शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

Conspiracy - 11


सत्तावनवाँ




पीटर्सबुर्ग के आरंभिक स्मारकों में – आरंभिक से मेरा तात्पर्य उन स्मारकों से है, जिन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है, - कुछ असामान्य भी हैं. शायद, ऐसा नहीं है – पीटर्सबुर्ग के सभी आरंभिक स्मारक अपनी-अपनी तरह से असामान्य हैं (और सबसे ज़्यादा असामान्य, उस लिहाज़ से, काँसे का घुड़सवार” है). मगर फिर भी – असामान्यों की श्रेणी में आने वाले पीटर्सबुर्ग के आरंभिक स्मारकों में एक पूरी तरह अप्रत्याशित है.  

हालाँकि, ऐसा प्रतीत हो सकता है, कि ना तो स्मारक के समर्पण में (स्मारक एक जन्मदिन के सम्मान में है), और ना ही समारोह के हीरोके महत्व में (और वह वाकई में स्मारक के योग्य है) कोई ख़ास बात है. हाँ, और ख़ुद स्मारक, जो अभी तक सही-सलामत है, पूरी तरह स्मारकों की पारंपरिक श्रेणी का है – ये एक स्तंभ है.

ये स्तम्भ है – कला-अकादमी की पचासवीं वर्षगांठ की याद में.

और इस स्तम्भ की विशेषता ये है, कि उसने स्मारक के स्थान पर किसी तरह का दावा भी नहीं किया.

वैसे, उसे इसके लिए बनाया भी नहीं गया था. कज़ान्स्की चर्च के लिए यह बना था.
चर्च की आंतरिक रचना के लिए कुल 56 स्तम्भों की ज़रूरत थी. ये बचा हुआ, सत्तावनवाँ था. अगर हम अभी कोई नीति-कथा लिखते, तो इस सत्तावनवें के अजीब भाग्य से कोई सार अवश्य निकालते – जो उन छप्पन की ही तरह वज़न बर्दाश्त करने के बनाया गया था, उसे पता ही नहीं चला कि असली वज़न क्या होता है.     

6 नवम्बर 1807 को  स्तम्भ को स्मारक घोषित कर दिया गया – स्मारक का उद्घाटन इम्पीरियल एकॅडमी ऑफ आर्ट्स के वृत्ताकार आँगन में हुआ.

कहीं वास्तुकार ए. एन. वरानीखिन ने आधुनिक संकल्पनावादियों को पीछे तो नहीं छोड़ दिया? ऐसा तब होता है, जब एक स्वतंत्र वस्तु....स्तम्भ के लिए अच्छा शब्द है : “स्वतंत्र”. ...जब, मैं कह रहा था, कि एक तैयार वस्तु, जिसे आरंभ में किसी और काम के लिए बनाया गया था – जैसे, समझ लीजिए, कोई इस्त्री - उसे कलात्मक वस्तु घोषित कर दिया जाए. मिसाल के तौर पर, स्मारक की तरह परिभाषित कर दिया जाए.

सब अच्छी तरह समझ में आ जाएगा, अगर ये याद करें, कि एकॅडमी ऑफ आर्ट्स का प्रेसिडेन्ट और कज़ान्स्की चर्च के निर्माण के लिए बनाए गए बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ का चेयरमैन एक ही व्यक्ति था – काउन्ट ए. एस. स्त्रोगानव. जब कज़ान्स्की चर्च को स्त्रोगानव का शिशुकहते हैं, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है. स्त्रोगानव के बिना वरानीखिन न होता, और न ही चर्च होता, वाकई में नहीं होता. कम से कम, वैसा चर्च. और आंतरिक सज्जा के लिए ऐसे स्तम्भों के साथ.

इसलिए, जब हम स्तम्भों की बात करते हैं, तो वीबर्ग से ग्रेनाइट के मोनोलिथों को प्राप्त करने का सबसे कठिन काम और इन भव्य चट्टानों को पीटर्सबुर्ग पहुँचाने, साथ ही उन्हें तैयार करने के काम की, और साथ ही अन्य अनेक कामों की व्यवस्था काउन्ट स्त्रोगानव ने की, स्तम्भों के विशेषज्ञ सैम्सन सुखानव और उसकी पूरी टीम को हमारा सलाम!

और ये बात, कि वरानीखिन पूर्व में स्त्रोगानव का कृषि-दास था, बेशक, सबको मालूम है.

हालाँकि सब लोग, अगर सबकी बात करें, बेशक, कुछ और भी जानते हैं : कि स्त्रोगानव ने बीफ़स्त्रोगानव नामक पकवान का आविष्कार किया था. अरे नहीं, साहेबान, पकवान का संबंध दूसरे स्त्रोगानव से है – अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच स्त्रोगानव के, इस स्त्रोगानव के, भाई के पोते से. इस स्त्रोगानव का नाम कई प्रसिद्ध वास्तुशिल्प के प्रयोगों से जुड़ा है.       

प्यार के मामले में अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच ख़ुशनसीब नहीं रहा, मगर दूसरी चीज़ों में किस्मत उस पर मेहेरबान थी : स्त्रोगानव ने उस चर्च को, जिस पर उसने काफ़ी मेहनत की थी (और धन भी दिया था), वृद्धावस्था में, पूरी तरह बना हुआ देख लिया – कज़ान्स्की चर्च के प्रतिष्ठापन के कुछ ही दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई थी. मगर चित्रकार ए.जी.वर्नेक के ब्रश से बनाया गया अपना पोर्ट्रेट वह नहीं देख सका, ये पोर्ट्रेट – मरणोपरांत बनाया गया था. दरबार के वास्तविक गुप्त-सलाहकार काउन्ट ए. एस. स्त्रोगानव को कैनवास पर महल के अपने काल्पनिक दफ़्तर में दिखाया गया है, और हमारे लिए वाकई  में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है, कि खिड़की के पीछे कज़ान्स्की चर्च अपनी सम्पूर्ण भव्यता के साथ खड़ा है, और काउन्ट के हाथ में एकेडमी ऑफ आर्ट्स की इमारत का नक्शा है, जिस पर वृत्ताकार आँगन की रूप रेखा साफ़ दिखाई दे रही है. स्वाभाविक है, कि नक्शे में बाहर से लाए गए स्तम्भ-स्मारक को नहीं दिखाया गया है, जो आरंभ में चर्च के लिए बना था, मगर, फिर भी ग्रेनाइट का स्तम्भ चित्र में दिखाया गया है – नींव और आधार समेत.

वास्तविक स्तम्भ के ऊपर, जो एकॅडमी को सौंप दिया गया है, वरानीखिन ने एक गोला स्थापित कर दिया था. आँगन, जो एक सम्पूर्ण वृत्त था, और गोला जिसे ग्रेनाइट के स्तम्भ द्वारा उसके ऊपर चढ़ाया गया है – ये सार्वभौमिक सद्भाव की विजय है, गोलों का संगीत है, पूर्णता की ओर जाता हुआ आरोही मार्ग है, और भी जाने क्या-क्या – स्त्रोगानव और वरानीखिन फ्रीमेसन (गुप्त संस्था के सदस्य - अनु.) थे, मगर फ्रीमेसन्स के प्रतीकों के रहस्य में जाने का फ़िलहाल हमारा कोई इरादा नहीं है. हमें दूसरी बात में दिलचस्पी है – भौतिक वस्तुओं के रूप में स्मारकों के जीवन में जो स्वयँ प्रत्यक्ष नहीं है, बाहरी दुनिया से,  लोगों से और अपने जैसी वस्तुओं से उनके रिश्ते, और अगर ये आपको किसी अदृश्य निर्देशक द्वारा स्वयम् के लिए प्रस्तुत किसी अवास्तविक नाटक की याद दिलाए, तो इसमें हमारा कोई दोष नहीं है.           

एकॅडेमी की बिल्डिंग के स्पष्ट प्लान वाली जिस ड्राइंग शीट को स्त्रोगानव ने चित्र में खोला है, उसका मुख्य तत्व – वृत्ताकार आँगन का “काँसे का प्रतिरूप” एकॅडेमी के लगभग वैसे ही प्लान के साथ, जो एकॅडेमी ऑफ़ आर्ट्स के वास्तविक वृत्ताकार आँगन के केंद्र में है, मौजूद है. हाँ-हाँ, ऐतिहासिक बिल्डिंग के ठीक बीचोंबीच, भीतरी वृत्ताकार आंगन के केंद्र में इसी बिल्डिंग का काँसे का “प्लान”इसी वृत्ताकार आंगन के साथ है. काँसे के “कागज़” के नीचे – काँसे का गोल प्लेटफॉर्म है, और उसके ऊपर – शाही कोट पहने हुए काँसे का आदमी है, जो काँसे की धनुषाकार बेंच पर बैठा है और, कहीं एक ओर देखते हुए, न जाने क्यों हमारी तरफ़ बायाँ हाथ बढ़ा रहा है – शायद, हमारा ध्यान एकॅडेमी के “ड्राइंग” की ओर खींच रहा है. बात, बेशक, ई.ई.शुवालव, एकॅडेमी के संस्थापक के स्मारक की हो रही है – स्मारक पीटर्सबुर्ग को उसकी 300वीं सालगिरह के उपलक्ष्य में रशियन एकॅडेमी के वर्तमान प्रेसिडेंट, ज़ुराब  त्सिरितेली द्वारा भेंट किया गया था.

वरानीखिन वाला स्तम्भ इस जगह पर सिर्फ दस साल रहा, त्सिरितेली वाला, शायद, काफ़ी लम्बे समय तक खड़ा रहने की उम्मीद है.

इस स्मारक के बारे में चाहे कोई कुछ भी सोचे, मगर वृत्तों का संयोजन प्रभावशाली है – वृत्त के भीतर वृत्त : काँसे के कागज़ पर “छोटा” वृत्त, जो पैमाने के अनुरूप भीतरी आँगन को प्रदर्शित करता है, और ख़ुद भीतरी वृत्ताकार आँगन, जिसके केंद्र पर ही ड्राइंग समेत ये स्मारक स्थापित है. सबसे ज़्यादा आश्चर्यजनक बात ये है, कि स्मारक के शिल्पकारों को वृत्तों के पूर्वनियोजित खेल में पकड़ना सबसे कठिन है : पहले स्मारक के लिए दूसरी जगह निश्चित की गई थी – मालाया सादवाया पर, ऐतिहासिक शुवालव के महल के सामने, जहाँ आरंभ में उसके द्वारा स्थापित एकॅडेमी थी. वहाँ, इसी तरह की धनुषाकार बेंच पर काँसे के शुवालव को बैठना था और आने जाने वालों को – ज़े.के. त्सिरितेली की इच्छानुसार – एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स की भावी बिल्डिंग के प्लान को प्रदर्शित करना था. मगर पीटर्सबुर्ग की सामाजिक सोच ने प्रॉजेक्ट को पूरा नहीं होने दिया – शुवालव को आँखों से दूर करके एकॅडेमी के वृत्ताकार आँगन में बिठा दिया गया.

मगर ये हो क्या रहा है? - “ड्राइंग में” शुवालव के पैरों के पास वाला छोटा वृत्त, जो आँगन के केन्द्र में है, उसी जगह पर है, जिस पर स्मारक-स्तम्भ खड़ा था.

तो ऐसा है संयोग!

मई 1817 में एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स के उपाध्यक्ष पी. पी. चेकालेव्स्की की मृत्यु हो गई, जो स्त्रोगानव की मृत्यु के बाद एकॅडेमी की व्यवस्था संभाल रहे थे. उसी समय सर्वोच्च आदेश द्वारा अध्यक्ष के पद पर ए. एन. अलेनिन की नियुक्ति की गई – उसे ये समझने में देर न लगी कि एकॅडेमी का काम-काज बुरी हालत में है. अध्यक्ष पद पर अपने कार्यकाल के बारहवें वर्ष में अलेनिन ने अपनी पुस्तक “सन् 1814 से 1829 के दौरान रॉयल एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स के काम-काज का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण” में एकॅडेमी को उचित स्तर पर लाने के लिए किए गए प्रयासों के बारे में याद दिलाना उचित समझा. जिन सकारात्मक सुधारों का श्रेय अलेनिन ने स्वयम् को दिया है, जैसे “स्वास्थ-सेवाओं में सुधार करना”, “मुख्य भवन के आंतरिक भाग से मल-प्रवाह पद्धति के दफ़्तरों को हटाना”, “मुख्य भवन से लान्ड्री और पेन्ट हाउस को हटाना” इत्यादि, उनमें एक और उपाय का ज़िक्र मिलता है : “वृत्ताकार-आँगन से ग्रेनाइट के स्तम्भ को हटाना”. इस समस्या को एक पूरा पैराग्राफ़ समर्पित है :
“वृत्ताकार और अपने आप में बेमिसाल आँगन में शहर के वास्तुकार स्वर्गीय वरानीखिन की सलाह पर कज़ान्स्की चर्च के निर्माण से बचा हुआ एक ग्रेनाइट का स्तम्भ लगाया गया था, जो अपनी सीधी ऊचाई से आँगन की वृत्ताकार रेखाओं को बड़ी भद्दी तरह से काटता था और इससे एक और नुक्सान ये हो रहा था, कि उसका आधार, जो बुरी तरह से निर्मित था, बसन्त के मौसम में बर्फ के पानी को भूमिगत पाइपों में स्वतंत्रता से नहीं जाने देता था, और इसकी वजह से एकॅडेमी के तहखाने, जिनसे काफ़ी आय होती है, कुछ हद तक पानी में डूब जाते हैं.  
<…> इस ग्रेनाइट के स्तम्भ को, जिसका वज़न करीब एक हज़ार पूद (पूद – वज़न का पुराना माप. 1 पूद – 40 पाऊण्ड्स – अनु.) था, सन् 1817 में लुहार शापव ने 1400 रूबल्स में बेहद हल्के मचान और दो चरखियों की सहायता से अपने आधार से हटा कर एक सुरक्षित जगह पर रखवा दिया. इस प्रयोग से, जो काफ़ी बड़े पैमाने पर किया गया था, अध्यक्ष अलेनिन को ( हाँ, अध्यक्ष अपने बारे में तृतीय पुरुष का प्रयोग करता है – लेखक) ये यकीन हो गया, कि सेन्ट आइजैक चर्च के स्तम्भों को लगभग इन्हीं साधनों की सहायता से उठाकर, अधिक अच्छी तरह और विश्वसनीयता के साथ, बिना किसी डर के स्थापित किया जा सकता है. वरानीखिन के ग्रेनाइट वाले स्तम्भ के स्थान पर आज मीनिन और पझार्स्की के ग्रुप का प्लास्टर ऑफ पैरिस का बड़ा मॉडेल है (मीनिन और पझार्स्की – सोलहवीं शताब्दी में मॉस्को को पोलिश सेनाओं से आज़ाद करवाने वाले वीर योद्धा – अनु.), जिसे शहर के रेक्टर मर्तोस से ख़रीदा गया था”.
जैसा हम देखते हैं, “स्तम्भ को हटाना, अलेनिन के अध्यक्ष पद का पहला बड़ा काम* था. स्तम्भ को वह एक अप्रिय गलती की तरह याद करता है, जिससे आँगन को मुक्त करना ज़रूरी था. इस बात का इशारा भी नहीं, कि ये एक स्मारक है, जिसे यहाँ यूँ ही नहीं, बल्कि किसी के सम्मान में स्थापित किया गया था. मगर, ये “किसी के” पिछले साल की बर्फ जैसा है : एकॅडेमी सत्तर साल की हो चुकी है, और पचास के दशक को याद करने में किसे दिलचस्पी है?

मगर अब उसके बारे में, जो स्तम्भ के स्थान पर आया है. इस वाक्य पर गौर करें - “मीनिन और पझार्स्की के ग्रुप का प्लास्टर ऑफ पैरिस का बड़ा मॉडेल” : शब्द “बड़ा” यहाँ न सिर्फ संरचना के साइज़ को दर्शाता है (समकालीन लोगों ने इन आँकडों को विशालमाना है), बेशक, एक छोटा मॉडेल भी था. जब मार्तिन द्वारा प्रस्तावित मीनिन और पझार्स्की का मॉडेल सन् 1908 में प्रतियोगिता में विजयी हुआ, तो शिल्पकार से एक प्लास्टर ऑफ पैरिस का मॉडेल बनाने की माँग की गई, जो “स्वाभाविक आकार का हो, और जो स्मारक का मूल स्वरूप होगा”. “स्मारक के ऐतिहासिक वर्णन” नामक पुस्तक के अनुसार, जो उसके उद्घाटन के फ़ौरन बाद ही प्रकाशित हो गई थी, इस सारे प्रयास का उद्देश्य, (अगर हमारी बात सुनी जाए) कुछ और नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण था. बड़े मॉडेल को तैयार करने में काफ़ी समय लग सकता था, और अगर अचानक शिल्पकार की मृत्यु हो जाए तो? तब दूसरा कुशल मूर्तिकार “छोटे” मॉडेल के नमूने पर “विशाल” आयाम का मॉडेल – स्मारक का बड़ा (अंतिम) मॉडेल  बना सकता था. मर्तोस के इरादे की बड़ी प्रशन्सा की गई थी.

सन् 1817 में, मतलब जिस साल “वरानीखिन के स्तम्भ” को हटाया गया था, रूस का ध्यान पितृभूमि की रक्षा करने वाले वीरों पर केंद्रित था : इससे एक साल पहले काफ़ी लोगों की उपस्थिति में (एकॅडेमी के ढलाई कारखाने की गैलरी में काफ़ी दर्शक थे) “एक ही बार में” ढाले गए स्मारक को पानी के रास्ते मॉस्को पहुँचाना था. विशेष इंतज़ाम के साथ फिनलैण्ड के ग्रेनाइट से बनाया गया पैडेस्टल मॉस्को भेजा जाता है, इस ग्रेनाइट को खदान से निकालने और उसे तैयार करने का काम “कुशल संगतराश” सैम्सन सुखानव ने किया था, जो तेरह साल पहले से इस किस्से की “ग्रेनाइट-महारानी” पर काम कर रहा था.

“वरानीखिन-स्तम्भ” के साथ कुछ ऐसा हुआ कि उसकी किस्मत में पूर्णांक तारीखों का महत्व है – वह ख़ुद पचासवीं सालगिरह को समर्पित था, स्मारक के रूप में प्रकट रूप से खड़ा रहा – दस साल, और “सुरक्षित स्थान” पर - भूला-बिसरा - पड़ा रहा, तीस साल.

उसकी याद ब्र्युलोव को आई, जब वह एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स का गार्डन बना रहा था. स्तम्भ को गार्डन के बीचों बीच ग्रेनाइट के पैडेस्टल पर स्थापित किया गया, वहीं वह आज भी खड़ा है. पुनर्स्थापित स्तम्भ से ये उम्मीद थी, कि वह समझ में आए और अपने उद्देश्य को स्पष्टता से प्रकट कर सके, इसलिए संदेहास्पद गोले के स्थान पर अपोलो की वीणा रख दी गई और तीनों कलाओं को प्रदर्शित करती हुई तीन औरतों की आकृतियों वाला काँसे का शीर्ष बना दिया गया. अगर उनकी तरफ़ देखते हुए आप स्तम्भ का चक्कर लगाएँ, तो मैं कह सकता हूँ, कि पहली बार में आप इन आकृतियों को गिनेंगे : सचमुच में, कभी चार गिनेंग़े, तो कभी तीन. वे तीन ही हैं, शक करने की गुंजाइश नहीं है. ये हैं – चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला.

जहाँ तक वास्तुकला का संबंध है, यहाँ के अनुपातों का तर्क ऐसा है, जो ख़ुद ही अंतर्निहित ख़ूबसूरत सामंजस्य का सुझाव देता है. एकॅडेमी के उत्तरी भाग के सामने स्थापित स्तम्भ, क्षेत्र के हिसाब से अप्रत्याशित रूप से एक न्यूनकोणीय समद्विबाहु त्रिभुज प्रदर्शित करता है, जिसका आधार, प्राचीन स्फिन्क्स द्वारा निर्धारित है, और बिल्डिंग के दूसरी तरफ़ वाले किनारे पर है. समद्विबाहु त्रिभुज के आधार के लिए ज़िम्मेदार स्फिन्क्स की आयु साढ़े तीन हज़ार साल है (इसीलिए वे आधार हैं), और विपरीत दिशा में स्थित न्यून कोणीय-शीर्ष वाले ग्रेनाइट के स्तम्भ की, जो एक उत्पाद की तरह है, इस हिसाब से कुछ भी नहीं है, तब तो उसका समय शुरू भी नहीं हुआ था. औपचारिक रूप से उसकी आयु 50 है. वास्तव में दो सौ से ज़्यादा. क्या यहाँ वर्षों की तुलना हो रही है स्फिन्क्सों की आयु से? वैसे, काफ़ी हद तक वे रिश्तेदार हैं – ये स्फिन्क्स और ये स्तम्भ – दोनों का खून एक ही है : उन्हें एक ही तरह की चट्टानों से बनाया गया है, जिनकी विशेषता है खुरदुरापन और क्वार्ट्ज़ की उपस्थिति.

रेखागणित की विजय के दृष्टिकोण से देखें तो स्तम्भ और स्पिन्क्स ने एक दूसरे को ढूँढ़ लिया. बल्कि, एक गूढ़ अर्थ में वे एक दूसरे को खोज रहे थे. जब स्तम्भ को “सुरक्षित जगह” पर रख दिया गया, तो फ़राओन अमेन्होतेप III के चेहरे वाले प्राचीन स्फिन्क्स वृत्ताकार आँगन में प्रकट हुए, मानो उससे मिलने आए हों (वाकई में वे वहाँ तटबन्ध पर इंतज़ाम किए जाने का इंतज़ार कर रहे थे). और फिर से स्त्रोगान्स्की के पोर्ट्रेट को याद करने को जी चाहता है – ग्रेनाइट के स्तम्भ के निकट कलाकार ने पैडेस्टल की तस्वीर बनाई है, जिस पर एक इबारत है, लैटिन से अनुवाद करने पर वो इस तरह है : “ईजिप्ट की कला का पीटर्सबुर्ग में पुनर्जन्म हुआ है 1810”. फ़राओन के स्फिंन्क्स,  जो तब तक मिले नहीं थे, उस समय रेत की पर्तों के नीचे दबे पड़े थे, और ग्रेनाइट का स्तम्भ एकॅडेमी के आँगन में उनका इंतज़ार कर रहा था. मगर – देर हो गई.

वैसे तो यहाँ काफ़ी सारे स्तम्भ हैं – गार्डन के दोनों ओर स्तम्भों की पंक्तियाँ हैं. मगर ये सारे स्तम्भ किसी उद्देश्य से हैं – उसे संभाले हुए हैं, जो उन्हें संभालना चाहिए. दर्शनीय भाग के सामंजस्य को कुछ ऊँचे पेड़ बिगाड़ते हैं, जो दृश्य को ढाँक देते हैं. कार्ल ब्र्युलोव के ज़माने में ये जगह अच्छी तरह दिखाई देती थी. पुनर्स्थापित किया गया स्तम्भ, सचमुच में पिछली सालगिरह की याद में,  रूम्यान्त्सेव स्मारक-स्तम्भ से सामंजस्य स्थापित कर सकता था, जो आज भी एकॅडेमी के गार्डन से दिखाई देता है. वर्तमान में स्तम्भ अपने आप खड़ा है, मगर ये नहीं कह सकते कि वह अकेला है. उससे सौ मीटर्स की दूरी पर ऊपर जाता हुआ एक पाईप है – यहाँ मोजाइक के वर्कशॉप्स हैं. वे ही, जिनमें सेंट आइसाक चर्च के लिए मोज़ाइक बनाया गया था और मॉस्को-मेट्रो के लिए भी. वे अभी भी कार्यरत हैं, मगर रंगीन शीशे बनाने की आधुनिक तकनीक से पाईप के बगैर काम चल जाता है. स्तम्भ और पाईप की ऊँचाई लगभग समान है. जब हम स्तम्भ की ओर देखते हैं तो नज़र पाईप की ओर देखना नहीं चाहती. मगर एक बार ये देखकर, कि ग्रेनाइट का स्तम्भ और ईंटों का पाईप एक दूसरे के पूरक हैं, आप उनकी अप्रत्याशित जोड़ी पर ध्यान दिए बगैर नहीं रह सकते. ये स्तम्भ...क्या कहें?...ये स्तम्भ है. और पाईप – श्रमजीवी है. ज़िंदगी भर काम करने के बाद, हड्डी तोड़ मेहनत करने के बाद, अब वह ख़ुद ही स्मारक बन गया है. तो, वे वैसे ही खड़े हैं एक दूसरे के सामने, दो स्मारक : एक – सालगिरह को समर्पित, दूसरा – रोज़मर्रा की ज़िंदगी को. 

                                                       
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* एक तरह से स्तम्भ के भाग्य ने एकॅडेमी के कॉन्फ्रेन्स-सेक्रेटरी और रूस के एक प्रसिद्ध फ्रीमैसन ए. एफ. लाब्ज़िन के भाग्य का निर्णय कर दिया : अलेनिन वाली घटना का परिणाम ये हुआ कि लाब्ज़िन को अपने पद से हाथ धोना पड़ा और उसे निर्वासित कर दिया गया – ये सच है कि उसे अपने फ्रीमैसोनिक विचारों की नहीं, बल्कि अपनी प्रखर बुद्धिमत्ता और लम्बी ज़ुबान की कीमत चुकानी पड़ी.

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