गुरुवार, 15 नवंबर 2018

Conspiracy - 04




                     
                                    और, कोहिरर* कहाँ है?



जवानी के दिनों में अपनी पहली विशेषज्ञता – “रेडियो इंजीनियरिंग”, के अनुरूप मैं रेडियो इंजीनियरिंग प्रयोगशाला के सोल्डरिंग आयर्न के पास बैठा था. अगले कुछ साल मुझे फेडेरल रेडियो में काम करने का मौका मिला, मगर अब “आयर्न” के साथ नहीं, बल्कि शब्दों के साथ : रेडियो-नाटकों के कार्यक्रम के लिए लिए नाटक लिखता था. इन्स्टीट्यूट की प्रयोगशाला में, और रेडियो के संपादकीय विभाग में एक जैसे उत्साह से, अपने ख़ास व्यावसायिक उत्सव की तरह रेडियो-दिवस मनाया जाता था. सब जानते थे, कि 7 मई को इतने-इतने साल पहले हमारे देशबंधु पपोव ने सार्वजनिक रूप से किसी ऐसी चीज़ का प्रदर्शन किया था, जिसका उसने ख़ुद आविष्कार किया था – हाँ, वो ही रेडियो, जैसा वो है, जिसके लिए हमारी ओर से उसे बहुत-बहुत धन्यवाद. पहला जाम पपोव के नाम.

रूस में बहुत सारे पपोव हैं, मगर जैसे ही “पपोव” कहते हो – पहला ख़याल रेडियो के ही बारे में आता है.
उसका स्मारक अर्धशताब्दी से ज़्यादा कार्पोव्का और कामेन्नाओस्त्रोव्स्की एवेन्यू के बीच वाले पार्क में है. ये जगह बिना सोचे-समझे नहीं चुनी गई है : कार्पोव्का के उस ओर, अप्तेकार्स्की द्वीप पर, अलेक्सान्द्र III इलेक्ट्रो-टेक्निकल इन्स्टीट्यूट में अलेक्सान्द्र स्तिपानविच पपोव पढ़ाता था और प्रयोग करता था, वह रहता भी वहीं था – टीचिंग फैकल्टी के लिए बनाई गई बिल्डिंग में. मगर पपोव, जो पैडेस्टल पर खड़ा है, अभी इटेइ का प्रोफेसर नहीं है, और वह क्रोन्श्ताद्त में रहता है, क्योंकि वहाँ खान-अफ़सरों की क्लास में पढ़ाता है, हालाँकि ये उसकी जीवनी का हिस्सा है, मगर यहाँ, पैडेस्टल पर उसकी भौतिक छबि के अवतरण के बारे में सब कुछ एकदम सही है :  अभी वह इम्पीरियल सेंट पीटर्सबुर्ग विश्वविद्यालय में भाषण दे रहा है, और इस भाषण का शीर्षक है “धातुई चूर्णों और विद्युत कम्पनों के बीच संबंध के बारे में”. पार्क में आने वाला हर व्यक्ति, स्मारक की ओर जाते हुए स्वयम् की रूसी भौतिक-रसायनिक सोसाइटी की ऐतिहासिक मीटिंग के सदस्य के रूप में कल्पना करने के लिए स्वतंत्र है. किसी नई, अज्ञात चीज़ की प्रत्याशा से ख़ुश क्यों न हुआ जाए? देखिए, महाशय : वक्ता के बाएँ हाथ के पीछे कोई रहस्यमय चीज़ बनी हुई है (वैसे – पपोव के बाएँ हाथ की एक्स-रे तस्वीर – रूस के पहले रेडियोग्राफों में से एक है – उसी के नाम के केन्द्रीय संचार म्यूज़ियम में उसे देखा जा सकता है).

पपोव की 46 साल की उम्र में मृत्यु हो गई. मगर पैडेस्टल पर उसे पचास से ज़्यादा का दिखाया गया है. शिल्पकार वी. या. बगाल्यूबव को दोष देने की जल्दी न कीजिए – सभी फोटोग्राफ़्स में वैज्ञानिक अपनी उम्र से बड़ा ही दिखाई देता है. असल में इस समय उसकी उम्र छत्तीस साल है. सन् 1895. पुराने कैलेण्डर के हिसाब से 25 अप्रैल, और नये के हिसाब से – 7 मई. पचास वर्षों के बाद सोवियत ऑफ पीपल्स कमिसार्स रेडियो दिवस निश्चित करेगी – पहली बार उसे युद्ध समाप्त होने से दो दिन पूर्व मनाया जाएगा.

और ख़ुद स्मारक का उद्घाटन ए.एस. पपोव की जन्म शताब्दी के अवसर पर किया गया.

22 मार्च 1959 के उजले इतवार को इण्डस्ट्रियल-कोऑपरेशन के कल्चरल पैलेस के सामने एक हज़ार से ज़्यादा लोग एकत्रित हुए. सोवियत संघ का राष्ट्रगान सम्पन्न हुआ. आवरण हटाया गया, और लोगों के सामने स्मारक प्रकट हुआ. सबने दुनिया को अपना आविष्कार दिखाने को तैयार पपोव को देखा. “ईवनिंग लेनिनग्राद”, जो सोमवार को निकलता था ने बड़े साधारण तरीके से लिखा : “वह खड़ा है, बेडस्टैण्ड का सहारा लिए, जिस पर उसके आविष्कार - रेडियो-उपकरण की छवि है”. “स्मेना” प्रकाशित हुआ मंगलवार को और उसने भी “बेडस्टैण्ड” का ज़िक्र किया. बाद में फर्नीचर की इस चीज़ में व्यासपीठ देखा गया. “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा” ने विस्तार में न जाते हुए, सिर्फ इतना लिख दिया : “पहला रेडियो सेट काँसे में अमर हो गया”. 

पता नहीं, कि इससे पहले रेडियो सेट्स को काँसे में अमर किया जाता था या नहीं. हो सकता है, कि रेडियो सेट का यह पहला स्मारक हो. ज़ाहिर है, सिर्फ उसका नहीं – सबसे पहले आविष्कारक का, और रेडियो सेट का भी. और न सिर्फ रेडियो सेट का, बल्कि पहले रेडियो सेट का.

पहला स्मारक रेडियो सेट का, ऊपर से – पहले रेडिओ सेट का.

मॉडेल के रूप में पहले रेडियो सेट को ए.एस. पपोव के म्यूज़ियम-क्वार्टर में रखा गया है, ये स्मारक से दो कदम दूर है. मगर यदि आपको पच्ताम्त्स्की-लेन तक जाने में कोई परेशानी न हो, तो मैं संचार-म्यूज़ियम की सिफ़ारिश करूँगा : वहाँ सीधे मौलिक रेडियो सेट को देख सकते हैं और मूल्यांकन भी कर सकते हैं, कि उसे काँसे में कितना सही-सही ढाला गया है.

आम तौर से, रूस में पपोव के कई स्मारक हैं, रेडियो सेट्स के साथ भी हैं. जैसे एकातेरिनबुर्ग में, जहाँ नौजवान पपोव ने एक थियोलॉजिकल स्कूल में दो साल बिताए थे, अलेक्सान्द्र स्तिपानविच पपोव, परिपक्व आयु का, रेडियो सेट की बगल में बैठा है, वैसे ही कच्चे लोहे के जैसा पपोव है, और हम, बड़े आत्मविश्वास के साथ, उस उपकरण में “टेलिफोन रिसीवर-प्रेषण का 1901 का नमूना देखते हैं (मूल वहीं, केन्द्रीय संचार म्यूज़ियम में है).

हाल ही में मैं पेर्म गया था, जहाँ बस यूँ ही पपोव के स्मारक के पास रुक गया : ये सबसे नया स्मारक न सिर्फ सौन्दर्यानुभूति देता है, बल्कि मुफ़्त में Wi-Fi. भी उपलब्ध करवाता है. अक्सर पपोव को परिपक्व आयु का दिखाया जाता है, मगर यहाँ पैडेस्टल पर वह एकदम छोकरा है. ये भी सही है, थियोलॉजिकल स्कूल के फ़ौरन बाद भावी वैज्ञानिक ने पेर्म छोड़ दिया, सेंट पीटर्सबर्ग के भौतिकी एवम् गणित संकाय में प्रवेश लेने के लिए. उसकी उम्र अठारह साल थी, और ये, शिल्प में ढला हुआ सबसे कम उम्र का पपोव है. स्मारक के साथ 25 अप्रैल 1895 के प्रदर्शन से संबंधित दो अतिरिक्त चीज़ें भी जुड़ी हुई हैं, वैसे, पेर्म वाले पपोव को वहाँ तक पहुँचने के लिए अभी काफ़ी जीना था. अलग-अलग पैडेस्टल्स पर रखी गईं ये चीज़ें प्रदर्शित करती हैं : (i) प्रेषण यंत्र के अलग-अलग हिस्सों का संयोजन और (ii) ख़ुद पहला रेडिओ सेट, वही वाला. इसलिए पहले रेडिओ सेट का ये कम से कम दूसरा स्मारक है.

पहले रेडिओ सेट के पेर्म वाले स्मारक को ध्यान से देखने के बाद, मैंने सुनिश्चित किया कि सभी ज़रूरी पार्ट्स दिखाए गए हैं (स्मारक के पास तारों और तार वाले एन्टेना के न होने को माफ़ किया जा सकता है). सबसे ज़्यादा तसल्ली मुझे उस पार्ट की मौजूदगी से हुई, जिसके बारे में हम ख़ास तौर से बात करेंगे. ये कोहिररकहलाता है, जो इस रेडियो सेट का करीब-करीब मुख्य पार्ट है. बात ये है, कि लेनिनग्राद्स्की-पीटर्बर्ग्स्की स्मारक में – और ये रहस्यपूर्ण है! – उसे, जैसे, जानबूझकर छुपाया गया है.

तो, हम अपने, पीटर्सबर्ग वाले स्मारक की तरफ़ लौटे.

अब मन को एकाग्र करके स्मारक का चक्कर लगाना है.

पपोव के पीछे, उसके पैरों के पास रखे ठीक-ठाक आकार के एक यंत्र पर फ़ौरन नज़र पड़ती है. ये रुम्कोर्फ की इंडक्शन कॉइल है, हेर्ट्ज़ के वाइब्रेटर के साथ. संभवतः कॉइल को डिस्चार्जर के साथ अभी एक निश्चित दूरी पर ले जाएँगे – उसकी और ख़ुदा की मदद से वातावरण में विद्युत-चुम्बकीय कम्पन भेजे जाएँगे (“हेर्ट्ज़ किरणें”, ऐसा उस समय कहते). वर्ना वह वहाँ, पपोव की पीठ के पीछे क्या कर रही है? भारी-भरकम शान से प्रदर्शित की गई रोम्कोर्फ-इंडक्शन कॉइल ये एहसास जगाने के काबिल है कि यहाँ वह सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है. मगर हम ऐसा नहीं सोचेंगे. आविष्कार का नयापन उससे ज़रा भी संबंधित नहीं है. ख़ास तौर से उसकी ओर मुड़ते हैं, जो रिसीवर है.

पैडेस्टल ऊँचा है, और व्यासपीठ भी ऊँचा है, ऊपर से वक्ता का हाथ रेडियो को ढाँक रहा है, मगर कोई बात नहीं, देख सकते हैं – किनारे से, पपोव की कोहनी के पीछे से देखेंगे. कोई बेलनाकार चीज़ – ये अति संवेदनशील टेलिग्राफ़-रिलेहै. “लकड़ी की” (जैसे लकड़ी की हो) दीवार अच्छी तरह दिखाई देती है. अंदर की ओर से उसकी बगल में कोई समतल चीज़ है, ठीक से समझ में नहीं आ रही है, शायद कोई दूसरा “बोर्ड”, - नहीं, “बोर्ड” नहीं, ये बैटरीज़ हैं. बड़ी दिलचस्प बात है, यंत्र व्यासपीठ पर इस तरह क्यों मोड़ा गया है, कि जनता की ओर उसका पिछला, कम दिलचस्प हिस्सा हो? और, सबसे महत्वपूर्ण भाग है – उस ओर, सामने की ओर, दीवार के उस ओर. सबसे महत्वपूर्ण भाग देखेगा वो, जो वक्ता की पीठ की तरफ़ जाएगा. तो हम, पपोव की पीठ के पीछे खड़े होकर सामने वाली छोटी-सी दीवार की ओर देख रहे हैं, और हम क्या देखते हैं? घण्टी.

सही है, कि वहाँ घंटी है. उसकी यही जगह है. मगर कोहिररकहाँ है?

कोहिरर’ (अभी समझाता हूँ), या दूसरे शब्दों में ब्रेन्ली की ट्यूब, अपने आविष्कर्ता एडवार्ड ब्रेन्ली के नाम पर, - ये सचमुच में ट्यूब है, ख़ुद तो काँच की है, मगर उसके अन्दर धातु की छीलन होती है. जिसके भीतर हेर्ट्ज़ की किरणों के प्रभाव से “विद्युत प्रवाह के प्रति प्रतिरोध” में तेज़ी से गिरावट आती है, क्योंकि ट्यूब के भीतर धातु के कण या तो आपस में “गुंथ जाते हैं” (लॉज के अनुसार), या “जुड़ जाते हैं” (पपोव के अनुसार), मगर वैज्ञानिक धातुई पावडर के गुणों के बारे में चाहे कुछ भी कहें, उन्हें एक बात ने उत्साहित किया : ये यंत्र विद्युत-चुम्बकीय कम्पनों पर प्रतिक्रिया करने में सक्षम है. सिर्फ हर प्रक्रिया के बाद ट्यूब को हिलाना पड़ता है. इंग्लैण्ड में रेडियो के आविष्कारक के रूप में सम्मानित ऑलिवर जोसेफ़ लॉज ने कोहिरर को (उसीने इस शब्द का आविष्कार किया था) रिकॉर्डिंग यंत्र – डायल गैल्वेनोमीटर या साधारण घण्टी के साथ सर्किट में जोड़ दिया. हेर्ट्ज़ वाइब्रेटर द्वारा भेजे गए धक्के के कारण कोहिरर उच्च चालकता की स्थिति में आ जाता है, जिसके बारे में रेकॉर्डर – जैसे घंटी सूचित करती है. खनखनाहट को रोकने के लिए पाउडर वाली ट्यूब को धक्का देना पड़ता था. लॉज के प्रयोगों में उसके ऊपर एक घड़ी के कलपुर्ज़ों से जुड़ा हुआ छोटा सा हथौड़ा चोट करता था.

और हमारे पपोव ने क्या किया? उसने लॉज के प्रयोगों को जारी रखा. उसने कोहिरर के साथ ख़ुद घण्टी को जोड़ दिया, मतलब विपरीत सम्पर्क स्थापित किया : जब विद्युतचुम्बकीय आवेग से कोहिरर फिर से उच्च चालकता की स्थिति में आ जाता, संवेदनशील रिले (एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त घटक!) घण्टी से बैटरी को जोड़ देता, उसका आर्मेचर कप पर ज़ोर से मार करता, वो, कम्पित होकर फिर से तीव्र प्रतिरोध की स्थिति ग्रहण कर लेता, और घण्टी का रिले के माध्यम से फिर से सम्पर्क टूट जाता. लम्बे सिग्नल – घण्टी देर तक बजती, छोटी – संक्षिप्त.

पपोव के बाद मार्कोनी ने, कोहिरर के अपने नमूने को पेश करते हुए इसी सर्किट को अपनाया.

हमें मार्कोनी की क्या ज़रूरत है? हम दूसरी बात कर रहे हैं.

तो, जब तक पपोव, मतलब, व्यासपीठ पर अपना भाषण पढ़ रहा है, हम उसकी पीठ के पीछे खड़े रहते हैं, रेडियो सेट की ओर देखते हैं और दीवार पर घण्टी देखते हैं, मगर कोहिरर हमें दिखाई नहीं देता. मगर भाषण का अधिकांश भाग तो ख़ासकर धातु की पाउडर वाली ट्यूब को समर्पित है, और इसे किसी और नाम से तो नहीं जाना जाता, याद दिलाता हूँ : “धातुई चूर्णों और विद्युत कम्पनों के बीच संबंध के बारे में”. कोहिरर की समस्या पपोव को बहुत परेशान कर रही थी. उसने बाद में भी इन कोहिरर्स में सुधार किए...संचार-म्यूज़ियम में पपोव द्वारा इस्तेमाल किए गए पाउडर्स का एक पूरा संग्रह है.

मगर कोहिरर कहाँ है?

पपोव को इस बात का श्रेय जाता है कि अपने यंत्र में उसने वायर-एन्टेनाका उपयोग किया (टेस्ला इसका आविष्कार कर चुका है), - बहुत ख़ूब!

फिर पपोव ने वायरकिससे जोड़ा? बेशक, कोहिरर से! मगर वो ही नहीं है.

कहेंगे, कि ये रेडिओ सेट का स्वाभाविक मॉडेल नहीं है, बल्कि सामान्य नमूना है. एक गूंगी ट्यूब को नज़रअंदाज़ क्यों न करें, जबकि सबको समझ में आने वाली घंटी वहाँ मौजूद है? मगर, ठहरिये: बैटरीज़, दीवार के पिछले हिस्से से चिपकी हुई हैं, करीब-करीब दिखाई नहीं दे रही हैं, मगर उनके बारे में तो कोई नहीं भूला. फ़ालतू-सा एलेक्ट्रोमैग्नेट भी ठीक घंटी के ऊपर दिखाया गया है. कोहिरर को पकड़ने वाले होल्डर्स की जोड़ी भी है, मगर ख़ुद कोहिरर उनके बीच नहीं है.

मगर सबसे नये वाले पेर्म के स्मारक में कोहिरर बीच में मोटा भी है – ये, रबर की मुहर, शायद, बहुत मामूली पार्ट है, जो कोहिरर को आकस्मिक आघात से बचाने के लिए है. ऐसा भी है!
मगर हमारे यहाँ, पीटर्सबर्ग में, कोहिरर नहीं है.

न जाने क्यों मुझे ये बात परेशान करती है. कि कोहिरर नहीं है.

पपोव ने, बेशक, कोहिरर में महँगी प्लेटिनम की प्लेट्स इस्तेमाल की थीं, मगर ये बहाना, कि “कहीं चोरी न हो जाएँ” मुझे मज़ाक लगता है. हो सकता है, कि कारण किसी गुप्तता से संबंधित हो? वैसे भी, अलेक्सान्द्र स्तिपानविच सैन्य-विभाग के लिए काम करता था और उसे हर चीज़ के बारे में खुल कर बोलने की आज़ादी नहीं थी? चाहे जो हो, इतिहासकार इसी बात के आधार पर उसके भाषणों में अजीब, अधकही बातों को समझाते हैं. जैसे वह जानबूझकर ये दिखा रहा हो, कि अपने आविष्कार को कोई ख़ास महत्व नहीं दे रहा है. जैसे जानबूझ कर ये दिखा रहा हो, कि उसने सिर्फ विद्यार्थियों के लिए आविष्कार किया है. मगर ख़ुद...

हो सकता है, कि इसका कारण “शीत युद्ध” हो. जो सन् 1959 में शुरू हो गया था, जब स्मारक का उद्घाटन किया गया था, और न केवल हर बात में गुप्तता रखने की अपरिहार्यता, बल्कि उसका पालन करने की आवश्यकता को भी प्रदर्शित किया जा रहा था?...हर बात अधूरी सी, और (या) ढंकी-छुपी होनी चाहिए. भौगोलिक नक्शों को जानबूझ कर बिगाड़ा गया. युद्ध-पूर्व की शहर की योजनाओं को पुस्तकालयों से हटा लिया गया. या, जैसे सत्तर के दशक में हम विद्यार्थियों को अपनी उन चीज़ों का ज़िक्र करने की मनाही थी, जिसके बारे में विदेशी सैन्य-पत्रिकाएँ खुल्लम-खुल्ला विस्तार पूर्वक जानकारी देती थीं. होल्डर्स हैं, मगर कोहिरर नहीं है. पता नहीं अचानक...

हाँ...भटक गया...मगर था, था तो सही पपोव के पास कोहिरर!

हो सकता है, वह पपोव की जेब में हो?

पपोव अभी जेब से कोहिरर निकालेगा, उसे स्प्रिंग से जोड़ेगा, रेडियो सेट को मोड़्कर उसका मुँह दर्शकों की ओर करेगा और - -

वर्ना तो, कैसे?

 
                                                                                   
      --------------------------------------------------------------------------------------------
* कोहिरर – रेडिओ सिग्नल डिटेक्टर
        

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें