रविवार, 2 दिसंबर 2018

Conspiracy - 07



               
सिर्गेइ मिरोनिच ने दुःस्वप्न को भगा दिया



अस्सी के दशक के मध्य मे गेनादी ग्रिगोरेव ने एक कविता लिखी, जो अनेक काव्य-संध्याओं में कवि की प्रस्तुति के कारण फ़ौरन प्रसिद्ध हो गई. कविता की भूमिका, जो अपने आप में महत्वपूर्ण है, बेहद कामयाब हुई (मुझे याद है, कि सन् 1986 में पैलेस ऑफ कल्चर में आयोजित कवियों की प्रतियोगिता “रेड अक्तूबर” में ग्रिगोरेव को, जिसने प्रभावशाली ढंग से इसे प्रस्तुत किया था, दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था, जबकि पहला पुरस्कार विक्टर क्रिवुलिन को मिला था). इस अतुकान्त काव्यात्मक पाठ में किसी “जॉर्जियन” और “रूसी” की बातचीत का वर्णन है, जो नेवा के डेल्टा पर शिकार के लिए गए थे. कोन्याक पीकर और जी भर के शिकार करने के बाद दोनों प्रकृति के सौंदर्य में खो जाते हैं, और तभी “रूसी” को मानो सपना आता है. भूमिका के अंतिम भाग में स्पष्ट हो जाता है कि ये शिकारी कौन हैं.
और तब जॉजियन बोला: “कॉम्रेड कीरव!”
नहीं, मैं, शायद, झूठ बोल रहा हूँ. अकेले में
वे हो जाते बेतकल्लुफ़. और स्तालिन ने कहा:
“सेर्गो, तुझे पता है, ये जगह
मुझे बेहद पसंद है. सोचता हूँ, लोगों को भी
वो अच्छी लगेगी. चल, हम इस जगह को
श्रमिकों की आरामगाह बनाएँ. और द्वीप को
मैं श्रमिक द्वीप कहूँगा!”
मिरोनिच चुप रहा. इसी पल
उसे सपना आया. दूर,
दलदली पौधों वाले द्वीप पर,
अचानक देखा उसने भीड़ को.
थे वे ख़ौफ़नाक, जैसे
नरक के प्रेत, अमंगल दुनिया के,
अजीब चिथड़ों में लिपटे,
नीले-सफ़ेद झण्डे हिलाते,
किसी ज़ेनिथको देख “हुर्रे” कहते,
लपके पहाड़ी पर हमला करने.

और अचानक – देखा ख़ुद को! पैडेस्टल पर!
पूरा काँसे का और अपनी कैप में,
अपने हाथ से जैसे दे रहा हो
गरजती भीड़ को आशीर्वाद...

ख़ौफ़ से सोचा उसने: “नहीं, ये नहीं हमारे...”
(लोग नहीं थे श्रमिकों जैसे...)
दोनों हाथ हिलाकर,
सिर्गेइ मिरोनिच ने भगाया दुःस्वप्न को!
और सुनी फिर स्तालिन की आवाज़:
“और वहाँ, सेर्गो...हाँ, वहाँ, जहाँ तुम देख रहे हो,
बनाएँगे हम तुम मिलकर
एक स्टेडियम!” 

कविता का शीर्षक है “डे ऑफ ज़ेनिथ, और वह समर्पित है एक सच्ची घटना को – नहीं, स्तालिन और कीरव के द्वीप पर शिकार को नहीं, बल्कि कविता के रचयिता, ख़ुद गेनादी ग्रिगोरेव, और कवि-अनुवादक, बाद में – साहित्यिक आलोचक, और राजनीतिक पर्यवेक्षक, विक्टर तपरोव की (कविता में वह अब्राम कलूनव है) कीरव स्टेडियम की सैर को, जहाँ ज़ेनिथ’(लेनिनग्राद) और दिनामो (कीएव) के बीच फुटबॉल मैच चल रहा था.        

ग्रिगोरेव की रचना कई बातों में उल्लेखनीय है, मगर फ़िलहाल हमें इस बात में दिलचस्पी है कि वह स्मारक के विषय को कैसे छूती है.

मुश्किल से ही इस स्मारक की काव्यात्मक छबि कहीं मिलेगी (शिल्पकार - वी.बी.पिन्चुक, वास्तुकार - एल. एम. हिदेकेल). आजकल के कवि आमतौर से स्मारकों पर, शहरी शिल्पकला पर मुश्किल से ही ध्यान देते हैं. हमारे लिए छबि के रूप में ख़ुद ग्रिगोरेव का प्रमाण ज़्यादा महत्वपूर्ण है (चाहे वह “जीवित”, भविष्य को स्पष्ट रूप से देखने वाले, मानो ऐतिहासिक कीरव के स्वप्न के रूप में ही क्यों न दिखाया गया हो): स्मारक और गरजती हुई भीड़, काँसे का कीरव और ज़ेनिथके प्रशंसक – ये तस्वीरें हैं मेरी जवानी के दिनों की.   

अपने बेहतरीन दिनों का ऐसा ही वह हमारी यादों में रह गया है – स्टेडियम की सीढ़ियाँ उतरते हुए, जिसे उसका नाम दिया गया है, हाथ फैलाए उमड़ती हुई भीड़ को आशीर्वाद देते हुए, जो एक सुर में नारे लगाते हुए ज़ेनिथका जोश बढ़ा रही है और ज़ेनिथके दुश्मनों को “हाय-हाय!” कर रही है, सब एक जैसे खूँखार, उनका भी उसकी प्रेरणादायक भंगिमा स्वागत कर रही थी (इनमें से कुछेक नारों का लेखकत्व फिर से गेनादी ग्रिगोरेव को दिया जाता है, मगर नहीं, ‘फैन्स महाशय, ये बिल्कुल सीधा-सादा लोक साहित्य है).

सन् 1950 में, जब स्टेडियम का उद्घाटन हो रहा था, तब, अगर अख़बारों पर भरोसा किया जाए, तो अनुशासन कुछ ज़्यादा ही था. बीच वाले मंच के ऊपर स्तालिन का एक बहुत बड़ा चित्र था, भाषण, झण्डे, बैनर्स उठाने वालों की, स्पोर्ट्स-सोसाइटीज़ के प्रोफसयूज़ के प्रशिक्षकों की और मिलिट्री-नेवल खिलाडियों की पंक्तियाँ थीं, अद्वितीय एथलीट निकोलाय पपोव था, दौड़ हो रही थी, जेवलीन फेंके जा रहे थे, जिम्नास्ट्स, एक्रोबेट्स, साइकलिंग करने वाले, जवान खिलाड़ी अपने खेल दिखा रहे थे और गोल-नृत्य कर रहे थे, रक्षा और आक्रमण के तरीकों का प्रदर्शन करते हुए कुश्ती हो रही थी, “एथलीटों के सबसे अच्छे दोस्त महान स्तालिन की – जय हो!” था, और समारोह के दूसरे भाग में था फुटबॉल मैच.

लेनिनग्राद की दो टीमें ज़ेनिथऔर दिनामोखेल रही थीं. दिनामो ने चौथे मिनट में गोल बनाया, मगर फिर बारिश होने लगी, और “ज़ेनिथ” ने खेल के दूसरे भाग में खेल को ड्रा पर समाप्त कर दिया...

स्टेडियम में सीढ़ी के दोनों ओर बने खिलाड़ियों के शिल्प काँस्य-कीरव का समर्थक-ग्रुप बना रहे थे. वह ख़ुद शानदार क्यारी के ऊपर खड़ा है. वह ख़ुशी बिखेर रहा है. वैसे वह इस जगह के लिए नहीं बनाया गया था. वह ख़ुद – अपना आप - नहीं है, वो अपना स्वयँ का भाई है. “एस. एम. कीरव स्टेडियम” वाला कीरव – शिल्पकार की पुनरावृत्ति है दूसरे कीरव की - कीरव कारखाने के क्षेत्र वाले कीरव की.

उस कीरव को कीरव कारखाने में सन् 1939 में ही स्थापित कर दिया गया था, जब क्रेस्तोव्स्की द्वीप पर (याने, कीरव-द्वीपों में से एक पर * ) भावी स्टेडियम - आर्किटेक्ट निकोल्स्की के अग्रगामी(avant garde) निर्माण की नींव के लिए अभी लम्बा चौड़ा हिल-क्रेटर बन ही रहा था. दोनों कीरव जैसे जुड़वा-भाई हों. कारखाने वाला हाथ के इशारे से श्रमिक वर्ग को श्रमिक उपलब्धियों के लिए प्रेरित करता है, और यहाँ का कीरव उसी जोशपूर्ण इशारे से श्रमिकों को आराम के लिए आशीर्वाद देता है, साथ ही सोशलिस्ट निर्माण की दृश्य उपलब्धि – उसके नाम के (सही कहें तो छद्म नाम के) स्टेडियम को, और पार्क – “कीरव सेन्ट्रल विश्राम-पार्क” को भी प्रदर्शित कर रहा है.

कुछ नहीं कर सकते, किस्मत ने कीरव के इस स्मारक को इसी और सिर्फ इसी स्टेडियम से जोड़ा था. यहाँ स्मारक-कीरव एकाग्रता से देख रहा था.  यूँ ही नहीं स्टेडियम का निर्माण कीरव के संरक्षण में शुरू हुआ था. मगर सन् 2006 में स्टेडियम को नष्ट कर दिया गया. नये, आधुनिक स्टेडियम का निर्माण शुरू हुआ. कीरव को पैडेस्टल पर अच्छा लगना बंद हो गया.

ऐसा सिर्फ पहली नज़र में लगता है कि वह हमेशा एक जैसा है, हर बात पे ख़ुश है, हर चीज़ से संतुष्ट है. मगर ऐसा बिल्कुल नहीं है. उसका मिज़ाज बदलता रहता है. उसकी भावनाओं की छटा से, जो बाह्य कारणों से प्रभावित होती हैं, स्मारकों के मनोविज्ञान का अध्ययन किया जा सकता है.

बाएँ हाथ के इशारे से चारों ओर की हर चीज़ के प्रति ख़ुशी व्यक्त करना एक बात है, मगर जब हाथ के नीचे कोई चीज़ आ जाती है, तो बात कुछ और हो जाती है. पार्क के क्षेत्र में, फुटबॉल-एवेन्यू में एक शानदार घर क्यों है? ठीक वहीं, जहाँ कीरव हाथ के इशारे से दिखा रहा है. और इस बात से, कि इस अनुचित निर्माण को देवदार के वृक्षों की घनी दीवार से स्मारक से अलग कर दिया गया, सिर्फ ऐसा आभास होता है, कि कीरव से कुछ छुपाने की कोशिश की गई थी, मगर बात बनी नहीं – वह सब जानता है, सब देखता है. और चेहरे से, और हाव भाव से – अपने समूचे अस्तित्व से वह एक ही बात प्रकट करता है : “ये क्या है, कॉम्रेड्स? तुम पागल हो गए हो क्या? किसने इजाज़त दी है?”

एक समय ऐसा आया, जब उसकी तरफ़ ध्यान देना बंद हो गया. वह विचित्र शरारतों का केंद्र बिंदु बन गया. कीरव, अपनी युवावस्था में जानता था कि ऊँचाई पर विजय पाने का क्या मतलब होता है (वह रूसी पर्वतारोहण का प्रवर्तक था), मगर इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी लोग एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर ऊँचे पैडेस्टल पर चढ़ जाए (4.65 मीटर्स ऊँचा), और सिर्फ इसलिए कि स्मारक को चिढ़ाए, उसे गुस्सा दिलाए – उसके ऊपर कोई कागज़ चिपका दे या उसे भद्दे चीथड़ों से बांध दे. मुझे याद है धागे से बंधी एक प्लास्टिक की थैली जो उसकी उँगली से बंधी थी - ये किसी गुब्बारे का अवशेष था - काँसे का कीरव जैसे बगल में रखे हाथ से इस गंदगी को झटक देना चाहता था, और उसने काफ़ी नफ़रत से संघर्ष किया था.

तभी वह स्वयम् को यहाँ फ़ालतू समझने लगा था, मगर अपनी भावनाओं को छुपाने की, ये दिखाने की कोशिश करता रहा, कि अनादर के लक्षणों को देख नहीं रहा है, और इससे सिर्फ मज़ाक उड़ाने वालों को और जोश आ गया.

वैसे, स्मारकों की ये आम समस्या है. गलत स्थिति में पड़ने पर, अपनी गरिमा न खोते हुए, वे अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहते हैं – ऐसा दिखाते हैं, कि ये आम बात है, उनका इससे कोई लेना देना नहीं है. कि, असल में, वे अपने नीचे हो रही हलचल से, जो कभी-कभी आक्रामक भी हो जाती है, काफ़ी ऊपर हैं. इसलिए लोगों को लगता है, कि स्मारक कभी-कभी बेवकूफ़ बन जाते हैं. मगर असल में वे सिर्फ स्मारक ही रहते हैं. अपने निर्माता के निर्णायक आदेश पर स्मारक चाहे जो भी भाव प्रकट क्यों न करे – चाहे वह तीव्र भाव हो, अदम्य इच्छा हो, - स्मारक असल में अपनी भावनाओं को छुपाकर रखते हैं. वे लोगों से अपने वास्तविक संबंध को उनसे बख़ूबी छुपा लेते हैं, स्वयम् को संदिग्ध, अक्सर हास्य-शोकात्मक और, लोगों की नज़र में सिर्फ हास्यास्पद परिस्थितियों के हवाले कर देते हैं. और इसका उस बात से कोई लेना-देना नहीं होता, कि स्मारक अपने चारों ओर हो रही घटनाओं को समझते हैं या नहीं, या सिर्फ वे घटनाओं से चकित हो गए हैं.

कीरव स्टेडियम के सामने वाला कीरव, बेशक, सब समझ रहा था. वह, जैसा कहते हैं, मुँह बनाने की कोशिश करता था. हमेशा सफ़ल नहीं हो पाता था.

नये स्टेडियम के निर्माण से पहले पुराने स्टेडियम को तोड़ दिया गया. दोनों चीज़ों – स्टेडियम और स्मारक – को दुनिया से सुरक्षित रखने के लिए सिमेन्ट- कॉन्क्रीट की पट्टियों से घेर दिया गया. स्मारक की तरफ़ मैं सिर्फ उन पट्टियों के बीच की झिरी से ही देख सकता था. इस निर्जन जगह पर वह निपट अकेला रह गया था, और उसका एक तरफ़ निकला हुआ हाथ अब बदहवासी प्रकट कर रहा था. “अरे! अरे! तुम सब कहाँ हो? देखो तो, यहाँ क्या हो रहा है!” वीराने में रोते हुए आदमी की पुकार. मगर बेआवाज़, गूंगी.    

वैसे, उसे पहले की तरह पैडेस्टल पर देखना अजीब लगता था. उसे तभी क्यों नहीं फ़ौरन विघटित कर दिया गया, ये एक पहेली है. अपने ज़माने में तो स्टेडियम के औपचारिक उद्घाटन से एक महीना पहले उसका उद्घाटन हो गया था, मगर अब ऐसा लग रहा है (और न सिर्फ उसे), कि अपने नाम के स्टेडियम के नष्ट होने के बाद वह कुछ ही समय रह पायेगा. समय बीतता गया, मगर वह खड़ा रहा, खड़ा ही रहा.

नये वाले का निर्माण शुरू हुआ और मेरे जैसे जिज्ञासु लोगों के लिए उस सुरक्षित क्षेत्र में कुछ छेद खुल गए. वह जैसे वापस अपने होशो-हवास में लौट रहा था, वह पहले जैसा होने का दिखावा कर रहा था – इस नई ज़िम्मेदारी के नेतृत्व से उत्साहित, यहाँ – निर्माण कार्य से, जैसे कि उसके पीठ के पीछे होने वाली घटना का उससे कोई संबंध हो. मगर ग़ौर से देखने पर कुछ और नज़र आता है – परेशानी, जिसे प्रसन्नता के आवरण के पीछे उसने अपने समूचे अस्तित्व से छुपा रखा था.

कीरव को, बेशक, निर्माण कार्य की काफ़ी समझ थी. पीठ के पीछे भी वह महसूस कर रहा था कि सब कुछ ठीक नहीं है. क्या उनका कोई बजट है? कॉन्ट्रेक्टर को क्यों बार-बार बदल रहे हैं? क्या किसी विशिष्ठ प्लान के अनुसार काम हो रहा है?...काम का दायरा कैसे निश्चित हुआ है? असमतलता के कारण क्या हैं? क्या उनका कोई अंतिम उद्देश्य है?…

कन्ट्रोलर ऑफ अकाउन्ट्स के बगैर भी वह महसूस कर सकता था, उसकी पीठ के पीछे वे चाहे जो भी बना रहे हों, उसमें किस हद तक धन का दुरुपयोग हुआ है, नियमों का उल्लंघन हुआ है. कहीं बाबेल की मीनार तो नहीं बना रहे हैं? उसके नाम का विशाल माँस-प्रसंस्करण संयंत्र उसके सामने तीन साल में बनकर तैयार हो गया था, नये स्टेडियम का निर्माण दस साल खिंचेगा.

ख़तरनाक गवाह है.

वह काफ़ी कुछ जानता था. और बेशक, जानता है.

मैं दावे के साथ तो नहीं कह सकता, कि इसीलिए उसे यहाँ से हटाना चाहते थे, और, हो सकता है, अभी भी हटा दें, मगर कई लोगों को ख़ास तौर से उसकी यहाँ पर उपस्थिति अवांछनीय लगने लगी थी.

2 मार्च 2007 का दिन उसके लिए सबसे ज़्यादा भारी था, और वो भी इस बदनसीब निर्माण के कारण. वैसे तो निर्माण कार्य में प्रत्यक्ष रूप से कोई बाधा नज़र नहीं आ रही थी, “स्पेस स्टेडियम” का वास्तुकार किशो कुरकावा, जो अभी जीवित था, स्मारक के विरुद्ध नहीं था, और अगर कोई ये कहे, कि उसके जाते-जाते (जो निकट भविष्य मे होने वाला नहीं था) पृथ्वी नामक ग्रह पर एक अत्यंत महंगा स्टेडियम बनने वाला है, तो इसे कपोल-कल्पना ही समझा जायेगा. स्मोल्नी में नये स्टेडियम के बारे में मीटिंग चल रही थी. पीटर्सबुर्ग के ऐतिहासिक एवम् सांस्कृतिक स्मारकों के रख-रखाव तथा सुरक्षा से संबंधित शासकीय नियंत्रण कमिटी की प्रमुख उस समय वी. ए. देमेन्त्येवा थी. उसीके पास अप्रत्याशित रूप से गवर्नर वलेन्तीना इवानव्ना मत्वियेन्का कीरव के बारे में कुछ कहने के लिए आई.

यहाँ ये स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए, कि लेनिनग्राद प्रॉविन्शियल कमिटी की फर्स्ट सेक्रेटरी और सेंट पीटर्सबुर्ग की गवर्नर – ये पद काफ़ी हद तक उत्तराधिकार से जुड़े हुए हैं और अपने महत्व से भी संबंधित हैं (पहला, शायद, और भी ज़्यादा); म्युनिसिपल अर्थव्यवस्था के लिए गवर्नर मत्वियेन्का प्रथम सेक्रेटरी कीरव के प्रति उत्तरदायी है, इसलिए, जब वह अपने दूर के पूर्वज की स्मृति को झकझोरती है, ऊपर से उसे समर्पित स्मारक के अस्तित्व पर सवाल उठाती है, तो वह निश्चय ही एक प्रतीकात्मक क्षेत्र का उल्लंघन करती है. और ऐसा हो ही नहीं सकता कि इस पर ध्यान न जाए.
स्मारक अख़बार नहीं पढ़ते, उनके पास इंटरनेट नहीं होता, मगर वो हर ज़रूरी बात को शिद्दत से महसूस कर लेते हैं. ये कैसे होता है, हमारी समझ में नहीं आयेगा.

ये याद करके, कि कीरव-स्टेडियम का अब अस्तित्व नहीं है, पत्रकारों को चौंकाते हुए गवर्नर बोली: “तो फिर, हो सकता है, वहाँ अलेक्सेइ बरीसविच का या सिर्गेइ अलेक्सान्द्रोविच का स्मारक बनाया जाए?** ग़ौर से सोचिए, क्या हमें कीरव के स्मारक की ज़रूरत है. मैं कीरव के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, मगर ये फ़ैसला करना होगा कि क्या उसकी वहाँ ज़रूरत है.”

इसी समय कीरव के सिर पर एक पंछी बैठ गया – कबूतर नहीं. उसे कमसे कम तीन प्रवासी श्रमिकों ने देखा, मगर वे ठीक से रूसी नहीं बोलते थे और बता नहीं सके कि वह कौन सा पंछी था. हो सकता है कौआ हो, या फिर चील भी हो सकती थी...

यहाँ से कुछ दूरी पर, एलागिन द्वीप पर, एक चिड़ियाघर है, वहाँ कुछ बिरले पंछी भी रखे हैं, हो सकता है, उनमें से एक उड़ कर आ गया हो...

मगर क्या उनके पर नहीं कतरते?

कीरव ने सोचा : अंत आ गया है.      

वैसे, एलागिन के बारे में...क्या सब स्पष्ट नहीं है?...एलागिन द्वीप पर पार्क के प्रवेश द्वार के निकट, ठीक पुल के बाद, कीरव की अर्ध-प्रतिमा स्थापित की गई...ये सही है, कि उसे लेनिन के पैडेस्टल पर लगाया गया था, और लेनिन की अर्ध-प्रतिमा हटा दी गई...दूसरी ओर, वितेब्स्की रेल्वे स्टेशन को लीजिए...वहाँ लेनिन की अर्ध-प्रतिमा हटाकर त्सार निकोलाय पाव्लोविच की अर्ध-प्रतिमा स्थापित कर दी गई...सब कुछ सीधा नहीं है, सब विरोधाभासी है, उलझा हुआ सा है....
और ये सिर्गेइ अलेक्सान्द्रोविच कौन है? कहीं महान राजकुमार तो नहीं, जिसे कल्याएव ने गोली मार दी थी? एक बड़े सलीब की शक्ल में उसके स्मारक को फ़ौरन क्रेम्लिन में हटा दिया गया, जैसे ही वहाँ लेनिन पहुँचा...

ये सिर्गेइ अलेक्सान्द्रोविच कहीं कुद्र्याव्त्सेव तो नहीं? अज़रबैजान की कम्युनिस्ट पार्टी (बो.) की सेंट्रल कमिटी का सेकण्ड सेक्रेटरी (एक बार कीरव अज़रबैझान में फर्स्ट सेक्रेटरी था). उसे सन् ’38 में गोली मार दी जाती है – कीरव की मौत के साढ़े तीन साल बाद...

या...हो सकता है...येसेनिन हो?

उसी दिन स्मोल्नी की प्रेस-सर्विस ने गवर्नर के शब्दों को स्पष्ट किया. ये सिर्फ मज़ाक था.

मज़ाक...

कीरव ने मुश्किल से ही उसकी तारीफ़ की होगी.

     
                   
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* मगर श्रमिकों के द्वीप पर नहीं, जैसा कि गेनादी ग्रिगोरेव की कविता में लिखा है (यहाँ कवि ने थोड़ी सी भूल कर दी है). श्रमिक-द्वीप सन् 1920 से 1989 तक कामेन्नी द्वीप कहलाता था.         
** ए. बी. मिलर, चेयरमैन, मैंएजमेन्ट कमिटी, गाज़्प्रोम और एस. ए. फुर्सेन्को, “ज़ेनिथ” फुटबॉल क्लब के प्रेसिडेन्ट.                            


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