आदर्श का आदर्श
मुझे यह जगह पसंद है. अपनी
ही तरह की है.
पहली नज़र में कोई ख़ास बात
नज़र नहीं आती : पैडेस्टल पर ग्रेनाइट का गोला, इसके
अलावा कुछ नहीं. मगर ग़ौर से देखो, तो पता चलेगा, कि कोई बात है, जो ठीक नहीं है. गार्डन के बीच में, क्यारी के केंद्र में ठोस, करीब दो मीटर का
पैडेस्टल क्यों खड़ा है, अगर उसके सिर्फ छोटा सा गोला रखना था
तो? पीटर्सबुर्ग में कई ग्रेनाइट के गोले हैं, मगर यदि उनके साथ पैडेस्टल्स हैं भी, तो वे ऊँचे
नहीं हैं. गोला, वह गोला ही है. उसे ऊपर क्यों उठाना है?
वसील्येव्स्की द्वीप की समुद्र के भीतर जाती हुई धरती पर भी
ग्रेनाइट के दो गोले हैं – वे सिर्फ ग्रेनाइट के गोले हैं – स्टाइल का एक तत्व,
अप्रतिम दृश्य के लिए एक सुरुचिपूर्ण जोड़ा, मगर
उसमें कोई गहरा अर्थ नहीं छुपा है. मगर यहाँ बिल्कुल ऐसा नहीं है. छिछोरापन हो या
गहरा अर्थ, मगर कुछ न कुछ तो निश्चित रूप से प्रकट होता है.
यहाँ, जैसे,
सर्दियों में, जब बगल में मालाएँ पहने क्रिसमस-ट्री खड़ी हो, यह अजीब संरचना – गोले के साथ समांतरषट्फलक – नये साल
का कोई छोटा सा खिलौना प्रतीत होता है. मगर साल के बाकी दिनों में, जब क्रिसमस-ट्री नहीं होती, - ये
उल्टा विस्मयबोधक चिह्न लगता है.
यहाँ
के पुराने रहने वाले जानते हैं,
कि पहले इस गार्डन में
जो च्कालव्की एवेन्यू और लेनिन स्ट्रीट वाले चौराहे पर है, गोले की जगह ख़ुद लेनिन था – मतलब उसकी अर्धप्रतिमा. ये
गोला – अर्धप्रतिमा के एवज़ में है. और पैडेस्टल, सही
में, गोले के नीचे नहीं, बल्कि
लेनिन की अर्ध-प्रतिमा के नीचे लगाया गया था.
तो
ऐसी बात है.
लेनिन
स्ट्रीट पर एक जगह है,
जो आजकल एलिज़ारव
म्यूज़ियम-फ्लैट कहलाता है. एलिज़ार – पति और पत्नी. आन्ना इल्यिनीच्ना – लेनिन की
बहन थी, और मार्क तिमोफ़ेयेविच – वही एलिज़ारव था, जिसके नाम पर एलिज़ारव एवेन्यू और मेट्रो स्टेशन
“एलिज़ारव्स्काया” का नाम रखा गया है. क्रांति से पूर्व उसने महत्वपूर्ण काम किये
थे, मगर प्रमुख ये है, कि
पहले, जब वह स्टीमर्स-सोसाइटी “वोल्गा” का डाइरेक्टर था, तब उसने अपने साले – व्लादीमिर इल्यिच लेनिन और उसकी
पत्नी को अपने फ्लैट में शरण दी थी,
जब वह परदेस से वापस
लौटे थे. इस फ्लैट में तीन महीनों के वैध आवास के दौरान – 4 अप्रैल से 5 जुलाई
1917 तक – लेनिन ने काफ़ी काम किया,
बल्कि, बेहद ज़्यादा काम किया. मगर काम – काम है, और ज़िंदगी – ज़िंदगी. मेरे
दिल की धड़कन बस रुक ही गई,
जब मैंने एलिज़ारवों के
फ्लैट-म्यूज़ियम के स्नानगृह में लकड़ियों से पानी गरम करने का बंबा देखा – वैसा ही
मेरे बचपन में हमारे फ़न्ताका के फ्लैट में था. और वैसा ही जैसा यहाँ पर था, लकड़ियों के चूल्हे के ऊपर, हमारे
यहाँ भी किचन की दीवार में गोल छेद था,
और मुझे मालूम था, किसलिए – समोवार के पाइप के लिए!...अन्य बातों के
अलावा वहाँ एक व्हील-चेयर भी है,
जिसे, शायद,
गोर्की से लाया गया था, जो तब तक आधिकारिक रूप से लेनिन्स्कीये गोर्की नहीं
बना था.
पेट्रोग्राद
की शिरोकाया स्ट्रीट को उत्सव वाले दिन – 7 नवम्बर 1923 को, मतलब, नायक के जीवनकाल में ही लेनिन्स्काया स्ट्रीट का नाम
दे दिया गया था,
जब उसे, थके-हारे,
निर्बल को, गोर्की में इसी (या ऐसी ही) व्हील-चेयर में घुमाते
थे... लेनिन्स्काया स्ट्रीट को सब,
जिनके लिए वह शिरोकाया
नहीं रही थी,
फ़ौरन, बिना बहस किए, लेनिन
स्ट्रीट कहने लगे और ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है : लेनिन्स्कोए (लेनिन के नाम से – अनु.) बहुत कुछ है : विचार, सिद्धांत,
आदेश – मगर ख़ुद लेनिन एक
है; वह अभी तक उसी नाम से जानी जाती है, और उस उत्सव वाले दिन (शायद, ऑक्टोबर क्रांति की छठी वर्षगाठ को), अगर पुराने सोवियत-हैण्डबुक पर यकीन करें तो, लेनिन
की अर्ध-प्रतिमा भी स्थापित की गई – सीधे प्रतिष्ठित और उस समय आवासीय अपार्टमेन्ट
के सामने ही सीढ़ी पर. शिल्पकार एम. या. खर्लामव की कृतियों के अन्य जानकार ज़ोर
देकर कहते हैं कि उसकी बनाई लेनिन की अर्ध-प्रतिमा सन् 1924 के मध्य में स्थापित
की गई होगी, मतलब वह जीवनकालीन प्रतिमा नहीं थी. सब कुछ हो सकता
है. हमारे लिए महत्वपूर्ण बात दूसरी है : अर्ध-प्रतिमा किससे बनी थी. प्लास्टर ऑफ
पेरिस से.
क्योंकि
सन् 1933 में गिस्लेरोव्स्की लेन (जैसा उस समय आज के च्कालव्की एवेन्यू का हिस्सा कहलाता
था) और लेनिन स्ट्रीट के चौराहे वाले छोटे से गार्डन में पैडेस्टल पर लेनिन की
अर्ध-प्रतिमा स्थापित की गई,
जो उसी मॉडेल पर बनाई गई
थी, मगर कॉन्क्रीट की थी.
और
उसे सन् 1960 में ग्रेनाइट की अर्ध-प्रतिमा से बदल दिया गया.
ग्रेनाइट
के स्मारक के लिए पेरेस्त्रोयका के बाद वाला अस्पष्ट समय, उसके कॉन्क्रीट वाले पूर्ववर्ती के लिए घेराबन्दी के
समय से ज़्यादा ख़ौफ़नाक साबित हुआ. वह कई बार अपने दुश्मनों के हमलों का शिकार हुआ
और अंत में खो गया.
और
तब उसी पैडेस्टल पर लेनिन के स्थान पर ग्रेनाइट का गोला प्रकट हुआ.
आम
तौर से, स्मारकीय लचीलेपन के लिए, जो
तथाकथित ‘लेनिनियत’
के लिए ज़िम्मेदार है, गोले की थीम (विषय-वस्तु) कब से आत्मसात् कर ली गई थी
– रचनावाद (कन्स्ट्रक्टिविज़्म) के युग में ही: एक अच्छे ख़ासे आकार का गोला पैडेस्टल
के रूप में इल्यिच के तलवों के नीचे दिखाई दे सकता था, और वह
उतना प्रतीकात्मक नहीं था,
जितना लेनिन की शिक्षा के
सर्वविजेयता के विचार को प्रदर्शित करता था: पृथ्वी का गोला जो है!
हमारा
मामला कुछ ज़्यादा दिलचस्प है.
यहाँ पूर्णता-श्रेणी है. ये है श्रेणी : प्लास्टर ऑफ़ पेरिस – कॉन्क्रीट –
ग्रेनाइट (ये सब अर्ध प्रतिमाएँ हैं) – और अंत में गोल – पदार्थ की
आत्मकेन्द्रीयता का आदर्श रूप (यहाँ – ग्रेनाइट). लेनिन अपने आप में एक आदर्श है
और, आदर्श होने के नाते अपने ही विचारों का प्रतीक है, जो इस श्रेणी के
अनुसार (प्लास्टर ऑफ़ पेरिस, कॉन्क्रीट, ग्रेनाइट) अधिकाधिक कठोर और मज़बूत होते जा रहे हैं.
मगर एक कदम अनंत की ओर बढ़ाया, आदर्श की सीमा से परे – और ये बन गया गोला ग्रेनाइट
का. और इस श्रेणी में ये गोला – आदर्श का आदर्श है.
अगर कोई ये कहेगा, कि ग्रेनाइट के गोले का अर्थ ये नहीं है, तो मैं उससे
पूछूंगा : तो फिर क्या है?
मगर अभी ये पूरा नहीं हुआ है.
सब कुछ पहले तर्क की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल है.
सतर्क पाठक ने गौर किया होगा, कि ऊपर दी गई श्रेणी में तत्व “काँसा” अनुपस्थित है.
देखिये, लेनिन स्ट्रीट पर काँस्य-अवस्था के लिए एक दूसरी चीज़
ज़िम्मेदार थी और ज़िम्मेदार है. और इसे समझने के लिए, हमें स्मारकों के परस्पर संबंधों और परस्पर प्रभावों
के विषय को छूना होगा, जिसका काफ़ी कम अध्ययन किया गया है.
बताता हूँ. लेनिन स्ट्रीट पर लेनिन की एक और अर्ध-प्रतिमा स्थापित की गई थी, मगर ये एम. या.
खर्लामव का नहीं, बल्कि वी. ई. इंगाल का शिल्प था, ऊपर से इंगाल की कृति
खर्लामव के शिल्प के बाद प्रकट हुई – सन् 1957 में, और आप स्पष्ट रूप से कल्पना कर सकते हैं : स्ट्रीट पर पहले
ही लेनिन ने (दूसरे!) कब्ज़ा कर लिया था. यह पूछ सकते हैं, कि दूसरे लेनिन
को स्थापित करने की क्या ज़रूरत थी, जब पास ही में पहला है? लेनिन के स्मारक कोई मील के पत्थर तो नहीं हैं (और
यहाँ तो उनके बीच की दूरी आधा मील भी नहीं होगी). कोई कारण तो नहीं था. मगर इसका
भी स्पष्टीकरण है. दूसरा मजबूरी में प्रकट हुआ. उसे यहाँ निर्वासित कर दिया गया
था.
लेनिन को लेनिन स्ट्रीट पर निष्कासित कर दिया?
बिल्कुल ऐसा ही हुआ. किसलिए? बिना किसी वजह के. स्टालिन की ख़ातिर.
पेत्रोग्राद-लेनिनग्राद में लेनिन की कई जगहें थीं, मगर सबसे ज़्यादा ‘लेनिनी’ - बेशक, स्मोल्नी है. स्मारक, जिसके बारे में बात हो रही है, वहीं प्रकट हुआ
था – स्मोल्नी के प्रमुख पथ के पास. स्मारक तो लेनिन का था, मगर स्टालिन की
बगल में. और पार्टी की XXवीं काँग्रेस चल रही थी. स्टालिन का लुप्त होना खटके
नहीं और सवालों को जन्म न दे, इसलिए उसके साथ-साथ लेनिन को भी हटा दिया गया –
बेमालूम तरीके से. स्टालिन को, जैसा कि तब होने लगा था, पिघलाने के लिए भेज दिया गया, और लेनिन को, साल भर के क्वारन्टाइन (अलग-थलग रखने) के बाद नई
जगह पर स्थापित करने का फ़ैसला किया गया – लेनिन स्ट्रीट पर बने गार्डन में, जहाँ वह बल्शोय एवेन्यू
पर चौराहा बनाती है. स्मोल्नी की अपेक्षा ये जगह उतनी ‘लेनिनी’ नहीं थी, यहाँ पर निष्कासित किए जाने का मतलब रुतबे में कमी आना
था, और ख़ास बात – दूसरा लेनिन यहाँ पहले से ही था, और ऐतिहासिक फ्लैट से कम दूरी पर था. (वैसे, लेनिन स्ट्रीट पर स्मारक फलक भी दो हैं और वे दोनों
उसी घटना को समर्पित हैं – लेनिन के यहाँ रहने को. सिर्फ स्मारकों से विपरीत वे रास्ते की पूरी लम्बाई पर
फैले हुए हैं: एक - बिल्डिंग नं. 1 के पास
जहाँ से रास्ता शुरू होता है, और दूसरा –– रास्ते के बिल्कुल अंतिम छोर पर -
बिल्डिंग नं. 52 के पास: वहीं पर वह रहता था...)
बेशक, स्मारक एक दूसरे को परेशान कर रहे थे.
(उसी तरह च्कालव एवेन्यू पर, जो लेनिन स्ट्रीट को काटता है, च्कालव की लगभग
पडोसी अर्ध-प्रतिमाएँ एक दूसरे के साथ हस्तक्षेप करती हैं – पेत्रोग्राद की तरफ़ न
जाने क्यों ‘डबलिंग’ पसंद करते हैं.)
पहले वाले लेनिन का लेनिन स्ट्रीट पर जन्मसिद्ध अधिकार था, मगर नया वाला
सिर्फ प्रवासी था.
मगर नए लेनिन के पास एक फ़ायदेमंद चीज़ थी – काँसा: पहले वाला तो काँन्क्रीट
का ही रहा. तो क्या? यहीं पर वो हुआ : पहले वाला, जैसा कि हम जानते
हैं, ग्रेनाइट में बदल गया. मुकाबला न सिर्फ जारी रहा, बल्कि तीव्र हो गया. ग्रेनाइट – काँसा. और तब हमारा
पहला वाला, जो ग्रेनाइट का हो चुका था, स्वयम् को खोकर ग्रेनाइट के गोले में परिवर्तित हो
गया. बेशक, अपने आप नहीं, बल्कि किन्हीं अफ़सरों और वरिष्ठ अधिकारियों की इच्छा से, मगर क्या वे ये
जानते थे कि उनकी इच्छा एक उच्च विचार के अधीन है?
और अब लेनिन स्ट्रीट पर पैडेस्टल्स के ऊपर लेनिन से जुड़ी हुई दो चीज़ें हैं, - ग्रेनाइट का गोला
तथा सिर और कंधों तक अर्ध-प्रतिमा.
और अगर गोले से दूर हटकर पुरानी शिरोकाया स्ट्रीट, आजकल की लेनिन स्ट्रीट
पार करो, तो उस तरफ़ वाले इंटर-यार्ड पार्क में – हमारे पैडेस्टल वाले गोले को संतुलित
करती हुई – एक और विचित्र वस्तु दिखाई देती है : कोई काँन्क्रीट जैसी, भद्दी-सी, खंभे जैसी. किसी निर्जन
जगह पर किसी की कब्र पर ऐसा निशान लगाया जाता होगा. मगर यहाँ तो लोग रहते हैं! काँन्क्रीट
में दरारें पड़ गई हैं, इबारतों और तस्वीरों समेत रंग उतर गया है, अभी भी पढ़ा जा सकता
है : “यहाँ कोल्या है”, - मगर फिर भी, ये मज़ाक ही होगा. मुझे लगता है, कि ये चीज़, ये लुप्त होती हुई प्रकृति, पैडेस्टल के ऊपर वाले ग्रेनाइट के गोले के साथ मिलकर एक
अपनी ही तरह की संरचना बनाती है. वहाँ – आदर्श का आदर्श, और यहाँ – अपरिपूर्णता का स्मारक.
या बेहतर होगा : अपरिपूर्णता का स्मारक – छोटे अक्षर से.
मैंने वहाँ के पुराने निवासियों से पूछा, कि ये क्या चीज़ है, क्या यहाँ पर पहले कुछ था. कोई भी मेरी बात का जवाब नहीं
दे सका – सब कुछ भुला दिया गया है. सिर्फ एक बुढ़िया को याद आया : “यहाँ मेरी-गो-राउण्ड
(हिंडोला) था, - और फिर, कुछ सोचकर, आगे बोली : - अरे नहीं – झूला”.


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें