सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

Monuments of Petersburg - 17




पुनःसमर्पित




अपने जीवनकाल में उसने चाहे जो भी झेला होएक बात निर्विवाद है : उससे एक ज़िंदा व्यक्ति की तरह बर्ताव किया गया. जैसे कि वह कोई ऐसा अस्तित्व हो, जो बाहरी प्रभावों को जागरूकता से महसूस करने में सक्षम हो.

उसे चिढ़ाया गया, उसका अपमान किया गया, उसकी परवरिश की गई और सज़ा भी दी गई, मगर उसके अच्छे दिनों में उसे सम्मान भी दिया गया. उसकी ओर से हास्य-व्यंगात्मक बयान जारी किए जाते और उपहासपूर्ण कविताएँ लिखी जातीं. अख़बारों के रिपोर्टर उससे उपहासात्मक प्रश्न पूछ सकते थे. आम तौर से, ये दिखाया जाता था, कि ये अस्तित्व जीवित है, अपनी दुर्भाग्यपूर्ण विशिष्ठता को समझने में सक्षम है. जैसे उससे इंतज़ार था (हाँ, और आज तक इंतज़ार है) जवाबी प्रतिक्रिया का. वो सिर्फ एक “लक्ष्य” नहीं था, बल्कि “व्यक्ति” भी था – अनुभव करने योग्य व्यक्ति था.

हो सकता है कि इसीलिए उससे अभी तक थोड़ा-बहुत डरते थे. किसे पता कि उसके दिमाग़ में क्या हो? और वह कितना संवेदनशील हो? एक वैज्ञानिक विषय के रूप में स्मारकों के मनोविज्ञान का अभी आरंभ  हो ही रहा है.

अपनी पहचान वह खो चुका है, मगर इससे पहले, सचमुच में उसने इसे हासिल किया था. ये हुआ था 23 मई 1909 को, ज़्नामेन्स्काया चर्च में, घंटों की आवाज़ के बीच. त्सार का परिवार, राजनयिक, मिनिस्टर्स, गार्ड यूनिट्स के प्रतिनिधि...निकोलाय II, फौजों का कमाण्डर. अनेक प्रतिनिधि मंडलों द्वारा लाए गए पुष्प चक्र. सुबह-सुबह पेत्रोपाव्लोव्स्काया किले से तोप के गोलों के बीच आगामी आयोजन के बारे में सूचित किया गया, और अब हज़ारों लोग इंतज़ार कर रहे हैं कि उन्हें चौक पर कब छोड़ा जाएगा. काँसे का बना हुआ, वह निकोलायेव्स्की रेल्वे स्टेशन की बिल्डिंग की ओर देख रहा है, आख़िर ये सिर्फ सम्राट का नहीं, बल्कि महान साइबेरियन पथ की नींव रखने वाली सार्वभौम शक्ति” का स्मारक है. महान सत्ता और गौरव. भयानक सम्राट की सीधी नज़र.

बहसें, उत्साह, उपहास, निंदा, दुष्टतापूर्ण कविताएँ – अलमारी पर बैठे हिप्पोपोटेमस के बारे में और हिप्पोपोटेमस पर सवार ठस-दिमाग के बारे में – ये सारा हो-हल्ला, ये ख़ास बात नहीं है. क्या ख़ुद को कार्टून समझना संभव है, अगर चौबीसों घण्टे अनुशासन बनाए रखने के लिए आसपास पुलिस का अफ़सर पहरा दे रहा हो?         

लोगों के झुण्ड, लाल झण्डे. फरवरी–क्रांति की आरंभिक घटनाओं में अपनी इच्छा के विरुद्ध वह सहभागी बन गया था – उसके पैडेस्टल पर, घोड़े के पैरों को पकड़ कर, “डाऊन-डाऊन” चिल्लाने को बेताब शौकीन चढ़ जाते हैं. उसके कोट पर – तमग़े, उसकी तलवार पर जॉर्ज का पट्टा है. मगर आज एक अलग तलवार का त्यौहार है : उसकी आँखों के सामने भीड़ को ख़ुश करते हुए एक विद्रोही कज़ाक ने मार्शल क्रीलव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं. त्सार को नकारने वाले कज़ाकों के बारे में अफ़वाह पेट्रोग्राड में लहरों की तरह हिलोरें ले रही है...

स्मारक इतने समझदार नहीं होते, कि उनके साथ जो हो रहा है उसे समझ सकें. उनके युनिफॉर्म पर क्यों हँस रहे हैं? जूतों में, उनके भीतर डाली गई पतलून में, जनरल की टोपी में क्या खराबी है? घोड़े में क्या बुराई है? बिना पूँछ का है, इसलिए?

अब वह बेइज़्ज़ती और हँसी-मज़ाक का पात्र बनेगा. सिर्फ एक बलि के बकरे की ज़रूरत होती है, वो भी लम्बे समय के लिए. चाहे कितना ही अजीब क्यों न लगे, मगर ये अप्रिय भूमिका ही आख़िरकार स्मारक को बचाने वाली है. महान ड्यूक निकोलाय निकोलायेविच को, अपने पतले पैरों वाले ओर्लोव्स्की के रेस के घोड़े समेत (जो भविष्यवादियों को ज़रा नहीं भाता था) बिना सोचे समझे मानेझ चौक से पिघलाने के लिए भेज दिया गया – बेहद शानदार था वह, मगर भारी, ताकतवर घोड़े पर सवार उसके भतीजे की फ़िलहाल सुरक्षा करने का फ़ैसला किया गया. मज़ाक उड़ाने के लिए. ठूँठ जैसी पूँछ वाले घोड़े को सबसे ज़्यादा निशाना बनाया जाएगा. मगर घोड़े को किसलिए? भारी वज़न वाले पेर्चेरॉन घोड़े की किस्म ही ऐसी होती है. हर घोड़ा त्सार अलेक्सान्द्र III का भारी-भरकम शरीर (या, जैसा कि ख़ुद पाओलो त्रुबेत्स्कोय ने कहा था, “त्सार का भीमकाय शरीर”) नहीं उठा सकता था, - इस समस्या को भारी-भरकम लॉर्ड नाम वाले ने सुलझाया. मगर, वैसे, पेर्चेरॉन घोड़ों की पूँछों को, पुराने रिवाज के अनुसार बढ़ने से रोका जाता था, फ्रान्स में इस पर सिर्फ 20वें शतक के अंत में ही प्रतिबंध लगाया गया है – “हरों” की तरफ़ जाते हुए...

अपने पसंदीदा घोड़े पर बैठे हुए अलेक्सान्द्र III को ये जताया जाता है, कि उसका कोई लिहाज़ नहीं किया जाएगा. शुरू में उसे एकांत कोठरी में बंद करके बाहरी दुनिया से अलग-थलग कर दिया जाता है, जिसे वहीं, ख़ासकर उसके लिए, बनाया गया था. सन् 1921 में “क्रास्नाया गज़ेता” के संवाददाता ने पहली मई के समारोहों का चित्रण करते हुए लिखा है:      

“विद्रोह स्क्वेयर. बिल्कुल चींटियों का पर्वत! सिरों का असीमित सागर. मंच पर वक्ता है. अभी तक हटाए नहीं गए अलेक्सान्द्र III के स्मारक के खोल पर, जो चतुर्भुज टॉवर के आकार का है, मुकुट की तरह बच्चे चढ़े हुए हैं; उन्हें वहाँ से भगाने की कोशिश तो करके देखो! – उन्हें कोई परेशान नहीं करता.

खोल में छिपे पियक्कड-त्सार को, तानाशाह त्सार को खोल के भीतर कैसा महसूस हो रहा है? या वह इस बात से ख़ुश है, कि उसे छुपा दिया गया है, कि उसे कोई नहीं देख रहा है?

मंच पर आज़ादी का मूक-नाटक खेला जा रहा है. संगीत गरज रहा है. श्रम-नायकों को पुरस्कार देने का सिलसिला शुरू होता है”. 37  

ऐसा लग रहा है, कि इस अभागे स्मारक से असल में अपनी बुरी तबियत के बारे में रिपोर्ट का, या पश्चात्ताप के संकेत का इंतज़ार किया जा रहा है.

महान अक्टूबर क्रांति की पाँचवी सालगिरह से पहले एक असाधारण बात हो गई: स्मारक का पुनःप्रतिष्ठापन. पेट्रोसोवियत के निर्णय के अनुसार गुलाबी ग्रेनाइट के पैडेस्टल पर, जो कभी वलाम से मंगवाया गया था, “हौआ” शब्द खोदा गया. नीचे, लकीर के नीचे, दिम्यान बेद्नी की कविता की चार पंक्तियाँ भी खोदी गईं :

मेरे बेटे और बाप को जीवन में ही मार डाला गया / मगर मैंने मृत्योपरांत बदनामी को झटक दिया, / देश की ख़ातिर खड़ा हूँ बनकर लोहे का हौआ, / जिसने हमेशा के लिए निरंकुशता के जुए को उतार फेंका”. किसी इन्सान के बारे में कहते, कि उसे सबसे कमज़ोर जगह पर मारा है (बाप और बेटे की मौत का मज़ाक उड़ाया है); मगर एक स्मारक को सताने के लिए, लगता है, ये कम ही है – धातु को कुछ और विकृत करना चाहिए – काँसे को लोहा कहना. दिम्यान बेद्नी ने, ज़ाहिर है, लेखकत्व छोड़ दिया है – कम होशियार लोगों के लिए एक हस्ताक्षर दिया गया है : “रूस का उपान्त्य शासक अलेक्सान्द्र III”.

अभी कल तक निरंकुश रूढ़िवाद का शानदार प्रतीक, हर तरह के नये आविष्कारों के ख़िलाफ़, जैसे जानबूझ कर निकोलायेव्स्की रेल्वे स्टेशन – रूस के पहले रेल मार्ग - की ओर देखता हुआ स्मारक आज वाकई में “लोहे का हौआ” बनकर रह गया है, जो अपनी ही बदनाम विशेषता के ऊपर खड़ा है. 
स्मारक के सामने शहर के निवासियों का झुण्ड खड़ा है, जो मुस्कुराते हुए इस इबारत को पढ़ रहे हैं”.
ये “क्रास्नाया गज़ेता” के सायंकालीन संस्करण से है; 38 सुबह के संस्करण में भी इसी बारे में लिखा गया था : “ज़्यादातर लोग अपनी नोटबुक्स में इबारत लिख रहे हैं”.

कह सकते हैं, कि स्मारक के साथ परस्पर संवाद स्थापित हो गया है.         

स्मारक से ये कहा गया कि वह स्वयम् को अपने विपरीत व्यक्ति का स्मारक समझे – अब ये स्मारक है “मृत्योपरांत बदनामी” का. स्मारकों में सहन शक्ति होती है. इस सहनशक्ति को प्रकट रूप से महसूस किया गया. ख़ासकर सार्वजनिक त्यौहारों के दिनों में.

अक्टूबर क्रांति की दसवीं सालगिरह की पूर्व संध्या को काँसे का त्सार स्वयम् को सलाखों के पीछे पाता है. “हौआपिंजरे में बंद है”. – “क्रास्नाया गज़ेता” सूचित करता है. 39 अब “वो” एक कलात्मक संरचना का हिस्सा है, जिसमें अमूर्त ज्यामितीय आकृतियों का पूरी तरह से विशिष्ठ प्रतीकों, जैसे हँसिया और हथौड़ा या USSR शब्दों से संयोजन दिखाया गया है. एक विशाल फ्लाईव्हील, जो अंतरराष्ट्रीय श्रम आंदोलन का प्रतीक है, स्मारक के पीछे लगाए गए एक स्प्रिंग जैसे टॉवर को घूमने पर बाध्य करता है.

तीस के दशक के अंत में उपहास की तीव्रता काफ़ी कम हो गई. अपमानित स्मारक की उपस्थिति जनता के लिए बोझ बन गई. अधिकारी भी उससे बेज़ार हो चुके थे. ये फ़ैसला किया गया कि समाजवादी क्रांति  की बीसवीं सालगिरह उसके बगैर मनाई जाए. समारोहों से तीन सप्ताह पहले – आधी रात को – स्मारक को हल्की सी भारहीनता का एहसास हुआ, भारी-भरकम घोड़े के पैरों के नीचे का ठोस आधार खिसक गया. फिर – अंधेरे कमरे की दीवारें...सन् सैतीस के दमन की आँच उस तक भी पहुँची. उसके पुर्जे अलग करके गोदाम भेज दिया गया. अंतिम विनाश बस होने ही वाला था.

लेखक एन. एल. पदोल्स्की ने मुझे एक दंतकथा सुनाई, जो एक ज़माने में शहर के कलाकार बुद्धिजीवियों के बीच प्रचलित थी. जैसे स्मारक को पिघलाने के काम में युद्ध ने बाधा डाली, शहर के अधिकारी स्मारक के बारे में भूल गए, रूसी म्यूज़ियम के पर्यवेक्षक ने त्रूबेत्स्की की कलाकृति को ब्रेड के बदले किसी दुकानदार को दे दिया. इसमें सच बात सिर्फ एक है : रूसी म्यूज़ियम ने वाकई में इस स्मारक को बचाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी.40 मगर घोडे के शिल्प को म्यूज़ियम को सौंपने का निर्णय युद्ध से पहले ही लिया गया था – सन् 1939 में. बस एक बार काँसे के अलेक्सान्द्र की आँखों के सामने दुनिया नब्बे डिग्री घूम गई, और इसका मतलब अंत से बिल्कुल नहीं था, बल्कि सिर्फ ये था कि वे करवट के बल लेटे रहे – घोड़ा भी और त्सार भी. छोटी सी तकनीकी खामी. उलट दी गई कई टनों वाली वस्तु को उठाना मुश्किल है, मगर ये काम मिखाइलोव्स्की गार्डन में हुआ, म्यूज़ियम की बगल में – शायद स्मारक को माफ़ी मिल गई थी?

फिर म्यूज़ियम के कामगारों के प्रयत्नों से उसके चारों ओर रेत के बोरे लगा दिये गए, लकड़ी के तख़्ते ठोंक दिये गए, ऊपर से मिट्टी डाल दी गई – और तभी युद्ध शुरू हो गया. उसके चारों ओर सुरक्षात्मक कवच बनाया गया, और वाकई में – वह सुरक्षित रहा : सन् इकतालीस में बम के गोलों की सीधी मार से.

फिर वह कई सालों तक बेनुआ बिल्डिंग के भीतरी कम्पाऊण्ड की दीवार को देखता रहा. वह अब स्मारक नहीं रहा, वह प्रदर्शनीय वस्तु बन गया है. ये सच है, कि उसे खुल्लम खुल्ला प्रदर्शित नहीं किया जाता. मुझे याद है, कि कैसे बचपन में म्यूज़ियम की खिड़की से कम्पाऊण्ड में झाँका करता था – परदे और तिरपाल कस कर लगाए गए थे, एक स्टैण्ड खिड़की के पास जाने से रोकता था, मगर किसी न किसी तरह दीवार और पर्दे के बीच की झिरी में से देखा जा सकता था : मैंने कम्पाऊण्ड का एक हिस्सा और घोड़े पर बैठी भारी-भरकम आकृति को देखा. रहस्यमय स्मारक के बारे में काफ़ी अस्पष्ट सी बातें होती थीं – शायद उस पर प्रतिबंध लगा है, या उसे छुपाया गया है...

फिर कुछ और साल लकड़ी की खोल (ये उसके लिए आश्चर्य की बात नहीं है) – जिसके भीतर उसने बेनुआ बिल्डिंग की पूरी मरम्मत का दृढ़ता से मुकाबला किया.

सन् 1990 में उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाते रहे, मगर कम्पाऊण्ड की सीमा के भीतर ही, और चार साल बाद मार्स-फील्ड के पीछे बने मार्बल-पैलेस में भेज दिया गया, ताकि उसे सब देख सकें. अश्वारोही शिल्प को बख़्तरबंद गाड़ी “पूंजीवाद के दुश्मन” के स्थान पर स्थापित किया गया, जिसके निकट ही मुझे अपने ज़माने में पायनियर्स टुकड़ी में प्रवेश मिला था. हर पायनियर जानता था, कि लेनिन के भाई ने त्सार अलेक्सान्द्र को मारने का प्रयास किया था, मगर, ये बात, कि लेनिन की बख़्तरबंद गाड़ी के स्थान पर ही कभी घोड़े पर सवार त्सार अलेक्सान्द्र III की आकृति प्रकट होगी, इस बात की, बेशक, धरती पर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था. अगर अंत तक पूरी बात सही-सही बताऊँ, तो बख़्तरबंद गाड़ी के बाद इस जगह पर कुछ समय के लिए एक और चीज़ आई थी – “संगमरमर की फोर्ड”, विजयी  पूंजीवाद का प्रतीक, मगर उसके बारे में सब भूल गए हैं. और जब पायनियर्समें प्रवेश मिल रहा था, तो मुझे अच्छी तरह याद है. “मैं तुम्हें म्यूज़ियम में ले जाऊँगी, बहन ने मुझसे कहा था...” – ये भी हमें याद था. मार्बल-पैलेस तब लेनिन सेन्ट्रल म्यूज़ियम की शाखा थी. अब भी वह शाखा ही है – सिर्फ शासकीय रूसी म्यूज़ियम की. इसीलिए घोड़े पर सवार अलेक्सान्द्र III को यहीं प्रतिस्थापित कर दिया गया...

इस तरह, मूर्ति स्मारक नहीं, बल्कि म्यूज़ियम की प्रदर्शनीय वस्तु ही बनी हुई है. हर चीज़ सुरक्षित नहीं बची है. जॉर्ज वाला पट्टा खो गया है, घोड़े की रास भी नहीं है, जिसे कभी बड़े आत्मविश्वास से त्सार खींचता था. दोनों ही नुकसान अपनी तरह से प्रतीकात्मक हैं.

अचरज की बात ये है कि काँसे के त्सार पर मनोवैज्ञानिक प्रयोग आज भी जारी हैं. सन् 2007 में उसके सामने एक अन्य चीज़ की स्थापना की गई – प्रागैतिहासिक छिपकली पर सवार एक तंदुरुस्त चीनी महिला की. ये फिनलैण्ड के कलाकारों का काम है – प्लास्टिक का. “ताँबे के घुड़सवार” की ओर इशारा करता हुआ. कुछ इसी तरह का.

घोड़े के साथ तो सब ठीक है : सिर झुकाए वह नीचे की ओर ही देखता है – अपने पैरों के अलावा उसने इस ज़िंदगी में कुछ भी नहीं देखा है. मगर सम्राट के लिए नज़र हटाना उचित नहीं है, चाहे उसने बहुत पहले ही अपने चारों तरफ़ हो रही घटनाओं को समझना बंद कर दिया हो. तो, वे दोनों एक दूसरे की ओर देख रहे हैं – काँसे का घुड़सवार, जिसे लम्बे समय तक पैरोडी कहा जाता रहा, और प्लास्टिक वाली पैरोडी – खुल्लमखुल्ला- उसके पूर्वज सम्राट पर.

सहन करना होगा.

स्मारक, सामान्य रूप से, सहनशील होते हैं.

जून 2008


            
        
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37. “क्रास्नाया गज़ेता” 4 मई 1921
38. “क्रास्नाया गज़ेता” 11 अक्तूबर 1922..
38. “क्रास्नाया गज़ेता” 4 नवम्बर 1927.
40. एल. पी. शपोश्निकवा. अलेक्सान्द्र III का स्मारक. शिल्पकार पाओलो त्रूबेत्स्की. सेंट पीटर्सबुर्ग, 1996 पृ, 23.

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