पैडेस्टल
पर कुत्ता
स्मारक काफ़ी मशहूर है, मगर
प्रत्यक्ष रूप से उसे कम ही लोगों ने देखा है. वह “ऑल-यूनियन इन्स्टीट्यूट ऑफ
एक्स्पेरिमेन्टल मेडिसिन” के कम्पाऊण्ड में स्थित है – एकाडेमिशियन पाव्लव स्ट्रीट,
हाउस नं. 12. यह क्षेत्र सुरक्षित है, प्रवेश
नियंत्रित है, गेट्स बंद रहते हैं. मगर इससे सन् 2008 के
आरंभ में अपराधियों को जर्मन शेफर्ड का सिर चुराने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई. ये पैडेस्टल
की फ्रेम बनाने वाले कुत्तों के आठ सिरों में से एक था, जिसके
ऊपर दुबला-पतला जर्मन पिन्सर बैठा है. ये मामला कैसे ख़त्म हुआ, मुझे नहीं मालूम, मगर अभी सारे सिर अपनी-अपनी जगह पर
हैं. पूरा सेट.
अगर उनकी तरफ़ ग़ौर से देखें,
तो हरेक के जबड़े में एक-एक ‘पाइप’ नज़र आएगा. इस सिलसिले में वैज्ञानिक प्रयोगों की कोई ज़रूरत नहीं है,
किसी फ़ोड़े-वोड़े से इसका संबंध जोड़ना गलत होगा : ये सब पानी के लिए
है – कभी-कभी ये स्मारक फव्वारा भी बन जाता है. बाकी – इसे कितना भी “कुत्ते का
स्मारक” क्यों न कहें – ये स्मारक है वैज्ञानिक प्रयोगों का”, ये है इसका असली नाम. प्रयोगों का सार काँसे की चार नक्काशियों द्वारा
जाना जा सकता है, जिन्हें पूरे स्मारक के ही साथ शिल्पकार
इ.एफ. बिज़पालव द्वारा बनाया गया है. स्पष्टीकरण देने वाले
शिलालेख का लेखकत्व ख़ुद इ.पी. पाव्लव का है.
स्मारक को यूँ ही नहीं
शरीर-वैज्ञानिकों की 15वीं काँग्रेस के उद्घाटन के अवसर के लिए बनाया गया था,
जो अपने आयोजन के संदर्भ में एक भव्य घटना थी, जिसकी तुलना हाल ही में आयोजित ‘कमिन्तार्न’ की सातवीं (और अंतिम) काँग्रेस से की जा सकती है, जो
लगभग उन्हीं दिनों मॉस्को में हुई थी. शरीर-विज्ञान काँग्रेस में भाग लेने के लिए डेढ़
हज़ार से ज़्यादा सहभागी और अतिथि लेनिनग्राद आए थे, जिनकी
संख्या कमिन्तार्न काँग्रेस के सहभागियों की संख्या की तिगुनी थी. पूर्ण अधिवेशनों
के लिए उन्हें ऊरित्स्की-पैलेस (पहले और आज भी – टॉराइड) दिया गया था. खाली समय में
उन्हें पीटरहॉफ़ ले जाया गया (तीन सौ बसों की कतार पाँच किलोमीटर लम्बी थी),
लेनिनग्राद के उद्यमों, स्कूलों और संस्थानों
में ले जाया गया, विशिष्ठ क्रम में – कोल्तुशी ले जाया गया,
जहाँ विज्ञान-शहर बनाया गया था, जिससे दुनिया
के सारे शरीर-वैज्ञानिकों को ईर्ष्या होती थी...अंत में सबको सोवियत सरकार से
मुलाकात के लिए मॉस्को ले जाया गया और मलोतव ने बहुत बड़ा स्वागत-समारोह आयोजित
किया.
अन्य प्राकृतिक विज्ञानों
की अपेक्षा सोवियत यूनियन में फिज़िओलॉजी(शरीर-विज्ञान) काफ़ी लोकप्रिय थी. पाव्लव
के सोवियत शासन से असहज रिश्तों के बावजूद सोवियत शासन अपने तरीके से उसकी इज़्ज़त
करता था. अख़बारों में पाव्लव को महान कहा जाता था.
संदर्भ पुस्तिकाओं में
स्मारक के उद्घाटन की तारीख 5 अगस्त 1935 दर्शाई गई है. ऐसा बिल्कुल नहीं है. इस
दिन इन्स्टीट्यूट के निदेशालय ने सिर्फ ‘वस्तु’
को स्वीकार किया. पाव्लव लंदन से लौट रहा था, और
उसके बिना किसी उद्घाटन की बात ही नहीं हो सकती थी. 7 अगस्त को “ऑल-यूनियन
इन्स्टीट्यूट ऑफ एक्स्पेरिमेन्टल मेडिसिन” के निदेशालय ने इन्स्टीट्यूट के नए
दर्शनीय स्थल “तैयार स्वरूप में महान वैज्ञानिक को और काँग्रेस के आयोजन के लिए
नियुक्त सरकारी कमिशन के सदस्यों – कॉम्रेड्स अकूलव, कामिन्स्की
और बाउमन को” दिखाए. ये “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा” से है. एक बड़ा उद्धरण दे रहा
हूँ, जो उपस्थितों की प्रतिक्रिया को बड़ी सुंदरता से
प्रदर्शित कर रहा है. ये है वो उद्धरण.
“इवान पेत्रोविच ने ‘क्रोनोमेट्रिक (कालमिति) शुद्धता से, जो उसकी
चारित्रिक विशेषता थी, दोपहर के ठीक तीन बजे अपना निरीक्षण
आरंभ किया. पहले मेहमान इवान पेत्रोविच पाव्लव की प्रयोगशालाओं में गए, जिनके प्रवेश द्वार पर ग्रेनाइट का फव्वारा था. ग्रेनाइट पर प्रयोग के लिए
इस्तेमाल किए जाने वाले कुत्तों की नक्काशी थी. इसके बाद मेहमानों ने सिचेनेव,
पाश्चर, डार्विन और मेन्डेलेफ़ के नए स्मारक
देखे. अपनी स्वाभाविक ज़िंदादिली से इन महान व्यक्तियों के जीवन के अनेक विशिष्ठ
पहलुओं का वर्णन करते हुए इवान पेत्रोविच ने ‘गाइड’ का कर्तव्य निभाया. स्मारकों से बने चौकोर से कुछ
दूर, लॉन्स के बीच, अचानक फ़व्वारा फूट
पड़ा, जिसे कलाकार लान्सेर ने बनाया था. फिर “अज्ञात कुत्ते”
के काँसे के स्मारक के पास आए. स्मारक के एक तरफ़ दिखाया गया है, कि कैसे एक कुत्ता अपने हमज़ात की गर्दन पर गहरे ऑपरेशन के कारण हुए घाव को,
जो पक चुका है, चाटते हुए उसे मौत से बचाता
है. इ. पे. पाव्लव ने बताया कि अब तक जितने भी कुत्तों पर ये ऑपरेशन किया जाता,
वे सब मर जाते थे. दूसरी ओर दिखाई दे रहा है, कि
कैसे कुत्ता प्लास्टर तोड़कर और उससे एक झिरझिरा बिस्तर बनाकर वैज्ञानिकों को एक
तरीका बताता है, जिससे कृत्रिम छेद से बहता हुआ अग्नाशय का
रस कुत्ते के पेट को संक्षारित न कर दे.
तीसरी तरफ़ क्लोरोफॉर्म का
मास्क पहना कुत्ता दिखाया गया है और उसके नीचे है पाव्लव के लेखों का एक उद्धरण :
“चाहे पुरातन काल से इन्सान का दोस्त और मददगार रहा कुत्ता विज्ञान की बलि चढ़ जाए,
मगर हमारी गरिमा हमें इस बात के लिए बाध्य करती है, कि ये निश्चित रूप से अनावश्यक यातना के बिना हो”.
“चीरफाड़ के
विरोधी, जो इंग्लैण्ड में अपनी पत्रिका निकालते हैं,”
इवान पेत्रोविच ने मेहमानों को बताया, “लण्डन
में मेरी उपस्थिति के दौरान मुझे गालियाँ देने का एक भी मौका नहीं छोड़ते. “जल्लाद”,
“यातना देने वाला”- इन नामों से मुझे पुकारते हैं. वैसे, हम जानवरों को कभी भी यातना नहीं देते. हर ऑपरेशन, इन्सान
ही की तरह, अनास्थेशिया देकर ही किया जाता है. ऑपरेशन के बाद
कुत्ते अच्छी तरह ठीक हो जाते हैं. इस आकृति की फोटो उतार कर उसे हमारे जवाब के
रूप में लंदन भेजना चाहिए”. 31
इस प्रकार,
ये स्मारक भी उसी श्रेणी का है, जो “चेम्बरलेन
को हमारा जवाब” है. इस संदर्भ में चेम्बरलेन से तात्पर्य है पूरी दुनिया की
प्रतिक्रिया से, प्रगति विरोधियों से, जिसे,
पाव्लव के अनुसार, कुत्तों पर वैज्ञानिक
प्रयोगों की आवश्यकता से इनकार करने वाले जानवरों के रक्षकों ने मूर्त रूप दिया
है.
“जल्लाद” शब्द उसे यूँ ही
याद नहीं आया. उस समय के “ईर्षालुओं” से महान शरीर-वैज्ञानिक का पुराना
हिसाब-किताब था. सन् 1903 में ही उसे चीरफाड़ के दुरुपयोग की जाँच-कमिटी में बैठना
पड़ा था. तीन प्रोफेसरों वाली इस कमिटी का गठन युद्ध मंत्री के प्रस्ताव पर मिलिटरी-सर्जिकल
अकादमी की काँन्फ्रेन्स द्वारा किया गया था. यह प्रस्ताव पशु कल्याण सोसायटी की
प्रेसिडेन्ट बैरोनेस मायेन्दोर्फ के पत्र के जवाब में पेश किया गया था. दुनिया के
ताकतवर लोगों के हस्तक्षेप ने शरीर-वैज्ञानिकों के संशोधन कार्य को काफ़ी जटिल बना
दिया. बैरोनेस की रिपोर्ट का शीर्षक ही काफ़ी मुखर था : “विज्ञान के नाम पर की जा
रही बेरहम और निरुपयोगी चीरफाड़ के दुरुपयोग के बारे में”. कमिटी ने,
ज़ाहिर है, चीरफाड़ के विरोधियों के सारे तर्क
खारिज कर दिए, वो भी काफ़ी उचित शब्दों में, जो पाव्लव को अपर्याप्त प्रतीत हुआ, और उसने
चुनिन्दा शब्दों में अपनी विशिष्ठ राय प्रस्तुत की. “जब मैं कोई प्रयोग कर रहा
होता हूँ, जिसका संबंध अंततः किसी जानवर की मृत्यु से है,
तो मुझे पश्चात्ताप के बोझिल भाव का अनुभव होता है, कि मैं एक हँसती-खेलती ज़िंदगी ख़त्म कर रहा हूँ, कि
जीवित व्यक्ति का जल्लाद बन गया हूँ...”32 – ये ही दर्दभरा शब्द
“जल्लाद” प्रयोगकर्ता के मुख से निकला था!...मगर सिर्फ, महान
उद्देश्य की ख़ातिर अनचाहे ही “जल्लाद” होते हुए भी सच्ची आंतरिक पीड़ा का अनुभव
किया जा सकता है, जिनके बारे में ये “तथाकथित” संरक्षक सपने
में भी नहीं सोच सकते – शरीर वैज्ञानिकों को कटघरे में खड़ा करना उनका काम नहीं है!
ये था सार उस “विशिष्ठ राय” का. झूठी “फिक्र” के बारे में पाव्लव ने आवेश पूर्वक
लिखा : “नहीं, ये हर जीवित और महसूस करने वाले प्राणि की
पीड़ा के प्रति दया की महान भावना नहीं है; ये अज्ञान की
विज्ञान के प्रति, अंधकार की रोशनी के प्रति चिरंतन शत्रुता
की छुपी हुई भावना है”.
यहाँ काफ़ी सारे व्यक्तिगत
कारण हैं. पशु-संरक्षकों के प्रति पाव्लव के मन में क्रोध की भावना थी. एक ज़माने
में वह उनके साथ मिलकर काम करता था, और उन्हें भी
उसके प्रयोगों से कोई शिकायत नहीं थी. मेरा मतलब उस कमिटी (1892) से है जो “पशुधन
को मारने के सबसे अच्छे और सबसे कम यातनामय तरीके” का अध्ययन करने के लिए बनाई गई
थी. पाव्लव इस कमिटी का सदस्य था. पीटरबुर्ग के कसाईखानों में इस्तेमाल में लाए जा
रहे दो तरीकों पर विचार किया जा रहा था – “तथाकथित रूसी” (जो असल में जर्मन था) और
“तथाकथित यहूदी” – रिपोर्ट्स में उन्हें इन्हीं नामों से दिखाया गया था. कमिटी के
सदस्यों के विचार परस्पर विरोधी थे. पाव्लव, उदाहरण के लिए
“यहूदी तरीके” को प्राधान्य दे रहा था, जबकि प्रोफेसर एन. ई.
व्वेदेन्स्की – “रूसी तरीके” को. इस मुख्य बहस के विस्तार में नहीं जाएँगे;
जानने के इच्छुक और कड़े दिल वालों को “रूसी पशु-संरक्षण समाज” के
सन् 1893 के बुलेटिन में छपी संबंधित रिपोर्ट्स का हवाला दूँगा. हमारे लिए ये महत्वपूर्ण
है कि पाव्लव के विरोधी, और वह ख़ुद भी अपने ख़ुद के प्रयोगों पर
निर्भर थे, हालाँकि उनके परिणामों का वे अलग-अलग तरह से विवेचन
कर रहे थे, और ये वैज्ञानिक प्रयोग पाव्लव ने कुत्तों पर किए
थे. “इन्सान के चौपाए मित्रों” की विज्ञान की वेदी पर न सिर्फ लोगों की तंदुरुस्त ज़िंदगी
की ख़ातिर, बल्कि पशुओं की यातना रहित मृत्यु की ख़ातिर भी बलि
चढ़ाई गई.
उसका इस तरह का काफ़ी काम था,
एक उपयोगी गाइड, जो “संरक्षकों” के लिए नहीं था
– “शरीर विज्ञान के प्रयोगों और चीरफाड़ की सामान्य तकनीक” (1910) – पच्चीस चित्रों
सहित : ‘हेड-होल्डर्स’, जबडों के लिए क्लिप्स,
चीरफाड़ की मेज़ें और बोर्ड्स...इनमें से किसी-किसी उपकरण को स्मारक की
नक्काशी से दिखाया गया है. “कभी-कभी, जब किन्हीं अत्यंत बहुमूल्य
जानवरों पर छोटे-छोटे अतिरिक्त ऑपरेशन करने पड़ते हैं और एनेस्थेशिया की सम्पूर्ण सुरक्षितता
पर कोई संदेह उपस्थित होते हैं, तो जानवर को दर्द पहुँचाना और
ख़ुद के लिए भी बिना एनेस्थेशिया के ऑपरेशन करने की मुसीबत मोल लेना ज़्यादा बेहतर है.”33
चाहे कितना ही विचित्र क्यों न प्रतीत हो, एक ईमानदारी
आदमी, बिना किन्हीं उच्च आदर्शों का सहारा लिए अच्छी तरह महसूस
करता है कि वह कुत्तों के प्रति ऋणी है, ये ऐसा ऋण है,
जो चुकाया नहीं जा सकता...
अब समय आ गया है चौथी नक्काशी
के नीचे इबारत लिखने का ( ऊपर दी गई अख़बार की टिप्पणी में सिर्फ तीन ही हैं...). “लम्बे
समय से इन्सान के प्रति झुकाव के कारण, अपनी चतुराई,
धैर्य और आज्ञाकारिता की बदौलत कुत्ता कई सालों तक, और कभी कभी ज़िंदगी भर भी, प्रयोगकर्ता की प्रसन्नता पूर्वक
सेवा करता है”.
ख़ास बात,
यहाँ, बेशक है - “प्रसन्नता
पूर्वक”. क्या ये स्वयम् को सही साबित करने का प्रयास है? हाँ,
क्या कहा जाए, पैडेस्टल के ऊपर बैठा हुआ कुत्ता
तंदुरुस्त है और शिकार जैसा प्रतीत नहीं होता. वह स्वाभिमानी है, उसका स्नायु तन्त्र मज़बूत है. पेट पर कोई नासूर नहीं है, और सिर भी पूरा सही-सलामत है. एक अर्धगोल की खाल के उच्छेदन का परिणाम,
लार ग्रंथियों की मानसिक उत्तेजना, या भोजन की
मात्रा से निर्धारित अनैच्छिक क्रियाओं की भोजन की अनियंत्रित मात्रा पर निर्भरता –
उसे अभी नहीं मालूम है, कि उस पर प्रयोग करके किस बात का अध्ययन
किया जाएगा.
मगर वह जानता है : इन्सान को
इसकी बहुत-बहुत ज़रूरत है. लोगों पर अविश्वास करने का उसके पास कोई कारण नहीं है.
मार्च
2008
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31. “शरीर
विज्ञान की काँग्रेस के सहभागी अकादमिशियन पाव्लव के पास” – “लेनिनग्राद्स्काया प्राव्दा”
8 अगस्त 1935.
32. इ.
पे. पाव्लव, लेखों
का सम्पूर्ण संकलन. खंड 5. मॉस्को-लेनिनग्राद. 1949, पृ.
166
33.
इ. पे.
पाव्लव, लेखों
का सम्पूर्ण संकलन. खंड 5. मॉस्को-लेनिनग्राद. 1949, पृ.
275.

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