प्रस्तुतकर्ता
इस स्मारक के बारे में मुझे बस एक ही सवाल पूछना है.
कुछ और नहीं पूछूँगा. न तो कलात्मक मौलिकता के
बारे में, न उसकी उत्पत्ति के रहस्यों के बारे में, न ही उसके दर्जे के बारे में...हालाँकि दर्जे के बारे
में दो शब्द कहना चाहिए, जिससे स्पष्ट हो जाए कि किसके बारे में बात हो रही है.
ये स्मारक- बैरागी है. वह एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स, या दूसरे शब्दों में कहें तो, रेपिन
इन्स्टीट्यूट के वृत्ताकार आँगन का कैदी (या स्वामी) है. कई लोग सोचते हैं कि एक
साधारण इन्सान इस स्मारक को नहीं देख सकता.
रेपिन इन्सटीट्यूट में वाकई में ‘पास’ दिखाकर जाना पड़ता है. मगर, यदि आप म्यूज़ियम में जा रहे हैं – वहाँ, दूसरी मंज़िल पर, प्रवेश फ्री है, और आपको खिड़की से
काँसे के आदमी को देखने का मौका मिलेगा, जिसके बारे में सर्वविदित है, कि ये शुवालव है.
मॉस्को वालों के लिए तो और भी आसान है – शुवालव के स्मारक को देखने के लिए उन्हें
पीटर्सबुर्ग आने की ज़रूरत नहीं है, उनके पास अपना स्मारक है, बिल्कुल ऐसा ही – वराब्योव हिल्स (स्पैरोव हिल्स) पर, युनिवर्सिटी की
फंडामेन्टल लाइब्रेरी के सामने.
सब सही है, इवान इवानविच शुवालव ने - जो काऊण्ट, कार्यरत गुप्त सलाहकार, एलिज़ाबेथ के कृपापात्र थे, मगर एकातेरीना के कार्यकाल में जिनका निरादर हुआ था, न सिर्फ सेंट
पीटर्सबुर्ग में एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स की स्थापना की, बल्कि उससे दो साल पूर्व मॉस्को में युनिवर्सिटी की भी
स्थापना की थी, एकॅडेमी ऑफ आर्टस असल में जिसकी शाखा थी. स्मारकों के
साथ इसके विपरीत हुआ – पहले वह पीटर्सबुर्ग में प्रकट हुआ, और साल भर बाद –
मॉस्को में. दोनों के शिल्पकार ज़े. के. त्सिरितेली हैं, मगर पीटर्सबुर्ग का शुवालव – शिल्पकार द्वारा शहर को
दिया गया उपहार है.
तो ऐसा है. पीटर्सबुर्ग का और मॉस्को का शुवालव एक
जैसे हैं, दोनों दरबारी कोट में हैं, दोनों एक जैसी बेंचों पर बैठे हैं, दोनों एक ही दिशा
में देख रहे हैं, दोनों ही के दाएँ हाथ में ड्राइंग पेपर का ‘रोल’ है, और दोनों ही का
बायाँ हाथ फैला हुआ है. मगर पीटर्सबुर्ग वाले के फ़ैले हुए हाथ में कुछ भी नहीं है, और हमें ये
अनुमान लगाना पड़ता है, कि इस मुद्रा से पीटर्सबुर्ग वाला शुवालव अपने पैरों
के पास पड़ी हुई चीज़ को हमें दिखा रहा है, और वहाँ, उसके सामने है एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स की बिल्डिंग का
नक्शा. मगर मॉस्को वाले शुवालव ने अपने उसी तरह फैले हुए हाथ में मॉस्को युनिवर्सिटी
की स्थापना का आदेश पकड़ रखा है. एकॅडेमी ऑफ आर्ट्स की बिल्डिंग का प्लान, जिसे पीटर्सबुर्ग
में कार्यान्वित किया जाने वाला है, ज़ाहिर है, मॉस्को वाले शुवालव के पास नहीं है (याद दिला दूँ, कि ये मॉस्को में
हो रहा है). ठीक उसी तरह, पीटर्सबुर्ग का शुवालव भी मॉस्को युनिवर्सिटी की
वास्तविकता की ओर इशारा नहीं कर रहा है (क्योंकि, इस बार ये पीटर्सबुर्ग में हो रहा है). मतलब, हर शुवालव जनता
को कोई ऐसी चीज़ दिखा रहा है, जो सिर्फ उसी शहर के लिए महत्वपूर्ण है.
ठीक है.
मगर क्या ये अजीब नहीं है?
नहीं, मैं पुनरावृत्ति के बारे में नहीं कह रहा हूँ.
पुनरावृत्ति – स्मारकों की ज़िंदगी में आम बात हैं. अच्छा, ये देखिए. पीटर्स्बुर्ग में “क्रास्नादोन के वीरों” का
स्मारक है, ये “सौगन्ध” नामक स्मारक की पुनरावृत्ति है, जिसे पहले क्रास्नादोन में स्थापित किया गया था. पीटर्सबुर्ग के
(बेशक, लेनिनग्राद के) चपायेव का स्मारक समारा (कुयबीशेव) के चपायेव की पुनरावृत्ति
करता है. इत्यादि, इत्यादि. ख़ुद ज़ुराब कन्स्तान्तीनविच त्सिरितेली ने
नीझ्नी नोवगरद को, मर्तोस की कलाकृति के सम्मान स्वरूप, मीनिन और
पझार्स्की के स्मारक की एक प्रति भेंट की थी, हाँ, ये कहते हैं, कि वह आकार में छोटी है – पूरे पाँच सेन्टीमीटर्स.
लेनिन को ही लीजिए – इस प्यारी आत्मा की तो कितनी ही
पुनरावृत्तियाँ हुई हैं. वी. वी. कज़्लोव की कलाकृति को याद कीजिए, स्मोल्नी के
सामने वाले इल्यिच के शिल्प को, जिसे ग्रेनाइट के बेलनाकार पैडेस्टल पर स्थापित किया
गया है (जिसे, इत्तेफ़ाक से, एकॅडेमी ऑफ आर्टस के काँस्य-ढलाई कारखाने में ढाला गया
था). उसके क्लोन्स देश में बिखरे पड़े
हैं – अनगिनत! इस लेनिन के नीचे कैसे-कैसे पैडेस्टल्स की कल्पना की गई!
कन्स्ट्रक्टिविस्ट स्टाइल में, सुपरमैटिक स्टाइल में, और निओक्लासिकल स्टाइल में, और ‘त्याप-ल्याप’
(फ़टाफ़ट-अनु.) स्टाइल में.
मगर लेनिन हमेशा एक ही रहा, हमेशा एक ही काम में व्यस्त. अपने दाएँ हाथ के जोशीले
हाव-भाव से वह विभिन्न वस्तुओं की ओर इशारा करता था (और इससे चुटकुलों की गुंजाइश
पैदा करता), मगर हाव-भाव हमेशा वही, जोशीला होता. इस लेनिन के फैले हुए हाथ में ना तो कभी GOELRO ( रूस के विद्युतीकरण के लिए सरकारी कमिशन) का प्लान दिखाई दिया, ना स्टालिन का संविधान, ना ही पहली मई का झण्डा. ये लेनिन हर जगह एक जैसा ही
रहा – वैसा ही जैसा स्मोल्नी के मार्ग में था.
मगर जहाँ तक शुवालव के स्मारक का सवाल है, यहाँ हमें एक
बिल्कुल नई बात दिखाई देती है. यहाँ विविधताएँ न तो स्मारक के आकार से और न ही
पैडेस्टल के रूप से संबंधित हैं, बल्कि उनका संबंध स्मारकों के व्यवहार की विशेषताओं से
है. एक ही स्मारक की इन विविधताओं की तुलना करने पर, हमें सचमुच में ‘स्मारकों का व्यवहार’ जैसी असाधारण बात के बारे में कहने का हक प्राप्त हो
जाता है.
गौर कीजिए, कि यहाँ और वहाँ, दोनों स्थानों पर व्यवहार एक जैसा है, मगर व्यवहार में
निहित अर्थ अलग-अलग हैं.
शुवालोव पीटर्सबुर्ग में क्यों ऐसा बर्ताव कर रहा है, और मॉस्को में
किसी और तरह का? क्योंकि उससे ऐसा ही करने को कहा गया है. मॉस्को में
भी, और पीटर्सबुर्ग में जैसे वह काम पर ही है, काम से जुड़े कुछ कर्तव्य पूरे कर रहा है. उसका सार है
कुछ विशेष सुविधाओं के प्रदर्शन में. वह कुछ कह रहा है, कुछ सूचित कर रहा है, दर्शकों को किन्हीं विशिष्ट, मगर हर मौके के
लिए ख़ास चीज़ों की जानकारी दे रहा है. उसके भाषण की कामयाबी इस बात पर निर्भर है, कि वह स्थानीय
परिस्थितियों के अनुरूप है अथवा नहीं.
ये बात ग़ौरतलब है, कि प्रदर्शित की जा रही चीज़ों का – एक स्मारक में, जैसे कोई ड्राइंग
हो, दूसरे में ऑर्डर की शानदार नकल – ऐतिहासिक शुवालव से अप्रत्यक्ष संबंध है.
जब एकॅडेमी की बिल्डिंग का निर्माण हो रहा था, मान लीजिए, ऐसे ड्राइंग्स के अनुसार, तो शुवालव, जो एकातेरीना के राज्य काल में अवकृपा का पात्र बन
चुका था, विदेश में रह रहा था. और एलिज़ावेथा पित्रोव्ना ने मॉस्को युनिवर्सिटी की
स्थापना के आदेश पर इसलिए तो हस्ताक्षर नहीं किए थे, कि शुवालव, बेंच पर बैठे-बैठे सबको ये दस्तावेज़ दिखाता रहे. मगर, यदि ये फर्जी
(फर्जी हस्ताक्षर!) है, तो क्या शुवालव ऐसे दस्तावेज़ का प्रदर्शन करता?
इस बात की कल्पना करना असंभव है, कि ऐतिहासिक
शुवालव इतना क्रियाशील होने की जोखिम उठा सकता था. बेशक, वह शिक्षाविद् था, मगर उदाहरण
स्वरूप नहीं. कार्यकारी गुप्त सलाहकार इवान इवानविच शुवालव कभी भी कर्मचारी की
भूमिका नहीं निभा सकता था, वह भी उस जगह की विशेषता को देखते हुए, जो एक सड़क-छाप
सहायक के लिए ज़्यादा उचित है.
मगर, हो सकता है कि ये बिल्कुल शैक्षणिक कार्य न हो, और छद्मवेष में ज़िंदगी
हो, मिमिक्री हो? प्रस्तुत किए जा रहे दस्तावेजों को ये सिद्ध करना होता
है, कि उन्हें प्रस्तुत करने वाला – हर शहर में अपना दस्तावेज़ – कोई और नहीं, बल्कि शुवालव है.
मुझे इस बात का डर है. असल में – ये सवाल बहुरूपिये के
बारे में है.
नहीं, सावधानी पूर्वक कहता हूँ.
क्या सचमुच, वहाँ भी और वहाँ भी – शुवालव है? कहीं कोई बहुरूपिया
तो नहीं, जो किसी कारणवश शुवालव होने का नाटक कर रहा हो, जैसे कई लोग लेनिन होने का या पीटर महान का होने ढोंग करते
हैं?
वह क्या चाहता है? उसे किस बात की ज़रूरत है? असली शुवालव के साथ उसने क्या किया है?


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