रविवार, 11 नवंबर 2018

Conspiracy - 03


हस्ताक्षरित




स्मारक हालाँकि ऊँचा है – करीब पाँच मीटर ऊँचा होगा और फिर पैडेस्टल भी, मगर उसे मशहूर कहना सही नहीं होगा. नहीं, बेशक, वह चारों ओर से दिखाई देता है, मगर नज़र उस पर ठहरती नहीं है. खड़ा है, बस, खड़ा रहता है.

कोई उसके निकट नहीं आता, कोई उसके निकट किसी से मिलने के लिए भी नहीं आता, कोई उसके निकट सेल्फी भी नहीं लेता, लोग यहाँ से बिना रुके गुज़रते हैं, वो भी ठीक उसकी पीठ के पीछे से, क्योंकि वहाँ दो एवेन्यूज़ को जोड़ने वाली एक छोटी-सी पगडंडी है, सीधे तेज़ी से निकल जाते हैं, ये जानते हुए कि कहाँ और किसलिए जा रहे हैं, और अगर कोई अपने सिर को मोड़ता भी है, तो उसकी दिशा में नहीं, बल्कि विपरीत दिशा में – एक पॉश बिल्डिंग की ओर. लगता है, यही वह स्थिति है, जब स्मारक किसी भी तरह लोगों से सम्पर्क नहीं करता, उन परिस्थितियों की कल्पना करना भी मुश्किल है, जो किन्हीं संबंधों की ओर इशारा करते.        

और ख़ुद उसे भी, शायद, उकताहट हो रही होगी. आँखों के सामने – सिर्फ कारें, बसें और ट्राम गाड़ियाँ, कुछ भी दिलचस्प नहीं : सिर्फ चौराहा – और बस. हाँ, साल में एक बार मस्जिद के सामने बड़ी संख्या में मुसलमान इकट्ठा हो जाते हैं, मगर वह वहाँ, बस यूँ ही खड़ा है, और वे उसकी तरफ़ ज़रा भी ध्यान नहीं देते. हालाँकि, अगर आपको याद हो, तो नाटक “तलछट” (The Lower Depths) का इकलौता सकारात्मक नायक – जो अपने धार्मिक विश्वास के अनुरूप ज़िंदगी जीता है, उसे तातारिन के नाम से पुकारते हैं, इतने सारे अच्छे लोगों को एक ही जगह पर देखना काँसे में मूर्त क्लासिक को ख़ुशी देता होगा – जैसे, ये उसके लिए हर साल का तोहफ़ा हो.         

वैसे, स्मारक के लिए जगह ठीक ही चुनी गई है, इसमें कोई गलती नहीं निकाल सकते. स्मारकपट्टिका के अनुसार गोर्की बगल में ही रहता था – हाउस नं. 23 में, सन् 1914 से सन् 1921 तक. हाथ में गर्मियों वाली टोपी देखकर ये अनुमान लगाया जा सकता है, कि पैडेस्टल पर स्थित गोर्की को टहलते समय की तस्वीर के अनुसार बनाया गया है – उसे मैक्सिम गोर्की एवेन्यू -  जिसे सन् 1968 में, जब स्मारक का उद्घाटन हुआ था, क्रोन्वेर्स्की एवेन्यू कहते थे - पार करना था और कहीं आगे जाना था – मेट्रो “गोर्कव्स्काया” से होते हुए कहीं आगे. यहाँ हर चीज़ गोर्कव्स्कीहै. हो सकता है, इसीलिए शुरू में ये बताना ज़रूरी नहीं समझा गया कि स्मारक किसका है, - वैसे भी स्पष्ट है कि किसका है. इसके अलावा, सोवियत रूस में हर स्कूली बच्चा गोर्की को चेहरे से पहचानता था और गोर्की की मूँछों को किसी और की मूँछें नहीं समझ सकता था.

पुरानी तस्वीरें इसका सुबूत हैं : पैडेस्टल पर कोई इबारत नहीं थी कि स्मारक किसका है.

मगर एक ख़ूबसूरत पल में एक अनुकूल शीर्षक ने चमचमाते हुए गुलाबी पैडेस्टल को सुशोभित कर दिया.

ये शीर्षक, या सही कहें तो, हस्ताक्षर, गोर्की के हस्ताक्षर के रूप में प्रकट हुआ, मतलब, फिर से कहता हूँ, बिल्कुल उसके ख़ुद के हस्ताक्षर के रूप मे, जिससे एक ज़माने में सब परिचित थे. लेखक एम. गोर्की मिसाल के तौर पर इस तरह हस्ताक्षर करता था : «МГорький»” (MGorky) – जिसमें हर अक्षर स्पष्ट लिखा होता था. ये हस्ताक्षर कवर्स पर और साइड-कवर्स पर प्रकाशित किया जाता था, और जब सुपर-कवर्स थे, तो ए. एम. गोर्की की संग्रहित रचनाओं के प्रमुख संस्करणों के सुपर-कवर्स पर भी – 30 खण्डों वाले संग्रह पर भी, जिसे हमारे यहाँ सम्पूर्ण नहीं माना जाता था, और 25 खण्डों वाले, और 18 खण्डों वाले, और 8 खण्डों वाले संग्रहों पर भी...पुस्तकालयों में गोर्की को प्रमुख स्थान पर रखा जाता था – सब जानते थे, कि गोर्की का हस्ताक्षर कैसा दिखता है. अतिरंजित किए बिना कहूँगा, कि ये हस्ताक्षर उसके स्वामी की तस्वीर के मुकाबले में कम परिचित नहीं था.

और एक बार वह पैडेस्टल पर प्रकट हो गया.

क्या ये अजीब नहीं है?

नहीं था – और अचानक प्रकट हो गया.

जब साधारण अक्षरों से दिखाया जाए कि पैडेस्टल पर कौन खड़ा है, तब कोई सवाल नहीं उठते, मगर यहाँ तो नीचे ये शीर्षक प्रकट हो गया, न कि सिर्फ शिलालेख. ऑटोग्राफ़. मगर पैडेस्टल पर हस्ताक्षर कौन कर सकता है, सिवाय उसके, जो उसके ऊपर खड़ा है? सिर्फ वही, जो उसके ऊपर खड़ा है. ये उसके हस्ताक्षर हैं.

मगर रुकिए : अगर हम अपनी आँखों पर विश्वास करने से इनकार न करें और गोर्की को पैडेस्टल पर देखें, और गोर्की के नीचे इसी पैडेस्टल पर गोर्की के ये प्रमाणित करते हुए हस्ताक्षर देखें, कि ये गोर्की ही खड़ा है, तो हमें, कम से कम कल्पना में ही ये मानना पड़ेगा कि गोर्की ने, जो हमारी आँखों को दिखाई देता है, ख़ुद एक बार अपने ख़ुद के पैडेस्टल पर हस्ताक्षर किए थे. मगर “मानना पड़ेगा” से क्या मतलब है? – कुछ और तो हो ही नहीं सकता, कोई और तो उसके लिए हस्ताक्षर नहीं ना करेगा?

बिल्कुल इसी तरह और कोई दूसरा विकल्प नहीं : पैडेस्टल के पास आया, झुका और हस्ताक्षर कर दिए. काँसे का होते हुए भी. मगर काँसे का होते हुए, वह पैडेस्टल पर जैसे खड़ा था, वैसे ही खड़ा है? मतलब, हस्ताक्षर करने के लिए उसे ज़मीन पर उतरना पड़ा होगा, क्या ऐसा होता है? और फिर वापस लौट गया होगा?

वर्ना – अनसुलझा विरोधाभास. किसी और तरह से तो इस हस्ताक्षर को समझाया नहीं जा सकता.
हस्ताक्षर को किसी और, कम काल्पनिक तरीके से समझाने की कोशिश, हमें कम से कम एक की विश्वसनीयता पर शक करने पर मजबूर करती है – या तो पैडेस्टल पर मौजूद हस्ताक्षर की वास्तविकता पर, या फिर उसकी वास्तविकता पर, जिसे यह हस्ताक्षर सत्यापित करता है.
स्मारक-गोर्की और पैडेस्टल पर उसके व्यक्तिगत हस्ताक्षर – किन्हीं भी काल्पनिक मान्यताओं के बगैर – दो ऐसी चीज़ें हैं जो एक साथ नहीं रह सकतीं.

तब, इसे और उसे – दोनों को देखते हुए हमें क्या करना चाहिए? इस बारे में हमें क्या सोचना चाहिए?

ये है गोर्की के स्मारक के रहस्यों का रहस्य, जिसके सामने हमारी तर्क बुद्धि निश्चित रूप से हथियार डाल देती है. संज्ञानात्मक विसंगति का बेहतरीन उदाहरण.

मगर, हो सकता है, कि ये उनमें से एक रहस्य हो, जिन्हें तर्कसंगत रूप से नहीं समझा जा सकता?
क्या ये मान लेना ज़्यादा आसान नहीं है, कि यह रहस्य इस स्मारक में लगातार निहित है – कम से कम उस दिन से, जब प्रमाणित करता हुआ हस्ताक्षर अचानक पैडेस्टल पर प्रकट हो गया था?   

नहीं, वाकई में, हम हस्ताक्षर करने के तकनीकी पहलू को एक ओर रख दें; स्मारक के मनोविज्ञान को समझना ज़्यादा महत्वपूर्ण है.          

काँस्य-गोर्की की सहज मुद्रा से हम धोखा न खा जाएँ - दाएँ हाथ का अंगूठा बेल्ट के नीचे घुसा हुआ है, पैर आगे निकला है, जिससे जूते का अगला हिस्सा पैडेस्टल के बाहर निकल गया है, - इस सबके साथ उत्तेजना के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. और – हैट देखिए. उसने हैट क्यों उतार दी और उसे बाएँ हाथ में क्यों पकड़ा है? ये कैसे हो सकता है : हैट और ओवरकोट पहनकर टहलने के लिए निकला और अचानक हैट उतार दी? सिर्फ इतना मत कहना: इसलिए कि बगल में मस्जिद है. या इसलिए कि क्शेसिन्स्काया पैलेस की बाल्कनी की ओर देख रहा है, जहाँ से लेनिन ने कई बार भाषण दिया था. और बात ये नहीं है, कि पेड़ों के कारण बाल्कनी नज़र नहीं आ रही है, - जब हरियाली नहीं होती, तब वह साफ़-साफ़ दिखाई देती है. बात ये नहीं है. सिर के ऊपर का वस्त्र अक्सर तब उतार देते हैं, जब आप चाहते हैं कि पहचान लिए जाएँ. और ज़रा इस स्मारक की इस हैट में कल्पना कीजिए – स्पष्टीकरण शिलालेख के बिना कोई भी गोर्की को पहचान नहीं पाएगा, लोग समझेंगे, कि रिसॉर्ट का कोई छैला इत्तेफ़ाकन सेन्ट पीटर्सबुर्ग आ गया है और लोगों को दिखाने के लिए बाहर निकला है. मतलब, यूँ ही नहीं उतारी – जानता था, कि क्या किया है. संस्थापक की छबि को लोग भूलने लगे थे, और ऊपर से प्रमुख सुराग़ भी गायब हो गया – मैक्सिम गोर्की एवेन्यू को, जिसे गोर्की के जीवनकाल में ही यह नाम दे दिया गया था, पुराना नाम – क्रोन्वेर्स्की एवेन्यू - वापस लौटा दिया गया.

कुछ स्मारक उन परिवर्तनों के प्रति बड़े भावुक होते हैं, जो लोगों के दिमागों में हो रहे होते हैं. पहले तो हमारे देश में हर कोई, मिसाल के तौर पर, गोर्की के बारे में ये जानता था, कि अलेक्सेइ मक्सीमविच गोर्की और मैक्सिम गोर्की – एक ही आदमी है, मगर अब, ठहरिये, हर कोई ये नहीं सोच सकता... और स्मारक महसूस करता है, कि कुछ गलत हो रहा है. और सच ही तो है, उसके पास शक करने की वजह तो है, कि उसे पहचानते नहीं हैं, या कोई और समझ रहे हैं. तो, वह अपने आयोजकों की गलती को सुधारने की ज़रूरत को महसूस करता है, जिन्होंने समय रहते उस पर शिलालेख लिखने की ज़ेहमत नहीं उठाई और आख़िरकार एक दिन वह ख़ुद ही अपनी छबि को अपने हस्ताक्षर से प्रमाणित कर देता है. 

मैं उसके काँसे में प्रवेश करके, स्वयम् को इस ग्रेनाइट के पैडेस्टल पर रखने की कोशिश करता हूँ : गोर्की के स्मारक जगह पर मुझे कौन सी बात परेशान कर सकती है? सबसे ज़्यादा, व्यक्तिगत रूप से मुझे भाषाई घटना से परेशानी होती : मैं मेट्रो स्टेशन “गोर्कव्स्काया” के नामकरण के औचित्य से परेशान होता, जिसका मुझसे (मुझसे मतलब – स्मारक के) पाँच साल पहले ही उद्घाटन हुआ था. क्या मुझ अकेले को ही ऐसा लगता है कि शब्द “गोर्कव्स्की” एकदम सही नहीं है? यह विचित्र विशेषण रूसी कान को क्रांति पूर्व समय से पढ़ाया जाता रहा है, और ख़ुद अलेक्सेइ मक्सीमविच ने उन दिनों भी अच्छी तरह सीख लिया था, कि हर चीज़, जो व्यक्तिगत रूप से उससे जुड़ी है – वो “गोर्कव्स्कोए” है.  (गोर्की शब्द का अर्थ है - कड़वा. यह शब्द ख़ुद ही विशेषण है, गोर्कव्स्कोए इस विशेषण से बनाया गया विशेषण है – अनु.) मगर रज़ानव ने, भाषा के प्रति अपनी संवेदनशीलता के कारण, गोर्की के बारे में लिखे गए लेख में “गोर्कव्स्कोए” शब्द के व्यापक अस्तित्व के प्रति कोई ज़िम्मेदारी न लेते हुए उसे उद्धरण चिह्नों के बीच रखा है, जैसे मजबूरी में इस फैशनेबल आविष्कार का समर्थन कर रहा हो. और अगर किसी ऐसे व्यक्ति से, जो मैक्सिम गोर्की के बारे में कुछ भी न जानता हो, जैसे तुर्गेनेव के समकालीनों से, पूछतेमहाशय, ज़रा बताइए तो, कि ये विशेषण “गोर्कव्स्की” किस व्यक्तिवाचक नाम से बना है? – वे जवाब देते, कि व्यक्तिवाचक नाम गोर्कव से. और अगर गोर्की के बारे में उन्हें बताया जाता तो शायद, उन्हें आश्चर्य भी होता. शायद मैं कुछ ज़्यादा ही परेशान हो रहा हूँ, मगर गोर्की – गोर्कव की उधेड़बुन में “गोर्कव्स्की” शब्द में प्रत्यय की समस्या मुझे काफ़ी परेशान कर रही है.  क्या उस प्रत्यय की सहायता से विशेषण से ही विशेषण बनाना उचित है, जो एक पर दूसरे के स्वामित्व को प्रकट करता हो? मेट्रो स्टेशन्स “दस्तयेव्स्काया” और “चिर्निशेव्स्काया” के नामों पर बहस की जा सकती है (क्या उन्हें आन्ना ग्रिगोरेव्ना और ओल्गा सक्रातव्ना के सम्मान में ये नाम दिए गए हैं?) मगर यहाँ कम से कम ये तो स्पष्ट है, कि इनका किन कुलनामों से संबंध है. गोर्की के सम्मान में मेट्रो स्टेशन का नाम उसी सिद्धांत के अनुसार “गोर्कायाहोना चाहिए था (हम गोर्की शहर से तो परिचित हैं), और अगर वह वाकई में “गोर्कव्स्काया” हो – तो कहीं वह इस गोर्कव के सम्मान में तो नहीं, जिसे हममें से कोई नहीं जानता? दूसरे शब्दों में, मुझे, अगर मैं स्मारक की जगह पर खड़ा होता, तो परेशानी होती, कि क्या किताबों की आदत छूट चुके लोग मुझे वो ही समझ रहे हैं ना, जब “गोर्कव्स्काया” स्टेशन के पेविलियन पर सिर झुका कर वो एवेन्यू पार करने वाले हों, जिसे कुछ समय पहले तक मेरा नाम दिया गया था. क्या कल मेरा नाम सीधे-सीधे लेंगे? मेरे देश-भाई मुझमें किसी गोर्कव को तो नहीं देखेंगे, जबकि मैं गोर्की हूँ, आँ? कहीं “गोर्कव्स्काया” नाम उन्हें उलझन में तो नहीं डालेगा? तो फिर पैडेस्टल पर हस्ताक्षर से प्रमाणित क्यों न किया जाए, कि मैं गोर्की हूँ, न कि गोर्कव?!

लेकिन वैचारिक उथल-पुथल के बगैर भी ये बात समझ में आती है, कि पैडेस्टल पर खड़े इस काँसे के नायक को, उस काल के लेनिनग्राद के स्मारकवाद के उल्लेखनीय हीरो को, विशाल और भारी-भरकम स्मारक को आजकल बेहद अकेलापन महसूस हो रहा है. पहले ऐसा नहीं था. पहले, गोर्की के ऐतिहासिक आवास से जुड़े जीवनी और स्थानों के नामों से संबंधित तथ्यों के अलावा यहाँ पर कुछ और भी बात थी, जिसने शिल्प को पराएपन का एहसास नहीं होने दिया.

देखिए, गोर्की बेइंतहा सिगरेट पीता था. दिन भर में वह दसियों सिगरेट पी जाया करता, कभी तो ये संख्या सौ तक पहुँच जाती थी. वह लगातार पीता रहता था : जब काम कर रहा होता, जब लोगों से बात कर रहा होता, जब आराम करता, वह थियेटर में भी अपने ही प्रीमियर्स के दौरान पीता था. वह इन्सान जिसने अपने फेफ़ड़ों को छलनी कर लिया था और जिसे तपेदिक था, पाँच मिनट भी बिना सिगरेट पिये नहीं रह सकता था, उसे पीते ही रहना पड़ता था. ऐसे कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखाई देते, जो इस बात की ओर इशारा करते हों, कि काँसे के आदमी की पतलून की जेब में या ओवरकोट में सिगरेट का पैकेट पड़ा है, मगर शक की गुंजाइश ही नहीं है : ऐसा हो ही नहीं सकता! जब स्मारक को स्थापित किया जा रहा था, तो सब समझ रहे थे कि गोर्की कहाँ से निकल रहा है – पेत्रोग्राद डिस्ट्रिक्ट फूड सेन्टर की 15 नंबर वाली तम्बाकू की द्कान से. सत्तर के दशक के आरंभ में स्मारक के पीछे वाली दुकान पर “तंबाकू” और “सिगरेट” लिखा रहता था, और वे, शायद, स्मारक के लिए ज़्यादा प्रभावशाली थे, बनिस्बत क्रिसमस-ट्री के छोटे-छोटे पौधों के जिन्हें न जाने क्यों गोर्की की पीठ के पीछे लगाया गया था. सिगरेटों में से कुछ, जो यहाँ पर स्मारक-गोर्की के ज़माने में दुकान नं 15 में बेची जाती थीं, जीवित अलेक्सेइ मक्सिमविच को भी उपलब्ध थीं : यही “बेलामोरकनाल” – सिर्फ नाम ही काफ़ी है गोर्की के संबंधों का प्रवाह खोलने के लिए...

उसकी पीठ के पीछे वहाँ क्या हो रहा था, उसे, बेशक, मालूम नहीं था, मगर शायद वह कुछ-तो महसूस कर रहा था, - वहाँ तंबाकू के व्यापार में दुनिया का रहस्य खेल रहा था. समाजवाद की विजय अब न केवल एक अलग-थलग देश में, बल्कि दुनिया के दूसरे भाग में भी तंबाकू की दुकान के नए नाम – “हवाना” से पुख़्ता हो रही थी. “बेलामोर”, “सेवेर”, “नाशा मार्का” और अन्य सिगरेटों की जगह अब हाथ से लपेटे गए सिगार - काली तंबाकू के पत्ते से बने - पेश किए जाते थे. “हवाना” की रंगबिरंगी शो-केस अमरीकी साम्राज्यवाद को हमारा जवाब था, जिसने समाजवादी क्यूबा पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिए थे. जब यू.एस.ए. के इक्के-दुक्के नागरिक “हवाना” पहुँचते थे, तो क्यूबा की सिगार्स को एक-एक कोपेक में बिकते देख पगला जाते थे. हमारे यहाँ के शानदार सिगार भी एक-एक कोपेक में बिकते थे, मगर वे ज़्यादा चलते नहीं थे. और ऐसा ही क्यूबा की रमका भी हाल था. ख़ैर, विश्व की समाजवादी व्यवस्था एक बार धराशायी हो गई, पूंजीवाद जीत गया (कम से कम हमारे देश में), और तंबाकू के रहस्य की कड़ी में गोर्की की पीठ के पीछे वाली दुकान “हवाना” बंद हो गई, और गोर्की के सिर के ऊपर, स्टालिन के घर की छत पर, अमेरिकन सिगरेट “कैमल” का इश्तेहार दिखाई देने लगा.

हर चीज़ गुज़र जाती है, और ये भी गुज़र गया.

इस स्मारक-व्यक्ति से संबंधित तंबाकू का प्रवाह सूख गया, और, ऐसा लगा, कि समयहीनताआ गई है.

समय की याद दिलाते हैं क्रिसमस-ट्रीज़. वे, जिन्हें स्मारक के उद्घाटन पर लगाया गया था, अच्छी तरह नहीं बढ़े, उन्हें काट दिया गया और नए पेड़ लगाए गए. मगर ये नये वाले भी ठीक नहीं रहे. पुराने वालों में से सिर्फ एक बचा था – वो, जो स्मारक के ठीक पीछे है. ये वाला आधी शताब्दी के दौरान ऊँचा हो गया. मगर वो भी रोएँदार नहीं है, और कामेन्नाओस्त्रव्स्की (पुराने ज़माने का कीरव) एवेन्यू, की तरफ़ से, उसका अपमान करने के लिए नहीं कह रहा हूँ, भद्दा भी है. ऊपर से कुछ सालों से उसकी फुनगी न जाने क्यों टेढ़ी बढ़ रही है. हो सकता, कि इसीलिए नए साल पर उसे मालाओं से नहीं सजाते.

ठीक ही तो है.

नये साल की क्रिसमस-ट्री के नीचे वह अपने आप को क्या महसूस करता?

  

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