बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

Monuments of Petersburg - 13



स्मारक –ट्रिब्यून    





अगर अलेक्सांद्र स्तम्भ और कुछ गैर-मानवरूपी चीज़ों को, जैसे स्मारक स्तंभों और स्मारक-तख़्तियों आदि को छोड़ दिया जाए, तो ये – पैडेस्टल सहित – शायद शहर का सबसे ऊँचा स्मारक है : अठारह मीटर्स. इन्सान की मूर्ति, ग्यारह मीटर्स की ऊँचाई पर चढ़ाई हुई, आकार तीन स्वाभाविक इन्सानों जितना होगा. शिल्पकार एम. गे. मनिज़ेर ने ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं की, जब उसने इसे “विशाल” कहा था.

स्मारक उतना ही महान है, जितनी कम उसके बारे में जानकारी है. कभी उसके आधार के पास हज़ारों रैलियों का शोर गूँजता था, पैडेस्टल का निचला भाग बढ़िया ट्रिब्यून का काम देता था. ये सब अतीत में था, स्मारक करीब-करीब भुला दिया गया है. उसके बारे में कभी-कभार ही कोई याद करता है – कभी-कभी “खूनी इतवार” की बरसी को समर्पित समाचार बुलेटिन्स में (यदि आँकड़ा अच्छा-ख़ासा हो). वह कब्रिस्तान पर स्थित है, भूतपूर्व प्रेअब्राझेन्स्की कब्रिस्तान पर, जो आजकल “9 जनवरी के शहीदों की याद” कहलाता है. उन्हीं के लिए है यह स्मारक - उसी 9 जनवरी के शिकार हुए लोगों का. उस दुर्भाग्यशाली दिन गोलियों से मार डाले गए लोग बागड़ से कुछ दूर एक बड़े गढ़े में गाड़ दिए गये थे.

कब्र पर फ़ौरन ही लोग आने लगे थे. हर साल 9 जनवरी को बहुत लोग यहाँ आते थे, "दसवें मील पर", मृतकों के प्रति सम्मान प्रकट करने. अपने आप सभाएँ हो जाती थीं : सोवियत शासन के दौरान यहाँ संगठित रूप से लोगों को लाया जाता था - पूरी-पूरी रेलगाड़ियाँ भर-भर के.

9 जनवरी 1918 को विशेष रूप से याद रखना चाहिए. अविश्वसनीय संयोग से इसी दिन, जो वैसे भी शोकपूर्ण है, यहीं, "खूनी इतवार" के शिकार हुए लोगों की कब्र के निकट ही, फिर से गोलियों से मारे गए प्रदर्शनकारियों को दफ़नाया गया - जो इस बार, 5 जनवरी को संविधान सभा के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे थे. तभी दोनों सामूहिक कब्रों पर ओबूखोव संयंत्र के श्रमिकों द्वारा एक अस्थाई कमान बना दी गई थी. “जनतंत्र के लिए संघर्ष में शिकार हुए लोगों” का यह पहला स्मारक था. (इसी तरह की कमान अन्य शिकारों के कब्रिस्तान में भी बनाई गई, सही कहूँ तो – ‘क्रांति के शिकार स्क्वेयर पर, या दूसरे शब्दों में – चैम्प दे मार्स पर ). सन् 1926 में 9 जनवरी के शहीदों की सामूहिक कब्र पर बने छोटे से टीले के चारों ओर जंज़ीरों की बागड़ बना दी गई और वहाँ पर साधारण सी स्मारक-तख़्ती लगा दी गई : दूसरी – जनतंत्र के लिए मारे गए लोगों की सामूहिक कब्र के बारे में याद दिलाने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी.

हालाँकि कब्रिस्तान को “9 जनवरी के शहीदों की यादें” ये नाम दिया गया था, 9 जनवरी के शहीदों को अब – नए कैलेण्डर के अनुसार 22 जनवरी याद किया जाता है. सन् 1929 में इस दिन तीन हज़ार श्रमिक एक सुर में गा रहे थे “शिकार हुए तुम, विनाशक युद्ध में...” सभा ने “खूनी इतवार” की पच्चीसवीं सालगिरह पर कब्र पर स्मारक का उद्घाटन करने का निर्णय लिया. और शिल्पकार मनिज़ेर तथा वास्तुकार वितमैन ने, जो बड़े जोश से इस परियोजना पर काम कर रहे थे, कब्र को कब्रिस्तान के मध्य भाग में – लकड़ी के बने कज़ान्स्की चर्च की जगह पर स्थानांतरित करने की सिफ़ारिश की.

स्मारक का उद्घाटन कई चरणों में, उसके निर्माण के विभिन्न चरणों के अनुसार किया गया. पहले – नींव, फिर पैडेस्टल और अंत में पूरा स्मारक. पहले चरण को नाम दिया गया “स्मारक का शिलान्यास”, मगर इसका अर्थ बहुत कुछ था. शहीद हुए उन अठ्ठ्यासी लोगों के अवशेष दो हज़ार व्यक्तियों की उपस्थिति में सम्मानपूर्वक आधार के नीचे तहख़ाने में ले जाए गए. दोबारा दफ़नाने की रस्म सन् 1929 के अगस्त में हुई थी. तभी “स्मारक के निर्माण के लिए स्वेच्छा से चंदा देने की अपील की गई.” “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा” ने इस पहल की ख़बर को मोटे अक्षरों में रेखांकित किया : “सबसे पहले बोल्शेविक श्रमिकों ने अपनी तनख़्वाह का कुछ प्रतिशत दिया”. 25 उन दिनों मीटिंग्स का होना आम बात थी. तो, स्वाभाविक रूप से इस नई सामूहिक कब्र पर – नष्ट किए गए चर्च के स्थान पर – ग्रेनाइट का पैडेस्टल बन गया, जिसे अभी ट्रिब्यून भी बनना था.

9 जनवरी की पच्चीसवीं बरसी पर, मतलब 22 जनवरी 1930 को पैडेस्टल-ट्रिब्यून तैयार हो गया, मगर काँसे की मूर्ति तब तक तैयार नहीं हुई थी. ग्रैनाइट की संरचना का, जो अपने आकार से श्मशान की भट्टी की याद दिलाती है, उद्घाटन शून्य से बीस डिग्री नीचे तापमान पर उस पल की गंभीरता के अनुसार किया गया – ट्रिब्यून के संदर्भ में कह सकते हैं : “चालू कर दिया गया”. ये ट्रिब्यून, मुझे कहना पड़ेगा (मैं भी सर्दियों में वहाँ गया था), सुरक्षित स्थान नहीं है. सीढ़ियाँ फिसलन भरी हैं, आसानी से पैर फिसल सकता है. पीछे की ओर कोई मुँडेर नहीं है: दो–एक कदम पीछे हटे, तो खाई में ही गिरोगे. मगर “खूनी इतवार” के महत्व के बारे में ग्रेनाइट पर खुदे लेनिन के शब्दों को पढ़ने के लिए थोड़ा बहुत तो चलना पड़ता है. शिलालेख ध्यान देने योग्य है. और सबसे पहले, लेनिन के लेखों में रहस्यपूर्ण सुधारों के कारण. पहला शिलालेख: “1905 की ड्रेस रिहर्सल के बिना 1917 की अक्टूबर क्रांति की जीत असंभव थी. लेनिन”. मूल स्त्रोत के अनुसार “ड्रेस रिहर्सल” - इन शब्दों को उद्धरण चिन्हों के बीच रखना चाहिये था (“कम्युनिज़्म में बच्चों की वामपंथी बीमारी”). मगर, ये छिद्रान्वेषण के लिए है.

दूसरे शिलालेख का मामला वाकई में गंभीर है. वह ध्यान से देखने योग्य है.

ये गलत – काफ़ी गलत है! – ये उद्धरण “रूस में क्रांति का आरंभ” इस लेख से लिया गया है, जो पीटर्सबुर्ग की घटनाओं के  फ़ौरन बाद जेनेवा में लिखा गया था और वहीं प्रकाशित हुआ था (लेनिन के संकलित लेखों का सातवाँ खण्ड, जिसमें यह लेख है, पैडेस्टल के “उद्घाटन” से ठीक पहले प्रकाशित हुआ था). पैडेस्टल पर हम पढ़ते हैं:

“हज़ारों मृतक और घायल – ये है पीटर्सबुर्ग में 9 जनवरी के खूनी इतवार का परिणाम. 9 जनवरी के हत्याकांड का जवाब पीटर्सबुर्ग के श्रमिकों ने सरकार का तत्काल तख़्ता पलटने के नारे से दिया.
लेनिन.                                                                  

असल में लेनिन के लेख में दूसरा वाक्य अलग तरह से है, तुलना करें : “सरकार का तत्काल तख़्ता पलटना – ये नारा था, जिससे 9 जनवरी के हत्याकांड का जवाब पीटर्सबुर्ग के उन श्रमिकों ने भी दिया, जो त्सार में विश्वास रखते थे - अपने नेता, पादरी जॉर्ज गैपॉन के मुख से दिया, जिसने इस हत्याकांड वाले दिन के बाद कहा था : “अब हमारा कोई त्सार नहीं है...” 26

गैपॉन!....ऐ ख़ुदा!...गैपॉन!

चलो, ख़ैर – कोई अप्रत्याशित बात नहीं है...सन् 1905 के आरंभ में उसे हीरोसमझा जाता था, “रूस में बढ़ती हुई क्रांति का जीवित अंश”! श्रमिकों के हत्याकांड के बाद वह जेनेवा गया था, प्लेखानव से, लेनिन से मिला... “इस मुलाकात से इल्यिच परेशान हो गए”, क्रूप्स्काया ने लिखा था, “प्यारे कॉम्रेड!” गैपॉन इल्यिच को पत्र में संबोधित करते हैं.27 “कॉम्रेड गैपॉन”, काँग्रेस में भाषण देते हुए लेनिन कहते हैं.28

फिर, बेशक, सब कुछ सामान्य हो गया. सन् ’30 में, जब ग्रेनाइट के स्लैब्स से, जो कभी नए चर्च के निर्माण के लिए लाए गए थे, पैडेस्टल का निर्माण किया जा रहा था, तब हर सतर्क श्रमिक, और श्रमिक ही क्या! – कोई भी बच्चा, अच्छी तरह जानता था कि पादरी गैपॉन – लोगों को उकसाने वाला और त्सार की ख़ुफ़िया पुलिस का एजेन्ट था!

तो, इससे क्या निष्कर्ष निकलता है? ये निष्कर्ष निकलता है कि 9 जनवरी के शिकार लोगों के स्मारक के पैडेस्टल पर जो ख़ुदा हुआ है, उसका अर्थ, जिसे संपादक ने छुपा दिया था – कुछ और नहीं, बल्कि लेनिन की गैपॉन की सत्ता के प्रति अपील है! ऊपर से, पैडेस्टल पर जो खुदा हुआ है, वह ख़ुद गैपॉन का छुपा हुआ उद्धरण था.

और इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया?!

शिलालेख का षडयंत्रकारी उद्देश्य इसी बात से समाप्त नहीं हो जाता. दूसरे शिलालेख पर लेनिन के वाक्य असल में क्रमबद्ध नहीं हैं, वे लेख के विभिन्न भागों से लिए गए हैं. वे शब्द, जो उनके बीच में नहीं हैं, जैसे अदृश्य रूप से विद्यमान हैं, सिर्फ मूल स्त्रोत तक पहुँचने की ज़रूरत है. और क्या? अन्य बातों के अलावा लेनिन के लेख में हम “विद्रोह कर रहे श्रमिकों की मूल मांग” के बारे पढ़ते हैं, जैसा कि उसे जेनेवा से प्रतीत हुआ था : “...सार्वत्रिक, सीधे, समान और गुप्त मतदान के आधार पर कॉन्स्टिट्युएन्ट सभा का शीघ्र आयोजन करना...” मगर ये कोई सन् 1905 नहीं था, और बोल्शेविकों द्वारा मार गिराए गए कॉन्स्टिट्युएन्ट सभा के विचारों के अवशेष वहीं पड़े हैं – इसी कब्रस्तान में...         

तो, पूरा स्मारक कैसा है? अंततः उसका उद्घाटन सन् 1931 में किया गया, घटनाओं की छब्बीसवीं बरसी पर. “ऊँचे पैडेस्टल पर श्रमिक की विशाल मूर्ति है, जिसने हाथ में मारे गए लोगों की अस्थियों का कलश पकड़ा है और विद्रोह का आव्हान कर रही है”, - कुछ साल बीतने के बाद ख़ुद मूर्तिकार ने उसका इस तरह से वर्णन किया है.”29 ये भी जोड़ना होगा, कि श्रमिक अर्धनग्न है और उसका जिस्म हट्टा-कट्टा है; दाएं पैर से, जो निहाई (एन्विल) पर रखा है, वह हथकड़ियों को कुचल रहा है; इन हथकड़ियों को तोड़ने वाला हथौड़ा भी यहीं है. ऐसे स्मारक को देखा था हज़ारों श्रमिकों ने जो मीटिंग के लिए आए थे. “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा” उनके बारे में लिखता है : “विजयी सर्वहारा वर्ग उन योद्धाओं का सम्मान करता है, जिन्होंने अपना ख़ून देकर महान अक्टूबर क्रांति का मार्ग बनाया था”.30

इस मार्ग को उभरी हुई आकृतियाँ अच्छी तरह प्रकट करती हैं. ये आकृतियाँ कुछ कहती हैं और उन्हें दाएँ से बाएँ “पढ़ा जा सकता है” – चित्रित जुलूस की विरुद्ध दिशा में. शिकार हुए लोगों के स्मारक पर मनिज़ेर जल्लादों को नहीं दिखाना चाहता था, इसलिए बारह क्रमवार आकृतियों में सबसे पहले हम मारे गए व्यक्ति को देखते हैं. आगे : दाढ़ी वाला आदमी, जो धरती पर गिर गया है, अभी तक जो हो रहा है, उस पर विश्वास न करते हुए दुर्दैवी फ़रियाद वाला हाथ आगे बढ़ा रहा है – देखिए, मेहेरबानी करके गोलियाँ न चलाइये, हम शांति से आए हैं. श्रमिक, जो मज़बूती से पैरों पर खड़ा है, भावावेग में अपना सीना गोलियों के सामने करता है: अत्याचारियों, डरता नहीं हूँ!...बीच वाली आकृतियों से स्पष्ट होता है, कि कैसे त्सार के प्रति विश्वास ख़त्म हो रहा है. बाएँ से तीसरा सब कुछ समझ चुका है. अंतिम – युद्ध के लिए तैयार हैं : एक पत्थर उठा रहा है, और दूसरा डंडा पकड़े है, जो आधुनिक बेसबॉल के बल्ले जैसा है.

मगर, गैपॉन की तरफ़ लौटते हैं. ज़ाहिर है कि वह ख़ुद फ़रियाद लेकर चल रहा था.

गोलीबारी के पहले राउण्ड के बाद (ये हुआ था नार्व्स्की गेट्स के पास) गैपॉन ज़मीन पर गिर गया. फ़रियाद उसने, ज़ाहिर है, किसी को भी नहीं दिखाई थी, बल्कि, जैसे ही मौका मिला (जब लोग गलियों में भाग गये थे) उसे सोशलिस्ट क्रांतिकारी रूटेनबर्ग को सौंप दिया – जो उस समय उसका रक्षक था, मगर अंततः हत्यारा सिद्ध हुआ.

गोलियों की बौछार में किसी ने भी सैनिकों को फ़रियाद नहीं दिखाई, मगर, अगर ऐसा हो जाता, तो वह व्यक्ति सिर्फ गैपॉन ही हो सकता था.

मैं इस विचार के समर्थन से काफ़ी दूर हूँ, कि मनिज़ेर ने उभरी हुई आकृतियों में गैपॉन को चित्रित किया है (जिसके बारे में लेनिन के उद्धरण के आधार पर इशारा भी किया था). दाढ़ी वाला, हाँ, वो ही. मगर बाकी बातों में गैपॉन से ज़्यादा समानता नहीं है. फिर भी...

लगता है, कि मेरे अलावा अब तक किसी के भी दिमाग़ में ये ख़याल नहीं आया है.

सौभाग्य से, मनिज़ेर के लिए.

फरवरी 2008

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25. «लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा”. 18 अगस्त 1929.
26. वी.इ. लेनिन. सम्पूर्ण संकलित रचनाएँ. खण्ड 9, पृ. 201.
27. लेनिन गैपॉन के पत्र को उद्धरित कर रहे हैं: सम्पूर्ण संकलित रचनाएँ, खण्ड 9 पृ. 183.
28. रूसी सोशलिस्ट डेमॉक्रेटिक पार्टी की तीसरी काँग्रेस. प्रोटोकोल पृ. 378-381
29, एम. गे. मनिज़ेर. कार्यरत शिल्पकार मॉ-ले. 1940. पृ. 21
30.  लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा. 24 जनवरी 1931


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