लड़की और रेल की पटरी
याद नहीं आता कि यह कहानी मुझे कैसे पता चली थी – या
तो मैंने इसे तस्वीरों वाली किताब में पढ़ा होगा, या, हो सकता है, पायनियर्स की मैगज़ीन में, या ओपन-सेशन में सुनी थी, रेडिओ पर सुनी थी या, हो सकता है, विक्ट्री पार्क में बड़ों के मुँह से, जहाँ कभी-कभी
घूमने का मौका मिल जाता था. चाहे जो हो, मेरी पीढ़ी के लोगों के अवचेतन में ये विषय पैंठ गया है
: लड़की ने देखा कि रेल की पटरी ख़तरनाक तरह से टूटी है, वह अपनी लाल टाई (या स्कार्फ़) उतारती है और उसे हिलाते
हुए रेल को रोकती है.
इस स्मारक को देखकर यही महसूस होता था, न सिर्फ मुझे
बल्कि सभी को, जो उसे जानते थे.
और उसे, ख़ास तौर से, अपने प्रतिरूप की वजह से जानते थे – ज़िलिनागोर्स्क में
प्रिमोर्स्कोए हाइवे पर, अगर आप शहर से बाहर जा रहे हैं, तो फ़ौरन
नीझ्न्याया स्ट्रीट के बाद, वह अभी भी वहीं है – काँसे की लड़की ग्रेनाइट के
पैडेस्टल पर, आधी लेटी हुई रूमाल हिला रही है, मगर ये सिर्फ सन्
1957 के नमूने का ‘क्लोन’ है – प्रारंभिक रूप, जिसे चार साल पहले ‘मॉस्को विक्ट्री पार्क’ में स्थापित किया गया था, कम प्रसिद्ध था : पार्क की पगडंडी – आम रास्ता थोड़े ही
है.
लड़की आधे मुड़े हाथ से पटरी का सहारा लिए है, और चूँकि दूसरी
पटरी नहीं दिखाई गई है, ये फ़ैसला कर सकते हैं कि उसके साथ कुछ बुरी बात हुई है
– या तो उसे चुरा लिया, या वह ज़मीन खिसकने से फ़िसल गई, बस गायब हो
गई...ज़ाहिर है कि लड़की कोई साहसिक कार्य कर रही है.
साहसिक कार्य के बारे में सूचित करती हुई इबारत भी है.
मगर ये इबारत पैडेस्टल पर नहीं है, जो अगर होती तो फ़ौरन नज़र आ जाती, बल्कि छोटे-छोटे
अक्षरों से सफ़ेद रंग में शिल्प के नीचे एक पट्टी पर है. स्मारक के बिल्कुल पास
जाकर, न चाहते हुए भी सिर झुकाकर पढ़ना पड़ता है...मगर, नहीं – वक्त ने सफ़ेद रंग को लगभग पूरी तरह मिटा दिया
है. मगर हमें तो मालूम है कि वहाँ क्या था. वहाँ ये था:
“रेमन्द दिएँ की विजय”
बिना ‘विकीपीडिया’
के देखते हैं, कि रेमन्द दिएँ (Raymonde Dien) कौन है?
तो, ये
बात है. कल्पना कीजिए, कि आपके सामने तीन चीज़ें हैं: आर्ट्स
स्क्वेयर पर शिल्पकार अनिकूशिन का पूश्किन का स्मारक, स्मारक
“रेमन्द दिएँ की विजय”, जो
प्रिमोर्स्कोए हाइवे पर है, और आपका आज्ञाकारी सेवक (स्मारक
नहीं), जो ये पंक्तियाँ
लिख रहा है, - आपसे पूछा जाता है, क्या
इन चीज़ों में कोई समानता है? पहली दो के बारे में तो फ़ौरन कह
सकते हैं कि वे स्मारक हैं, उन्हें जोड़ती है - हाथ हिलाने की
ऊर्जा, उनमें से हर एक भावावेग को दर्शाता है – पूश्किन
प्रेरणा के क्षण में गिरफ़्तार है, और रेमन्द दिएँ – मृत्यु
के ख़तरे के पल में. जहाँ तक मेरा सवाल है, तो मैं सिर्फ उनके
पास खड़ा हूँ. अरे, नहीं, नहीं. तीनों
के बीच एक समानता है, वो ये है: हम तीनों – हम उम्र हैं. जब
स्मारक के बारे में ये पता चलता है, कि वह आपका हम उम्र है,
तो उसकी तरफ़ ज़्यादा गौर से, ज़्यादा सहानुभूति
से, ज़्यादा हमदर्दी से, हो सकता है,
कुछ अपने तरीके से देखने लगते हो. पूश्किन के,
जिसका ये स्मारक है, अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच
के, साथ तो कोई सवाल ही नहीं है – उसने मेरी ज़िंदगी में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, बिल्कुल मेरे बचपन से, मगर जहाँ तक रेमन्द दिएँ का सवाल है, मैंने तो ये
नाम भी नहीं सुना था, जब तक कि – बेशक, बड़ा होने पर – पीटर्सबुर्ग के स्मारकों के जीवन के रहस्यमय पहलुओं की ओर
आकर्षित नहीं हुआ.
सिर्फ
तभी मुझे अचरज हुआ, कि कितना भुला दिया गया है (मेरे अचरज करने की
घड़ी में) रेमन्द दिएँ को. मगर तब विकिपीडिया नहीं था.
अब
रेमन्द दिएँ के साहसी कारनामे के बारे में कोई भी इंटरनेट से जान सकता है, और,
अगर ईमानदारी से कहूँ, तो, मुझे यह बात लेख लिखने से हतोत्साहित करती है. अभी कुछ ही दिन पहले तक,
जब रेमन्द दिएँ का नाम विस्मृति के अंधेरे में डूबा हुआ था, इस स्मारक से देशवासियों के दिमागों में उसका इस स्मारक से संबंध स्थापित
नहीं हो पा रहा था, मेरे हाथ जल्दी से जल्दी इस स्मारक के
बारे में लिखने के लिए बस खुजला रहे थे, जिसे हम बिल्कुल गलत
समझ रहे थे. हाँ, पैडेस्टल पर स्थित जवान लड़की सचमुच में रेल
को रोक रही है, मगर इसलिए नहीं कि दुर्घटना को रोक सके.
उल्टे, रेल की पटरियों पर वह जानबूझ कर जोखिम वाली परिस्थिति
उत्पन्न कर रही है.
संक्षेप
में कहानी ये है.
ये हुआ
था फ्रान्स में युद्ध-विरोधी प्रदर्शन के दौरान, जो संयोग से उसी फरवरी वाले
दिन आयोजित हुए थे, जब सोवियत संघ में सोवियत जल सेना और थल
सेना की स्थापना की बत्तीसवीं साल गिरह मनाई जा रही थी. उन दिनों फ्रान्स
इंडोचाइना में औपनिवेशिक युद्ध लड़ रहा था, और दुनिया के
शांतिप्रिय लोग वियतनामी जनता के राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम का समर्थन कर रहे थे. ‘तूर’ शहर में टैन्क्स से लदी एक रेलगाड़ी पहुँची,
जिसे इंडोचाइना भेजा जाना था – कम्युनिस्ट-सोच वाले श्रमिकों ने
विरोध प्रदर्शन किया, रेमन्द दिएँ पटरियों पर लेट गई और
दूसरी औरतें भी फ़ौरन उसका अनुसरण करते हुए पटरियों पर लेट गईं, उसने रेलगाड़ी को स्टेशन से बाहर निकलने नहीं दिया, जिससे
पुरुष प्रदर्शनकारियों को रेलगाड़ी में घुसकर युद्ध सामग्री को नुकसान पहुँचाने का
मौका मिल गया. रेलगाड़ी लगातार नौ घण्टे खड़ी रही और रेमन्द दिएँ को तोड़फोड़ के आरोप
में एक साल की सज़ा सुनाई गई, मगर प्रगतिशील मानवता के विरोध
प्रदर्शनों की बदौलत इस साहसी कम्युनिस्ट महिला को छह महीने बाद ही आज़ाद कर दिया
गया, हालाँकि उसे लम्बे समय तक अपने अधिकारों से वंचित रखा
गया. इस तरह, वह पूरी दुनिया में शांति के लिए एक सक्रिय
योद्धा बन गई.
विस्तृत
जानकारी के लिए कृपया इंटरनेट पर जाएँ.
इंटरनेट
पर ही मैंने “रेमन्द दिएँ” नामक रचना सुनी थी, जिसे नादेझ्दा अबूखवा,
हमारी प्रख्यात मेज़्ज़ो-सोप्रानो गायिका ने प्रस्तुत किया है (अपने
दुर्लभ एल्बम “रोमान्सेस एण्ड साँग्स” में, अन्य कलाकार हैं
ब्राम्स, शुमन और अन्य क्लासिक्स).
ख़ुद
सिर्गेइ प्रकोफ्येव ने, जो गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे, अपनी ओरेटोरिओ (संगीत कथा-कथन) - “दुनिया की सुरक्षा में” इस विषय को शामिल किया था, और इस कथा-कथन के लिए कविता सैम्युअल मार्शाक ने लिखी थी. दिएँ के बारे
में महिला-कोरस ये गाता है:
दुनिया में मज़बूत दीवार नहीं,
उन ज़िंदा लोगों के मुकाबले,
जो कर सकते हैं रेमन्द दिएँ की तरह
हथियारों का सामना सीने से.
पूरी
कविता में इन चार पंक्तियों से पहले और दो पद हैं जो विजय की विषय-वस्तु को पूरी
तरह खोलते हैं:
चिंघाड़्ते
साइरनों की आवाज़
दहशत न
फैलाए,
लेट जाने
का फ़ैसला किया
रेमन्
दिएँ ने रास्ते के जाल पे.
सामने
उसके पहियों की चीख के साथ,
दो
स्टेशनों के बीच,
रुक गई
रेल
टैंकों
का भारी भार लिए.
कहते हैं
कि इसी विषय पर एक गीत भी था, जिसे मुझसे पहले के पायनियर्स
कंठस्थ किया करते थे, मगर उसके शब्द मालूम नहीं हैं.
मतलब, इसमें
आश्चर्य की कोई बात नहीं है, कि रेमन्द दिएँ की जीत को लगभग फ़ौरन
ही काँसे में अमर कर दिया गया. और चार साल बाद सिर्फ इसे सुनिश्चित करने के लिए
इसका जुड़वाँ-स्मारक भी बना दिया गया.
मगर बाद
में लोग उसे भूलने लगे.
मेरे
स्कूल के दिनों में शांति के लिए संघर्ष कर रही एक अन्य योद्धा – आन्जेला डेविस को
सब लोग जानते थे,
जिसके बेहद शानदार बाल थे. वह सोवियत संघ में
लोकतंत्र और सामाजिक प्रगति के लिए संघर्ष का प्रतीक बन चुकी थी, जिनकी संयुक्त राष्ट्र में बेहद कमी थी; हमारे देश
में सब लोग आन्जेला डेविस को अमेरिका की जेल से आज़ाद करने की माँग कर रहे थे,
और वह रेमन्द दिएँ से पंद्रह साल छोटी थी, जो
हमें मालूम हो ही नहीं सकता था, क्योंकि इस समय तक रेमन्द
दिएँ को सोवियत संघ में लोग लगभग भूल चुके थे. अस्सी के दशक के मध्य में खगोल
भौतिकीविद डॉक्टर हैदर ने प्रेसिडेन्ट रीगन के प्रशासन को चुनौती दी और उनके ‘स्टार-वार्स’ और परमाणु-परीक्षणों के कार्यक्रम के
विरुद्ध भूख हड़ताल की घोषणा कर दी. उसे जेल-वेल नहीं भेजा गया, वह ख़ुद व्हाइट हाउस की बाड़ के पास अपने टाइम-टेबल के अनुसार बैठता था. इस
शांति-योद्धा को हास्य-शोकात्मक प्रतीक के रूप में जाना जाता था : उसकी भूख हड़ताल
करीब सात महीने चली, और उससे कुछ भी हासिल नहीं हुआ.
वैज्ञानिक को कोई संगीत कथा-कथन समर्पित नहीं किया गया, मगर
“शून्य” ग्रुप के लीडर फ्योदर चिस्तिकोव ने उसके बारे में एक गीत की रचना की थी,
मुझे ‘पैलेस ऑफ यूथ’ में
आयोजित एक रॉक-फ़ेस्टिवल में कवि के मुख से उसे सुनने का मौका मिला था (“ - - और
तब हमने सुनी अच्छी ख़बर - - फिर से खाने लगा - - डॉक्टर है-ए-ए-ए-दर - - डॉक्टर
है-ए-ए-ए-दर”).
पिछली शताब्दी के अंत और नई शताब्दी के आरंभ
में रेमन्द दिएँ को हमारी प्रेस ने बिल्कुल याद नहीं किया – सिवाय इसके कि स्मारक का
विशिष्ठ संदर्भ-पुस्तिकाओं में ही ज़िक्र किया गया. इन छोटे-छोटे नोट्स में उसके
जीवनकाल को इस तरह दर्शाया गया है : (1929 - ?). आज इंटरनेट इस प्रश्नवाचक
चिह्न के बारे में शक की गुंजाइश नहीं छोड़ता. शिल्पकार, कलाकार,
संगीतकार, ऑपेरा गायक, सामाजिक
और सरकारी कार्यकर्ता, जिन्होंने इस ख़ूबसूरत नाम की प्रशंसा
की थी, दूसरी दुनिया में जा चुके हैं, मगर
वह, जिसके लिए उसके जीवनकाल में ही आधी शताब्दी से भी पहले स्मारक
बना दिया गया था, अभी भी जीवित है (जब मैं यह लिख रखा हूँ) –
तो, उसकी दीर्घायु की कामना करता हूँ.
पता नहीं, रेमन्द
दिएँ ने अपने आप को काँस्य रूप में, काँसे की पटरी के पास
देखा है या नहीं, और क्या पीटर्सबुर्ग में अपने स्मारक
(बल्कि दो-दो स्मारकों) की उपस्थिति के बारे में वह जानती भी है या नहीं, मगर, मेरे विचार में, हमारी इस
नश्वर दुनिया के लिए इन दोनों स्मारकों की उपस्थिति अत्यंत अविश्वसनीय है : आधी
शताब्दी से भी ज़्यादा समय से स्मारक और वह व्यक्ति भी एक ही साथ रह रहे हैं, जिसका स्मारक बनाया गया है!
इंटरनेट
में रेमन्द दिएँ का वीडियो-इंटरव्यू देखा जा सकता है, जो
उसने सन् 2012 में दिया था – ज़ाहिर है, फ्रेंच में. ढलती
उम्र के बावजूद कम्युनिस्ट महिला चुस्त-दुरुस्त है.
इंटरनेट
में आप क्या-क्या नहीं देख सकते! इस बारे में कुछ कहने का भी मन नहीं करता. जिस
आसानी से इंटरनेट पर जानकारी उपलब्ध हो जाती है, उससे तथ्यों को खोजने वाले
हमारे बिरादर की सारी ख़ुशी काफ़ूर हो जाती है, जो उसे पुरानी,
ख़ास जानकारी को प्राप्त करते समय हुई होगी. रहस्य धूमिल हो जाते हैं,
गुप्तता काफ़ूर हो जाती है.
मगर
दूसरी ओर से देखें, तो इंटरनेट इंटरनेट है, और
स्मारक स्मारक है. और उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाता रहेगा जैसा वह है.
पीटर्सबुर्ग के मैत्रीपूर्ण शिल्प-समुदाय में एक छोटे से समूह – “स्वागत करती हुई
लड़कियों” - को देखा गया है, जिसका ज़िक्र करने को जी चाहता है. प्रिमोर्स्काया पर स्थित दूसरे ‘पार्क ऑफ विक्टरी’ में पैडेस्टल पर खड़ी है “विजेताओं
का स्वागत करती हुई लड़की”, उसके हाथों में गुलदस्ता है. और एक
समय, लाख्ता की तरफ़ से शहर में आने वालों का दूसरी लड़की हाथों
में गुलदस्ता लिए स्वागत करती थी, जिसका नाम भी यही था : “गुलदस्ते
वाली लड़की”, उसने पायनीयर्स वाली टाई बांधी थी और टॉवर जैसे ऊँचे
पैडेस्टल पर खड़ी थी. शहर फ़ैलता गया और इस लड़की को सिस्त्रारेत्स्क के पास ले गए. उसे
शायद ज़िलिनागोर्स्क भी ले जाते, क्योंकि अब वह भी पीटर्सबुर्ग
का ही हिस्सा है, मगर ज़िलिनागोर्स्क में पहले से ही एक लड़की है,
जो रूमाल हिला रही है. वे अब भी एक दूसरे से दूर नहीं हैं. सिर्फ बेनाम
की “गुलदस्ते वाली लड़की” उनका स्वागत करती है, जो शहर में प्रवेश
करते हैं, और रेमन्द दिएँ रूमाल हिलाकर उन्हें बिदा करती है,
जो शहर से बाहर जा रहे हैं. बाहर जाने वाले लोगों में से ज़्यादातर ये
नहीं जानते कि वह रेमन्द दिएँ है (उसकी ख़ातिर वे इंटरनेट पर तो नहीं जाएँगे). और अगर
वह यातायात को रोकने की कोशिश करती भी है, तो हमें इससे करना
भी क्या है. हम टैन्क्स तो नहीं हैं.

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