जगह.
ज़िंदगी में कुछ ऐसा हुआ कि विआर्दो की तीन
लड़कियाँ और एक लड़का था,
और उसने तुर्गेनेव की
दर्जिन एव्दोत्या एर्मलाएव्ना से हुई बेटी के पालन-पोषण की भी ज़िम्मेदारी उठाई थी.
मगर यहाँ भी “स्थान की स्मृति” निरंतरता का सुझाव दे सकती है : पहले इस छोटे से
चौक में एक शिल्प बनाया गया था,
जो मातृत्व को समर्पित
था – सिमेन्ट की बनी माँ और दो खिलखिलाते हुए सुखी बच्चे.
इस
शिल्प-परिवार को मैंने उसके विध्वंस के दुर्दैवी दिनों में देखा था. माँ के बिना
नाक के चेहरे को छैनी के मोटे-मोटे घावों से वैसे ही विकृत कर दिया गया था, और खाली ढाँचा बच्चों के खोये हुए अंगों को बड़ी
संवेदना से प्रकट कर रहा था. समय ने कलात्मक अभिव्यक्ति को नई दिशा प्रदान की – वो, जिसे पहले समाजवादी यथार्थवाद कहा जाता था, अब उदास अतियथार्थवाद कहलाया जाने लगा. मगर बेंच पर
बैठकर बियर पीते हुए (जो चौक में आने वालों का आम शौक था) ना तो मातृत्व की
ख़ुशियों की और ना ही सुखी बचपन की कल्पना की जा सकती थी, बल्कि जीवन की क्षणभंगुरता और मृत्यु की आहट का एहसास
होता था.
स्मारक
के लिए तुर्गेनेव के मृत्योपरान्त मास्क का उपयोग किया गया था. जब स्मारक का
उद्घाटन किया जा रहा था,
तो इस बात का ज़िक्र सभी
रिपोर्ट्स और भाषणों में किया गया,
- ये मान सकते हैं, कि मास्क वाली बात को जीवित (असल में, मृत) तुर्गेनेव के साथ समानता की कटिबद्दता के रूप में
देखा जा रहा था. समानता है. मास्क की तुलना में स्मारक का चेहरा अधिक जीवित प्रतीत
होता है (मास्क की तस्वीर आसानी से
इंटरनेट पर मिल सकती है) – खूब भीतर धँसे गालों को ठीक कर दिया गया, नाक की हड्डी सीधी कर दी गई, जो जीवन समाप्त होने पर अचानक मुड़ गई थी. मगर सबसे
महत्वपूर्ण बात तो रह गई – चेहरे का भाव, जो यदि
मौत की पीड़ा को नहीं,
तो किसी अलौकिक, पारलौकिक भाव को प्रकट कर रहा था. ये कहने को जी चाहता
है, कि स्मारक-तुर्गेनेव का चेहरा – ये वो ही
मृत्योपरान्त-मास्क है,
जिसने बस आँखें खोल दी
हैं.
मास्क
को मृत्यु के कुछ घण्टों बाद निकाला जाता है. ये मान सकते हैं, कि स्मारक का “ज़िंदा” चेहरा, आईने में मृत्यु का प्रतिबिम्ब है, जिसके पहले वो ही समय होता है (जो मानव-तुर्गेनेव की
मृत्यु के ऐतिहासिक, “सही” समय से मेल खाये, ये
ज़रूरी नहीं है).
दाहिने
हाथ से तुर्गेनेव छड़ी का सहारा लिए हुए है. यदि वह स्वयम् को हाथ में राजदण्ड पकड़े
किसी शासक को चित्रित नहीं करता है,
तो इस स्थिति का सिर्फ
एक ही मतलब हो सकता है : खड़े होने की तैयारी. किसलिए? सवाल
सीधा नहीं है. चेहरे के भाव से,
और संतुलन की
विश्वसनीयता से काँसे का तुर्गेनेव कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करने की तैयारी
दिखा रहा है,
हो सकता है, जो ख़ुद उसे भी ज्ञात नहीं है. कुल मिलाकर ये तैयारी
नंबर एक है.
मगर
तुर्गेनेव आख़िर किस बात की तैयारी कर रहा है? किस
प्रकार के “सत्य के क्षण” का वह अनुभव कर रहा है?
इटालियन
स्ट्रीट वाले स्टाल को हटा दिये जाने के कारण अब पुराने मानेझ-चौक पर बिअर नहीं पी
जाती, मगर पैनकेक के शौकीनों के लिए (स्टाल नज़दीक ही है)
ऑस्ट्रेलिया में निर्मित तीन बेंचें हमेशा पड़ी रहती हैं (ये सेंट पीटर्सबुर्ग की
300वीं सालगिरह पर आरंभिक तोहफ़ों में से एक विदेशी तोहफ़ा था – कहते हैं कि इन
बेंचों को मेलबोर्न शहर के नेत्रहीन कारीगरों ने बनाया था). पैनकेक्स के खवैये
संमिश्रित भावों से तुर्गेनेव की ओर देखते हैं. जैसे उसकी कोई बात उन्हें परेशान
कर रही है.
चलिए, हम भी उसकी पोषाक की ओर देखें. उसके कोट की एक ही बटन
लगी है. पहली नज़र में ऐसा प्रतीत हो सकता है, कि हम
तुर्गेनेव को उसी रोनी सूरत में देख रहे हैं, जिसमें
पैरिस के सुदूरवर्ती क्षेत्र में ए.एफ. कोनी ने उसे देखा था, जब उसने पाया कि वृद्ध हो चले लेखक के गर्मियों वाले
कोट में पर्याप्त बटन नहीं हैं. नहीं,
ध्यान से देखने पर, हमें कोट पर तीन बटन्स दिखाई देते हैं – फंदों की
संख्या को देखते हुए,
ये पूरे हैं. मगर न जाने
क्यों तुर्गेनेव पर कोट अजीब ढंग से बैठा है, - जैसे, तुर्गेनेव ने बटन को सही फंदे में नहीं डाला है. सही
है, यकीन करना आसान है, कि बटन
सही फंदे में नहीं लगा है,
मगर वो जो ग़ौर से देखने
पर नज़र आता है,
उस पर यकीन करना मुश्किल
है. कोट का एक पल्ला – काफ़ी! – लम्बा है दूसरे पल्ले से! जब तक तुर्गेनेव बैठा है, तब तक इस पर ध्यान नहीं जाता (मगर हमारे लिए नहीं!), मगर यदि वह खड़ा हो जाए, तो सब
को उसकी पोषाक का जंगली फ़ैशन नज़र आयेगा. शोख-बो-टाई बस मास्करेड का ही आभास देती
है!
इवान
सिर्गेयेविच तुर्गेनेव कभी-कभी स्वयँ को चौंकाने की इजाज़त देता था.
एक
अन्य संस्मरण लेखक – काउन्ट सोलोगुब13 की गवाही भी हमारे लिए बहुत
महत्वपूर्ण है.
स्मारक
का शानदार परिवेश हमें तुर्गेनेव की ज़िंदगी की एक अद्भुत घटना की याद दिला देता
है. बात हो रही है “लन्दन के पागलपन” की, जिसके
बारे में काउन्ट व्लादीमिर सोलोगुब के संस्मरणों से पता चलता है, जिन्होंने ख़ुद इवान सिर्गेयेविच की मौखिक कहानी को लिख
लिया था. एक बार लेखक को लन्दन के एक “सुपर-एलीट” क्लब में जाने का मौका मिला
(“टिप-टॉप” – तुर्गेनेव की ही तर्ज़ पर संस्मरण लेखक दुहराता है). वातावरण की
कृत्रिमता ने तुर्गेनेव को चौंका दिया : “ प्रवेश-कक्ष से ही मुझे इस इमारत की
शान-शौकत से कंपकंपी होने लगी”. ये तो कम है, कि
तुर्गेनेव को सफ़ेद टाई पहन कर आना था – “वर्ना हमें अंदर नहीं जाने देते” (शायद, टाई के बगैर स्मारक को भी इस चौक पर प्रवेश नहीं
मिलता), बटलरों के, जो “हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सदस्यों जैसे ज़्यादा लग रहे थे”, “पवित्र
कामों” से उसे अचरज और डर लग रहा था,. मीट के
कटलेट्स देते हुए,
वे असाधारण गंभीरता से घोषणा करते : “पहला कटलेट”, “दूसरा
कटलेट”, “तीसरा कटलेट”. “मुझे ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरी पीठ पर चींटियाँ रेंगने लगी हैं...”
तुर्गेनेव को जैसे किसीने दबोच लिया था. उसके अनुसार ये “कोई उन्माद” था. “मैं
शक्तिहीन हो गया!...दम घुट रहा है यहाँ, मेरा
दम घुट रहा है!...मुझे रूसी शब्दों से स्वयम् को सान्त्वना देनी चाहिए!” ये हैं वे
शब्द, जो वह मेज़ पर मुट्ठी मारकर “पागल के समान
चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा” : “मूली! कद्दू! घोड़ी! शलजम! बाबा! दलिया! दलिया!” – कई
सालों बाद तुर्गेनेव की ये चीखें रमान जैकबसन14 के सूक्ष्म भाषाई विश्लेषण का विषय बनने वाली थीं. प्रसिद्ध भाषा शास्त्री और संकेत-वैज्ञानिक
ने पूरी गंभीरता से तुर्गेनेव के उद्गारों का विश्लेषण किया है.
स्मारकों
को इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता कि वे कहाँ देख रहे हैं. छड़ी पर झुका हुआ तुर्गेनेव
स्टाल की तरफ़ देख रहा है,
जहाँ पैनकेक्स बेचे जाते
हैं. ये स्टाल सिर्फ “संदर्भ का तत्व” ही नहीं है. ये तथ्य कि स्टाल लगभग स्मारक
के उद्घाटन के साथ ही खुला था,
हमें एक बात का यकीन
दिलाता है: दोनों,
मतलब स्टाल और स्मारक, अपनी ही तरह की संरचना है. पैनकेक के मेनू पर नज़र
डालिए. कुछ साल तक इसकी ख़ास डिश थी “पैनकेक विथ पॉपी, कोलम्बियन”
(इसे सन् 2006 में रोक दिया गया),
सबसे ज़्यादा समय तक
“ग्रीक” पैनकेक्स और तथाकथित “e-mail
with mushrooms in cream”
बिकते रहे. ये कहना न्यायसंगत होगा,
कि यहाँ साधारण पैनकेक्स
भी मिलते हैं,
मगर, ये तुर्गेनेव को न समझ में आने वाले “e-mail with mushrooms in cream”,
हो सकता है, यही वो अंतिम बिंदु हो, जो इस
ठाठ-बाट के अनिच्छुक कैदी के सब्र का प्याला छलका देता हो. ये सर्वविदित है कि
स्मारक – भाषा-विहीन होते हैं. मगर,
खड़े होने पर, काँसे का तुर्गेनेव अपने तिरछे, लगभग जोकर जैसे कोट से, जिसका
बटन गलत लगा है,
सबको चौंकाने में समर्थ
है, और ये वैसा ही होगा, जैसे
वह – “उन्माद में” (जैसे तब) - रूसी में चिल्लाया हो :
“पैनकेक!”
मार्च 2007
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13.
वी.ए.सोलोगूब. संस्मरण. मॉस्को-लेनिनग्राद,
1931, पृष्ठ 445-448.
14. लेख “ गूढ़ तुर्गेनेव”
: रमान जेकब्सन की पुस्तक “Works on Poetics” पृष्ठ 251-255.

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