उत्तरार्ध
ये किताब
“पीटर्सबुर्ग के स्मारकों के रहस्यमय जीवन” का उत्तरार्ध है, जो सन्
2008में प्रकाशित हुई थी. कुछ संशोधनों के साथ उसे सन् 2009 में पुनःप्रकाशित किया
गया. इसके बाद वाले प्रकाशनों में संशोधन लागू नहीं किये गए. इस बीच समय गुज़रता
रहा, और पीटर्सबुर्ग के स्मारकों की दुनिया आम तौर से चलती
रही, ऊपर से देखें तो, बिना
किसी विशिष्ठता के. मगर – आम तौर से था, मगर
उसके व्यक्तिगत प्रतिनिधियों के साथ नाटकीय घटनाएँ हुईं.
शुरुआत, शायद,
इसीसे करना भी चाहिए
- पिछली किताब के नायकों का जीवन कैसा
रहा.
मगर
पहले, कुछ टिप्पणियाँ.
ग्रेनाइट
के, कॉन्क्रीट के, काँसे
के – और चाहे किसी भी चीज़ के – स्मारक सिर्फ दिखने में ही कठोर और आत्मविश्वास से
परिपूर्ण प्रतीत होते हैं. असल में वे अत्यंत तनावग्रस्त होते हैं, जिसे,
अगर वे व्यक्ति होते, तो मानसिक तनाव कहा जा सकता था. उन्हें हमेशा डरना
पड़ता है, क्योंकि वे निरंतर लोगों के सम्पर्क में रहते हैं, जो परिवर्तनशील प्राणी होते हैं और बिल्कुल भी
स्मारकों के समान नहीं होते.
स्मारक
– वही वस्तुएँ हैं,
जिनके माध्यम से मानव
इतिहास सर्वाधिक स्वेच्छा से अपनी तथाकथित विडम्बना को प्रकट करता है. कोई भी
स्मारक देर-सबेर इस क्रूर विडम्बना का शिकार हो ही जाता है, और कम से कम इसीलिए उनमें से हरेक हमारी सहानुभूति के
योग्य है. स्मारकों का मज़ाक उड़ाना बेवकूफ़ी भी है और घृणास्पद भी है. बेवकूफ़ी –
वैसा ही, जैसा बेवकूफ़ीभरा है ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के साथ छेड़छाड
करना. घृणास्पद – वैसा ही,
जितना घृणास्पद है
असुरक्षित लोगों का अपमान करना. मुझे आश्चर्य होता है, कि वे
लोग जो मृत्युदण्ड के ख़िलाफ़ हैं,
अक्सर किन्हीं विशिष्ठ
स्मारकों को नष्ट करने का स्वागत करते हैं. स्मारक का तो इसमें कोई दोष नहीं है, कि वह स्मारक है. उसका दोष नहीं है, कि वह फलाँ-फलाँ का स्मारक है, वह,
हो सकता है, किसी और का स्मारक होना चाहता था – किसी ‘ओ-हो-हो’
का, मगर ये उसके नसीब में नहीं था. उसका दोष नहीं है, कि आजकल के लोगों की नज़रों में वह उसका स्मारक नहीं है, जिसका-होना-चाहिए, बल्कि उसका
है-जिसका-आज-नहीं-होना-चाहिए. उसका
दोष नहीं है,
कि वह न जाने कबसे
स्मारक है बिल्कुल इसका
नहीं, बल्कि एकदम दूसरे का – अपने युग की पसंद का, उसकी
आकांक्षाओं और भ्रांतियों का,
शाश्वतता के बारे में
उसकी धारणाओं का,
क्योंकि चाहे स्मारक का
अनावरण कभी भी क्यों न हुआ हो,
ऐसा लगता है, कि वह हमेशा के लिए है. अपने कलात्मक मूल्य के लिए वह
उत्तरदायी नहीं है. स्मारक आम तौर से किसी भी बात के लिए दोषी नहीं होते और
उत्तरदायी भी नहीं होते. अंततः हमें ये समझ लेना चाहिए और इससे समझौता भी कर लेना
चाहिए.
तो, अब विशिष्ट के बारे में.
सबसे
पहले – नुक्सान के बारे में. लेनिन का स्मारक, “मज़दूर” कारखाने में, सन् 1954में
स्थापित, शिल्पकार एस. डी. मेर्कूरव, कॉन्क्रीट
का. मेरे लिए वह सहायक किरदार था – किताब में उसका ज़िक्र अन्य स्मारकों के संदर्भ
में आया है, जो उसके प्रतिरूप थे (बॉटनिकल गार्डन में स्थापित लेनिन). लेनिन की तीसवीं पुण्यतिथि के अवसर पर
स्थापित इस स्मारक ने काफ़ी कुछ झेला है, जिसमें
आग्नेयास्त्रों और चाकुओं का इस्तेमाल करते हुए हमला बोलकर उस उद्यम पर कब्ज़ा करने का प्रयास भी शामिल था (2004).
मैंने स्मारक को
अच्छी हालत में नहीं पाया ( कारखाने में घुसकर लेनिन का फोटोग्राफ लेने के लिए
चतुराई से काम लेना पड़ा). स्मारक घिस गया था,
उसके परखचे उड़ गए थे, वह बहुत भद्दा लग रहा था,
मगर ये सब ठीक ही लग रहा था, बाह्य रूप आसपास
के औद्योगिक परिवेश के अनुरूप ही था, जो श्रम की उच्च उत्पादकता
का वादा नहीं कर रहा था. स्मारक उत्पादन की मंदी के काल के औद्योगिक परिदृश्य में
पूरी तरह फिट हो रहा था. इसे सन् 2009 में, पुस्तक के
प्रकाशित होने के फ़ौरन बाद हटा दिया गया (और उम्मीद करता हूँ, कि किताब के कारण नहीं). स्मारक को नष्ट करना दुर्भाग्य से लेनिन के
स्मारकों की सुरक्षितता के हालात के बारे में मेरे सैद्धांतिक विचार के प्रतिकूल
था; जिन स्मारकों की ओर प्रवेश नियंत्रित होता है, उन्हें कोई ख़तरा नहीं होता, ये मेरी मान्यता गलत
साबित हुई, जिसे मुझे अब स्वीकार करना होगा.
(कृपया ध्यान दें,
कि सिर्गेइ मेर्कूरव के एक अन्य शिल्प के – कीएव में स्थापित लेनिन
का ग्रेनाइट का स्मारक, जिसे सन् 1939 में न्यूयॉर्क में
विश्व प्रदर्शनी में दिखाया गया था - दिसम्बर 2013 में
मैदानी कार्यकर्ताओं द्वारा हथोड़ों से टुकड़े कर दिये गए, जिसके
बाद सन् 2014में युक्रेन में लेनिन का पतन शुरू हुआ था, मगर
ये इतिहास हमारी किताब के लिए नहीं है).
फिनलैण्ड रेल्वे स्टेशन के
पास वाले लेनिन के स्मारक का ज़िक्र “मोहकता बढ़ाने के उपाय” वाली किताब में किया
गया है – एक वस्तु के रूप में, जिसके वास्तविक
आकर्षण को फव्वारे लगाकर कम करने की कोशिश की गई है. किताब में इसका विवरण बहुत
छोटा है, प्रासंगिक है, मगर फिर भी ये
बताना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ< कि इस स्मारक पर
अप्रैल 2009 में अज्ञात कार्यकर्ताओं द्वारा रात को हमला किया गया – उसे उड़ा दिया
गया, बेहद नुक्सान पहुँचाया गया, जिसके
बाद लकड़ी की खोल में बंद कर दिया गया, जिसमें वह करीब सात
महीने रहा. 24 नवम्बर की रात को उसके पुर्जे –पुर्जे अलग करके पुनर्निमाण के लिए
लीगवो के निकट के मरम्मत करने वाले वर्कशॉप में भेज दिया गया. मरम्मत के बाद,
विस्फोट के एक साल बाद, उसे फिर से अपनी पहली
जगह पर स्थापित कर दिया गया.
किताब के प्रमुख नायकों
में से एक – पियोनेर्स्काया स्ट्रीट पर च्कालव के स्मारक - की किस्मत बिल्कुल अजीब
रही, - मेरी किताब में वह “पाइप पर च्कालव” शीर्षक
से दिया गया है, क्योंकि वह ज़मीन में गड़े हुए पाइप से जुड़े
हुए कॉन्क्रीट के सिर को प्रदर्शित करता है. अनधिकृत, बियर
स्टाल्स के पीछे ख़ुद शिल्पकार द्वारा पेरेस्त्रोयका के अंत में रूस से जाने के
पहले स्थापित, “पाइप पर च्कालव” वकत की चुनौतियों को सहा,
नष्ट किए जाने की धमकियों को बर्दाश्त किया और, अब खुले आम कहा जा सकता है, कि वह डटा रहा. न सिर्फ
उसके सिर के ऊपर लगा हुआ हुक निकाल दिया गया, न सिर्फ पाइप
समेत उसे रंगा गया – उसके चारों ओर की जगह को भी ख़ूबसूरत बनाया गया: वीरान जगह को
पार्क में बदल दिया गया, अनोखे पौधों को लगाया गया और चारों
ओर की पोपड़े निकली हुई सुरक्षा-दीवारों को नया रूप दिया गया, उन्हें अरोनॉटिक्स के क्षेत्र में घरेलू उपलब्धियों के चित्रों से सजाया
गया (मझाय्स्की, त्सिआल्कोव्स्की, गगारिन).
मैं यहाँ इस क्षेत्र के सौंदर्यीकरण के सिद्धांतों पर चर्चा नहीं करना चाहूँगा और
इस परियोजना की विचारधारा पर तो बिल्कुल ही नहीं (एक बार च्कालव के ऊपर वाली
सुरक्षा दीवार को डेप्युटी का चित्र सुशोभित कर रहा था) – अच्छी तरह से समझते हुए
कि स्मारक सही-सलामत है (और हम हर तरह के स्मारकों की हिफ़ाज़त करते हैं). जिस तेज़ी
से स्मारक का सामाजिक स्तर बदला, वह विस्मयकारी है, -
एक अवैध आप्रवासी से वह उस क्षेत्र का सम्माननीय निवासी बन गया.
यह स्मारक च्कालव का
स्मारक बाद में है. पहले – वह स्मारक है आधुनिकता का : नब्बे के दशक में,
जब वह बियर के स्टाल्स के पीछे छुपा हुआ था, वह
देश के विघटन और विनाश के युग का स्मारक था, अब, देशभक्ति प्रदर्शित करते हुए कह सकते हैं, कि वह स्मारक
है – ग्लैमर की सम्पूर्ण सत्ता के युग का, हालाँकि, ये युग भी, शायद, पूरा होने जा
रहा है. आगे क्या होगा – देखेंगे.
पीटर्सबुर्ग के स्मारकों की बात हो और काँसे
के घुड़सवार का ज़िक्र न हो, ये नामुमकिन है. उसका,
बेशक, किताब में ज़िक्र तो किया गया है, मगर एक ज़रूरी टिप्पणी के साथ, कि “काँसे का घुड़सवार –
हमारा ‘हीरो’ नहीं है”. फिर भी शहर का
मुख्य स्मारक होने के नाते उसका भी यहाँ उल्लेख होना चाहिए. इसलिए मुझे यह कहना
पड़ेगा कि “काँसे के घुड़सवार” के साथ सब ठीक है, हालाँकि सन् 2014
के मई में अनचाहे ही वह त्रासदी का अपराधी बन गया. विजय-दिवस की पूर्व संध्या को
कोई टूरिस्ट धृष्ठता से पैडेस्टल पर चध्अ गया और घोड़े के खुरों के नीचे बैठकर
सेल्फी लेने की कोशिश करने लगा, मगर अपना संतुलन खो बैठा,
सिर के बल चट्टान से नीचे गिरा और फ़ौरन मर गया. हर कोई इस घटना से
अपना-अपना प्रतीकात्मक निष्कर्ष निकालना चाहता है – मैं तो सीधे-सीधे कहूँगा:
स्मारकों से मज़ाक नहीं करते.




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