अख़्मातवा और परछाई
जिन व्यक्तियों के पीटर्सबुर्ग में कई स्मारक बने हैं, उनमें पहले पाँच
में (काफ़ी लोगों को आश्चर्य होगा) आन्ना अन्द्रेयेव्ना अख्मातवा है.
आज की तारीख में ये पाँच इस तरह हैं : लेनिन, प्योत्र, पूश्किन, कीरव, अख्मातवा.
जैसे ही हम इस समूह के सदस्यों के स्मारकों की संख्या
निश्चित करते हैं, तो फ़ौरन पता चलता है, कि इस पंक्ति के पहले और अंतिम सदस्य की जगह स्मारकों
की संख्या के हिसाब से अलग है.
साथ ही इस बात पर गौर करेंगे, कि पीटर्सबुर्ग
में (बल्कि ये कहना ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा कि लेनिनग्राद में) कभी भी झ्दानव का
स्मारक नहीं बना, जो अख्मातवा का मुख्य उत्पीड़क था. लेनिनग्राद
युनिवर्सिटी, पैलेस ऑफ पायनियर्स, शिप बिल्डिंग प्लान्ट को झ्दानव का नाम दिया गया था, एक पूरा
झ्दानव्स्की ‘ज़ोन’ था, मगर न जाने क्यों झ्दानव का स्मारक कभी नहीं था.
सन् 1946 में अपनी रिपोर्ट में झ्दानव ने ख़ुद जोशेन्का
और अख्मातवा के लिए (और अपने लिए भी) 1 , अभूतपूर्व (और अदृश्य) स्मारक बनाया, मगर कम से कम
अख्मातवा को समर्पित पहले भौतिक स्मारक को बनने में और 45 साल लग गए.
वह ख़ुद भी अपनी छबि को स्मारक के रूप में उतारने के
प्रयत्नों में अधिकाधिक बाधा डालने के लिए चिंतित थी. अख्मातवा का प्रसिद्ध आह्वान
: “और अगर कभी इस देश में / सोचेंगे मेरा स्मारक बनाने के बारे में...” उसके
लिए बनने वाले किसी भी स्मारक के विचार को बोझिल बना देता है – किसी भी शिल्पकार
को, चाहे – अनचाहे इसका ख़याल रखना चाहिए. मतलब अख्मातवा का स्मारक बनाए, मगर बिल्कुल
अख्मातवा का नहीं, और इस तरह उसकी वसीयत से बचकर निकल जाए या, इसके विपरीत, उसके अक्षम्य
तर्क का पालन करे और तब किसी विशिष्ठ जगह को चुने – “और यहाँ, जहाँ खडी थी मैं तीन सौ घण्टे/ और जहाँ मेरे लिए नहीं खुला था द्वार”. अक्सर इस जगह को ‘क्रेस्ती’ समझते हैं, मगर यहाँ बात हो रही है ‘श्पालेर्नाया’,
25 की जहाँ उसका पति और पुत्र कैद थे और जहाँ अन्य चीज़ों
के अलावा कैदियों को देने के लिए पार्सल भी स्वीकार किए जाते थे.
अख्मातव के स्मारक
- शहर में बहुत प्रसिद्ध नहीं हैं.
इनमें सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध है ये – जो न सिर्फ
अख्मातवा की वसीयत के अनुसार है, बल्कि दृश्य रूप से भी उसे प्रदर्शित करता है.
1
उद्घाटन
हुआ था सन् 2006 में.
जिस जगह
पर इस स्मारक को बनाया गया है, वह कुछ अंशों में निगरानी-चौक जैसी
लगती है. वैसे, देखने के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है, सिवाय “क्रेस्ती” के – जेल की उदास बिल्डिंग्स के, जो
नीवा नदी के उस पार बनी हैं. अख्मातवा के स्मारक के लिए बिल्कुल आदर्श जगह है. ऐसा
प्रतीत हो सकता है, कि समुचित निर्णय के इंतज़ार में उसे ख़ास
तौर से संभाल कर रखा गया था.
जो सच है, वो
सच है – कई बातों में ये जगह बिल्कुल सामान्य नहीं है.
मुझे याद
है कि इस क्षेत्र में आदमी के जितनी ऊँचाई की घास उगती थी. दाईं ओर (नीवा की ओर
मुँह करके खड़े हैं) शानदार घर की बजाय थी मिलिट्री यूनिट. किनारे की ओर की और कुछ
हद तक वोइनवा स्ट्रीट की तरफ़ से (जिसे आजकल – श्पालेर्नाया कहते हैं) खाली जगह के
चारों ओर बाड थी,
मगर वोइनवा स्ट्रीट के किनारे –किनारे बैरेक्स जैसी कोई चीज़ फैली
हुई थी , जो आने-जाने वालों की नज़र से क्रेस्ती को छुपाती
थी. बाईं ओर दीवार पर अजीब–सा “गेन्दाल्फ ज़िन्दाबाद!” लिखा था – बेशक, “”द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स” के सम्मान में, जिसे अभी हाल
ही में “ सेवेरो-ज़ापद (नॉर्थ-वेस्ट)” ने प्रकाशित किया था. इस जगह के साहित्यिक
महत्व को नहीं तलाशेंगे, वह तो किसी और ही कारण से प्रकट हुआ
: बात ये थी, कि सन् 1992-1994 के दौरान इस वीरान जगह के
सुरक्षा गार्ड्स, सभी, एक जैसे,
कवि थे. उन दिनों साहित्यकार अक्सर सिक्यूरिटी के काम पर चले जाते
थे, मगर, शायद, पूरे
शहर में यही एक जगह थी, जहाँ सारे सिक्यूरिटी गार्ड्स जिनकी
तीन-तीन दिन बाद ड्यूटी लगती थी, कवि ही होते थे. उनकी
यूनियन इसी नाम से जानी जाती थी : “लित-अख्राना” (साहित्यिक सुरक्षा) –
तत्कालीन प्रेस में उसके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी देखी जा सकती है. अक्सर इस
सुरक्षा-क्षेत्र पर कवि-गार्डों के दोस्त आ जाते, जो वैसे ही
कवि और गद्यकार थे, कभी-कभी रात भर वहीं रुक जाते, या फिर हफ़्तों वहीं रह जाते, इसके लिए वो बैरेक्स बड़ी
काम आती थीं, जिनका अब अस्तित्व नहीं है. 4 सितम्बर 1993 की
रात को इस भगवान–भरोसे पड़ी ज़मीन पर पीटर्सबुर्ग के कवि-गार्डों का पहला सम्मेलन
हुआ – “पीटर्सबुर्ग्स्की लितेरातर” (पीटर्सबुर्ग साहित्यकार) नामक अख़बार
ने, जिसका संपादकीय कार्यालय यहाँ से कुछ ही दूर स्थित “हाउस
ऑफ राइटर्स” में था, इसके बारे में जानकारी दी थी (दो महीने
बाद हाउस ऑफ राइटर्स, संपादकीय कार्यालय समेत जल जाता है).
मतलब, इस वीरान जगह पर निरंतर कविताएँ पढ़ी जातीं, जितनी शहर में
कहीं भी पढ़ी नहीं जाती थीं. और न सिर्फ अपनी कविताएँ. अख्मातवा की कविताओं के बारे
में कुछ नहीं कहूँगा, मगर इस इतिहास की सबसे अविश्वसनीय बात की ओर गौर
करूँगा. “विषय का आरंभकर्ता” जैसा उसे कहते थे, या “वरिष्ठ गार्ड”, यहाँ कोई और नहीं, बल्कि “अख्मातव” नामक दुर्लभ उपनाम वाला कवि था.
अलेक्सेइ अख्मातव – पीटर्सबुर्ग का जाना-माना व्यक्ति. एक उत्कृष्ट कवि होने के
साथ ही वह एक अन्य कवि – गेनादी ग्रिगोरेव की “डॉक्युमेंटरी कविता” का एक पात्र भी
है. ‘सत्य-कविता’ “दस्का” (बोर्ड-अनु.) में, जो “लित-अख्राना”
के ख़त्म होने के छह साल बाद, और इस क्षेत्र में स्मारक के उद्घाटन के छह साल पहले
लिखी गई थी, जिसकी सुरक्षा “लितोख्रान्त्सी” (साहित्यिक-गार्ड्स) द्वारा की जाती
थी, गेनादी ग्रिगोरेव ने “अख्मातव के नाम से” एक स्वगत लिखा, जिसमें
स्वीकारोक्ति है:
“हर चीज़ कर रही है मेरा इंतज़ार – प्रशन्सा और पुरस्कार!
दोषी नहीं मैं लोगों के सामने.
अख्मातवा 2 है गरेन्का का छद्म नाम,
मगर मेरे परदादा थे अख्मात !”
अब मैं अपने आपको रोक रहा हूँ, ताकि अविश्वसनीय
संयोगों में बह न जाऊँ – आन्ना अन्द्रेयेव्ना अख्मातव के स्मारक के बारे में उन
बातों से शुरू करना बेकार है, जो किन्हीं लोगों को, शायद, उत्सुकता प्रतीत हो. मगर मेरी नज़र में, सब कुछ काफ़ी
जटिल है. बात, आख़िर, हो रही है इस “स्थान की स्मृति” के बारे में, चाहे वह कितनी
ही अजीब क्यों न हो. और हमने तो इस “स्मृति” की कल्पना नहीं की थी.
तो बात ये है. अख्मातव और उसके कवि-दोस्त बिल्कुल
नहीं जानते थे कि उन्हें किस बात की सुरक्षा करनी है. बैरेक में कुछ संदिग्ध से
उपकरण और भारी-भरकम निर्माण सामग्री पड़ी थी, जैसे, टूटे हुए चिपबोर्ड्स पड़े थे. बैरेक में मज़बूत ताला
लगा हुआ था. सबसे कीमती चीज़ वहाँ पुराना टेलिफोन सेट था, जिसकी बदौलत
गार्ड बाहरी दुनिया से सम्पर्क बनाए रख सकता था (मैं भली-भाँति कल्पना कर सकता हूँ
– ख़ुद एक बार गार्ड का काम कर चुका हूँ). अंत में, जब उस समय के हालात के कारण कवि-गार्ड्स को तनख़्वाह
देना बंद कर दिया गया, तो अख्मातव ने तनख़्वाह के रूप में वहाँ पड़ा सामान ले
लिया और चिपबोर्ड्स को ट्रक में भरकर अपनी ‘ समर-कॉटेज’’ ले गया. अब सुरक्षा करने के लिए कुछ
बचा ही नहीं था और, महत्वपूर्ण बात है, बेकार में, अगर “इस बेकार में” का तात्पर्य तनख़्वाह से हो.
मगर फिर भी – वे वहाँ किसकी सुरक्षा करते थे?
नतीजा ये निकलता है, कि बिना जाने, वे आन्ना अख्मातवा के भावी स्मारक की जगह की रक्षा कर
रहे थे. और बस, इतना ही.
किससे? क्यों? किसलिए?
और हो सकता है, वे ख़ुद भी, अनजाने में ही कोई अगम्य काव्यात्मक-सेवा कर रहे थे –
अख्मातवा के भावी स्मारक के स्थल पर. जैसे कोई अनिच्छुक प्रीस्ट्स हों. या, जैसे कोई जादू
टोने वाले जादूगर.
मैंने अलेक्सेइ अख्मातव से पूछा, कि उन दिनों कोई
ख़ास बात तो नहीं होती थी. उसने बगैर सोचे जवाब दिया : “आवाज़ें”. “कैसी आवाज़ें?” – “वो, देर शाम को, रात होते-होते
– उस किनारे से आवाज़ें आती थीं. वहाँ कैदियों के रिश्तेदार सड़क से आवाज़ देते
थे, जिससे कि उनके
अपने जाली लगी खिड़कियों के पास आ जाएँ”.
बात कुछ
ऐसी है. कुछ दिन पहले मैं अपने दोस्त के साथ पेर्म गया और वहाँ हमने आश्चर्यजनक
नाम वाली स्तीक्स नदी को देखने का निश्चय किया (ये वास्तविक, भौगोलिक
नाम है). पहुँच गए. स्तीक्स एक छोटी से नदी थी, जो लगभग सूख
चुकी थी, कहीं कहीं बिल्कुल छोटे पाइप जैसी थी, - स्तीक्स पार करते हुए हम गड्ढों से, सरकण्डे के
पेड़ों के बीच से गुज़रे; स्तीक्स के बाईं ओर जेल थी, दाईं ओर – कब्रिस्तान. तभी हमने भी सुना कि कैसे
कब्रिस्तान से, ऊँचाई से – स्तीक्स के उस पार से – रिश्तेदार
ऊँची, कर्कश आवाज़ों में जेल में बंद कैदियों को आवाज़ देते
हैं.
कल्पना
करता हूँ,
कि यहाँ कैसे होता होगा. गर्मियों की शाम. शहर ख़ामोश हो चुका है.
नीवा के ऊपर समुद्री चिड़िया उड़ रही है. कवि, जो न जाने किस
चीज़ की सुरक्षा कर रहा है, बाहर खुले में तिपाही ले आया. घनी
और ऊँची घास में बैठ गया. काव्य-देवता का इंतज़ार कर रहा है. और तभी – उस किनारे से
– चिल्लाने लगते हैं.
नहीं, यहाँ
क्रेस्ती के विषय से नहीं भाग सकते.
क्रेस्ती
देखने के लिए अख्मातवा कैवेलरी गार्ड रेजिमेंट के ऑफिसर्स-कोर से मुड़ गई और वहाँ
स्तम्भों के किनारे न जाने कब से मार्स और बेल्लोना की मूर्तियाँ रखी हैं, जिनकी
ओर किसीका ध्यान नहीं जाता – समय ने दोनों को नहीं बक्शा. मार्स के हाथ कोहनियों
तक गायब हैं, बेल्लोना की कलाइयाँ नहीं हैं – क्या युद्ध के
देवताओं को ऐसा होना चाहिए? 3 मगर बेल्लिना तो
पाताल की देवी है. उसका ख़ज़ाना - यहाँ है. ये न तो सड़क है, न
गली, न ही चौक, न आँगन, ये अण्डरग्राउण्ड पार्किंग की छत है – वहाँ, नीचे,
रिक्तता है, कालकोठरी है. प्लास्टर की भग्न
देवी उदासी से काँसे में ढली सुघड़, सुरुचिपूर्ण महिला को
देखती है, जिसको इस बात का अंदाज़ भी नहीं है, कि उसके पैरों के नीचे किसका ख़ज़ाना है.
एक और
शिल्प-युग्म,
जो ऊपर से स्फिन्क्स की याद दिलाता है (मगर जिनका ग्रीस या इजिप्ट
से कोई संबंध नहीं है), अख्मातवा की नज़र के दायरे में है.
नुकीले सीनों वाले ये प्राणी, जो अख्मातवा से दस साल पहले
यहाँ प्रकट हुए थे, मुश्किल से ही बगल में किसी और की
उपस्थिति का अनुमान लगा सकते हैं – वे एक-दूसरे की ओर ही देखने के लिए अभिशप्त हैं,
वो भी सिर्फ एक आँख से, जो चेहरे के सजीव भाग
में है; चेहरे के दूसरे भाग में, जो
नीवा की और जेल की तरफ़ है, सिर्फ खाली आँख वाली खोपड़ी है. ये,
जैसा कि ज्ञात है, ये “राजनीतिक दमन के
पीड़ितों का स्मारक” है.
इस तरह
स्मारक के रूप में अख्मातवा, जो शेम्याकिन की कल्पना से उपजे
प्राचीन देवताओं और अनजान प्राणियों से घिरी है, अकेली यहाँ
मानव जाति का प्रतिनिधित्व करती है. मगर, शिल्पकार गलीना
ददोनवा की कल्पना के अनुसार, उसे भी जोड़ा जाना चाहिए,
“ईजिप्ट की देवी ईसिस से जो पति और बेटे के मृत शरीरों की खोज में
नील के किनारे जा रही है” (वैसे, शायद, ईसिस के पति और बेटे के साथ कुछ और हुआ होगा). मुझे याद आया, कि अख्मातवा की दूसरी शादी ईजिप्ट के विशेषज्ञ से हुई थी (मगर स्मारक न तो
इसके बारे में है, और न ही इस पति के बारे में), मगर अपने आख़िरी दिनों में अख्मातवा ने प्राचीन ईजिप्ट की कविता का अनुवाद
किया था (और, ऐसा कहते हैं कि कविता का एक अंश बेटे को दे
दिया), अनुवादित पाठों में “ईसिस का ओसिरिस के लिए विलाप” भी
है... “आसमान मिल गया धरती से. परछाईं पड़ी धरती पर./ दिल मेरा जलता है निष्ठुर
विरह की आग में...”
एक के
बाद इधर-उधर के मतलब प्रकट होते हैं, एक दूसरे से बातें करने लगते हैं,
कभी डराते हैं, कभी गूँजते हैं...तो, स्मारक का स्पष्टीकरण देने के लिए एक और विषय – “’लोट’
की पत्नी, जो चारों ओर नज़र दौड़ाते ही नमक के
स्तम्भ जैसी जम गई थी”- को अलग रखते हैं...
बहुत हो
गया.
तो नील
और नीवा...और सही में, अपनी सहायक नदियों समेत और किस नदी पर इतने
स्फिन्क्स हो सकते थे? पीटर्सबुर्ग मे तो वे दर्जनों हैं,
जिनमें दो असली हैं, इजिप्ट के थीब्स से....
रोज़ानव
वोल्गा को रूसी ‘नील’ कहता था.
तब नीवा –
नील की परछाई हुई.
अख्मातवा
उस किनारे की तरफ़ क्यों देख रही है, ये बात समझ में आ रही है. इसका
संबंध उस “तब” से, जो स्थायी “अब” के लिए रूपक है. मगर यदि
“यहाँ और अब” को एकदम स्पष्ट अर्थ में लें तो वह वहाँ क्या देख रही है, आँखों से क्या ढूँढ़ रही है?
बात
सिर्फ पति और बेटे के बारे में नहीं है, जो क्रेस्ती में कैद थे –
“तब”. बात ये भी है, कि क्रेस्ती में – “अब – उसका प्रतिरूप
है. एकदम असली प्रतिरूप. और – बिल्कुल अभी – वह वहाँ स्थित है, रूपक के अर्थ में नहीं, बल्कि एकदम असली अर्थ में.
उसके
काँस्य स्मारक के आधिकारिक उद्घाटन के बाद, प्लास्टर ऑफ पैरिस से बने
उसके प्रतिरूप के स्मारक का उद्घाटन क्रेस्ती में हुआ – आधिकारिक अवसर के लिए
उपयुक्त पवित्रता से, फूलों से और शब्दों से. प्रेस
रिपोर्ट्स के अनुसार प्लास्टर ऑफ पैरिस के स्मारक-प्रतिरूप के लिए ‘ऑफ़िस-कॉरीडोर’ में जगह बनाई गई. अगर इंटरनेट पर डाली
गईं तस्वीरों पर यकीन करें, तो कॉरीडोर बहुत संकरा है और
ख़ासकर अख्मातवा के लिए बेहद तंग है, फिर छत बहुत ऊँची है,
जिससे तीन मीटर्स वाली अख्मातवा बिना रुकावट के दरवाज़े के ऊपर,
दीवार की ओर देखती रहती है, जो ऑफ़िस के किसी
कमरे में खुलता है.
इस
स्मारक के क्रेस्ती में उद्घाटन का अर्थ समझ में नहीं आया. नहीं, सामान्य
तौर पर क्रेस्ती के क्षेत्र में अख्मातवा के स्मारक का नहीं (हालाँकि ये भी
विवादरहित नहीं है, ज़्यादा अच्छा होता वहाँ, जैसे, डैनियल खार्म्स का स्मारक, मगर चलिए, ठीक है, क्यों नहीं
हो सकता?), बल्कि काँसे के स्मारक के इस प्लास्टर ऑफ पैरिस
के प्रतिरूप का, जो पहले ही नदी के दूसरे किनारे पर स्थापित
है. वैसे भी वह, काँसे का, इस तरह
बनाया गया है, कि क्रेस्ती की ओर सिर्फ बाहर से ही देख सकता
है : अख्मातवा की नज़र कहीं दूर, नीवा के पार, टिकी है. प्लास्टर ऑफ पैरिस के प्रतिरूप को भी,
जो बाह्य रूप से मुख्य स्मारक से सिर्फ निर्माण सामग्री के आधार पर
भिन्न है, उसी नज़र से ऑफिस के कमरे की दीवार की ओर देखना
चाहिए. क्रेस्ती में इस अख्मातवा को घुटन महसूस होती है, चाहे
वह हिरासत केन्द्र के किसी भी प्रशासनिक कमरे में क्यों न रखी जाती.
दो-दो
अख्मातवाओं की उपस्थिति को इस तरह से समझाते हैं, कि असल में एक शिल्प-समूह
की कल्पना की गई थी, जिसमें इन दोनों के अलावा अख्मातवा की
कविताओं वाला एक स्मृति पटल भी होने वाला था : उसकी स्थापना क्रेस्ती की तरफ़ वाले
किनारे पर की जाने वाली थी - बाहरी, दूरस्थ, मुख्य अख्मातवा की नज़र की सीध में... फिर भी इस प्रतिरूप के बारे में हर
चीज़ समझ में नहीं आती. हाँ – शिल्प समूह का सदस्य. संकल्पना के अनुरूप. मगर संकल्पना
क्या थी? हो सकता है, सिर्फ एक उपहार
हो? ताकि इस संस्था में भी एक अपना स्मारक हो – अपनों के लिए,
बाहरी लोग तो वैसे भी नहीं देखेंगे. और बिना किसी दावे के सिर्फ एक
ही शिल्प...
क्रेस्ती
के साथ वैसे भी सब कुछ आसान है – वह भी समूह का हिस्सा बन गया है. और ये सचमुच ही
ऐसा है – नीवा के बाएँ किनारे पर पैडेस्टल की बगल में खड़े हो जाइए, जिस
पर काँसे की अख्मातवा खड़ी है और देखिए कि वह किस तरफ़ देख रही है – इन्हीं ईंटों
वाली मायूस इमारतों की ओर जिनके पीछे इकलौती चिमनी है – और आपको सब समझ में आ
जाएगा.
ऊपर से, काँसे
की अख्मातवा ने अपनी एकटक नज़र उस अक्ष से हटाकर, जिस पर
शेम्याकीन्स्की के स्फिन्क्स ताक-झाँक करते थे, स्वयँ को
अपने पैरों के पास वाले “राजकीय दमन के शिकार” स्मारक पर केंद्रित कर दिया है. ऐसा
लगता है, कि एक स्मारक दूसरे, स्मारक
को निजीकृत कर रहा है, जो सैद्धांतिक रूप से उसके निकट है.
खुद नीवा
ही इस व्यापक स्मारक-परिसर का हिस्सा बन गई है. बिना अतिशयोक्ति के – भव्य परिसर
का. मगर यह भव्यता सरसरी नज़र से छुपी हुई है.
क्योंकि
इस परिसर का मुख्य तत्व है – अख्मातवा की टिकी हुई नज़र.
मगर तभी
समस्याएँ शुरू हो जाती हैं.
अब
रबेस्पेर को ही लीजिए. ये किनारा उसीके नाम से जाना जाता था. अख्मातवा के सामने
फैलकर,
रबेस्पेर किनारे ने, सिर्फ अपने नाम से ही इस
व्यापक स्मारक परिसर में एक महत्वपूर्ण, हालाँकि प्रतीकात्मक
योगदान दिया है. “राजनीतिक दमन के शिकारों” का स्मारक रबेस्पेर किनारे पर नहीं तो
और कहाँ हो सकता था? सात साल तक अख्मातवा रबेस्पेर किनारे के
सामने खड़ी रही. और तब किनारे को उसका पुराना नाम लौटा दिया गया. और वह
“वस्क्रेसेन्स्काया किनारा” हो गया. (वस्क्रेसेन्ये – पुनर्जन्म – अनु.)
वस्क्रेसेन्स्काया
– अस्तित्वहीन चर्च के नाम पर, बेशक, गहरा
अर्थ रखता है. मगर “राजनीतिक दमन के शिकारों” के लिए रबेस्पेर, आप भी मानेंगे, बेहतर है!
और फिर
जल्दी ही हिरासत केंद्र अपनी ऐतिहासिक बिल्डिंग्स छोड़ने वाला है, उसके
लिए कोल्पिना में नई बिल्डिंग्स बन गई हैं. इस समय तक, जब ये
लेख लिखा जा रहा था (अगस्त 2014) जनता को क्रेस्ती के भविष्य के बारे में सूचित नहीं
किया गया था. मगर वहाँ चाहे जो भी बना हो – कोई मनोरंजन
केन्द्र, बिज़नेस सेंटर, फ़ाइव स्टार
हॉटेल या विभिन्न ऑफ़िसों के लिए मल्टी-फंक्शनल कॉम्प्लेक्स – अख्मातवा द्वारा
उन्हें देखना न सिर्फ अनावश्यक, बल्कि अटपटा भी है.
और जब
आन्ना अन्द्रेयेव्ना की सीधी नज़र अपना अर्थ खो देगी, तो ये भव्य स्मारक पल भर
में नष्ट हो जाएगा, और उसका हर तत्व अपने आप में सिमट जाएगा.
वैसे, किसी अजनबी की सरसरी नज़र इस भव्य विनाश को फिर भी नहीं
महसूस करेगी.
लेनिन को
तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता - कि क्या देखना है. वह चाहे कहीं भी
देखे – चाहे वह बाथ-हाउस हो, या बार हो या वही कैदखाना हो –
लेनिन हमेशा अपने आप में परिपूर्ण है. मगर क्रेस्ती की ओर देखती हुई अख्मातवा – ये
बिल्कुल अलग बात है. क्रेस्ती नहीं – तो देखने का कोई मतलब ही नहीं.
बेशक, नए
विचार उत्पन्न होंगे – स्मारकों के साथ ऐसा नहीं होता, कि
उनकी हर चीज़ बेमतलब हो जाए. हो सकता है, कि आन्ना अख्मातवा
की नज़र में हमें उलाहना या फिर व्यंग नज़र आए (हालाँकि वो ऐतिहासिक आन्ना
अन्द्रेयेव्ना की विशेषता नहीं थी).
क्या
हिरासत केन्द्र के कर्मचारी अख्मातवा के प्लास्टर ऑफ पैरिस वाले प्रतिरूप को अपने
साथ कोल्पिना ले जाएँगे? मेरा ख़याल है, कि ले
जाएँगे. वह उनकी बैलेन्स-शीट में है ना?
और
शिल्प-समूह के विचार को, जिसमें यह प्रतिरूप शामिल है, सिर्फ इस तरह समझा जा सकता है. अगर काँसे की अख्मातवा दूर नज़र न गड़ाने में
असमर्थ है, तो प्लास्टर में ढले प्रतिरूप को भी देखने के लिए
दूरी की तलाश है, मगर यहाँ तो दीवार है, - तो फिर वह इस हिरासत केंद्र में क्या कर रहा है? कुछ
नहीं. यहाँ सवाल नहीं पूछते : ये स्मारक – एक कैदी है.
ये
स्मारक भी नहीं है, ये परछाईं है – नदी के उस पार वाले स्मारक की.
स्मारक
की परछाईं का स्मारक से वही संबंध है, जैसे प्लास्टर ऑफ पैरिस का काँसे
से.
या जैसे
नील की परछाईं का ख़ुद नील से.
मगर तब
ये कोई नील तो नहीं है, बल्कि स्तीक्स है, है ना?
और
अख्मातवा इस तरह देख रही है, जैसे कोई सपना देख रही है, एकटक दूसरे किनारे को देख रही है, हेडीस के साम्राज्य
( मृत्युलोक - अनु.) जहाँ उसकी अदूरदृष्टि वाली परछाईं मुरझा रही है. यही
है अवधारणा. यही है शिल्प-समूह.
2
ये है
पीटर्सबुर्ग में अख्मातवा का पहला स्मारक. बल्कि, लेनिनग्राद में.
अख्मातवा
का पहला,
और वैसे, वही लेनिनग्राद में अंतिम स्मारक है
: स्मारक के उद्घाटन के चार ही दिन बाद लेनिनग्राद का नाम बदलकर सेंट पीटर्सबुर्ग
हो गया. स्मारक का उद्घाटन “आकस्मिक तख़्ता
पलट” की नाकाम कोशिश के डेढ़ सप्ताह बाद किया गया – याद है ना, “इमर्जेन्सी कमिटी” और बाकी सब?
अख्मातवा
शहर में नहीं थी और अब प्रकट हो गई – ग्रेनाइट की, उत्साहपूर्वक बैठी है पैर
पर पैर रखे, हाथों को सीने पर टिकाए...जन्मसिद्ध अधिकार का
नैतिक बोझ तो था, फिर ये उलझन कि स्मारक को कहाँ स्थापित
किया जाए और कहाँ न किया जाए – यहाँ, हो सकता है, कोई काव्यात्मक वसीयत का चक्कर नहीं था. ऊपर से
अख्मातवा की “रेक्वियम” जिस पर प्रतिबंध लगा था, स्कूल के
पाठ्यक्रम में शामिल नहीं की गई थी, मगर स्मारक तो कुछ मायने
में स्कूल में है – उसे स्कूल नंबर 209 के सामने वाले गार्डन में स्थापित किया गया
है, पैडेस्टल पर स्पष्ट (बल्कि, इसके
विपरीत, अस्पष्ट) खुदा हुआ है : “स्कूल को भेंट...” 4 - और उद्घाटन हुआ था किसी और दिन नहीं, बल्कि स्कूल-वर्ष के पहले दिन – 2 सितम्बर 1991को (उस साल पहली सितम्बर को
इतवार था).
समाज अभी तक हाल ही की घटनाओं से दूर नहीं हुआ
था और नई घटनाओं की आशंका में जी रहा था. रिपब्लिक्स ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी
थी,
उच्च अधिकारी आत्महत्याएँ कर रहे थे, राजनेता
चौंकाने वाले बयान दे रहे थे, कम्युनिस्ट पार्टी को
ट्रिब्युनल की धमकी दी जा रही थी. उन्माद, जो समाज पर हावी
हो गया था, कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था, और सामान्य उदासीनता के लौटने में अभी काफ़ी वक्त था (ये हुआ था, करीब नवम्बर के आयोजनों तक).
अख्मातवा
सबसे कटी हुई है. वह इस जगह से परे है और इस वक्त से परे है. लगता है, कि
वह कुछ भी नहीं देख रही है – न फूल, न पहली क्लास के बच्चे,
न उनके एकाग्र अभिभावक, न ही स्कूल के प्रवेश
द्वार के सामने अपने उद्घाटन को. उसकी पलकें जैसे झुकी हुई हैं – यकीन करने के लिए,
कि ऐसा नहीं है, उसके बिल्कुल पास जाकर उसकी
आँखों में देखना होगा (आपको करना है?). वह यहाँ नहीं है,
न आपके साथ, न हमारे साथ (अगर हम बगल में
हैं). मगर हम उसके अपने आप में मगन होने का रहस्य जानने का नाटक नहीं करेंगे. इस स्मारक
के बारे में हम इसलिए बात नहीं कर रहे हैं. यहाँ एक संयोग है, और फिर से – वह छाया के विषय से जुड़ा है.
जैसे
श्पालेर्नाया पर अख्मातवा के स्मारक को क्रेस्ती में एक प्रतिरूप दिया गया है, उसी
तरह स्कूल के सामने वाली अख्मातवा भी अपने प्रतिरूप से वाकिफ़ है : वो है
पीटर्सबुर्ग स्टेट युनिवर्सिटी के भाषा-विज्ञान विभाग के आँगन में.
शिल्पकार
वी.ई.त्रयानव्स्की ने स्मारक के विभिन्न संस्करणों पर काम किया था. “युनिवर्सिटी
वाली” अख्मातवा हालाँकि आकार में “स्कूल वाली” अख्मातवा से छोटी है, हालाँकि
काँसे में ढली हुई है, मगर वह बिल्कुल ‘वही’ है. मूल भाव, बेशक,
वही है – पैर पर पैर रखे उदासीन भाव से बैठी है, हाथों को सीने पर रखा है, सिर्फ जगह बदल दी है. इस
स्मारक का उद्घाटन सन् 2004 में हुआ था.
भाषा-विज्ञान
विभाग का आँगन – बेशक, कोई क्रेस्ती तो नहीं है, मगर यहाँ भी वह अलिप्त है, बाहर वालों की आँखों से अलग-थलग
है. चाहे कैद कह लीजिए, या शरणस्थल.
अख्मातवा
के स्मारकों के साथ अजीब-अजीब होता है. श्पालेर्नाया और वस्तानिया स्ट्रीट्स पर दो
पूरे आकार के,
और दोनों परछाईं के साथ हैं.
3
और ख़ुद
परछाईं,
वो भी ‘फ़न्तान्नी पैलेस’
के बाग में घूमती है. औपचारिक दृष्टिकोण से ये, शायद,
अख्मातवा के प्रतिबंध से बचने का एक बेहतरीन तरीका है : कवि को
स्मारक तो समर्पित करना, मगर पत्थर पर जैसे कवि की परछाई चित्रित
करना, - कई लोग इसे अख्मातवा की परछाईं का स्मारक ही समझते
हैं. ये जगह ही शायद इस बात का सुझाव देती है – अख्मातवा की परछाईं शिरिम्येत्येव
पैलेस के बाग में नहीं तो और कहाँ रहेगी?
ओ.ए.क्रीव्दिना
और बी.बी. तीचिनिन की किताब में स्मारक का वर्णन इस प्रकार से है : “इस स्मारक को
बनाने के विचार को आ.अ. अख्मातवा की कविता की इस पंक्ति से प्रेरणा मिली :
“तुम्हारी दीवारों पर मेरी परछाईं...” ( “बिना नायक की कविता”, 1942 से). चमचमाते काले पत्थर की स्लैब पर काँसे में ढला एक खड़ा पत्थर है,
जो एक स्तंभ के हिस्से को प्रदर्शित करता है. स्लैब पर और स्तंभ पर
अख्मातवा को प्रदर्शित करती हुई गहरी आकृति है, जो उसकी
परछाईं से संबद्ध है. नीचे, बाईं ओर, मानो
शीशे में प्रतिबिंबित होती हुई रुबाई की पंक्तियाँ हैं:
“और एक ख़ामोश परछाईं की तरह
भटकूंगी मैं यहाँ रात में
शिरिम्येतेव के बाग में
1926”
इन
पंक्तियों को स्लैब पर यूँ पढ़ा जा सकता है, मानो दर्पण में पढ़ रहे हों”
5
हाँ, इस
तरह का रहस्यमय लेखन वाकई में अख्मातवा की भावना के अनुरूप है:
दर्पण की लिखाई में लिख रही हूँ,
दूसरा रास्ता ही नहीं है –
खोजा इसे इत्तेफ़ाकन मैंने
उसे छोड़ने की जल्दी नहीं है.”
स्मारक
का उद्घाटन अख्मातवा की चालीसवीं पुण्यतिथि के अवसर पर किया गया – 5 मार्च 2006
को. उद्घाटन के अवसर पर न केवल अख्मातवा की परछाईं के बारे में भाषण दिए गए, बल्कि
झुकोव्स्की, पूश्किन तथा औरों की परछाइयों को भी याद किया
गया (सिर्फ परछाइयाँ – जिनसे इस रूप में यहाँ पर अख्मातवा ने बातें की थीं).
यहाँ इस
बात पर गौर करना होगा कि परछाईं दाएँ से बाएँ नहीं मुड़ती है, बल्कि
बाएँ से दाएँ मुड़ती है – अक्षर भी बाकी सारी चीज़ों की तरह अपनी परछाईं सीधे डालते
हैं, न कि दर्पण की तस्वीर में. तो, कूट
भाषा में लिखी पंक्तियाँ हम तक परछाइयों की नहीं, बल्कि इसके
विपरीत प्रतिबिम्बों की दुनिया से – दर्पण के पीछे से पहुँचती हैं. और इसलिए इन
कूट लेखन वाली पंक्तियों की बगल में निर्मित – अख्मातवा की परछाईं नहीं, बल्कि ख़ुद अख्मातवा है – दर्पण के पीछे. उसका चेहरा एक
किनारे है, हमेशा की तरह, मतलब,
अगर वह यहाँ होती, हमारी ओर, तो वह किनारे की ओर देखती, न कि उस ओर, जिधर हम देख रहे हैं, मतलब “दर्पण” की ओर, और वह ख़ुद को नहीं देखती, - जैसे, यहाँ से वह अपने प्रतिबिम्ब को नहीं देख रही है, बल्कि
वो ख़ुद वहाँ है – समूची – दर्पण के पीछे.
रह गई मैं अपने दर्पण के पीछे,
जहाँ न तो रोशनी है, ना
ही हवा...
दर्पणों
के साथ उसके उलझे हुए रिश्ते थे.
और दर्पण में प्रतिरूप मदद नहीं करना चाहता
मेरी.
और
दर्पणों के भी उसके काव्यात्मक जीवन में उलझे हुए रिश्ते ही होते. “दर्पण को सिर्फ
दर्पण का ही सपना आता है...”
हो सकता
है,
ये ही दर्पण का सपना हो. और उसमें वह है. मगर वह ख़ुद. परछाईं नहीं.
4
प्रत्यक्ष
रूप में परछाईं – ख़ुद परछाईं – भी फोन्तान्नी पैलेस में दिखाई गई है. ग्रेनाइट की
स्लैब एक अन्य,
ज़मीन में किनारे तक दबी हुई स्लैब पर रखी है, और
दोनों स्लैब्स पर एक आदमी की टेढ़ी-मेढ़ी परछाईं पड़ी है – वही इस संरचना का मुख्य
तत्व है. ये परछाईं है मन्देल्श्ताम की. उसके अलावा इस संरचना के अन्य महत्वपूर्ण तत्व
हैं इबारत “ओसिप मन्देल्श्ताम को 2007”, दो चौकोर पट्टिकाएँ जो
स्मारक के उद्गम के बारे में सूचित करती हैं, जैसे स्पॉन्सर्स,
और अख्मातवा की कविता “वरोनेझ” का एक अंश “ओ.एम.”
को समर्पित करते हुए. कविताएँ, जो अख्मातवा ने वरोनेझ में निष्कासित
मन्देल्श्ताम से मिलने के बाद लिखी थीं, जैसे यहाँ पर अख्मातवा
की स्पष्टतः अनुपस्थित परछाईं का प्रतिनिधित्व करती हैं.
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1. ये देखना दिलचस्प है कि
ख़ुद अख्मातवा अपनी बाद की टिप्पणियों में (1962में) झ्दानव के प्रति क्या लिखती
हैं (और वैसे, उसके लिए स्मारक की संभावना के संबंध में): “ऐसा लगता था, कि इस शासकीय(प्रहार करने वाले) व्यक्ति ने जीवन में सिर्फ इतना ही किया, कि बूढ़ी महिला को
अशोभनीय शब्दों से संबोधित करता रहा, और इसीमें उसकी अमर कीर्ति है. तभी उसके लिए स्मारक और संकलित रचनाओं का
वादा किया गया था. मगर इनमें से एक भी पूरा नहीं हुआ”. आन्ना अख्मातवा की डायरियाँ
(1958-1966), मॉस्को; तोरिनो : 1996,पृ, 265.
2. आन्ना अख्मातवा
का असली कुलनाम गरेन्का था. पहली शादी के बाद कुलनाम हो गया – गरेन्का-गुमिल्योवा, पहले पति,
गुमिल्योव से तलाक के बाद उन्होंने अपनी दादी का शादी से पहले का
कुलनाम – अख्मातवा अपना लिया. इसी छद्मनाम से वे कविताएँ लिखती रहीं.
3.ये परिस्थिति अख्मातवा के स्मारक
के उद्घाटन के समय थी. स्मारक का प्रकट होना दोनों शिल्पों के लिए ‘शुभ’ रहा – दोनों को अपनी-अपनी जगह से हटाकर मरम्मत
के लिए भेज दिया गया. अनुपस्थित अवयवों को पुनर्स्थापित कर दिया गया.
4. दूसरी
पंक्ति मुश्किल से पढ़ी जाती है: “इण्डेक्स फर्म की ओर से”.
5. क्रीव्दिना
ओ.ए.,
तीचिनिन बी.बी.. सेंट पीटर्सबुर्ग के शिल्प और शिल्पकार.
1703-2007 – से.पी.ब.;
लोगोस, 2007, पृ. 76



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