रविवार, 16 दिसंबर 2018

Conspiracy - 10


पहलों में पहला


बस, इतना मत कहिए, प्लीज़, कि आप जानते हैं कि निकालाय अन्तोनविच क्रिस्तोफारी कौन है.
नहीं, बेशक, सब कुछ हो सकता है, मगर ख़ुद मुझे उसके बारे में तब पता चला, जब उसके लिए स्मारक बनाया गया. वो भी नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर.
नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर उससे पहले भी स्मारक थे.
बार्क्ले और कुतूज़व केथिड्रल के सामने, ‘कैथेरीन द ग्रेट गार्डन में, ग्योथे चर्च के सामने वाले आँगन में, अलेक्सान्द्र नेव्स्की चौक में, हालाँकि किसी और विचार से, अलेक्सान्द्र नेव्स्की का चौक बिल्कुल भी  नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट नहीं है... और ये – क्रिस्तोफारी. नेव्स्की की ओर, मतलब सीधे उसके रास्ते पर, सबसे नज़दीक है. और अगर हम क्रिस्तोफारी की उपस्थिति पर ध्यान नहीं देते, तो ये हमारी लापरवाही की वजह से है. स्मारक मज़बूत है – काँसे का, पूरे आकार का. दूसरी ओर से, वह भी अच्छा है, वह ख़ुद ही अपने आप पर ध्यान नहीं देता, ये बात नहीं कि वह छुपना चाहता है, बल्कि अपने आप को थोपना नहीं चाहता – कोई उपदेश नहीं देता, किसी बात का आह्वान नहीं करता, अपनी ही समस्या मे उलझा हुआ है, जो उसके अपने कल्याण से संबद्ध है.
क्रिस्तोफारी – नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर सबसे जवान है : पहले, स्मारक की दृष्टि से, दूसरे, एक व्यक्ति की दृष्टि से, जो स्मारक में अमर हो गया है. एक व्यक्ति की दृष्टि से एन. ए. क्रिस्तोफारी का जीवन काल, जिसे अंत में अमर बना दिया गया : 1802-1881 था. नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर जिन्हें प्रदर्शित किया गया है, उन सब में – मृत्य के समय के हिसाब से – बेशक, ग्योथे उसके सबसे करीब है – उसकी आधी शताब्दी पहले मृत्यु हो गई थी.    
रहस्यमय क्रिस्तोफारी का एक और स्मारक है – मॉस्को में, और वह, शायद, ज़्यादा मज़बूत, ज़्यादा शानदार है. मॉस्को वाले स्मारक की ऊँचाई तीन मीटर्स है. पीटर्सबुर्ग वाला उससे थोड़ा कम है, मगर ज़्यादा नहीं.
मेरे लिए ये बड़े शर्म की बात है, कि मैंने क्रिस्तोफारी का नाम कभी नहीं सुना था...क्रिस्तोफारी का नाम कई स्मारक पट्टियों पर है. उसके सम्मान में डाक टिकट जारी किए गए थे. उसकी तस्वीर चांदी के तीन रुबल के स्मारक-सिक्के को सुशोभित कर रही है. उसे एक यादगार मेडल समर्पित किया गया है.
बस, इतना मत कहिए, कि आप ये सब जानते हैं. हालाँकि अब मैं भी उसके बारे में थोड़ा-बहुत जान गया हूँ. ज़्यादा नहीं, मगर थोड़ा-बहुत.
सेविंग्स बैंक ऑफ रशिया – इन्होंने ही क्रिस्तोफारी को याद किया था. और ये समारोह पूर्वक हुआ था : रूस में सेविंग्स-बिज़नेस की 165वीं सालगिरह के अवसर पर.
उकताने वाले स्पष्टीकरणों के चक्कर में न पड़ते हुए, तैयार लेख का उद्धरण देता हूँ – अजीब बात है, कि 6 सेंटीमीटर व्यास के छोटे से लकड़ी के वृत्त पर इतने सारे शब्द कैसे समा गए (ये, शायद लेज़र टेक्नोलॉजी की बदौलत संभव हुआ, जिसका रूस में पहली बार ऐसे मेडल्स को बनाने में प्रयोग किया गया था). संक्षेप में – (और सही में : इससे ज़्यादा संक्षेप में कह ही नहीं सकते.), संक्षेप में:
13 मार्च (पुराने कैलेण्डर के हिसाब से 1मार्च) 1842 को एन. ए. क्रिस्तोफारी ने सेंट पीटर्सबुर्ग ट्रेजरी (कज़ान्स्काया स्ट्रीट, 7) की पहली रशियन सेविंग्स-बैंक में दस चाँदी के रूबल्स की राशि जमा करके पहला खाता खोला. एन. ए. क्रिस्तोफारी को पासबुक नं. 1 दी गई.      
क्या बात है! पहला खाताधारक, जिसका उसे पुरस्कार भी मिला.
वहाँ एक और वाक्य भी है : एन.ए. क्रिस्तोफारी के स्मारक का उद्घाटन 13 मार्च 2007 को किया गया, - मगर ये जानकारी मॉस्को के स्मारक से संबंधित है, उसका, वैसे, मेडल के दूसरी ओर चित्र है, जबकि पीटर्सबुर्ग में पहले रूसी खाताधारक के स्मारक का उद्घाटन 12 नवम्बर 2006 को हुआ – रूसी सेविंग्स बैंक के कर्मचारी-दिवस के उपलक्ष्य में. अपने इस व्यावसायिक त्यौहार के लिए रशियन फेडेरेशन की सेविंग्स बैंक के कर्मचारी सम्राट निकोलाय प्रथम  के ऋणी हैं, जिसने सन् 1841में इसी दिन, मतलब पुराने कैलेण्डर के अनुसार 30 अक्टूबर को, सेविंग्स बैंकों के चार्टर को मंज़ूरी दी थी, यही दिन सेविंग्स-बैंक की सभी शाख़ाओं में सन् 1988 से मनाया जाता है.
मॉस्को के स्मारक का प्रवर्तक है – शिल्पकार अलेक्सान्द्र  रुकावीश्निकव.
पीटर्सबुर्ग के स्मारक का – कलाच शहर का अलेक्सान्द्र कज़ीनिन.
मॉस्कोवाला रशियन फेडेरेशन के सेविंग्स बैंक के प्रमुख ऑफिस के प्रवेश द्वार के सामने खड़ा है.
पीट्र्सबुर्ग वाले का पता है : नेव्स्की 101 – स्थानीय सेविंग्स बैंक के प्रवेश द्वार पर , ऑफिस नंबर 9055/055.
प्रवेश द्वार का मतलब “सड़क पर” नहीं है, मगर “बिल्डिंग में” भी नहीं है. वहाँ एक आँगन जैसा बरामदा है, जो नेव्स्की के सारे प्रवेश द्वारों को जोड़ता है. अगर प्रॉस्पेक्ट पर चलने वाला अपना सिर घुमाए (और ट्रॉलीबस में जाने वाले को खिड़की से देखना काफ़ी है), तो उस प्रवेश द्वारों वाले बरामदे के बीचोंबीच उसे काँसे का क्रिस्तोफारी दिखाई देगा. वह जैसे बैंक से बाहर निकल रहा है, और उसके पीछे काँच का दरवाज़ा बंद हो गया है, अब वह सीढ़ियों से नीचे उतरकर (वे आठ हैं) और विस्तीर्ण गलियारे से होकर नेव्स्की के फुटपाथ पर जाने वाला है.         
मगर फिर उसने दाएँ हाथ में बड़ा-सा सिक्का क्यों पकड़ रखा है? (हम उसके पास आ गए हैं : हाँ उसने सिक्का पकड़ रखा है, उस पर मूल्य नहीं दिखाया गया है, मगर हमें तो मालूम है कि के ये मानो चाँदी का रूबल है – और उसने बचत के लिए कुल चाँदी के दस रूबल्स दिए थे!)
सही में : अगर वह बैंक से बाहर आ गया है और काँच के दरवाज़े की ओर पीठ करके खड़ा है, तो उसने हाथ में चाँदी का रूबल क्यों पकड़ा है? कहीं, उन्होंने लेने से इनकार तो नहीं कर दिया? मगर रशियन फेडेरेशन की सेविंग्स बैंक में, नेव्स्की पर भी, चाँदी के रूबल्स स्वीकार नहीं करते – न तो 1841 में ढले हुए, न ही 1842 के...हाँ, और ऐतिहासिक क्रिस्तोफारी के जीवनकाल में इस जगह पर सेविंग्स बैंक भी नहीं था. यहाँ, वैसे कुछ भी नहीं था.
सब स्पष्ट है. वह अभी चाँदी के दस रूबल्स लेकर भीतर जाने वाला है, वह जैसे यहाँ है भी, और नहीं भी है, क्योंकि वह कज़ान्स्काया, 7 की तरफ़ जा रहा है, एजुकेशनल हाउस के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ में, जहाँ अभी पहली सेविंग्स बैंक खुलने वाली है.
बेकार ही में निकोलाय अन्तोनविच अन्य जमाकर्ताओं को कुहनियों से धक्का दे रहा है, ताकि पहला आ सके. कहते हैं, कि इस दिन कुल 76 लोग सेविंग़्स बैंक में अपनी धनराशि जमा कराने आए थे. क्रिस्तोफारी, हो सकता है, दूसरे या पाँचवें नम्बर पर हो. और तब हमारे ज़माने में स्मारक उसका नहीं, बल्कि किसी और का खड़ा करते.     
हमने शायद उसका नाम भी न सुना होता – क्रिस्तोफारी. हमें ये भी पता न चलता कि उसके गलमुच्छे कैसे हैं.
मगर उसके गलमुच्छे वाकई में शानदार हैं. अगर चिकनी ठोड़ी न होती, तो वे वैसे ही एक दूसरे से जुड़ जाते, दाढ़ी बना देते. मॉस्को वाला और पीटर्सबुर्ग वाला स्मारक गलमुच्छों की दृष्टि से एक दूसरे से मिलते हैं, बाकी तो पीटर्सबुर्ग और मॉस्को वाले क्रिस्तोफारी के चेहरे एक दूसरे जैसे नहीं हैं, उनके चेहरों के अनुपातों में वैसा ही फ़र्क है, जैसा लिंकन और पूश्किन के चेहरों में है, जैसा कभी-कभी मॉस्को और पीटर्सबुर्ग के क्रिस्तोफारी को सेविंग्स बैंक में आने वाले समझ बैठते हैं. और ये अचरज की बात नहीं है : जब नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर स्मारक का उद्घाटन किया गया था, तो पीटर्सबुर्ग के पत्रकारों को सूचित किया गया था, कि काफ़ी ढूँढ़ने के बाद निकोलाय अन्तोनविच की सिर्फ एक ही तस्वीर मिल पाई है – वह “महान सुधार” नामक छह खण्डों के संकलन की एक किताब में मिली है, जिसका सन् 1911 में विमोचन हुआ था, किसानों की स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर (क्रिस्तोफारी ने, शायद, कृषि-सुधार के विकास में योगदान दिया था). उसी इकलौते प्रसिद्ध चित्र के अनुसार ही पहले जमाकर्ता का शिल्प बनाया गया था.
मेरी यह देखने की इच्छा थी, कि किताब के पन्ने पर यह तस्वीर कैसी दिखती है, और मैं पब्लिक लाइब्रेरी चल पड़ा. क्रिस्तोफारी का चित्र वाकई में चौथे खण्ड में एव्गेनी विश्निकव के लेख “मुख्य कमिटी और संपादकीय कमिटी” के साथ छपे चित्रों में है. ख़ुद क्रिस्तोफारी के बारे में तो लेख में एक भी शब्द नहीं है, मगर, ज़ाहिर है, उसका इस संपादकीय कमिटी से कोई संबंध था, क्योंकि उसका चित्र अन्य कार्यकर्ताओं के दर्जनों चित्रों के बीच है, जिनके बारे में भी कोई जानकारी नहीं दी गई है. मैं तो इन तसवीरों को तसवीर कहने में भी हिचकिचाऊँगा – इतने छोटे-छोटे चित्र : माचिस की डिब्बी के लेबल पर, वैसे शायद दो-दो आ जाएँ. ऊपर से इन चित्रों को कई-कई लोगों के समूहों में छापा गया है. जिस समूह में क्रिस्तोफारी का चित्र है, उसमें छह लघु-तस्वीरें हैं, हरेक के नीचे संबंधित कार्यकर्ता का नाम दिया गया है, बिना उसके रैंक और स्थिति के, और ये सब पृष्ठ के बीच में है, और ऊपर, नीचे – लेख का मजमून है, जिसका इन छह लोगों से कोई लेना देना नहीं है. और उस नन्ही-सी तस्वीर से निकला इतना दृढ़ स्मारक? वो भी दो-दो. ये तो ऐसा ही हुआ, जैसे बीज से पेड़ निकलता है...
क्रिस्तोफारी को श्रेय देना पड़ेगा, उसका बेहद भावपूर्ण चेहरा है : इतने नन्हे-से चित्र में भी विशेषताएँ नज़र आती हैं – गलमुच्छों का घनापन, जिनका ऊपर उल्लेख किया गया है (कमिटी के सभी सदस्यों के बीच वह इस बात में चैम्पियन है) और अविश्वसनीय, करीब-करीब भद्देपन की हद तक लम्बा चेहरा. ये बात समझ में आती है, कि मूल चित्र की खामियों ने शिल्पकारों को कल्पना करने की खुली छूट दे दी, इसीलिए काँसे के दोनों क्रिस्तोफारी एक दूसरे से भिन्न हैं. और ये, बावजूद इसके, कि दोनों शिल्पकारों ने क्रिस्तोफारी के चेहरे के स्वाभाविक भद्देपन को थोड़ा-सा कम कर दिया – हौले से गलमुच्छे छोटे कर दिए और, उसकी लम्बाई को नुक्सान पहुँचाते हुए, चेहरे के अनुपात को बदल दिया.
तो, पहले जमाकर्ता में कुछ ख़ास योग्यताएँ थीं, जिनका सेविंग्स बैंक के उद्घाटन पर लगी जमाकर्ताओं की कतार में उसके नंबर से कोई संबंध नहीं था. उसकी योग्यताओं के महत्व को ये तथ्य प्रमाणित करता है, कि निकोलाय अन्तोनविच को ए. ए. पोलव्त्सेव के सुप्रसिद्ध “रूसी जीवनी कोश” में स्थान दिया गया है, और ये कोई खेल नहीं है. पच्चीस खण्डों वाले इस संग्रह के नौवें खण्ड (1903) में एक हज़ार से अधिक लोगों की जीवनियाँ हैं (सभी को तो स्मारकों से सम्मानित नहीं किया गया). इंटरनेट पर उसके बारे में अधिकांश जानकारी इसी खण्ड से ली गई है. पोलव्त्सेव के जीवनी-कोश में इस बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है कि क्रिस्तोफारी सेविंग्स बैंक में आने वाला पहला जमाकर्ता था. मगर ये कहा गया है, कि वह ऑनररी ट्रस्टी था, “सन् 1772 से क्रेडिट-ट्रेजरी के फैसलों का संकलनकर्ता था, इस ट्रेजरी के दस्तावेजों और जमाराशियों का ऑडिट करता था, बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ का चेयरमैन था, परियोजनाओं के मसौदों पर काम करता था, कमिशन्स में काम करता था वगैरह. उसकी ताशों की फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूरों के जीवन स्तर को सुधारने की दिशा में उसका बड़ा योगदान है. मतलब, काबिल इन्सान था, उसके पास योग्यताएँ थीं, वर्ना उसकी मृत्यु के बीस से अधिक सालों के बाद संकलित किए गए इस खण्ड में उसका उल्लेख न होता.                                                  
टिप्पणी बड़ी नहीं है. जीवनी-कोश के अन्य लेखों की तुलना में बहुत छोटी है. हर लेख के बाद स्त्रोत के संदर्भ दिए गए हैं, जो कभी-कभी काफ़ी बड़ी संख्या में भी हैं, मगर यहाँ सिर्फ एक है – अख़बार “आवाज़” के सन् 1881 के अंक का उल्लेख है. अख़बार के अंक की तारीख का मृत्यु की तारीख से मिलान करने पर मैंने सोचा कि ये मृत्युलेख है. हो सकता है, कि उसमें क्रिस्तोफारी के बारे में कुछ और भी हो?
इस अंक के लिए इसरार किया. इनकार मिला. “जीर्णशीर्ण अवस्था के कारण”. मैंने समझाया कि मुझे सिर्फ एक कॉलम को सिर्फ देखना भर है, फाइल के पन्ने पलटने का मेरा कोई इरादा नहीं है. “आवाज़” देने से मुझे इनकार करने वाली लड़की ने अपने प्रमुख से बात की, और वह स्वयँ अखबार लाने गया. खाली हाथ लौटा. “अफ़सोस है, कि बेहद ख़स्ता हाल है. संभव नहीं हो रहा है. – “ऐसा कैसे?” मुझे अचरज होता है. “मैंने सन् 1865 के “आवाज़” के लिए ऑर्डर दिया था, और फाइल बढ़िया हालत में थी”. - “ उस समय अच्छे कागज़ पर छपाई होती थी, और ये बिल्कुल आख़िरी वाली है, अख़बार बंद होने से पहले. बुरा कागज़ है, ज़्यादा दिन चलने वाला नहीं है”. – “क्या वाकई में,” मैं पूछता हूँ, “एक टिप्पणी भी देखना असंभव है?” - “असंभव. कागज़ का चूरा-चूरा हो गया है. रैक से उतारना संभव नहीं है, बिखर रहा है”. उसने मुझे अकादमी ऑफ साइन्सेज़ की लाइब्रेरी में जाने की सलाह दी (सोचा, कि वहाँ भी मुश्किल से ही अच्छा कागज़ होगा) या फिर कलेक्टर (संग्रहकर्ता) के माध्यम से मॉस्को से सम्पर्क करूँ. मगर, अच्छी तरह सोचने के बाद मैंने फ़ैसला किया कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. बेकार क्यों इन्सान की परछाईं को सताऊँ? क्या मुझे इस मृत्युलेख की ज़रूरत है?
सब कुछ वैसा ही रहने दें, जैसा है. इसी तरह ज़्यादा बेहतर है, ज़्यादा अभिव्यक्तिपूर्ण है... एक विरोधाभासी-सी बात हो गई थी. आदमी का स्मारक ढाला है काँसे में, बल्कि दो-दो स्मारक बने हैं, मगर उसकी याद धूल बन चुकी है...क्या कोई अन्योक्ति बन रही है, नहीं?...
वैसे भी मैंने निकोलाय अन्तोनविच के प्रति एक छोटा-सा गुनाह किया है...उसके बारे में कुछ गलत सोच बैठा. जब “महान सुधारों” के खण्डों के पन्ने पलट रहा था, तो मेरा ध्यान गया, कि एक खण्ड़ में बारीक लिखाई से सुधार दिखाए गए हैं, जो इससे पहले के खण्ड़ की गलतियों से संबंधित थे. प्रकाशन में अत्यंत सावधानी बरतने के बावजूद छोटी-छोटी तकनीकी त्रुटियाँ रह ही गईं. मगर त्रुटि-संशोधनों को कौन पढ़ता है? और तब मेरे दिमाग़ में एक विचार कौंधा : अगर अचानक किसी छोटे से चित्र के नीचे की इबारत में गड़बड़ हो गई हो तो? पाँचवें खण्ड़ में इस विषय पर किए गए सुधारों पर नज़र क्यों न डाली जाए? कहीं अचानक “एन. ए. क्रिस्तोफारी” और बगल वाले “ए. के. गीर्स” के नीचे के नामों में अदला-बदल न हो गई हो, जिसके बारे में अगले खण्ड में सूचित किया गया है? गीर्स चदायेव के समान है, उसके गलमुच्छे बिल्कुल ही नहीं हैं, क्रिस्तोफारी से एकदम अलग तरह का चेहरा है. और, कहीं ऐसा तो नहीं कि स्मारक उसका न हो? ये होती ग़ज़ब की बात! और वह मुझे इतना ख़तरनाक प्रतीत हुआ, कि मुझे फ़ौरन उस पर विश्वास हो गया और मैं फ़ौरन पाँचवें खण्ड़ की ओर भागा, ताकि चौथे खण्ड़ में हुई अकल्पनीय त्रुटि के बारे में मेरे संदेह की पुष्टि हो सके...मगर ये मेरा भ्रम ही निकला. कोई गलती नहीं हुई थी. क्रिस्तोफारी क्रिस्तोफारी ही था.
अपने गलत विचारों के लिए मुझे पछतावा है, मैंने उनका बुरा सोचा – स्वर्गवासी क्रिस्तोफारी और पहले जमाकर्ता के रूप में उसके प्रशंसकों का.         
(चलिए, मैं कुछ नहीं कर सकता. मुझे अभी भी शत-प्रतिशत विश्वास नहीं है, कि “महान सुधारों” के सम्पादक मण्डल ने उस कमिशन के सभी सदस्यों के चित्रों को, जो कब के ख़ुदा को प्यारे हो चुके हैं प्रकाशित किया है, मगर कुछ न कुछ तो छापना ही था... उनमें से एक तो चादाएव से काफी मिलता है, और दूसरा जैसे कोई...जैसे डिकेन्स की किताब से निकला हो...मगर नहीं. बात इस बारे में नहीं है.)
एक और तस्वीर मेरे दिमाग में उभरी है, और उससे छुट्टी पाना मुश्किल है.
एक बुज़ुर्ग आदमी अपनी गुज़री हुई ज़िंदगी के बारे में सोच रहा है – जल्दी ही ख़ुदा को प्यारा हो जाऊँगा. और उसके सामने सांत्वना देने वाले फ़रिश्ते जैसा कोई प्रकट होता है और कहता है : “निकोलाय अन्तोनोविच, आपको पता तक नहीं है, और आपकी मृत्यु के एक सौ पच्चीस साल बाद आपका स्मारक बनने वाला है”.  - “कब्र पर?” - बुज़ुर्ग अपनी पलकें उठाता है. “कब्र पर क्यों? नेव्स्की प्रॉस्पेक्ट पर”. – “मेरा? नेव्स्की पर?” – “काँसे का, पूरे कद का, और एक और भी, मॉस्को में”. ‌ - “ये नहीं हो सकता!” – “और क्या, निकोलाय अन्तोनोविच! और चाँदी के सिक्के पर आपकी तस्वीर भी ढाली जाएगी!” – “मगर किसलिए? किसलिए?” वह ख़यालों में अपनी योग्यताओं की गिनती करेगा. हो सकता है, इसलिए कि मैटर्निटी होम बनवाया? अपने मज़दूरों के लिए बड़े-बड़े घर बनवाए? इसलिए कि लड़कों और लड़कियों के लिए स्कूल बनवाए? इसलिए कि विदेश में चैरिटी संस्थाओं के अनुभव का अध्ययन किया और देखा कि रूसी संदर्भ में इसे कैसे लागू किया जाए? या फिर कृषि-सुधारों के लिए?...किसलिए? किसलिए?”
“याद करो, निकोलाय अन्तोनविच, उनचालीस साल पहले 1 मार्च ’42 में आप कज़ान्स्काया पर स्थित बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ में आए थे और आपने सेविंग्स बैंक में दस रूबल्स का चाँदी का सिक्का जमा किया था चार प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर पर?...फिर और लोग आने लगे थे...”
“हाँ, हाँ, याद आया. तो फिर?”
“बस यही बात है. आप पहले थे”.                  

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