ग्रेट मॉस्को स्ट्रीट
के अंत में
उसे ठण्ड महसूस होती है,
ख़ास तौर से बारिश के बाद, जब मोटी-मोटी बूंदें
उसकी पीठ से बहती हैं. धूप के दिनों में वह लम्बी परछाई डालता है, और, जब वह चर्च की तरफ़ बढ़ती है, तब वह उसे देखता है. जैसे वह अभी सिर उठाएगा और कुछ कहेगा, मगर फ़िलहाल ख़यालों में डूबे हुए उसने विनिमय दर की और ज्वेलरी की दुकान के
साइनबोर्ड्स से मुँह मोड़ लिया है – साइनबोर्ड बहुत बार बदलते हैं, मगर इस “फिलहाल” को लम्बा खिंचते जाना है. कई लोगों को याद है कि वह
ग्रेनाइट का है, और सही है – उसे जैसे पत्थर से तराशा गया हो,
हालाँकि ये काँसे का स्मारक है, सिर्फ
पैडेस्टल ग्रेनाइट का है.
वह – इन्सान जैसा है. उस अर्थ
में नहीं, कि इन्सान से काफ़ी मिलता है (सचमुच
मिलता है – पिरोव के प्रसिद्ध पोर्ट्रेट से), बल्कि उस अर्थ
में, कि अत्यंत सक्रियता से – जितना, आम
तौर से, स्मारकों के लिए संभव है – व्यवहार में ख़ुद को प्रकट
करता है : कभी घटनाएँ बनाता है, कभी ज़्यादतियों के लिए
प्रेरित करता है, कभी घटनाओं को उकसाता है. एक शब्द में,
जीता है. और लोगों के बीच में रहता है.
इनमें से पहली घटना पर
अलेक्सान्द्र सकूरव ने डॉक्युमेन्ट्री फिल्म बनाई थी,
जिसका शीर्षक भी यही था : “पीटर्सबुर्ग की डायरी. दस्तयेव्स्की के
स्मारक का उद्घाटन”. किसी भी स्मारक का जीवन, ज़ाहिर है,
उसके उद्घाटन से शुरू होता है, मगर 30 मई 1997
को जो कुछ हुआ, वह सकूरव की मेहेरबानी से न सिर्फ ऐतिहासिक
तथ्य का, बल्कि एक ख़ास सामूहिक अनुभव का भी गवाह रहेगा.
“ख़ामोश बैठो, फ्योदर मिखाइलविच”, अन्द्रेइ बीतव ने कहा, और ये वाक्य, जो शायद, संदर्भ से बाहर हास्यपूर्ण है, उस समय अजीब तरह से प्रासंगिक लग रहा था. बीतव प्रासंगिकता के बारे में कह
रहा था - इस समय के फॉर्मूले – “चर्च और बाज़ार के बीच” - के अनुसार स्मारक की
“प्रासंगिकता” के बारे में कह रहा था. कह रहे थे, कि जैसे वह
हमेशा यहीं था. सर्वाधिक पीटरबुर्गी लेखक के प्रति ये शहर का कर्तव्य ही है.
शस्ताकोविच ने चर्च के समूह गान में बाधा नहीं डाली, गवर्नर
ने स्मारक के निर्माताओं के नामों का उल्लेख किया : ल्युबोव मिखाइलव्ना खोलिना,
प्योत्र (उसका बेटा) और पावेल (उसका पोता), दोनों
का कुलनाम इग्नात्येव था...और जब भाषण ख़त्म हुए और शहर के अधिकारीगण कारों में बैठ
गए और अनिमंत्रित लोगों को स्मारक के पास छोड़ा गया, तो
कैमेरा उस चीज़ पर केंद्रित हो गया, जो सकूरव के लिए हमेशा
प्रमुख है – लोगों के चेहरों पर – उनके, जो सिर्फ कुछ देर के
लिए आये थे, देखने के लिए, थोड़ा सा खड़े
रहने के लिए. और ये – हाँ, दस्तावेज़ है.
“लोगों के चेहरों पर अक्सर
नज़र डालना चाहिए”, पीछे से आवाज़ आई.
“शायद इसलिए,
कि उनसे ज़्यादा प्यार करें”, सकूरव की आवाज़
कहती है. “और, शायद, इसलिए कि साहित्य
हमसे दूर न हो जाए”.
यहाँ कुछ अत्यंत व्यक्तिगत
है – चेहरों के और साहित्य के बारे में.
तो,
प्यार के बारे में...
सन् 2010 से,
जुलाई के पहले शनिवार को (“जुलाई के आरंभ में, बेहद गर्म मौसम में, शाम को एक नौजवान अपनी कोठरी से
निकला...”)... यदि किसी को मालूम नहीं हो तो बता दूँ, कि आम
तौर से जुलाई के आरंभ में पीटर्सबुर्ग में ‘दस्तयेव्स्की-दिवस’
मनाया जाता है. कई अर्थों में यह ख़ुशी का त्यौहार है. “दस्तयेव्स्की
Forever”, “दस्तयेव्स्की राज कर रहा है!”, “रोद्या, तुम सही नहीं हो!” – पोस्टर्स, उपन्यासों के नायकों के जुलूस, प्रदर्शन, प्रचार, भीड़-नाट्य. और क्या? दस्तयेव्स्की
का सनकीपन के प्रति झुकाव था, उसमें विनोद की भावना थी – हो
सकता है, अपनी ही तरह के ख़ास विनोद की भावना हो, मगर थी. मज़ाक और शरारत पसन्द करता था. मगर बात ये भी नहीं है. ये बात नहीं
है, कि दस्तयेव्स्की “हमारा सब कुछ” है, बल्कि अभी वह हमारे लिए मानो हमारे जैसा है (हमें, शायद,
ऐसा लगता है, जब हम “रोद्या, तुम सही नहीं हो!” इस पोस्टर को समझते हैं). सोल्झेनीत्सिन के नायकों से
हम इतनी बेतकल्लुफ़ी से पेश आयेंगे, इस बात की कल्पना करना भी
मुश्किल है. मगर दस्तयेव्स्की के पात्रों के साथ ही जैसे हम बड़े हुए हैं.
और ग्रेट मॉस्को स्ट्रीट
के अंत में खड़े दस्तयेव्स्की को इस बारे में सबसे ज़्यादा मालूम होगा. लोगों के
बदलते मूड को उसने झेला है. उद्घाटन के आरंभ में दिखाए गए सम्मानों की गंभीरता ने
पाठकों और प्रशंसकों के भावी आनन्दोत्सवों की संभावना को बदला नहीं था. और,
ये देखिये, उसकी आँखों के सामने और लोगों को
ख़ुशी प्रदान करते हुए , नियत समय पर ग्रेनाइट की चौकियों पर
“अपराध और दण्ड” के पात्रों की जीवित मूर्तियाँ प्रकट हो जाएंगी (यदि वह ख़ुद –
काँसे में लिपटा ग्रेनाइट है, तो वे काँसे में लिपटे जीवित
शरीर”). कुज़्नेच्नी गली वाले अपने घर की बाल्कनी में “जीवित” दस्तयेव्स्की अकेला,
या आन्ना ग्रिगोरेव्ना के साथ त्यौहार के मेहमानों का स्वागत करने
के लिए आयेगा : नीचे स्टेज पर मुख्य कार्यक्रम चल रहा होता है. ये सच है, कि स्मारक की नज़र को वह दिखाई नहीं देता – शायद, यही
बेहतर है.
बाकी,
आम दिनों में, बेशक, वह
ज़्यादा शांत होता है. मगर आम दिनों में भी वह इन्सानों की दुनिया के निरंतर
सम्पर्क में होता है. या इन्सानों की दुनिया उसके निरंतर सम्पर्क में रहती है
(अगर आप ये मानते हैं, कि दुनिया उस तक "पहुँच जाती है").
उसके सामने अक्सर खुदाई होती है - यहाँ कुछ पाइप्स डाले गए हैं, और, जब उन्हें बदला जाता है, तो
उसे ये सब देखना पड़ता है. उसके आसपास की जगह को अक्सर नया रूप देते रहते हैं.
पीठ के पीछे वाले पेडों को या तो काटते हैं, या
वहाँ नए पेड़ लगाते हैं. दो लैम्प-पोस्ट्स, पुराने स्टाइल में
बने हुए, अवैध रूप से इश्तेहार चिपकाने वालों को आकर्षित
करते हैं. सीधे लैम्प पोस्ट पर इश्तेहार चिपकाने वालों से बचाने के लिए, उनमें से एक पर लैम्प की ऊँचाई पर एक ढाल लगा दी गई, और वाकई में इश्तेहार, जो बड़े, मोटे अक्षरों में होते थे ( A4 साइज़ के और बगैर
तस्वीरों के), कानूनी तरीके से इस ढाल पर प्रकट होने लगे (
"हर तरह की कानूनी सहायता", "ड्राइविंग
लाइसेन्स की बहाली", "फ़ौरन कर्ज़"), और वे भी जो आसान थे, छोटे अक्षरों में थे और
तस्वीरों के साथ थे ("मेट्रो के पास कमरा", "किसी
भी समय मसाज"), उन्होंने भी किसी तरह अपने लिए
सीधे-सीधे लैम्प-पोस्ट्स पर जगह बना ही ली, जिससे ऐसा लगने
लगा कि लैम्प-पोस्ट्स छिल रहे हैं. आख़िरकार ढाल को हटा दिया गया और ये कम से कम
इसलिए भी सही था, क्योंकि वह दस्तयेव्स्की के लैम्प को
अवरुद्ध करती थी.
निष्पक्षता की ख़ातिर ये
कहूँगा, कि इश्तेहार चिपकाने वाले स्मारक
के पैडेस्टल की, ज़ाहिर है, हिफ़ाज़त करते
हैं, क्योंकि हम शहर में ऐसे अनेक ऐसे पैडेस्टल्स को जानते
हैं, जिन पर बेरहमी से इश्तेहार चिपकाए गए हैं.
एक बार मैंने पैडेस्टल के
पास कुछ और नहीं, बल्कि एक मोटर साइकल देखी – अगर
स्मारक के क्षेत्र का पार्किंग की तरह इस्तेमाल करना है, तो
मोटरसाइकल को फेन्सिंग की खूँटियों के उस पार से यहाँ लाना पड़ा होगा...एक तरफ़ से
तो मोटरसाइकल यहाँ बेहद भद्दी लग रही थी, मगर दूसरी तरफ़ –
इसमें दिल को छू लेने वाली कोई बात तो थी. जैसे कीमती चीज़ की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी
स्मारक को सौंप दी गई हो, और वह वाकई में उस पर नज़र रखे हुए
है.
मगर,
फिर भी, इतना खुल्लम-खुल्ला स्मारक का उपयोग
कम ही किया जाता है. आम तौर से उसका मीटिंग-प्लेस की तरह उल्लेख किया जाता है.
यहाँ हमेशा कोई न कोई, घड़ी पर नज़र डालते हुए, किसी न किसीका इंतज़ार करता है. मैंने ख़ुद भी “दस्तयेव्स्की” के पास
मुलाकात तय की है, और मुझे हर तरह के नज़ारों का गवाह और कभी
कभी सहभागी भी होना पड़ा है.
न जाने क्यों नशे में धुत,
और ख़ास तौर से पूरी तरह धुत लोग दस्तयेव्स्की के स्मारक के पास
चुम्बक की तरह खिंचे चले आते हैं, ख़ासकर गर्मियों के मौसम
में – कभी एक पैडेस्टल के पास पड़ा ऊँघता है, तो कभी दूसरा.
वैसे इस क्षेत्र में और भी दूसरे अलग-थलग स्थान हैं, जहाँ
सोया जा सकता है, मगर नहीं, न जाने
क्यों यहीं, पैडेस्टल के पास समय-समय पर किसी न किसी का गुड़ी-मुड़ी
बना शरीर दिखाई देता है. और क्या इस हाव-भाव से दस्तयेव्स्की के प्रति सहज सम्मान
का भाव प्रकट नहीं होता है – जैसे, उपन्यास “पियक्कड़” की
संकल्पना के लिए, मार्मेलादव के पात्र के लिए, इस विषय में दिलचस्पी के लिए? और कहीं इस तरह
पियक्कड ख़ुद को स्मारक की सुरक्षा में तो नहीं सौंप रहा है? मैंने
एक भी बार मिलिशिया-पुलिस को यहाँ किसी की शांति को भंग करते नहीं देखा. जैसे
काँसे के फ़्योदर मिखाइलविच ने उन्हें सर्वोच्च स्वीकृति दी हो, जो खुले दिल से उसके पास आते हैं.
मगर अक्सर पियक्कड़,
बेघर, और कभी-कभी चर्च के पोर्च से उठकर,
जहाँ दस्तयेव्स्की पार्षद था, व्यावसायिक
भिखारी भी यहाँ एक लम्बी बेंच पर बैठ जाते हैं, पार्क के पास
– ध्यान लगाते हैं, कुछ लोग सो जाते हैं. ये जगह उन्हें पसंद
है.
अब मैं एक किस्सा सुनाऊँगा,
जो मेरी नज़र में सिर्फ यहीं – “दस्तयेव्स्की के पास” ही हो सकता है.
ये बिल्कुल अविश्वसनीय, एकदम अति काल्पनिक मामला है. मेरी
नज़रों के सामने जो घटित हुए उनमें सबसे असंभव दृश्य, ऐसा
जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता.
घटना सन् दो हज़ार कुछ के
गर्मियों के दिन की : नियत समय और नियत
स्थान पर – यहाँ, “दस्तयेव्स्की के पास” दो व्यक्ति
मिलते हैं. दो व्यक्ति – पावेल क्रुसानव और मैं : वैसे हम तीसरे का इंतज़ार कर रहे
थे, याद नहीं किसका, और ये महत्वपूर्ण
भी नहीं है, वह वैसे भी हमेशा देर से ही आता है. लेखक
क्रुसानव मुझसे पहले आ गया, और मैंने उसे दूर से ही, स्क्वेयर पार करने से पहले ही देख लिया. और स्मारक की ओर जाते हुए,
तिरछी नज़र से वहाँ बैठे “क्लब” के सदस्यों को देख लिया, जो पत्थर की बेंच पर बैठे थे, - जो इस जगह के लिए
बिल्कुल साधारण बात है. असाधारण व्यक्ति उनमें से सिर्फ एक था ( उसीके कारण यह
समूह लोगों का ध्यान खींच रहा था) – अपने अजीब अवतार से वह अन्य लोगों से एकदम अलग
नज़र आ रहा था, उस पर नज़र डाले बिना वहाँ से गुज़रना असंभव था,
तो मैंने भी सरसरी नज़र उस पर डाली.
पैडेस्टल के पास आता हूँ,
क्रुसानव से हाथ मिलाता हूँ, वह बैग से बियर
की दो बोतलें निकालता है, एक मुझे देता है, खोलते हैं, एक-एक घूँट पीते हैं. आजकल हम इस तरह से
बियर नहीं पीते, इसलिए नहीं, कि अब सड़क
पर पीना मना है, बल्कि इसलिए, कि हम
दोनों का ही मन इस पेय से ऊब चुका था. मगर तब, आम तौर से,
चलता था, ख़ासकर जब किसी का इंतज़ार कर रहे हो
और एक जगह पर खड़े हो. तो, हम ग्रेनाइट की खूँटी के पास खड़े
हैं, किसी विषय पर बात कर रहे हैं – हाँ, साहित्य के बारे में, शायद, - और
तभी मैंने देखा, कि वह अजीब सा आदमी बेंच से हटकर हमारी तरफ़
आ रहा है. ज़ाहिर था, कि अब मदद के लिए विनती करेगा और मैं
भीतर ही भीतर ख़ुद को इसके लिए तैयार कर रहा हूँ. कैसा तो था वह...कैसे कहूँ...अगर
ऐसा आदमी परदे पर दिखाई दे, तो कोई भी उसकी वास्तविकता में
विश्वास नहीं करेगा. मतलब, जब आप मुँह फेर लेना चाहते हो :
“ओह, गॉड!” (मगर, तभी मुझे फिर से
सकूरव की याद आई – लोगों के चेहरों के बारे में, जिन पर
अक्सर नज़र डालनी चाहिए, जिससे उन्हें प्यार कर सको...).
चेहरा जगह-जगह से सूजा हुआ, आँख़ ऐसे तैर रही थी, कि पलक नज़र नहीं आ रही थी, मगर अब मैं वर्णन करने से
अपने आप को रोकता हूँ... कपड़ों को देखकर लग रहा था, कि कहीं
ऐसी जगह लेटा था, जहाँ लेटते नहीं हैं. उत्तेजित था, मगर हाव-भाव सधे हुए थे, और हमारी ओर किसी निश्चय से
आ रहा था – जैसे समझ रहा हो, कि हम पर कैसा प्रभाव पड़ेगा.
पास आकर नम्रता से माफी मांगता है, और पीड़ित शराबी की भर्राई
आवाज़ में बियर के लिए माँगता है – सीधे बात पर आता है.
मैं पलक भी झपका नहीं पाया
था, कि क्रुसानव ने फ़ौरन उसे अपनी बोतल दे दी,
करीब-करीब पूरी भरी हुई. आदमी इस भेंट से कुछ चौंक गया और धन्यवाद
देते हुए कुछ बड़बड़ाने लगा. क्रुसानव जेब में हाथ डालता है, और
जो भी हाथ लगा, बिना देखे, उसे दे देता
है. उस आदमी ने वे पैसे छुपाए नहीं, मगर क्रुसानव अपनी दूसरी
जेब से भी पैसे निकालकर उसकी ओर बढ़ाता है. मैं भी पावेल वसील्येविच के प्रतिसाद से
कुछ चौंक गया, मैं ख़ुद भी – सहानुभूति से उतना नहीं, जितना अनुरूपता से – भयानक शब्द : दे देता हूँ... और वो एकदम
भौंचक्का हो जाता है. “लोगों, तुम लोग हो कौन?... कलाकार?” मुझे अक्सर कलाकार समझ बैठते हैं, अक्सर “उस तरह का” जवाब देता हूँ. मगर वह, ज़ाहिर है,
मिलनसारिता दिखाते हुए हमें धन्यवाद देना चाहता है और वह अपने बारे
में बताना आरंभ करता है – बर्फबारी की तरह; वर्ना ये क्या है?
“आप यकीन नहीं करेंगे, मगर मैं भी लेखक हूँ”.
(“भी” – ये इशारा दस्तयेव्स्की की तरफ़ था.) “आपको यकीन नहीं होगा, मैंने इतनी सारी किताबें लिखी हैं!...सारा देश मुझे पढ़ता था!...आप यकीन
नहीं करेंगे, लाखों में मेरी प्रतियाँ निकलती थीं!...”
क्रुसानव, मुझे आश्चर्यचकित करते हुए कुछ बुदबुदाता है जैसे
“ओह, नहीं, क्यों नहीं...हम यकीन करते
हैं...हम जानते हैं...” – मगर वह पावेल वसील्येविच को सुन ही नहीं रहा है और अपनी
प्रतियों और मानधन के बारे में हाँके जा रहा है, हाँके जा
रहा है, मगर कुछ समझ में नहीं आ रहा है : “अच्छा, चलता हूँ!” – और वह कोने के पीछे चला गया – वहाँ, बारह
सीढ़ियाँ नीचे की ओर जाती हैं, वाइन की दुकान तहख़ाने में है.
“इसका क्या मतलब है?”-
मैंने पूछा. “उसने मुझे नहीं पहचाना”, - पावेल
वसील्येविच रिक्तता से बोला. “कौन है ये?” मैं थोड़ा चौंकता
हूँ. – “आप एक दूसरे को जानते हैं?” क्रुसानव
उसका कुलनाम बताता है, जिससे मैं कुछ अंदाज़ नहीं लगा पाता,
कोई साधारण सा कुलनाम, जिसे मैं, वैसे भी, जल्दी ही भूल जाऊँगा (याद करना मुश्किल
नहीं है, मगर किसलिए?) “तो, ये क्या सचमुच में लेखक है?” और मैं सुनता हूँ:
“हाँ”.
बात असल में ये थी. नब्बे
के दशक के आरंभ में क्रुसानव एक बहुत बड़े प्रकाशन गृह में संपादक था. किताबों का
बाज़ार पूरे उत्कर्ष पर था. प्रकाशन गृह कुछ ख़ास विधाओं पर निर्भर था;
उनकी माँग बहुत ज़्यादा थी – फैन्टेसी, डिटेक्टिव...तभी
एक पाण्डुलिपी आई, जो सही में “गैंग्स्टर नॉवेल” की विधा के
अनुरूप थी, - उसे जेल से भेजा गया था, और
विषय की जानकारी और भाषा की सजीवता के कारण वह उस तरह की अन्य रचनाओं से काफ़ी
भिन्न थी.
“मुझे कुछ भी सुधारने की
ज़रूरत नहीं पड़ी”. ढेर सारी प्रतियाँ निकाली गईं, और किताब
फ़ौरन बिक गई. जल्दी ही नया लेखक जेल से बाहर आया. इसके बाद क्रुसानव नए प्रकाशन
गृह में चला गया, और इस प्रकाशन गृह ने पूरी तरह नये लेखक पर
ध्यान दिया, उसे “गैंग्स्टर नॉवेल्स” पर लगा दिया, जो वह एक के बाद एक लिखता जाता, उसे सहायक भी दिए
गए. मानधन भारी था. वह समय भी, ज़ाहिर है, “गैंग्स्टरों” का ही था. बेशक, ये वो साहित्य नहीं था,
जिसकी ओर आलोचक ध्यान देते हैं, मगर कामयाबी
तो कामयाबी है. उसकी एक किताब की प्रतियों की संख्या मेरी और क्रुसानव की सभी
किताबों की प्रतियों की संख्या से कहीं ज़्यादा थी, जो एक
दूसरे काल-खण्ड में लिखी गई थीं.
और फिर?
क्रुसानव नहीं जानता कि फिर क्या हुआ.
बाद में – पता नहीं.
लेखक और सम्पादक की
दस्तयेव्स्की के स्मारक के पास मुलाकात – ये हुआ बाद में.
मैं चौंक गया. मैंने कहा,
कि ऐसा नाटक सिर्फ यहीं हो सकता है – सिर्फ इसी जगह पर.
हम स्मारक के बाईं ओर खड़े
थे, और फ्योदर मिखाइलविच, सिर
झुकाए, सीधे हमारी ओर देख रहा था. अवास्तविकता का आभास इतना
तीव्र था, कि मैं इसे सपना समझने के लिए तैयार था, वो भी उसका – हमारी ओर देख रहे
दस्तयेव्स्की का, उसके सपने में हम आये थे.
बियर,
वैसे, बहुत कचरा थी. शायद, मैंने पूरी नहीं पी.


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