कब्रिस्तानों में
1.
अगर तीख्वीन्स्की और लज़ारेव्स्की कब्रिस्तानों
को अलग करने वाले गलियारे की दीवारें न होतीं, तो
दस्तयेव्स्की की अर्ध-प्रतिमा लेखक की कब्र से सीधे उस आदमी के स्मारक को देख रही
होती, जो पूश्किन से मिलता जुलता है, जैसा
कि उसे हमारी फ़िल्मों में दिखाया जाता है : घने कल्ले, चेहरे
के “गैर-रूसी” नाक नक्श...वहाँ से गुज़रने वाला कोई भी हैरत से जम ही जाएगा. मगर
पूश्किन का यहाँ, बेशक. कोई काम नहीं है.
वे समकालीन थे – बस इतनी ही बात है.
काँसे का आदमी ठण्डे पत्थर
पर लेटा है, जोड़ों का दर्द अब उसे डराता नहीं
है – यूँ ही वह डॉक्टर नहीं है. बाईं करवट लेटा है, सिर
कोहनी पर मुड़े हुए हाथ पर टिका है. बेहद अभिव्यक्तिपूर्ण शिल्प है. छोटी-छोटी बात
का इतना सूक्ष्म चित्रण (जैसे, बाल बनाने का स्टाइल, बालों को जमाने की स्टाइल...) अतियथार्थवाद की ओर इशारा करता है. निःसंदेह,
ऐसे ही एडोल्फ मगीर को लोग जानते थे.
मगीर ड्यूक मैक्समिलियन
लेख्तेनबेर्ग और उनकी पत्नी – ग्रैण्ड डचेस मरिया निकोलायेव्ना (निकोलाय प्रथम की
बेटी) के महल का डॉक्टर था. उसके बारे में बहुत कम जानकारी है. मगर वो ख़ुद – जैसे
बिल्कुल जीवित हो.
उसने फ्रॉक कोट,
ओवरकोट पहना है, बो-टाई लगाये हुए है. जूते –
बिल्कुल नए जैसे. जूतों के तलवे एकदम चिकने – ऐसे तलवों ने ज़मीन को छुआ नहीं होगा,
एक भी बार नहीं! दिमाग़ में ख़याल आता है, कि
उसे लेटी हुई अवस्था में ही कपड़े पहनाए गए हैं. तो फिर वह ज़िंदा है या नहीं?
आँखें खुली हैं, मगर बात ये नहीं है : क्या
अपनी मृत्यु के बाद वह आख़ें खोले वहाँ लेटा है या सिर्फ लेटा है – लेट गया और लेटा
ही है? ल्युथेरन दफ़न विधियों से कुछ समझने की कोशिश करें.
पीटर्सबुर्ग – चाहे यूरोप की खिड़की हो, मगर कब्रों के ऊपर
वाले विविध स्मारक पत्थरों के बीच – ठण्डे पैडेस्टल्स पर लेटी हुई आकृतियाँ लगभग
नहीं हैं. अगर सही कहें, तो सिर्फ दो हैं. दोनों लज़ारेव्स्की
कब्रिस्तान में, या, जैसा कि सन् 1935
से उसे कहते हैं, XVIII शताब्दी के म्यूज़ियम-कब्रिस्तान में
हैं. दोनों, विरोधाभासी ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण – अब
सेनोटाफ़ बन चुके हैं.
सेनोटाफ – उस कब्र के ऊपर
बना हुआ स्मारक होता है, जिसमें मृतक के अवशेष नहीं
होते. सेनोटाफ़ को उस हालत में बनाया जाता है, जब साधारण रूप
से दफ़नाने की संभावना न हो – जैसे, अगर मृत शरीर मिला न हो.
कभी कभी सेनोटाफ से तात्पर्य होता है उस स्थान से जहाँ किसी व्यक्ति की, या व्यक्तियों के समूह की मृत्यु हुई हो. मगर यहाँ बात कुछ और है, आम तौर से कहें तो, विशिष्ठ है, हालाँकि इस कब्रिस्तान के लिए ख़ास है. यहाँ की झूठी कब्रें – अपने आप में
म्यूज़ियम में प्रदर्शनीय वस्तुएँ हैं. लज़ारेव्स्की कब्रिस्तान, जैसा कि मशहूर है, स्मारक-म्यूज़ियम है. उसका निर्माण,
हर कब्रिस्तान की तरह, स्वाभाविक रूप से ही
हुआ था, मगर ‘सिर्फ’ स्वाभाविक तरीके से नहीं. बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में यहाँ अन्य
कब्रिस्तानों से चालीस से ज़्यादा स्मारकों को स्थानांतरित किया गया, जो ऐतिहासिक-कलात्मक दृष्टि से बहुमूल्य थे (बेशक, तत्कालीन
पैमाने के अनुसार). किन्हीं-किन्हीं कब्रों के साथ अवशेषों को भी फिर से दफ़नाया
गया, किन्हीं-किन्हीं में – नहीं.
जैसे,
वास्तुकार ए. डी. ज़खारव और उसके माँ-बाप की कब्र का स्मारक-पत्थर
स्मोलेन्स्क ऑर्थोडॉक्स कब्रिस्तान से अवशेषों सहित लाया गया था, मगर शिल्पकार अगोस्तिनो त्रिस्कोरिन के अवशेषों को स्मोलेन्स्क ल्युथेरन
कब्रिस्तान में नहीं छेड़ा गया, पर शेर के संगमरमरी पंजों पर
खड़े स्मारक स्तम्भ को यहाँ लाया गया – इस इरादे से कि वो यहाँ एक प्रदर्शनीय वस्तु
की तरह रहे. लेटे हुए आदमी की यहाँ एक और मूर्ति है ( वही,
दूसरी वाली – पीटर्सबुर्ग के कब्रिस्तानों में और तो कोई मिलेगी नहीं) : डॉक्टर
मगीर से भिन्न, जिसकी आँखें खुली हैं, ये
स्पष्ट रूप से सो रहा है. सिर फौजी टोप पर इस तरह रखा है, मानो
तकिये पर रखा हो. उसे सिम्योनव्स्की रेजिमेन्ट के लाइफ़-गार्ड का यूनिफॉर्म पहनाया
गया है. फ़ौलाद का. स्टाफ़-कैप्टेन ई. एक्स. फ़ोन रैसिग के अवशेष उसके माँ-बाप तथा
सगे भाई के अवशेषों के साथ वोल्कोवो ल्युथेरन कब्रिस्तान में रह गए. मगर फ़ौलाद का
स्मारक पत्थर पूरा का पूरा यहाँ लाया गया – विशाल ताबूत के साथ, जो सोई हुई मूरत के लिए पैडेस्टल बन गया.35 .
मगर डॉक्टर मगीर के शिल्प
को बगैर पैडेस्टल के लाया गया.36 स्मारक के लिए प्रवेश द्वार के पास
वाली दीवार के निकट स्थान निश्चित किया गया. अवशेष वहीं रहे,
जहाँ वह भी था – स्मोलेन्स्क ल्युथेरन कब्रिस्तान में, ग्रेनाइट के विशाल ब्लॉक के नीचे.
अधिकांश ऐतिहासिक
कब्रिस्तान नष्ट किए जा रहे थे, स्मारकों को
उन्हीं की सुरक्षा के लिए स्थानांतरित किया गया.
स्मोलेन्स्क ल्युथेरन
कब्रिस्तान में आख़िरी बार मैं सन् 2008 के बसंत में गया था – कब्रिस्तान की हालत
बेहद दयनीय थी. शवकक्ष-खंडहर, ध्वस्त-स्मारक
स्तंभ, काँसे के बारे में कुछ कहा ही नहीं जा सकता – काँसे
का कोई भी हिस्सा नहीं बचा था...दक्षिण-पूर्वी हिस्से में, उस
दीवार से कुछ दूर, जिसके पीछे कार-रिपेयर्स की दुकानें हैं,
मैं एक बोल्डर से टकराया जो कभी लेटे हुए आदमी के काँसे के शिल्प के
लिए पैडेस्टल का काम करता था. ये ही मगीर की असली कब्र है, उसके
अवशेष यहाँ हैं. थोड़ा सा हट कर किनारे पर – बेघर लोगों के सोने की जगह है : खाली
बोतलें, चीथड़े, जले हुए कंबल, बिस्तर, अलाव के निशान...
बोल्डर पर खुदा है कि ये
कब्र किसकी है. पत्थर से झाँकता हुआ एक छोटा सा स्क्रू इस बात की याद दिलाता है कि
कभी यहाँ कोई ज़रूरी चीज़ बंधी हुई थी.
“हम वहाँ मिलेंगे!” – बस
यही समाधि-लेख था.
“वहाँ”,
यकीन करना चाहिए, सभी मिलेंगे, मगर “यहाँ” – वह पैडेस्टल, जिस पर वह खुदा हुआ है,
और उसके नीचे के अवशेष भी स्मारक से जुदा कर दिए गए हैं.
बेशक,
काँसे के शिल्प के पास इस कब्रिस्तान में बचने का एक भी मौका नहीं
था. उसे सिर्फ मृत डॉक्टर के शिल्प को उसके भौतिक अवशेषों से जुदा करके ही
सुरक्षित रखा गया. मगर कब्र तो बच गई. यही है वो...
फिर से,
ज़ाहिर है, एक बहुत अच्छे मकसद से, सन् 2004 में म्यूज़ियम-कब्रिस्तान में नया पैडेस्टल बनाया गया, कब्र के ऊपर जो रह गया था, उससे मिलता जुलता – इसे
भी बोल्डर पर ही बनाया गया था, शायद, आकार
में कुछ छोटा था, समाधि-स्मारक को परिपूर्ण आकार दे दिया गया
– “असली जैसा”, और असली वाला, बगैर
स्मारक के, वहीं रह गया, जहाँ सचमुच
में अवशेष पड़े हैं.
मगीर की जन्मभूमि –
बवारिया थी, उसका निधन हुआ पीटर्सबुर्ग में
पैंतीस साल की उम्र में.
काँसे का आदमी,
पत्थर के बोल्डर पर करीब नब्बे साल से पड़ा हुआ आसमान और ल्युथेरन
कब्रिस्तान के पेडों के शिखरों को देखता रहा. नब्बे साल – पीटर्सबुर्ग के अनेक
स्मारकों के लिए खतरनाक उम्र रही है, इस काल खण्ड के बीत
जाने के बाद उनके साथ कुछ न कुछ होता ही है. यहाँ भी कुछ तो हुआ था, और वह अपनी कब्र पर नहीं है, हर हाल में, अपनी कब्र पर, और उसकी आँखों के सामने वो है,
जो पहले नहीं था. रात्कोव-रोझ्नोव का चर्च-तहख़ाना...
यूनानी शैली का ये नमूना
पूरे आसमान को नहीं ढाँकता था. आसमान कुछ समय बाद ढँक गया – छत पर बड़े-बड़े अक्षरों
वाली एक अजीब सी संरचना से. हालाँकि हम इस धरती पर मेहमान हैं,
मगर ये कैसे पता चले कि वहाँ एक होटल है?...बवारिया
के निवासी को ये शाप मिला है, कि वह मॉस्को शब्द
को देखता रहे और समझ न पाए कि वह कहाँ है.
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35. कलात्मक
स्मारक-पत्थर...खण्ड 3. पृ. 104, 105, 245-247, 282, 283.
36. वहीं. खण्ड 3, पृ. 174, 175
2
मैंने
पीटर्सबुर्ग के नोवोदिविच्ये कब्रिस्तान को भी अत्यंत दयनीय अवस्था में पाया, अस्सी के दशक के आरंभ में, जब कई
वर्षों से चल रहा विनाश अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था. अलेक्सान्द्र कुश्नेर तब
तक लिख चुका था : “कैसे हैं हमारे कब्रिस्तान! / उनकी उपेक्षा - / ज़िंदगी से और
मौत से इनकार / मौत से...” ये उसी के बारे में है, नोवोदेविच्ये
के बारे में.
आह,
लगाने के लिए नहीं है
फूल
इस अवशेष और विनाश पर!
अगर न होता त्यूत्चेव, शायद,
कभी का उसे उखाड़ देते.
कब्रिस्तान
को अभी तक पूरी तरह नष्ट न किये जाने का कारण है, अफ़वाहों
के मुताबिक, वहाँ एक और कब्र का होना – क्रूप्स्काया के पिता को
यहीं दफ़नाया गया है : यहीं पर नादेझ्दा कन्स्तान्तिनोव्ना की शताब्दी के अवसर पर
बेर्न से उसकी माँ के अवशेष भी लाए गए – ये सन् ’69 था, ख़ुद लेनिन की जन्म शताब्दी की तैयारियाँ चल रही थीं.
साथ ही, एक संगठित पद्धति से, “फ़ालतू”
कब्रें नष्ट हो रही थीं,
उनकी संख्या सैकडों में
थी.
क्रूप्स्काया
के माँ-बाप की कब्र उन थोड़ी सी कब्रों में से थी जिनका ध्यान रखा जा रहा था. मगर
फिर भी इसका उस विशेष सम्मान से कोई मुकाबला नहीं है, जिससे
एकदम दूसरे लोग आन्ना अकिमोव्ना वेर्शीनिना की कब्र के चारों ओर इकट्ठा होते थे.
वेर्शीनिना घुड़सवार दस्ते के जनरल की पत्नी थी, जिसकी
सन् 1914 में मृत्यु हो गई थी.
इस
तस्वीर को भुलाया नहीं जा सकता. बगल में मॉस्को-एवेन्यू है,
मगर यहाँ करीब-करीब जंगल
है. घनी घास,
गोखरू के पौधे, ध्वस्त खाइयाँ, खुदी
हुई कब्रें : किन्हीं निर्माण कार्यों की आवश्यकता के कारण अधिकांश ग्रेनाइट चुरा
लिया गया है;
इक्का-दुक्का
स्मारक-प्लेट्स बेतरतीबी से ज़मीन से झाँक रही हैं; वीराना
– एक भी रूह नहीं...और अचानक – काँसे का क्राइस्ट, पूरे
आकार का. और उसके पीछे गुलाबी ग्रेनाइट की ऊँची सलीब और बहुत सारे ताज़ा फूल, और मोमबत्तियाँ जल रही हैं...इस जगह पर चाहे मैं किसी
भी समय क्यों न आया,
मोमबत्तियाँ हमेशा जलती
रहती थीं...
पी.आई.
क्युफर्ली प्रथम श्रेणी का शिल्पकार नहीं था. त्सार अलेक्सान्द्र II का स्मारक,
जो मुरीनो गाँव में स्थापित
किया गया था सुरक्षित नहीं बचा;
उसका दूसरा काम – क्रांतिकारी
शिल्प “आंदोलनकर्ता” शायद म्यूज़ियम के स्ट्राँग रूम में सुरक्षित है. शिल्पकार के विषयों
का आयाम, निःसंदेह,
चौंकाने वाला है, मगर,
अगर किसी शिल्प ने ख़ुद क्युफर्ली
को चकित किया होगा,
तो, मेरे ख़याल में, वो है क्राइस्ट
की काँसे की मूर्ति का नसीब,
जिसे उसने जनरल वेर्शीनिन
की पत्नी की कब्र के स्मारक-पत्थर के रूप में बनाया था.
कई
लोगों के लिए ये स्मारक से भी बढ़कर है.
यहाँ
हमेशा लोग रहते हैं. कुछ देर रुककर प्रार्थना करने के लिए आते हैं. दूसरे शहरों से
लोग आते हैं. काँसे का क्राइस्ट एक मिनट के लिए भी अकेला नहीं रहता – कम से कम जब तक
कब्रिस्तान खुला है,
तब तक (कुछ समय से वह शाम
के छह बजे बंद हो जाता है).
इसी
शिल्प के साथ जनरल की पत्नी का सम्प्रदाय और उसकी कब्र जुड़ी है. स्मारक पर किए जाने
वाले रहस्यमय अनुष्ठानों के बारे में बात नहीं करूँगा, क्योंकि
मुझे ख़ुद भी समझ में नहीं आया है. मैंने पढ़ा था, कि कुछ
आगंतुक काँसे की मूर्ति को धोने के बहाने से पानी को शुद्ध करते हैं, - पता नहीं,
मैंने देखा नहीं. एक बात
बताऊँगा : काँसे का क्राइस्ट अनेक वर्षों से इस उद्ध्वस्त कब्रिस्तान में खड़ा है और
आज तक सुरक्षित है,
ये बात ही आश्चर्यजनक प्रतीत
होती है. अगर आप उत्सुकता दिखाएँगे,
तो हो सकता है कि आपको यहाँ
किस्सा सुनाएँगे,
कि कैसे एक बार नास्तिकों
ने स्मारक पर हमला बोल दिया था. काँसे के क्राइस्ट के पैर काट दिए थे – उसके चोगे की
किनार तक, मगर वह,
जिसने ये किया था, कोई श्रमिक था, एक दिन
बाद ट्राम के नीचे आ गया,
और उसके दोनों पैर काटने
पड़े थे.
कभी
दबी ज़ुबान से मुझे ये बताया गया था,
बिल्कुल फुसफुसाहट से. अब
तो ये कहानी इंटरनेट पर हर तरह से दुहराई जाती है. लगभग रहस्यमय सम्प्रदाय वाली ये
जगह शहर का प्रेक्षणीय स्थल बन गई है.
खैर, एक ऐतिहासिक तथ्य : स्मारक को एक बार वाकई में ज़मीनदोस्त
कर दिया गया था – बिना तकनीकी साधनों की सहायता से ये संभव नहीं था. और दूसरी बात :
काँसे के क्राइस्ट के पैरों के पंजे नहीं हैं.
साथ
ही ये भी स्पष्ट है कि पीटर्सबुर्ग में इतना सम्मानित स्मारक अन्य कोई नहीं है.
मई 2008

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