पैर में ऐंठन
शायद गोल चष्मे की वजह से
हो, मगर दूर से वह सचमुच में बुढ़ा गए और ज़्यादा
अक्लमंद हो गए हैरी पॉटर जैसा लगता है, और कुछ-कुछ जॉन लेनन
जैसा भी, छोटे-छोटे बालों वाला और सूट पहना हुआ. और, बेशक, गुज़रे ज़माने के सकारात्मक नायक का “समकालीन का
आदर्श”, जैसे मिडल स्कूल के बारे में समस्यागत सोवियत
फिल्मों का आदर्श शिक्षक, जब इस स्कूल में चात्स्की का स्वगत
भाषण मुँहज़बानी याद करवाया जाता था (मैंने किया था), और न
सिर्फ इतना ही: बल्कि फ़मूसव का भी, और स्कालाज़ूब का भी.
हालाँकि वह ग्रिबायेदव है,
मगर उसे देखकर अक्सर चेर्निशेव्स्की या दब्राल्यूबव का धोखा हो जाता
है.
ऐसा प्रतीत होता है,
कि उसे ख़ुद को भी यह बात महत्वपूर्ण नहीं लगती कि उसे किस नाम से प्रदर्शित
किया गया है. ग्रिबायेदव से? ठीक है, जाने
दो. उसे ख़ुद को कोई फ़रक नहीं पड़ता कि वह कौन है. और अपने चारों ओर की हर चीज़ के
प्रति वह उदासीन है. मौजूद है, जैसे संयोगवश उपस्थित है,
- अगर है, मतलब है, और
नहीं भी हो सकता था. जिस अनासक्ति से वह आसपास के स्थान को देखता है, वो जैसे एक सिद्धांत में ढल गई है. वैसे ही, जैसे
शिल्पकार वी.वी. लीशेव, जिसने ये शिल्प बनाया था, आत्मसंरक्षण के बारे में प्रयत्न कर रहा था – उसने ऐसा कुछ भी नहीं बनाया
है, जिससे किन्हीं अनुमानों को मौका मिले. किन्हीं भी नहीं.
और हाँ,
कुर्सी में बैठा है, चष्मे के भीतर से थकी हुई
नज़र गरोखोवाया स्ट्रीट की गहराई में उलझ गई है. ख़यालों में मग्न. झुका हुआ,
जैसे ध्यानमग्न हो. कोई जुनून नहीं, कोई ललक
नहीं, कोई आवेग नहीं. भावहीन चेहरा, अचरज
होता है – चेहरे पर कोई भाव नहीं हैं.
ज़ाहिर है,
कि वह कुछ रच रहा है. और ये भी ज़ाहिर है कि “बुद्धि से दुर्भाग्य”
की रचना कर रहा है. और वह कर ही क्या सकता है? अगर वह
ग्रिबोयेदव है - तो यहाँ, इस कुर्सी में वह और क्या करेगा? कागज़ के पन्ने
घुटने पर पड़े हैं, मगर हाथ में कलम नहीं है – न दाएँ में,
न बाएँ में. हो सकता है, इसीलिए पन्ने कोरे
हैं. और हमें, जो पैडेस्टल के पास खड़े हैं, साफ़ दिखाई देता है : कागज़ का ऊपरी हिस्सा दर्शकों की ओर झुका हुआ है,
अभी-अभी काँसे के वज़न के साथ मज़बूत घुटने से नीचे फिसलने वाला ही
हैं – कोशिश कर लो छिटकने की.
मगर यदि वह कुछ नहीं लिख
रहा है (और पढ़ भी नहीं रहा है), तो क्या मैं पूछ
सकता हूँ, कि उसने चष्मा क्यों पहना है? कहीं सिर्फ गरोखोवाया को देखने के लिए तो नहीं?
बात ऐसी है. नज़र उसकी एकदम
सीधी है. कहीं भी केंद्रित नहीं ( केंद्रित होना – आवेग है),
और सीधी – सीधेपन से दृश्य को जवाब देती हुई, जो
एडमिरैल्टी की ओर केंद्रित है. और वहाँ है उसका शिखर, वहाँ
है एक छोटा सा जहाज़...अब तो यह यकीन करना भी मुश्किल है कि पहली योजना के अनुसार
स्मारक को किसी दूसरी जगह पर खड़ा होना (या बैठना?) था. तब
किधर देखता? वहाँ, जहाँ स्मारक को पहले
स्थापित करने की योजना थी, वहाँ किसी दृश्य की गुंजाइश ही
नहीं थी.
मतलब,
उसे चष्मा पढ़ने के लिए ही पहनाया गया है, न कि
दूर पर नज़र गड़ाने के लिए. योजना के मुताबिक.
हाँ,
ये सवाल है : क्या ऐतिहासिक ग्रिबायेदव निकटदृष्टि दोष से पीड़ित था
या दूरदृष्टि दोष से?
ये ख़याल कि चष्मा बिना
काँच का है और उसे सिर्फ दिल बहलाने के लिए पहनाया गया है,
हम खारिज कर देते हैं.
काँच चाहे नहीं हैं,
मगर लगता है, कि वे हैं, इस बात पर हमें यकीन करना होगा. चाहे कुछ भी कहिए, ऐसा
कभी-कभार ही होता है : स्मारक, नियमानुसार, चष्मा नहीं पहनते.
हर हालत में,
काँसे के ग्रिबोयेदव को यहाँ हमेशा कुछ न कुछ पढ़ने को मिल जाएगा (
और हमेशा ही मिलता रहा है).
ये काफ़ी कुछ कह जाता है.
ऐसा मानते हैं,
कि इश्तेहार और इसी तरह के बैनर्स सड़कों पर पैदल चलने वालों के लिए,
या कारों में जाने वालों के लिए बिल्कुल नहीं लगाए जाते. सामान्य
पैदल चलने वालों और कारों में जाने वालों में से कितने लोग अपनी इच्छा से इन
बैनर्स पर लिखी हुई इबारत पढ़ते हैं? मैं, मिसाल के तौर पर, बैनर्स का पाठक नहीं हूँ. मेरे
दिमाग़ में तो कभी इन बैनर्स पर तनी हुई जानकारी को समझने का ख़याल भी नहीं आता,
जो वे पहेलियों के रूप में पेश करते हैं. मानता हूँ, कि जानकारी फिर भी आत्मसात् कर ही लेता हूँ, मगर
अवचेतन रूप से, अपनी इच्छा के विरुद्ध. मगर यहाँ बात कुछ और है.
अपनी इच्छा के विरुद्ध उसे, ग्रिबायेदव को – स्पष्टतः और
सीधे – इन बेकार की इबारतों में हिलगा लेते हैं. हमेशा!
वे हमेशा उसकी आँखों के
सामने रहती हैं. उनसे मुँह भी नहीं मोड़ सकते – पैडेस्टल पर बैठा हुआ,
वो पढ़ने से इनकार नहीं कर सकता, जो उसे दिखाया
जाता है.
कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है,
कि वह उनका इकलौता पाठक है, दशकों से, दनादन एक के बाद एक बदलने वाले इन नारों का, आह्वानों
का, इश्तेहारों का. क्या यह सब सिर्फ उस अकेले की ही आँखों
के सामने खींचकर लगाया जाता है, वर्ना इतना निरंतर और
आज्ञाकारी पाठक और कहाँ मिलेगा?
मैं ये भी मानने के लिए
तैयार हूँ, कि ये चष्मा ही सड़कछाप इश्तेहार
वालों को उकसाता है कि अपनी इबारतों को उसके (चश्मे के) मालिक के सामने प्रस्तुत
करें. अगर चष्मा पहने हुए है – तो, मतलब वह पाठक है. ठीक है,
तो फिर पढ़ो, पढ़ते रहो!
और वह पढ़ रहा है. उसके पास
करने के लिए और है ही क्या?
जैसे उसे किसी टीवी
स्टूडियो में किसी एडवर्टाइज़िंग प्रोग्राम के एंकर के स्थान पर बिठाया गया हो,
और वह अपनी आँखों के सामने रखे मॉनिटर में टेलिप्रॉम्प्टर की ओर देख
रहा हो. और ख़ामोश हो. और उसे बस दिखाया जा रहा है, दिखाया जा
रहा है...इस उम्मीद में कि वह दोहराएगा.
मगर इंतज़ार करते रहिए. वह
ख़ामोश ही रहेगा. बोलकर तो एक भी बात नहीं दोहराएगा. स्मारक बातें नहीं करते. चाहे
दशकों तक उनके सब्र का इम्तिहान क्यों न लिया जाए.
असल में प्रयोगों का
उद्देश्य स्पष्ट नहीं है. काँसे के ग्रिबायेदव पर किए जा रहे प्रयोगों का उद्देश्य
रहस्यमय है.
हमारे पास क्या है?
एक युग को बदलते हुए दूसरा युग आता है : देर्झिन्स्की स्ट्रीट थी,
फिर से गरोखोवाया हो गई. स्मारक का सन् 1959 में उद्घाटन किया गया,
नवम्बर समारोहों के दो हफ़्तों बाद और शोकपूर्ण बरसी के नौ महीने बाद
– दूरस्थ पर्शिया में हुई कवि की मृत्यु के 130 साल बाद. तभी चाँद पर रॉकेट भी
छोड़ा गया था. तदनुसार अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच की आँखों के
सामने गर्वीला नारा “सोवियत विज्ञान की जय!” प्रकट हो गया. फिर उसे “मे-डे ज़िंदाबाद!” के नारे से प्रेरित किया गया और बाईसवीं काँग्रेस से
आरंभ करके पार्टी की सभी काँग्रेसों के निर्णयों को पूरा करने की अपील की गई. सोवियत
काल में देर्झिन्स्काया स्ट्रीट पर इश्तेहार लम्बे समय तक लटके रहते थे, मगर बार-बार बदलते नहीं थे, अपीलों की सूची लम्बी
नहीं थी, कभी कभी फुर्सत के लम्बे पल भी मिल जाते थे,
जो ग्रिबायेदव की नज़र को एडमिरैल्टी को देखते हुए आराम करने का मौका
देते थे.
“बुद्धि से दुर्भाग्य” के
लेखक की ओर इबारतों का असली आतंकी हमला सोवियत काल के बाद आरंभ हुआ. उसके काँसे के
चष्मे के सामने अपीलों की श्रृंखला खुलती चली गई, फिर वे
तेज़ी से बदलने लगीं, क्योंकि मामला किसी एक इश्तेहार तक
सीमित नहीं था – गरोखोवाया पर अधिकाधिक इश्तेहार लटकाए जा रहे थे, और हर इश्तेहार दूसरे को रोकते हुए चिल्ला-चिल्लाकर सहनशील ग्रिबायेदव से
कोई अपील कर रहा था. उसे ज़ोर देकर क्रेडिट लेने की सलाह दी जाती, झ्वानेत्स्की के काव्य-पाठ में, रोज़ेनबाउम की
कॉन्सर्ट में आमंत्रित किया जाता, उससे अपने फ्लैट के वॉल
पेपर को बदलने की माँग की जाती, नई कार खरीदने की, ब्रान्डेड माँस-उत्पादों को खरीदने, प्लास्टिक
सर्जरी करवाने और सबसे बेहतरीन टेलिफोन कम्पनियों के सबसे सस्ते टैरिफ़ को चुनने को
कहा जाता. लोगों की अपेक्षा स्मारकों के लिए समय ज़्यादा धीरे गुज़रता है. अत:
स्मारकों की ग्रहणशक्ति की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न प्रकार की इन
सूचनाओं को आराम से ‘क्लिप’ कह सकते
हैं.
सन् 1959 में ग्रिबायेदव
के यहाँ प्रकट होने के पीछे ये प्रेरणा थी, कि बगल
में ही TYUZ (थियेटर फॉर यंग व्यूअर्स) बनाया जा रहा है,
और ग्रिबायेदव को स्कूल में पढ़ाया जाता है. वाकई में दो साल पहले ही
सिम्योनोव्स्की परेड ग्राउण्ड पर TYUZ की बिल्डिंग की आधारशिला
रखी गई थी, जिसने ऐतिहासिक ग्रिबायेदव को कुछ प्रमुखता दी,
जो इस जगह पर कभी गया ही नहीं था, मगर जिसे
स्कूल के पाठ्यक्रम में दस्तयेव्स्की से पहले शामिल किया गया था, जो एक बार यहाँ अपनी मौत की आशंका से ठिठुर गया था. तो, TYUZ की बिल्डिंग और ग्रिबायेदव के स्मारक के बीच कुछ संबंध तो है – आंशिक रूप
से अर्थगत, और कम से कम शैलीगत भी. सड़क के उस छोर पर
एडमिरैल्टी के दृश्य की बदौलत : अगर वहाँ इतना शानदार है, तो
यहाँ भी कुछ वैसा ही होना चाहिए – सम्पूर्णता और सुंदरता के लिहाज़ से. संदर्भ
पुस्तिकाओं में अक्सर ग्रिबायेदव के स्मारक को TYUZ की
बिल्डिंग के परिप्रेक्ष्य में दिखाया जाता है, जो पायनिर्स्काया
स्क्वेयर (जैसा सन् 1962 से सिम्योनोव्स्की परेड ग्राउण्ड को कहते हैं) की गहराई
में स्थित है; ग्रिबायेदव के दोनों तरफ़ से TYUZ तक काँक्रीट की स्लैब्स से बने हुए समानांतर फुटपाथ जाते हैं; ग्रिबायेदव के पीछे, अच्छा है कि वह इसे नहीं देखता,
कुछ बेढंगी, हँसमुख आकृतियाँ हैं, रूपक के शौकीन जवान लड़कों और लड़कियों की (एक के घुटनों पर किताब पड़ी है).
संक्षेप में स्मारक को ऐसे ही शैक्षणिक संदर्भ में समझना चाहिए. मेरे ख़याल में,
ये सही नहीं है. स्मारक निश्चित रूप से आसपास की चीज़ों से तादात्म्य
स्थापित करता है, मगर बिल्कुल अलग तरह का. ग्रिबायेदव को TYUZ
के परिप्रेक्ष्य में, अर्थात सामने से समझने
की अपेक्षा पीठ की तरफ़ से समझना ज़्यादा सही होगा, इस तरह,
कि लटके हुए इश्तेहार दिखाई दें, जिन्हें
ग्रिबायेदव को मजबूरन पढ़ना पड़ता है और जिनके बिना उसकी कल्पना करना मुश्किल है.
इश्तेहारों और बैनर्स से अटी पड़ी गरोखोवाया स्ट्रीट ही कुर्सी पर बैठे हुए काँसे
के अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच ग्रिबायेदव के साथ अर्थगत और शैलीगत तादात्म्य
स्थापित करती है. जहाँ तक TYUZ का सवाल है, उसकी यहाँ कोई ज़रूरत ही नहीं है.
अगर हम पीठ की तरफ़ से ग्रिबायेदव
को देखें, तो ग्रिबायेदव की – जो इन
इश्तेहारों का पाठक है, एक दिलचस्प बात पर गौर किए बगैर नहीं
रह सकते. उसका बायाँ पैर कुछ मुड़ा हुआ है और जैसे मजबूरन दाएँ पैर पर रखा है;
हमें कुर्सी के नीचे से, जिस पर ग्रिबायेदव
बैठा है, उसके जूते का तलवा दिखाया जाता है – इतनी लापरवाही है उसके बैठने में. अगर चष्मे वाला स्मारक दुर्लभ होता है,
तो जूते का तलवा दिखाने वाला स्मारक भी असाधारण चीज़ है. हम पूरा
तलवा देख सकते हैं, पूरी एडी के साथ, स्पष्टता
से, बनावट समेत, और इसके लिए हमें
कुर्सी के नीचे जाने की ज़रूरत नहीं है, ग्रिबायेदव के दायें
कंधे के पीछे ठहरना काफ़ी है, हद से हद (अगर कोई छोटे कद का
हो तो), लॉन को फुटपाथ से अलग करने वाली मुंडेर पर चढ़ना
पड़ेगा. हम देखेंगे : तलवा पैडेस्टल की सतह से लगभग समकोण बना रहा है. अपने आप में
तो वह दिलचस्प नहीं है. मगर पैर का असाधारण रूप से मुड़ना काबिले गौर है. क्या इस
मुद्रा से ये ज़ाहिर होता है कि वह आराम से बैठा है? इस तरह
से बैठकर और पैर को इस तरह मोड़ कर तो देखिए, ऊपर से जूते
पहने पैर को. दर्द होगा. नहीं, जनाब, ये
कुछ और नहीं बल्कि ऐंठन है. ऐंठन ही ग्रिबायेदव के बाएँ पैर को घुमा रही है.
कागज़ के पन्नों की ओर
देखिए. क्या वे यूँ ही घुटने से फिसल रहे हैं? बस एक पल
- और वे सचमुच ही फिसल जाएँगे!...दायाँ हाथ – शिथिल अलसाहट में – उन्हें पकड़ने की
कोशिश भी नहीं कर रहा है. अच्छा, अच्छा...बाएँ हाथ को क्या
हुआ? – कोहनी कुर्सी की पीठ पर पड़ी है, हाथ के लिए दूसरा कोई सहारा है ही नहीं, इस हालत में
उसे क्या ज़्यादा देर रख सकते हो? ग्रिबायेदव का भारी-भरकम
हाथ सीधे कुर्सी की पीठ से नीचे उतर रहा है, फिसल रहा
है!...एक सेकण्ड बाद वह गिर जाएगा!...और वह अपना संतुलन खो बैठेगा!...और, एक ओर गिरने के बाद, वास्तुशिल्पी वी. ई. याकव्लेव
के डिज़ाइन के अनुसार बनाए गए षट्कोणीय पैडेस्टल से नीचे गिर जाएगा. और एक पूरी
कहानी बन जाएगी.
ये एक-दो सेकण्ड बाद ही
होने वाला है, मतलब ये, कि
कभी नहीं होगा, क्योंकि उन दुर्दैवी पलों से पूर्व निश्चित
ही एक पल था, चिर काल के लिए रोका गया पल – एक अंतहीन पल
गहरी मूर्छा से पहले का, जिसमें बस गिरने ही वाला है (और
नहीं गिरेगा) ग्रिबायेदव.
तो ये बात है! यहीं से
चेहरे पर अनासक्ति का भाव है – ये मूर्छित होने से पहले की अनासक्ति है! दर्द उसे
महसूस नहीं हो रहा है (टखने के जोड़ में), अभी उसमें
बैठे रहने की ताकत है, मगर वह तैर चुका है, तैर चुका है, होश खो रहा है...
सब ख़त्म हो गया. आँखों के
सामने अंधेरा है. फमूसव का अधूरा स्वगत वाक्य पूरा करने को जी चाहता है...मगर
फमूसव के बदले तुम्हारे सामने है : “क्रेडिट 1500000 डॉलर्स तक...” – “5% की
छूट...” – “ तुम्हारी आदर्श स्टाईल...”
“हैमोराइड भूल जाओ!”
क्लिनिक का पता दिखाते हुए.
और इस यातना का अंत नहीं
है.
जनवरी
2007


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