शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

Monuments of Petersburg - 15



साँडों की किस्मत




मुझे याद है कि कैसे विचिस्लाव कूरित्सिन ने, जिसकी लेनिनग्राद की घेराबन्दी के बारे में किताब प्रकाशित होने ही वाली थी, मुझे एक अजीब सवाल से चौंका दिया : क्या मुझे मालूम है कि माँस प्रसंस्करण संयन्त्र के पास जो साँड खड़े थे, वे कहाँ हैं.

“क्या कहाँ हैं? वहीं खड़े हैं”. नहीं, कूरित्सिन ने मुझे यकीन दिलाया कि अब वहाँ दूसरे, काँक्रीट  के हैं, जबकि उन्हें होना चाहिए काँसे के. वह ख़ास तौर से उन्हें देखने के लिए गया था और उसे यकीन हो गया कि उन्हें बदल दिया गया है. ये देमूत- मलीनव्स्की की रचना नहीं है. कूरित्सिन ने फ़ैसला कर डाला.

वसीलि इवानविच देमूत-मलीनव्स्की अन्य शिल्पकृतियों के लिए ज़्यादा प्रसिद्ध थे – जैसे, मूर्तिकला समूह के “प्लूटो द्वारा प्रज़ेर्पिना का अपहरण” - खनन संस्थान के पोर्टिको के सामने, “रथ” और “जनरल स्टाफ़ के आर्क की शिल्प द्वारा की गई सजावट” (एस. एस. पिमेनव के साथ). इवान सुसानिन का स्मारक जो कस्त्रोमा में उसके मॉडेल पर बनाया गया था, उसे क्रांति के बाद हमेशा के लिए गिरा दिया गया था, और अब लेनिनग्राद में उसके साँडों के साथ हालाँकि नाटकीय घटनाएँ हुईं, मगर इतनी ज़्यादा नहीं.

देमूत-मलीनव्स्की के साँडों के बारे में मैं कब से लिखना चाह रहा था, मगर मुझे ये ख़याल रोक रहा था कि ये पूरी तरह से विषय के अनुरूप नहीं है. सच पूछिये तो, साँड हमारे यहाँ शहरी मूर्तिकला की श्रेणी में आते हैं. शिल्पकला की दृष्टि से स्मारकों का निर्माण, जैसा कि सबको मालूम है, किसी व्यक्ति या किसी चीज़ को अमर बनाने के लिए किया जाता है. काँसे के साँडों का, जिन्हें सन् 1827 में ढाला गया था, कोई दावा नहीं था कि वे ऐतिहासिक व्यक्तियों या किन्हीं घटनाओं को अमर बनाने जा रहे हैं. उनके लिए त्सार्स्कोए सेलो (अब मॉस्को) एवेन्यू में अबवोद्नी नहर के पीछे वाले मवेशीखाने के तीन कमानों वाले प्रवेशद्वार के कम्पाऊण्ड के किनारों पर जगह निश्चित की गई थी, जहाँ वे चुपचाप कई दशकों तक खड़े रहे. मगर, पहली बात, ये साँड सिर्फ शहरी सजावट की दृष्टि से आकार में काफ़ी बड़े हैं. और दूसरी बात, कुछ कलाकृतियों में ऐसी योग्यता होती है, कि वे समाज की चेतना में अपनी छबि बदल सकें. यही काँसे के साँडों के साथ हुआ. 

मामला कुछ ऐसा था. एक अलग-थलग देश में सोशलिज़्म की विजय से वैचारिक मोर्चे के अग्रणी नेताओं को शक्तिशाली और विशाल कलात्मक छबियों की आवश्यकता महसूस हुई. कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक) की 27वीं काँग्रेस के पश्चात्, जिसमें सन् 1937 के लिए माँस का उत्पादन सन् 1932 की तुलना में 276% के संकेतक द्वारा निर्धारित किया गया था, और इसी – माँस की – दिशा में उस युग के रचनात्मक मनोभावों के अनुरूप दृश्यों को ढूँढ़ने की ज़रूरत महसूस हुई. माँसल-ठोस काँसे के बैल, जिनका दूसरी पंचवर्षीय योजना के आरंभ होने से सौ से ज़्यादा साल पहले देमूत-मलीनव्स्की की प्रतिभा ने निर्माण किया था, अब निश्चित रूप से सोवियत-माँस उत्पादकों के आदर्श को प्रस्तुत कर रहे थे. अनुभूति की पूर्णता के लिए सिर्फ मूर्तिकला से संबंधित एक संदर्भ की आवश्यकता थी. उसे ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी. दोनों साँडों को स्वाभाविक रूप से उठाकर शहर की सीमा पर, ‘स्रेद्नाया रगात्काके पीछे, नई जगह पर स्थापित कर दिया गया – हाल ही में बने “माँस उद्योग के प्रथम कारखाने” के विशाल प्रवेश द्वार के पास. देमूत-मलीनव्स्की ने अपनी कब्र में करवट बदली होगी (जैसा वास्तव में हुआ, मगर इस बारे में कुछ देर बाद...), साँडों को, ज़ाहिर है, महान वास्तुकार नोह त्रोत्स्की की महान शिल्पकृति की बगल में स्थापित करने के लिए नहीं बनाया गया था. मगर दूसरी तरफ़ से, यह स्वीकार करना होगा, कि माँस प्रसंस्करण संयन्त्र के रचनात्मक-औद्योगिक संदर्भ ने इन स्मारकों को निर्णायक रूप से पुनः परिभाषित किया और इन्हें उच्च क्लासिकल स्मारकों का नाम दिया – वे – पहली बात, वाकई में स्मारकों के रूप में पहचाने जाने लगे, और, दूसरी बात, सोशलिस्ट रिअलिज़्म के स्मारकों के रूप में स्वीकार किए गए. ताकत, इच्छा, ऊर्जा, जीवन के प्रति आशावाद – “ऐ, कॉम्रेड, और ज़्यादा ज़िंदगी!” (या अगर माँस प्रसंस्करण संयंत्र के कीरव के पैडेस्टल की इबारत को याद करें : “...शैतान ही जानता है. अगर इन्सान की तरह कहा जाए, तो शिद्दत से दिल चाहता है – जीने को और ज़िंदा रहने को”), और साथ ही ये आदर्श कच्चा माल, जो खाद्य और तकनीकी उत्पादों की एक विस्तृत श्रंखला का वादा करता है, अत्यंत उच्चकोटि का लगभग तैयार भोजन है, जो श्रमिकों के लिए आवश्यक है. साँड विजयी सोशलिज़्म का स्मारक बन गए. ख़ास बात ये है, कि जल्दी ही लेनिनग्रादवासी साँडों की असली उम्र के बारे में भूल गए, ज़्यादातर लोग उन्हें लेनिनग्राद के एस.एम.कीरव माँस प्रसंस्करण संयंत्र का हमउम्र मानते थे.

वैसे, कोई अचरज की बात भी हो सकती थी. अख़बारों में प्रकाशित संयंत्र के स्केचेज़ में, जो अभी बन रहा था, साँडों को बिल्डिंग्स की छतों पर दिखाया गया था. हो सकता है, कि बैल की आकृति को, जो इस परियोजना में दिखाई गई वध-पूर्व मवेशियों को रखने के संयंत्र की छत को सुशोभित कर रही थी, नए सिरे से बनाने की ज़रूरत थी, मगर मैं पूछता हूँ, कि जिस तरह बड़े सींगों वाले मवेशियों को विशेष उपकरणों की सहायता से इस संयंत्र की छठी मंज़िल पर (और सुअरों को सातवीं मंज़िल पर) “स्लाटर एंड फिनिशिंग” विभाग में भेजा गया, उसी तरह साँडों को क्यों नहीं ले जाया गया. उसी विधि से देमूत-मलीनव्स्की के काँसे के साँड को सीधे छत पर ले जाने में क्या परेशानी थी? मुझे लगता है, कि ऐसा ही इरादा भी था. 

संक्षेप में स्लावा कूरित्सिन की संदेहास्पद सूचना से परेशान होकर मैं मॉस्को-हाइवे की ओर चल पड़ा, जिससे ख़ुद ही फ़ैसला कर सकूं, कि आख़िर माँस-संयंत्र के लोहे के दरवाज़ों के पास कौन खड़ा है. दोनों ही साँड मुझे अच्छी हालत में नहीं मिले. वे शानदार नहीं लग रहे थे. पैरों पर तो मज़बूती से खड़े थे, मगर चर्म-रोग संबंधी समस्याएँ साफ़ नज़र आ रही थीं. उनकी खाल सूखी पपडी जैसी हो गई थी, अगर इस फूहड़पन की वजह भूरा-हरा रंग हो, जिसकी पपडी के नीचे से पहले वाली गुलाबी रंग की पर्त झाँक रही हो, जो ख़ुद भी पपडी बन गई थी. ज़ाहिर है कि साँडों को कई बार पेन्ट किया गया था. कई जगह तो रंग की तहें बिल्कुल “माँस” की हद तक निकल गई हैं, और ये हिस्से ज़रा भी काँसे की याद नहीं दिलाते. हाँ, काँक्रीट जैसा है. मैं यकीन करने को तैयार था कि ये बदले हुए काँक्रीट के साँड हैं, जिन पर रंग लगाए गया है, तभी अचानक मुझे बाईं ओर वाले साँड के पैर पर एक छोटा सा गंजा स्थान देखा, जो नैसर्गिक नहीं था : किसी ने (बस, वह कूरित्सिन नहीं था – वर्ना उसे सच्चाई का पता चल जाता...) पेन्ट को सिक्के से खुरच दिया था, वह भी उसी बात से परेशान था, जो मुझे सता रही थी - साँड की शरीर-रचना... तो, मतलब – काँसा! इसमें कोई शक ही नहीं था कि ये काँसा था! हाँ, ये काँसे के ही साँड थे – जहाँ-जहाँ काँसा नहीं था, वहाँ उन पर ज़ाहिर है, काँक्रीट थोपा गया था. पेन्ट लगाने से त्रुटियाँ छुपनी चाहिए थीं; फिलहाल तो ये संभव हो गया था. कूरित्सिन को साँडों के रंग ने परेशान कर दिया और, सबसे पहले, खुले हुए दाँत (पूँछ, कम से कम बाएं वाले साँड की, “उसकी अपनी” नहीं थी), मगर जहाँ तक मेरा सवाल है, मैंने चैन की सांस ली : साँडों पर चाहे कितने ही पैबंद क्यों न लगाए गए, चाहे जैसा भी रंग क्यों न लगाया गया, मेरे सामने खड़े थे ऐतिहासिक साँड, वे ही – देमूत-मलीनव्स्की वाले.                               
चलिए, ठीक है. अब हम इन साँडों से जुड़े, लगभग रहस्यमय इतिहास को चुपचाप अनदेखा नहीं कर सकते. उसके बारे में सब जानते हैं, मगर हम उसमें कुछ और जोडेंगे. पीटर्सबुर्ग के स्थानीय इतिहासकार वी.वी. नेस्तेरव ने अपनी प्रसिद्ध पुस्त्क “द लायन्स गार्ड द सिटी”(1971) में इसे बहुत प्रसिद्धी दी. इसके बाद, जब एन. ए. सिन्दालव्स्की ने इस कहानी को भविष्य-सूचक स्वप्न का रंग देकर उसका पुनर्कथन किया, तो ये इतिहास बेहद लोकप्रिय हो गया, मॉस्को के अख़बारों में भी पहुँच गया. बात युद्ध के आरंभ में काँसे के साँडों को बचाने की कार्यवाही के बारे में हो रही है. साँडों की काँसे वाली आकृतियों को मोर्चे वाली लाइन से हटाकर शहर के दूसरे भाग में ले जाया गया, और, कहीं और नहीं बल्कि अलेक्सान्द्रो-नेव्स्की मॉनेस्ट्री की सीमा में, जहाँ तीख्वीन्स्की कब्रिस्तान में, संयोगवश, ख़ुद देमूत-मलीनव्स्की चिर निद्रा में पड़ा था. साँड जैसे अपने निर्माता की कब्र के पास आ गए थे. शहर की लोककथाओं के संग्राहक एन. ए. सिन्दालव्स्की ने इस विषय पर अजीब सपने के बारे में एक लोककथा रची है, जो कभी देमूत-मालिनव्स्की को आया था: काँसे के साँड, जिन्हें हाल ही में उसने बनाया था, देमूत-मलीनव्स्की के घर उससे मिलने के लिए आए. सपना देखने वाला इसका मतलब नहीं बूझ सका. मगर हम, मतलब, जानते हैं. सिन्दालव्स्की की सधी हुई कलम से कब्रिस्तान में हुई रहस्यमय मुलाकात को अब बिना चूके शिल्पकार के सपने के साथ ही जोड़ा जाता है. पता नहीं देमूत-मलीनव्स्की के सपने के बारे में लोककथा किन समुदायों में प्रचलित थी, मगर इस सपने के बगैर भी ये संयोग काफ़ी कुछ कह जाता है. यहाँ एक और बारीकी है जिस पर ध्यान नहीं दिया गया है....

बात ये है, कि देमूत-मलीनव्स्की को, जिसकी मृत्यु सन् 1846 में हो गई थी, तीख्वीन्स्की में नहीं, बल्कि किसी और ही कब्रिस्तान – स्मोलेन्स्की में - दफ़नाया गया था. पाँच साल बाद वहीं उसकी बीबी एलिज़ाबेथ फिओदोसेव्ना को दफ़नाया गया – उसकी किस्मत में अपने पिता  - शिल्पकार एफ. एफ. शेद्रिन की बगल में, कब्र के ऊपर वाले एक ही स्मारक- ग्रेनाइट की बेदी - के नीचे दफ़न होना लिखा था. वैसा ही स्मारक उसके चाचा, लैण्डस्केप पेन्टर एस. एफ. शेद्रिन की कब्र पर भी लगा था34

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में अलेक्सान्द्रो-नेव्स्की मॉनेस्ट्री की सीमा में दो कब्रिस्तानों – लज़ारेव्स्की और तीख्विन्स्की – को स्मारकों का दर्जा प्राप्त हुआ. लज़ारेव्स्की XVIII शताब्दी का म्यूज़ियम–कब्रिस्तान बन गया. चूँकि शेद्रिन भाई शिल्पकारों की हैसियत से इस शताब्दी के थे, इसलिए उन्हें अन्य महान हस्तियों के साथ लज़ारेव्स्की में फिर से दफ़नाया गया, दोनों स्मारकों को भी यहीं लाया गया. बेटी को पिता के साथ पुनः दफ़नाया गया. और कुछ वर्षों के बाद ख़ुद वसीली इवानविच देमूत-मलीनव्स्की को भी – उसकी निःसंदेह योग्यताओं के आधार पर – बगल वाले तीख्विन्स्की कब्रिस्तान में दफ़नाया गया, जिसे उस समय “कला के दिग्गजों और ए.एस. पूश्किन के समकालीनों का म्यूज़ियम” कहा जाता था.     

वसीली इवानोविच स्मोलेन्स्की कब्रिस्तान में अपनी पहली कब्र में करीब एक शतक तक पड़ा रहा. और साँड भी कई सालों तक एक ही जगह पर खड़े रहे.

तो, हुआ ऐसा, कि देमूत-मलीनव्स्की के अवशेषों को तभी छेड़ा गया, जब उसके साँडों को शहर की सीमा पर “माँस-संयंत्र” के निकट भेजा गया.

और ऐसा भी हुआ, कि पति और पत्नी को जुदा कर दिया गया, और अभी भी वे अलग-अलग कब्रिस्तानों में विश्राम कर रहे हैं, हाँलाकि ये कब्रिस्तान एक दूसरे की बगल में ही हैं, जिन्हें पत्थरों की दो दीवारें एक दूसरे से अलग करती हैं.                        

वसीली इवानोविच की कब्र पर स्मारक सिर्फ युद्ध से पहले ही प्रकट हुआ. और युद्ध के आरंभ में साँडों के उसके पास आने की घटना हुई.

मतलब, साँड न सिर्फ अपने निर्माता के पास आए, बल्कि ख़ुद निर्माता ने भी उनसे मिलने के लिए ऐसा रास्ता अपनाया जो समझ से परे है.

कोई बहुत ही अजीब, अविश्वसनीय संयोग है (अगर ये – संयोग है तो...) – हर चीज़ के अभ्यस्त हो जाने वाले हमारे शहर के लिए भी.

अक्टूबर 2007
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34. कलात्मक कब्र के पत्थर शहरी शिल्पकला के राजकीय म्यूज़ियम के संकलन में. वैज्ञानिक सूची. संपादक वी.एन. तिमोफेयेव, संकलनकर्ता ए.ए. अलेक्सेयेव, यू. एम. पिर्यूत्को, वी.वी. रीतिकव – खण्ड 2 पृ. 66,67. खण्ड 3. पृ. 318-320.

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